बुधवार, 31 मार्च 2010

काश ! हम संचार क्रांति के गुलाम न होते

     संचार क्रांति धुरी है साम्राज्यवादी वर्चस्व, धंधा और झूठ। जो लोग इसे सत्य से जोड़ते हैं वे मासूम हैं और इस तकनीक की वैधता को अभी भी खिलंदड भाव से ले रहे हैं। संचार क्रांति की पारदर्शिता के खोखलेपन का आदर्श उदाहरण है हाल में आई आर्थिकमंदी और अमेरिका में सैंकड़ों बैंकों दिवालिया हो जाना। आश्चर्य की बात यह है कि आम जनता और मीडिया को उसकी भनक तक नहीं लगी।
     पारदर्शिता का आलम यह है कि अमेरिका आज सारी दुनिया के सामने नंगा खड़ा है,400 से ज्यादा अमेरिकी बैंक दिवालिया हो चुके हैं लेकिन अभी तक एक भी अपराधी नहीं पकड़ा गया।
    सबसे ज्यादा सुरक्षा देने वाली नयी उन्नत तकनीक का इस्तेमाल जब से हुआ है तब से साइबर सफेदपोश अपराधियों की संख्या हठात् आसमान छूने लगी है। साइबर लूट और अपराध में सैंकड़ों गुना वृद्धि हुई है।
    फेक मेल, फेक दोस्त ,फेक सेक्स और फेक प्रेम की भी बाढ़ आ गयी है। कहने का तात्पर्य यह है कि इंटरनेट की संचार प्रणाली पर शक की सुई जिस तरह घूम रही है वैसी स्थिति अन्य किसी माध्यम की नहीं हुई थी।
     आज नेट प्रामाणिकता के संकट से गुजर रहा है। मानव सभ्यता के इतिहास में संचार के किसी भी उपकरण को इस तरह के संकट का सामना नहीं करना पड़ा था। आखिरकार इंटरनेट अपने वायदे पूरे क्यों नहीं कर पाया ? ऐसा क्या हुआ कि नेट की प्रामाणिकता और खूबियों के बारे में जितने दावे नेटगुरुओं ने किए थे वे धीरे-धीरे हवा हो गए।
     मसलन् कागजरहित ऑफिस के वायदे का क्या हुआ ? आज अमेरिका में पहले की तुलना में कागज की खपत ज्यादा हो रही है। हमारी बैंकों से लेकर अन्य संस्थानों में कागज की खपत कम होने की बजाय  बढ़ी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आज कारपोरेट नेट कंपनियों और विभिन्न देशों की सरकारों के द्वारा की जा रही साइबर निगरानी के दायरे में आ गयी है। बैंक खाते जो कल तक गुप्त थे आज साइबर निगरानी के दायरे में हैं और साइबर डकैतों के लिए खुले हैं। पारदर्शिता के वायदे को भी नयी संचारप्रणाली निभा नहीं पायी है।
     फेक में मजा और फेक का ही संचार यही संचार क्रांति की अब तक की सबसे बड़ी देन है। देखने वाली बात यह है कि नयी संचार प्रणाली क्या मनुष्य को सत्य और यथार्थ करीब ले जाती है या सत्य से दूर ? संचार क्रांति के हाहाकार में सत्य से हम कोसों दूर चले गए हैं,सत्याभास को ही सत्य समझने लगे हैं।
     संचार क्रांति का दूसरा बड़ा योगदान है कि हम सचार तकनीक के गुलाम होकर रह गए हैं। आम जीवन में सत्य की हलचलों की बजाय पाखण्ड की बाढ़ आ गयी है खासकर मनोरंजन और धर्म का बिगुल बज उठा है। मनोरंजन और धर्म के कोलाहल में हमें सिर्फ धमाकों की आवाजें दिखती हैं, हमने जीवन के सत्य से मुखातिब राजनीति की ओर देखना बंद कर दिया है। विज्ञापन के शोर में हमने गरीबों का क्रंदन सुनना,देखना और पढ़ना बंद कर दिया है। संचार क्रांति की सुनामी ने हमें बहरा बना दिया हैं। संचार सुनामी में हम निर्जीव प्राणी बनकर रह गए हैं। यह सारा उलटा-पुलटा इसलिए हुआ है क्योंकि हमने संचार क्रांति की गुलामी स्वीकार कर ली है। काश ! हम संचार क्रांति के गुलाम न होते ।         







ट्विटर‘ पर नकली हेबरमास

( प्रसिद्ध जर्मन समाजशास्त्री जे.हेबरमास)

             जर्मन के विश्व विख्यात समाजशास्त्री जे.हेबरमास अचानक 29 जनवरी 2010 को 5.38P.M. पर ‘ट्विटर’ पर आए और उन्होंने लिखा, ‘‘ यह सच है कि इंटरनेट ने विविधतापूर्ण जमीनी लेखकों और पाठकों के सार्वजनिक वातावरण को पुनः सक्रिय किया है।’’ 5.40 पर उन्होंने फिर ‘ट्विट’ किया और लिखा, ‘‘ ब्राडकास्टिंग का यह निर्वैयक्तिक और बहुआयामी प्रतिवादी संतुलन है।’’ फिर 5.41 पर लिखा ‘‘ इसने संचार में अनिवार्य संप्रेषण के तत्व को शामिल कर दिया है। साथ ही यह सर्वसत्तावादी शासनों की सेंसरशिप की उपेक्षा करता है।’’ फिर 5.44 पर लिखा ‘‘ विश्व में लाखों बिखरे हुई चर्चाओ से बिखरे हुए आडिएंस और अलग-थलग पड़ी जनता का निर्माण हो रहा है। ’’
गार्जियन ने लिखा कि क्या 80 साल का फ्रेकफुर्ट स्कूल का मनीषी ‘ट्विट’ पर आया था ? अथवा कोई twitter.com/­jhabermas के नाम से हेबरमास का इस्तेमाल कर रहा है ? अथवा philosophy ­blogos के लोग उन्माद पैदा करने के लिए हेबरमास के नाम की प्रामाणिकता जानने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं ? कुछ लोग कह रहे हैं कि हेबरमास ने Political Communication in Media Society: Does Democracy Still Enjoy an Epistemic Dimension? नामक जो निबंध लिखा था उसमें से ही निकालकर ये ‘ट्विट’ लिखा है। सवाल उठा है आखिरकार कट एंड पेस्ट हेबरमास क्यों करने जाएंगे ?
    जोनाथन स्ट्रे नामक एक ब्लॉगर ने वास्तव हेबरमास के साथ संपर्क किया और उनसे फूछा कि क्या आप ‘ट्विटर’ पर गए थे तो उन्होंने साफ इंकार किया और कहा कि कोई मेरे नाम का कोई दुरुपयोग कर रहा है। ‘ट्विटर’ के संवाद में जिस तरह हेबरमास ने मना किया है कि वे ‘ट्विटर’ पर नहीं जाते और कोई अन्य उनके नाम का दुरुपयोग कर रहा है वैसे ही दुनिया के और भी बड़े ज्ञानी लोगों के नाम का पाखंडी ‘ट्विटर’ इस्तेमाल कर रहे हैं। यही स्थिति नेट सामग्री में भी हो सकती है ?








मंगलवार, 30 मार्च 2010

सैलीबरेटी अमिताभ से आतंकित क्यों है कांग्रेस

     अमिताभ बच्चन ने जब से गुजरात के विकासदूत का जिम्मा लिया है तब से कांग्रेस बौखलाई घूम रही है। कल कांग्रेस के प्रवक्ता ने अमिताभ से जबाव मांगा कि वह गोधरा-गुजरात के 2002 के दंगों के बारे में अपनी राय व्यक्त करें ? पहली बात यह है कि अमिताभ से जबाव मांगने का कांग्रेस को कोई हक नहीं है। किसी भी नागरिक को यह हक है कि वह किसी मसले पर बोले या न बोले। जिस बेवकूफी के साथ कांग्रेस प्रवक्ता  ने अमिताभ से जबाव मांगा है, उस सिलसिले को यदि बरकरार रखा जाए तो क्या किसी उद्योगपति से कांग्रेस यह सवाल कर सकती है ? क्या टाटा से नैनो का कारखाना गुजरात में लगाते वक्त यह सवाल कांग्रेस ने पूछा कि आप गुजरात क्यों जा रहे हैं ? वहां तो 2002 में दंगे हुए थे,क्या कांग्रेस ने उन उद्योगपतियों से सवाल किया था जिन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री को कुछ अर्सा पहले प्रधानमंत्री के पद हेतु ‘योग्य’नेता घोषित किया था, मूल बात यह है कि कांग्रेस जो सवाल अमिताभ से कर रही है वही सवाल देशी-विदेशी उद्योगपतियों से क्यों नहीं करती ? आखिरकार वे कौन सी मजबूरियां हैं जो कांग्रेस को देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों से गोधरा-गुजरात के दंगों पर सवाल करने से रोकती हैं ?कांग्रेस ने आज तक उन कारपोरेट घरानों से पैसा क्यों लिया जिन्होंने गुजरात दंगों के बाद मोदी और भाजपा को चंदा दिया था। खासकर उन घरानों से पैसा क्यों लिया जिन्होंने मोदी को योग्यतम प्रधानमंत्री कहा था।
      इससे भी बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस कब से दूध की  धुली हो गई ? कौन नहीं जानता कि श्रीमती इन्दिरा गाँधी के महानायकत्व के निर्माण में अमिताभ बच्चन के सिनेमा की बड़ी भूमिका रही है।
    संघ के सारे कारनामों को जानने के बावजूद कांग्रेस का संघ के प्रति साफ्टकार्नर रहा है। यह भी एक खुला सच है कि कांग्रेस ने राजीव गाँधी के जमाने में अमिताभ से खुली राजनीतिक मदद ली थी उन्हें इलाहाबाद से लोकसभा का चुनाव लड़वाया गया और उस समय अमिताभ से यह नहीं पूछा था कि सिख-जनसंहार पर क्या राय है ? भारत-विभाजन पर क्या राय है ? कांग्रेस के द्वारा भारत-चीन युद्ध के समय संघ से मदद लेने और बाद में संघ की एक कार्यकर्त्ता टोली को गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल करने पर क्या राय है ? यह फेहरिस्त काफी लंबी है।
    मूल समस्या यह नहीं है कि अमिताभ बताएं कि 2002 के दंगों पर उनकी राय क्या है ? समस्या यह है कि अमिताभ बच्चन जैसे सैलीबरेटी के एक्शन को कैसे देखें ?
     अमिताभ साधारण नागरिक नहीं हैं और नहीं राजनेता हैं,बल्कि सैलीबरेटी हैं। सैलीबरेटी की एकायामी भूमिका नहीं होती,सैलीबरेटी के एक्शन,बयान आदि का एक ही अर्थ नहीं होता। सैलीबरेटी अनेकार्थी होता है,एक का नहीं अनेक का होता है। उसमें स्थायी इमेज और कोहरेंट अर्थ खोजना बेवकूफी है।
      सैलीबरेटी हमेशा अर्थान्तर में रहता है। यही वजह है गप्पबाजी,चटपटी खबरें,खबरें,अनुमान,स्कैण्डल आदि में वह आसानी से रमता रहता है। आज के जमाने में किसी भी चीज का एक ही अर्थ नहीं होता फलतः अमिताभ बच्चन के गुजरात के विकासदूत बनने का भी एक ही अर्थ या वही अर्थ नहीं हो सकता जैसा कांग्रेस सोच रही है।
     अमिताभ का गुजरात का विकासदूत बनना कोई महान घटना नहीं है यह उनकी व्यापार बुद्धि, खासकर फिल्म मार्केटिंग की रणनीति का हिस्सा है। साथ ही उनके देशप्रेम का भी संकेत है।
    अमिताभ ने सभी दलों की मदद की है ,यह काम उन्होंने नागरिक और सैलीबरेटी के नाते किया है। इससे अमिताभ की इमेज कम चमकी है अन्य लोगों और दलों की इमेज ज्यादा चमकी है, बदले में अमिताभ को तरह-तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा है।
     आज भाजपा ने अमिताभ का लाभ उठाने की कोशिश की है यही भाजपा वी.पी.सिंह के साथ मिलकर अमिताभ-अजिताभ को बोफोर्स का एजेण्ट कहकर अपमानित कर रही थी, कांग्रेस के साथ उस समय अमिताभ को अपमान के अलावा क्या मिला था ? यूपी के पिछले विधानसभा चुनाव में अमिताभ ने अप्रत्यक्ष ढ़ंग से समाजवादी पार्टी के लिए काम किया था हम जानते हैं कि बाद में मायावती और कांग्रेस ने उन्हें किस तरह परेशान किया ।
   आज कांग्रेस के लोग अमिताभ पर हमले कर रहे हैं तो वे संभवतः यह सोच रहे हैं कि शायद मोदी की इमेज या साख को सुधारने में अमिताभ से मदद मिले, लेकिन ऐसा नहीं हो सकता,अमिताभ कोई पारस नहीं हैं कि उनका स्पर्श करते ही लोहे के मोदी सोने के हो जाएं। सवाल यह है कि कांग्रेस सैलीबरेटी संस्कृति से इतना आतंकित क्यों है ?
    उल्लेखनीय है फिल्मी नायक की इमेज बहुआयामी और बहुअर्थी होती है। इंटरनेट,ब्लॉग और ट्विटर के युग में हीरो अपनी इमेज को नियंत्रित रखने की कोशिश भी करते हैं। लेकिन साइबर फिसलन में पांव टिका पाना संभव नहीं होता। फलतःसैलीबरेटी अपना विलोम स्वयं रचने लगता है।





साम्यवादी खबर से क्यों डरते हैं ?

    एक जमाना था जब सोवियत शासन और समाजवाद के प्रभाववश सारी दुनिया में विचारों और सूचनाओं की सेसरशिप खूब होती थी, आए दिन समाजवादी समाजों में साधारण आदमी सूचना और खबरों को तरसता था। संयोग की बात है अथवा सिद्धांत की समस्या है यह कहना मुश्किल है,लेकिन सच यह है कि साम्यवादी विचारकों और कम्युनिस्ट समाज का सूचना और खबरों से बैर चला आ रहा है। आज भी समाजवादी समाजों में सूचना पाना,खबर पाना आसान नहीं हैं। हमें सोचना चाहिए कि आखिरकार साम्यवादी खबर से क्यों डरते हैं ? खबरों से डरने वाला समाज कभी भी स्वस्थ समाज का दावा नहीं कर सकता। जिस समाज में खबरें प्राप्त करने के लिए जंग करनी पड़े,वह समाज आर्थिक तौर पर कितनी भी तरक्की कर ले पिछड़ा ही कह लाएगा। यही स्थिति इन दिनों चीन की है।
        चीन में कहने को इंटरनेट है लेकिन अबाधित ढ़ंग से सूचनाएं पाना संभव नहीं है। सूचनाओं की खोज करते हुए आप जेल भी जा सकते हैं। पहली दिक्कत तो यह है कि सूचनाओं पर कड़ी साइबर निगरानी है। इसके बावजूद यदि सूचना मिल गयी तो उसे संप्रसारित करना मुश्किल होता है।
    उल्लेखनीय है चीन में इंटरनेट यूजर पर देश के अंदर नजर रखी जाती है। आप यदि ऐसी सूचना खोजकर पढ़ रहे हैं जो सेंसर है तो आपको पुलिस दमन का सामना करना पड़ेगा। आप आसानी से देख सकते हैं कि कौन सी साइट,ब्लॉग आदि को सेंसर कर दिया गया है। यहां http://whatblocked.com/ पर देखेंगे तो सारा खेल आसानी से समझ में आ जाएगा। आज की तारीख में फेसबुक,ट्विटर,यू ट्यूब, ट्विटपिक,विकीलीक पर पूरी तरह पाबंदी है। बीबीसी और विकीपीडिया पर आंशिक पाबंदी है। गूगल न्यूज और जीमेल उपलब्ध हैं।
      चीन की साइबर नाकेबंदी और नेट सेंसरशिप का परिणाम यह हुआ है कि अब नेट पर ऐसे सरबर आ गए हैं जो वैध नहीं हैं। जिन्हें प्रॉक्सी सरबर कहा जाता है। ये वे सरबर हैं जो चीनी साइबर पुलिस की पकड़ के बाहर हैं और इनका संचालन अमेरिका से ही होता है और संभवतः सीआईए के द्वारा संचालित हैं।  ऐसा ही एक सरबर है Haystack । इस सरबर को सीआईए ने ईरान के तथाकथित सत्ताविरोधियों को मुहैय्या कराया था । इसी तरह A VPN, Tor, Steganography आदि सरबर हैं जो प्रचलित सरबरों के विकल्प के रुप में काम कर रहे हैं और इनके जरिए ही प्रतिवादी चीनी जनता सूचनाओं का आदान-प्रदान कर रही है। शर्त एक ही है कि आपके पास सही साफ्टवेयर होना चाहिए जिससे आप उपरोक्त सरबरों का इस्तेमाल कर सकें।
     चीन में व्यापक नेट सेंसरशिप के बावजूद नेट का कारोबार तेजी से फलफूल रहा है। तकरीबन 30बिलियन डॉलर का 2009 में नेट कंपनियों ने कारोबार किया है। चीन में ज्यादातर लोग नेट पर जीवनशैली और मनोरंजन से संबंधित सूचनाएं प्राप्त करने जाते हैं। अधिकांश जनता की खबरों को खोजने में कोई दिलचस्पी नहीं है। इंटरनेट के 60 प्रतिशत यूजर 30 साल से कम उम्र के हैं। मॉर्गन स्टेनले में नेट विशेषज्ञ रिचर्डस जी का मानना है कि अमेरिका में अधिकांश यूजर खबरों की तलाश में नेट पर जाते हैं। लेकिन चीन में मनोरंजन की तलाश में जाते हैं। चीन में काम करने वाली नेट कंपनियों की मुश्किल यह है कि उनके पास स्थानीय मदद का अभाव है और सभी नेट कंपनियों को चीन के प्रशासन के साथ गांठ बांधकर काम करना पड़ता है। इसके कारण प्रशासन का राजनीतिक एजेण्डा नेट कंपनी का बिजनेस एजेण्डा बन जाता है। यही खबर और सूचना की मौत का प्रधान कारण भी है। राजनीतिक दल का एजेण्डा यदि व्यापार और संचार का एजेण्डा बनेगा तो सूचना और खबर की मौत तय है।  
        



सोमवार, 29 मार्च 2010

संचार क्रांति का मानवाधिकार कार्यकर्ता है ‘ ट्विटर' और 'ब्लॉगर'

   
 भारत में ‘ ट्विटर’ को अभी भी बहुत सारे ज्ञानी सही राजनीतिक अर्थ में समझ नहीं पाए हैं ,खासकर मीडिया से जुड़े लोग भारत के विदेश राज्यमंत्री शशि थरुर के ‘ट्विटर’ संवादों पर जिस तरह की बेवकूफियां करते हैं उसे देखकर यही कहने की इच्छा होती है कि हे परमात्मा इन्हें माफ करना ये नहीं जानते कि ये क्या बोल रहे है। ‘ट्विटर‘ मूलतः नयी संचार क्रांति का मानवाधिकार कार्यकर्ता है। यह महज संचार का उपकरण मात्र नहीं है। यह साधारण जनता का औजार है। यह ऐसे लोगों का औजार है जिनके पास और कोई अस्त्र नहीं है।
    इन दिनों चीन में जिस तरह का दमन चक्र चल रहा है। उसके प्रत्युत्तर में चीन में मानवाधिकार कर्मियों के लिए ‘ट्विटर’ सबसे प्रभावशाली संचार और संगठन का अस्त्र साबित हुआ है। जगह-जगह साधारण लोग ‘ट्विटर’ के जरिए एकजुट हो रहे हैं। लेकिन एक परेशानी भी आ रही है। ‘ट्विटर’ में 140 करेक्टर में ही लिखना होता है और चीनी भाषा में यह काम थोड़ा मुश्किलें पैदा कर रहा है।
   ‘ट्विटर’ लेखन के कारण चीन में मानवाधिकार कर्मियों को ,खासकर नेट लेखकों को निशाना बनाया जा रहा है। नेट लेखक चीन की अदालतों में जनाधिकार के पक्ष में और चीनी प्रशासन की अन्यायपूर्ण नीतियों के बारे में जमकर लिख रहे हैं उन्हें साइबर चौकीदारों की मदद से चीन की पुलिस परेशान कर रही है,गिरफ्तार कर रही है। गिरफ्तार नेट लेखकों ने ‘ट्विटर’ का प्रभावशाली ढ़ंग से इस्तेमाल किया है। मजेदार बात यह है कि चीन प्रशासन के द्वारा अदालतों में साधारण मानवाधिकार कर्मियों और चीनी प्रशासन के अन्यायपूर्ण फैसलों के खिलाफ जो मुकदमे चलाए जा रहे हैं उनकी सुनवाई के समय सैंकड़ों ब्लॉगर और ट्विटर अदालत के बाहर खड़े रहते हैं और अदालत की कार्रवाई की तुरंत सूचना प्रसारित करते हैं और प्रतिवाद में जनता को गोलबंद कर रहे हैं। इससे चीनी प्रशासन की समस्त सेंसरशिप धराशायी हो गयी है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो ब्लॉगर और ट्विटर नया संगठक है। यह ऐसा संगठनकर्ता है जो कानून और राष्ट्र की दीवारों का अतिक्रमण करके प्रतिवादी संगठन बनाने का काम कर रहा है।    



फिल्मी संस्कृति की प्रमुख चुनौतियां- 4-

(हैदराबाद स्थित अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय में दीप प्रज्वलित करते जगदीश्वर चतुर्वेदी)

हिन्दी सिनेमा में राजनीति आरंभ से ही रही है। हिन्दी सिनेमा की यह विशेषता है कि इसके जितने भी बड़े हीरो हैं वे किसी न किसी न किसी रुप में भारत की राजनीति के प्रधान नेता के भावों और विचारों को व्यक्त करते रहे हैं। फिल्मों में ग्राम्य जीवन,कृषिदासता,भूमि विवाद, जाति संघर्ष, भारत-चीन युद्ध,भारत-पाक विवाद, मुसलमानों का स्टीरियोटाईप, औद्योगिक संस्कृति,राजनीतिक संवृत्तियां,राजनीतिक विमर्श की चालू भाषा आदि चीजें हैं जो बार बार आती रही हैं।
    ग्लोबलाइजेशन में कलाओं के सामने क्या चुनौती है और फैशन उद्योग में क्या चलेगा,इसका फैसला फिल्मों में होता है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं है बल्कि आधुनिककाल के उद्योग और राजनीतिक विमर्श के वातावरण निर्माण का उपकरण या माध्यम भी है।
     एक जमाना था सिनेमा में वाम की भाषा दिखती थी और आज वाम की प्रतिवादी भाषा नजर नहीं आती। अब सिनेमा की भाषा में दृश्यों के माध्यम से परवर्ती पूंजीवाद के दृश्यों का बाहुल्य नजर आता है। सिनेमा के दृशय ही हैं जो उसकी भाषा बनाते हैं। सिनेमा में राजनीति के आने के कारण फिल्मी कहानी का चरित्र भी बदला और नए किस्म की कहानी आई जिसके केन्द्र में नए किस्म का ढ्रामा भी आया। अब छोटी कहानी होती है लेकिन लोकेशन अर्थों से भरी होती है। जैसे नए भवन,सूचना की नई तकनीक, विशाल इमारतों और शानदार सड़कों का जाल। फिल्मी भाषा का नया संसार भूमंडलीकरण की ग्लोबल भाषा में आया है,इसे विज्ञापन से लेकर फिल्मों के दृश्यों में सहज देखा जा सकता है।     
   सिनेमा कैसे राजनीति करता है इसका आदर्श नमूना है फिल्मी कथानक,नायक-नायिका आदि में आया बदलाव। इस बदलाव का सुंदर नमूना है हीरो की बदली हुई प्रकृति। नायक संस्कृति दो नमूने हैं अमिताभ बच्चन (पूर्व शाहरुख) और शाहरुख खान। शाहरुख खान नव्य-उदारवाद का नायक है, इसका समूचा तानाबाना भूमंडलीकरण और आप्रवासी भारतीय और जाति अस्मिता से जुड़ा है। यह ऐसा नायक है जिसकी अतीत की स्मृतियां फिल्म कहानी से गायब हैं। पुराने फिल्मी हीरो के पास अतीत था,बचपन था। उसकी मनुष्य या व्यक्ति की पहचान थी। पुराने हीरो की जाति,क्षेत्रीय या धर्म की पहचान नहीं होती थी, (एकाध अपवाद छोड़कर)। इसके विपरीत नए हीरो के पास जाति-क्षेत्रीय पहचान है। मसलन् नया हीरो शाहरुख पंजाबी,समृद्ध और उच्चजाति का है। ये चीजें पुराने हीरो में गायब हैं। पुराने हीरो ने नाम देखें, ‘मि.अमर’, ‘ मि.आनंद’, ‘मि.राज’, ‘विजय’, ‘ जय’ ‘वीरु’ आदि। कुछ फिल्मों में मुस्लिम नाम आए ,जैसे ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘कुली’, ईसाइ रुप में ‘अमर अकबर एंथोनी’, ‘नसीब’ ,हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई के रुप में ‘जान जानी जनार्दन’ आयी,किंतु पुरानी फिल्मों में जाति पहचान नहीं थी।
    आर्थिक उदारीकरण आने के बाद फिल्मों में ‘राहुल’ और ‘प्रेम’ जैसे नायकों का चरित्र जाति और क्षेत्रीय पहचान को लेकर आता है,टिपिकल मल्होत्रा और खन्ना सामने आते हैं,समृद्ध पंजाबी के रुप में क्षेत्रीय पहचान सामने आती है। नायिका के रुप में ‘सिमरन’, ‘अंजलि’ सामने आती हैं और उनके साथ ओबेराय और ग्रेवाल जाति पहचान भी सामने आती है।
 पुराने हीरो के पास अतीत की स्मृतियां थीं जिनकी उसे जब याद आती थी तो वह प्रतिवाद करता था,बदला लेता था,हिंसा करता था,इसी तरह नायक-नायिका में अमीर-गरीब का बायनरी अपोजीशन भी था। सजनी अमीर साजन गरीब का फार्मूला खूब चला। गरीब हीरो में संपदा के प्रति घृणा का भाव था। हीरो यदि अमीर होता था तो उसकी सहानुभूति गरीबों के प्रति हुआ करती थी। कहने का तात्पर्य यह है कि गरीब और गरीबी का संदर्भ फिल्मी कथानक का अनिवार्य हिस्सा था। लेकिन अब ऐसा नहीं होता। 
    नव्य उदारीकरण के  नायकों के खान बंधुओं की त्रिमूर्ति ने (शाहरुख,आमिर, सलमान) ने नया आख्यान रचा है। इसमें गरीब,किसान,मजदूर और गरीबी गायब है। ये ऐसे नायक हैं जिनका कोई अतीत नहीं है। नया हीरो गुस्सा नहीं करता,पर्तिवाद नहीं करता। ‘राहुल’ और ‘प्रेम’ को कभी गुस्सा नहीं आता। बल्कि जिससे गुस्सा करना चाहिए उससे सामंजस्य बिठाने पर ज्यादा जोर है। इन्हें सामाजिक असमानता परेशान नहीं करती। नए नायक का कोई इतिहास नहीं है,बचपन नहीं है। पुरानी स्मृतियां नहीं हैं। उसकी वैभव और संपदा से भरी जिंदगी है। चूंकि नए हीरो के पास अतीत की स्मृतियां नहीं हैं अतः उसे गुस्सा भी नहीं आता। उसका कोई इतिहास नहीं है। फलतः इतिहास के प्रति इसके अंदर केयरिंग का भाव भी नहीं है।
   ‘लगान’ फिल्म अपवाद है और उसमें भी ‘क्रिकेट राष्ट्रवाद’ को भुनाना प्रधान लक्ष्य है। इस फिल्म की जनप्रियता का दूसरा बड़ा कारण है संगीत। सामयिक सिनेमा में गोविन्दा अकेला नायक है जो लुंपन सर्वहारा का रुपायन करता नजर आता है।
     नई फिल्मों में आप्रवासी सभ्य ,सुसंस्कृत और संस्कारी है। गॉव के लोग बर्बर, असभ्य और खून के प्यासे चित्रित किए जा रहे हैं। इसे ‘शक्ति’ फिल्म में देख सकते हैं।
 (हैदराबाद स्थित अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के हिन्दी और भारतीय अध्ययन विभाग के द्वारा आयोजित सेमीनार सिनेमा और संस्कृति विषय पर जगदीश्वर चतुर्वेदी के भाषण पर आधारित) 







रविवार, 28 मार्च 2010

माध्यम और सामाजिक सरोकार - पीटर गोल्डिंग


       तकनीकी क्षेत्र में तेजी से आ रहे परिवर्तनों ने परंपरित जीवनशैली पर इनके प्रभावों को लेकर काफी आलोचना और आशंका पैदा की। कोई आश्चर्य नहीं कि सर्वाधिक नए माध्यम को भी उसी भर्त्सनामूलक आलोचना के नजरिए से देखा गया। टेलीविजन के एक आरंभिक आलोचक ने अपना अनुभव इन शब्दों में लिखा है-
     ''आणविक बमों के बुखार से पीड़ित इस दुनिया में जो बहुत भयावह ढंग से शांति और युद्ध के बीच संतुलन बनाए हुए है, एक नया ख़तरा पैदा हुआ है , टेलीविजन का ख़तरा-अणु के जेकिल और हाईड, एक ऐसी ताकत जो संस्कृति और मनोरंजन के क्षेत्र में क्रांति पैदा कर दे, जो एक ही साथ विनाश का दानव भी है और उसका निषेधक भी।''
      माध्यम के इस तकनीकी पक्ष के प्रति जागरुकता और भी ज्यादा गहराई से प्रसारण के साथ जुड़ी हुई है। यद्यपि तकनीक नएपन के प्रति लगाव सिनेमा के आरंभिक इतिहास का महत्वपूर्ण पक्ष रहा है। शायद इसकी जड़ें और भी गहरी हैं, उदाहरण के लिए, औद्योगीकरण के विरुद्ध लोकप्रिय विद्रोहों के रूप में। नई तकनीक ने कार्य और अवकाश दोनों में बदलाव किया है लेकिन दोनों के बीच का संबंध बहुत महत्वपूर्ण है कम से कम दोनों में से किसी भी क्षेत्र में किसी भी प्रकार के वैज्ञानिक अन्वेषण के प्रभाव के संबंध में तो हैं ही।

सरोकार का दूसरा क्षेत्र जनमाध्यमों की विचारों और विश्वासों को प्रभावित करने और व्यवहार को अपनी तरफ मोड़ने की संभावित क्षमता है। जनसंचार का कर्नेल मॉडल जिसमें कुछ लोग बहुसंख्यक को असीम शक्ति और दण्डमुक्ति के भाव से भरकर संबोधित करते हैं, ने इस तरह के शोधों को जन्म दिया है जिसमें फुसलानेवाले संचार के खतरे और प्रभावों पर जोर है। केन्द्रीय समस्या के रूप में प्रोपैगैण्डा और विज्ञापन को रखा गया। युद्ध के दौरान के अधिकतर शोध आक्रामक प्रोपैगैण्डा के प्रभावों की खोज और इससे लड़ने के बेहतर तरीकों के अन्वेषण में लगे हुए थे। इस तरह के शोधों ने विशेष तौर पर अमेरिका में, बाद के कामों पर दूरगामी प्रभाव डाला जबकि इस देश में भगवान 'हॉ-हॉ' की लोकस्मृतियों और माहौल में व्यापत 'जरूरत के समय में दोस्त' बनाने के चलन ने जिसे बी बी सी ने अपने युद्धकालीन प्रसारणों की नीति बना रखी थी , ने बहुत आगे चलकर प्रसारण के प्रभाव और खतरों की व्याख्या करनेवाले विमर्शों के ढर्रे को बदला।

इसी तरह से विज्ञापन उद्योग के विकास और इसके द्वारा माध्यमों के प्रयोग ने लोकप्रिय रवैय्ये में संभावित परिवर्तन को लेकर एक तनाव की स्थिति पैदा की। इनमें छद्म जरूरतों का निर्माण और भौतिकवाद, धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा और आम जनता के बड़े हिस्से में तुलनात्मक रूप से वंचित होने का बोध शामिल था। डेनीस थॉम्सन जो इस दृष्टिकोण के आरंभिक व्याख्याकार थे और जिन्होंने हाल के वर्षों में इसे बिना किसी घालमेल के फिर जोर देकर दोहराया-''विज्ञापन उपभोक्ताओं की समनुरूप संख्या के बारे में आश्वस्त करता है। ऐसा वह प्रेस और टी वी के ऊपर नियंत्रण के जरिए करता है। इसकी आचार संहिता बहुत जोरदार ढंग से संचार के समूचे तंत्र को आवृत्त करती है। यथास्थिति के सिध्दान्त के अनुकूल इसका लक्ष्य हमारे जीवन को नियंत्रित करना और हमें उपभोक्ता दौड़मशीन (कंज्युमर ट्रेडमिल) पर लगाए रखना है।''

इस तरह की भावनाओं ने विज्ञापन ,उसकी आचार संहिता, उसकी कृत्रिमता पर किए जा रहे हमले को सीमित कर दिया। बजाए इसके कि माध्यमों में इसके बढ़ते प्रभाव को कम करके दिखाए। जहाँ तक प्रोपैगैण्डा का सवाल है इसके शोधों का उद्देश्य हमले का निशाना बन सकने वाले 'खलनायकों' पर से ध्यान हटाकर 'पीड़ित' पर ध्यान केन्द्रित करना है।

सांस्कृतिक आलोचना की लंबी परंपरा से निकलकर एक तीसरा बृहत्तर सरोकार उभरता है जिसका संबंध मैथ्यू अर्नाल्ड, टी एस इलियट और एफ आर लेविस के लेखन से जुड़ता है , जिनका भय यह था कि सांस्कृतिक मिलावट निश्चित रूप से स्तरहीनता को जन्म देगा, अवकाश के बढ़े अवसर तुच्छ जन मनोरंजन के द्वारा बर्बाद किए जा रहे हैं और अंग्रेजी संस्कृति के जरिए इन्हें रोका जा सकता था लेकिन नए माध्यम के द्वारा न केवल इनकी उपेक्षा की जा रही है बल्कि इनके लिए ख़तरा भी पैदा किया जा रहा है। शोध कार्यों का एक बड़ा हिस्सा इन प्रवृत्तियों से लड़ने के तरीके खोजने में लगा है जो इस बात की तसदीक करता है कि ये प्रवृत्तियाँ मौजूद रही हैं।

विश्वास की एक और बेचैन प्रक्रिया है जो माध्यमों के प्रभाव को लेकर सशंकित है। वैकल्पिक अवकाश के साधनों के अभाव में माध्यमों के समक्ष अधिकतम अरक्षण (एक्सपोजर) के कारण अथवा अज्ञानता या अपरिपक्वता के कारण या अस्वाभाविक असुरक्षा की वजह से इन समूहों को विशेष तौर पर संरक्षा की जरूरत है। बच्चे और कामगार वर्ग दोनों समूह इस भूमिका में आन्तरायिक भाव से अनूकूल बैठते हैं।

बच्चों के लिए सरोकारों की झलक अमेरिका के फ्रेडरिक वर्थैम्स की महत्वपूर्ण शोध कृति 'द सेडक्शन ऑफ द इनोसेन्ट'[1] में विस्तार क साथ दिखाई देती है। इन सरोकारों में नया कुछ नहीं है। जॉन टाबियस ने 19 वीं शती में बाल अपराधों के बारे में लिखते हुए कहा कि '' जैक शिफर्ड, डिक टर्पिन और अन्य अपराध नायकों का लोकप्रिय कल्पना पर प्रभाव ऐसा था कि वे लगभग 19 वीं शती तक अनुश्रुति का हिस्सा बन चुके थे। समसामयिकों ने पाया कि उनके नाम और दुस्साहसिक कारनामे अधिकतर बच्चों को मालूम थे जबकि उन्हें इ्रंगलैण्ड की महारानी विक्टोरिया का नाम नहीं पता था। ''

एक जेल का प्रशासक इन छोटे बच्चों के अपराध के बारे में बिना किसी हिचक के कहता है ''ये उनके सिक्के के नंबर हैं जिनकी मैं गिनती करता हूँ, महोदय।''

न केवल बच्चों की गतिविधियों पर जनमाध्यमों के बढ़ते प्रभाव , उनके आपराधिक व्यवहार, स्कूल के काम, उनके अवकाश के समय पर माध्यमों का एकाधिकार आदि की तरफ ध्यान गया बल्कि सामान्यतया उनकी आस्थाओं , सेक्स के प्रति उनका रवैय्या, नैतिकता पर भी चर्चा हुई। 1960 के मध्य में 'राष्ट्रीय दर्शक और श्रोता' नाम से स्थापित संस्था जो अपने उत्साही सचिव मेरी व्हाइटहाउस के आलोचनात्मक दृष्टिकोण से खासा प्रभावित थी, ने हमेशा प्रसारण के बच्चों पर तथाकथित घातक प्रभावों को अपने प्रचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। श्रीमती व्हाइटहाउस ने बारंबार दोहराया कि कैसे टेलीविजन के बच्चों के कामुक व्यवहार पर पड़नेवाले असर के संबंध में उनकी खोज ने उन्हें 'वाला' जैसी संस्था शुरु करने के लिए उत्प्रेरित किया।

इसी तरह की चिंता भोले, कम पढ़े और सुसंस्कृत माध्यम उपभोक्ताओं को लेकर माध्यम के व्यवहार में और बाद के शोधों में दिखाई देती है। लॉर्ड रीथ, बी बी सी का पहला महानिदेशक, माध्यमों को लोकप्रिय शिक्षण और नैतिक उत्थान के औजार के रूप में ,कम से कम कला के क्षेत्र में नहीं देखे जाने का असली व्याख्याकार बन गया। रीथ ने 1924 में लिखा, '' वर्षों से, सड़क का आदमी ऐसे संगीत से संतुष्ट होता रहा है जो आसानी से और तुरंत घुलमिल जाता है और इसीलिए हमेशा बेहतर नहीं होता।'' सेंसरशिप की भूमिका को लेकर तर्क-वितर्क कई बार सांस्कृतिक सुसभ्यता और जनसंचार की दुर्बलता के विपरीत संबंधों पर जोर देते हैं, सेंसरशिप को कीमत के स्तर पर औचित्यपूर्ण ठहराने अथवा बड़े पैमाने पर निष्क्रिय कर दी गई सामग्री के लिए एक सावधान नियंत्रण को बरतने की आवश्यकता के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है।
( पुस्तक अंश- पुस्तक का नाम- जनमाध्यम, लेखक पीटर गोल्डिंग,अनुवाद-सुधा सिंह,प्रकाशक, ग्रंथ शिल्पी,बी-7,सरस्वती कामप्लेक्स,सुभाष चौक,लक्ष्मीनगर,दिल्ली-110092,मूल्य-325रुपये)

चीन और अमेरिका संबंधों का नया पैराडाइम-अरुण माहेश्वरी

     सरसरी तौर पर यह साफ दिखाई देता है कि चीन और अमेरिका की अर्थव्यवस्थाएं आपस में पूरी तरह से गुथ गयी है। चीन का विकास उसके निर्यात पर निर्भर है और उसके निर्यात का काफी बड़ा हिस्सा अमेरिका जाता है। 2001 में चीन का निर्यात उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 20 प्रतिशत था, जो 2007 तक बढ़ कर 36 प्रतिशत होगया। देशों के समूह के तौर पर निश्चित तौर पर यूरोपियन यूनियन उसके मालों का सबसे बड़ा ग्राहक है, लेकिन अकेले एक ग्राहक के रूप में अमेरिका का ही स्थान अव्वल है। इसके अलावा, अमेरिका को आपूर्ति करने वाले देशों में कुछ अर्से पहले तक कनाडा सबसे आगे था, लेकिन अब उसका स्थान चीन ले चुका है। चीन ही आज अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों का सबसे बड़ा खरीदार और मालिक है। पहले यह स्थान जापान को प्राप्त था। 2008 के बाद से चीन अब उससे आगे चला गया है। हाल के अमेरिकी संकट में अगर किसी देश ने अमेरिका के लिये सबसे बड़े त्राणदाता की भूमिका अदा की तो वह चीन ही था। अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद के जरिये चीन अमेरिका को ऋण देने वाला आज सबसे बड़ा देश बन चुका है।
चीन और अमेरिका के संबंधों को लेकर अभी जिसप्रकार का चित्र बनता है, उसमें लगता है जैसे अमेरिका चीन में बने सामानों को खरीद रहा है और चीन अमेरिका की सरकारी प्रतिभूतियों को। एक विकासशील देश चीन एक धनी देश अमेरिका को खर्च करने के लिये उधार दे रहा है। इसके एवज में अमेरिका चीन में बने सामानों को खरीद कर उधार में आए डालर को फिर से चीन को सौंप देता है और यही डालर फिर कर्ज के तौर पर अमेरिका के पास आ जाता है। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदार देश है और चीन सबसे बड़ा कर्जदाता। सवाल उठता है कि क्या ऐसी कोई चीज लंबे समय तक चल सकती है? साधारण बुद्धि से सोचने पर यह सारा मामला कुछ अजीब सा, उटपटांग जान पड़ता है। ओबामा के आर्थिक सलाहकार लारेंस समर्स ने किसी समय अमेरिका और उसके विदेशी कर्जदाताओं के संबंधों को वित्तीय आतंक का संतुलनकह कर परिभाषित किया था। चीन का प्रमुख अंग्रेजी सरकारी दैनिक पिपुल्स डेलीलिखता है कि चीन के हाथ में भारी मात्रा में अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों के होने का अर्थ यह है कि वह कभी भी डालर की एक आरक्षित मुद्रा की हैसियत को खत्म कर सकता है। लेकिन साथ ही वह यह कहने से भी नहीं चूकता कि यह स्थिति वस्तुत: निश्चित परस्पर विनाश पर आधारित शीत युद्धकालीन गतिरोध का विदेशी मुद्रा संस्करण है। अर्थात, दोनों ही यह मान कर चल रहे हैं कि जो आज चल रहा है, उसके अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है। दूसरा विकल्प सिफ‍र् परस्पर विनाश है।
चीन अमेरिका संबंधों के इस जटिल और अबूझ से रूप को देखकर ही अब कुछ भविष्यद्रष्टाइन दोनों अर्थव्यवस्थाओं की परस्परनिर्भरशीलता के बजाय इनकी अनिवार्य जुदाई की बात भी कहने लग गये हैं। हार्वर्ड के प्रसिद्ध इतिहासकार नियाल फगु‍र्सन एक समय में जिस चीज को चिमेरिका कह कर प्रचारित कर रहे थे, वे ही अब इसे एक ऐसा विवाह बंधन बताने लगे हैं जिसका अंत विछोह के अलावा और कुछ नहीं हो सकता।

इसी सिलसिले में चीन और अमेरिका के बीच चीनी मुद्रा युआन के विनिमय मूल्य को लेकर इधर जो थोड़ी नोकझोंक चल रही है, उसकी तह में जाना काफी उपयोगी होगा। यह बात जग जाहिर है कि चीन और अमेरिका के बीच व्यापार संतुलन काफी अधिक बिगड़ा हुआ है। चीन के साथ अमेरिका के व्यापार घाटे में पिछले दिसंबर महीने में 18.14 बिलियन अमेरिकी डालर की वृद्धि हुई, जबकि इस जनवरी महीने में यह वृद्धि 18.3 बिलियन डालर हुई। अमेरिका इसके लिये अक्सर चीन को कोसता है कि उसने अपनी मुद्रा युआन की विनिमय दर को कृत्रिम ढंग से काफी कम कर रखा है, जिसकी वजह से अमेरिकी बाजार में चीनी सामानों को अनुचित लाभ मिल रहा है और अमेरिका का चीन के साथ व्यापारिक घाटा बढ़ता जा रहा है।
12 मार्च को राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अमेरिकी निर्यातआयात बैंक के वार्षिक सम्मेलन में अमेरिका के बढ़ते हुए व्यापार घाटे के संदर्भ में जोर देकर कहा कि फिर से व्यापार संतुलन को कायम करने में चीनी मुद्रा युआन की विनिमय दर को बाजार पर आधारित किया जाना एक महत्वपूर्ण कदम होगा। ओबामा के इस वक्तव्य के दूसरे दिन ही चीन के केंद्रीय बैंक, पिपुल्स बैंक आफ चायना के उपराज्यपाल सू निंग ने उन्हें तुर्की दर तुर्की जवाब देते हुए  कहा कि युआन के मूल्य के प्रश्न का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। युआन की विनिमय दर को बढ़ाना चीन और अमेरिका के बीच व्यापार संतुलन की समस्या का समाधान नहीं है। सू निंग की दलील थी कि सन् 2005 के जून महीने में डालर के दामों को अस्थिर कर दिये जाने के बाद से युआन की दर 20 प्रतिशत से अधिक बढ़ गयी है। 2002 से लेकर 2008 के बीच अमेरिकी डालर की कीमत सालाना तीन प्रतिशत की दर से कम हुई थी। लेकिन इसी दौरान अमेरिकी व्यापार घाटा 500 बिलियन डालर से बढ़ कर 900 बिलियन डालर होगया। अर्थात, डालर के कमजोर होने से अमेरिकी घाटे में कोई कमी नहीं आयी है।


इसी सिलसिले में निंग ने अमेरिका के इस व्यापार घाटे के दूसरे रहस्यों पर से पर्दा उठाते हुए जिन तथ्यों का उल्लेख किया, वे चीन और अमेरिका के बीच के व्यापार की वास्तविकता और इन दोनों अर्थव्यवस्थाओं के संबंधों को जानने की दृष्टि से महत्वपूर्ण कहे जा सकते हैं। उन्होंने बताया कि चीन के पक्ष में व्यापार संतुलन का अर्थ सिफ‍र् चीन की अर्थव्यवस्था को लाभ नहीं समझा जाना चाहिए। सचाई यह है कि चीन के अधिकांश निर्यातकों में विदेशी पूंजी लगी हुई है। चीन के वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार पिछले वर्ष चीन के विदेश व्यापार में निवेश का 55.2 प्रतिशत विदेशी है और 56 प्रतिशत निर्यात चीन में स्थित विदेशी कंपनियों ने किया है। चीन को इस व्यापार से जो मामूली मुनाफा होता है उसका अधिकांश विनिर्माण की श्रंखला के अंतिम चरण से आता है। जबकि, अमेरिका खुद उत्पाद की डिजाइन और उसके वितरण से अच्छा खासा मुनाफा ले लेता है। इस बात को ठोस उदाहरण से समझने के लिये कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता की इस रिपोर्ट पर गौर किया जा सकता है, जिसके अनुसार एक 30 गिगाबाईट के विडियो आईपॉड पर 299 अमेरिकी डालर की लागत में से 163 डालर अमेरिकी कंपनियों और मजदूरों को मिलते हैं, तथा 132 डालर दूसरे एशियाई देशों के कलपुर्जे निर्माताओं को, जबकि चीन में, जहां उसे अंतिम रूप से तैयार किया जाता है, इसका सिफ‍र् 4 डालर भुगतान किया जाता है। चीन के मजदूरों द्वारा आईपॉड के निर्माण में सिफ‍र् एक प्रतिशत का योगदान किये जाने पर भी चीन से अमेरिका को होने वाले निर्यात में इसके चलते 150 डालर का योगदान होता है, अर्थात चीनअमेरिका के बीच व्यापार संतुलन में एक आईपॉड 150 डालर का योगदान करता है।
इसीलिये आज भी चीन और अमेरिका की अर्थव्यवस्था को बराबरी के दर्जे पर रखना एक बड़ा भ्रम है। बाजार विनिमय दरों के आधार पर चीन की अर्थव्यवस्था अभी भी अमेरिका से एक तिहाई है। उसका प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पादन अमेरिका के प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद का चौदहवां हिस्सा भर है। अमेरिका का प्रतिरक्षा बजट चीन से छ: गुना है। जहां तक सरकारी प्रतिभूतियों का सवाल है, चीन के लिये यह संभव नहीं है कि वह उसे बाजार में छोड़ सके। डालर की कीमत के गिरने से सबसे अधिक नुकसान चीन को ही होगा। इसीलिये जो लोग आज दोनों को बराबर के वजन वाला बताकर जी 2 की बात करते हैं, वह सच से कोसों दूर, कुछ खास गरज से एक राजनीतिक भ्रम फैलाने की बात के अलावा और कुछ नहीं है। और यही वह बिंदु है जिसकी ओर इशारा करना यहां हमारा अभीष्ट है। 

उपरोक्त विश्लेषण से एक बात साफ है कि चीन की अर्थव्यवस्था के लिये निर्यात में अभिवृद्धि महत्वपूर्ण होने पर भी उतनी अधिक महत्वपूर्ण नहीं है जितनी आम तौर पर समझा जाता है। निर्यात की राशि में चीन के द्वारा जोड़े गये मूल्य का अंश उसके जीडीपी का बहुत छोटा सा हिस्सा है। अमेरिका में खपने वाले अधिकांश मालों का ज्यादातर हिस्सा अन्य स्थानों पर निर्मित होता है। युआन के विनिमय मूल्य पर नियंत्रण और डालर से अमेरिकी प्रतिभूतियों की खरीद के जरिये वह  अपने निर्यातकों की मदद करता है। बदले में अमेरिका में ब्याज की दर नियंत्रित रहती है और अमेरिकी उपभोक्ता की खर्च की आदत बनी रहती है। लेकिन, मूल सचाई यह है कि चीन के विकास की असली चालक शक्ति वहां होने वाला निवेश ही है।
इस समूचे उपक्रम में जिस बात पर नजर रखने की जरूरत है वह है चीन और अमेरिका के बीच विकसित की जा रही एक प्रकार की रणनीतिक समझ और साझेदारी। चीन आज की दुनिया में पूंजीवाद के बरक्स सोवियत संघ की तरह कोई समाजवादी विकल्प नहीं पेश कर रहा है। दुनिया के गरीब और विकासशील देश उससे कोई विशेष उम्मीद नहीं रख पारहे हैं। चीनी विशिष्टता वाला समाजवाद अमेरिकी विशिष्टता वाला पूंजीवाद जैसा प्रतीत हो रहा हैइस बात को कहने वालों की कमी नहीं है। अमेरिकी सरकार की हरचंद कोशिश इस बात की है कि कैसे चीन को अपनी समग्र विश्व रणनीति का अंशीदार बनाया जाए। अमेरिकी पत्रपत्रिकाओं में चीन की सारी लानतमलामत के बाद भी पूरा जोर इस बात पर रहता है कि जलवायु परिवर्तन से लेकर आर्थिक पुनर्बहाली तक, सभी मामलों में दुनिया के इन दोनों देशों के बीच एक प्रकार का सामंजस्य कायम हों। चीन और अमेरिका की बराबरी की बात कहने वालों के बारे में अमेरिका के पूर्व ट्रेजरी अधिकारी अलबर्ट कीडेल कहते हैं कि दोनों अर्थव्यवस्थाओं में बराबरी करने का कोई तुक नहीं है, फिर भी चीन को यह जताने के लिये कि वह हमारा भागीदार है और इसीलिये उसकी कुछ जिम्मेदारियां है, और हम जिस चीज को महत्वपूर्ण समझते हैं, उसे उस बात को सुनना चाहिए, इस बात में कुछ सार है।

ओबामा ने इसी बीच चीन के साथ हाथ मिलाने के लिये रणनीतिगत और आर्थिक संवाद का एक सालाना मंच बनाया है, जिसकी पहली बैठक वाशिंगटन में पिछले जुलाई महीने में हुई थी। इस मंच का मूल उद्देश्य यह है कि दोनों देशों के प्रमुख नीति निर्धारक आपस में मिले और उनके सामने जो समस्याएं है उनपर बात करें। ओबामा के शब्दों में, इसप्रकार के प्रयोग को निरर्थक नहीं समझा जाना चाहिए।
भ्रम को बनाये रखने के लिये अमेरिकी पत्रिकाएं यह जरूर कहती है कि चीन और अमेरिका हमबिस्तर होकर भी अलगअलग सपने देखते हैं। शासन की किसकी प्रणाली ज्यादा सही और कारगर है, इसकी प्रतिद्वंद्विता में वे लगे हुए है। लगभग तीन दशक से भी ज्यादा समय पहले जब देंग ज्याओ पिंग ने चार आधुनिकीकरण के नारे के साथ चीन के तीव्र विकास की एक समग्र नीति अपनायी थी, तभी उन्होंने यह भी कहा था कि चीन को विकसित देश बनाने की प्रक्रिया में चीन समाजवादी रहेगा या पूंजीवादी, यह बात आने वाले पचास वर्षों बाद ही तय होगी। विश्व रणनीति की सही समझ को विकसित करने के लिये चीन और अमेरिका के बीच इस निरंतर विकासमान घटनाचक्र पर नजर रखने की जरूरत है।



फिल्मी संस्कृति की प्रमुख चुनौतियां- 3-

     मासकल्चर के उत्पादन का सबसे बड़ा कारखाना है सिनेमा। सिनेमा का संस्कृति के उत्पादन से कम और मासकल्चर के उत्पादन से ज्यादा संबंध है। भारत में सिनेमा निर्माण के 5 केन्द्र है,ये हैं-मुम्बई,मद्रास,हैदराबाद,कोलकाता और बैंगलौर। ये पांचों केन्द्र धीरे-धीरे माध्यम साम्राज्यवाद के दायरे में कैद होते चले जा रहे हैं। हाल ही में जारी ‘माई नेम इज खान’फिल्म की सफलता और इसके पहले की सफल फिल्मों और फिल्म उद्योग में देशी-विदेशी इजारेदार और बहुराष्ट्रीय पूंजी के निवेश और निरंतर फैलते साम्राज्य को ध्यान से देखें तो हमें फिल्म उद्योग में आ रहे परिवर्तनों और संकट का सही ढ़ंग से आभास मिल सकता है।
    एक जमाना था हिन्दी सिनेमा में पूंजी निवेश देशी था,इसमें वैध-अवैध दोनों ही किस्म का पैसा लगा था। यह सारा पैसा गैरइजारेदार घरानों का था। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे लुंपन पूंजीपति या समानान्तर अर्थव्यवस्था कहते हैं या ब्लैकमनी भी कहते हैं। आज यह स्थिति नहीं है। आज सिनेमा उद्योग में अनिल अम्बानी से लेकर रुपक मडरॉक का पैसा लगा है। यह मूलत:ग्लोबलाइजेशन की विश्वव्यापी प्रक्रिया का हिस्सा है। देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों का फिल्म उद्योग में पूंजी निवेश भारतीय सिनेमा उद्योग की प्रकृति में आ रहे मूलगामी परिवर्तनों का द्योतक है।
        कारपोरेट घराने फिल्म निर्माण के साथ सिनेमाघरों की खरीद पर भी जोर दे रहे हैं। इस ग्रुप ने विदेशों में भी सिनेमाघर खरीदने पर जोर दिया है।अमेरिका,ब्रिटेन आदि देशों में इस ग्रुप ने कई सिनेमाघर खरीदे हैं। इसके अलावा स्पिलवर्ग की कंपनी ‘ड़्रीमवर्क’ के साथ समझौता किया है जिसके अनुसार अंबानी ग्रुप 825 मिलियन डॉलर निवेश करेगा। इससे स्पिलवर्ग 6 फिल्में बनाएंगे। अनिल अंबानी की कंपनी ने 2009-10 में 350 करोड़ रुपये फिल्म निर्माण पर खर्च करने का फैसला किया था। इसके तहत 15 फिल्में बननी थीं, जिनमें 8 हिंदी और बाकी क्षेत्रीय भाषाओं  -जैसे तमिल, भोजपुरी, बांग्ला,मलयालम,पंजाबी - की फिल्में बननी थी।
         विश्व विख्यात अमेरिकी वित्तीय संस्था जेपी मॉर्गन ने पीवीआर पिक्चर में 60 करोड़ रुपये निवेश करने का फैसला लिया है। भारत सरकार ने 250 करोड़ रुपये निवेश करने का फैसला लिया है। यह पैसा मूलतः एनीमेशन फिल्मों के निर्माण,गेमिंग और विजुअल प्रभाव के म्यूजियम के निर्माण पर खर्च किया जाएगा।   
     भारतीय रिजर्ब बैंक ने भी बैंकों से फिल्म निर्माण के लिए कर्ज मुहैय्या कराने का प्रावधान किया है,मजेदार बात यह है कि रिजर्ब बैंक ने कर्ज के नियम कारपोरेट घरानों के फिल्म उद्योग में आने के पहले नहीं बनाए। बैंकों में एक्सिम बैंक सबसे ज्यादा कर्जा दे रही है। इसके अलावा बीमा कंपनियां भी फिल्मों का बीमा कर रही हैं। इससे फिल्मों का सही समय पर निर्माण करने में मदद मिल रही है। साथ शेयर और बॉण्ड के जरिए भी फिल्म निर्माण के लिए बाजार से पैसा उठाया जा रहा है। इस तरह से पैसा जुगाड़ करने वाली कई वित्तीय संस्थाएं सामने आ गयी हैं। कहने का मतलब यह है कि हिन्दी सिनेमा का अर्थशास्त्र बुनियादी तौर पर बदल गया है। यह लुंपन अर्थशास्त्र से कारपोरेट पूंजी के राजनीतिक अर्थशास्त्र में रुपान्तरण की बेला है। इसका फिल्म के दर्शक,कहानी, नायक- नायिका और समाज के प्रति बदले नए नव्य-उदारतावादी ग्लोबल सरोकारों के साथ गहरा संबंध है।    
    भारत का फिल्म उद्योग बहुभाषी है। भारत की 20 भाषाओं में प्रतिवर्ष 1000 से ज्यादा फिल्में रिलीज होती हैं, सालाना इससे ज्यादा फिल्में तैयार होती हैं। भाषायी फिल्में अपने ही राज्यों में सीमित प्रचार-प्रसार पाती हैं, एकमात्र हिन्दी सिनेमा है जो गैर हिन्दी राज्यों और विदेशों में भी अपना प्रसार करने में सफल रहा है। इसके अलावा हॉलीवुड की फिल्मों का नव्य-उदारीकरण के दौर में व्यापक बाजार टेलीविजन से लेकर सिनेमा हॉल तक तैयार हुआ है।
     सारी दुनिया में 10 करोड़ लोग प्रति सप्ताह 13,000 सिनेमाघरों में मुम्बई सिनेमा देखते हैं।उल्लेखनीय है बॉम्बे को मुंबई नाम 1995 में दिया गया। फिक्की और केपीएमजी के द्वारा तैयार रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि बॉक्स ऑफिस और सिनेमा से होने वाली अन्य किस्म की आमदनी में बहुत ज्यादा उछाल आने की संभावना नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार सन् 2009 में फिल्म उद्योग 2.2 बिलियन डॉलर (109.2 करोड़ रुपये) का कारोबार करेगा। केबल और सैटेलाइट पर फिल्मों की बिक्री में भी गिरावट आएगी। इसके बावजूद फिल्म उद्योग की सालाना विकासदर सन् 2013 तक 9.1प्रतिशत रहने की संभावना है। इसका अधिकतम व्यापार 3.4 बिलियन डॉलर (168-6बिलियन रुपये) तक जाने की संभावना है। भारत में इस समय 50 से बड़ी फिल्म निर्माता कंपनियां हैं।
    फिल्म निर्माण के बारे में यह मिथ है कि बड़े बजट की फिल्म ज्यादा कारोबार करती है, यह सच नहीं है, बड़े बजट और बड़े स्टार की फिल्मों की फ्लॉप दर ड्यादा है। कम बजट और बड़े स्टार के बिना बनने वाली फिल्मों का सफलता दर बेहतर रही है।
    फिल्म उद्योंग में देशी-विदेशी इजारेदार घरानों के पूंजी निवेश के बाद भारतीय सिनेमा का चरित्र पूरी तरह बदल गया है। इसी तरह आइनॉक्स वगैरह में तैयार हुए नए टाइप के सिनेमाघरों में बड़ी पूंजी का निवेश हुआ है। पहलीबार फिल्म उद्योग का समग्रता में बड़ी पूंजी के पैराडाइम में रुपान्तरण हुआ है। नव्य-उदारीकरण के पहले तक भारतीय सिनेमा गैर कारपोरेट-लंपट पूंजी के खेल में फंसा हुआ था, फलत: सिनेमा तकनीक का विकास नहीं हो पाया, कारपोरेट पूंजी के पैराडाइम में जाने के कारण फिल्म निर्माण की उच्च तकनीक और हॉलीवुड के हुनरमंद निर्देशकों का भी उसे तजुर्बा हासिल होता। विचारणीय सवाल यह है कि भारतीय बैंकों ने फिल्म उद्योग की तरफ नव्य-उदारतावाद के पहले रुख क्यों नहीं किया ?
   एक अन्य फिनोमिना यह भी है कि हॉलीवुड में पूंजी का अभाव है, इसके कारण भी हॉलीवुड के निर्माता भारतीय पूंजी और मध्य-पूर्व के तेल उत्पादक देशों की ओर भाग रहे हैं। मध्य-पूर्व और भारत के बड़ी पूंजी के खिलाड़ी जिस गति से मीडिया उद्योग में पूंजी निवेश कर रहे हैं उससे माध्यमों की दुनिया में तीसरी दुनिया का वर्चस्व बढ़ेगा। हॉलीबुड कमजोर होगा और मीडिया मुगलों के कारोबार पर भी असर होगा, यह असर विश्वव्यापी होगा। बुनियादी तौर पर इससे माध्यम साम्राज्यवाद से तीसरी दुनिया के मीडिया अन्तर्विरोध तेज होंगे।          
      फिल्म उद्योग अब इजारेदार पूंजी के पैराडाइम में दाखिल हो चुका है। खासकर 1995-96 के बाद से इस दिशा में प्रयास तेज हुए हैं। अब तक का फिल्म उद्योग का सारा विमर्श ‘लुंपन पूंजी’ पर चल रहा था,भूमंडलीकरण के बाद देशी-विदेशी इजारेदार पूंजी का प्रवेश हुआ है। इस प्रक्रिया का आरंभ नरसिंहाराव के शासनकाल में हुआ था। उस समय हॉलीवुड की फिल्मों के अबाध प्रवेश की अनुमति दी गयी,बाद में प्रिंट और इलैक्ट्रोनिक मीडिया में विदेशी पूंजी निवेश की अनुमति दी गयी।
    आमतौर पर पहले फिल्म उद्योग में भारत के पूंजीपतिवर्ग की कोई दिलचस्पी नहीं थी, किंतु दूरसंचार और इलैक्ट्रोनिक मीडिया को निजी क्षेत्र के लिए खोल देने के कारण इजारेदार पूंजी का मीडिया और दूरसंचार के क्षेत्र में जबर्दस्त निवेश हुआ है। इससे भारत का कई स्तरों पर सांस्कृतिक- राजनीतिक नुकसान हुआ है। मीडिया में इजारेदाराना केन्द्रीयकरण बढ़ा है। यह सारा खेल ज्यादा चैनल,ज्यादा खबरें,ज्यादा अभिव्यक्ति की आजादी, ज्यादा मनोरंजन के नाम पर हुआ है। हमें ठंड़े दिमाग से सोचना चाहिए कि क्या हमें इनमें से कोई भी चीज ज्यादा मिली है ? ज्यादा पाने के चक्कर में हम मीडिया के बुनियादी सवालों से कोसों दूर चले गए हैं। हमने अपनी सांस्कृतिक संप्रभुता को दांव पर लगा दिया है।
    आज हम खुश हैं कि ‘माई नेम इज खान’ ने बड़ा कारोबार किया, लेकिन हम भूल गए कि मुंबईया सिनेमा को इस प्रक्रिया में हमने हॉलीवुड के हवाले कर दिया है। आज हम मुंबईया सिनेमा की स्वायत्तता पर खतरे के बादल मंडराते नजर आ रहे हैं। भारत की फिल्में फ्लॉप हो रही हैं और हॉलीवुड की हिन्दी फिल्में भारत और भारत के बाहर हिट हो रही हैं।जो बाजार कल तक भारतीय सिनेमा के पास था उसे हॉलीवुड उठाकर लिए जा रहा है। यह प्रक्रिया दो तरह से चल रही है,एक तरफ भारतीय पूंजीपति हॉलीवुड में पैसा लगा रहा है दूसरी ओर हॉलीवुड कंपनियां सिनेमा निर्माण के क्षेत्र में आ रही हैं, सिनेमा थियेटरों को खरीद रही हैं। इस पूरी प्रक्रिया के क्या परिणाम निकलेंगे और किस तरह के अन्तर्विरोध पैदा हो रहे हैं इस पर वाम और दक्षिण दोनों ही चुप्पी लगाए बैठे हैं। मुंबईया सिनेमा में हॉलीवुड का दखल  बढ़ना हमारे सिनेमा उद्योग के भविष्य पर सवालिया निशान लगाता है। यह मूलतः सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की दिशा में लंबी छलांग है।   
     






फिल्मी संस्कृति की प्रमुख चुनौतियां- 2-

भारतीय सिनेमा में सांस्कृतिक संवाद का मूलाधार है आनंद। इसके तीन मुख्य तत्व हैं, ये हैं, भारतीय संस्कार, गाने और संगीत। ये तीनों ही तत्व मिश्रित संस्कृति का रसायन तैयार करते हैं। मिश्रित संस्कृति का संचार करने के कारण ही हिन्दी की फिल्में किसी भी विकसित और अविकसित पूंजीवादी मुल्क से लेकर समाजवादी सोवियत संघ तक में कई बार वर्ष की सर्वोच्च 10 या 20 फिल्मों में स्थान बनाती रही हैं। सांस्कृतिक बहुलतावाद की लोकतांत्रिक भावबोध के साथ जैसी सेवा हिन्दी सिनेमा ने की है वैसी सेवा हॉलीवुड भी नहीं कर पाया। यही वजह है कि बॉलीवुड का हिन्दी सिनेमा शीतयुद्ध के समय में हॉलीवुड के सामने चट्टान की तरह अड़ा रहा। पूरे शीतयुद्ध के दौरान हॉलीवुड सिनेमा ने दुनिया के अधिकांश देशों के सिनेमा उद्योग को बर्बाद कर दिया। किंतु भारत में उसे पैर जमाने में सफलता नहीं मिली।    
     द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दौर में भारत का एक बड़ा फिनोमिना है आप्रवासी भारतीय। इसमें विविध किस्म के भारतीय हैं और ये अमेरिका से दक्षिण अफ्रीका,मारीशस से कैरिबियन देशों ,मध्यपूर्व के देशों से लेकर समूचे यूरोप तक फैले हैं। इनमें भारत की जातीय-सांस्कृतिक विविधता साफ नजर आती है। हम यह भी कह सकते है कि भारतीय संस्कृति का इन लोगों के कारण विश्वव्यापी प्रसार हुआ है। यही वह बुनियादी कारक है जिसके कारण हिन्दी फिल्मों में आप्रवासी एशियाई संस्कृति की व्यापक अभिव्यक्ति होती रही है। आप्रवासियों का अपनी संस्कृति से प्रेम ही है जो ‘प्राचीन भारत’ से जोड़े रखता है। इस कार्य में भारत की फैंटेसी,संस्कार,यथार्थ,गाने आदि का व्यापक इस्तेमाल किया जाता है।
  उल्लेखनीय है आप्रवासी भारतीयों दोहरे दबाब में हैं,एक तरफ वे अपने काम की जगह पर आए दिन भेदभाव के शिकार होते रहते हैं और दूसरी ओर प्राचीन भारत की उम्मीदें उन्हें घेरे रहती हैं। यही वजह है कि आप्रवासी भारतीय भारत  में बनी फिल्में खूब देखते हैं, यह काम वे आजादी के पहले से कर रहे हैं। हाल के वर्षों में ग्लोबल भारतीय सिनेमा में वितरण, माइग्रेसन और स्थानीयतावाद का प्रवेश हुआ है।
    सिनेमा ने बड़े पैमाने पर साहित्य खासकर कथा साहित्य का उपयेग किया है। सिनेमा और उपन्यास के बीच किस तरह का आदान-प्रदान हो रहा है और हमें उसके कारण किस तरह के साहित्यिक परिवर्तनों को देखना पड़ा है यह चीज हमारी आलोचना की आंखों से ओझल रही है। हमारे आलोचकों ने सिनेमा के कथा साहित्य और सामान्यतः साहित्य पर पड़ने वाले प्रभाव की अनदेखी क्यों की यह तो वही जानें किंतु इस प्रसंग में कुछ बातों की ओर ध्यान खींचना चाहता हूँ।
     सिनेमा का सीधा प्रधान असर यह हुआ है कि कलाओं और साहित्य के प्रचलित वर्गीकरण गड़बड़ा गए हैं,अप्रासंगिक हो गए हैं। अब आधुनिकतावाद और आधुनिकता पर कोई भी बहस सिनेमा और इलैक्ट्रोनिक मीडिया के प्रभाव का अध्ययन किए बिना नहीं कर सकते। हिन्दी आलोचना में इस मसले पर जितनी भी बहस है वह सिर्फ साहित्य को केन्द्र में रखकर चली है,आधुनिकता के आख्यान के कारक तत्वों का एक बड़ा हिस्सा साहित्येतर संचार रुपों में विकसित होता रहा है। हम भूल ही गए कि सिनेमा ने आधुनिक संस्कार,आचार-व्यवहार और एटीट्यूट बनाने में केन्द्रीय माध्यम की भूमिका अदा की है।    
     




शनिवार, 27 मार्च 2010

फिल्मी संस्कृति की प्रमुख चुनौतियां- 1-

 (फिल्म अभिनेता शाहरुख खान)                         
 संचार तकनीक के द्वारा निर्मित वातावरण स्वभावत: ग्लोबल-लोकल होता है। यह धारणा फिल्मों के ऊपर भी लागू होती है। भारतीय फिल्मों का चरित्र और हॉलीवुड फिल्मों का चरित्र अनेक मामलों में भिन्न है। भारतीय सिनेमा का मूलाधार है वैविध्य और बहुलतावाद। जबकि हॉलीवुड सिनेमा की धुरी है इकसारता।   
     भारतीय सिनेमा में संस्कृति और लोकसंस्कृति के तत्वों का फिल्म के कथानक के निर्माण में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। जबकि हॉलीवुड सिनेमा के कथानक की धुरी है मासकल्चर। हॉलीवुड सिनेमा विश्वव्यापी अमरीकी ग्लोबल कल्चर के प्रचारक-प्रसारक की अग्रणी भूमिका अदा करता रहा है। जबकि भारतीय सिनेमा में पापुलरकल्चर के व्यापक प्रयोग मिलते हैं।
    हॉलीवुड-बॉलीवुड उद्योग की इस प्रकिया में भारतीय सिनेमा ने खिचड़ी फिल्मी संस्कृति का निर्माण किया है। उसने भारतीय फैंटेसी का व्यापक प्रचार-प्रसार किया है। भारतीय फिल्मी फैंटेसी के चार प्रमुख क्षेत्र हैं, प्रेम, परिवार -समुदाय, राष्ट्र और गरीब। इन चारों के कथानक,विवाद और नज़ारे सबसे ज्यादा रचे गए हैं। भारतीय सिनेमा में भाषायी वैविध्य है साथ ही इसे अपने लिए देश और विदेश दोनों में स्थान बनाना होता है। इसके कारण सिनेमा में भाषायी -सांस्कृतिक सीमाओं का अतिक्रमण का भाव भी होता है। भाषायी और लोकल संस्कृति का अतिक्रमण करने के लिए भारतीय सिनेमा ,खासकर हिन्दी सिनेमा को अनेक चीजों का अतिक्रमण करना होता है।
     हिन्दी सिनेमा मूलत: समग्रता में ‘महा- आख्यान’ नहीं बनाता। वह ऐसा कोई कथानक नहीं बनाता जो सब कुछ अपने अंदर समेटे हो। भारतीय सिनेमा में संस्कृति,इतिहास, व्यक्तित्वअभिनय और कथानक की इकसार अवस्था नहीं मिलती। इससे राष्ट्रीय विविधता को रुपायित करने और बनाए रखने में मदद मिली है। इस बिखरे फिल्मी संसार में सेतु का काम किया है पापुलर कल्चर ने (मासकल्चर नहीं) ।
      पापुलरकल्चर के सेतु से गुजरने के कारण ही मुम्बईया सिनेमा की ‘फ्रेगमेंटरी ’और संवादमूलक प्रकृति है। भारतीय सिनेमा सांस्कृतिक विमर्शों को पैदा करता है।
      हॉलीवुड का सिनेमा सुसंबद्ध ढ़ंग से पाठक को सम्बोधित करता है जबकि भारतीय सिनेमा दर्शक के अलावा सांस्कृतिक समूहों को सम्बोधित करता है। यही वजह है कि भारतीय सिनेमा जितना देश में देखा जाता है वैसे ही विदेश में भी देखा जाता है। देशी-विदेशी दर्शकों को आकर्षित करने में जिस तत्व का सबसे बड़ा रोल है वह है‘भारतीयता’, इस ‘भारतीयता’ का आधार राजनीतिक न होकर सांस्कृतिक है।इसे साम्प्रदायिक राजनीतिक कैटेगरी के रुप में सांस्कृतिक आधार से संवाद करने के कारण ही हिन्दी सिनेमा और भारतीय सिनेमा विदेशों में सभी को अपील करता है। यह ऐसे आप्रवासी की भारतीयता है जो नागरिकता के प्रपंचों से मुक्त है। इस भारतीयता की अपील उन लोगों में जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटे हुए हैं। इस भारतीयता का आधार है जीवनशैली और संस्कार।
 
  फिल्म की कहानी का विधा रुप में उद्योग,बाजार और राजनीति से गहरा संबंध होता है। विधा के साथ उद्योग और बाजार की शक्तियों की सक्रियता का जो रुप यहां मिलता है वह अन्यत्र कम देखने को मिलता है।  हमें विधा की अवधारणा के फिल्म में रुपान्तरण को आलोचनात्मक नजरिए से देखने की जरुरत है। विधा यहां अमूर्त्त कोटि नहीं है। बल्कि विधा की सांस्कृतिक एजेण्ट के रुप में महत्वपूर्ण भूमिका है। भारतीय समाज में अस्मिता के रुपों को परिभाषित करने वाली कोटि भी यही है। फिल्मी कहानी  सांस्कृतिक उत्पादन पर चलने वाली सामयिक बहसों का केन्द्र बिंदु है। यह समाज में सक्रिय सांस्कृतिक-सामाजिक संवृत्तियों को अप्रत्यक्ष रुप से प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण विधा रुप है।
      फिल्मी कहानी सांस्कृतिक मार्ग है। हम जब भी किसी फिल्मी कहानी देखें तो पहले उसके पैराडाइम को देखें। फिल्मी कहानी का पैराडाइम उसके अंदर से खोजना चाहिए ऊपर से फिल्मी कहानी गैर-समस्यामूलक संदर्भ में तैयार की गई होती है। लेकिन उसकी हमेशा कोई मंशा होती है जिसे तयशुदा मानकों के आधार पर ही पढ़ा जा सकता है। मसलन् हाल ही में रिलीज की गई फिल्म ‘माई नेम इज खान’ को ही ले सकते हैं, यह अमेरिकी विदेश नीति के फ्रेमवर्क में निर्मित फिल्म है। शाहरुख खान का बयान ‘माई नेम इज खान आई एम नॉट ए टेररिस्ट’,यह वक्तव्य बार-बार भिन्न संदर्भ में शाहरुख खान देता है और बड़े ही कौशल के साथ भारत के साम्प्रदायिक संदर्भ को भी इसमें शामिल कर लिया गया है।
   शाहरुख खान का बयान असाधारण ढ़ंग से रुपक मडरॉक के ‘न्यूज कारपोरेशन’ के 9 / 11 के संदर्भ में किए गए व्यापक मुस्लिम विरोधी प्रचार अभियान के फ्रेमवर्क का हिस्सा है। इस बयान की तमाम विचारधारात्मक जटिलताएं तब ही खुलेंगी जब हम अमेरिकी विदेश नीति के सामयिक मुस्लिम विरोधी पैराडाइम से वाकिफ हों।
       उल्लेखनीय है कि हिन्दी सिनेमा में ‘तेजाब’ फिल्म के साथ मुस्लिम विरोधी नजरिए का प्रवेश होता है। इस फिल्म के साथ ही मुसलमान को विलन के रुप में व्यापक कवरेड मिलता है। मुसलमान के नकारात्मक कवरेज को ‘गदर’ फिल्म वे नयी ऊँचाईयों पर पहुँचाया, शाहरुख कान की नयी फिल्म ‘माई नेम इज खान’ इसी सिलसिले की ओबामा प्रशासन की विदेशी नीति के फ्रेमवर्क में तैयार की गई फिल्म है।  
    इसी प्रसंग में दर्शकों के साम्प्रदायिकीकरण की प्रक्रिया पर भी हमें ध्यान देने की जरुरत है। वे फिल्में दर्शक जुगाड़ नहीं कर पातीं जो धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक फिल्में हैं, इसके विपरीत साम्प्रदायिक और राष्ट्रवादी नजरिए की फिल्में हिट जाती हैं। फिल्में स्वतः ही दर्शक नहीं बनातीं बल्कि उनके दर्शक सचेत ढ़ंग से बनाए जाते हैं। हमें देखना चाहिए कि हिन्दी सिनेमा ने किस तरह का दर्शकवर्ग तैयार किया है।साथ ही यह भी देखना चाहिए कि टेलीविजन के द्वारा किस तरह का दर्शकवर्ग तैयार किया जा रहा है। कहीं दर्शकवर्ग के चरित्र को टेलीविजन ने तो प्रभावित नहीं किया है ?   
 ( हैदराबाद स्थित अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के द्वारा 24 और25 मार्च 2010 को  आयोजित सेमीनार में सिनेमा और संस्कृति विषय पर दिए भाषण पर आधारित संशोधित आलेख)     



मंगलवार, 23 मार्च 2010

स्त्री की भिन्नता का आख्यान



           स्त्री और पुरूष एक प्रतीक व्यवस्था बनाते हैं जिसमें भाषा संरचना है। जिसके अनेक दरवाजे है,अनेक खिड़कियां हैं। अनेक तरीके हैं। यहां पर विषय को सेक्स को प्रतीक व्यवस्था के तहत या अन्य रूप में देख सकते हैं।
भाषा शिश्नकेन्द्रित इसलिए रही है क्योंकि लिंग उसका आधार है। शब्दों में उसे व्यक्त करते हैं। इसी कारण शिश्नकेन्द्रित भाषा या पुंसवादी नाम दिया गया। देरीदा का विचार है कि वाचिक शब्द का लिखित शब्द से ऊपर दर्जा है। इसी कारण शब्दकेन्द्रित भाषा पदबंध का प्रयोग होता है।
       सिकसाउस और इरीगरी ने शिश्नकेन्द्रित और शब्दकेन्द्रित इन दोनों को मिलाकर 'शिश्नवाक् केन्द्रित ' भाषा नाम दिया। जो वायनरी अपोजीशन पर आधारित है। इसमें पहला शब्द दूसरे की तुलना में मूल्यवान होता है। सिकसाउस और इरीगरी दोनों ने ही यह रेखांकित किया कि मूल्यवान् शब्द दूसरे पर निर्भर हैं। मसलन् मर्द/ औरत, व्यवस्था / अव्यवस्था या अराजकता, भाषा / चुप्पी , उपस्थिति / अनुपस्थिति, वाचन/ लेखन , प्रकाश / अंधेरा, अच्छा/ बुरा आदि। इनकी एक-दूसरे पर निर्भरता ही पश्चिमी विचारों की धुरी है।
     सिकसाउस ने लाकां की इस धारणा का इस्तेमाल किया है कि बच्चे को अपनी प्रतीकात्मक पहचान बनाने के लिए माँ के शरीर से अलग होना होता है।यही वजह है कि स्त्री का शरीर भाषा में दिखाई नहीं देता। सिकसाउस इस क्रम में माँ के शरीर से औरत के शरीर,स्त्री के शरीर से स्त्री की कामुकता की ओर लम्बी छलांग लगाती है।इसी के आधार पर कहती है स्त्री की कामुकता और स्त्री का कामुक आनंद शिश्न वाक् केन्द्रित भाषा में व्यक्त नहीं हो पाता।इन दोनों को हमेशा शिश्न के संदर्भ में मर्द के संदर्भ में ही परिभाषित किया गया
       स्त्री की भी कल्पना होती है,उसका अपना स्वायत्त संसार होता है।वह फैंटेसी की इमेजों के करीब होती है। उसके बारे में प्रतीकात्मक रूप से कुछ बातें तय हैं। इसके बावजूद वह तरल है, फैलती है, पुरूष की तुलना में कम स्थिर है।
         हेलिनी यह मानकर चलती है कि पाठक जानता है कि स्त्री की कामुकता के बारे में फ्रॉयड और लाकां के क्या विचार थे। उसके लेखन के दो स्तर हैं। पहला वह हमेशा रूपक में लिखती है और रूपक में ही बोलती है। इस क्रम में व्यक्ति और संरचना इन दोनों को सम्बोधित करती है। उसने लेखन की हस्तमैथुन से तुलना की है। जो औरतों में गुप्त होता है। शर्मनाक माना जाता है। बचकाना माना जाता है। कुछ ऐसा माना जाता है जिसे वयस्क नहीं करते। वयस्कता हासिल करने के लिए उसको अस्वीकार करना जरूरी है।यह वैसे ही है जैसे योनि की अनुभूतियों को वयस्क कामुकता की गर्भ की पुनरूत्पादक क्षमता के लिए अस्वीकार किया जाए।
     यदि वायनरी अपोजीन के अर्थ में मर्द की कामुकता को परिभाषित किया जाएगा तो मर्द प्रतीक व्यवस्था के दायरे में ही कैद रहेगा। स्त्री के सामने दो तरह के शोषण के रूप है पहला है पितृसत्ता का शोषण,दूसरा है नस्लीय शोषण। जिसे भारत में जाति और धर्म के शोषण के रूप में भी जानते हैं।
स्त्री अनेक मर्तबा बोलती हैं और लिखती भी हैं। किन्तु मर्द के नजरिए से। पुंस व्यवस्था तयशुदा है अत: अधिकांश औरतें उसे सहज ही स्वीकार कर लेती हैं। ऐसी औरतों के लेखन में स्त्रीत्व और स्त्री जैसी कोई चीज नहीं होती। प्रतीकात्मक व्यवस्था में लेखन हमेशा रेखांकित किया जाता है। स्त्री ही स्त्री लेखन कर सकती है क्योंकि स्त्री लेखन स्त्री शरीर के माध्यम से ही भाषा के रूप में जन्म लेता है। भाषा में पहला पदबंध सीमित और दूसरा असीमित अर्थ की व्यंजना करता है। जैसे एक-अनेक,सम-भिन्न, आदि।इसमें पहला पदबंध अच्छे और दूसरा बुरे की कोटि में आता है। जो अच्छे की कोटि में आते हैं वे मर्द हैं ,निश्चित हैं,व्यवस्था है,और जो बुरे की कोटि में आती है वह औरत है,अनिश्चित है, प्रकृति है। देरीदा के वायनरीवाद की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसने इसकी कोई सकारात्मक ज्ञानमीमांसा निर्मित नहीं की।बल्कि इस क्षेत्र में नकारात्मक ढ़ंग से काम किया। जो शब्द मूल्यवान् थे उन्हें नकारात्मक रूप में व्याख्यायित किया। उन्हें मातहत के अन्तर्विरोध के रूप में पेश किया।
      जबकि शब्दों का इतिहास बताता है कि शब्दों की परिभाषा हमेशा तुलनात्मक रूप में सकारात्मक दिशा में अपना विकास करती है। विखंडन की भाषा रणनीति अंतत: पराभौतिक पदबंधों के वायनरी अपोजीशन के द्वारा निर्धारित अर्थों को भी अस्त-व्यस्त कर देती है। विखंडनवादी रणनीति उनके लिए फायदेमंद हैं जो हाशिए पर हैं,स्त्री आन्दोलन में काम कर रहे हैं,स्त्रीवादी साहित्य विमर्श में लगे हैं।वह जाति,धर्म,स्त्री आदि के अब तक के प्रचलित विमर्शों को धराशायी कर देती है।
        फ्रांसीसी स्त्रीवाद में सीमोन पहली चिन्तक थी जिसने 'सैकिण्ड सेक्स' में स्त्री को अदर या अन्या के रूप में व्याख्यायित किया। स्त्री और पुरूष के बीच के भेदभाव को पैदा करने में पितृसत्ता की भूमिका के विविध आयामों को विस्तार से खोला।पितृसत्ता की दोगली भूमिका को उजागर किया। जबकि लूस इरीगरी ने रेखांकित कि औरत को पितृसत्ता के दोगले चरित्र के तहत नहीं खोजना चाहिए।वह तो अन्यत्र रहती है। वह पितृसत्ता के बाहर थी इसीलिए बच गयी है।
      पितृसत्ता का वैचारिक ढांचा तो एक रूप,एक ही विचारधारा, एक ही मूल्य और एक ही सेक्स की बातें करता रहा है। जबकि स्त्री का सारा संसार ही अलग है। वह जहां आज दिखाई दे रही है,अस्तित्ववान है,उसका प्रधान कारण ही यही है कि वह पितृसत्ता और वायनरी अपोजीशन के बाहर अवस्थित है। इसी अर्थ में इरीगरी ने लिखा कि स्त्री एक नहीं अनेक है।एकत्व के नाम पर स्त्री की पहचान पुरूष में समाहित नहीं की जा सकती और स्त्री के वैविध्य को ही नकार सकते हैं। स्त्री को समत्व में समाहित करना पुंसवादी विचार है। स्त्री भिन्न है, उसकी भिन्नता ही उसकी शक्ति है। भिन्नता के आधार पर ही वह अपना अस्तित्व बचाए रखने में समर्थ रही है। कामुक भिन्नता को जो लोग नहीं मानते वे असल में पुंसवाद की ही वकालत करते हैं।