रविवार, 31 जनवरी 2010

कामुकता का बदलता चरित्र -4- समापन किश्त





हिंदुत्ववादियों की हिंदू धर्म की व्याख्या मूलत: धर्म को जीवनशैली मानकर चलती है। अस्मिता का जीवनशैली से जुड़ना वस्तुत: विश्व पूंजीवादी बाजार के तर्क की जीत है और हिंदू तत्ववादी इसी चीज का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। वे हिंदू धर्म को जीवनशैली मानते हैं। शरीर कैसे जीवनशैली से जुड़ गया? उसे 'डाइटिंग' (नियंत्रित आहार) के आधुनिक अर्थ के साथ जोड़कर देखें। 

'डाइटिंग' का खान-पान के विज्ञान के प्रवेश के साथ संबंध है। पहले खान-पान का विज्ञान के साथ संबंध नहीं था। आज खान-पान का विज्ञान निर्मित हो चुका है। आज व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह क्या खाए? क्या पीए? आज विकसित देशों में प्रत्येक व्यक्ति (अति गरीब को छोड़कर) 'डाइटिंग' करता है। इसके कारण 'डाइटिंग' का 33 बिलियन डॉलर का विश्व बाजार पैदा हो गया है।

  विश्वव्यापी पूंजीवादी व्यवस्था के उदय के साथ खाने-पीने की तरह-तरह की चीजें बाजार में उपलब्ध हुईं। 'डाइटिंग' उद्योग ने इसे नई बुलंदियों तक पहुंचाया। आज अनेक किस्म की खाने-पीने की चीजें पूरे वर्ष सहज ही उपलब्ध हैं। खान-पान का जीवनशैली से संबंध जुड़ने के कारण दुनिया के प्रति हमारा रवैया बदला। जीवन शैली में धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण का प्रसार हुआ। 'डाइटिंग' का लक्ष्य युवा औरतें ही होती हैं। इससे ज्यादातर औरतों में तरह-तरह की शारीरिक और मानसिक समस्याएं जन्म ले रही हैं।
भारतीय परंपरा में स्त्री की जो इमेज रही है उसमें मातृभाव हावी रहा है। यहां तक कि पत्नी से जो उम्मीदें की जाती हैं उनका मातृभाव से गहरा संबंध है। इसके कारण पति-पत्नी के बीच का शारीरिक प्रेम अच्छी नजर से नहीं देखा जाता। उस प्रेम को अच्छा माना जाता है जिसमें शारीरिक प्रेम कम और वायवीय प्रेम ज्यादा हो। पति और पत्नी के बीच के शारीरिक प्रेम के बारे में जो आचार-संहिता बनाई गई उसमें इस बात का खास तौर पर ध्यान रखा गया। प्रेम को आनंद का पर्याय बनाया गया और सेक्स को प्रेम से अलग कर दिया गया।

  भारतीय चिंतकों ने पति के लिए निर्देश दिया कि वह अपनी पत्नी को सिर्फ ऋतु के समय ही प्यार करे। यानी मासिक धर्म से दूसरे मासिक धर्म के बीच के सोलह दिनों को ऋतु कहा गया। इसमें भी पहले चार दिन, ग्यारहवें और तेरहवें दिन संभोग न करें। बाकी रात्रिा में संभोग करे। यानी महीने में मात्र दस दिन संभोग की इजाजत दी गई। इसमें भी सम तिथियों में संभोग करने से पुत्रा और विषय तिथियों में संभोग करने से पुत्राी प्राप्ति का योग बताया गया। जाहिरा तौर पर भारतीय मनोदशा पुत्राी प्राप्ति के पक्ष में नहीं है। इसका परिणाम यह है कि संभोग के
लिए जो दिन सुझाए गए वे सीधे-सीधे घटकर आधे रह गए। इसके अलावा पर्व हैं, अमावस्या है, पूर्णिमा है, या देवी-देवताओं के मेले या त्यौहार हैं जिनके अवसर पर संभोग करना मना है। यदि कोई इन तिथियों में संभोग करता है तो उससे क्या नुकसान हो सकता है इसकी लंबी सूची है। इसके अलावा दिन में सेक्स करना मना है। कहने का मतलब यह कि महीने में संभोग के लिए सुरक्षित बमुश्किल पांच रातें खोजना लॉटरी निकलने के बराबर है। 

इस तरह के प्रावधान बताते हैं कि भारतीय परंपरा विवाहित जीवन में भी सेक्स को पर्याप्त जगह नहीं देती। यानी हम भारतीय हैं कृपया सेक्स की बातें न करें। सेक्स संबंधी रूढ़ियां ्रूहदू समाज में आज भी बहुत मजबूत हैं। यही वजह है कि उच्च जाति की औरतें योनि और जननेंद्री के नाम को नहीं लेतीं। उसके लिए तरह-तरह के छ िर्नांम दे दिए गए हैं। यह मान्यता है कि योनि व जननेंद्री को सही नाम से पुकारेंगे तो वह आकर्षित कर सकती है। स्थिति यह है कि डाक्टर के पास एक उच्च शिक्षा संपन्न व्यक्ति जब अपने उपचार के लिए पहुंचा तो उसे अंग्रेजी में गुप्तांग का नाम बोलने में कोई परेशानी नहीं हो रही थी किंतु ज्यों ही डाक्टर ने उन्हें अपनी मातृभाषा में गुप्तांग का नाम लेने के लिए कहा, उस भाषा में अनूदित करने के लिए कहा जो भाषा उनके शारीरिक अनुभव के करीब हो तो उन महाशय के पास शब्द नहीं थे। 

कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदू समाज में सेक्स और कामुकता के प्रति अज्ञान के कारण बड़े पैमाने पर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक तनाव पैदा हो रहे हैं। इस अज्ञान का सबसे प्रमुख कारण है सेक्स के बारे में खड़ी की गईं सांस्कृतिक बाधाएं।
प्रसिध्द मनोशास्त्री सुधीर कक्कड़ ने लिखा है आम तौर पर यह मिथ है कि निचली जातियों में सांस्कृतिक बाधाएं नहीं होतीं किंतु सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि बड़े पैमाने पर निचली जातियों में सेक्स को लेकर व्यापक असंतोष है। दिल्ली में रहने वाली निचली जातियों की औरतों ने बताया कि सेक्स ने प्यार और लगाव के बजाय उनके मन में वैमनस्य और अलगाव पैदा किया है। इसका प्रधान कारण यह है कि अधिकांश औरतों को प्यार या संभोग जनबहुल कमरे में करना पड़ता है जो चंद मिनट का होता है। इसमें किसी भी किस्म का शारीरिक और मानसिक आनंद नहीं मिलता। अधिकांश औरतों के लिए यह अनुभव पीड़ादायक और अरुचिकर होता है। यदि यह बात कोई औरत बता दे तो उसे शारीरिक उत्पीड़न के भय से गुजरना होता है। स्थिति यहां तक बदतर होती है कि सेक्स के समय कोई भी औरत अपने कपड़े तक नहीं उतार पाती। क्योंकि कपड़े उतारकर सेक्स करने में शर्म महसूस होती है। निचली जाति की जिन औरतों में पति के प्रति समर्पण की भावना पाई जाती है वहां पर सेक्स को मर्द का ही विशेषाधिकार और आवश्यकता माना जाता है। इसे ये औरतें इन शब्दों में बताती हैं 'आदमी बोलना चाहता है।

आम तौर पर हिंदुस्तानी औरतें सेक्स के बारे में रूपकों में बातें करती हैं जैसे 'हफ्ते में एक बार लगवा लेते हैं।' यानी सप्ताह में एक बार इंजेक्शन लगवा लेते हैं। कहने का मतलब यह है कि संभोग पीड़ादायक है किंतु स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। संभोग के लिए सबसे ज्यादा चर्चित पदबंध है, काम और धंधा अर्थात् कार्य और व्यापार। 

निचली जाति की औरतों और पुरुषों में संभोग एक तरह का समझौता और निर्वैयक्तिक विनिमय संबंध है। इसमें एक पक्ष शोषण करता है और आनंद लेता है।

दूसरी ओर मध्य वर्ग और उच्च मध्य वर्ग के पति-पत्नी संबंधों में आम तौर पर आंतरिक लगाव का अभाव मिलेगा। खासतौर पर औरतों में अपने पति के प्रति एक मर्द के तौर पर आंतरिक लगाव अनुपस्थित मिलेगा। पति-पत्नी के बीच में युगल के तौर पर जिस आंतरिकता की बातें की जाती हैं उन्हें जीवन के विभिन्न पड़ावों पर सुनते हुए स्त्रिायां बड़ी होती हैं और ये सारी बातें कल्पना और फैंटेसी से निकली होती हैं। इन मीठी-मीठी बातों के माध्यम से पति-पत्नी के मधुर जगत की सृष्टि की जाती है।

 जबकि जीवन की वास्तविकता यह है कि पति-पत्नी के जीवन में वह सुनहरा दिन कभी नहीं आता जिसकी मधुर बातें सुनते हुए लड़कियां बड़ी होती हैं। इन दोनों के बीच जो असमान संबंध उभरकर आता है। यह असमानता प्रत्येक क्षेत्रा में अभिव्यक्ति पाती है जिसके कारण कभी-कभी आनंद का क्षण आता है और बाकी समय महाभारत चलता रहता है जिसमें असंतोष, दुख, दर्द और कुंठाओं की बार-बार अभिव्यक्ति होती है। इसका प्रधान कारण यह है कि भारतीय समाज में सेक्स और कामुकता के प्रति आंतरिक गंभीर भावबोध का अभाव है। इस अभाव की जड़ें हमारे सामाजिक संबंधों की प्रकृति में छिपी हैं। पति-पत्नी के बीच के मौजूदा सामाजिक संबंधों में व्याप्त असमानता, कामुकता और सेक्स के प्रति अवैज्ञानिक रवैए को जब तक नहीं बदलेंगे तब तक नई भावनाओं के साथ हमारा समाज सामंजस्य नहीं बिठा पाएगा।
परवर्ती पूंजीवाद के दौर में कामुकता की लोकप्रियता ने कामुक पहचान को नया जन्म दिया। इसे उपभोक्तावादी संस्कृति के माध्यम से निर्मित किया। यह परवर्ती पूंजीवाद के विकास की सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है। आज सेक्स और सेक्सुएलिटी का पूरी तरह वस्तुकरण हो चुका है। उसे वस्तुओं के साथ जोड़ दिया गया है। अब सबकुछ खुला और बाजार में, दिन के उजाले में होता है।

 पूर्व-आधुनिक काल में कामुकता राज्य के संरक्षण में पलती थी। आज वह स्वायत्त और आत्मनिर्भर है। इसे प्रत्यक्षत: सत्ता के संरक्षण की जरूरत नहीं है। इसके विपरीत सत्ता और बाजार इसके सहयोग पर निर्भर हैं। दरबारी सभ्यता ने कामुकता को समृध्दि के प्रदर्शन से जोड़ा। पूंजीवाद ने इसे निर्वस्त्रा करके सत्ताधारी राजनीति के वर्चस्व से जोड़ा और बाजार का सर्वस्व बना डाला।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से सामंतवाद का कामुकता से संबंध है। पूंजीवाद का अर्ध्दनग्नता (सेमी पोर्नोग्राफी) से और परवर्ती पूंजीवाद का पोर्नोग्राफी से संबंध है। 

मध्यकाल में कामुकता की अभिव्यक्ति कलाओं में हुई और कामुक कला-निपुण था। पूंजीवाद ने कामुक को कामुकता की वस्तु बना दिया, उसे कला और कौशल से पृथक किया। अब कामुकता मात्रा देह होकर रह गई। परवर्ती पूंजीवाद ने कामुकता को आम जीवन का सबसे आकर्षक और गतिशील तत्व बना दिया। 

सामंती दौर में कामुकता के क्षेत्र में विशिष्ट जातियों और पेशेवर लोगों का दखल था आज इस पर प्रत्येक नागरिक का दखल है। आज विज्ञापन के मॉडल या पोर्नोग्राफी के मॉडल सुधीजनों या गुणीजनों के परिवारों से नहीं आते अपितु आम शहरी परिवारों से आते हैं। अब गुण के बजाय शरीर के ऊपर जोर है। सामंतवाद में कामुकता दरबार को संबोधित करती थी। 

आधुनिककाल में समस्त सामाजिक समूहों और वर्गों को संबोधित करती है। सामाजिक जीवन से पलायन की ओर ले जाती है। आज कामुकता सबसे बड़ा उद्योग है। भारत में इसका 100 करोड़ रुपए से ज्यादा का कारोबार है। आम तौर पर कामुकता पर प्रतिबंध लगाने की मांग की जाती है किंतु प्रतिबंध इस समस्या का समाधान नहीं है। प्रतिबंध के बजाय इसके प्रति आलोचनात्मक रवैया पैदा किया जाना चाहिए। उसने नए किस्म की गुलामी और आजादी को जन्म दिया है। यह हमारे निजी जीवन की कामुकता के अधिकार का क्षय है। यह स्वतंत्र कल्पनाशीलता के लिए चुनौती है। यह व्यक्तिगत शैली के लिए गंभीर समस्या है।

हमें इस सवाल पर सोचना चाहिए कि हाल के वर्षों में कामुकता और पोर्नोग्राफी के व्यापक प्रचार-प्रसार के पीछे सबसे प्रमुख कारण क्या है? संभवत: कामुकता के बहाने सत्ताधारी वर्गों के द्वारा जनतांत्रिक महिला आंदोलन का प्रत्युत्तर देने की कोशिश की जा रही है। 

औरतों के अंदर जहां एक ओर आत्मविश्वास पैदा हुआ है, वहीं दूसरी ओर स्त्री के प्रति हिंसाचार में वृध्दि हुई है। विभिन्न माध्यमों के जरिए हिंसा को नॉर्मलाइज किया जा रहा है। कामुक सामग्री का सामाजिक जीवन में तेजी से इस्तेमाल बढ़ा है। इससे आक्रामकता, संकीर्णता, प्रतिगामिता में वृध्दि हुई है। साथ ही, सामाजिक परिवर्तन के विरोधी भावबोध का सामाजिक आधार मजबूत हुआ है। जनमाध्यमों में औरतों के मसलों पर चर्चाएं कम हो रही हैं जबकि औरत के परंपरागत सरोकारों मसलन, खाद्य, फैशन, सुंदरता, साज-सज्जा आदि पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। इस स्थिति से निकलने के लिए जरूरी है कि कामुकता और सेक्स के प्रति पूर्वग्रहों से अपने को मुक्त करें। कामुकता और सेक्स जीवन की वास्तविकता है। इसके प्रति वैज्ञानिक रवैया अपनाएं। साथ ही, साधारण स्त्रिायों के आम सवालों और समस्याओं को चर्चा के केंद्र में लाएं।



कामुकता का बदलता चरित्र -3-



एक जमाना था जब सेक्स का प्रजनन से संबंध था। प्रजनन के कारण बड़े पैमाने पर औरतों को अकाल मृत्यु का शिकार होना पड़ता था। एक तरह से स्त्री के लिए सेक्स का मतलब मौत था। किंतु परिवार नियोजन के उपायों के आने के बाद सेक्स का प्रजनन से संबंध विच्छेद हो गया। आज स्थिति यह है कि बगैर सेक्स किए गर्भधारण किया जा सकता है।

 आज सेक्स और कामुकता पूरी तरह स्वायत्त हैं। यह कामुकता की मुक्ति की घोषणा है। अब कामुकता पूरी तरह व्यक्ति का निजी गुण बन गई है वह चाहे तो अन्य से इसका विनिमय कर सकता है। यह कृत्रिम कामुकता है। यह स्त्री की सबसे बड़ी जीत है। 

अधिकांश औरतें सैकड़ों वर्षों से कामुक आनंद से वंचित थीं। कामुक आनंद स्त्रियों के लिए भयानक सपने की तरह था। वे सेक्स करते हुए डरती थीं कि उन्हें इसके कारण गर्भधारण की पीड़ा से गुजरना पड़ेगा। बार-बार गर्भधारण का अर्थ था स्त्री की असमय मौत। आज भी भारतीय समाज में परिवार नियोजन के उपायों के प्रति अज्ञानता और सामान्य-से खर्चे पर इनकी अनुपलब्धता के कारण बड़ी संख्या में स्त्रियां प्रजनन के दौरान ही मर जाती हैं। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो परिवार नियोजन के उपायों ने स्त्री को मौत से मुक्ति दिलाकर क्रांतिकारी भूमिका अदा की है।

 इधर के वर्षों में एड्स के आने के कारण कुछ लोगों ने सेक्स का मौत से फिर से संबंध जोड़ने की कोशिश की है। किंतु यह सेक्स और मौत के पुराने संबंध की वापसी नहीं है क्योंकि एड्स स्त्री और पुरुष में फर्क नहीं करता। पहले सेक्स के कारण स्त्री के लिए ही मौत का खतरा था जबकि एड्स के कारण स्त्री-पुरुष दोनों ही मर सकते हैं।

इसके अलावा एड्स जैसी भयानक बीमारी से बचने में सबसे प्रभावी परिवार नियोजन का मैथड 'कंडोम' ही है। भारतीय समाज की सामंती मानसिकता साधारण नागरिक को परिवार नियोजन के पुरुष केंद्रित उपायों के इस्तेमाल से रोकती है।

आज भी मेडीकल स्टोर्स पर गर्भ निरोधक गोलियां या कंडोम मांगते हुए लोग शर्माते हैं। दुकानदार भी देते हुए शर्माता है। यहां तक कि सेक्सोलॉजी के विशेषज्ञ डाक्टरों के चैंबर चारों ओर से बंद गुप्त घर की तरह होते हैं।

पत्र-पत्रिकाओं की दुकानों पर सेक्स या कामुकता का साहित्य चोरी-छिपे बिकता है या फिर आम आदमी जिस निस्संकोच भाव के साथ राजनीति, साहित्य, धर्म आदि की पत्र-पत्रिकाएं पढ़ लेता है, उलट-पुलटकर देख लेता है उसी निस्संकोच भाव का वह सेक्स या कामुकता पर केंद्रित पत्रिका को देखते समय प्रदर्शन नहीं करता। 

सामंती मानसिकता का आलम यह है कि सेक्स और कामुकता केंद्रित पत्रिकाएं अमूमन सीलबंद होती हैं। जबकि अन्य विषयों की पत्रिकाएं सीलबंद नहीं होतीं। कहने का तात्पर्य यह कि कामुकता का बिक्रेता भी सामंती मानसिकता का सम्मान करता है।

विगत पचास वर्षों में जो कामुक क्रांति हुई है उसके कारण लिंगाधारित तटस्थ कामुकबोध का भौतिक आधार निर्मित हुआ। इसके कारण स्त्री को कामुक स्वायत्तता की दिशा में आगे कदम बढ़ाने का अवसर मिला है। वहीं दूसरी ओर समलैंगिक कामुकता और परवर्जन का स्त्री और पुरुष दोनों में तेजी से विकास हुआ है। ये कृत्रिम कामुकता (प्लास्टिक सेक्सुएलिटी) की देन है।

कुछ लोग कामुकता को फ्रायड से जोड़ते हैं। जबकि फ्रायड ने कामुकता और निजी अस्मिता के अंतस्सबंध की खोज की। फ्रायड के पहले समाज इस संबंध से अनभिज्ञ था। फ्रायड ने कामुकता को निजी मसला बनाया। मनोविज्ञान का मानना है कामुकता मनुष्य की चेतन और अवचेतन फैंटेसी है। जहां पर अस्मिता के संघर्ष उभरेंगे वहां पर स्त्री, कामुकता और सेक्स के सवाल भी उठेंगे। इस परिप्रेक्ष्य में कामुकता का संबंध अस्मिता के साथ है।

आज विश्वभर में अस्मिता का सवाल सबसे बड़ा मसला है। आज समाज में स्त्रियां यह सवाल कर रही हैं कि स्त्री क्या है? उसके अधिकार क्या हैं? क्या वह पुरुष के समान है? क्या उसे पुरुष संदर्भ के बगैर अपनी पहचान बनाने और अपनी शर्तों पर जीने का अधिकार है? आज स्त्रियां कह रही हैं कि मेरा तन, मन और धन सिर्फ मेरा है।

आज समाज में इस तरह की भावना के कारण शरीर हमारी अस्मिता की पहचान का मुख्य उपकरण बन गया है। आज प्रत्येक सामाजिक प्राणी शरीर के माध्यम से अपनी इमेज प्रक्षेपित कर रहा है। शरीर के नए-नए कद, आकार-प्रकार, बनावट, नाक-नक्श, हाव-भाव आदि पर जोर दिया जा रहा है। स्त्री पुरानी पहचान और भूमिका को त्याग रही है। चारों ओर उसी की रूप चर्चा है और मुक्त रूप का बोलबाला है। इसके कारण कामुकता का अर्थशास्त्र पैदा हुआ है।

कामुकता और सेक्स का उद्योग विशालकाय रूप में उभरकर सामने आया है। यही स्थिति समलैंगिक पंथियों की है वे भी अपनी पहचान खोज रहे हैं। वे पहले से तयशुदा हैट्रोसेक्सुअल स्टीरियोटाइप को चुनौती दे रहे हैं।

कहने का तात्पर्य यह कि लिंगाधारित पहचान के प्रश्न प्रमुखता हासिल कर रहे हैं। साथ ही, प्रत्येक अपने 'निजी' भावों, इच्छाओं, शरीर आदि पर जोर दे रहा है। शारीरिक 'एपियरेंस' और 'कंट्रोल' को तरह-तरह की माध्यम प्रस्तुतियों के जरिए उभारा जा रहा है। यह बायो पावर के युग की सूचना है। आज बॉडी संचालक शक्ति है। उसे अस्मिता और जीवनशैली के साथ जोड़कर पेश किया जा रहा है। इस क्रम में धार्मिक तत्ववादी संगठन धर्म को जीवन शैली के रूप में व्याख्यायित कर रहे हैं।




कामुकता का बदलता चरित्र -2-






19वीं शताब्दी में सेक्स विमर्श के दौरान तीन तरह के दृष्टिकोण सामने आए। पहला, विमर्श स्त्रr की कामुकता को 'हिस्टीरिया' के चिकित्साशास्त्र से जोड़ता है।
दूसरा, बच्चों के संदर्भ में कामुकता की व्याख्या प्रस्तुत करता है। इन लोगों ने बताया गया कि बच्चे सेक्स की दृष्टि से सक्रिय होते हैं अत: बच्चों को सेक्स से दूर रखना चाहिए।
तीसरा, विमर्श पिता के संदर्भ में कामुकता पर विचार करता है और कामुकता को परिवार और शादी से जोड़कर देखता है। शादी में सेक्स को आवश्यक और स्व-नियामक मान लिया गया।

आरंभ में परिवार नियोजन की पध्दतियों को गैर-जरूरी माना गया। आरंभ के वर्षों में यह तर्क दिया गया कि जो परिवार नियोजन करना चाहता है तो उसे अपनी कामेच्छा पर नियंत्राण लगाना चाहिए इससे परिवार स्वत: छोटा हो जाएगा। यही वह दौर है जब तेजी से संयुक्त परिवार के टूटने की प्रक्रिया शुरू हुई। दूसरी ओर मूलत: सभी धर्मों की ओर से संयुक्त या बड़े परिवार की वकालत शुरू हुई।

फूको के अनुसार कामुकता की धारणा का उदय विभिन्न किस्म के आधुनिक सामाजिक संस्थानों के उदय के साथ हुआ। आधुनिक समाज और आधुनिक राष्ट्र को सक्षम बनाने में अन्य बातों के अलावा जनसंख्या नियंत्रण के उपायों की बहुत बड़ी भूमिका रही है। मूलत: इस बात पर जोर दिया गया कि शारीरिक स्वास्थ्य कैसा हो। सामाजिक विकास की सारी तकनीकी इसी उद्देश्य से निर्मित की गई। इसके माध्यम से व्यक्ति की शारीरिक क्षमता के ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल पर जोर दिया गया। इसके कारण 'कामुकता के सांस्थानिक' रूपों का जन्म हुआ। इसे शरीर और आनंद का अर्थशास्त्रा भी कह सकते हैं। प्राचीनकाल में वात्स्यायन का कामसूत्र मूलत: 'निजी' या 'सेल्फ' की देखभाल, कामेच्छा, इच्छापूर्ति आदि पर जोर देता है। कालांतर में दार्शनिकों ने इसका निषेध किया और नैतिकता और सौंदर्यशास्त्र का अंग बना दिया। यह भी बताया गया कि जीवन के लिए सेक्स से ज्यादा जरूरी है भोजन और भजन। अध्यात्मवादियों की यह सबसे बड़ी जीत थी। इसके चलते 'आत्म' की उपेक्षा हुई। 'सत्य' की खोज पर जोर दिया गया। अब 'आत्म' (सेल्फ) से बड़ा 'सत्य' हो गया।

कामुकता (सेक्सुएलिटी) पदबंध का सबसे पहले 19वीं शताब्दी में प्रयोग मिलता है। बायोलॉजी और ज्यूलॉजी में यह पदबंध 1800 ई. में मिलता है। किंतु आज जिस अर्थ में इस पदबंध का प्रयोग होता है उसकी शुरुआत 19वीं के अंत में हुई। यह पता चला कि स्त्रियों को ऐसी अनेक बीमारियां होती हैं जो मर्दों को नहीं होतीं। इनका संबंध स्त्री की सेक्सुएलिटी से है। इसके बाद सारे प्रयास इस दिशा पर केंद्रित हो गए कि स्त्री की कामुकता को कैसे नियंत्रित किया जाए। यह भी बताया गया कि जो स्त्राी कामुक आनंद के बारे में महसूस करती है वह अस्वाभाविक है।

भारतीय परंपरा में कामुकता सामाजिक निर्मिति है। यह पावर का खेल है। इसे मात्र शारीरिक उत्तेजनाओं के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। शारीरिक उत्तेजना से आनंद मिल सकता है और नहीं भी मिल सकता। कामुकता को सक्रिय बनाने वाली एकमात्र शक्ति है पावर।

कामुकता का शास्त्र दरबारी संस्कृति के तहत रचा गया। इसके बाद ही इसके विविध रूपों को समाज जान पाया। श्रृंगार रस केंद्रित रचनाएं कामुकता पर ही रोशनी डालती हैं। इसके कारण स्त्री की भूमिका और स्त्री की स्थिति के प्रति उदासीनता और उसे मातहत बनाने की प्रवृत्ति का विकास हुआ। स्त्री की भूमिका को कम करके देखा गया। इसके दो महत्वपूर्ण दुष्परिणाम हुए, पहला, स्त्री सामाजिक विमर्श से गायब हो गई और दूसरा, कामुकता विमर्श सत्ता का विमर्श बन गया। साथ ही, स्त्री और कामुकता दोनों को रहस्यमय और गुप्त बना दिया गया।
 सामंती दौर में कामुकता और स्त्री पर्याय बनाए गए। आधुनिक काल की शुरुआत के साथ सामंतवाद की जिस गति से विदाई हुई उसी गति से कामुकता और स्त्री के प्रश्न सामने आते गए। उन्नीसवीं शताब्दी में चिकित्सा के क्षेत्र में नए-नए आविष्कार हुए। इनके बारे में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के द्वारा जो सामग्री प्रकाशित हुई उसने स्त्री, सेक्स और कामुकता के पुराने मिथों को तोड़ा। किंतु इस क्षेत्र की जानकारियां चंद हाथों तक सीमित थीं। अधिकांश जनता अशिक्षित थी। कामुकता और सेक्स से संबंधित साहित्य साधारण जनता की पहुंच के बाहर था। यहां तक कि शिक्षित जनता के पास तक इस साहित्य की पहुंच नहीं थी। इस क्षेत्र की तमाम जानकारियां सिर्फ पेशेवर लोगों के पास तक ही बमुश्किल पहुंच पाई थीं। स्त्रिायों तक ऐसे साहित्य की पहुंच शून्य के बराबर थी।
यही वजह थी कि अधिकांश औरतें आज भी कामुकता, स्त्री और सेक्स के बारे में अज्ञानी की तरह पेश आती हैं। अधिकांश औरतों को शादी के समय सेक्स का ज्ञान नहीं होता। शादी के बाद स्त्री को पुरुष की इच्छाओं की अनिच्छित भाव से पूर्ति करनी होती है। यही वजह है कि आम तौर पर माताएं कहती हैं कि 'बेटी शादी के बाद तुम्हें अनेक ऐसी बातें माननी पड़ सकती हैं जिन्हें तुम पसंद न करो। तुम उनकी उपेक्षा करना क्योंकि मैंने भी ऐसा ही किया था।'
आधुनिक समाज के आने के बाद पति-पत्नी के बीच में भावात्मक एकता और संतान के प्रति जिम्मेदारी पर जोर दिया गया। संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार का जन्म हुआ। पुराने घर की सामुदायिक भावना को ध्वस्त करते हुए घर की नई धारणा और परिवेश ने जन्म लिया।

 'घर' के परिवेश और कार्य क्षेत्र के परिवेश को अलग करके देखा जाने लगा। घरेलू और सामाजिक, निजी और सामाजिक में फर्क पैदा हुआ। अब निजी जिंदगी और निजता पर जोर दिया जाने लगा। व्यक्ति की निजी जिंदगी, एकल परिवार, प्राइवेसी आदि की धारणा के विकास के कारण स्त्री की अस्मिता, भावों, इच्छाओं और आकांक्षाओं को तरजीह दी गई। इसके अलावा परिवार नियोजन के आधुनिक उपायों ने कामुकता और सेक्स को स्वायत्त बनाया। परिवार नियोजन के आधुनिक उपायों के इस्तेमाल से स्त्री को गर्भधारण करने और बच्चे पैदा करने के जंजाल से मुक्ति मिली।

ध्यान रहे, छोटे परिवार के निर्माण में आधुनिक गर्भ-निरोधक उपायों की महत्वपूर्ण भूमिका है। परिवार नियोजन के बारे में लंबे समय से प्रचार अभियान चलता रहा है किंतु कायदे से प्रथम विश्वयुध्द के बाद से ही परिवार नियोजन के प्रयासों को बल मिला है। पश्चिमी जगत में ईसाइयत ने बड़े पैमाने पर परिवार नियोजन का विरोध किया इसके बावजूद परिवार नियोजन को सफलता मिली।
भारत में यदि परिवार नियोजन के उपायों को स्वेच्छा से जनप्रिय बना दिया गया होता और धार्मिक और फासीवादी संगठनों ने इसके खिलाफ जहरीला प्रचार न किया होता तो हमारे समाज की तस्वीर कभी की बदल चुकी होती। आज सच्चाई यह है कि हिंदू, मुस्लिम और ईसाई धर्म के हितों और विचारों के प्रचारक संगठन अपने-अपने तरीके से परिवार नियोजन, गर्भपात, एकल परिवार आदि का जमकर विरोध कर रहे हैं। यही वजह है कि इन तबकों के वोट हासिल करने के लिए प्रमुख राजनीतिक दल इन सवालों पर खुलकर प्रचार अभियान नहीं चलाते।

प्रभावी ढंग से परिवार नियोजन के उपायों को लागू करने का मतलब है कामुकता और सेक्स को स्वायत्ता बनाना। आज वैज्ञानिक खोजों के कारण स्त्री को सेक्स और कामुकता के बहाने मिलने वाली यातनाओं और मृत्यु से मुक्ति मिली है। स्त्री के निजी जीवन में बुनियादी बदलाव पैदा किया है। आज स्त्री के लिए कामुकता (कुछ हद तक मर्द के लिए भी) वैविध्यपूर्ण आनंद का रूप ग्रहण कर चुकी है।



कामुकता का बदलता चरित्र -1-







कामुकता आज चर्चा के केंद्र में है। इसके बारे में भारतीय समाज में तेजी से मंथन चल रहा है। कामुकता के सवालों पर खुली बहसें हो रही हैं। एक जमाना था जब कामुकता के बारे में बात करना निषिद्ध था। अपराध था। जो लोग बात करते थे उन्हें हेयदृष्टि से देखा जाता था। उनसे दूर रहने की सलाह दी जाती थी। सामंतकाल के पहले यह स्थिति नहीं थी।

प्राचीनकाल में आम लोगों की शिक्षा के सामान्य विमर्श में कामुकता और सेक्स संबंधी विषय भी शामिल थे। सामंतकाल के आने के बाद कामुकता के प्रति खुलापन गायब हो गया। अब अन्य अनेक विषयों की तरह कामुकता संबंधी विमर्श भी चंद लोगों की बपौती हो गया। सामंती दौर में निर्मित निषिध्द तत्वों में सेक्स और कामुकता संबंधी तत्वों को भी शामिल कर लिया गया। यह सिलसिला लंबे समय तक चलता रहा।

सामंती मानसिकता शर्म या पर्दा डालने पर जोर देती है। शर्म और पर्दे
की ओट में सबकुछ लागू कर सकते हैं। यहां तक कि कामुकता और सेक्स पर भी विमर्श कर सकते हैं। कामुकता और सेक्स के इन दिनों विमर्श के केंद्र में आने से सामंती विचारधारा को जबर्दस्त धक्का लगा है। यह आधुनिकता की जीत है। आज पर्दा, झिझक और शर्म को प्रतिगामिता और पिछड़ेपन का प्रतीक माना जाता है। लगातार ऐसे संस्कारों, मूल्य और रवैए पर जोर दिया जा रहा है जो 'बोल्ड और ब्यूटीफुल' की मानसिकता निर्मित करें।

शर्म, लज्जा और आवरण के बिना चीजों, वस्तुओं और घटनाओं को देखना, पारदर्शी रूप में देखना, बेझिझक बातें करना आधुनिकता की निशानी है। इसके विपरीत लज्जालु, शर्मीलापन, पर्दादारी, प्रच्छन्न ढंग से बातें करना, जी हुजूरी की भाषा में बोलना या किसी अन्य के माध्यम से बातें करना सामंती मानसिकता की निशानी है। इस तरह की मानसिकता के खिलाफ साधारण लोगों में प्रतिक्रिया तेज हुई है। आज कामुकता, सेक्स, एकल परिवार, स्त्राी के अधिकारों और अस्मिता के सवालों पर समाज पूरी तरह विभाजित है। आम तौर पर इन विषयों पर धार्मिक तत्ववादी और प्रतिगामी संगठन सामंती रवैया अपनाए हुए हैं।
सच्चाई यह है कि स्त्री, कामुकता और सेक्स समाज की वास्तविकता है। इनसे बचकर कोई भी नहीं रह सकता। इन तीनों के प्रति पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण आज भी वैचारिक स्तर पर वर्चस्व बनाए हुए है। राजनीति में इसका धार्मिक तत्ववादियों, फासीवादियों और प्रतिक्रियावादी राजनीति से संबंध है। स्त्री, कामुकता और सेक्स संबंधी विषयों पर जितनी ज्यादा बहस होगी उतना ही वे ताकतें कमजोर होंगी जो पितृसत्तात्मकता के
पक्ष में खड़ी हैं। खुली बहस से वर्जना और अछूतभाव से मुक्ति मिलेगी। स्त्री, कामुकता और सेक्स को दमित भावबोध से मुक्त करके वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने के लिए आवश्यक है इनके बारे में प्रश्नाकुलता पैदा की जाए और परिवार और समाज में खुलकर बातें की जाएं।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो पाएंगे कि आधुनिकता और पूंजीवादी दृष्टिकोण ने ऐसे संस्थानों और नियमों, कानूनों का निर्माण किया जिसमें सामंती दमनात्मक रवैए को समाहित कर लिया गया। सोवियत संघ में समाजवादी सत्ता की स्थापना और स्त्रीवादी आंदोलन के प्रभाववश स्त्री, कामुकता और सेक्स के प्रति लोकतांत्रिक भावबोध पैदा हुआ। इन तीनों तत्वों के प्रति पुराने विचारों और मान्यताओं और दमनात्मक रवैए से मुक्ति की दिशा में समाज तेजी से आगे बढ़ा।

पूंजीवादी और सामंती दृष्टिकोण कामुकता और सेक्स के प्रति बुनियादी तौर पर अनुदार और अराजक है। जो लोग कामुकता और सेक्स के बारे में प्रचलित और पुराने विचारों को नहीं मानते तो उन्हें दंडित करता है। पूंजीपति वर्ग सभ्यता के निर्माण पर जोर देता है। पूंजीपति वर्ग के लिए सभ्यता (सिविलाइजेशन) का मतलब है अनुशासनपूर्ण जीवन। अनुशासन का मतलब है इच्छाओं पर आंतरिक नियंत्रण।

इस विचार पर बल दिया गया कि अनुशासन के द्वारा ही बलिष्ठ और शक्तिशाली समाज, संस्थानों और संगठनों का निर्माण हो सकता है। बलिष्ठ शरीर के माध्यम से स्वत:स्फूर्त इच्छाओं को काबू में रखने में सफलता मिलती है। अनुशासित और शक्तिशाली शरीर 'पावर' को जन्म देता है। जिसके पास 'पावर' है वही समर्थ है। 'पावर' का दारोमदार अनुशासन पर टिका है। इसका यदि कामुकता और सेक्स के क्षेत्र में प्रयोग करेंगे तो समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध्द और बीसवीं शताब्दी में सेक्स के विभिन्न रूपों को लेकर विकसित औद्योगिक देशों और सोवियत संघ में चिकित्सा क्षेत्र में विशेष अनुसंधान कार्य हुए। इनके परिणामस्वरूप कामुकता को गुप्त रखने पर जोर दिया गया। इसे गुप्त रखने के उपायों पर अमल किया गया। इसके खिलाफ तरह-तरह के कानूनी प्रावधान बनाए गए। इस तरह के प्रयासों का लक्ष्य था व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक क्षमताओं को विकसित करना। किंतु दूसरी ओर स्त्री आंदोलन और मजदूर आंदोलन के विकास के कारण पितृसत्तात्मकता कमजोर हुई। कामुकता का विज्ञान के रूप में विकास हुआ। अब कामुकता का केस हिस्ट्री के तौर पर अध्ययन किया जाने लगा, वहीं दूसरी ओर चर्च में जाकर आत्मस्वीकृतियों के जरिए ज्यादा से ज्यादा आम लोग अपनी सेक्स संबंधी गलतियों के प्रायश्चित के लिए जाने लगे इस सबके कारण सेक्स को गुप्त रखने पर जोर दिया गया। इसे 'निजी जीवन का रहस्य' कहा गया। बाद में कामुकता को जानने के बजाय कामुकता के 'सत्य' की खोज पर ध्यान दिया गया। इसके कारण आधुनिकता के साथ 'सत्य' की खोज की मुहिम चल निकली। कालांतर में सामान्य कामुकता और असामान्य कामुकता के बीच फर्क किया गया।

शनिवार, 30 जनवरी 2010

मुक्ति की गारंटी है जनोन्मुखी विज्ञान




 अंधविश्वास से लड़ने के लिए विज्ञान के बुनियादी क्षेत्रों में अनुसंधान और विज्ञानसम्मत चेतना के निर्माण पर जोर दिया जाना चाहिए। कुछ विज्ञान संगठन हैं जो सचमुच में अंधविश्वास से लड़ना चाहते हैं किंतु इसके लिए ये लोग लोकप्रिय विज्ञान का सहारा लेते हैं। प्रसिध्द वैज्ञानिक जे.डी. बर्नाल के शब्दों में 'लोकप्रिय विज्ञान वास्तविक विज्ञान से उतनी ही दूर की चीज है जितनी लोकप्रिय संगीत, शास्त्रीय संगीत से है।'

इस फर्क के बावजूद लोकप्रिय विज्ञान के जरिए टुकड़ों-टुकड़ों में विज्ञान के परिणामों को आम जनता तक पहुंचाने में मदद मिलती है। या जब इन्हें सनसनीखेज ढंग से पुनर्प्रस्तुत किया जाता है तो भी परिणाम आम लोग जान ही जाते हैं। लेकिन यह टुकड़ों-टुकड़ों में होता है और लोग विज्ञान की विधि और भावना से अपरिचित ही रह जाते हैं।

आज विज्ञान और लोकप्रिय विचारों के बीच आदान-प्रदान टूट चुका है। विज्ञान को लेकर वैसी सघन और प्रशिक्षित गुणग्राहकता कहीं नहीं मिलती जैसी क्रिकेट या फुटबाल मैचों को लेकर देखी जाती है। इसकी व्याख्या केवल वैज्ञानिक आनंद में वित्तीय हितों की कमी या इस विषय की अंतर्निहित कठिनाई के जरिए नहीं की जा सकती।

आम लोग महीनों क्रिकेट की बारीकियों को लेकर चर्चाएं करते रहते हैं यहां तक कि सट्टे में पैसा तक दांव पर लगाते हैं। यदि विज्ञान में लोगों की रुचि होती तो एक बड़ा दिलचस्प खेल दिखाई देता और वह यह कि आम लोग किसी समस्या पर प्रोफेसर '' के सिध्दांत पर प्रोफेसर '' के सिध्दांत की अपेक्षा दस और एक का दांव लगाते।

अंधविश्वास को हमारे जनमाध्यम सबसे पहले कवरेज देते हैं। खासकर हिंदी मीडिया की स्थिति तो बेहद खराब है। हिंदी में किसी भी दैनिक मीडिया में विज्ञान के स्थायी पेज या स्तंभ नहीं हैं। न विज्ञान संवाददाता हैं, न विज्ञान संपादक हैं, और न विज्ञान पर लिखने वाले वैज्ञानिक लेखक ही हैं। विज्ञान की यदा-कदा खबरें आती हैं तो लगता है चिप्पियां जोड़कर खबर बनाई गई है। अथवा सनसनीखेज ढंग से विज्ञान खबर प्रकाशित होती है। जनमाध्यमों का विज्ञान के प्रति इस तरह का उपेक्षा भाव जनमाध्यमों की सामाजिक भूमिका पर सवालिया निशान लगाता है।

आमतौर पर यह देखा जाता है वैज्ञानिक खबरों को हिंदी का कोई अखबार छापता ही नहीं या छापता है तो छपी हुई चीजें आती हैं। वे पूरी तरह टुकड़ों-टुकड़ों में होती हैं। लोकप्रिय अखबार किसी खोज के बारे में सिर्फ इसलिए छापते हैं क्योंकि वह चौंकाने वाली लगती है और हमारे स्वीकृत दृष्टिकोण में कुछ उलटफेर करती है। अधिक गंभीर अखबार भी यथार्थत: इससे बेहतर कुछ नहीं करते।

 जब वे विज्ञान संबंधी खबर बनाते हैं तो किसी वैज्ञानिक से एक पैराग्राफ उधार मांग लेते हैं और वह विशेषज्ञ न सिर्फ यह मानकर चलता है कि बाकी लोग भी उसके जितने ही जानकार हैं बल्कि जानकार और गैर-जानकार सारे ही लोग इस नई पहेली का कोई मतलब नहीं निकाल पाते जो विज्ञान नाम की समूची पहेली में आ चिपकी है। ऐसी खबरों में कोई बौध्दिक रुचि लेने के बजाय उन्हें एक सरसरी उत्सुकता के साथ ही, पढ़ा जा सकता है। हमारे लिए इन टुकड़ों में से छांटना, छानना और जोड़ना तब तक और भी कठिन होता है जब तक हम यह न देख सकें कि विज्ञान की विकासमान सीमाओं में इस तरह की खबरें क्या जोड़ती हैं।

अधिकतर लोकप्रिय विज्ञान पत्रिकाएं बेहतर होती हैं किंतु इनमें से अधिकांश हिस्सा आश्चर्यजनक कथाओं और व्यावहारिक गुरों से भरा होता है। इनमें यदाकदा ही गंभीर और सटीक लेख प्रकाशित होते हैं। ऐसा एक भी प्रकाशन नहीं है जिसकी अकेली भूमिका समकालीन आर्थिक और राजनीतिक विकास के संदर्भ में विज्ञान की प्रगति को सहज ग्राह्य रूप में पेश करने की हो। लोकप्रिय विज्ञान पर लिखी पुस्तकों की अवस्था इससे भी खराब है। अंधविश्वास के खिलाफ लड़ने के लिए हमें इस स्थिति को बदलना होगा।

हमें विज्ञान और लोकप्रिय विचारों के बीच आदान-प्रदान पर जोर देना होगा। आज विज्ञान और वैज्ञानिक अलगाव की स्थिति में हैं। अलगाव का आलम यह है कि वैज्ञानिक दूसरी दुनिया का हो गया है।

वैज्ञानिक का सामाजिक अलगाव वस्तुत: विज्ञान के सामाजिक अलगाव का द्योतक है। अपने विषय से इतर वह साधारण व्यक्ति लग सकता है, गोल्फ खेल सकता है, अच्छे किस्से सुना सकता है और एक समर्पित पति और पिता भी हो सकता है, लेकिन उसका विषय उसकी अपनी 'दुकान' है, जो उसे समझने वाले चंद लोगों को छोड़कर उसे पूरी तरह आत्मकेंद्रित बना देती है। साहित्यिक संस्कृति के लोगों में विज्ञान के बारे में कुछ भी न जानने का एक आकर्षण होता है, स्वयं वैज्ञानिक भी इस आकर्षण से बच नहीं पाते। उनके बारे में भी यह बात अन्य विज्ञानों पर लागू होती है।

वैज्ञानिक विषयों पर अच्छी सामान्य बातचीत दुर्लभतम अवसरों में से एक होती है और यदि किसी समूह में वैज्ञानिकों की बहुतायत हो तो भी यह बात लागू होती है।आज स्थिति यह है कि संस्कृति और विज्ञान का अलगाव बढ़ गया है। इस अलगाव की शुरुआत विज्ञान की शिक्षा शुरू होने के बाद हुई। यह एक भारी विरोधाभास है। इसके बाद से ही विज्ञान का शौकिया चरित्रा खत्म हुआ और व्यापक जनता की रुचि भी इसमें से जाती रही। अब खुद से विज्ञान के बारे में सोचने की जरूरत किसी को नहीं है, विज्ञान के क्षेत्रा में अब ऐसे ही लोग मिलते हैं जो बस अपने काम से काम रखते हैं।

अंधविश्वास सिर्फ जनता तक सीमित नहीं हैं बल्कि प्रशासन और राजनीति के क्षेत्रा में भी इसका गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। इसी तरह विज्ञान के प्रति अज्ञान सिर्फ जनता तक सीमित नहीं है बल्कि प्रशासन और राजनीति तक इसका क्षेत्रा फैला हुआ है। यह अचानक नहीं है कि लोकचेतना, राजनीति और प्रशासन में विज्ञान इतना तिरस्कृत है।

विज्ञान के प्रति हमारा मौजूदा रवैया हमारी मौजूदा सामाजिक व्यवस्था का अनिवार्य और मौलिक अंग है। समाज की मौजूदा जरूरतें अपनी संतुष्टि के लिए विज्ञान को जाग्रत रखना चाहती हैं, लिहाजा ये जरूरतें कुछ भी हों, कुछ विज्ञान इनके लिए जरूरी है। लेकिन इन जरूरतों की पूर्ति के लिए आया विज्ञान नई जरूरतें पैदा करता है और पुरानी जरूरतों की आलोचना करता है। ऐसा करते हुए समाज में सुधार करने में उससे भी कहीं ज्यादा और भिन्न भूमिका अदा करने लगता है। यही कारण है कि शासक वर्ग यह कोशिश करता है कि विज्ञान और वैज्ञानिक दोनों को सामाजिक अलगाव की अवस्था में रखा जाए और विज्ञान को एक उपयोगी नौकर की तरह इस्तेमाल किया जाए।

विज्ञान का यदि सामाजिक अलगाव खत्म हो जाएगा तो वह सामाजिक परिवर्तन का अस्त्र बन जाएगा, मालिक बन जाएगा। यही वजह है कि वैज्ञानिकों को अपने-अपने पेशों में मगन रहने दिया जाता है। समाज में जिन लोगों का वर्चस्व है वे नहीं चाहते कि विज्ञान आम लोगों तक पहुंचे और आम जनता विज्ञानसम्मत चेतना से संपन्न बने। विज्ञानसम्मत चेतना के माध्यम से ही आम लोगों में आलोचनात्मक ढंग से सोचने और देखने का नजरिया विकसित होता है। जो नजरिया सिर्फ आलोचनात्मक हो और विज्ञानसम्मत न हो तो उसमें अंधविश्वासों को अपदस्थ करने की क्षमता नहीं होती।

विज्ञान को जनप्रिय बनाने के काम में सबसे बड़ी बाधा है धन की। आज अंधविश्वास के कार्यों के लिए जिस तरह बेशुमार धन उपलब्ध है उसकी तुलना में विज्ञान के अनुसंधान कार्यों के लिए धन उपलब्ध नहीं है। राज्य और निजी क्षेत्रा दोनों ही की तरफ से विज्ञान के बुनियादी अनुसंधान के लिए सकल घरेलू उत्पाद का एक फीसदी हिस्सा भी खर्च नहीं होता। जो कुछ खर्च होता है उस पर बाजार की शक्तियों की नजर लगी हुई है।

इसके अलावा फासीवादी ताकतें विज्ञान का अपने हितों और राजनीतिक विस्तार के लिए इस्तेमाल करना चाहती हैं। वे इसका युध्द सामग्री के निर्माण के लिए इस्तेमाल करने के पक्ष में सक्रिय हैं। वहीं दूसरी ओर आम जनता में पौराणिक मिथों, कथाओं और रहस्यवादी अतार्किकता का जमकर प्रचार कर रही हैं। यहां तक कि गणेश दूध पी रहे हैं जैसे चमत्कारों का प्रचार करते रहे हैं। बहुत सारे संत-महंत अपने जादुई चमत्कारों के नाम पर जादूगरी के करतबों और विज्ञान के नुस्खों का प्रयोग कर रहे हैं और आम जनता में अंधविश्वास फैला रहे हैं।

फासीवादी ताकतें पोंगापंथी बातों का दृढ़ सत्यों के साथ घालमेल कर रही हैं। आज यह प्रचार किया जा रहा है कि हिंदू जन्मना श्रेष्ठ होते हैं, उनमें सिर्फ अनुशासन की कमी है यदि वे अनुशासित हो जाएं, कद काठी मजबूत कर लें और संघर्ष के लिए तैयार हो जाएं तो वे अपनी नियति बदल सकते हैं, भारत पर राज कर सकते हैं और सारी दुनिया फिर उनका लोहा मानने के लिए मजबूर होगी। इस तरह के विचारों का विज्ञानसम्मत ज्ञान से कोई लेना-देना नहीं है। बल्कि इस तरह की बातें अंधविश्वास का हिस्सा हैं।

फासीवादी दृष्टिकोण भारतीय परंपरा में हिंदुओं के अलावा किसी अन्य समुदाय के योगदान को स्वीकार ही नहीं करता और बार-बार यह प्रचार किया जा रहा है कि भारतीय परंपरा में मुसलमानों की विध्वंसक भूमिका रही है। वे लुटेरे और हमलावर रहे हैं। इस तरह के तर्क भारतीय संगीत, दर्शन, स्थापत्य, विज्ञान, समाजविज्ञान, राजनीति, ललित कला आदि के क्षेत्रों में मुसलमानों के योगदान को एकसिरे से खारिज करते हैं और परंपरा के बारे में अंधविश्वास का फासीवादी प्रपंच निर्मित करते हैं।

ये लोग विज्ञान के फौजी इस्तेमाल के पक्ष में हैं किंतु सामाजिक जीवन में विज्ञानसम्मत चेतना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के सख्त खिलाफ हैं। सामाजिक जीवन में पोंगापंथ, दंतकथाएं, विज्ञान विरोधी बातें और अंधविश्वास इन्हें पसंद है। आज ये ही ताकतें अंधविश्वास का सबसे ज्यादा प्रचार कर रही हैं। इससे इन्हें अपना सामाजिक-राजनीतिक आधार बढ़ाने में मदद मिली है। इस सबको देखते हुए और भी जरूरी है कि अंधविश्वास के खिलाफ संघर्ष को ज्यादा व्यापक पैमाने पर चलाया जाए।




गूगल के खिलाफ भारतीय प्रकाशक अमेरिकी अदालत पहुँचे

गूगल की डाकेजनी के खिलाफ भारतीय प्रकाशकों ने अमेरिकी अदालत में जाकर हस्तक्षेप किया है। भारतीय प्रकाशकों और लेखकों के प्रतिनिधि के अलावा IRRO   और   FIP ने भी इस विवाद में अपना कानूनी विरोध दर्ज कराया है। इनका तर्क है कि गूगल ने  लाखों भारतीय किताबों को स्केन करके नेट पर अवैध धंधा आरंभ कर दिया है। यह सीधे
कॉपीराइट के अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और भारतीय कॉपीराइट एक्ट 1957 का सीधा उल्लंघन है।
    उल्लेखनीय है कि गूगल ने विश्व के अनेक देशों के साथ किताबों के डिजिटल रुप को पेश करने के लिए गुप्त सौदे किए हैं। भारतीय प्रकाशकों के द्वारा अमेरिकी अदालत में जाकर प्रतिवाद करने और गूगल और अमेरिकी प्रकाशकों और लेखकों के बीच कुछ अर्सा पहले हुए समझौते का भी विरोध किया गया है। प्रतिवाद करने वालों में इंडियन रिप्रोग्राफिक राइटस ऑर्गनाइजेशन और फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स के नाम प्रमुख हैं। इन संगठनों ने गूगल बुक सेट्टलमेंट 2-0 को चुनौती दी है।
   न्यूयार्क की जिला अदालत में प्रतिवाद दाखिल करने वालों में स्टार पब्लिकेशंस, अभिनव पब्लिकेशंस, दया पब्लिकेशंस हाउस, पुस्तक महल भी शामिल हैं।

IRRO के वकील सिद्धार्थ आर्य का मानना है गूगल का समझौता सभी अंतर्राष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन है। गूगल ने 2004 से अवैध तरीके से सारी दुनिया की 70 लाख से ज्यादा किताबें स्केन करके अपनी डिजिटल लाइब्रेरी में ड़ाल दी हैं। अमेरिकी लेखकों और प्रकाशकों के बीच पिछले दिनों जो समझौता हुआ है वह सारी दुनिया के लेखकों -प्रकाशकों पर भी लागू होता है। गूगल के समझौते में एक शर्त यह भी है कि कोई लेखक अपने कॉपीराइट उल्लंघन पर चुप रहता है तो इसे लेखक की अनुमति मान लिया जाए। यह प्रावधान अब तक के समस्त कॉपीराइट प्रावधानों का उल्लंघन है। भारतीय प्रकाशकों ने मांग की है कि गूगल के द्वारा जिन भारतीय लेखकों की किताबें वगैर अनुमति लिए गूगल बुक में ड़ाल दी हैं उन्हें तुरंत ङटाया जाए। अदालत की सुनवाई फरवरी 2010 के मध्य में होने की संभावना है।  





संस्कृति उद्योग की धुरी हैं अंधविश्वास - 3-







नकल की प्रवृत्ति को पूंजीवाद का प्रधान गुण माना जाता है। इस अर्थ में पूंजीवाद अपने विकास के साथ-साथ सामंती और पूर्व सामंती कला रूपों और मूल्यबोध को बरकरार रखता है।
कलाओं में अंधानुकरण आधुनिक काल में नकल में रूपांतरित कर लेता है। इससे जहां कभी न खत्म होने वाले मनोरंजन की सृष्टि करने में मदद मिलती है वहीं दूसरी ओर अंधानुकरण के एटीटयूट्स, रवैए और संस्कार का विकास होता है। कलाओं से यथार्थ गायब हो जाता है। उसकी जगह काल्पनिक यथार्थ या आभासी यथार्थ ले लेता है।

इसी तरह अंधविश्वास या नकल की संस्कृति का परजीवीपन और पेटूपन की संस्कृति से गहरा संबंध है। इसका स्वतंत्राता के विचार से विरोध है, यह उन तमाम विचारों को अस्वीकार करती है जो नकल या अंधानुकरण के विरोधी हैं।

     पूंजीवाद अपनी सामान्य प्रकृति के अनुसार अंधविश्वासों को भी वस्तु के रूप में बदल देता है, उन्हें संस्थागत रूप दे देता है। अंधविश्वासों को कामुकता एवं रोमांस के साथ प्रस्तुत करता है और यह कार्य फिल्म, टी.वी. और वीडियो फिल्मों के संगठित औद्योगिक माल के उत्पादन के रूप में करता है। 

कामुकता, पोर्नोग्राफी, अतिलयात्मक गीत और संगीत तथा नकल के आधार पर निर्मित कलाएं जितनी ज्यादा बनेंगी उतना ही ज्यादा अंधविश्वास भी बढ़ेगा। उतनी ही ज्यादा सामाजिक असुरक्षा, भेदभाव और तनाव की सृष्टि होगी। इसका प्रधान कारण यह है कि आज अंधविश्वास को मासकल्चर ने अपना सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बना लिया है। 

अंधविश्वास की रणनीति और धार्मिक संप्रेषण की शैलियों को अपनाकर विज्ञापन, फिल्म और टी.वी. उद्योग तेजी से अपना विकास कर रहा है। पहले अंधविश्वास के माध्यम से राज्य अपने लिए जहां एक ओर धन जुटाता था वहीं दूसरी ओर जनता के दिलो-दिमाग पर शासन करता था। आज भी इस स्थिति में बुनियादी फर्क नहीं आया है। सिर्फ तरीका बदला है और इस कार्य में परंपरागत अंधविश्वास प्रचारकों के अलावा जो नया तत्व आकर जुड़ा वह है पूंजीपति वर्ग, बाजार और संस्कृति उद्योग। 

अब अंधानुकरण की प्रवृत्ति का बाजार की शक्तियां खुलकर अपने मुनाफों के विस्तार के लिए इस्तेमाल कर रही हैं। अंधानुकरण के लिए जरूरी है कि स्टीरियोटाइप प्रस्तुतियों पर जोर दिया जाए। इनमें खर्च कम और मुनाफा ज्यादा होता है और प्रस्तुतियां जल्दी ही समझ में आ जाती हैं। इस तरह की प्रस्तुतियां यथार्थ के निषेध और स्वतंत्र सृजन या मौलिक सृजन के निषेध को व्यक्त करती हैं।

 वे ऐसे उन्माद, आनंद और मनोरंजन की सृष्टि करती हैं जो प्रभेदों का सृजन करता है। ध्यान रहे, प्रभेद वहीं पैदा होते हैं जहां भय हो, अंधविश्वास हो या जहां एक-दूसरे को धोखा देकर हराने का प्रयत्न किया जाता है। वहां परस्पर व्यवहार में सहज भाव नहीं होता।

अंधविश्वास मूलत: ऐसी स्वाधीनता की हिमायत करते हैं जो मनुष्य को पीड़ित करती है। यह संबंधहीन स्वाधीनता है। यह बुनियादी तौर पर नकारात्मक स्वाधीनता है। अंधविश्वास तरह-तरह के धार्मिक उपकरणों को जमा करने और धार्मिक उपकरणों के माध्यम से अंधविश्वासों से राहत पाने का रास्ता सुझाते हैं। रवींद्रनाथ टैगोर के शब्दों में, 'मानव जीवन में जहां अभाव है वहीं उपकरण जमा होते हैं। ... इस अभाव और उपकरण के पक्ष मेंर् ईष्या है, द्वेष है, वहां दीवार है, पहरेदार है, वहां व्यक्ति अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है और दूसरों पर आघात करना चाहता है।'

अंधविश्वास, पुनर्जन्म और कर्मफल के सिध्दांत से मुक्ति पाने के लिए जरूरी है कि तर्क और विमर्श के पुराने पैराडाइम को बदलें। पुराने पैराडाइम से जुड़े होने के कारण हम प्रभावी ढंग से अंधविश्वास का विरोध नहीं कर पा रहे हैं। तर्क के पैराडाइम को बदलते ही हम विकल्प की दिशा में बढ़ जाएंगे। पैराडाइम को बदलते ही विचारों में मूलगामी परिवर्तन आने लगेगा। 

आम तौर पर हमारे बहुत से बुध्दिजीवी पुराने पैराडाइम को बनाए रखकर तर्कों में परिवर्तन कर लेते हैं। ध्यान रहे, अंधविश्वास को तर्क और विवेक से अपदस्थ नहीं किया जा सकता। जब तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर नया पैराडाइम निर्मित नहीं किया जाता तब तक अंधविश्वास को अपदस्थ करना मुश्किल है। 

अंधविश्वास का जबाव तर्क नहीं विज्ञान है। जो लोक तर्क में विश्वास करते हैं वे पैराडाइम बदलते ही असली शक्ल में सामने आ जाते हैं। ध्यान रहे, जब पैराडाइम बदलते हैं तो उसके साथ ही, सारी दुनिया भी बदल जाती है। कहने का तात्पर्य यह है कि पैराडाइम बदलते ही हमारा विश्व दृष्टिकोण बदल जाता है, नए का जन्म होता हैवैज्ञानिक चेतना के विकास की संभावनाएं प्रबल हो जाती हैं। यही वह बिंदु है जिस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है।

 अंधविश्वास का जबाव तर्क से देंगे तो अंतत: पराजय हाथ लगेगी यदि पैराडाइम बदलकर विज्ञानसम्मत चेतना से इसका जबाव देंगे तो अंधविश्वास को अपदस्थ कर पाएंगे। हमारे रैनेसां के चिंतकों ने अंधविश्वास का प्रत्युत्तर तर्क से देने की चेष्टा की और इसका अंतत: परिणाम यह निकला कि हम आज अंधविश्वास से संघर्ष में बहुत पीछे चले गए हैं। तर्क को आज अंधविश्वास ने आत्मसात कर लिया है। अंधविश्वास का तर्क से बैर नहीं है उसकी लड़ाई तो विज्ञानसम्मत चेतना के साथ है।

अंधविश्वास के कारण बौध्दिक अधकचरापन पैदा होता है। इन दिनों विज्ञान और विज्ञानसम्मत चेतना के बजाय मिथकीय चेतना पर जोर दिया जा रहा है। आज विज्ञान को सत्य की खोज के काम से हटाकर व्यावहारिक उपयोग, उद्योग और युध्द के साजो-सामान के निर्माण में लगा दिया गया है। यहां तक कि धर्म और विज्ञान में सहसंबंध स्थापित करने की कोशिशें चल रही हैं। अब विज्ञान को पूंजीवाद ने महज एक चिंतन का रूप या शुध्द विज्ञान बना दिया है या उपयोगी रूप तक सीमित कर दिया है। 

एक जमाना था विज्ञान पर विश्वास था। किंतु एक अर्से के बाद विज्ञान के प्रति संशय का भाव पैदा हुआ। शुरू में विज्ञान के प्रति प्रशंसाभाव था। बाद में मोहभंग हुआ और विज्ञान के प्रति संशय भाव पैदा हुआ। आज पूंजीवादी वैज्ञानिक निराश और हताश हैं कि क्या करें? वे पीछे मुड़ नहीं सकते। आगे किस तरह बढ़ना है? बढ़ गए तो कहां पहुचेंगे? आज विज्ञान के पूंजीवादी पक्षधर परेशान हैं कि विज्ञान के इतने विराट जुलूस को कहां ले जाएं? इसके कारण विज्ञान और विज्ञानसम्मत चेतना के प्रति अविश्वास और गहरा हुआ है।

 आम लोगों से लेकर बुध्दिजीवियों तक संशयवाद बढ़ा है। इसके कारण पुन: एकसिरे से अंधविश्वास और आध्यात्मिकता की बाढ़ आ गई है। कुछ लोग मानव स्वभाव की उन्नतिशीलता को लेकर कुछ भी होता न देखकर हताशा में डूबे जा रहे हैं और विज्ञान को तिलांजलि दे रहे हैं। कुछ ऐसे भी लोग हैं जो पहले से ही यह मानकर चल रहे हैं कि विज्ञान की सामाजिक परिणतियों पर कोई भी विचार-विमर्श हानिकर होने को बाध्य है।

 कुछ ऐसे लोग भी हैं जो विज्ञान के व्यावहारिक उपयोग के अलावा और किसी भूमिका पर सोचने के लिए तैयार नहीं हैं। कुछ लोगों के लिए विज्ञान का विनाश के अलावा और किसी काम में उपयोग संभव नहीं है। कुछ के लिए यह संपत्तिा और मुनाफों के अंबार खड़ा कर देने का साधन मात्रा है। यह सही है कि पूंजीवाद समाजों में विज्ञान का सही उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा रहा। यह भी सच है कि वैज्ञानिक वेतनभोगी कर्मचारी होकर रह गए हैं।

 आज वैज्ञानिक या तो किसी विश्वविद्यालय में काम करता है या किसी उद्योग या संस्था में काम करता है। निजी साधनों से वैज्ञानिक अनुसंधान करने वाले वैज्ञानिक अब दुर्लभ हो गए हैं। जाहिरा तौर पर वैज्ञानिक जहां काम करता है वहां के हितों की उसे सबसे पहले पूर्ति करनी होगी। यही ्रूबदु है जहां पर हमें विज्ञान की सामाजिक भूमिका पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यदि विज्ञान बंदी है और वैज्ञानिक खरीदा जा चुका है तब अंधविश्वास के खिलाफ विज्ञान और विज्ञानसम्मत चेतना की भूमिका शून्य के बराबर होगी।

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

संस्कृति उद्योग की धुरी हैं अंधविश्वास - 2-



आज हम रोम की महानता के गुण गाते हैं किंतु यह भूल जाते हैं कि रोम की महानता का आधार अंधविश्वास था। रोम की महानता के बारे में पोलिबियस ने लिखा कि मैं साहसपूर्वक यह बात कहूंगा कि संसार के शेष लोग जिस चीज का उपहास करते हैं, वह रोम की महानता का आधार है और उस चीज का नाम अंधविश्वास है। इस तत्व का उसके निजी और सार्वजनिक जीवन के सभी अंगों में समावेश कराया गया है और इसने ऐसी खूबी से उनकी कल्पनाशक्ति को आक्रांत कर लिया है कि उस खूबी को बेहतर नहीं बनाया जा सकता। संभवत: बहुत से लोग इसकी विशेषता समझ नहीं पाएंगे, लेकिन मेरा मत है कि ऐसा लोगों को प्रभावित करने के लिए किया गया है। यदि किसी ऐसे राज्य की संभावना होती, जिसके सभी नागरिक तत्वज्ञ होते तो इस तरह की चीज से हम बचे रह सकते थे। लेकिन सभी राज्यों में जनता अस्थिर है, निरंकुश भावनाओं, अकारण क्रोध और हिंसक आवेगों से ग्रस्त है। इसलिए केवल यही किया जा सकता है कि जनता को अदृश्य के भय से, और इसी किस्म के पाखंडों से काबू में रखा जाए। यह अकारण नहीं, बल्कि सुविचारित चाल थी कि पुराने जमाने के लोगों ने जनता के दिमाग में देवताओं और मृत्यु के बाद के जीवन की बातें बैठाईं। हमारी मूर्खता और विवेकहीनता यह है कि हम इस प्रकार की भ्रांतियों को दूर करना चाहते हैं।
इसके अलावा जिस विधा का निर्माण किया गया वह है चमत्कारवर्णन और दंतकथा। चमत्कारवर्णन और दंतकथाओं ने अंधविश्वासों को आम जनता के जीवन में उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। किसी भी दर्शनवेत्ता और धर्मशास्त्री के उपदेशों के द्वारा पुरुषों और औरतों के समूहों को श्रध्दा, भक्ति और विश्वास की ओर नहीं मोड़ा जा सकता था। इनको प्रभावित करने के लिए अंधविश्वास का लाभ उठाना पड़ता था। यह कार्य चमत्कारवर्णन और दंतकथाओं के बिना संभव नहीं था। कालांतर में इसने नागरिक जीवन की प्राचीन व्यवस्था और साथ ही, वास्तविक सृष्टि संबंधी स्थापनाओं में मिथकशास्त्र के रूप में सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर लिया।
कौटिल्य का अंधविश्वास में विश्वास नहीं था किंतु उन्होंने राज्य के कौशल के तौर पर अर्थशास्त्र में अंधविश्वास की चर्चा की है। उनका न तो राजा के दैवी अधिकार और उसकी सर्वज्ञता की सच्चाई में विश्वास था और न वे यह चाहते थे कि स्वयं शासक इस तरह की वाहियात बात को सच मानें। वे सुझाव देते हैं कि राज्य को अपनी आंतरिक और बाह्य स्थितियों को सुदृढ़ करने के लिए सामान्य लोगों की अंधमान्यताओं का लाभ उठाना चाहिए।

कौटिल्य अर्थशास्त्र में अनेक ऐसे सुझाव देते हैं जो अंधविश्वासों पर आधारित हैं। संयोग से जिन उपायों को सुझाया गया है वे थोड़े फेरबदल के साथ अब भी लागू किए जाते हैं। कौटिल्य ने कुछ ऐसे साधनों को अपनाने की सलाह दी जो बहुत ही भद्दे थे और जिनका दोहरा उद्देश्य था। वे न केवल जनता के बीच अंधविश्वासमूलक भय उत्पन्न करते थे, बल्कि अंधविश्वास के विरोध में यथार्थ और ठोस कदम उठाने वाले प्रचारकों का शारीरिक रूप से सफाया करने की ओर भी लक्षित थे।

अंधविश्वास के साथ-साथ पुनर्जन्म और कर्मफल की प्राप्ति की धारणा का भी व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। इसका साहित्य पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार साहित्य में काव्य-रूढ़ियों का चलन शुरू हुआ।

यह मान लिया गया कि जो कुछ हो रहा है उसका उचित कारण है ज़िस कार्य में असामंजस्य है, वह अवश्य भविष्य में करने वाले को दंड देने का साधन बनेगा। इस विचार ने भारतीय साहित्य में सामंजस्यवादी दृष्टिकोण की प्रतिष्ठा की है। समाज की विषमताओं और अनमेल परिस्थितियों को कभी विद्रोही दृष्टि से नहीं देखा गया।

यह मान लिया गया नाटक दुखांत नहीं होना चाहिए। असंतोष और विद्रोह के अभाव में कवि की बुध्दि अधिकाधिक सूक्तियों और चमत्कारों में उलझती गई। साहित्य में सिर्फ रस और रस में भी सिर्फ श्रृंगार रस की रचनाओं का बाहुल्य इस मार्ग के अनुसरण का स्वाभाविक परिणाम था।
   उल्लेखनीय है रस की अवधारणा की उत्पत्ति का समय तकरीबन वही है जब अंधविश्वास, पुनर्जन्म और कर्मफल की प्राप्ति के सिध्दांत का जन्म हुआ। रसों में हमारे प्राचीन लेखकों ने सिर्फ श्रृंगार रस पर ही मुख्यत: जोर दिया और अन्य रसों की उपेक्षा की।

तात्पर्य यह है कि अंधविश्वास के साथ आनंदमूलक मनोरंजन, कामुकता, स्त्री के सौंदर्यमूलक हाव-भावों का गहरा संबंध है। यह संबंध मध्यकाल से विकसित हुआ और आधुनिक काल तक चला आया है। अंधविश्वास के समूचे कार्य-व्यापार को यदि इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाएंगे कि समाज में कलाओं में नकल की प्रवृत्ति वस्तुत: अंधविश्वास के प्रति सहिष्णु भाव पैदा करती है।

संस्कृति उद्योग की धुरी हैं अंधविश्वास - 1-





अंधविश्वास सामाजिक कैंसर है। अंधविश्वास ने सत्ता और संपत्ति के हितों को सामाजिक स्वीकृति दिलाने में अग्रणी भूमिका अदा की है। आधुनिक विमर्श का माहौल बनाने के लिए अंधविश्वासों के खिलाफ जागरूकता बेहद जरूरी है। आमतौर पर साधारण जनता के जीवन में अंधविश्वास घुले-मिले होते हैं।


अंधविश्वासों को संस्कार और एटीटयूट्स का रूप देने में सत्ता और सत्ताधारी वर्गों को सैकड़ों वर्ष लगे हैं। अंधविश्वासों की शुरुआत कब से हुई इसका आरंभ वर्ष तय करना मुश्किल है। फिर भी ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि सामाजिक विकास के क्रम में जब राजसत्ता का निर्माण कार्य शुरू हुआ था उस समय साधारण लोग किसी से डरते नहीं थे। किसी भी किस्म का अनुशासन मानने के लिए तैयार नहीं थे, राजा की सत्ता को स्वीकार नहीं करते थे। सत्ता के दंड का भय नहीं था। यही वह ऐतिहासिक संदर्भ है जब अंधविश्वासों की सृष्टि की गई। 

आरंभिक दौर में अंधविश्वासों को संस्कार और जीवन मूल्य से स्वतंत्र रूप में रखकर देखा जाता था। कालांतर में अंधविश्वासों ने सामाजिक जीवन में अपनी जड़ें इस कदर मजबूत कर लीं कि अंधविश्वासों को हम सच मानने लगे।

अंधविश्वास का दायरा बहुत बड़ा है। इसके दायरे में सामाजिक मान्यताएं, सामाजिक आचार-व्यवहार से लेकर कला, ललित कला, साहित्य, राजनीति, व्यापार तक आता है। इसके कारण सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया बाधित हुई है।
  
भारत में विगत दो हजार वर्षों में किसी भी किस्म की सामाजिक क्रांति नहीं हुई। हम लोगों ने कभी भी इस सवाल पर सोचा नहीं कि हमारे समाज में विगत दो हजार वर्षों में सामाजिक क्रांति क्यों नहीं हुई? तमाम किस्म की कुर्बानियों के बावजूद आधुनिक भारत में कोई सामाजिक क्रांति क्यों नहीं हुई? यदि गंभीरता से भारतीय समाज पर नजर डालें तो पाएंगे कि भारत में सामाजिक क्रांति न होने के जिन कारणों की ओर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ध्यान खींचा था उनकी तरह हमारे समाज ने पूरी तरह ध्यान नहीं दिया।

हजारीप्रसाद द्विवेदी का मानना था कि भारत में सामाजिक क्रांति न होने के तीन प्रमुख कारण हैं। पहला, अंधविश्वास, दूसरा, पुनर्जन्म की धारणा और तीसरा कर्मफल का सिध्दांत। हमारी समूची चेतना इन तीन सिद्धांतों से परिचालित रही है। अंधविश्वास के कारण ही रूढ़ियों ने जन्म लिया। साहित्य एवं कलारूपों में रूढ़ियां और सामाजिक जीवन में रूढ़ियां अंधविश्वास की ही देन हैं।
आधुनिककाल आने के बाद साहित्य से रूढ़ियों का खात्मा हुआ बल्कि सामाजिक जीवन में रूढ़ियां बनी रहीं , अंधविश्वासों के खिलाफ सामाजिक संघर्ष लड़ा नहीं गया। वहीं दूसरी ओर, पूंजीवाद ने बड़े कौशल के साथ अंधविश्वास को अपनी मासकल्चर, विज्ञापन रणनीति और मार्केटिंग का अंग बनाकर नई शक्ल दे दी।

आज बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने बाजार के विकास के लिए जिन दो तत्वों का प्रचार रणनीति में सबसे ज्यादा इस्तेमाल कर रही हैं वह है धार्मिक संप्रेषण की पध्दति और दूसरा है अंधविश्वास। इन दो के जरिए जहां एक ओर उपभोक्तावाद का तेजी से विकास हो रहा है वहीं दूसरी ओर अंधविश्वासों के प्रति भी आस्था बढ़ रही है।
  
जो लोग सामाजिक परिवर्तन करना चाहते हैं उन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियों की धार्मिक संप्रेषण की रणनीति और अंधविश्वास की जुगलबंदी को तोड़ना होगा। उन तमाम क्षेत्रों में हमले तेज करने होंगे जिनसे इन दो तत्वों को संजीवनी मिलती है। इसके अलावा पुनर्जन्म और कर्मफल के सिध्दांत के प्रति आम जनता में आलोचनात्मक रवैय्या पैदा करना होगा। आज अंधविश्वास संस्कृति उद्योग का अनिवार्य तत्व बन गया है। संभवत: कुछ लोगों को यह बात समझ में न आए और कुछ लोगों की भावनाएं भी आहत हों। किंतु इस डर से अंधविश्वासों के खिलाफ जागरूकता पैदा करने के काम को छोड़ा नहीं जा सकता।

प्रश्न उठता है अंधविश्वास क्या है? इसे किन तत्वों से मदद मिलती है? इसका सामाजिक आधार कौन सा है? इससे किस तरह का समाज निर्मित होता है? किस तरह के कला रूप जन्म लेते हैं? और इसका विकल्प क्या है? ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो पाएंगे कि अंधविश्वास की धारणा का बुनियादी सारतत्व एक जैसा रहा है। मिस्र, यूनान और भारत में अंधविश्वासों की शुरुआत तकरीबन एक ही तरह हुई।

अंधविश्वास की बुनियादी विशेषता है अंधानुकरण, वैज्ञानिक विवेक का त्याग और स्वतंत्र चिंतन का विरोध। सामाजिक जीवन में इसका लक्ष्य था आम लोगों को अपने श्रेष्ठजनों के किसी भी आदेश के पालन का अभ्यस्त बनाया जाए। दूसरा , वे उन्हीं पर भरोसा करना सीखें जो हर मामले में समान भाव से धार्मिक विधि-विधानों का पालन करते हों। कलाओं की दुनिया में इसने नयनाभिराम चित्रों और मधुर गीतों की सृष्टि की। नयनाभिराम चित्रों और मधुर गीत-संगीत को मंदिरों में मानदंड के रूप में स्थापित किया गया। कला के क्षेत्र में किसी को यह इजाजत नहीं थी कि उनमें परिवर्तन करे। इसके कारण कलाओं के रूप सैकड़ों वर्षों तक अपरिवर्तित रहे। किसी ने यह साहस नहीं दिखाया कि कलाओं और मधुर गीतों में परिवर्तन करे। ये कलारूप सैकड़ों वर्षों से एक जैसे हैं। मिस्र के कलारूप इस अंधानुकरण के आदर्श उदाहरण हैं। विगत दस हजार साल से उनकी शैली में किसी तरह का परिवर्तन नहीं हुआ है। इस दौरान वे न तो बेहतर बन पाए और न बदतर ही बन पाए।
  इसी तरह अंधविश्वास को जनप्रिय बनाने में झूठ खासकर इष्टकर झूठ की बहुत बड़ी भूमिका रही है। एक ऐसा झूठ, उदात्त झूठ जिसके सहारे संपूर्ण समुदाय को, संभव हो सके तो शासकों को भी स्वीकार करने के लिए राजी किया जा सके।

इस तरह के झूठ के आदर्श उदाहरण हैं हमारे रीति-रिवाज और संस्कार जिनकी प्रशंसा करते हुए हमारे शास्त्र थकते नहीं हैं। रीति-रिवाज और संस्कारों की प्रशंसा के क्रम में सबसे ज्यादा हमला स्वतंत्र चिंतन पर किया गया, उन लोगों पर हमले किए गए जो स्वतंत्र चिंतन के हिमायती थे। जो प्रत्येक बात पर शंका करते थे। प्रश्न करते थे।

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