गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

राससुन्दरी दासी की यह आत्मकथा 'आमार जीबोन'


राससुन्दरी  दासी  की यह आत्मकथा 'आमार जीबोन' नाम से सन्1876 में पहली बार छपकर आई। जब वे साठ बरस की थीं तो इसका पहला भाग लिखा था। 88 वर्ष की उम्र में राससुन्दरी देवी ने इसका दूसरा भाग लिखा। जिस समय राससुन्दरी देवी यह कथा लिख रही थी, वह समय 88 वर्ष की बूढ़ी विधवा और नाती-पोतों वाली स्त्री के लिए भगवत् भजन का बतलाया गया है। इससे भी बड़ी चीज कि परंपरित समाजों में स्त्री जैसा जीवन व्यतीत करती है, उसमें केवल दूसरों द्वारा चुनी हुई परिस्थितियों में जीवन का चुनाव होता है। उस पर टिप्पणी करना या उसका मूल्यांकन करना स्त्री के लिए लगभग प्रतिबंधित होता है। स्त्री अभिव्यक्ति के लिए ऐसे दमनात्मक माहौल में राससुन्दरी देवी का अपनी आत्मकथा लिखना कम महत्त्वपूर्ण बात नहीं है। यह आत्मकथा कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। सबसे बड़ा आकर्षण तो यही है कि यह एक स्त्री द्वारा लिखी गई आत्मकथा है। स्त्री का लेखन पुरुषों के लिए न सिर्फ़ जिज्ञासा और कौतूहल का विषय होता है वरन् भय और चुनौती का भी। इसी भाव के साथ वे स्त्री के आत्मकथात्मक लेखन की तरफ प्रवृत्त होते हैं। प्रशंसा और स्वीकार के साथ नहीं; क्योंकि स्त्री का अपने बारे में बोलना केवल अपने बारे में नहीं होता बल्कि वह पूरे समाजिक परिवेश पर भी टिप्पणी होता है। समाज को बदलने की इच्छा स्त्री-लेखन का अण्डरटोन होती है। इस कारण स्त्री की आत्मकथा वह चाहे जितना ही परंपरित कलेवर में परंपरित भाव को अभिव्यक्त करनेवाल क्यों न हो, वह परिस्थितियों का स्वीकार नहीं हो सकता; वह परिस्थितियों की आलोचना ही होगा।

  राससुन्दरी देवी की आत्मकथा में कई ऐसी चीजें हैं जो अत्यंत साधारण लगते हुए भी विशिष्ट हैं। पहले पाठ में यह आत्मकथा एक ऐसी संतुष्ट स्त्री की कहानी लगती है जो अपने घर-परिवार, घर में मिले लाड़-दुलार, सामाजिक हैसियत, बेटे-बेटियों और पोते-पोतियों, नाती-नातिनों के साथ, भरे-पूरे परिवार के बीच एक गृहस्थ स्त्री की साध भरी दुनिया में संतुष्ट है। विश्लेषण-वर्णन का अद्भुत तरीका अपनाया है राससुंदरी देवी ने! स्त्री भाषा का एकदम आदर्श नमूना ठण्डी, निरुद्वेग और किसी भी तरह की चापलूसी से रहित! न शिकायत है न आरोप -प्रत्यारोप! फिर भी स्त्री के पक्ष से सारी बातें कह जाती हैं।

  सबसे पहले मैं स्त्री आत्मकथा लेखन की दिक्कतों के बारे में कुछ कहना चाहती हूँ। यह पहली बार हुआ कि 19वीं सदी के आरंभ में बड़े पैमाने पर स्त्री लेखन और स्त्री आत्मकथात्मक लेखन दोनों सामने आते हैं। चूंकि स्त्री लेखन का संसार उसके अनुभव के संसार से ही शुरु होता है, इसलिए स्त्री के आरंभिक लेखन में स्त्री के अनुभव का संसार अति परिचय की हद तक शामिल है। घर -परिवार, पति-बच्चे, घरुआ वातावरण और इसके भीतर के शक्ति संबंधों की दुनिया सब इतनी ज्यादा पहचानी हुई लगती है कि वह महत्तवहीन हो जाती है। ध्यान रखना चाहिए कि महत्वहीन या महत्वपूर्ण साबित करने का काम स्त्री लेखिका नहीं बल्कि पुंसवादी लेखकीय मानदण्डों के आधार पर पुरुष आलोचक लेखक करता है। ऐसे में स्त्री के अस्तित्व को लेकर उसकी के प्रति जो उपेक्षाभाव घर और समाज में होता है, उसी की झलक विचारों और लेखन की दुनिया में भी दिखाई देती है। हिन्दी आत्मकथात्मक साहित्य का आलम यह है कि साहित्येतिहास की पुस्तकों में पहले भारतेन्दु की रचना 'कुछ आपबीती कुछ जगबीती' को हिन्दी की पहली आत्मकथा लेखन का प्रयास कहा गया और फिर जब तक बनारसीदास के 'अर्ध्दकथानक' को नहीं खोज लिया गया, आत्मकथा लेखन की शुरुआत नहीं मानी गई। जबकि स्त्रियों द्वारा लिखे गए आत्मकथात्मक गद्य के नमूने पहले भी मिलते हैं, लेकिन उन पर आत्मकथा की कोटि के तहत विचार नहीं किया गया।

  मैं विधा के रूप में आत्मकथा के जेनर पर पहले बात करना चाहती हँ। आत्मकथा के विधा की जिस रूप में संरचना तय की गई है, वह अपने आप में बहिष्कारमूलक और समस्यामूलक है। यह महाकाव्य की तरह है जिसके लिए एक महान् नरैटिव और आदि-अंत का बखान जरुरी है। साथ ही विषय से दूरत्व का बोध भी जरुरी है। जितनी दूर का विषय होगा, उतनी शानदार प्रस्तुति होगी,पर मुश्किल यह है कि स्त्री लिखते समय अपने से दूरी नहीं बनाए रख सकती। स्त्री वर्तमान से गहरे संपृक्त होती है। अतीत उसका नहीं है। अतीत पर उसका नियंत्रण भी नहीं है। इस कारण लिखते समय वह वर्तमान की समस्याओं और जटिलताओं का विश्लेषण प्रस्तुत करती है। बिना ऐसा किए वह रह नहीं सकती। कारण कि जिन सामाजिक-राजनीतिक असंगतियों को वह झेलती है लिखते समय उसका विश्लेषण न करे, यह संभव नहीं है। स्त्री के सामने आत्मकथा लिखते समय अजीब द्वन्द्व की स्थिति होती है। जिसके बारे में लिख रही होती है, वह वो स्वयं होती है; जिस औजार के जरिए लिख रही होती है यानि भाषा उसमें उसके अपने अनुभव के शब्द नहीं होते। संसार को नामित करने की प्रक्रिया से वह बाहर होती है। इन सबसे मुश्किल स्थिति यह है कि वह जब तक आत्मकथा लेखन में 'सब्जेक्ट' की भूमिका में नहीं होगी, तब तक वह नहीं लिख सकती। स्त्री को'सब्जेक्ट' की भूमिका में कभी देखा ही नहीं गया है; वह रचना में, भाषा में, समाज में ऑब्जेक्ट ही रही है।

  आत्मकथा 'सेल्फ' के उद्धाटन का क्षेत्र है। स्त्री के स्व को समाज और भाषा में इतनी पाबंदियों के बीच रखा गया है कि उसका ठीक ठीक बाहर आना संभव नहीं है। विखण्डन, बिखराव, टूट-फूट, असंगतियाँ इसकी विशेषता है। तो आत्मकथा का जो महाख्यानमूलक रूप है, स्त्री की आत्मकथा उसके आस-पास भी नहीं ठहरती। पुरुष आत्मकथाओं में परिवेश का चित्रण उसकी महानता और गरिमा के साथ एक महान् कहानी को निर्मित करने के लिए होता है। साधारण परिवेश का गरिमापूर्ण चित्रण पुरुष 'सब्जेक्ट' के साथ द्वन्द्वात्मक और संघर्षपूर्ण रूप में दिखाया जाता है और आत्मकथा के अंत तक जाते-जाते साबित कर दिया जाता है कि पुरुष का अपने परिवेश पर नियंत्रण है। वह परिस्थितियों का दास नहीं, उनका मालिक हैं। वहाँ गरीबी जैसी डरानेवाली चीज भी पुरुष को उसकी महानता और लक्ष्य से भटका नहीं सकती। गरीबी में स्त्रियाँ बिक सकती हैं, उनकी देह और आत्मा सीधे इसका शिकार बनती है, पर पुरुष के लिए वह चुनौतियों का सृजन करती है जिसके पार उसकी महानता का संसार उसकी प्रतीक्षा में है। इसलिए गरीबी वहाँ'गर्बीली' होती है। 'पुरुष क्या श्रृंखला को तोड़ करके,चले आगे नहीं जो जोर करके' ! (दिनकर,रश्मिरथी)

 (लेखिका- सुधा सिंह) 

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

पियरे बोर्दिओ और नव्य-उदारतावाद - 7-

बोर्दिओ के अनुसार विनियमन (डीरेगूलेशन) की नीति के खिलाफ सबसे पहले राजनीतिक चिन्तन को महत्व दिया जाना चाहिए। राजनीतिक गतिविधियों को प्रधानता दी जानी चाहिए। यह प्रस्थान बिंदु हो सकता है। इसके बाद इस संघर्ष को राष्ट्र-राज्य की सीमाओं के परे ले जाने की जरुरत है। इसके लिए विश्वव्यापी सामाजिक आंदोलन की जरुरत होगी और वैसा ही संगठन भी बनाना पड़ेगा। ये सामाजिक आंदोलन अपनी प्रकृति ,आकांक्षा और लक्ष्य में भिन्ना किस्म के होंगे। इनमें कुछ समानताएं भी होंगी जो इन्हें 'तुलनात्मक' बनाएगी । बहुत सारे आंदोलन परंपरागत राजनीतिक लामबंदी,राजनीतिक दलों की लामबंदी ,जो सोवियत टाइप हुआ करती थी, को अस्वीकार करते हुए आ रहे हैं। यह पूरी तरह इजारेदाराना भाव के प्रति प्रतिवाद है। इन आंदोलनों की धुरी है छोटे ग्रुपों पर इजारेदारी कायम करना। साथ ही ये तुरंत शिरकत की मांग करते हैं। इन आंदोलनों की खूबी है कि ये तुरंत नए एक्शन सुझाते हैं। इनमें प्रतीकात्मक सार होता है। इनके लक्ष्य और उपाय मौलिक होते हैं। ये ठोस सामाजिक लक्ष्यों को केन्द्रित होते हैं। जैसे हाउसिंग,रोजगार,स्वास्थ्य,गरीबी के प्रति सरोकार आदि। वे इनके व्यावहारिक समाधान सुझाते हैं जिन्हें तत्काल लागू किया जा सकता है। उनके प्रस्तावों और प्रतिवाद को उदाहरण के रुप में पेश किया जा सकता है। व्यक्तिगत तौर पर शिरकत को बढ़ाया जा सकता है। इनको मीडिया की सही जानकारी होती है,बल्कि वे इसके मास्टर होते हैं,इसलिए वे किसी भी घटना को पेश करने,नाटकीय बनाने में सिध्दहस्त होते हैं। जिससे वे मीडिया और राजनीति का ध्यान खींच पाते हैं। इस तरह के आंदोलनों को मीडिया ज्यादा कवरेज देता है,इसका अर्थ यह नहीं है कि ये आन्दोलन मीडिया केन्द्रित हैं, बोर्द्रिओ कहता है कि अब तक मीडिया परंपरागत दलों का समर्थन करता रहा है, किंतु अब उनकी तरफ ध्यान न देकर इन सामाजिक आंदोलनों की ओर ध्यान दे रहा है। ये आंदोलन कम समय में ही अपना सामाजिक आधार बना लेते हैं। आरंभ में ऐसे आंदोलनों का चरित्र अंतर्राष्ट्रीय था। एक-दूसरे मॉडल को वे लागू करते रहे।  इन सभी सामाजिक आंदोलनों का साझा फिनोमिना है कि ये नव्य-उदारवादी नीतियों को अस्वीकार करते हैं। एक अन्य प्रवृत्ति है कि ये अंतराष्ट्रीय हैं,अंतर्राष्ट्रीयतावादी हैं।इन सामाजिक आंदोलनों में एटीट्यूट की एकता है।
बोर्दिओ के अनुसार मांगों और प्रक्रियाओं के बीच बगैर किसी इजारेदारी के अनिवार्यत: तालमेल होना चाहिए। यह तालमेल नेटवर्क के बीच होना चाहिए। इनमें व्यक्तियों और समुदायों को बगैर किसी वर्चस्व के एकजुट किया जाना चाहिए। इनके परिप्रेक्ष्य और कार्यक्रम की रक्षा की जानी चाहिए। इन संगठनों को लोचदार और टिकाऊ होना चाहिए। इन्हें मिलजुलकर प्रचार करना चाहिए,नियमित सभाएं करनी चाहिए,साथ ही लक्ष्य केन्द्रित सवालों को उठाना चाहिए। बोर्दिओ के शब्दों में ''ग्लोबलाइजेशन हमारा भविष्य नहीं है बल्कि राजनीति है। इसलिए प्रतिवाद की राजनीति सत्ता के केन्द्रीकरण के खिलाफ होगी। यह विकल्प अंतर्राष्ट्रीय होगा। इसमें मजदूर संगठनों और नए संगठनों के अनुभवों से काम लिया जाएगा।''
नव्य-उदारतावाद के प्रचार अभियान में बार-बार समृध्द समाज के निर्माण की बात कही जा रही है। यह कहा जा रहा है कि हमें भारत को समृध्द बनाना है। समृध्दि की मांग पागलपन की हदें पार गई है। सवाल किया जाना चाहिए कि आखिरकार समृध्द भारत की मांग कौन लोग कर रहे हैं ? वे ऐसी मांग क्यों कर रहे हैं ? अथवा यों कहें कि समृध्द समाज की मांग किसके लिए की जा रही है , इससे किसका भला होगा ? असल में समृध्द समाज की मांग उन लोगों ने उठायी है जो अपने मालों की बिक्री करना चाहते हैं। वे ऐसे मालों को बेचना चाहते हैं जो हमारी आवश्यकता का हिस्सा नहीं हैं। वे ऐसे उपभोक्ता का आधार तैयार करना चाहते हैं जिसके पास उपभोग की वस्तुएं खरीदने के लिए बेशुमार पैसा हो। जिससे वह इन मालों को खरीद सके। भारत जैसे गरीब देश में उपभोक्ता वस्तुओं को जब गरीब आदमी टीवी में हसरतभरी निगाहों से देखता है तो उसके अंदर भी इन्हें पाने इच्छा पैदा होती है,इन्हें पाकर वह ज्यादा से ज्यादा खुशियां पाने का सपना देखता है। ऐसा सोचने वाले गलत सोच रहे हैं। वस्तुओं से खुशी नहीं मिलती। ज्यादा से ज्यादा उपभोक्ता वस्तुओं का अम्बार खुशियां नहीं देता,खुशी तो असल में तुलनात्मक तौर पर अपने पड़ोसी की संपत्ति देखकर ही आती है, पड़ोसी की संपत्ति से जब ज्यादा संपत्ति होती है तब ही मन खुश होता है। यदि सभी की संपदा का स्तर एक जैसा कर दिया जाएगा तो खुशी पैदा नहीं होगी।
अमरीका के मार्ग को अपनाने वालों को यह भी ध्यान रखना होगा कि वहां चंद लोगों की दादागिरी चलती है। ये वे लोग हैं जो शासकवर्ग कहलाते हैं। जिनके अनुसार नीतियां बनती हैं और बदलती हैं। यहां तक शासकवर्गों के बीच में भी सत्ता का हिसाब-किताब बनता-बदलता रहता है। शासकवर्ग में एक जमाने में मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का वर्चस्व हुआ करता था,आज यह क्षेत्र ढलान पर है। आज अमेरिका में अंतर्राष्ट्रीय -राष्ट्रीय इजारेदार वित्तय संस्थानों का वर्चस्व है,आर्थिक उदरीकरण के दौर में इन्हीं संस्थानों ने नीतियों की बागडोर थामी हुई है। दूसरी ओर मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में अपने देश में अमेरिका संरक्षणवाद का सहारा ले रहा है और गैर- अमेरिकी मुल्कों पर संरक्षण हटाने के लिए दबाव डाल रहा है।
    अमेरिका की नीति है '' उदारीकरण विदेश में देश में संरक्षणवाद।'' अमेरिका में कौन शासकवर्ग है इसका जबाव बेहद जटिल है। इसका प्रधान कारण है कि अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में औद्योगिक प्राथमिकताएं बदलती रहती हैं। मसलन् इन दिनों मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र ढलान पर है और वित्तीय संस्थान बढत पर हैं अत: शासकवर्गों में वित्तीय संस्थानों का बोलवाला है। अनेक पुराने औद्योगिक घराने पुराने धंधों में बने रहने की बजाय वित्तीय क्षेत्र में आ रहे हैं,हमारे देश में भी यह फिनोमिना आ गया है। नव्य-उदारतावाद के दौर में वित्तीय संस्थानों और वित्तीय पूंजी का ही सारा खेल है। वे ही ग्लोबलाइजेशन के असल मुखिया हैं,बाकी अन्य शासकवर्गों को उनके सहयोगी की भूमिका अदा करनी होगी। वित्तीय पूंजी बहुराष्ट्रीय इजारेदारियों की रखैल है, वह उनकी संपदा का स्रोत है। आज सबसे ज्यादा किसी सेक्टर में प्रधान कर्ताओं को तनख्वाह और सुविधाएं दी जा रही हैं तो वह है वित्ताीय पूंजी क्षेत्र। वित्तय पूंजी का सारा खेल शेयर मार्केट के ऊपर निर्भर है,इसके अलावा विभिन्न कंपनियों के विलय और बिक्री से भी नव्य-उदारतावाद लाभांवित हुआ है। विलय-बिक्री की फीस के बहाने वित्तीय संस्थानों ने बेशुमार धन कमाया है। मसलन् 2006 में 3,900 विलियन डालर के इस क्षेत्र में सौदे हुए,इनके जरिए निवेशक बैंकों ने फीस के रुप में 18.8 विलियन डालर कमाए।
     आंकड़े बताते हैं कि दो फीसदी घराने अस्सी फीसदी विश्व संपदा के मालिक हैं। इसमें वित्ताीय पूंजी से जुड़े अभिजन के पास बहुत छोटा अंश ही है।  ये वे वित्तीय कंपनियां हैं जो सट्टा बाजार में पैसा लगाती हैं,उधार पैसा देती है और बड़ा मुनाफा बटोर रही हैं। अमेरिकी समाज आर्थिक तौर पर सबसे ज्यादा संकटग्रस्त है खासकर मध्यवर्ग और मजदूरवर्ग के सामने गंभीर संकट पैदा हो गया है। उसकी सामाजिक सुरक्षा  की सुविधाएं कम हुई हैं, पगार में गिरावट आई है।बेकारी बढ़ी है। मसलन् सन् 2000-2005 के बीच में अमरीकी अर्थव्यवस्था 12 फीसदी बढ़ी, उत्पादकता 17 फीसदी बढ़ी किंतु पगार मात्र तीन फीसदी बढ़ी। जबकि इसी अवधि के दौरान परिवार की असल आमदनी में गिरावट दर्ज की गई। एक सर्वे में नवम्बर 2006 में तीन-चौथाई अमेरिकियों ने कहा कि वे दुर्दशापूर्ण जीवन जी रहे हैं,अथवा यों भी कह सकते हैं कि छह साल पहले जो दशा थी उसमें कोई सुधार नहीं आया है। फेडरल रिजर्व बैंक के मुखिया के सीनेट कमेटी के सामने स्वीकार किया है कि ''अमेरिका में बढ़ती हुई असमानता चिन्ता की चीज है। इकहरे ढ़ंग से आमदनी और संपदा में इजाफा हो रहा है।यह अच्छा लक्षण नहीं है।'' सरकार की सकल घरेलू आय का 43 फीसदी हिस्सा पगारजीवी लोगों से आता है। आज अमरिकी दलों में वित्तीय पूंजी से जुड़े शासकवर्गों को चुनौती देने की किसी में क्षमता नहीं है। उनसे सब डरते ही नहीं हैं बल्कि वे तो सभी के माई-बाप हैं।



रश्मि खेरिया की ताजा कविता 'स्वाद'


स्वाद
बादलों के साथ -साथ
दौड़ रहा
मन मेरा भी

खेत खलिहान नदी -नाले
रिश्तों के जंगल ---
सब पीछे छूटते रहे

बस लिया
स्वाद
मैंने
भीगने का


                      



















रश्मि खेरिया का ताजा काव्य संकलन ' अपने होने का सच '

                                  
रश्मि खेरिया का यह पहला संकलन है। विगत दो दशकों से काव्य साधना में लगी इस लेखिका ने रुपकों और बिम्बों में जीवनानुभवों को व्यक्त करने की जो कला विकसित की है वह हिन्दी की स्त्री कविता की बड़ी उपलब्धि है। इनकी कविता में जीवन का उल्लास और आवेग  व्यक्त हुआ है। इनके काव्य संकलन का नाम है 'अपने होने का सच'। 
                                                              


                                 
                       छूटना
                          चाहा
                          बाँधना
                          कुछ क्षणों को
                          मुट्ठी में

                          न जाने कब
                          चुपके से
                           फिसल गए
                            रेत बन
                          नहीं खुली मुट्ठी
                                                    खाली मुट्ठी ही लिए

                          भरी-भरी दिखती रही.



 (प्रकाशक- रेमाधव पब्लिकेशंस प्रा.लि. सी 22, तृतीय तल, डी.सी.राजनगर,गाजियाबाद-201002)

रविवार, 27 दिसंबर 2009

पियरे बोर्दिओ और नव्य-उदारतावाद - 6-

क्रिश्चियन फंडामेंटलिस्टों का अमेरिका में व्यापक स्तर पर शिक्षा और मीडिया नेटवर्क है।इसमें बॉब जॉन यूनीवर्सिटी का नाम सबसे ऊपर है।इजराइली तत्ववादियों का अनुकरण करते हुए इस विश्वविद्यालय ने ईसाइयों में धार्मिक शुध्दता का पाठ पढ़ाया जाता है। ये लोग समाज में किसी भी किस्म के सम्मिश्रण को स्वीकार नहीं करते। रूढ़िवादी विचारों और संस्कारों में पूरी तरह आस्था रखते हैं। बाइबिल इनके लिए अंतिम और एकमात्र सत्य है। ये आक्रामक और रक्षात्मक दोनों ही किस्म की रणनीति का अपने सांगठनिक विकास के लिए इस्तेमाल करते हैं। 


बॉब जॉन यूनीवर्सिटी के छात्र सिर्फ विचारों और संस्कारों में ही तत्ववादी नहीं होते अपितु उग्रवादी भी होते हैं। ये किसी भी किस्म की विज्ञानसम्मत शिक्षा और विचारों का विरोध करते हैं। शिक्षा के पाठ्यक्रमों में किसी भी किस्म की उदारतावादी दृष्टि को स्वीकार नहीं करते। इस विश्वविद्यालय के द्वारा पृथकतावादी और तत्ववादी ताकतों का  खुलकर समर्थन किया जाता है। ये लोग नस्लवादी श्रेष्ठत्व पर जोर देते हैं। नस्लवादी श्रेष्ठत्व इनके धार्मिक उसूलों से जुड़ा हुआ है। 


आमतौर पर तत्ववादी या पृथकतापंथी संगठन अपने कार्यों को वैध ठहराने के लिए अंधविश्वास और अनहोनी या विलक्षण घटनाओं को चुनते हैं। इजराइली और क्रिश्चियन तत्ववादियों ने मध्य-पूर्व में ईराक पर अमरीका और उसके मित्र राष्ट्रों के हमले और तबाही को ईश्वर की कृपा से किए गए हमले और पाप के दण्ड के तौर पर व्याख्यायित किया।इसके लिए सैन्य पदावली का प्रयोग किया गया।
       


सुसान रोज ने ''क्रिश्चियन फंडामेंटलिज्म एण्ड ऐजुकेशन इन दि यूनाइटेड स्टेट्स''(1993) में लिखा कि कैथोलिक स्कूलों की तुलना में प्रोटेस्टेण्ट या इवानगेलिकल्स स्कूलों में छात्रों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। इसके विपरीत कैथोलिक स्कूलों में छात्रों की संख्या में गिरावट आई है। निजी क्षेत्र में इन स्कूलों का बड़ी तेजी से विकास हुआ है। अनुमानत: दस लाख विद्यार्थी 18,000 हजार निजी धार्मिक स्कूलों में पढ़ते हैं। ये कुल निजी स्कूली छात्रों की संख्या का  20 फीसद हिस्सा हैं।
    
सन्1965 से कैथोलिक स्कूलों में आज तक 65 फीसदी से ज्यादा इनरोलमेंट में गिरावट आई है। जबकि गैर-कैथोलिक स्कूलों में इनरोलमेंट 149 फीसदी बढ़ा है।इसका अर्थ यह है कि इवानगेलिक और तत्ववादी स्कूलों में विगत दो दशकों में छात्रों की भर्ती में तेजी से इजाफा हुआ है। इसी दौरान इन स्कूलों ने पृथकतावादी मार्ग की अपेक्षा ज्यादा से ज्यादा  कठमुल्लावादी मार्ग का अनुसरण किया है। इसके लिए इन संगठनों ने अदालती कार्रवाईयों तक का सहारा लिया है। अदालतों से इन्हें अपनी गतिविधियां जारी रखने का एक तरह से लाईसेंस  मिल गया है।


इन समस्त घटनाओं से इस तथ्य पर रोशनी पड़ती है कि अमरीकी न्याय व्यवस्था और शिक्षा व्यवस्था किस हद तक तत्ववादी संगठनों के सामने असहाय साबित हुई है।साथ ही उनके शिक्षा संस्थान बगैर किसी बाधा के सुचारू रुप से चल रहे हैं।
       
    इवानगेलिक स्कूलों का पाठ्यक्रम,पध्दति और प्रभाव सार्वजनिक धर्मनिरपेक्ष स्कूलों से भिन्न है। धार्मिक तत्ववादी स्कूलों का अमरीका में लक्ष्य है धर्मनिरपेक्ष जीवन शैली का विरोध करना ,धार्मिक और पितृसत्ता की स्थापना करना,बच्चों को नशेबाजी,कामुकता,हिंसा और अनुशासनहीनता से बचाना। इसके अलावा तत्ववादी शिक्षा का मुख्य जोर बाइबिल, धार्मिक संस्कारों की शिक्षा और धर्मनिरपेक्ष सार्वजनिक स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले विषयों के खिलाफ रहा है। इन स्कूलों में दण्ड और अध्यापन की सार्वभौम पध्दति अपनायी जाती है। विद्यार्थियों के लिए महंगी से महंगी किताबें और पाठ्यक्रम सामग्री तुरंत प्रदान की जाती है। पाठ्यक्रम पढ़ाने के लिए किसी शिक्षक की मदद की जरूरत महसूस नहीं होती क्योंकि छात्र स्वयं ही पढ़ सकता है। पाठ्यक्रम पढ़कर शायद ही कोई सवाल किसी के मन में उठे क्योंकि समस्त सवालों के जबाव पाठ में ही होते हैं। इन स्कूलों के छात्र सार्वजनिक धर्मनिरपेक्ष स्कूलों की तुलना में ज्यादा संख्या में पास होते हैं। यहां तक कि स्टैण्डफोर्ड अचीवमेंट टेस्ट में इन स्कूलों के छात्रों को राष्ट्रीय नियम की तुलना में एक साल और सात माह ज्यादा की वरीयता मिलती है।सेना में इन तत्ववादी स्कूलों के छात्रों को बेहतरीन विद्यार्थी मानकर वरीयता के साथ भर्ती किया जाता है।क्योंकि इनमें अनुशासन, अनुकरण और अधिकारियों के प्रति सम्मान का भाव होता है।
         अमरीका में धार्मिक तत्ववादी स्कूलों में आमतौर पर गोरे मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चे दाखिले लेते हैं। इनके परिवारों की औसत आमदनी 25,000हजार डालर है।यह सम्मिश्रित किस्म का प्रभुत्वशाली समुदाय है। अत: इस समुदाय के छात्रों में धार्मिक तत्ववादी शिक्षा का आधार निर्मित होने से धार्मिक शिक्षा का प्रभाव कई गुना ज्यादा बढ़ जाता है। रीगन प्रशासन ने एक जमाने में तत्ववादी स्कूलों पर अंकुश लगाने की काफी कोशिश की किन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके विपरीत तत्ववादी स्कूलों ने धर्मनिरपेक्ष स्कूलों को अपनी दिशा बदलने के लिए दबाव तेज कर दिया है। इस दिशा में उन्हें काफी हद तक सफलता भी मिली और बड़ी संख्या में ईसाई स्कूलों और धर्मनिरपेक्ष स्कूलों में विलय भी हुआ। आज स्थिति यह है कि अमरीका में तत्ववादियों के नियंत्रण वाली उच्च शिक्षा और टेलीविजन का मजबूत गठबंधन  है। खासकर लिबर्टी यूनीवर्सिटी और रीजेंट विश्वविद्यालय के माध्यम से यह काम बखूबी अंजाम दिया जा रहा है। ये विश्वविद्यालय धार्मिक कठमुल्लापन के साथ आधुनिक विज्ञान,प्रौद्योगिकी और शिक्षा का सामंजस्य बिठाने की कोशिश कर  रहे हैं।
         बोर्द्रिओ ने ''अगेंस्ट डिपॉलिटिसाइज पॉलिटिक्स''(11 अप्रैल,2001) निबंध में लिखा 'ग्लोबलाईजेशन' का अर्थ अपरिहार्य आर्थिक विकास का रास्ता नहीं है। बल्कि यह सोची-समझी सचेत नीति है जो इसके विध्वंसकारी परिणामों के प्रति सचेत नहीं है। यह नीति शर्मनाक ढ़ंग से स्वतंत्रता,उदारीकरण,उदारतावाद और विनियमन की भाषा का इस्तेमाल कर रही है। यथार्थत: यह अ-राजनीतिकरण की नीति है। यह बिडम्बना ही है कि इसका लक्ष्य है सभी किस्म की आर्थिक बाधाओं से मुक्त करना। यह साधारण जनता को सरकारी नीतियों और विनियमित अर्थव्यवस्था के सामने निहत्था मरने के लिए छोड़ देती है। सभी बड़े अंतर्राष्ट्रीय संगठनों जैसे विश्व व्यापार संगठन अथवा यूरोपीय आर्थिक समुदाय के द्वारा सभी बहुराष्ट्रीय निगमों के नेटवर्क के हित में नीतियां बनायी जा रही हैं। ये सारी नीतियां भिन्न-भिन्न तरीके से स्वीकृति पा रही हैं। पहले इन नीतियों को कानूनी तौर पर मान्यता दिलायी जाती है। उदार और सामाजिक जनवादियों की सरकारों के द्वारा विकसित देशों में एक ही साथ स्वीकृति दिलायी गयी है। इसके कारण सरकारों ने अर्थव्यवस्था पर अपना प्रभुत्व धीरे-धीरे खत्म किया है।



शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

पोप पर हमले की कोशिश




क्रिसमस के मौके पर एक महिला ने बेरियर से फांदकर पोप के ऊपर कूद कर छलांग लगा दी। अचानक 82 वर्ष के  पोप उठ खड़े हुए और बच गए, उन्हें कोई चोट नहीं आयी। इस घटना का फुटेज इटली के सरकारी टीवी चैनल RAI पर दिखाया गया। पूरी खबर देखें -    

VATICAN CITY - A woman jumped the barriers in St. Peter’s Basilica and knocked down Pope Benedict XVI as he walked down the main aisle to begin Christmas Eve Mass yesterday.

The 82-year-old pope quickly got up and was unhurt, said a Vatican spokesman, the Rev. Ciro Benedettini.

Footage aired on Italy’s RAI state TV showed a woman dressed in a red jumper vaulting over the wooden barriers and rushing the pope before being swarmed by bodyguards.

The commotion occurred as the pope’s procession was making its way toward the main altar and shocked gasps rang out through the public that packed the basilica. The procession came to a halt and security rushed to the trouble spot.

Benedettini said the woman who pushed the pope appeared to be mentally unstable and had been arrested by Vatican police. He said she also knocked down Cardinal Roger Etchegaray, who was taken to a hospital.

“During the procession an unstable person jumped a barrier and knocked down the Holy Father,’’ Benedettini said by telephone. The pope “quickly got up and continued the procession.’’

After the incident, Benedict, flanked by bodyguards, resumed his walk to the basilica’s main altar to start the Mass. He did appear somewhat shaken and leaned heavily on aides and an armrest as he sat down in his chair.

Benedict made no reference to the incident as the service started. As a choir sang, he sprinkled incense on the altar before opening the Mass with the traditional wish for peace in Latin: “Pax vobis’’ (“Peace be with you’’). The faithful responded: “Et cum spiritu tuo’’ (“And also with you’’).

It was the second year in a row there was a security breach at the service. At the end of last year’s Mass a woman who had jumped the barriers got close to the pope but was quickly blocked by security                         
                    


पियरे बोर्दिओ और नव्य-उदारतावाद - 1-

          पियरे बोर्दिओ की समाजशास्त्रीय और मीडिया दृष्टि पर परवर्ती मार्क्सवाद, समाजशास्त्र, चिन्हशास्त्र और मीडिया संरचना सैध्दान्तिकी का गहरा असर है। हिन्दी में अभी तक बोर्दिओ के बारे में चर्चा नहीं हो रही है,कभी-कभार एक दो उध्दरण मात्र दिखाई दे जाते हैं।बोर्दिओ फ्रांस की माक्र्सवादी-समाजशास्त्रीय परंपरा के प्रमुख स्तम्भ थे।


    पूंजीवाद और परवर्ती पूंजीवाद के दौर में किस तरह की सामाजिक,सांस्कृतिक और आर्थिक संरचनाएं निर्मित हो रही हैं और समाजशास्त्रीय सैध्दान्तिकी की नयी बदली हुई परिस्थितियों में किस तरह की संरचनाएं बन रही हैं और उन्हें किस तरह विश्लेषित करें। विश्लेषण के नए मॉडल क्या हो सकते हैं ? खासकर ऐसे दौर में जब सार्वभौमत्व की विदाई की घोषणा हो चुकी हो।बोर्द्रिओ का यहां नव्य-उदारतावाद यानी ग्लोबलाइजेशन के संदर्भ में विशेष रुप से मूल्यांकन किया गया है।
     
    बोर्दिओ के नजरिए का ग्लोबलाईजेशन के संदर्भ और परवर्ती पूंजीवाद के द्वारा पैदा की गई सांस्कृतिक और आर्थिक तबाही के संदर्भ में महत्व है। हमारे समाज में मध्यवर्ग के एक बड़े तबके में फैशन की तरह ग्लोबलाईजेशन का प्रभाव बढ़ा है,सरकार की नीतियों में ग्लोबलाइजेशन का अंधानुकरण चल रहा है,यहां तक कि अब तो वे लोग भी ग्लोबलाइजेशन के पक्ष में बोलने लगे हैं जो कल तक उसका विरोध करते थे,ऐसे विचारकों और राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं की तादाद तेजी से बढ़ रही है, वे यह कह रहे हैं कि पूंजीवाद का अब कोई विकल्प नहीं है,ग्लोबलाईजेशन के तर्कों को मानने के अलावा और कोई विकल्प नहीं हैं। 


    यही स्थिति ग्लोबल मीडिया चैनलों की है, उनके उपभोक्ताओं में किसी भी किस्म का प्रतिवाद का स्वर दिखाई नहीं देता बल्कि उल्टे राजनीतिक हल्कों में ज्यादा से ज्यादा चैनल और अखबार समूहों को अपने राजनीतिक रुझान के पक्ष में करने की होड़ चल निकली है। ग्लोबल मीडिया और ग्लोबलाइजेशन के प्रति इस तरह के रुझान इस बात के संकेत हैं कि भारत में ग्लोबलाइजेशन का वैचारिक असर रंग दिखाने लगा है।
        
    ग्लोबलाइजेशन की वैचारिक आंधी में हम भूल गए कि मीडिया विचारधारा मीडिया के बाहर अन्यत्र निर्मित होती है। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि मीडिया का आम जनता पर सुनिश्चित प्रभाव होता है। हकीकत यह है कि मीडिया सामाजिक यथार्थ के दायरे में काम करता है। ग्लोबलाईजेशन और बहुराष्ट्रीय मीडिया की आंधी के विश्वव्यापी प्रतिरोधी स्वर को वैचारिक नेतृत्व देने वालों में बोर्द्रिओ अग्रणी कतार में रहे हैं। उनके विचारों में नए बदले हुए यथार्थ का सटीक मूल्यांकन मिलता है।उनके विचार भारतीय समाज के लिए भी प्रासंगिक हैं खासकर उन लोगों के लिए जो मौजूदा हालातों को बदलने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
       
  बोर्दिओ का जन्म एक अगस्त 1930 को हुआ और 23 जनवरी 2002 को मृत्य हुई। शिक्षा के दौरान बोर्द्रिओ एक असाधारण विद्यार्थी थे, लगन और साधना के धनी थे।सन् 1955 में उन्हें अल्जीरिया में सेना में काम करने के लिए भेजा गया,जिसके दौरान उन्होंने अल्जीयर्स विश्वविद्यालय में अपना कुछ समय बिताया, इस दौरान के अनुभवों और चिन्तन को उन्होंने 'थ्योरी ऑफ प्रैक्टिस' (1972) और ' दि लॉजिक ऑफ प्रैक्टिस' (1980)में लिपिबध्द किया। इन दोनों कृतियों पर लेवीस्त्रास का गहरा असर है। इन दोनों कृतियों में संरचनावाद के दायरे को तोड़कर आगे जाने की कोशिश दिखाई देती है। लेवीस्त्रास के अलावा समाजशास्त्रियों और माक्सवादी चिन्तन का भी उनके समूचे लेखन पर गहरा असर है।
   
     बोद्रिओ की गहरी दिलचस्पी सैध्दान्तिकी के निर्माण में रही है। उनके अंदर मूलत: एक दार्शनिक सक्रिय रहा है। किंतु दर्शन की क्षुधा को उन्होंने समाजशास्त्र की पध्दतियों के जरिए फील्ड अनुभवों के जरिए तृप्त किया। बोर्दिओ स्वभाव और व्यवहार में पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष थे। सामाजिक संरचनाओं का समाजशास्त्रीय नजरिए से अध्ययन करते समय उनकी दिलचस्पी का प्रधान क्षेत्र सामाजिक विषमता रहा है।
      
  बोर्दिओ ने बौध्दिक जगत में हीरो की भूमिका की तीखी आलोचना की है। बौध्दिक जगत में नायक खोजने अथवा नायक बनाने की बजाय वैज्ञानिक अनुसंधान के जरिए सामाजिक हस्तक्षेप को महत्वपूर्ण माना। बोर्द्रिओ ने सारी जिन्दगी बेघर,बेसहारा, शरणार्थी, नस्लवाद से पीड़ित लोगों की हिमायत की। इसके अलावा फ्रांस में शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान किया। मजदूर संगठनों,सत्ता से जुड़े राजनीतिज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक ही साझा मंच पर लाने का काम किया। मीडिया के क्षेत्र में उनकी चर्चित किताब है ,' ऑन टेलीविजन' (1996) इस किताब में उन्होंने रेखांकित किया है कि किस तरह टेलीविजन सारवान मुद्दों को हाशिए पर डाल रहा है और सांस्कृतिक फास्ट फूड तैयार कर रहा है। 


    बोर्दिओ की मूल चिन्ता यह थी कि किस तरह बीसवीं शताब्दी के संघर्षों की उपलब्धियों को बचाकर रखा जाय। ये पहलू उनकी निम्न तीन किताबों -'एक्टस ऑफ रेजिस्टेंस'(1998), 'फायरिंग बैक'(2002) और 'इंटरवेंशन' में देखे जा सकते हैं। ये तीनों किताबें एक नए किस्म के अंतर्राष्ट्रीयतावाद की हिमायत करती हैं। बोर्दिओ स्वभाव से शर्मीले और संकोची व्यक्ति थे।सरकारी सम्मान और पद की उन्हें आकांक्षा नहीं थी, बल्कि इसे उन्होंने ठुकराया।यहां तक कि वे कभी टीवी पर भी नहीं जाते थे। एक मर्तबा अमेरिकी टीवी पर व्यक्तिगत जीवन की अनेक बातों को अमेरिकी जनता के साथ शेयर करने के लिए वह टीवी पर आए तो आम लोगों को अचरज हुआ। यहां तक कि एक अर्से के बाद उन्होंने परिवार और लेखन के अलावा सामाजिक जीवन में शिरकत करनी बंद कर दी थी। बोर्द्रिओ ने अपने को दर्शन में दीक्षित किया,अल्जीरिया के युध्द में अपने विचारों को तपाया और कालान्तर में समाजविज्ञानी बने। बोर्दिओ उन चंद विचारकों में हैं जिनके यहां फ्रांस के 1968 के छात्र विद्रोह के पहले से ही फ्रांसीसी समाज का आलोचनात्मक विश्लेषण पेश किया जा रहा था। राजनीति में वे हमेशा वामपंथी रहे।
       
   बोर्दिओ का मानना है कि नव्य-उदारतावाद का मूल लक्ष्य है सामुदायिक संरचनाओं का क्षय और बाजार के तर्क की प्रतिष्ठा। इस तरह के आधार पर जो विमर्श तैयार किया जा रहा है वह वर्चस्ववादी है। विश्वबैंक ,इकोनामिक कारपोरेशन एंड डवलपमेंट और आईएमएफ जैसी संस्थाओं के द्वारा जो नीतियां थोपी जा रही हैं उनका लक्ष्य है श्रम मूल्य घटाना, सरकारी खर्च घटाना,  काम को और भी लोचदार बनाना। यही मौजूदा दौर का प्रधान विमर्श है। यथार्थ में आर्थिक व्यवस्था नव्य-उदारतावाद के यूटोपिया को लागू करने का विमर्श है। इसके कारण राजनीतिक समस्याएं पैदा हो रही हैं। 


    नव्य-उदारतावादी विमर्श, विमर्शों में से एक विमर्श नहीं है,बल्कि यह 'ताकतवर विमर्श' है। ताकतवर विमर्श इस अर्थ में, यह कठोर है,आक्रामक है,यह अपने साथ सारी दुनिया की ताकतें एकीकृत कर लेना चाहता है।यह आर्थिक निर्णय और चयन को अपने अनुकूल ढाल रहा है। वर्चस्ववादी आर्थिक संबंधों को निर्मित कर रहा है।नए किस्म के चिन्हशास्त्र को बना रहा है। 'थ्योरी ' के नाम पर ऐसी सैध्दान्तिकी बना रहा है जो सामूहिकता की भूमिका को नष्ट कर रही है। वित्तीय विनियमन पर इसका अर्थसंसार टिका है। इसके तहत राज्य का आधार सिकुड़ रहा है,बाजार का आधार व्यापक बन रहा है। सामूहिक हितों के सवालों को अप्रासंगिक बना रहा है। इसने व्यक्तिवादिता ,व्यक्तिगत तनख्वाह और सुविधाओं को केन्द्र में ला खड़ा किया है। तनख्वाह का व्यक्तिकरण मूलत: सामूहिक तनख्वाह की विदाई की सूचना है। नव्य -उदारतावाद मूलत: बाजार के तर्क से चलने वाला दर्शन है। इसमें बाजार ही महान है। इसके लिए परिवार,राष्ट्र,मजदूर संगठन,पार्टी, क्षेत्र आदि किसी भी चीज का महत्व नहीं है,यदि किसी चीज का  महत्व है तो वह है उपभोग का। उपभोग को बाजार के तर्क ने परम पद पर प्रतिष्ठित कर दिया है।


बोर्दिओ का मानना है भूमंडलीकरण ने जब सूचना तकनीकी के साथ नत्थी कर लिया तो उसने पूंजी की गति को अकल्पनीय रुप से बढ़ा दिया। इसके कारण छोटे निवेशकों के मुनाफों में तात्कालिक इजाफा हुआ,वे अपने मुनाफों के साथ स्थायी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुनाफों की तुलना करने लगे हैं। बड़े कारपोरेशन बाजार के साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिश कर रहे हैं।नव्य उदारीकरण के दौर में संरचनात्मक हिंसाचार में इजाफा हुआ है। असुरक्षा बढ़ी है। मुक्त व्यापार गुरूमंत्र बन गया है।मीडिया के द्वारा साधारण जनता की अभिरुचि के निर्माण की प्रक्रिया में व्यक्तिवादिता, प्रतिस्पर्धा और विशिष्टता इन तीन तत्वों का खासकर ख्याल रखा जाता है।बोर्दिओ का मानना है  अभिरुचि वर्गीकृत होती है और यह वर्गीकरण क्लासीफायर की व्यंजना है। इस स्थिति को हासिल करने की संभावना सिर्फ उन लोगों के पास है जिन्हें शिक्षा मिली है और जिनके पास पैसा है। इन लोगों की अभिरुचि उन लोगों से भिन्न होती है जो इनसे भिन्न हैं।
( लेखक- जगदीश्वर चतुर्वेदी,सुधा सिंह) 

क्रिसमस पर सेना के हमले बंद नहीं होते




क्रिसमस के अवसर पर मीडिया सीधे छुट्टी के मूड में होता। अधिकांश पत्रकार यह मानते हैं ये छुट्टी के दिन हैं। वे तरह-तरह से आनंद मनाते हैं। इसका अर्थ है कि क्रिसमस पर चूंकि सब छुट्टी पर हैं अत:कोई ठोस वास्तव खबर नहीं होती। ऐसी अवस्था में जो भी आकर्षक खबर लगे उसे ले लो। पुरानी खबरों का संकलन दे दो। क्रिसमस पत्रकार की नजर दफ्तर के बाहर चली जाती हैं। वह खबरों से भागता है। दफ्तर से भागता है।
   चैनलों में बाजार और चर्च की रौनक का व्यापक कवरेज आने लगता है। आनंद देने वाली वस्तुओं की खपत और मांग बढ़ जाती है। उपहार लेने देने ,खिलाने-पिलाने ,पार्टी लेने-देने का चक्कर केन्द्र में आ जाता है। सोना खूब बिकता है। सूखे मेवा ,शराब और केक खूब बिकता है। चर्च जाने वालों की संख्या बढ़ जाती है। इन्हीं सब चीजों का कवरेज आने लगता है। कवरेज के केन्द्र में आनंद आ जाता है।
  क्रिश्चियन परिवारों में यह परिवार के मिलन और नए सिरे से परिभाषित करने का अवसर है। ईसाई संतों के द्वारा इस मौके पर शांति संदेश का प्रसारण किया जाता है। सबसे दुख की बात यह है कि ईसाई संतों के शांति पाठ को ईसाई राष्ट्राध्यक्ष कभी नहीं मानते। क्रिसमस पर सेना की छुट्टी नहीं होती। सेना के हमले बंद नहीं होते।      






गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

सीआईए ,जुआरी और आतंकवादी

    आज के गार्जियन ने खबर दी है कि सीआईए का आतंकी खेल जुआरी ले उड़ा। आज भी आतंकवादी संगठनों के नाम से काम करने वाले सैंकड़ों बंदे अमरीका में चुपचाप पड़े रहते हैं और आदेश मिलते ही सक्रिय हो जाते हैं। ऐसे ही एक अलकायदा सदस्य का गुप्त कोड अलजजीरा चैनल के हाथ लग गया। फ्रांस और ब्रिटेन की हवाई सेवाएं रद्द कर दी गयीं ,और सारे मीडिया में खबर फैला दी गयी कि ब्रिटेन में 26/ 11 जैसा हमला हो सकता है। पूरी खबर देखें-
The intelligence reports fitted the suspicions of the time: al-Qaida sleeper agents were scattered across the US awaiting orders that were broadcast in secret codes over the al-Jazeera television network.
Flights from Britain and France were cancelled. Officials warned of a looming "spectacular attack" to rival 9/11. In 2003 President Bush's homeland security tsar, Tom Ridge, spoke of a "credible source" whose information had US military bracing for a new terrorist onslaught.
Then suddenly no more was said.
Six years later, Playboy magazine has revealed that the CIA fell victim to an elaborate con by a compulsive gambler who claimed to have developed software that discovered al-Jazeera broadcasts were being used to transmit messages to terrorists buried deep in America.
Dennis Montgomery, 56, the co-owner of a software gaming company in Nevada, who has since been arrested for bouncing $1m worth of cheques, claims his program read messages hidden in barcodes listing international flights to the US, their positions and airports to be targeted.
The CIA took the information seriously, working with Montgomery at his offices and paying him an undisclosed amount of money. The "intelligence" Montgomery claimed to have found was passed on to the White House and homeland security where it kickstarted an alert that bordered on panic.
According to Playboy, Montgomery's claims caused the cancellation of British Airways and other flights supposedly mentioned in the codes.
Some officials were not at all surprised to hear the allegation that al-Jazeera was involved. The then defence secretary, Donald Rumsfeld, later vilified the station for "vicious, inaccurate and inexcusable" reporting of the US invasion of Iraq.
For months, the source of the information was kept under wraps within the CIA but once it became more widely known in the agency it immediately came under question. Playboy quotes one former counterterrorism official who attended a briefing on the source as being furious. He said: "I was saying: 'This is crazy. This is embarrassing.' They claimed they were breaking the code, getting latitude and longitude, and al-Qaida operatives were decoding it. They were coming up with airports and everything, and we were just saying: 'You know, this is horseshit!' "
Frances Townsend, a homeland security adviser to Bush, defended the decision to work with Montgomery. "It didn't seem beyond the realm of possibility. We were relying on technical people to tell us whether or not it was feasible. I don't regret having acted on it," she told Playboy.
But the doubts began to prevail as Montgomery refused to reveal how he was finding the barcodes, when no one else could, and he demanded $100m for the software. The CIA also began to wonder why al-Qaida didn't use emails and web pages to communicate with its agents.


 The intelligence reports fitted the suspicions of the time: al-Qaida sleeper agents were scattered across the US awaiting orders that were broadcast in secret codes over the al-Jazeera television network.
Flights from Britain and France were cancelled. Officials warned of a looming "spectacular attack" to rival 9/11. In 2003 President Bush's homeland security tsar, Tom Ridge, spoke of a "credible source" whose information had US military bracing for a new terrorist onslaught.
Then suddenly no more was said.
Six years later, Playboy magazine has revealed that the CIA fell victim to an elaborate con by a compulsive gambler who claimed to have developed software that discovered al-Jazeera broadcasts were being used to transmit messages to terrorists buried deep in America.
Dennis Montgomery, 56, the co-owner of a software gaming company in Nevada, who has since been arrested for bouncing $1m worth of cheques, claims his program read messages hidden in barcodes listing international flights to the US, their positions and airports to be targeted.
The CIA took the information seriously, working with Montgomery at his offices and paying him an undisclosed amount of money. The "intelligence" Montgomery claimed to have found was passed on to the White House and homeland security where it kickstarted an alert that bordered on panic.
According to Playboy, Montgomery's claims caused the cancellation of British Airways and other flights supposedly mentioned in the codes.
Some officials were not at all surprised to hear the allegation that al-Jazeera was involved. The then defence secretary, Donald Rumsfeld, later vilified the station for "vicious, inaccurate and inexcusable" reporting of the US invasion of Iraq.
For months, the source of the information was kept under wraps within the CIA but once it became more widely known in the agency it immediately came under question. Playboy quotes one former counterterrorism official who attended a briefing on the source as being furious. He said: "I was saying: 'This is crazy. This is embarrassing.' They claimed they were breaking the code, getting latitude and longitude, and al-Qaida operatives were decoding it. They were coming up with airports and everything, and we were just saying: 'You know, this is horseshit!' "
Frances Townsend, a homeland security adviser to Bush, defended the decision to work with Montgomery. "It didn't seem beyond the realm of possibility. We were relying on technical people to tell us whether or not it was feasible. I don't regret having acted on it," she told Playboy.
But the doubts began to prevail as Montgomery refused to reveal how he was finding the barcodes, when no one else could, and he demanded $100m for the software. The CIA also began to wonder why al-Qaida didn't use emails and web pages to communicate with its agents.

शोषणकारी ताकतों से टकराता जनकवि महेन्द्र 'नेह' - रमेश प्रजापति ( 3)

आज मानव के सामने स्वप्न एवं जीवन की सच्चाई के बीच की मरूभूमि हमारे सम्मुख आकर खड़ी हो जाती है। हर तरफ अन्तर्विरोध एवं द्वन्द्व के बीच कवि बड़ी तेजी से समाज में नैतिक-मूल्यों के टूटने-बिखरने की ध्वनियाँ सुन रहा है। गहन संवेदना से लबालब इन कविताओं में गाँव की सोंधी माटी की महक और लोक ध्वनि बार-बार गूँजती है। उपभोक्तावाद ने हमारे नैतिक-मूल्यों का ह्रास बड़े पैमाने पर किया है। यदि समाज की मूल्यहीन वर्तमान गतिविधियों को देखे तो पाएंगे कि बाजारवाद के बढ़ते वर्चस्व ने हमारे सम्पूर्ण सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक परिदृश्य को ही बदल कर रख दिया है। आपसी संबंधों का कोई महत्तव नहीं रह गया है। व्यक्ति अवसरवादी होता जा रहा है। वह वक्त आने पर अपनों का खून भी करने से नहीं चूकता है-''निश्चित ही/ इस बीच जुड़ रहे है/ कुछ नए रिश्ते/ अभी-अभी जवान जिस्म से/ टपके गाढ़े खून के उजास में।''                                      - (गाढ़े खून के उजास में, पृष्ठ-92)
    आर्थिक उदारीकरण ने सामाजिक जीवन की सभी अवधारणाओं को विघटित कर दिया। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि भारत में अन्तर्कलह, वर्ग-संघर्ष, क्षेत्रीयवाद, वर्चस्ववाद, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आदि का मानव जीवन में हस्तक्षेप बढ़ा है। मानवीय अस्मिता और मानवता पर खतरा बढ़ रहा है, वहीं मनुष्य मानसिक पीड़ा, कुंठा, भय, टूटन और निराशा में डूबता जा रहा है। आज का मनुष्य आर्थिक दबाव में पिस रहा है। मंहगाई, भ्रष्टाचार, आतंक,, हिंसा और आत्महत्या में वृध्दि हुई है। 'ग्लोबल समय,जुलूस और शांता चाची' कविता में कवि उत्तार आधुनिक काल की चमचमाती वस्तुओं के लदे-फँदे बाजार में नए साम्राज्यवाद के खिलाफ़ मेहनतकशों द्वारा विरोध करते देखकर अनुभवों से भरे शांता चाची के चेहरे पर खुशी का उभरना इस बात की ओर संकेत करता है कि पूँजीवादी ताकतों का सामना करके ही अपने हक के लिए लड़ा जा सकता है और एक नए युग का निर्माण किया जा सकता है। भूमंडलीकरण की पदचाप भारत की सभ्यता और साँस्कृतिक विरासत पर स्पष्ट सुनाई पड़ने लगी है। समसामयिक युग-चेतना से जुड़ी होने के कारण कविता की व्यक्ति से निकटता बढ़ रही है। अनुभूति, विचार और संवेदना की दृष्टि से महेन्द्र नेह की इन कविताओं का वैचारिक फलक विस्तृत है। किसानों और मजदूरों के संघर्ष भरे जीवन और उनकी विडम्बनाओं को बड़े ही सहज अन्दाज में चित्रित करती उनकी कविताओं में समाज से उठती अमानवीयता की दुर्गन्ध के बीच शोषितों, दलितों, पीड़ितों आदि मजदूर वर्ग की कराहें स्पष्ट सुन सकते हैं-''वे हमारी ऑंखें निकालते हैं/और हमारे हाथों में/जुम्बिश नहीं होती/वे हमारे हाथ उतारते है/और हमारे पाँव में/हरकत नहीं होती/ वे हमारे पाँव काट देते हैं/ और हमारी ऑंखों में खून नहीं उतरता।'' (कुतुबनुमा, पृष्ठ-79)  
     वर्तमान सामाजिक व्यवस्था और शोषणकारी ताकतों के विरूध्द सबसे अधिक शोषित या उत्पीड़ित वर्ग ही अपनी पूरी शक्ति के साथ परिवर्तनकारी संघर्ष करके अपनी मुक्ति के रास्ते तलाशता है। महेन्द्र नेह की कविताएँ एक निश्चित उद्देश्य की दिशा में आगे बढ़ती हैं और वह उद्देश्य है आत्ममुक्ति से मानव मुक्ति के मार्ग की खोज।  इसी कारण महेन्द्र नेह की इन कविताओं में समाज और व्यवस्था के प्रति विद्रोह, आक्रोश और जनवादी तेवर साफ-साफ दिखाई देता है। एक बड़े परिवर्तन की आहट इन कविताओं में सुनाई देती है,जिसके संदर्भ में मुंशी प्रेमचंद उचित ही कहते हैं-''......अब एक सभ्यता का सूर्य सुदूर पश्चिम में उदय हो रहा है, जिसने इस नारकीय महाजनवाद या पूँजीवाद की जड़ खोदकर फेंक दी है....सारे अंधकार को चीरकर दुनिया में अपनी ज्याति का उजाला फैला रही है।'' इस नई सभ्यता की मशाल को लेकर चलने वाला अगला दस्ता किसानों और मजदूरों का है। तभी तो कवि को मेहनतकशों की चुप्पी में प्रतिशोध की ध्वनि सुनाई दे रही है जिससे धरती पर एक बार फिर परिवर्तन अवश्य होगा। कवि का यह आशावादी स्वर इन पंक्तियों में देखा जा सकता है-''इंसानी फसलों को तबाह करते/खूनखोर जानवरों ने/रख दिए हैं अपने/भारी-भरकम बूट/पाँवों सहित तोड़ दिए जाएँगे बूट/तब हिंसा नहीं/प्रतिहिंसा होगी मुखर/धरती/अपनी धुरी पर/तनिक और झुकेगी/और तेजी से थिरक उठेगी तब।''-     (फिल वक्त, पृष्ठ-22)  
    किसानों और मज़दूरों के जीवन के प्रति गहरी संवेदना रखने वाले जनकवि महेन्द्र नेह की ये कविताएँ वर्तमान के विध्वंसकारी समय का आईना हैं जिसमें मजदूर वर्ग की छटपटाहट स्पष्ट देखी जा सकती है। कवि को अपनी जिम्मेदारियों का अहसास भी है तभी तो कहते है-''आज समय फिर से मांग कर रहा है कि शासक-वर्ग की जन विरोधी कुसंस्कृति के विरूध्द जन-पक्षधर संस्कृति अपने श्रेष्ठ सृजनात्मक, मुखर और प्रतिरोधी रूप में एक नव-अभ्युदय, नव-जागरण और नव-प्रबोधन का वातावरण तैयार करे।'' यही कारण है कि उनकी कविता का अधिकतर भाग इस मज़दूर वर्ग की जिन्दगी और उस जिन्दगी के बीच से ग्रहण की गई अनुभूतियों, विचारों और घटनाओं से निर्मित है जिसमें उसे घुट-घुटकर जीना पड़ रहा है। सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखे तो इन कविताओं में शोषणकारी ताकतों का पुरजोर विरोध करने की चेतना बड़े ही आक्रामक स्वर में मुखरित हुई हैं। अत: शोषणकारी ताकतों से टकराने वाले इस जनधर्मी कवि की ये कविताएँ आम आदमी में गहरा विश्वास तो रखती ही है साथ ही उनके संघर्षों से भी गहरी संवेदना रखती हैं।



'' थिरक उठेगी धरती '' - महेन्द्र नेह            रमेश प्रजापति
शब्दालोक प्रकाशन, सी-3/59,               नागार्जुन नगर, सादतपुर विस्तार 
                                      डी-8, डी.डी.ए. कॉलोनी,
दिल्ली-110094, मूल्य 60/-               न्यू जाफराबाद,शाहदरा,दिल्ली-11003
                                      मो0- 09891592625