रविवार, 28 फ़रवरी 2010

स्पीड युग का नायक नरेन्द्र मोदी

(मोदी के शासन में साम्प्रदायिक दंगे का दृश्य)

मासमीडिया दुधारी तलवार है। दर्शकों के लिए  बिडम्बनाओं की सृष्टि करता है। मासमीडिया के द्वारा सृजित अर्थ वहीं पर नहीं होता जहां बताया जा रहा है बल्कि अर्थ अन्यत्र होता है। अर्थ वहां होता है जहां विचारधारा होती है और विचारधारा को लागू करने वाले संगठन होते हैं। चूंकि गुजरात में संघ परिवार की सांगठनिक संरचनाएं बेहद पुख्ता हैं अत: टीवी के अर्थ का लाभ उठाने की संभावनाएं भी वहां पर ज्यादा हैं। मासमीडिया अदृश्य हाथों को लाभ पहुँचाता है अत: हमें देखना होगा मोदी के संदर्भ में अदृश्य शक्ति कौन है ? मीडिया जब एक बार किसी चीज को अर्थ प्रदान कर देता है तो उसे अस्वीकार करना बेहद मुश्किल होता है। इसबार मीडिया ने यही किया उसने मोदी को नया अर्थ दिया,मोदी को विकासपुरूष बनाया। विकास को मोदी की इमेज के साथ जबर्दस्ती जोड़ा गया जबकि विकास का मोदी से कोई संबंध नहीं बनता। इसने मोदी का दंगापुरूष का मिथ तोड़ दिया। मोदी का दंगापुरूष का मिथ जब एकबार तोड़ दिया गया तो उसका कोई संदर्भ नहीं बचता था और इसी शून्य को सचेत रूप से विकासपुरूष और गुजरात की अस्मिता के प्रतीक के जरिए भरा गया। विकासपुरूष और गुजराती अस्मिता की धारणा असल में गुजराती जिंदगी के यथार्थ के नकार पर टिकी है। यह ऐसी धारणा है जिसे मीडिया ने पैदा किया है,यह गुजरात की ठोस वास्तविकता के गर्भ से पैदा नहीं हुई है। वरना यह सवाल किया ही जा सकता था कि मोदी ने राज्य में क्या कभी कोई ऐसा कारखाना खुलवाया जिसकी कीमत दस हजार करोड़ रूपसे से ज्यादा हो !
      मोदी की जो छवि मीडिया ने बनायी वह मोदी निर्मित छवि है। असली मोदी छवि नहीं है।  यह छवि कर्ममयता का संदेश नहीं देती। बल्कि भोग का संदेश देने वाला मोदी है। मीडिया निर्मित मोदी को हम असली मोदी मानने लगे हैं। विकास और गुजराती अस्मिता के प्रतीक मोदी को मीडिया ने निर्मित किया। यह आम लोगों को दिखाने के लिए बनाया गया मोदी है। यह दर्शकों के लिए बनाया गया मोदी है। इसमें सक्रियता का भाव है,यह मुखौटा है,बेजान है।यह ऐसा मोदी है जिसका गुजरात की दैनन्दिन जिंदगी के यथार्थ के साथ कोई मेल नही ंहै। यह मीडिया के जरिए  संपर्क बनाता है। मीडिया के जरिए यह संदेश देता है। हम जिस मोदी को जानते हैं वह कोई मनुष्य नहीं है। बल्कि पुतला है। हाइपररीयल पुतला है। जिसके पास न दिल है, न मन है, उसके न दुख हैं और न सुख हैं। उसका न कोई अपना है और न उसके लिए कोई पराया है। वह पांच करोड़ गुजरातियों का था ,उसमें पांच करोड़ गुजराती थे और वह फासिस्ट था। वह कोई मानवीय व्यक्ति नहीं है। अमेरिकी पापुलर कल्चर के फ्रेमवर्क में उसे सजाया गया है।  पापुलरकल्चर में मनुष्य महज एक विषय होता है।   प्रोडक्ट होता है। जिस पर बहस कर सकते हैं, विमर्श किया जा सकता है। मोदी इस अर्थ में मानवीय व्यक्ति नहीं है। वह तो महज एक प्रोडक्ट है। विमर्श की वस्तु है।
मोदी के जिस विजुअल को बार-बार टीवी से प्रक्षेपित किया गया है उसमें हम मोदी के इतिहास को नहीं देख पाते, वैविध्य को नहीं देख पाते। मोदी का सिर्फ सीने से ऊपर का हिस्सा ही बार-बार देखते हैं। इसका ही मुखौटे के तौर पर व्यापक प्रचार के लिए इस्तेमाल किया गया। मोदी का प्रत्यक्षत: टीवी में सीने के ऊपर का हिस्सा और मुखौटा एक ही संदेश देते हैं कि मोदी कोई व्यक्ति नहीं है। बल्कि ऐसा व्यक्ति है जिसका इकसार सार्वभौम रूप बना दिया गया है। इकसार सार्वभौमत्व मोदी की इमेज को पापुलरकल्चर,मासकल्चर और मासमीडिया के सहयोग से प्रचारित प्रसारित किया गया। यह एक तरह से मोदी की जीरोक्स प्रतिलिपियों का वितरण है। मुखौटे मूलत: मोदी की जीरोक्स कॉपी का कामकर रहे थे। यह नकल की नकल है। किंतु यह ऐसी नकल है जिसका मूल से अंतर करना मुश्किल है। बल्कि अनेक सभाओं में तो मोदी के डुप्लीकेट का भी प्रचार के लिए इस्तेमाल किया गया। संभवत: भारत में पहलीबार ऐसा हुआ है कि किसी राष्ट्रीय दल ने अपने नेता के प्रचार के लिए उसके डुप्लीकेट का इस्तेमाल किया हो साथ ही इतने बड़े पैमाने पर नेता के मुखौटों का इस्तेमाल किया गया हो। इससे यथार्थ और नकली मोदी का अंतर ही धूमिल हो गया।
मोदी को नायक बनाने के लिए जरूरी था कि मोदी के मोनोटोनस अनुभव से दर्शकों को बचाया जाए इसलिए तरह-तरह के रोमांचक,भडकाऊ भाषण भी कराए गए। दर्शकों को जोड़े रखा गया। ध्यान रहेमीडिया कभी भी सारवान अर्थ सृष्टि नहीं करता बल्कि बल्कि हाइपररीयल अर्थ की सृष्टि करता है। वह ऐसी चीजें को उभारता है जिसे दर्शक हजम करें।
मोदी ने जिस तरह की हाइपररीयल राजनीति का इसबार प्रदर्शन किया है उसने समूचे राजनीतिक परिवेश और राजनीतिमात्र के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगा दिया है। मोदी की इस तरह की राजनीति का हिन्दुओं की मुक्ति अथवा गुजरात के पांच करोड़ लोगों की अस्मिता की मुक्ति के सपने से कोई लेना-देना नहीं है। हाइपरीयल राजनीति की विशेषता यही है कि किसी को भी नहीं मालूम होता कि सूचनाएं जनता में कैसे जा रही हैं। हम सब जानते हैं कि कोई रिमोट कंट्रोल है जो सूचनाओं और प्रचार को नियंत्रित कर रहा है किंतु कौन है इसका किसी को पता नहीं है। मोदी का नया रूप ट्रांसप्लांटेशन की पध्दति की देन है। अभी तक हम संप्रेषण के जिस रूप के आदी थे वह रूप परिवहन और संचार के जरिए प्राप्त हुआ था। ठोस रूप हुआ करता था। किंतु मोदी हाइपररीयलिटी की देन है। संप्रेषण ट्रांसप्लांटेशन की देन है। मुखौटा संस्कृति की देन है। वह वास्तव समय और स्थान के साथ जल्दीएकीकृत हो जाता है। मोदी अपने विचारों और चरित्र का एक ही साथ ,एक ही क्षेत्र में और एक ही समय में एकीकरण करने में सफल रहा है। इसके साथ उसने परिवहन और संचार के संप्रेषण रूपों का भी उपयोग किया है। इसके कारण वह अपनी वैद्युतकीय चुम्बकीय इमेज बनाने में सफल रहा । इस तरह का मोदी तो सिर्फ निर्मित करके ही उतारा जा सकता है। मोदी का प्रचार अभियान रेसकार में भाग लेने वाली कार की तेज गति से हुआ है। यह कार इतनी तेज गति से दौड़ती है कि इसमें एक्सीडेंट भी उतना ही तेज होता है जितना तेज वह दौड़ती है। यह एक तरह का इनफार्मेशन शॉक पैदा करती है। मोदी ने भी यही किया है। उसने अनेक को इनफार्मेशन शॉक दिया है। मोदी ने जिस गति से गुजरात को चलाया है उसमें काररेस की तरह लगातार तकड़े एक्सीडेंट होते रहे हैं। किंतु एक्सीडेंट की खबरें तो खबरें ही नहीं बन पायीं क्योंकि कार रेस का एक्सीडेंट कोई खबर नहीं होता है। बल्कि उसे सामान्य एक्सीडेंट के रूप में पेश किया जाता है। उसे सामाजिक खतरा नहीं माना जाता। मोदी के शासन में जिस तरह की कार रेस चली है उसने यह बोध भी निर्मित किया है कि मोदी से कोई सामाजिक खतरा नहीं है। क्योंकि मोदी हाइपररीयल है, काररेस का हिस्सा है। काररेस में एक्सीडेंट होना सामान्य बात है, इसे गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है।
       मोदी ने अपनीहाइपरीयल राजनीति के जरिए व्यक्ति को 'डि-लोकलाइज'किया है। व्यक्ति को जब 'डी-लोकलाइज' कर देते हैं तो वह कहीं पर ही नहीं होता। मोदी ने जब राजनीति को हाइपरीयल बनाया तो राजनीति और समाज के बीच वर्चुअल दूरी बनायी और इस वर्चुअल दूरी में ले जाकर लोगों को कैद कर दिया। वर्चुअल दूरी में आप वास्तव के साथ नहीं होते किंतु मजा ले सकते हैं। यह एकदम वर्चुअल सेक्स की तरह है। इसके गर्भ से एकदम नए किस्म के नजरिए और नैतिक सवाल उठ रहे हैं। आप पूरी तरह वर्चुअल नजरिए से देख रहे होते हैं। मोदी को इस बात का श्रेय देना चाहिए कि उसने वर्चु अल तकनीक को मनुष्य के अंदर उतार दिया और उसके नजरिए का वर्चुअलाइजेशन कर दिया। नजरिए का वर्चुअलाइजेशन व्यक्ति को समाज से दूर ले जाता है साथ ही नजरिए का भी रूपान्तरण कर देता है। वर्चुअल राजनीति में हमें दूर से देखने में मजा आता है। दूर से ही भूमिका अदा करते हैं। यह बिलकुल साइबरसेक्स की तरह है।
      संघ के हिन्दुत्व को देखना है तो उसे किताबों से नहीं देख और समझ सकते। बल्कि आप गुजरात जाकर ही महसूस कर सकते हैं। हिन्दुत्व ने गुजरात का कायाकल्प किया है। गुजरात को व्याख्या और मिथों (गांधी के मिथ) के जरिए नहीं समझा जा सकता। उसके लिए गुजरात जाना होगा और उसे करीब से महसूस करना होगा तब ही संघ का हिन्दुत्व समझ में आएगा। अब तक गुजरात को हमने कहानियों और व्याख्याओं के जरिए ही देखा है उसके वास्तव संसार को महसूस नहीं किया। वास्तव गुजरात न तो रूपान्तरणकारी है और न कल्याणकारी है। वह जितना ही रंगीन है,दरिद्र है,भोगी है,बर्बर है उतना ही वर्चुअल है असुंदर है। आज गुजरात सांस्कृतिक रेगिस्तान की ओर तेजी से प्रयाण कर रहा है।
      बुध्दिजीवियों-लेखकों-संस्कृतिकर्मियों की इसमें बलि देदी गयी है। बौध्दिकता की अब गुजरात में कोई कदर नहीं है। जनता का बुध्दिजीवियों पर कोई भरोसा नहीं रहा। यह मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मौलिक विचार ,मौलिक सृजन करने वालों को,सत्ताा का प्रतिवाद करने वालों को रेगिस्तान में गाड़ दिया गया है। अब हमारे पास गुजरात के गरबा और मंदिरों और हीरों के प्रतीक भर रह गए हैं। इन्हें ही हम अपनी समृध्दि का प्रतीक मान रहे हैं। मोदी की आंधी ने सभी रंगों को धो दिया है। सभी इमेजों को साफ कर दिया है। संभवत: ऐसा महात्मा गांधी भी नहीं कर पाए थे। क्योंकि गांधी मनुष्य थे। मोदी वर्चुअल मनुष्य है। मोदी के पास मीडिया और तकनीक का तंत्र है जबकि गांधी के पास न तो मीडिया था और न सूचना तकनीक ही थी अगर कुछ था तो सिर्फ रामनाम और आंदोलनकारी जनता थी। मोदी के पास न तो राम हैं और न आन्दोलनकारी जनता है। बल्कि जनता के ऐसे बर्बर झुंड हैं जिनको जनसंहार करने में कोई परेशानी नहीं होती ,बुध्दिजीवियों-संस्कृतिकर्मियों पर हमले करने में परेशानी नहीं होती। निन्दा से परेशानी नहीं होती। अपने दुष्कर्मों पर लज्जित नहीं होते। वे  वीडियोगेम के खिलाड़ी की तरह व्यवहार करते हैं। खेलते हैं।
    मोदी ने गुजरात को सांस्कृतिक रेगिस्तान बनाया है। मोदी के लिए हिन्दू संस्कृति ही सब कुछ है और कुछ भी नहीं है। यह निर्भर करता है कि आप हिन्दू संस्कृति की किस तरह व्याख्या करते हैं। मोदी के राज्य में संस्कृति नहीं है। किसी भी किस्म का सांस्कृतिक विमर्श नहीं है। कोई मंत्रालय नहीं है। सिर्फ एक ही मंत्रालय है और एक ही मंत्री है वह है मुख्यमंत्री। मोदी ने निर्मित संस्कृति का वातावरण तैयार किया है। निर्मित संस्कृति के वातावरण का भारत की सांस्कृतिक परंपरा और उसके वातवरण से कोई लेना-देना नहीं है। गुजरात में अब हर चीज उत्तोजक और उन्मादी है। संस्कृति के रेगिस्तान को उपभोक्ता वस्तुओं से भर दिया गया है। मोदी के लिए संस्कृति का अर्थ है सिनेमा, तकनीक,हिन्दुत्व और तेज भागमभाग वाली औद्योगिक जिंदगी। मोदी के लिए स्पीड महान है। तकनीक महान है। हर चीज इन दो के आधार पर ही तय की जा रही है। मोदी के भाषणों में इसी बात पर जोर था कि उसने वे सारे काम मात्र पांच साल में कर दिखाए जो विगत पचपन वर्षों में कोई नहीं कर पाया। इस दावे के पीछे जो चीज सम्प्रेषित की जा रही है वह है स्पीड। मोदी के काम की स्पीड। मोदी स्पीड का नायक है और स्पीड का अत्याधुनिक वर्चुअल सूचना तकनीक के साथ गहरा रिश्ता है। तकनीक,हिन्दुत्व और स्पीड के त्रिकोण के गर्भ से पैदा हुई संस्कृति है,हाइपररीयल संस्कृति है,इसे हिन्दू संस्कृति समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। मोदी जैसा सोचता है मीडिया भी वैसा ही सोचता है। इस अर्थ में मोदी हाइपररीयल है।
  मोदी ने गुजरात के यथार्थ पर कब्जा जमा लिया है हम वही यथार्थ देख रहे हैं जिसकी वह अनुमति देता है ऐसी स्थिति में यथार्थ को व्याख्यायित करने वाले मोदी के मानकों को निशाना बनाया जाना चाहिए। मोदी आज जिस हिन्दुत्व का प्रतिनिधित्व कर रहा है। वह 1980 के बाद में पैदा हुआ हिन्दुत्व है इसका संघ परिवार के पुराने हिन्दुत्व से कम से कम संबंध है। भूमंडलीकरण से ज्यादा संबंध है। यह अत्याधुनिक तकनीक और अत्याधुनिक बर्बरता के अस्त्रों से लैस है।


  


शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

सच्चे ग्राम्यसेवक थे नानाजी देशमुख

 (स्व.नानाजी देशमुख)

नानाजी देशमुख ने राजनीति और सामाजिक विकास का नया मानक बनाया था, आज उनके निधन की खबर पढ़कर बेहद कष्ट हुआ। नानाजी ने आरएसएस के श्रेष्ठतम प्रचारक और संगठनकर्ता के रुप में यश अर्जित किया था। मैं अपने छात्र जीवन में कईबार उनसे मिला था। मथुरा में मेरा घर है, जहां पर संघ के सभी नामी व्यक्तित्वों को करीब से जानने का अवसर मिला करता था।

आपात्काल के बाद नानाजी जब पहलीबार मथुरा आए थे तो उन्हें करीब से जानने और अनेक मसलों पर खुली चर्चा का अवसर मिला था, शहर के सभी संघी नेता मेरे मंदिर पर नियमित आते थे और आज भी आते हैं। संयोग की बात थी कि मेरे हिन्दी शिक्षक मथुरानाथ चतुर्वेदी थे , वह संघ के श्रेष्ठतम नेता थे। मेरी हिन्दी और राजनीति में दिलचस्पी पैदा करने वाले वही प्रेरक थे । मथुरानाथ चतुर्वेदी वर्षों जनसंघ के अध्यक्ष रहे़, मथुरा नगरपालिका के भी चेयरमैन रहे। साथ ही मथुरा में संघ के संस्थापकों में प्रमुख थे। उनसे ही संघ के प्रमुख विचारकों का समस्त गंभीर साहित्य पढ़ने को मिला और मैं संघ के विचारकों से कभी प्रभावित नहीं हो पायाऔर मजेदार बात हुई कि वामपंथ के करीब चला गया। इसके बावजूद मेरे हिन्दी शिक्षक मुझे बेहद प्यार करते थे।

नानाजी के व्यक्तित्व के बारे में सबसे पहले आदरणीय मथुरानाथ चतुर्वेदी जी से ही जानने का मौका मिला था। नानाजी बेहद सरल व्यक्ति थे। संघ की विचारधारा का विकासरुपी मॉडल तैयार करने में उनकी केन्द्रीय भूमिका थी, विकास और हिन्दुत्व के अन्योन्याश्रित संबंध का उनका मॉडल ईसाइ मिशनरियों के सेवाभाव से प्रभावित था। नानाजी को भारत के गॉवों के उत्थान की चिन्ता थी.साथ ही उनका मानना था कि एक उम्र (60 साल) के बाद राजनेताओं को राजनीति त्यागकर जनसेवा करनी चाहिए। नानाजी की मृत्यु ने एक सच्चा ग्राम्यसेवक खो दिया है।
              



आरएसएस का मूक हिन्दू यूटोपिया


   (मोदी के गुजरात में हुए दंगे का एक दृश्य) 

मोदी ने मूक हिन्दू यूटोपिया निर्मित किया है। इसमें सहज धर्मनिरपेक्ष वातावरण असहिष्णु लगता है। नागरिकों ने अपनी जिम्मेदारी संघ के कंधों पर डाल दी है और अपने को जिम्मेदारी से मुक्त कर लिया है। मूक कल्पनालोक में अहर्निश वाचिक हिंसा चलती रहती है। 

गुजरात में शोषण है,गरीबी है और बोरियत भी है। साम्प्रदायिक हिंसा ने इन सबसे निजात दिलाने का वायदा किया किंतु वास्तव में ऐसा न हो सका बल्कि स्थिति सुधरने की बजाय और भी बिगड़ती चली गयी। हम सोच रहे थे कि सब कुछ ठीक हो जाएगा ,दंगा पीड़ितों को दुबारा से बसा दिया जाएगा किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ ।

 मोदी के पास गुजरात के भविष्य को लेकर कोई नया प्रस्ताव नहीं है,पुरानी त्रासदी से निकलने का रास्ता नहीं है। मोदी को मीडिया ने महानायक के रूप में प्रस्तुत किया। मोदी से नीतिगत तौर पर कोई सवाल नहीं किए। उससे सिर्फ उपलब्धियां बोलने के लिए कहा गया उसकी किसी भी उपलब्धि के बारे में मीडिया वालों ने अपनी ओर से पुष्टि का प्रयास नहीं किया। मोदी ने जो कहा उसको प्रसारित कर दिया, उसकी तहकीकात नहीं की,अन्य स्रोत से पुष्टि नहीं की। इसी को कहते हैं राजनीतिक जनसंपर्क।  राजनीतिक प्रचार। लेकिन इसे पेश किया खबर के रूप में।

 राजनीतिक प्रचार खबर नहीं होता। मोदी को इजारेदारियां सबसे ज्यादा पसंद करती हैं। इसका प्रधान कारण है मोदी का बड़ी पूंजी के प्रति प्रेम। बड़ी पूंजी के अपने प्रेम को मोदी आशिक की तरह निभाता रहा है। वह बड़ी पूंजी का दीवाना है। उसे ऐसी नीतियों से नफरत है जो बड़ी पूंजी का निषेध करें। बड़ी पूंजी का वातवरण किसी भी किस्म के धर्मनिरपेक्ष वातावरण को स्थिर नहीं बनने देता। इसके विपरीत गैर धर्मनिरपेक्ष वातावरण बनाने पर जोर देता है। जनता के जीवन में विमर्श,संवाद और वैचारिक तानवों की समाप्ति हो जाती है। जनता मूलत: दर्शक बना दी जाती है। वह देखती है किंतु बोलती नहीं।
  
बड़ी पूंजी के परिवेश में नए किस्म की सामूहिक गोलबंदी और मानसिकता पैदा हो जाती है। जिसमें आधुनिक की बजाय गैर आधुनिक सामाजिक गोलबंदियां उभरकर सामने आ जाती हैं। ये हथियारबंद और आक्रामक गोलबंदियां हैं। संघ परिवार के नए प्रयोग इस रणनीति से परिचालित हैं और कांग्रेस भी इसी धंधे में लग गयी है और उसने गुर्जर आरक्षण के नाम पर यह प्रयोग शुरू कर दिया है। लोकतांत्रिक राजनीति के निहाज से सामूहिक गोलबंदियां शुभ लक्षण नहीं है।  

सामूहिक उन्माद से संचालित गोलबंदियां अंतत: हमारे देश को कांगो और सूडान जैसे जनसंहारों और समूहों की खूनी लड़ाईयों के युग में ले जाएंगी अथवा नाइजीरिया की तरह समाज में अपराधियों का ही शासन होगा। सामूहिक गोलबंदी फासिस्ट हथयार है। इसके जरिए अप्रासंगिक सवालों के आधार पर  लोगों को हमेशा उन्माद में रखा जाता है। ऐसी स्थिति में किसी भी किस्म के तर्क और परेशान करने वाले सवालों को उठाना संभव ही नहीं होता। मोदी इसी गोलबंदी की पैदाइश है। मोदी के राजनीतिक जगत में धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक लेखक ,बुध्दिजीवी,संस्कृकिर्मी के लिए किसी भी किस्म की स्वायत्त जगह नहीं है। अल्पसंख्यकों के लिए कोई जगह नहीं है। वे सिर्फ दोयमदर्जे के नागरिक होकर ही जी सकते हैं।
      
मोदी के गूंगे कल्पनालोक में सैंकडों साल पुराने विचार बार-बार दर्शन देते हैं। ये ऐसे विचार हैं जो पहले कभी किसी ने नहीं देखे न सुने। हिन्दुत्व की तथाकथित शुध्दतावादी धारा का कल्पित आख्यान और विदेशी हमलावरों की मनगढ़ंत कहानियां इस कल्पनालोक सबसे बड़ी पूंजी हैं। इन आख्यानों का नए उपभोक्तावाद से गहरा संबंध है।  

इस काम के लिए कथावाचकों,भजनमंडलियों, टीवीपंथी संतों -महंतों की पूरी मंडली अहर्निश काम कर रही है।ये लोग पुराने विचारों की बाढ़ पैदा किए हुए हैं। इनमें नया बहुत ही कम है। इन कथावाचकों के पास कहानियां हैं कि माँ कैसे अपने बेटे से प्यार करती थीबाप कैसा सदाचारी था, अथवा अनाचारी था तो भगवान ने उसे कैसे ठीक कर दिया। ऐसी भी कहानियां सुनाते  हैं जो पुरूषत्व और स्त्रीत्व को अस्वीकार करती हैं। ऐसे पिता की कहानी बताते हैं जो माता का विरोध करता था। जमींदार किसान का विरोध करता था। इसके अलावा विलक्षणताओं से भरी हुई कहानियां भी सुनाई जा रही हैं। 

मोदी और संघ के पक्ष में रचे जा रहे इस कल्पनालोक का  इतिहास से बैर है। उसे किस्से-कहानियां,पौराणिक कहानियां पसंद हैं, किंतु इतिहास पसंद नहीं है। उसकी कल्पना की नदी की कहानी में दिलचस्पी है नदी के विकास की वैज्ञानिक कहानी में दिलचस्पी नहीं है।  
       
संघ परिवार के यहां मनुष्य और पशु में अंतर नहीं है। बल्कि अनेक बार तो यह देखा गया है मनुष्य से ज्यादा पशु को महान बनाया गया है। याद करें गौ संरक्षण आंदोलन को। गूंगा कल्पनालोक स्त्री-पुरूष में अंतर नहीं करता बल्कि प्रत्येक चीज को पुरूष की नजर से ही देखता है। कृत्रिम और असली में अंतर नहीं करता। यूटोपिया और विज्ञान में अंतर नहीं करता। इतिहास और मिथक में अंतर नहीं करता बल्कि मिथकों को ही मुक्ति का स्रोत मानता है। मिथकीय कहानी की शुरूआत सहजभाव से हो जाती है और फिर अचानक उसमें इतिहास का समावेश कर लिया जाता है। 

गूंगे कल्पनालोक के साइबोर्ग पक्के दोस्त हैं। मोदी के भी कार्यकलाप की धुरी इंटरनेट है। मोदी के लक्षण साइबोर्ग से काफी मिलते हैं। साइबोर्ग को मिथकीय कहानियां पसंद हैं और वे तमाम चीजें उन्हें भी अच्छी लगती हैं जो गूंगे कल्पनालोक के निर्माताओं को अच्छी लगती हैं।
   
मौजूदा परवर्ती पूंजीवाद का सबसे बड़ा फिनोमिना है खोखलापन अथवा अर्थहीनता। परवर्ती पूंजीवाद में खोखलापन अथवा अर्थहीनता चारों ओर से घेर लेती है। यह खोखलापन हमारे बौध्दिक और कलात्मक उत्पादन को आकर घेर लेता है। सर्जनात्मकता भी खोखलेपन की शिकार हो जाती है। इसके कारण वैचारिक विभ्रम में इजाफा होता है। हम लगातार रहस्यों की दुनिया में घिरते चले जाते हैं।

 आज हम जिसे संस्कृति कहते हैं वह पदबंध स्वयं में ही दिग्भ्रमित करने लगा है। संस्कृति की जब बातें करते हैं तो संस्कृति के वैज्ञानिक और नये खोजपरक आयामों की ओर ध्यान नहीं जाता। सामान्य शिक्षा की अवधारणा और उसके वैज्ञानिक आयाम की ओर ध्यान नहीं जाता। बल्कि हमारी शिक्षा और संस्कृति को लेकर समस्त प्रतिक्रियाएं दैनंदिन जिंदगी,त्यौहारों और भावनाओं से तय होती हैं। अर्थहीनता क्रांतिकारी परिवर्तनों के खिलाफ विभ्रम पैदा करती हैं।

 मौजूदा समाज में संस्कृति के उत्पादन के क्षेत्र में संस्कृतिविरोधी चीजों का इजारेदारियों के समर्थन से सुचिंतित भाव से उत्पादन हो रहा है। मसलन् उपन्यास और सिनेमा जगत में घटिया उपन्यासों और फिल्मों की बाढ़ आयी हुई है। इस समूची प्रक्रिया का युवावर्ग पर गहरा असर हो रहा है। प्रभुत्वशाली विचारधारा युवावर्ग में प्रतिगामी विचारों और भावनाओं को संगठित कर रही है। प्रतिगामी व्यक्ति का निर्माण किया जा रहा है। 

व्यक्ति के सामने विचारधारात्मक विभ्रम की स्थिति है। संकट यह है कि खोखलेपन का उत्पादन अंत में स्वयं बुध्दिजीवियों और रचनाकारों को ही चुनौती देने लगा है। हिन्दी में यह स्थिति बड़े पैमाने पर पैदा हो गयी है। अन्य भाषाओं में भी संभवत: यही स्थिति है।
    
साहित्य,कला,संस्कृति से लेकर राजनीति तक सभी क्षेत्रों में खोखलेपन ने कब्जा जमा लिया है। अब सारी गतिविधियां उपयोगितावाद के सिद्धान्तों को मद्देनजर तय की जा रही हैं। ये सारी गतिविधियां खंड-खंड हैं। बिखरी हैं। इसमें आलोचना और अनुसंधान अभाव है। बुर्जुआजी बार-बार नयी चीजों के आस्वाद में निवेश कर रहा है। नई से नयी चीजों का आस्वाद लेने की प्रवृत्तिा बेहद खतरनाक प्रवृत्तिा है। इसमें अनेक बार पतनशील भी आ रहा है। यह ऐसा नया है जो आक्रामक है, भ्रमित करने वाला है।
        व्यापारिक तंत्र समूची सांस्कृतिक गतिविधियों पर वर्चस्व स्थापित किए हुए है और जरा सी भी ऐसी कोई चीज जो समाज के वैनगार्ड का काम कर रही है उसे विभाजित करने की कोशिश करने लगता है। उसे सामाजिक नियमों के बहाने रोका जा रहा है। स्थिति इतनी खराब हो गयी है कि हम लोग बहस के दौरान  खंड- खंड, शंकालु और वैविध्यपूर्ण व्याख्या के नाम पर बहसों से पलायन करने लगे हैं। बहस के पुख्ता आधारों को त्याग देते हैं । वैनगार्ड का यहां अर्थ है संरक्षक। संरक्षक हमें बुर्जुआजी की मूर्खताओं और संस्कृतिविहीनता से बचाता है। चीजों पर संदेह करना सिखाता है। आज ऐसे लोगों और संगठनों से संघर्ष की जरूरत है जो संस्कृति में उपयोगितावाद,खंड-खंड सत्य,भ्रमित  अथवा शंकालु यथार्थ ,व्याख्याओं के वैविध्य के नाम पर मूर्खताओं को फैला रहे हैं। इसके लिए जरूरी है कि आपके पास सुसंगत क्रांतिकारी कार्यक्रम हो। क्रांतिकारी नीति हो। हमें संस्कृति से लेकर राजनीति तक प्रत्येक क्षेत्र में आलोचनात्मक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य के बिना किसी भी नयी चीज को स्वीकार नहीं करना चाहिए।
     
मोदी के ''पांच करोड़ गुजरातियों की अस्मिता'' के नारे को अधिकांश दलों ने  अनालोचनात्मक ढ़ंग से स्वीकार कर लिया है। किसी भी दल ने इस नारे के पीछे छिपी राजनीति और फासीवादी विचारधारा को निशाना नहीं बनाया सिर्फ इतनाभर कहा गया कि यह नारा हिन्दुत्व पर पर्दा डालने के लिए लाया गया है। 

सच यह नहीं है, यह एकदम नया नारा है। इसकी वैचारिक परिणतियां और तानाबाना अलग है। यह अस्मिता की राजनीति के सबसे खतरनाक बिंदु पर हमें ले जाता है। हमें पूरी तरह निरस्त्र कर देता है। आलोचनात्मक विवेक को निशाना बनाता है। सभी किस्म के तर्कों को खत्म कर देता है। इसमें भविष्यवादी की अनुगूंजें सुनाई देती हैं।  तकनीकी महानता का महिमामंडन है। इसके बहाने  कला,संस्कृति आदि पर सीधे हमले किए जा रहे हैं। घटिया फिल्मों के रिलीज के लिए गुजरात में कोई परेशानी नहीं है बल्कि जितनी भी परेशानी है अच्छे सिनेमा के लिए है। गुजराती अस्मिता और विकास के नाम पर संघ परिवार तकनीक और बुर्जुआ तरक्की को आक्रामक भाव से पेश कर रहा है साथ ही कला,साहित्य,संस्कृति के श्रेष्ठतम मानकों पर घृणिततम हमले कर रहा है। यह स्थिति तकरीबन वैसी ही है जैसी प्रथमविश्वयुध्द के बाद इटली में थी। कला,साहित्य संस्कृति पर राष्ट्रवाद और फासीवाद ने जमकर हमले किए। आश्चर्य की बात यह है कि भारत का इजारेदार पूंजीपतिवर्ग इस तरह के हमलों को संरक्षण दे रहा है। भाजपा को बड़े पैमाने पर धन मुहैयया कराया जा रहा है।
      
भाजपा गुजरात में जो कुछ कर रही है वह भारतीय पूंजीपतिवर्ग के समर्थन से कर रही है। वे खुल्लमखल्ला फासीवाद को प्रश्रय दे रहे हैं। गुजरात में अपनी बर्बर कार्रवाईयों  के जरिए संघ परिवार के छोटे से लेकर बड़े नेतागण परंपरागत संस्कृति की धारणा को ही बदलने में लगे हैं। आज स्थिति इतनी बदतर है कि कोई भी मूर्ख व्यक्ति गुजरात में खड़ा होकर किसी भी कलाकार,साहित्यकार,बुध्दिजीवी का सरेआम अपमान कर जाता है और उसके खिलाफ कोई प्रतिक्रिया दिखाई नहीं देती। प्रशासन कोई कार्रवाई नहीं करता। उलटे ऐसे व्यक्तियों को संरक्षण दिया जा रहा है। संस्कृति की नकारात्मक व्याख्या तैयार की जा रही है। संस्कृति के खिलाफ मूर्ख और हिंसक लोग फरमान जारी कर रहे हैं। यह सब संघ परिवार के लोग कर रहे हैं।

     



आरएसएस का गुजरात मॉडल सामाजिक वैविध्य का अस्वीकार है


संघ के मोदी प्रयोग ने एक और काम किया है उसने भारत में विविधता की सीमारेखा तय कर दी है। धर्मनिरपेक्षता ने विविधता की असंख्य संभावनाओं को खोला था किंतु संघ ने विविधता की सीमा बांध दी है। विविधताओं में अन्तर्क्रिया की भी सीमा तय कर दी है। इस मॉडल को वे धीरे-धीरे सारे देश में ले जाने चाहते हैं। उनका मानना है  धर्मनिरपेक्ष अनंत विविधता  समस्या की मूल जड़ है। विविधता की जड़ों कोही काटने के फार्मूले के तौर पर ''पांच करोड़ गुजरातियों की अस्मिता'' पर जोर दिया गया। यह मूलत: गुजरात की सांस्कृतिक-भाषायी और धार्मिक विविधता का अस्वीकार है। इसमें एकत्व का भाव है। समानता और न्यायभावना नहीं है।
      गुजरात में साम्प्रदायिक हिंसाचार सिर्फ कायिक हिंसा तक ही सीमित नहीं रहा है बल्कि गरीबी, शिक्षा, सामाजिक उत्पीडन आदि के रूप में भी इसको व्यापक रूप दिया गया है। मसलन् कोई व्यक्ति यदि ईसाई है तो उत्पीड़न का शिकार है,अन्तर्जातीय विवाह करता है तो उत्पीड़ित किया जाता है, मुसलमान किसी स्कूल को चलाते हैं तो उनमें हिन्दू बच्चे पढ़ने नहीं जाते, मुसलमान की दुकानों से हिन्दू खरीददारी नहीं कर रहे हैं। धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में कोई नाटक खेलता है, पेंटिंग बनाता है,व्याख्यान देता है तो उसके कार्यक्रमों में संघ के हुड़दंगी वीरपुंगव पहुँच जाते हैं। ऐसा करते हुए मोदी ने विगत पांच सालों में समाज में स्थायी विभाजन पैदा कर दिया है। समूची प्रशासनिक मशीनरी संघ के इशारे पर काम कर रही है। संघ का आदेश आखिरी आदेश होता है।
      सन् 2002 के पहले तक इतना व्यापक सामाजिक विभाजन समाज में नहीं था किंतु दंगों के बाद उभरी शांति ने विभाजन को मुकम्मल बना दिया है। नेता लोग साम्प्रदायिक सद्भाव की बात करते रहे हैं किंतु वास्तव में गुजरात में साम्प्रदायिक विचारधारा के हमले बंद नहीं हुए हैं। मोदी यदि अपने चुनाव घोषणापत्र को लागू करने में दिलचस्पी लेते तो शायद माहौल कुछ बदला होता किंतु मोदी की दिलचस्पी लोकतंत्र में नहीं थी। मजेदार बात यह है कि अब कहा जा रहा है कि आज गुजरात में जो हुआ है वैसा ही सारा देश में होगा। गुजरात का विकास हुआ है और भविष्य में यदि भाजपा को मौका मिले तो सारे देश का भी गुजरात के पैटर्न पर विकास होगा।
    मोदी को विकासपुरूष बनाने वाले मीडिया भाष्यकार यह भूल गए  मोदी का साम्प्रदायिक विचारधारा के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। यह विचारधारात्मक तौर पर संभव नहीं है कि संघपरिवार अपना साम्प्रदायिक एजेण्डा विकास के बहाने त्याग दे। बल्कि सच इसके एकदम उलट है संघ परिवार ने विकास को फासीवादी और सर्वसत्ताावादी नजरिए से परिभाषित किया है। इस मामले में कांग्रेस और भाजपा में कोई बुनियादी अंतर नहीं है। गुजरात के संदर्भ में भाजपा के साम्प्रदायिक हिंसा में जितने हाथ रंगीन हैं उतने ही कांग्रेस के भी रंगीन हैं। साम्प्रदायिक हिंसाचार के मामले में ये दोनों अपने-अपने तरीके से संघ परिवार की सेवा करते रहे हैं। यह भी कह सकते हैं कि फिलहाल संघ को मोदी ज्यादा पसंद हैं।
     फर्ज करो मोदी हार जाते तो क्या होता ? कौन मुख्यमंत्री होता ? निश्चित रूप से जो भी मुख्यमंत्री होता वह संघ का ही व्यक्ति होता। विकल्प साफ थे-केशुभाई पटेल,सुरेशमेहता,शंकरसिंह बाघेला,काशीराम राणा अथवा कोई पुराना नरम हिन्दुत्ववादी कांग्रेसी मुख्यमंत्री होता। चुनाव तो गरम हिन्दुत्व और नरम हिन्दुत्व में ही होना था। जाहिरातौर पर जब हिन्दुत्व ही चुनना है तो जनता ने गरम हिन्दुत्व को चुना और अपने लिए शांति खरीद ली। कम से कम मोदी के जीतने से हिन्दुओं पर हमले तो नहीं होंगे। यदि मोदी हार जाते तो चुप बैठने वाले नहीं थे और नए किस्म के हिंसाचार की लहर के वापस लौटने की संभावनाएं थीं यही वह डर है जिसे मोदी ने अपनी राजनीतिक वीरता की पूंजी बनाया है। 
       मोदी का जीतना साम्प्रदायिकता की विदाई नहीं है बल्कि साम्प्रदायिकता का बने रहना है। गुजरात की जनता के सामने विकल्प बेहद खराब थे और नरम और गरम साम्प्रदायिकता में से ही चुनना हो तो गरम साम्प्रदायिक कम से कम एक समुदाय विशेष को तो नकली शांति देती ही है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो साम्प्रदायिकता का विकल्प विकास नहीं है बल्कि विकास को बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया गया है। ध्यान रहे साम्प्रदायिकता कभी बहाने के बिना अपना आधार विस्तार नहीं कर पाती। साम्प्रदायिकता को इस बार 'पांच करोड़ गुजरातियों की अस्मिता'' के नाम पर 'विकास' का प्रपंच खड़ा करने की जरूरत पड़ी है। विकास के नाम पर वे राज्य में जो भी नीति और योजनाएं लागू कर रहे हैं वे सारी केन्द्र सरकार की हैं। राज्य की अपनी कोई स्वतंत्र नीति नहीं है। जो स्वतंत्र नीतियां लागू की गईं उनमें धर्मान्तरण रोकने के नाम पर लाया गया कानून है जो व्यक्ति के स्वतंत्रता के अधिकार का हनन करता है।
     सवाल उठता है क्या कभी गुजरात साम्प्रदायिकता के जहर से पूरी तरह मुक्त हो पाएगा यह तब ही संभव है जब घृणा और हिंसा का राज्य प्रशासन संप्रेषण और संरक्षण बंद कर दे अथवा इसके खिलाफ केन्द्र कोई हस्तक्षेप करके कानून लाए। फिलहाल की स्थिति में यह असंभव लगता है। साम्प्रदायिक ताकतें जिस राज्य में  अपना वर्चस्व स्थापित करने में सफल हो जाती हैं वहां पर असंवैधानिक सत्तााकेन्द्रों की चांदी हो जाती है। प्रशासन निष्पक्षभाव से काम करना बंद कर देता खत्म है।
      गुजरात के संघ मॉडल की विशेषता है कि समूची प्रशासनिक मशीनरी का साम्प्रदायिकीकरण। अपराधियों को खुला संरक्षण। सामाजिक जीवन में हिन्दू परंपरावाद का जयघोष। हिन्दू परंपरावाद के आधार पर ही समस्त कला-साहित्य-संस्कृति से लेकर जीवनशैली के रूपों को परिभाषित किया जा रहा है। गैर हिन्दू परंपराओं के खिलाफ हमलावर कार्रवाईयां संगठित की जा रही हैं। परंपरावाद की उपभोक्तावाद के साथ संगति का महिमामंडन चल रहा है,उपभोक्तावाद के गैर-पारंपरिक रूपों के खिलाफ हमले संगठित किए जा रहे हैं।  भाजपा और संघ परिवार गुजरात के बाहर कानून व्यवस्था के नियमों के पालन की मांग करता है जबकि भाजपा संचालित राज्यों में इसकी अनदेखी करता है। देश में संविधान और कानून के पालन की मांग करता है किंतु गुजरात में स्वयं ही संविधान और कानून को ठेंगा दिखाता है। इससे कम से कम एक बात साफ है कि भारत के संविधान और कानून को लेकर संघ परिवार में किसी भी किस्म की न्यूनतम आस्था नहीं है। यह बात अनेक मर्तबा सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश अपने फैसलों में कह चुके हैं।
   संघ के गुजराती मॉडल की धुरी है संघ का संगठन ,प्रशासनिक मशीनरी और अपराधी गिरोह तंत्र, ये तीनों मिलकर राज्य प्रशासन चला रहे हैं। इन तीनों से मिलकर गुजरात का मॉडल बनता है। जाहिरा तौर पर इतने सख्तशाली सांगठनिक ढांचे को आप चुनाव में परास्त नहीं कर सकते। ठीक यही मॉडल अन्य राज्यों में भी विकसित किया जा रहा है। भारत में पहले से अपराधियों का सबसे बड़ा नेटवर्क रहा है और उनकी अपनी राजनीतिक वफादारियां भी हैं अत: गुजरात के बाहर इस कार्य में धीमी गति से सफलता मिल रही है। किंतु प्रशासनिक संरचनाओं में काम करने वालों का आज भी सबसे बड़ा मजदूर संगठन संघ परिवार के हाथ में है। 
'' पांच करोड़ गुजरातियों की अस्मिता'' के नारे के तहत 'अन्य' को गूंगा बना दिया गया है। मजेदार बात यह है आप गुजराती अस्मिता के नारे का जाप करते जाइये और भ्रष्टाचारण करते जाइए ,संघ परिवार को कोई शिकायत नहीं है, और नयी चीजों के गुजरात में आने से संघ परिवार को परेशानी है, ज्यादा से ज्यादा उपभोग करने से संघ को कोई परेशानी नहीं है। यदि किसी चीज से परेशानी है तो ऐसे सवालों को पूछे जाने से जो गुजरात प्रशासन को नंगा करते हैं,संघ परिवार की राजनीति को नंगा करते हैं। अथवा मौजूदा साम्प्रदायिक माहौल का विरेचन करने वाले सवालों से संघ को परेशानी है,मोदी प्रशासन को परेशानी है।









शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

दो पड़ोसियों की लाइफलाइन है दोस्ती


 कल भारत-पाक के बीच विदेश सचिव स्तर की बातचीत खत्म हुई तो मीडियावाले विवाद खोज रहे थे, पंगे वाले सवाल उठा रहे थे। बातचीत को व्यर्थ बता रहे थे। प्रेस काँफ्रेस में भारत की विदेश सचिव निरुपमा राव शांतभाव से पत्रकारों के सवालों के जबाव दे रही थीं,राव की बॉडी लैंग्वेज में जो स्वाभाविकता और सहजता थी वह तारीफ के काबिल है।
   कूटनीति की भाषा शरीर की भावभंगिमा के जरिए बहुत कुछ कह देती है। निरुपमा राव की भावभंगिमा ने मीडिया की सनसनी को ठंड़े बस्ते में ड़ाल दिया है। दोनों पड़ोसी देशों में बातें हों यह सभी चाहते हैं,खासकर इन देशों की जनता यही चाहती है।
   विदेश सचिव स्तर की बातचीत के ठीक पहले पूना में ब्लास्ट हुआ जिसमें अनेक लोग मारे गए। आतंकी नहीं चाहते कि भारत-पाक में दोस्ती और संवाद बने। दोनों देशों के संबंध ज्यों ही सामान्य होने शुरु होते हैं कोई न कोई हंगामा खड़ा कर दिया जाता है। मीडिया इस प्रक्रिया में आग में घी का काम करता रहा है। मीडिया और दोस्ती विरोधी देशी ताकतों को( ऐसी ताकतें दोनों देशों में हैं)  यह बात पसंद नहीं है कि भारत-पाक में दोस्ती बनी रहे।
  कायदे से देखा जाए तो इसबार की बैठक सार्थक रही है। लंबे अंतराल के बाद यह बैठक हो पायी है। इस तरह की बैठकें ज्यादा होनी चाहिए । राष्ट्रों की समस्याएं कूटनीतिक वार्ताओं से हल होती है, पंगों से नहीं,घृणा से नहीं। भारत ने पाक को 3 दस्तावेज सौंपे हैं जिनमें पाक से चलने वाली आतंकी गतिविधियों का कच्चा चिट्ठा है और भारत ने इन तीनों दस्तावेजों पर कार्यवाही की मांग की है।

हमें यह ध्यान रखना होगा कि पाक में आईएसआई जैसा खतरनाक खुफिया संगठन है जो अमेरिकी गुप्तचर संस्था के साथ मिलकर काम करता रहा है। भारत और पाकिस्तान में आतंकी ग्रुपों को वह मदद करता रहा है और आज भी कर रहा है। कुछ अर्सा पहले तक अमेरिकी नागरिक रिचर्ड हेडली जैसे जासूस भारत में आतंकियों के लिए काम करते रहे हैं, हमारी सरकार अभी तक अमेरिकी प्रशासन के साथ गरमी के साथ हेडली जैसे खतरनाक व्यक्तियों के बारे में बात नहीं कर पायी है। हेडली को लेकर अमेरिका के प्रति संघ परिवार भी चुप है ,यह चुप्पी बड़ी अर्थपूर्ण है, भारत को अमेरिका को साफ कहना चाहिए कि हेडली को वह हमें सौंपे, हम पाक से आतंकियों को सौंपने की मांग कर रहे हैं, लेकिन अमेरिका से हेडली को सौपने की मांग क्यों नहीं करते ? क्या बात है कि आतंकियों के साथ अमेरिकी जासूसी संस्थाओं के संबंध हमें दिखाई नहीं दे रहे। हेडली के मामले में अमेरिकी विदेश विभाग भी फंसा हुआ है,हेडली को अमेरिका ने क्यों भेजा यह अभी भी रहस्य बना हुआ है। हिन्दी में कहावत है चोर को न मारो चोर की मईया को मारो। आतंक की गंगा अमेरिका से आ रही है। यह बात मीडिया वाले भी नहीं बताते और नहीं अमेरिका से ही हेडली को भारत को सौंपने की मांग करते हैं। इसी को कहते हैं मीडिया की अमेरिकी भक्ति और पाक द्वेष।
    भारतीय उपमहाद्वीप में अमेरिका सबसे बड़ा खतरा है न कि पाकिस्तान। आतंकी नरक में पाक को डुबोने वाला अमेरिका है और आतंकवाद के बहाने पाक को अमेरिका हजम कर जाना चाहता है, यदि ऐसा होता है तो भारत के लिए खतरा और भी बढ़ जाएगा। पाक को दोस्ती के मार्ग पर लाना हमारी सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। भारत-पाक दोस्ती बनी रहे इससे इस क्षेत्र की जनता को लाभ होगा। जबकि अमेरिकी शस्त्र उद्योग नहीं चाहता कि भारत-पाक में दोस्ती बनी रहे,शस्त्र उद्योग के विचारक और दलाल बार बार मीडिया में आ रहे हैं और वे उन्हीं बातों पर जोर दे रहे हैं जिससे भारत-पाक में और भी कटुता पैदा हो । हमें भारत-पाक में दोस्ती के बिंदुओं को सामने लाना होगा और यही अमेरिकी शस्त्र उद्योग को करारा प्रत्युत्तर होगा। भारत­­ -पाक एक-दूसरे की लाइफलाइन हैं। किसी अवस्था में यह लाइन बंद नहीं होनी चाहिए।   


मोदी और गुजराती अस्मिता की राजनीति-2

जनता की चेतना’ के नाम पर पांच करोड़ जनता का जयगान वस्तुत: ऐसी जनता का जयगान है जिसने सचेत रूप से वास्तविकता से अपने को अलग कर लिया है। जनता की यथार्थ से विच्छिन्न अवस्था का मीडिया ने खासकर चैनल प्रसारणों में बार-बार प्रक्षेपण किया गया।

     चैनलों में  विधानसभा चुनाव के समय गुजरात की जनता के चेहरे आ रहे थे ,चैनलों में शिरकत के जरिए जनता का महिमामंडन चल रहा था,किंतु जनता के ऊपर मीडिया का सत्य थोपा हुआ था, मीडिया सत्य के आधार पर जनता की भावनाओं को उभारा जा रहा था। इसका सिलसिला काफी पहले से शुरू हुआ था।

मोदी की विकासपुरूष की इमेज,''पांच करोड़ की गुजराती अस्मिता'' को मीडिया ने विगत पांच वर्षों (2002-07 ) में सचेत रूप से विकसित किया गया। सन् 2002 के दंगों की विभीषिका और तद्जनित सत्य से लोग दूर रहें, इसका सारा ताना-बाना गुजरात में 2002 के दंगों के बाद से शुरू हुआ था और इसके लिए एक ही बात बार-बार कही गयी कि हम 2002 को भूलना चाहते हैं। हम आगे जाना चाहते हैं। लेकिन विपक्ष बार-बार 2002 का रोना-धोना लेकर आ जाता है और हमें गोधरा की याद दिलाता है।
     उल्लेखनीय है संघ परिवार भारत में अस्मिता राजनीति का चैम्पियन है। आधुनिक भारत की अस्मिता की राजनीति का विमर्श संघ को अपने अंदर समेटे हुए है। संघ ने गुजरात में ''पांच करोड़ की गुजराती अस्मिता'' का नारा इसलिए दिया कि गुजरात के सत्य पर पर्दा डालना था और सत्ता हासिल करनी थी, अस्मिता का सवाल सत्य के उद्धाटन का हिस्सा नहीं होता बल्कि सत्य पर पर्दादारी के लिए, सत्य से ध्यान हटाने ,वास्तव मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए अमूमन अस्मिता  की राजनीति का इस्तेमाल किया जाता है।
अस्मिता सत्य से पलायन का अस्त्र हैअस्मिता के नाम पर मानवता को बौना बनाया जाता है,मनुष्य को छोटा बनाया जाता है अथवा उसकी उपेक्षा की जाती है।
  
 ''पांच करोड़ की गुजराती अस्मिता'' के नाम पर गुजरात के मानव सत्य को अस्वीकार किया गया। इस कार्य में मीडिया ने बड़े ही कौशल के साथ मोदी का साथ दिया और बार-बार रेखांकित किया कि गुजरात का सत्य वही है जो मोदी कह रहा है। मोदी जो कह रहा है वही वास्तविकता है।

साथ ही गुजरात के बारे में सभी किस्म के ऐतिहासिक-राजनीतिक सत्य को मीडिया ने विकृत करके पेश करने की कोशिश की और बार-बार यही दरशाने की कोशिश की है कि इस बार का चुनाव जाति के नाम पर नहीं लड़ा गया, साम्प्रदायिकता के नाम पर नहीं लड़ा गया, हिन्दुत्व के नाम पर नहीं लड़ा गया, इस बार का चुनाव सिर्फ विकास के नाम पर लड़ा गया और सभी चुनाव विश्लेषक (जिनमें अधिकांश धर्मनिरपेक्ष थे) यही बताते रहे कि गुजरात का चुनाव विकास के नाम पर लड़ा गया । इस तरह की व्याख्याओं का गुजरात के मानवीय यथार्थ से कोई संबंध नहीं है। संघ परिवार की विकास परिवार के रूप में छवि बनाने की कोशिश मीडिया राजनीति का हिस्सा है।  इसमें गुजरात की जनता की चेतना नहीं बोलती, गुजरात की जनता के अन्तर्विरोध नहीं बोलते। 
    आज हमारे सामने मुश्किल चुनौती है जनता के सही अर्थ को परिभाषित करने की। जनता की चुप्पी के क्षेत्रों के अर्थ खोलने की। हमें देखना होगा  क्या जनता के नाम पर जो अर्थ बांटा जा रहा है क्या वह मीडिया निर्मित अर्थ है  ? क्या सत्य का विकृतिकरण  हो रहा है सत्य का लोप तो नहीं हो गया ? मीडिया की विशेषता है  वह अर्थ सर्वग्राह्य बनाता है,सरलीकरण करता है,तटस्थ बनाता है। अर्थ को फॉर्मरहित बनाता है। अथवा जनता को ही फॉर्मलेस बनाता है। जहां मीडिया के द्वारा प्रस्तावित अर्थ का जनता प्रतिरोध करती है उसे अस्वीकार करती है,वहां पर मीडिया जनता के प्रतिरोध का जबाव नहीं देता। मासमीडिया हमेशा सत्ताा के साथ रहता है और जनता को मेनीपुलेट करता है।  यह भी संभव है मीडिया जनता के साथ हो और जनता को ही सही अर्थ से वंचित कर दे,अर्थ को खोखला बना दे। जनता के अर्थ के साथ हिंसाचार करे। ऐसी अवस्था में जनता मीडिया से अभिभूत रहे ,अथवा राजनीति को मीडिया शोमैनशिप के मार्ग पर ठेल दे। गुजरात के संदर्भ में इन प्रवृत्तियों को सहज ही देखा जा सकता है।
       मोदी का तर्क है विगत पांच साल में गुजरात में कोई साम्प्रदायिक दंगा नही हुआ। यह बात तथ्यत: ठीक नहीं है। इन पांच सालों में कईबार साम्प्रदायिक हिंसाचार की वारदातें हुई हैं। स्थिति यह है कि गुजरात में जिस दिन चुनाव प्रचार आरंभ हुआ उसी दिन साम्प्रदायिक हिंसाचार की घटना हुई और उसमें कई लोग मारे गए। कई चर्च भी हमले के शिकार हुए । दूसरी बात यह साम्प्रदायिक हमला सिर्फ दंगे अथवा हिंसाचार के समय ही नहीं होता बल्कि तथाकथित शांत माहौल में साम्प्रदायिक वैचारिक हमले होते रहते हैं और ये कायिक हिंसाचार से ज्यादा गंभीर घाव करते हैं। सवाल यह है कि विगत 8 सालों में गुजरात में साम्प्रदायिक विचारधारा के हमले हुए हैं या नहीं ? साम्प्रदायिकता बढ़ा है या घटा है ? ध्यान रहे साम्प्रदायिकता वह भी है जो हिंसाचार के बिना होती है। संघ जानता है कि गुजरात में मुसलमानों को अधमरा किया जा चुका है। उनकी समूची अर्थव्यवस्था तहस-नहस की चुकी है। इस तबाही के बाद ही मोदी सत्ता में आया था।
सन् 2002 का चुनाव जीतने के बाद मोदी का प्रमुख लक्ष्य था गुजरात को साम्प्रदायिकचेतना से घेर लेना। और इस कार्य में मोदी सफल रहा। अहर्निश मुसलमानों ,ईसाईयों और धर्मनिरेक्षता के खिलाफ वैचारिक अभियान चलाया गया, समूचा सामाजिक वातावरण प्रदूषित करके रखा गया। पहले साम्प्रदायिकता के तर्को के आधार पर कत्लेआम किया गया और सन् 2002 में चुनाव जीतने के बाद साम्प्रदायिक विचारधारा को जबर्दस्ती लोगों के जेहन में उतारा गया। इसके लिए 'पांच करोड़ गुजरातियों की अस्मिता'' के नारे को वैचारिक अस्त्र बनाया गया। अनेक ऐसे कानून बनाए जिनसे अल्पसंख्यकों के हितों को नुकसान पहँचता है।
   अल्पसंख्यकों के खिलाफ समूचे राज्य में आर्थिक-राजनीतिक और सामाजिक भेदभाव की भावना को जमीनी वास्तविकता में तब्दील कर किया गया। अघोषित तौर पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ पाबंदियां लगायी गयीं और मुस्लिम बुद्धिजीवियों और धर्मनिरपेक्ष बुध्दिजीवियों पर निरंतर हमले संगठित किए गए। सवाल उठता है यदि मोदी की जीत के बाद गुजरात में शांति लौट आई थी तो मुसलमानों और धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों के खिलाफ द्वेष और घृणा अभियान जारी क्यों रहा ? ये अभियान बताते हैं कि मोदी के शासन में साम्प्रदायिक अशांति जारी थी।

  दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि गुजरात के राज्यव्यापी जनसंहार की पृष्ठभूमि एक दिन में तैयार नहीं हुई बल्कि इसकी जमीन लंबे समय से तैयार की जा रही थी, संभवत: राममंदिर आन्दोलन के आरंभ होने के साथ ही गुजरात के जनसंहार की आधारशिला रख दी गयी थी। लालकृष्ण अडवाणी की राम रथयात्रा सोमनाथ से  शुरू हुई और गुजरात को संघपरिवार की आदर्श परीक्षणस्थली अथवा प्रयोगशाला के तौर पर विकसित करने का फैसला तब ही ले लिया गया था। भाजपा को यू.पी. में असफलता हाथ लगी किंतु गुजरात में प्रयोग सफल रहा। इसका प्रधान कारण है गुजरात में जमीनी स्तर पर दो दलीय ध्रुवीकरण है। कांग्रेस और भाजपा के अलावा किसी भी दल का अस्तित्व नहीं है। यह दो दलीय ध्रुवीकरण भाजपा के लिए आसानी से सत्ता में ले जाने में मददगार साबित हुआ है। यदि गुजरात में कोई तीसरा दल होता जैसा यू.पी. अथवा बिहार में है तो भाजपा को संभवत: जनता नहीं चुनती। दो दलीय ध्रुवीकरण में भाजपा हमेशा फायदे में रहेगी। गुजरात से राजनीति का यही मॉडल निकल रहा है। भाजपा चाहती है कि साम्प्रदायिक और गैर साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण हो। दो दलीय अथवा दो मोर्चों की राजनीति का मंच तैयार हो। इसमें भाजपा ज्यादा सुविधाजनक स्थिति में रहेगी।
   



             

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

‘तेरा’ ‘मेरा ’ ग्लोबल प्रेत

                   
 प्रेत कभी अकेले नहीं आते हमेशा अनेक के साथ आते हैं। यह वर्णशंकर प्रेत है। यह आधा भारतीय है और आधा विलायती है। इसका राजनीतिक शरीर भी वर्णशंकर है। आधा ''हमारा'' और आधा ''तुम्हारा''  यह अद्भुत मिश्रित क्लोन है। ग्लोबल कल्चर की उपज है। इसके कपड़े और मुखौटे जरूर राजनीतिक दलों के हैं किंतु इसकी आत्मा ठेठ अमरीकी है। ग्लोबल है।

कहने को इसका शरीर भारतीय है किंतु मन-मिजाज,स्वभाव,भाव-भंगिमा, बयान, चाल- ढाल, संगठनशैली सब अमरीकी हैं। यह नयी विश्वव्यापी जनतंत्र  स्थापना की अमरीकी मुहिम के सभी लक्षणों से युक्त है। नया अमरीकी जनतंत्र जबरिया थोपा जनतंत्र है, लाठी का जनतंत्र है।इसमें सत्ता जैसा चाहेगी वैसा ही विपक्ष भी होगा। पश्चिम बंगाल या भारत के लिए यह पराया जनतंत्र है।
    प्रेतों के वचनों में हमेशा मानवीय भाषा होती है जैसे झगड़े का समाधान बातचीत से होना चाहिए, हमें झगड़ा पसंद नहीं है। हम चाहते हैं कि सब लोग शांति से रहें, प्रेम से रहें, भाईचारे के साथ रहें। हमारे प्रशासन का काम है लोगों को सुरक्षा देना। मानवीय मंगलवचनों का इनके मुख से निरंतर पाठ चलता रहता है। यह वैसे ही है जैसे अमरीकी विदेश विभाग सारी दुनिया में अपने नेताओं के मुँह से मंगलवचनों को उगलवाता रहता है।

 मंगलवचन की राजनीति नए अमरीकी जनतंत्र की राजनीति है,यह ‘तेरे’ ,‘मेरे’ के प्रेतों की निजी खूबी है। प्रेतों ने यह भाषा अमरीकी तंत्र से सीखी है। यह लोकल भाषा नहीं है। ग्लोबलाईज जनतंत्र की ग्लोबल भाषा है। ग्लोबल प्रेतों का दादागुरू नव्य- उदारतावाद है। यह अचानक नहीं हैं कि नव्य-उदारतावादी प्रेतों के साथ हैं, प्रेतों के ताण्डव के साथ हैं।
        ग्लोबल प्रेत सिर्फ अंधविश्वासी,पुनर्जन्म विश्वासी नहीं है, वह यदि संघियों के शरीर में प्रवेश कर सकता है तो वैज्ञानिक नजरिए के कायल कम्युनिस्टों के अंदर भी प्रवेश कर सकता है।

    ग्लोबल  प्रेत की कोई विचारधारा नहीं होती। वह कहीं भी और कभी भी किसी के अंदर प्रवेश कर सकता है और उसके अंदर स्थायी और अस्थायी डेरा जमा सकता है। प्रेत की कोई जाति नहीं होती, धर्म नहीं होता, राजनीति नहीं होती,चेहरा नहीं होता,प्रेत तो प्रेत है उसे मनुष्य समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।

प्रेत का धर्म ही अलग होता है। प्रेत वर्चुअल होता है। अनुपस्थिति होता है। प्राणरहित होता है। प्रेत में मानवता की खोज संभव नहीं है। प्रेत कोई व्यक्ति नहीं है। प्रेत ग्लोबल बहुराष्ट्रीय निगम व्यवस्था का प्रतीक है। इस प्रेत को साक्षात किसी ने देखा नहीं है। सिर्फ इसके उत्पात देखे हैं,प्रेत के ताण्डव देखे हैं, प्रेत की हिंसा और प्रतिहिंसा देखी है। इलाका दखल देखा है। ग्लोबल प्रेत को किसी के घर में आग लगाते,बलात्कार करते, बंदूक से गोलियां बरसाते देखा गया है,  उसकी बंदूकों की आवाजें सुनी हैं, दनदनाती मोटर साईकिलों पर हथियारबंद जुलूसों की दहशत महसूस की है, प्रेतों के द्वारा किए गए अत्याचारों के आख्यान सुने हैं। बलात्कार की शिकार औरतों के आख्यान सुने हैं। किंतु किसी ने प्रेतों को देखा नहीं है। आश्चर्य की बात है कि इन प्रेतों को कोई पंडित,कोई ओछा,कोई तांत्रिक बोतल में कैद नहीं कर पाया। कोई पुलिस वाला, सेना वाला,टीवी वाला पकड़ नहीं पाया,प्रेतों को हम देख नहीं पाए किंतु उनके आख्यान और महाख्यान को लगातार सुनते रहे हैं।

    काश प्रेतों के चेहरे होते। प्रेतों के पैर होते। शरीर होता तो कितना अच्छा होता हम साक्षात् प्रेतों को देख पाते, हमारे पास टीवी द्वारा पेश किया गया प्रेतों का आख्यान है किंतु रियलिटी शो नहीं है। प्रेतों की रियलिटी  नहीं है। प्रेतों के द्वारा सताए लोगों के यथार्थ बाइट्स हैं, यथार्थ आख्यान नहीं हैं। हम यथार्थ बाइट्स से ही काम चला रहे हैं। अधूरे यथार्थ से ही काम चला रहे हैं।  काश प्रेतों का रियलिटी शो कोई अपने कैमरे में कैद कर पाता !
 सवाल यह है कि जब प्रेतों के ताण्डव के आख्यान हम जानते हैं तो प्रेतों को खोजने का काम क्यों नहीं करते, प्रेतों को दण्डित कराकर उन्हें प्रेत योनि से मुक्ति क्यों नहीं दिलाते ? क्या हमें ' हमारे' और 'तुम्हारे' सभी प्रेतों को दण्डित कराने का प्रयास नहीं करना चाहिए ? क्या लोकतंत्र की वैज्ञानिकचेतना यही कहती है कि प्रेतों को आराम से रहने दो ?  
     हमारे देश में जिस प्रेत ने कब्जा जमाया है वह वर्णशंकर प्रेत है, हाइपररीयल प्रेत है। इच्छाधारी प्रेत है। जब इच्छा होती है तो किसी शरीर में प्रवेश कर जाता है  और जब इच्छा होती है गायब हो जाता है। यह ऐसा प्रेत है जिसे इच्छामृत्यु वर प्राप्त है। यह सत्ताधारी प्रेत है। इसी अर्थ में इच्छाधारी है। इच्छाधारी प्रेत बड़ा खतरनाक होता है। वह कभी भी किसी के भी अंदर प्रवेश कर जाता है और अभीप्सित लक्ष्य को प्राप्त करके गायब हो जाता है। हमने गली,मुहल्लों से लेकर गांवों-शहरों में ऐसे असंख्य प्रेत पाले हुए हैं। ये जनतंत्र के नए संरक्षक और भक्षक हैं।
      इच्छाधारी प्रेत के पास वैचारिक हिमायती भी हैं,ये ज्ञान-विज्ञान और समाजविज्ञान के धुरंधर हैं। इन लोगों ने अनेक प्रेताख्यान लिखे हैं। असल में ये विद्वान ही हैं जो इसे मंत्रोच्चारण करके प्रेतों को जिंदा रखे हुए हैं। यह विलक्षण संयोग है कि प्रेत मंत्रों से मरते नहीं है,प्रेत में क्लोनकल्चर होती है। यह भी कह सकते हैं प्रेत हमेशा क्लोन कल्चर के जरिए ही निर्मित किए जाते हैं, प्रेत एक जैसे होते हैं। प्रेतों की हरकतें एक जैसी होती हैं, भाषा एक जैसी होती है, संस्कृति एक जैसी होती, विचारधारा एक जैसी होती है। प्रेत के आख्यान लेखक भी एक जैसे होते हैं। काश हम प्रेत को देख पाते।


- मोदी और गुजराती अस्मिता की राजनीति - 1-


गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का विगत विधानसभा चुनाव में सबसे चर्चित नारा था ''पांच करोड़ गुजरातियों की अस्मिता'' को वोट दो।  स्वयं को गुजराती अस्मिता का वारिस घोषित किया। मोदी और संघ के अलावा सब इसके दायरे के बाहर हैं। पराए हैं। खारिज करने लायक हैं। यह अनेकार्थी नारा है। फासीवादी नारा है।

इस नारे का पहला संदेश , पांच करोड़ गुजराती खुश हैं, वे मेरा समर्थन कर रहे हैं अत: तुम भी समर्थन करो। यानी लोगों की खुशी को मोदी को चुनने के साथ जोड़ देते हैं।

दूसरा संदेश, यदि आप खुश होना चाहते हैं तो पांच करोड़ की कतार में शामिल हों अथवा दुख के लिए तैयार रहें। पांच करोड़ की कतार में शामिल हैं तो आपका परिवार और संसार सुखी है वरना तुम सोच लो।
तीसरा संदेश, मोदी के पांच करोड़ के संसार में सब सुखी हैं। कोई भी दुखी नहीं। अर्थात् मोदी के पांच करोड़ में दुखियों के लिए कोई जगह नहीं है। वंचितों और बेकारों के लिए कोई जगह नहीं है। जो पांच करोड़ में शामिल नहीं वह खुश नहीं।

    ''पांच करोड़ गुजराती'' के रूपक के बहाने मोदी वस्तुत: धर्मनिरपेक्ष पहचान पर हमला बोलते हैं। लोकतांत्रिक विवेक को निशाना बनाते हैं। सामाजिक तनाव में इजाफा करते हैं। सामाजिक तनाव में प्रतीयमान अर्थ के जरिए इजाफा करते हैं।
       मोदी का ''पांच करोड़ गुजराती अस्मिता'' का नारा फासिस्ट नारा है। इसका मोदी ने रूपक के तौर पर इस्तेमाल किया है। समृद्धि और खुशहाली के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया है। इस नारे के तहत मोदी सामाजिक तनाव और घृणा को बरकरार रखते हैं। यह एक तरह से घृणा की विचारधारा का पुनर्रूत्पादन है। ''पांच करोड़ गुजराती'' को मोदी एक परिवार के रूप में पेश करते हैं। समूचे राज्य को परिवार बनाकर मोदी राज्य और गुजराती परिवारों के बीच जो अन्तर्विरोध हैं उन पर पर्दादारी करते हैं। पूंजीवाद के अन्तर्विरोधों को छिपाते हैं। भूमंडलीकरण और गुजराती जनता के अन्तर्विरोधों को छिपाते हैं। लोकतंत्र और संघ के बीच के अन्तर्विरोधों को छिपाते हैं। संघ और अल्पसंख्यकों के बीच के अन्तर्विरोधों को छिपाते हैं।
    इस नारे का एक अन्य अर्थ है कि ''पांच करोड़ गुजराती'' मोदी के राज्य में सुखी हैं। वे मोदी के साथ हैं। पांच करोड़ का परिवार सुखी परिवार है, जो सुखी परिवार है वही सब कुछ पाने का हकदार है। अर्थात् समाज में जो लोग सुखी नहीं हैं वे पाने के हकदार नहीं हैं। पाने के हकदार वे ही हैं जो सुखी हैं। इस तरह मोदी अपना वंचितों के खिलाफ एजेण्डा भी बरकरार रखते हैं। वंचितों के प्रति अपने विरोध भाव को बरकरार रखते हैं।

इस प्रक्रिया में मोदी मध्यवर्ग की प्रतिरोध क्षमता को कुंद बनाते हैं,भ्रमित करते हैं और वंचितों में भी विभ्रम पैदा करने में सफल हो जाते हैं। ''पांच करोड़ गुजराती'' के नारे का इस्तेमाल करते हुए मोदी यह भी बताते हैं कि हम अपनी दुनिया कैसे बनाएं ? दुनिया को बनाने के लिए अन्तर्विरोधों में जाने की जरूरत नहीं है। इस तरह वे सामाजिक परिवर्तन के मूलगामी सवालों से ध्यान हटाने में सफल हो जाते हैं। मोदी का मूलत: जोर इस बात पर है कि ''पांच करोड़'' की दुनिया को कैसे बरकरार रखा जाए। उसकी अस्मिता को कैसे बनाए रखा जाए।
    यह नारा एक और काम करता है वह गुजराती जाति के आंतरिक अन्तर्विरोधों पर पर्दादारी। गुजराती जाति कोई इकसार जाति समूह नहीं है। बल्कि उसमें जातिप्रथा के रूप में जातियां हैं और उन जातियों के अपने अन्तर्विरोध भी हैं। इसके अलावा गुजरात में मुसलमान भी रहते हैं जिनके राज्य के साथ अन्तर्विरोध हैं। इन सभी समूहों के आंतरिक अन्तर्विरोधों को चालकी के साथ '' पांच करोड़ गुजराती की अस्मिता'' के नाम पर छिपा लिया गया है और गुजरात की एक सरलीकृत इमेज पेश की गई । गुजरात की अन्तर्विरोधपूर्ण,संश्लिष्ट और जटिल प्रकृति को इससे छिपाने में मदद मिली है।

 ''पांच करोड़ गुजराती की अस्मिता'' के नाम जिस जनता का मीडिया ने बार-बार चेहरा दिखाया,बयान सुनाए और भाजपा ने जिस जनता को पांच करोड़ के साथ एकमेक करके पेश किया,हमें उसकी चेतना के बारे में भी गंभीरता के साथ सोचना होगा।

       भारत में जनता का जयगान बहुत होता है। मोदी का जयगान उससे भिन्न नहीं है , बल्कि एक कदम आगे जाकर मोदी ने अस्मिता को पांच करोड़ के साथ जोड़ दिया है। ध्यान रहे  ‘जनता की चेतना’ के नाम पर अमूमन चेतनता का विरोध किया जाता है। ‘जनता की चेतना’ वस्तुत: अचेतनता ही है जिसका बुर्जुआ पार्टियां दोहन करती हैं। यह ऐसी चेतना है जो शिरकत के भाव से वंचित है अथवा जिसके पास शिरकत का अवसर ही नहीं है। अथवा जिसमें किसी भी किस्म की इच्छी ही नहीं है। अथवा जो अपनी इच्छाओं को दबा लेती है। जो कुछ वास्तव में हो रहा है उसे नोटिस ही नहीं लेती। चुप रहती है। अथवा सब कुछ जानते हुए भी नहीं बोलती।

गुजरात में मोदी फिनोमिना कैसे जन्मा


        गुजरात में विगत 15 सालों में जो मतदाता बने हैं उनमें से अधिकांश बेरोजगारऔर अर्द्ध रोजगार करते हैं। बेरोजगारों की इतनी बड़ी फौज स्वयं में बड़ी समस्या है। इस वर्ग में ''खाओ कमाओ, मौज करो'' की उपभोक्तावादी विचारधारा प्रबल है और इस समुदाय को सकारात्मक और जिम्मेदार राजनीति से नफरत है। यही वर्ग आज सबसे ज्यादा हिन्दुत्व की विचारधारा के पक्ष में है। अल्पसंख्यकों के खिलाफ है। अल्पसंख्यकों के प्रति जिस तरह का अभूतपूर्व हिंसाचार सन् 2002 में हुआ था उसमें युवावर्ग की केन्द्रीय भूमिका थी और यही युवावर्ग आज उन्मादी समूह की तरह गुजरात में सक्रिय है। इसमें शहरी मध्यवर्ग से लेकर दलित- आदिवासी का एक हिस्सा भी शामिल था।
    गुजरात के चुनाव में हिन्दुत्व के सामाजिक एवं धार्मिक श्रेष्ठत्व के सिध्दान्त को केन्द्र में रखा गया। मतदाताओं को गोलबंद करने के लिए जाति और धर्म के समीकरणों का व्यापकरूप में इस्तेमाल किया गया। दंगों के लिए अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा को बुनियादी आधार बनाया । चुनावों में संघ परिवार का एक ही संदेश था भाजपा को मुसनमानों के वोट नहीं चाहिए। अल्पसंख्यकों की गुजरात में कोई जगह नहीं है। वे गैर-कानूनी हैं। वे राज्य में रहना चाहते हैं तो दोयम-दर्जे के नागरिक होकर रहें अथवा शरणार्थी का जीवन जीने के लिए तैयार रहें।  
      गुजरात में संघ का माहौल अचानक नहीं बना है। इसमें संघ परिवार को वर्षों वैचारिक अभियान चलाना पड़ा है। इसकी विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों ने  जमीन तैयार की है। भाजपा के सत्ता में आने के पहले अनेक वर्षों से नए सम्प्रदायों और आश्रमों की गुजरात में बाढ़ आ गयी। सारा गुजरात हिन्दू धार्मिकता में डुबो दिया गया। उनके अनुयायियों का बहुत बड़ा हिस्सा संघ की राजनीति का सामाजिक आधार है। ये ऐसे हिन्दू सम्प्रदाय हैं जिनका पुराने किस्म के हिन्दूधर्म से कोई संबंध नहीं है। बल्कि ये नए युग के भूमंडलीकरण का वैचारिक हिस्सा हैं। ये सम्प्रदाय अपने हजारों-लाखों शिष्यों की टोलियों में उभरकर आए हैं,ये ग्लोबल संप्रेषक हैं। इन धार्मिक सम्प्रदायों की गतिविधियों को सर्वधर्मसद्भाव के नाम पर कांग्रेस ने भी खूब बढ़ावा दिया।

उल्लेखनीय है कि गुजरात में भाजपा के शासन स्थापित होने के पहले भी दंगे होते थे। साम्प्रदायिक गोलबंदियां थीं। किंतु प्रशासन कमोबेश तटस्थ था। किंतु भाजपा के शासन में आने के बाद प्रशासन का भगवाकरण किया गया। इससे समूचे गुजरात में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को टिकाऊ बनाने में मदद मिली।
    भाजपा के गुजरात में शासन में आने के पहले अल्पसंख्यकों को नागरिक माना जाता था,वे नागरिक अधिकारों का इस्तेमाल कर रहे थे। किंतु भाजपा के सत्ता में आने के बाद से स्थिति में परिवर्तन आना शुरू हुआ और सन् 2002 में यह स्थिति बनी अल्पसंख्यकों पर व्यापक हमले हुए और उनकी समूची अर्थव्यवस्था और बस्तियों को नष्ट कर दिया गया। अल्पसंख्यकों को शरणार्थी बना दिया गया। शत्रु बना दिया गया। घृणा का पात्र बना दिया गया। स्थायीतौर पर हिन्दू-मुसलमान के भेद को आमजीवन का हिस्सा बना दिया गया। इस प्रक्रिया में सबसे खराब भूमिका राज्य प्रशासन की रही। उसने अल्पसंख्यकों के अधिकार और जानोमाल की हिफाजत करने से इंकार कर दिया।

मोदी ने अपनी मीडिया रणनीति के जरिए यह सवाल उठाया आप मोदी के पक्ष में हैं या विपक्ष में । आमतौर पर इस तरह का मुद्दा भारतीय राजनीति में सिर्फ एक बार ही हुआ है और वह है 1971 के लोकसभा चुनाव के समय जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने इसी आधार पर अपनी इमेज बनायी थी और दो-तिहाई बहुमत से चुनाव जीता था।

व्यक्तित्व को दल से महान् बनाने की कला मोदी ने इंदिरा से सीखी है और इस कला के आधार पर कांग्रेस को पीट दिया। कांग्रेस का प्रचार अभियान काफी देर से शुरू हुआ जबकि मोदी ने अपना चुनाव प्रचार अभियान छह महिने पहले से ही शुरू कर दिया था। मोदी ने अपने पांच साल के शासनकाल में प्रशासन और राजनीति को अपने पर ही केन्द्रित रखा और पार्टी का कद कम किया। इससे लोगों में पहलीबार संघ के नायकानुवर्तित्व की धारणा साकार हुई।

संघ की नीति के अनुरूप भाजपा में जनतंत्र नहीं होता अथवा मंत्रालयों को किसी भी किस्म की स्वायत्तता नहीं होती। मोदी ने संघ की धारणा के अनुरूप इमेज निर्मित की और उसके माफिक परिणाम भी निकले। अन्य भाजपा शासित राज्यों में मुख्यमंत्री अभी तक ऐसा नहीं कर पाए हैं। कांग्रेस ने मोदी के शासनकाल में भ्रष्टाचार के आरोपों का पुलिंदा जारी किया था किंतु इसमें से किसी को भी आम जनता में प्रचारित नहीं कर पाए।

इसके विपरीत मोदी ने आरंभ से ऐसी इमेज बनाई कि वह भ्रष्टनेता नहीं है। मोदी का कोई परिवार  नहीं है और वह अकेला है अत: उसे आमलोगों को इस तथ्य को गले उतारने में सफलता मिल गई कि वह भ्रष्ट नहीं है। मोदी की साम्प्रदायिक इमेज के बारे में गुजरात के बाहर बातें की जा सकती हैं किंतु गुजरात में उसकी साम्प्रदायिक इमेज पर कांग्रेस ने एक भी शब्द नहीं बोला।
   
मोदी का गुजरात के विकास का नारा एकदम खोखला नारा था, किंतु जनता ने इस पर ध्यान नहीं दिया। वह नेता पर मुग्ध थी,उसके कद से अभिभूत थी। सच यह है कि भारत के जो छह राज्य सबसे ज्यादा कर्ज में डूबे हुए हैं। उनमें गुजरात का नाम भी आता है। इसके अलावा महाराष्ट्र,पश्चिम बंगाल,केरल,पंजाब और राजस्थान हैं। केन्द्रीय वित्तमंत्री के अनुसार ( हिन्दू बिजनेस लाइन,14 दिसम्बर 2007) गुजरात के पास सन् 2001-02 में जो कर्जा था वह सन् 2006-07 में 45,301 करोड़ से बढ़कर 94,009 करोड़ हो गया। इस अवधि में गुजरात में कर वसूली में सुधार नहीं आया बल्कि सारा राज्य रिजर्वबैंक के कर्ज पर चलता रहा हैं। इसके बावजूद जिस चीज ने मोदी की इमेज में इजाफा किया वह था उसके द्वारा पूंजी निवेश में बढ़त हासिल करना 51 सेज प्रकल्पों को बगैर किसी बाधा के लागू करना। लड़कियों की शिक्षा के काम को प्राथमिकता देना। गांवों में बिजली का पहुँचना और बिजली चोरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना। बिजली चोरों में ज्यादातर पटेल थे उनके खिलाफ बाकायदा मुकदमे ठोके गए। बिजली चोरी पर एक हद तक अंकुश लगा और राज्य में बिजली उत्पादन और वितरण को पेशेवर शक्ल प्रदान की और इसके कारण गांव के किसानों के गुस्से का सामना करना पड़ा।
मोदी ने जब विकास को मुद्दा बनाया और प्रचार अभियान के दौरान अपनी उपलब्धियों को गिनाना शुरू किया। ऐसे आंकडों का इस्तेमाल किया जो उसके पक्ष को मजबूत बनाते थे और उन आंकड़ों को छोड़ दिया जो उसके पक्ष को कमजोर बनाते थे। अपने आंकड़े पेश करते समय बार-बार गुजरात के शांत वातावरण का जिक्र जरूर किया। साम्प्रदायिक सद्भाव के उपकरण के तौर पर बिजली,पानी आदि का इस्तेमाल किया। मसलन् बिजली  सभी गांवों में पहुँचायी गयी ,सबके घरों में गयी है ,इस अर्थ में  हिन्दू-मुस्लिम भेद नहीं माना । इससे प्रौपेगैण्डा को हिन्दू-मुस्लिम भेदभाव के आरोपों के दायरे बाहर ले गया। बिजली और पानी के बहाने भेदभावरहित राजनीति की बात करते हुए मोदी ने असल में भेदभावरहित काल्पनिक इमेज की रचना की और मतदाताओं को आकर्षित किया। मतदाताओं की इच्छाओं के साथ नत्थी किया।
      
    मोदी और कांग्रेस में साझा समझ थी कि दंगे के लिए संघ का नाम न लिया जाए। विकास पर बातें की जाएं। विकास का श्रेय यदि मोदी को मिलता है तो केन्द्र में बैठे कांग्रेस नेताओं को भी श्रेय दिया जाए। दोनों ने ही अपने-अपने तरीके से नए सामाजिक ग्रुपों में पैठ बनाने की कोशिश की। कनवर्जंस की राजनीति का ही असर है कि गुजरात में संघ परिवार का  राज्य की स्वायत्त एवं स्वतंत्र प्रशासनिक संरचनाओं के साथ अंतर खत्म हो गया है। सभी संरचनाएं संघ में समाहित हो गयी हैं।यही फिनोमिना पश्चिम बंगाल में भी है,समस्त संरचनाएं माकपा में समाहित हो गयी हैं।

गुजरात में प्रशासनिक और राजनीतिक संरचनाओं कां संघ परिवार के साथ अंतर मिट गया है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं कह सकते। भाजपा खुलकर संघ के लिए काम करने को तैयार है तो दूसरी ओर मुख्य विपक्षी पार्टी के तौर पर कांग्रेस ने 2002 के दंगे का अपने घोषणापत्र में जिक्र तक नहीं किया। संघ के खिलाफ मनमोहनसिह,सोनिया गांधी ने अपने भाषणों में एक भी वाक्य नहीं बोला। बल्कि अखबार की रिपोर्ट बताती हैं कि कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों के चयन में विश्वहिन्दू परिषद के प्रवीण तोगड़िया और अनेक बागी नेताओं के सुझावों का पालन किया।     
पहले राजनीतिक समझ वर्गीय और सामाजिक यथार्थ पर आधारित थी। आजकल वर्गीय-सामाजिक यथार्थ की समझ जगह मुद्दों की समझ प्रधान है। वोटबैंक की राजनीति प्रधान है। समझ का स्रोत वोटबैंक है न कि यथार्थ। समस्याओं को स्वायत्त और सीमित परिप्रेक्ष्य में पेश किया जा रहा है।

पहले यथार्थ में जीते थे अब अतिशयोक्ति में जीते हैं। हाइपररीयल का युग अतिशयोक्ति का युग है।'हाइपर' का अर्थ है 'इससे ज्यादा'। यह ऐसा प्रयोग है जो हमें 'भौतिकवाद-आदर्शवाद', 'व्यक्ति-समग्र', 'धर्मनिरपेक्षता-साम्प्रदायिकता', 'हम और तुम' की बिडम्बनाओं के परे ले जाता है। इसका प्रधान लक्ष्य है सामाजिक और कायिक संदर्भ के फ्रेम को एकीकृत करना। इसे एकीकरण की भाषा के जरिए अर्जित किया जाता है। फलत: एकीकृत यथार्थ वैधता अर्जित कर लेता है।
     सच यह है एकीकृत यथार्थ जैसी कोई चीज नहीं होती यथार्थ अपने तरीके से भिन्न दिशा में सक्रिय रहता है। यथार्थ के भिन्न धरातल होते हैं। मसलन्! भौतिकवादियों और भाववादियों , धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता, हम और तुम का धरातल और यथार्थ एक नहीं हो सकता। हाइपररीयल इन सब पर पर्दा डालता है, अन्तर्विरोधों को छिपाता है। यही मोदी का सर्जक है।