बुधवार, 30 जून 2010

'उत्तरआधुनिक' एजेंडा क्या है? - 3- इलेन मिकसिन्स वुड

   वर्तमान उत्तरआधुनिकतावाद के बारे में एक और विशेष रूप से रोचक बात है, एक खास रूप से नोट करने लायक अंतर्विरोध। एक ओर यह इतिहास के प्रतिवाद पर आधारित है, जो एक प्रकार के राजनीतिक निराशावाद से जुड़ा है। चूंकि कोई भी ऐसा तंत्र और कोई भी इतिहास नहीं है जिसके प्रयोजनमूलक विश्लेषण की गुंजाइश है, अत: हम बहुत सारी शक्तियों के मूल तक नहीं पहुंच सकते, जो हमारा दमन करती है; और हम किसी प्रकार के संयुक्त विरोध, किसी प्रकार की सामान्य मानव मुक्ति अथवा पूंजीवाद के विरुध्द वैसे आम संघर्ष की भी आकांक्षा नहीं कर सकते जिसमें समाजवादी विश्वास करते थे। अधिक से अधिक हम कई विशिष्ट और पृथक प्रतिरोधों की उम्मीद कर सकते हैं।
दूसरी ओर ऐसा प्रतीत होता है कि इस राजनीतिक निराशावाद का उद्गम पूंजीवादी संपन्नता और संभावना के प्रति अपेक्षाकृत अधिक आशावादी दृष्टिकोण में है। आज के उत्तरआधुनिकतावाद (जैसा कि हमने देखा है यह प्रतीकात्मक रूप से साठ के दशक की पीढ़ी के उत्तरजीवियों तथा उनके छात्रों द्वारा अपनाया गया है), जिसकी विश्व के प्रति दृष्टि अभी भी पूंजीवाद के 'स्वर्णिम युग' में बध्दमूल है, के अनुसार पूंजीवादी व्यवस्था के प्रमुख लक्षण हैं : 'उपभोक्तावाद', उपभोग के पैटर्न की विविधता तथा 'जीवन-शैलियों' का प्रसार। भाषा और विमर्श पर उत्तरआधुनिकतावादी द्वारा जोर दिया जाना उनकी उपभोक्ता पूंजीवाद के प्रति आसक्ति तथा उनके इस दृढ़ विश्वास में देखा जा सकता है कि पुरानी राजनीतिक एजेंसियां (विशेष रूप से श्रमिक आंदोलन) स्थायी रूप से पूंजीवादी उपभोक्तावाद के 'प्रभुत्व' में आ गई हैं। बौध्दिक आचरण को सामाजिक जगत के केंद्र में स्थापित कर तथा बुध्दिजीवियों को प्रोत्साहित कर या विशेष रूप से शिक्षाविदों को ऐतिहासिक एजेंसी का अग्रदूत बनाकर उत्तरआधुनिकतावाद ने इन प्रभुता संपन्न एजेंसियों का स्थानापन्न नई एजेंसियों से करने के लिए अंतिम, और प्राय: भौंडा, अतिवादी और सुपरिचित प्रयास
किया है।
यहां भी उत्तरआधुनिकतावादी बुध्दिजीवी अपने मौलिक गैर-इतिहासवाद को दरशाते हैं। ऐसा लगता है युध्दोतर तेजी के 'स्वर्णिम' क्षण के बाद के पूंजीवाद के संरचनात्मक संकट ठीक उनके सामने से निकल गए हैं या कम से कम इनका उन पर कोई खास सैध्दांतिक प्रभाव नहीं पड़ा है। कुछ के अनुसार इसका अर्थ यह है कि पूंजीवाद के विरोध के अवसर बहुत सीमित हो गए हैं। अन्य मानो यह कह रहे हों कि अगर हम सचमुच व्यवस्था को बदल नहीं सकते या यहां तक कि समझ नहीं सकते (या इसे हम व्यवस्था मानें भी) और अगर हमारे पास कोई श्रेयस्कर स्थिति न है न हो सकती है, जिससे कि हम उस व्यवस्था की आलोचना कर सकें इसका विरोध करने की तो बात ही छोड़िए, तो भी बैठकर इसका आनंद उठा सकते हैं या इससे भी बेहतर है कि खरीददारी करने जा सकते हैं।
इन बौध्दिक प्रवृत्तियों के प्रतिपादक भाष्यकार निश्चित तौर पर जानते हैं कि सब कुछ ठीक नहीं है लेकिन इन प्रवृत्तियों में शायद ही कुछ ऐसा है, जिससे उदाहरण के लिए आज की बढ़ती हुई गरीबी तथा बेघरबारी, गरीब मेहनतकश वर्ग के बढ़ते आकार, असुरक्षित और पार्ट टाइम श्रमिक के नए रूपों आदि को समझने में मदद मिलती हो। बीसवीं सदी के अस्पष्ट इतिहास के दोनों पक्षों, इसकी विभीषिकाओं तथा इसके चमत्कारों ने निस्संदेह उत्तरआधुनिकतावादी चेतना के निर्माण में भूमिका निभाई है। लेकिन जिन विभीषिकाओं ने प्रगति की पुरानी धारणा को नष्ट किया है, वे आज के उत्तरआधुनिकतावाद की सुस्पष्ट प्रकृति को परिभाषित करने में उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितनी कि आधुनिक प्रौद्योगिकी तथा उपभोक्ता पूंजीवाद की धन समृध्दि। उत्तरआधुनिकतावाद कभी-कभी पूंजीवाद की अस्पष्टता के समान दिखता है, तब जब इसे उनके नजरिए से देखा जाए जो इसके फायदों का आनंद उठाते हैं न कि उनके दृष्टिकोण से जो इसकी लागतों को झेलते हैं।
अंतिम विश्लेषण में 'उत्तरआधुनिकता' उत्तरआधुनिकतावादी बुध्दिजीवियों के लिए इतिहास का एक क्षण न होकर स्वयं मानवीय स्थिति प्रतीत होती है, जिससे बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं। यदि मिलस के अनुसार उनके युग की प्रमुख समस्या यह थी कि प्रसन्नचित्त यंत्रमानवों में स्वतंत्रता अथवा तर्कना की शक्ति होने की उम्मीद नहीं की जा सकती थी, तो नव उत्तरआधुनिकतावादी स्वयं भी उन्हीं अभिवृत्तियों को प्रदर्शित करते हैं जिनकी मिलस ने निंदा की थी। यहां तक कि वे उन्हीं संकटापन्न प्रबोधन मूल्यों को आधुनिक बुराइयों की जड़ मानते हैं और उन्होंने उन्हें निसर्गत: दमनकारी मानकर खुलेआम अस्वीकार कर दिया है। दूसरे शब्दों में, उत्तरआधुनिकतावाद अब निदान नहीं, बीमारी बन गया है।

तालिबान को अमेरिका का रंगदारी टैक्स

     अमेरिका का अफगानिस्तान में तालिबान के साथ किस तरह का संबंध है और कैसे अमेरिकी प्रशासन तालिबान कमांडरों की मदद कर रहा है इसका रहस्योदघाटन आज हुआ है। आज ही अमेरिका के प्रसिद्ध अखबार ‘दि नेशन’ में कांग्रेसनल कमेटी की रिपोर्ट छपी है जिसमें कहा गया है अमेरिकी सेना के लिए अफगानिस्तान में रसद की सप्लाई बनाए रखने के लिए अमेरिकी प्रशासन बड़ी मात्रा में प्रोटेक्शन मनी या रंगदारी टैक्स दे रहा है। यह बात अमेरिका की कांग्रेसनल रिपोर्ट में स्वीकार की गई है।
      इस रिपोर्ट के प्रेस में लीक होने से अमेरिकी प्रशासन परेशान है। अमेरिका के अखबार ‘दि नेशन’ ने इस रिपोर्ट का रहस्योदघाटन किया है। रिपोर्ट का नाम है “Warlord, Inc,” इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सेना पर होने वाले खर्चे का एक हिस्सा कैसे तालिबान के हाथों पहुँच रहा है। यह पैसा रंगदारी टैक्स के रूप में तालिबान के सैनिकों को दिया जा रहा है। जिससे अमेरिकी सेना के लिए रसद की अबाधित सप्लाई बरकरार रखी जाए।
    ‘होस्ट नेशन ट्रुकिंग’ नामक कंपनी को 2.16 बिलियन डॉलर का कॉट्रेक्ट दिया गया है इस फर्म का काम है सेना की सुरक्षा रसद सप्लाई बनाए रखना। यह कंपनी अपनी सप्लाई लाइन को बनाए रखने के लिए तालिबान को प्रोटेक्शन मनी देती रही है। इस फर्म ने अफगानिस्तान में भाड़े के सैनिकों की भर्ती की है और उन्हें भी अफगानिस्तान में तैनात किया गया है,जांच में पाया भी गया है कि भाड़े के सैनिकों की सुरक्षा के लिए भी यह फर्म तालिबान को मंथली हफ्ता दे रही है।
     जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे सेना और प्रशासन में भ्रष्टाचार बढ़ा है , तालिबान और भी मजबूत हुआ है। तालिबान को प्रति सप्ताह डेढ़ से दो मिलियन डॉलर का भुगतान किया जा रहा है।यह बात रिपोर्ट में संबंधित कंपनी के हवाले से कही गयी है। इस कंपनी ने स्वीकार किया है कि वह तालिबान को प्रति सप्ताह डेढ़ से दो मिलियन ड़ालर प्रोटेक्शन मनी दे रही है। कंपनी ने कांग्रेसनल कमेटी को लिखा है कि अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान के बगराम स्थित मुख्यालय में माल की सप्लाई के लिए प्रति ट्रक के हिसाब से रंगदारी टैक्स दिया जा रहा है।
    कंपनी ने इसका पूरा ब्यौरा दिया है जिसके अनुसार कंधहार से हिरात जाने के लिए प्रति ट्रक 500 डॉलर तालिबान को दिए जाते हैं। काबुल से गजनी जाने के लिए 50 डॉलर दिए जाते हैं। कंपनी ने  रसद सप्लाई के 44 मार्गों का जिक्र किया है इसमें से प्रत्येक मार्ग को 10 तालिबानी वारलोर्ड नियंत्रित करते हैं। उल्लेखनीय है ‘दि नेशन’ अखबार ने नवम्बर 2009 में सबसे पहले यह खबर छापी थी उस पर कांग्रेसनल कमेटी ने जांच की और उस रिपोर्ट को सही पाया है।
  कांग्रेसनल कमेटी के लोगों ने अफगानिस्तान के प्रमुख वारलोर्ड कमाण्डर रूहुल्ला का इंटरव्यू लिया जिसमें उसने माना कि तालिबान के विभिन्न धड़ों को प्रोटेक्शन मनी मिलती रही है। उल्लेखनीय है कमाण्डर रूहुल्ला को सबसे ज्यादा प्रोटेक्शन मनी दी जा रही है।रूहुल्ला ने इंटरव्यू में यह भी कहा है कि वह रंगदारी टैक्स वसूली के बदले में अफगानिस्तान के गवर्नर,पुलिस चीफ और सेना के जनरलों को नियमित घूस देता रहा है। उसने कहा कि वह प्रति माह 3,500 ट्रकों की सुरक्षा करता है और प्रति ट्रक 1,500 डॉलर लेता है। यह पैसा अंततः अमेरिकी करदाताओं की जेब से तालिबानियों के पास पहुँच रहा है। 

फेसबुक का मूल्य 23 बिलियन डॉलर हुआ


      रायटर के अनुसार फेसबुक की कीमत 23 बिलियन डॉलर हो गई है। एक साल में उसकी कीमत में तिगुनी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उल्लेखनीय है  सन् 2004 में गूगल के शेयर जब बाजार के लिए खोले गए थे तो उससे तुलना करें तो पाएंगे कि फेसबुक की कीमत दुगुनी है। फेसबुक का तकरीबन 500 मिलियन लोग इस्तेमाल कर रहे हैं। फेसबुक ने सन् 2009 में विज्ञापनों से 800 मिलियन डॉलर कमाए हैं। यह सन् 2008 की आमदनी से ढ़ाई गुना ज्यादा है। फेसबुक पर इन दिनों वयस्क लोग तकरीबन 12 घंटे प्रति सप्ताह खर्च करते हैं। इंटरनेट की सकल विज्ञापन आय का 13 प्रतिशत हिस्सा फेसबुक के पास है।  

'उत्तर आधुनिक' एजेंडा क्या है ? -2- इलेन मिकसिन्स वुड


इतिहास के बिना ऐतिहासिक परिवर्तन
पुनश्च, आज के उत्तरआधुनिकवाद तथा युगों के अंत की पूर्व विवेचना में कुछ महत्वपूर्ण विभेद हैं। अब तक 'आधुनिकता' के अंत (अथवा 'पाश्चात्य सभ्यता के पतन') को हमेशा एक ऐतिहासिक स्थिति के रूप में समझा गया है, जो ऐतिहासिक ज्ञान के लिए उपलब्ध है। इसमें स्वयं ही ऐतिहासिक परिवर्तन और राजनीतिक कार्रवाई की भी संभावना है। आज डेविड हार्वे और फ्रेडरिक जेमसन जैसे मार्क्सवादी बुध्दिजीवी भी हैं जो 'उत्तरआधुनिकता' की चर्चा एक ऐतिहासिक स्थिति; समकालीन पूंजीवाद के एक दौर, एक सामाजिक और सांस्कृतिक रूप, जिसकी ऐतिहासिक उत्पत्ति तथा भौतिक आधार हो और जो परिवर्तन और राजनीतिक एजेंसी के अध्यधीन हो, के रूप में करते हैं।4 हम उनकेऐतिहासिक निर्णयों से असहमत हो सकते हैं। लेकिन हम उनसे इतिहास के बारे बहस भी कर सकते हैं। बहरहाल, 'उत्तरआधुनिकवाद' कुछ और ही है और वही इस पुस्तक की विषयवस्तु है।
    सर्वप्रथम, यहां 'उत्तरआधुनिकतावादी' वाम के सर्वाधिक महत्वपूर्ण थीम का खाका प्रस्तुत है (मैं इस पद का उपयोग व्यापक रूप से उन विविध बौध्दिक और राजनीतिक प्रवृत्तियों के लिए करूंगा जो हाल के बरसों में उभरे हैं, जिनमें 'उत्तरमार्क्सवाद' तथा 'उत्तरसंरचनावाद' भी शामिल हैं)। उत्तरआधुनिकतावादी भाषा, संस्कृति और 'विमर्श' से पहले ही अभिभूत हैं। ऐसा प्रतीत होता है कुछ उत्तरआधुनिकवादियों के लिए इसका शाब्दिक अर्थ यह है कि मानवजाति और उसके सामाजिक संबंध केवल भाषा द्वारा ही बनते हैं या न्यूनतम शब्दों में यों कहें कि भाषा ही सब कुछ है जिसके जरिए हम दुनिया को जान सकते हैं। अन्य किसी वास्तविकता तक हमारी पहुंच नहीं। अपने अति 'विरचनावादी' संस्करण में उत्तरआधुनिकतावाद ने न केवल भाषाविज्ञान के सिध्दांत के उन रूपों को अपनाया है जिनके अनुसार हमारे विचार हमारी बोलचाल की भाषा की संरचना के अनुसार बनते और सीमित होते हैं। इसका सीधा अर्थ यह भी नहीं कि समाज और संस्कृति की संरचना भाषा के 'समान' होती है, जिसके नियम और पैटर्न सामाजिक संबंधों को वैसे ही शासित करते हैं जैसे व्याकरण के नियम या उनकी 'अंत:संरचना' भाषा को शासित करती है। समाज महज भाषा के समान नहीं है। यह भाषा ही है और चूंकि हम सभी अपनी भाषा से बंधे हैं अत: जिन विशिष्ट 'विमर्शों' में हम जीते हैं उसके बाहर हमारे लिए कोई मानक सत्य, ज्ञान का कोई बाहरी संदर्भ बिंदु उपलब्ध नहीं है।
अन्य उत्तरआधुनिकतावादी हो सकता है 'विमर्श' के महत्व पर जोर देते हुए भी भाषा को इसके शब्दों और बोली के सरल अर्थ में इतनी महत्ता नहीं देते हों। लेकिन कम से कम वे ज्ञान की 'सामाजिक संरचना' पर बल देंगे। इसके मद्देनजर ज्ञान की सामाजिक संरचना पर यह जोर स्पष्टतया अनापत्तिजनक और पारंपरिक लग सकता है। मार्क्सवादियों को भी ऐसा ही लगेगा, जिन्होंने हमेशा यह माना है कि कोई भी मानव ज्ञान हम तक तटस्थ रूप में नहीं पहुंचता। सभी ज्ञान भाषा तथा सामाजिक आचरण के माध्यम से बंट जाते हैं। लेकिन उत्तरआधुनिकतावादियों के दिमाग में इस विवेकपूर्ण प्रस्थापना से कहीं अधिक उग्र कुछ है। उत्तरआधुनिकतावादी ज्ञानमीमांसा का सर्वाधिक स्पष्ट निरूपण उनकी वैज्ञानिक ज्ञान की अवधारणा है। कभी-कभी वे यहां तक दावा करते हैं कि पाश्चात्य विज्ञान, जो इस दृढ़ विश्वास पर आधारित है कि प्रकृति कुछ निश्चित सार्वभौम, अपरिवर्तनीय, गणितीय नियमों द्वारा शासित होती है, साम्राज्यवादी और दमनकारी सिध्दांतों की अभिव्यक्ति मात्र है जिस पर पाश्चात्य समाज आधारित है। लेकिन उस उग्र दावे को छोड़कर, आधुनिकोत्तरवादियों की या तो जान बूझकर या भ्रम और बौध्दिक भावुकतावश ज्ञान के प्रतिरूपों को इसकी वस्तुओं के साथ मिलाने की आदत है; उदाहरण के लिए मानो वे केवल यह नहीं कह रहे कि भौतिकी विज्ञान एक ऐतिहासिक निर्मिति है जो अलग-अलग समय में भिन्न-भिन्न सामाजिकसंदर्भों में परिवर्तित हुई है, प्रत्युत यह भी कि स्वयं प्रकृति के नियम भी 'सामाजिक रूप से निर्मित' तथा ऐतिहासिक रूप से परिवर्तनीय हैं।
उत्तरआधुनिकता प्राय: यह नकारेंगे कि वे ज्ञानमीमांसक सापेक्षवादी हैं। बल्कि वे इस बात पर जोर देंगे कि वे जानते हैं कि बाहर एक वास्तविक दुनिया है। लेकिन बिडंवना यह है कि अपना बचाव करने में ही यह संभव है कि वे बात को अपने विरुध्द साबित कर दें और जिस सम्मिश्रण (या भ्रम) का आरोप मैं उन पर यहां लगा रहा हूं, वे उसे प्रदर्शित कर दें, मानो केवल भौतिक विज्ञान ही नहीं बल्कि ऊष्म गतिकी के नियमों द्वारा प्रदर्शित भौतिक वास्तविकता भी स्वयं ऐतिहासिक दृष्टि से चर सामाजिक निर्मिति है। वे निश्चित ही इसे अक्षरश: सत्य नहीं मानते; लेकिन मानव ज्ञान विशिष्ट भाषाओं, सभ्यताओं और हितों के अंत:क्षेत्र में है और विज्ञान को कुछ उभयनिष्ठ बाह्य सत्य को समझना या इसके करीब नहीं आना चाहिए और आ सकता भी नहीं है। इस ज्ञानमीमांसापरक पूर्वकल्पना का व्यावहारिक परिणाम इससे कुछ मिलता जुलता है।  यदि वैज्ञानिक 'सत्यता' का मानक स्वयं प्राकृतिक जगत में नहीं बल्कि विशिष्ट समुदायों के खास प्रतिमानों में है तो प्रकृति के नियम भी वही होंगे जो समुदाय विशेष समय विशेष में कहेगा।
अपने आपको 'उत्तरआधुनिकतावादी' मानने वाले सभी बुध्दिजीवी जान-बूझकर इस प्रकार के उग्र मीमांसक सापेक्षवाद, यहां तक कि अहंमात्रवाद का समर्थन नहीं करेंगे। यद्यपि यह उनके ज्ञानमीमांसागत अवधारणाओं का अपरिहार्य परिणाम प्रतीत होता है। लेकिन न्यूनतम शब्दों में, उत्तरआधुनिकतावाद का निहितार्थ है 'सर्वसत्तात्मक ज्ञान' तथा 'सार्वभौमिक' मूल्यों की जोरदार अस्वीकृति, जिनमें 'विवेकशीलता' की पाश्चात्य अवधारणाएं, समानता के आम प्रत्यय, चाहे उदारवादी हो या समाजवादी और मानव मुक्ति की सामान्य मार्क्सवादी अवधारणा शामिल है। प्रत्युत उत्तरआधुनिकतावादी 'विभेद' पर जोर देते हैं जिनमें खास स्थायी अस्मिताएं जैसे लिंग, नस्ल, समुदाय, लैंगिकता, उनके नानाविध, विशिष्ट और अलग दमन तथा संघर्ष; खास ज्ञान, जिसमें संजातीय समूहों के लिए विज्ञान भी शामिल हैं।
इन मूलभूत सिध्दांतों का आशय यह है कि हमें वामपंथियों की पारंपरिक 'अर्थशास्त्रीय' चिंताओं तथा राजनीतिक अर्थव्यवस्था जैसे ज्ञान के रूपों को अनिवार्य रूप से अस्वीकार कर देना चाहिए। दरअसल हमें इतिहास के मार्क्सवादी सिध्दांतों सहित प्रगति के पाश्चात्य विचारों जैसे सभी 'महान आख्यानों' का अनिवार्यत: तिरस्कार करना चाहिए। इन सभी थीमों को प्रतीकात्मक रूप से 'न्यूनीकरणवाद', 'संस्थापनावाद' या 'तत्ववाद' की व्याख्या में एक साथ मिला दिया जाता है। मार्क्सवाद को जिसकी एक विशेष रूप से उग्र धारा समझा जाता है। इसका आधार यह है कि यह कथित रूप से मानव अनुभव के विविध स्वरूपों को दुनिया के बारे में एकाश्म दृष्टि में परिणत कर देता है। मार्क्सवाद ऐतिहासिक निर्धारक के रूप में उत्पादन की रीति को, अन्य 'स्थायी अस्मिताओं' की तुलना में वर्ग को, तथा यथार्थ के 'तर्कमूलक विन्यास' की तुलना में 'आर्थिक' अथवा 'भौतिक' निर्धारकोंको विशेषाधिकार प्रदान करता है। 'तत्ववाद' की इस व्याख्या में न केवल विश्व के वास्तव में एकाश्मिक और एकांगी विश्लेषणों (मार्क्सवाद का स्तालिनवादी विश्लेषण) बल्कि किसी भी प्रकार के कारण-कारक विश्लेषण को भी अपने दायरे में समेटने की प्रवृत्ति है।
उत्तरआधुनिकतावादी शब्दावली का अर्थ आगे दिए गए लेखों में और भी स्पष्ट हो जाना चाहिए; लेकिन अभी यह स्पष्ट है कि इन सभी उत्तरआधुनिक सिध्दांतों में विश्व तथा माानव ज्ञान की विखंडित प्रकृति पर बल दिया गया है। इन सभी का राजनीतिक निहितार्थ सुस्पष्ट है : मानव स्वभाव इतना अस्थिर और विखंडित (विकेंद्रित विषय) है और हमारी पहचान इतनी परिवर्तनीय अनिश्चित और नाजुक है कि एक समान सामाजिक 'स्थायी अस्मिता' एक समान अनुभव तथा समान हितों (जैसे वर्ग) पर आधारित सामूहिक कार्रवाई और एकजुटता का कोई आधार नहीं हो सकता।
अपनी न्यूनतम उग्र अभिव्यक्ति में भी उत्तरआधुनिकतावाद 'सर्वसत्तात्मक' ज्ञान अथवा दृष्टि पर आधारित किसी मुक्तिकारी राजनीति की असंभावना पर बल देता है। यहां तक कि पूंजीवाद विरोधी राजनीति भी अत्यधिक 'सर्वसत्तात्मक' या 'सार्वभौमवादी' है। उत्तरआधुनिक विमर्श में एक सर्वसत्तात्मक तंत्र के रूप में पूंजीवाद शायद ही उपस्थित है और इसलिए पूंजीवाद की समालोचना भी निषिध्द है। दरअसल इसमें किसी पारंपरिक अर्थ में भी 'राजनीति' शब्द को प्रभावी रूप में इनकार कर दिया जाता है जिसका अभिप्राय वर्गों अथवा राज्यों की सर्वापरि शक्ति अथवा उनके विरोध से हो और 'आइडेंटिटी पॉलिटिक्स' अथवा 'व्यक्तिगत राजनीति' जैसे विभाजित संघर्षों का मार्ग प्रशस्त किया जाता है। यद्यपि और भी सार्वभौम परियोजनाएं हैं जिनके प्रति उत्तरआधुनिक वामपंथियों का आकर्षण है, जैसे पर्यावरण संबंधी राजनीति। लेकिन यह समझना कठिन है कि पर्यावरण संबंधी राजनीति अथवा वास्तव में कोई भी राजनीतिक कार्रवाई, उत्तरआधुनिकतावाद के सर्वाधिक मौलिक सिध्दांतों के अनुरूप कैसे हो सकती है जो कि एक गहरा ज्ञानमीमांसापरक संदेहवाद और व्यापक राजनीतिक पराजयवाद है।
तब यह उत्तरआधुनिकतावाद 'आधुनिक' युग के अंत संबंधी पूर्व की थ्योरीज की तुलना कहां बैठता है? तुरंत जो बात ध्यान में आती है वह यह है कि उत्तरआधुनिकतावाद, जिसमें युग के अंत संबंधी पुराने निदानों की कई विशेषताएं शामिल हैं, ऐसा प्रतीत होता है, उल्लेखनीय रूप से अपने ही इतिहास से बेखबर है। आज के उत्तरआधुनिकतावादियों का यह दृढ़ विश्वास है कि वे जो कहते हैं वह अतीत से एकदम पृथक स्थिति को दरशाता है लेकिन कई बार ऐसा लगता है वे पूर्व में कही गई सभी बातों से बिलकुल बेखबर हैं। यहां तक कि ज्ञानमीमांसापरक संदेहवाद, सार्वभौम सत्य और मूल्यों पर आघात, आत्मअस्मिता पर संदेह, जो कि वर्तमान बौध्दिक फैशन का बहुत बड़ा अंग है, का भी एक इतिहास है जो उतना ही पुराना है जितना कि दर्शनशास्त्र और खास रूप से, युग की नवीनता का उत्तरआधुनिक अर्थ एक अत्यधिक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक यथार्थ की अनदेखी या इसके इनकार पर निर्भरकरता है। वह यथार्थ है पूंजीवाद की 'सर्वसत्तात्मक' एकता जिसने बीसवीं सदी के सभी युग-विच्छेदों को एकसूत्र में बांध रखा है।
यह हमें उत्तरआधुनिकतावादियों की सर्वाधिक सुस्पष्ट विशिष्टताओं से रू-ब-रू कराता है : युगपरक विभेदों तथा विशिष्टताओं पर उनके जोर देने के बावजूद, सभी मान्यताओं तथा ज्ञान की ऐतिहासिकता को उजागर करने के उनके दावे के बावजूद (या सटीक रूप में मानव ज्ञान तथा यथार्थ की खंडित प्रकृति और 'अंतर' पर उनके द्वारा जोर दिए जाने के कारण) वे इतिहास के प्रति उल्लेखनीय रूप से संवेदनहीन हैं। उनकी यह संवेदनहीनता उनके मौलिक विवेकहीनता तथा 'प्रबोधन' मूल्यों पर उनके आक्रमण के विरुध्द प्रतिक्रियात्मक प्रतिध्वनियों के प्रति उनके बहरेपन में कम उजागर नहीं होता है।
तब यहां युग-परिवर्तन के वर्तमान विश्लेषणों तथा अन्य सभी विश्लेषणों के बीच एक प्रमुख अंतर है। पूर्व के सिध्दांत, परिभाषानुसार इतिहास की किसी खास अवधारणा पर आधारित होते थे तथा ऐतिहासिक विश्लेषण के महत्व पर बल दिया जाता था।
उदाहरण के लिए सी. राइट मिलस ने इस बात पर बल दिया कि तर्कना और स्वतंत्रता के संकट, जिससे उत्तरआधुनिक युग का आरंभ हुआ 'संरचनात्मक समस्याएं' दरशाते हैं और उन्हें व्यक्त करने के लिए आवश्यक है कि हम युगपरक इतिहास तथा मानव जीवन चरित के पुराशास्त्रीय अर्थ में काम करें। केवल इसी अर्थ में संरचना तथा परिवेश के संबंधों का पता लगाया जा सकता है, जो आज इन मूल्यों को प्रभावित करते हैं तथा इसके कारण-कारक संबंधों का विश्लेषण किया जा सकता है। मिलस यह भी मानकर चलते थे कि पुराशास्त्रीय प्रबोधन के समान ही, इस प्रकार के ऐतिहासिक विश्लेषण का मुख्य उद्देश्य मानव स्वतंत्रता तथा एजेंसी के स्थान चिन्हित करना,  अपने विकल्प निर्धारित करना तथा 'इतिहास निर्माण में मानव के निर्णयों की गुंजाइश को बढ़ाना' है। अपनी निराशावादिता के बावजूद, वह मानते थे कि उनके समय में ऐतिहासिक संभावना की सीमाएं 'वाकई बहुत विस्तृत' थीं।
यह कथन प्राय: हर सूक्ष्म विश्लेषण की दृष्टि से वर्तमान उत्तरआधुनिकतावादी सिध्दांतों का प्रतिस्थापनामूलक है, जो प्रभावी रूप में संरचना अथवा संरचनात्मक संबंधों के अस्तित्व तथा 'कारण-परिणाम विश्लेषण' की संभावना को इनकार करते हैं। संरचनाओं और कारणों का स्थान विखंडों और आकस्मिकताओं ने ले लिया है। सामाजिक तंत्र (यथा पूंजीवादी तंत्र) जिसका अपना तंत्रगत तथा 'गति के नियम' हों, जैसी कोई चीज नहीं रह गई है। केवल विभिन्न प्रकार के दमन, शक्ति, विशिष्टता तथा 'विमर्श' रह गए हैं। हमें न केवल प्रगति की प्रबोध धारणाओं जैसे पुराने 'महान आख्यानों' को अस्वीकार करना है बल्कि बोधगम्य ऐतिहासिक प्रक्रिया तथा कारणत्व के विचार को भी छोड़ना है और स्पष्टतया इसी के साथ ही 'इतिहास निर्माण' के किसी भी विचार को भी त्यागना है। कोई भी सुसंरचित प्रकिया नहीं है जो मानव ज्ञान के लिए (या यह अवश्य माना जाना चाहिए कि मानव कार्रवाई के लिए) उपागम्य हो, केवल अराजक, असंबध्द और अवर्णनीय विभेद हैं।
पहली बार हमें ऐसा लगता है कि हमारे सामने पदों का विरोधाभास उपस्थित है यानी इतिहास की अस्वीकृति पर आधारित युग परिवर्तन का सिध्दांत।

मंगलवार, 29 जून 2010

'उत्तरआधुनिक' एजेंडा क्या है?- इलेन मिकसिन्स वुड -1-



             प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान लिखी गयी अपनी प्रसिद्ध और अरूचिकर पुस्तक दि डिक्लाइन ऑफ दि वेस्ट में ओसवाल्ड स्पेंगलर ने घोषणा की कि पश्चिमी संस्कृति और इसके प्रबल मूल्यों सा अंत होने जा रहा है।समाज को एक सूत्र में बांधने वाली परंपराएं और बंधन टूट रहे हैं ; विचार और सभ्यता की एकता सहित जीवन की एकात्मकताएं बिखर रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अपने स्वाभाविक चक्र से गुजरने वाली हर अन्य संस्कृति के समान ही पश्चिम भी अपने ‘प्रबोधन’ अथवा ‘ज्ञानोदय’ के शरदकाल ( जो कि पहसे ही विध्वंसात्मक है ) से अनिवार्यतः निकलकर व्यक्तिवाद और नास्तिवाद में आ गया है।

              लगभग चार दशकों के बाद सी.राइट मिल ने घोषणा की कि 'हम आधुनिक युग के अंत के कगार पर हैं।' इस युग का स्थान उत्तरआधुनिक काल ले रहा है। इसमें वे ऐतिहासिक अपेक्षाएं जो 'पश्चिमी सभ्यता' को परिभाषित करती रही हैं, अब प्रासंगिक नहीं रह गई हैं। तर्कना और स्वतंत्रता की संयुक्त प्रणाली में प्रबोधन सिध्दांत और इस सिध्दांत में निहित दो अन्य प्रमुख सिध्दांतउदारवाद और समाजवाद 'विश्व की और हमारी पर्याप्त व्याख्या कर पाने में लगभग विफल हो गए हैं।' जे.एस. मिल और कार्ल मार्क्स दोनों ही समान रूप से कालातीत हो चुके हैं।1
            इन दो युगांतकारी घोषणाओं, एक 1918 में और दूसरी 1959 में प्रकाशित, के बीच बहुत बड़े सैध्दांतिक विभेद हैं। जहां एक ओर स्पेंगलर के विचार लोकतंत्र-विरोधी हैं वहीं मिल्स आमूल परिवर्तन (रैडिकलिज्म) में विश्वास रखते हैं। जहां स्पेंगलर की 'प्रबोधन' से शत्रुता (या कम से कम इसके प्रति अनिश्चितता) है, वहीं मिल्स, यद्यपि कुछ हताश, लेकिन प्रबोधन के मूल्यों में निरंतर विश्वास रखते हैं। लेकिन इस बीच मंदी, युध्द और नरसंहार का विप्लवकारी इतिहास और इसके अनंतर भौतिक समृध्दि की आशा भी है : एक मानवता के अब तक के सबसे बड़े भय से भी अधिक भयावह और दूसरा सर्वाधिक सुखद आशाओं की कल्पना का प्रतीक।

जिस समय स्पेंगलर ने 'दि डिक्लाइन ऑफ दि वेस्ट' लिखी, यूरोप निश्चित रूप से एक बहुत बड़े उथल-पुथल की स्थिति में था। यह युध्द और क्रांति के दौर से गुजर रहा था। कहने की आवश्यकता नहीं कि लोकतंत्र के प्रसार के कारण और गैर-क्रांतिकारी स्थितियों में भी शासक वर्ग को संभावित खतरा था। मिलस की श्रेष्ठता अन्य कारणों से थी। 1918 से विश्व उन विभीषिकाओं से गुजर चुका था जिनकी स्पेंगलर कल्पना भी नहीं कर सकते थे; जबकि मिलस 1950 के दशक के शांत और राजनीतिक उदासीनता के वातावरण में पूंजीवादी समृध्दि ('समृध्द समाज') की उदीयमान लहरों के बारे में लिख रहे थे। और वह विश्वविद्यालय के छात्रों की उस पीढ़ी को पढ़ा रहे थे जो यद्यपि अभी भी शीतयुध्द और परमाणु-युध्द के भय के साए में जी रही थी, लेकिन फिर भी भौतिक संपन्नता की विलक्षण आशा से आह्लादित थी।
            दरअसल पूंजीवाद का यह 'स्वर्णिम युग' (जैसा कि एरिक हॉब्सबाम2 ने इसे संज्ञा दी है) मिल्स की पीढ़ी के अन्य शिक्षाविदों (जिनमें से अधिकांश शायद माइकेल हैरींगटन के कहे गए 'अन्य अमरीका का अनदेखा कर रहे थे, अमरीकी साम्राज्यवाद के बारे में कहने की तो आवश्यकता ही नहीं है') को ठीक उसी समय यह भी आश्वस्त कर रहा था कि पश्चिमी सभ्यता की समस्याओं का कमोबेश समाधान हो गया है; वहां कुल मिलाकर सामाजिक सौहार्द की स्थिति है; और दरअसल प्रगति की प्रबोधन परिकल्पना कमोबेश प्राप्त हो चुकी है अथवा कम से कम इससे बहुत अधिक बेहतर होने की संभावना नहीं, आवश्यकता नहीं या यथेष्ट भी नहीं है। मिल्स के सहकर्मी डैनियल बेल ने (जो अपनी सुप्रसिध्द पुस्तक के बाद के संस्करण में मिलस पर क्यूबा के देशद्रोही के रूप में बहुत निर्मम कटाक्ष करने वाले थे) इसी को 'विचारधारा का अंत' कहा।

अत: मिल्स के लिए प्रबोधन संबंधी आशावाद का अंत किसी असंदिग्ध आपदा का परिणाम नहीं था बल्कि उसकी निराशावादिता सफलता और असफलता दोनों से समान रूप से उत्पन्न थी। उनका कहना था कि प्रबोधन के कई प्रमुख उद्देश्यों की पूर्ति वास्तव में हो गई है जैसे सामाजिक तथा राजनीतिक संगठनों को तार्किक बनाना; वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीय प्रगति जिसकी प्रबोधन के सर्वाधिक आशावादी स्वप्नद्रष्टा कल्पना भी नहीं कर सकते थे; उन्नत पश्चिमी समाजों में सार्वभौम शिक्षा का प्रसार आदि।

मिल्स ने कहा फिर भी इन उन्नतियों से मानव जाति की 'मूलभूत विवेकशीलता' में शायद ही कोई वृध्दि हुई है। यदि कुछ हुआ भी है तो वह 'वैज्ञानिक पुनर्गठन', नौकरशाही और आधुनिक प्रौद्योगिकी ने मानव स्वतंत्रता में वृध्दि के बजाए इसे और भी सीमित कर दिया है। ये कई अप्रत्याशित बुराइयों के स्रोत भी रहे हैं। 'वैज्ञानिक पुनर्गठन' और स्वतंत्रता के बीच तालमेल की इसी कमी का परिणाम था आत्मनिर्वासित मनुष्यों अथवा 'प्रसन्नचित्त यंत्रमानवों' का आगमन। उन्होंने अपने आपको उन परिस्थितियों : विशालकाय संगठनों तथा पराजित करने वाली ताकतों के अनुरूप ढाल लिया, जिन पर उनका कोई नियंत्रण नहीं था और उन्हें इसका एहसास भी था। ये वे लोग थे जिनके बारे में यह माना जा सकता है कि उन्हें न तो स्वतंत्रता की आकांक्षा थी न ही तर्कना की इच्छा।

इनमें से कुछ विषयवस्तु तो काफी लंबे समय से पाश्चात्य सामाजिक सिध्दांत के भी अंग रहे थे। उदाहरण के लिए, मैक्स वेबर या कार्ल मैनहिम का समाजशास्त्र। आत्मनिर्वासन के संबंध में मार्क्सवादी सिध्दांतों के उल्लेख की तो आवश्यकता ही नहीं है। और वाम तथा दक्षिणपंथी दोनों ही के लिए प्रगति के प्रति निराशा तथा प्रबोधन के प्रति दुविधा बीसवीं सदी की संस्कृति के सामान्य विषय रहे हैं। इसके कारण अच्छे भी रहे हैं, बुरे भी। लेकिन मिलस के दिनों में इसका एक अलग आयाम था और था इसका भी असफलता से कम और (प्रतीयमानत:) सफलता यानी युध्दोपरांत दीर्घ तेजी के दौरान 'कल्याणकारी' और 'उपभोक्ता' पूंजीवाद के पल्लवन से अधिक सरोकार था।

यह दृढ़ विश्वास कि तेजी जारी रहने वाली है और यह पूंजीवाद की सामान्य स्थिति दरशाती है, वाम समाजवादी सिध्दांत के विकास का प्रमुख निर्धारक घटक बन गया। कई वामपंथी समाजवादी आलोचकों, जिनमें मारकूस का उदाहरण प्रमुख है, ने यह तय मान लिया कि इस नए किस्म के पूंजीवाद ने 'आम लोगों', विशेष रूप से मजदूर वर्ग पर अपरिवर्तनीय प्रभाव छोड़ा है। मिलस ने वामपंथियों से 'श्रमिक सैध्दांतिकी' त्यागने का आग्रह किया। निश्चित ही वे अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं थे जो सोचते थे कि अब मजदूर वर्ग एक विरोधपरक शक्ति के रूप में उपलब्ध नहीं है। यहां तक कि अपने आपको मार्क्सवादी मानने वाले लोग भी इस तरह के विचार रखते थे। यह 1960 के दशक की 'क्रांतियों', छात्रों के रैडिकलिज्म तथा उन मार्क्सवादी सिध्दांतों की प्रमुख थीम बनाने वाला था। यह प्रतिरोध के वाहक के रूप में छात्रों और बुध्दिजीवियों को तथा मजदूर वर्ग के संघर्ष के स्थान पर 'सांस्कृतिक क्रांति' को अधिक प्रमुखता देते थे।3

साठ के दशक की क्रांतियों के दस बरसों बाद तेजी का दौर प्रभावी रूप से बीत चुका था। लेकिन आज पूंजीवादी गतिहीनता के समय में इसकी बौध्दिक विरासत अभी भी जीवित है। इन्हीं विरासतों में एक और 'उत्तरआधुनिकता' है। इस बार बुध्दिजीवियों का एक वृहद समुदाय वर्तमान युग को उत्तरआधुनिक काल के रूप में मात्र घोषणा कर ही संतुष्ट नहीं है वरन वे अपने आपको जान-बूझकर 'उत्तरआधुनिकतावादी' कहलाते भी हैं। यद्यपि वे नीत्से जैसे पुराने दार्शनिकों से लेकर लकां, ल्योतार्द, ंफूको और देरीदा जैसे हाल के विचारकों के विभिन्न प्रभाव को स्वीकार करते हैं लेकिन आज का उत्तरआधुनिकतावाद सबसे अधिक साठ के दशक की पीढ़ी के विचारकों तथा उनके छात्रों से जुड़ा है। अत: उत्तरआधुनिकतावाद 1990 के दशक में पूंजीवाद के नए (उत्तर फोर्डवादी 'असंगठित', 'लचीले') स्वरूप पर चाहे जितना भी जोर दे, यह पूंजीवाद के तथाकथित स्वर्णिम काल के दरम्यान निर्मित चेतना का ही परिणाम है।

दरअसल कुछ उत्तरआधुनिकतावादी पूंजीवाद की जीत और उपभोक्तावाद के उल्लास के लिए इतने उत्सुक हैं कि उन्होंने तेजी के दौर के अंत को शायद ही नोटिस किया है। लेकिन जो वर्तमान वास्तविकताओं से अपेक्षाकृत अधिक परिचित हैं, उनकी बौध्दिक जड़ें उस 'स्वर्णिम क्षण' में हैं। उनका विश्वास पूंजीवाद की उस जीत में है जो साम्यवाद के पतन की तारीख से बहुत पहले की है। इसलिए जहां कुछ दक्षिणपंथियों ने 'इतिहास के अंत' या पूंजीवाद के अंतिम विजय की घोषणा कर दी है, वहीं कुछ वामपंथी बुध्दिजीवियों द्वारा हमसे यह पुन: कहा जा रहा है कि एक युग का अंत हो गया है; हम 'उत्तरआधुनिक' युग में रह रहे हैं; 'प्रबोधन परियोजना' समाप्त हो चुकी है; सभी पुराने यथार्थ और विचारधाराएं अप्रासंगिक हो गई हैं; वैज्ञानिक पुनर्गठन के पुराने सिध्दांत अब लागू नहीं होते, आदि-आदि।

जैसा कि हम कुछ क्षण में आगे देखेंगे यह स्पष्ट नहीं है कि नव उत्तरआधुनिकवाद किसी प्रकार के ऐतिहासिक विश्लेषण की अनुमति देता है। लेकिन यदि आज के उत्तरआधुनिकवादी बुध्दिजीवियों के अनुसार 'उत्तरआधुनिकता' कोई ऐतिहासिक काल दरशाता है तो ऐसा प्रतीत होता है कि वास्तविक परिवर्तन 1960 के दशक के उत्तर में या 1970 के दशक के आरंभ में आया। हालांकि आरंभिक युगपरक मील के पत्थरों और एकदम हाल के समय के पुल के बीच बहुत ऐतिहासिक जल प्रवाहित हो चुका है लेकिन उत्तरआधुनिकता के हाल के निदान के बारे में जो ध्यान आकर्षित करने वाली बात है वह यह कि इसमें और विचारधारा के अंत की पुरानी घोषणाओं, अतिवादी तथा प्रतिक्रियावादी दोनों संस्करणों में बहुत समानता है। दूसरे शब्दों में, जो ध्यान देने वाली बात है, वह असातत्य की इस कहानी में नैरंतर्य या कम से कम पुनरावृत्ति है। यदि हम एक ऐतिहासिक युग के अंत में आ गए हैं तो जिसका अंत हुआ है वह स्पष्टतया कोई बहुत अलग युग का अंत नहीं बल्कि एक ही युग का दोबारा अंत हुआ है।

नैरंतर्य और असातत्य की इस द्वंद्वात्मकता से आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आखिर, बीसवीं सदी के ये आभासीय युग विच्छेद पूंजीवाद के तर्क और आंतरिक अंतर्विरोधों द्वारा ऐतिहासिक एकता में बंधे हुए हैं, पूंजीवाद एक गतिशील लेकिन संकटों से भरा तंत्र है जो हजारों मौत मरता है। (क्रमशः)

किताब का नाम- इतिहास के पक्ष में
संपादक द्वय- इलेन मिकसिन्स वुड और जॉन बेलेमी फास्टर
 प्रकाशक- ग्रंथ शिल्पी बी-7, सरस्वती कॉम्प्लेक्स,सुभाष चौक,लक्ष्मी नगर,दिल्ली-110092
 मूल्य- 375 रूपये


पोस्टमॉडर्न में 'पोस्ट ' और 'मॉडर्न' के खेल



           उत्तर - आधुनिकता को समझने के लिए वृद्ध पूंजीवाद की सही समझ होना बेहद जरुरी है। हिन्दी के अधिकांश बुध्दिजीवी इसका अमूमन उपहास उड़ाते रहते हैं।ये ऐसे बुध्दिजीवी हैं जो अभी तक सामंती खोल से बाहर नहीं निकल पाए हैं। इनका जीवन और साहित्य को लेकर सामंती रवैय्या है। ज्ञान के स्तर पर पूंजीवाद की आधी - अधूरी समझ को मुकम्मल समझ कहते हैं। पिछड़ेपन का आलम यह है कि ये अपने ज्ञान को सही और अन्य के ज्ञान को गलत मानते हैं। हर विषय पर वगैर जाने लिखना और उसे लेकर अहंकार में डूबे रहना , अपने ही हाथों अपनी पीठ ठोकना,ज्ञान के पुस्तकीय एवं शोधपरक कार्यों की उपेक्षा करना, मौलिक लेखन और मौलिक ज्ञान के नाम पर ' कॉमनसेंस ' की बातों की पुनरावृत्ति करना, संदर्भों को छिपाना आदि।
            
        उत्तर - आधुनिकतावाद पदबंध की यह सीमा है कि इसकी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं है। इस पर की गयी बहस किसी न किसी रुप में आधुनिकतावाद से जुड़ती है। ' 'उत्तर' का वास्तव में क्या अर्थ है इसकी संतोषजनक व्याख्या नहीं मिलती । मसलन्, 'मॉडर्न' का संबंध वर्तमान से है तो 'पोस्ट मॉडर्न' का संबंध भविष्य से होगा। इस दृष्टि से 'पोस्ट मॉडर्न' साहित्य वह होगा जिसका भविष्य से संबंध है। ब्रैन मैक हॉल ने ''पोस्ट मॉडर्निस्ट फिक्शन'' में लिखा 'पोस्ट मॉडर्न' का अर्थ है ऐसी वस्तु का संदर्भ जो मौजूद नहीं है। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में उत्तर-आधुनिकतावाद पर विचार करें तो पाएंगे डिक हिंगिस ने '' ए डायलेक्टिक ऑफ सेंचुरी''[1978]मेंअंग्रेज चित्रकार जॉन वाटकिंस कैपमैन के बारे में लिखा कि उसने सन्1870 में 'पोस्ट मॉडर्न पेंण्टिग' पदबंध का सबसे पहले प्रयोग किया। 
         सन् 1917 में लिखित रुडोल्फ पान्नविट्ज ने '' दि क्राइसिस इन यूरोपीयन कल्चर '' में 'उत्तर- आधुनिक' पदबंध का सैन्यवादी, राष्ट्रवादी,अभिजात मूल्यों की व्याख्या के संदर्भ में प्रयोग किया। बाद में यह प्रवृत्ति फासिज्म में प्रकट हुई। ब्रिटिश इतिहासकार अर्नाल्ड टायन्वी ने ''ए स्टैडी ऑफ हिस्ट्री'[1947]एवं डी.सी. सॉमरवेल की कृतियों में 'उत्तर-आधुनिक' का प्रारम्भ सन् 1875 से माना गया है। जबकि अमरीकी चिन्तन में सन् 1950 के बाद इस पदबंध का प्रयोग मिलता है। 
        बर्नार्ड रोजेनबर्ग ने 'मासकल्चर'[1957]में मास सोसायटी की व्याख्या 'उत्तर -आधुनिक' पदबंध के तहत की है। अर्थशास्त्री पीटर डुकर की एक रिपोर्ट '' दि लैण्ड मार्क्स ऑफ टुमारो ''[1957]में ' ए रिपोर्ट ऑन दि न्यू पोस्टमॉडर्न वर्ल्ड ' शीर्षक से उप अध्याय है। इसी तरह सी. ब्राईट मिल्स ने ''दि सोशियोलॉजिकल इमेजिनेशन''[1959] में बताया है कि इस युग में आधुनिक युग की जगह उत्तर -आधुनिक युग ने ले ली है। उत्तर- आधुनिक विद्वानों की राय है कि सामयिक समाज उच्च प्रौद्यौगिकी और सूचना प्रणाली के अत्याधुनिक रुपों के विकास के कारण तेजी से बदल रहा है।
       ल्योतार की कृति '' पोस्ट मॉडर्न कण्डीशंस ''[1984] में लिखा कि उत्तर - आधुनिकतावाद का तीन कारणों से वैशिष्ट्य है ,पहला- सौन्दर्यात्मक अर्थ में,यहां वह आधुनिकतावाद से संबंध तोड़ता है। यह विघटन कला ,स्थापत्य ,साहित्य ,चित्रकला में विशेष रुप से दिखाई देता है। दूसरा -कला,विज्ञान एवं तकनीकी के संदर्भ में प्रगति ,स्वतंत्रता का विस्तार ,मानवतावाद आदि प्रासंगिक नहीं रह गए हैं।
          ' आधुनिक' ने सार्वभौम मुक्ति की जो बात कही थी,वह आज संभव नहीं है। हमारी परिस्थितियां बिगड़ रही हैं।इसका कारण है ''तकनीकी विज्ञानों का विकास ।''यह परिस्थितियों को बिगाड़ रहा है। यह विकास हमारी परेशानियों को दूर नहीं कर रहा , बल्कि जटिलता के प्रति अस्थिर कर रहा है।यह हमारी जरूरतों और सामाजिक विकास से असंबध्द है। तीसरा- बुध्दिजीवियों की संस्थागत भूमिका का क्षय ,प्रगति एवं मुक्ति के आख्यान का क्षय ,सुरक्षित जगह और प्क्ष का अभाव, प्रतिरोध की राजनीति का उदय,आलोचना और विरोध की संभावनाओं को बनाए रखने की कोशिश। उत्तर- आधुनिकों में ल्योतार की यह रिपोर्ट आप्त वाक्य के रुप में स्वीकृति प्राप्त है। यह रिपोर्ट वृध्द पूंजीवाद की व्याख्या का गंभीर प्रयास है।
          इस रिपोर्ट की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें पूंजीपति वर्ग के शोषक चरित्र को छिपाया गया है। पूंजीवादी व्यवस्था और पूंजीपति वर्ग के शोषण से कैसे मुक्ति प्राप्त करें ?पूंजीवादी व्यवस्था का कारगर विकल्प क्या है ?बुर्ज़ुआ विचारधारा का क्या विकल्प है ?आधुनिक समाज के बुनियादी अन्तर्विरोध क्या हैं ?और उन्हें कैसे हल करें इत्यादि प्रश्नों की उपेक्षा की गयी है।
       इहाव हसन ने ''दि कल्चर ऑफ पोस्ट मॉडर्निज्म''[1985]में लिखा कि साहित्य में सबसे पहले इस पदबंध का प्रयोग स्पेनिश विद्वान् फेद्रिको दे ओनिस ने किया था। उसने सन् 1930 में इर्विंग हॉव,हेरी लेविन और लेसिली फील्डर की आलोचना के प्रसंग में इस पदबंध का प्रयोग किया था। सन् 1940-50 के दौरान स्थापत्य और कविता के मूल्यांकन के क्षेत्र में उत्तर- आधुनिक दृष्टिकोण का विकास हुआ। सत्तर के दशक में संस्कृति के क्षेत्र में उत्तर-आधुनिक मानदंडों का प्रयोग हुआ।
       उत्तर - आधुनिकता से असहमत होना संभव है। किन्तु उसके प्रभाव से बचना असंभव है। उसने हमारे रवैय्ये, एटीटयूट्स,संस्कार,जीवन शैली और दृष्टिकोण को प्रभावित किया है। उन्हें बदला है।इस क्रम में पूंजीवाद की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में छलांग लगा चुके हैं। इस छलांग के कारण रैनेसां और औद्योगिक क्रान्ति के परिप्रेक्ष्य में निर्मित विचारों की शक्ति चुकी हुई नज़र आने लगी है। आधुनिकता के सवाल बेअसर लगने लगे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है ? आधुनिकतावादी -विमर्श या शास्त्रीय विमर्श इसके कारणों को अभी तक उद्धाटित नहीं कर पाया है। इन परिवर्तनों के संतोषजनक उत्तर न तो आधुनिकतावादियों के पास हैं और न उत्तर- आधुनिकतावादियों के पास हैं।


उत्तर आधुनिकतावाद क्या है ?


उत्तर-आधुनिकतावाद को वृध्द पूंजीवाद की सन्तान माना जाता है।पूंजीवाद के इजारेदाराना दौर में तकनीकी प्रोन्नति को इसका प्रमुख कारक माना जाता है। विश्व स्तर पर साम्राज्यवादी दखलंदाजी के बढने के बाद से आर्थिकतौर पर अमरीकी प्रशासन की दुनिया में दादागिरी बढी है।


इसके अलावा जनमाध्यमों ; संस्कृति; सूचना प्रौद्योगिकी , और विज्ञापन की दुनिया में आए बदलावों के कारण दुनिया में अधिरचना में निर्णायक परिवर्तन हुए हैं।इन परिवर्तनों के कारण आम नागरिकों की जीवन शैली में बुनियादी बदलाव आया है। आम लोगों के दृष्टिकोण में नए लक्षण दिखाई दे रहे हैं। इस तरह के चौतरफा परिवर्तन पहले कभी देखे नहीं गए। भारत में इन परिवर्तनों के कारण जिस तरह के बदलाव आए हैं उनकी सही ढंग से मीमांसा करने की जरूरत है।

उत्तर-आधुनिक विमर्श की शुरूआत संस्कृति के क्षेत्र से हुई।यही वजह है कि इसकी शैतानियों का जन्म भी यहीं हुआ। आज भी विवाद का क्षेत्र यही है। प्रश्न उठता है कि संस्कृति के क्षेत्र में ही यह उत्पात शुरू क्यों हुआ ?असल में संस्कृति का क्षेत्र आम जीवन की हलचलों का क्षेत्र है और साम्राज्यवादी विस्तार की अनन्त संभावनाओं से भरा है। पूंजी; मुनाफा; और प्रभुत्व के विस्तार की लड़ाईयां इसी क्षेत्र में लडी जा रही हैं। जैसा कि सभी उत्तर -आधुनिक आलोचकों का मानना है कि उसकी एक सुनिश्चित परिभाषा संभव नही है। यही वजह है कि कोई उसे उत्तर- आधुनिकता का तर्क कहता है । कोई उसे छलना कहता है। किसी के लिए चिह्नों की लीला है। किसी के लिए सांस्कृतिक हमला है। किसी के लिए सांस्कृतिक तर्क है। किसी के लिए तर्क का अन्त है। किसी के लिए इतिहास का अन्त है। किसी के लिए विखंडन है। किसी के लिए विकेन्द्रण है। किसी के लिए बहुलतावाद है । किसी के लिए महावृत्तान्त का अन्त है।

रिचर्ड रोर्ती के शब्दों में उत्तर-आधुनिकता ''विडम्बनात्मक सैद्धांतिकी'' है जो हर शाश्वत सत्य और अनिवार्यताओं की खोज के विरूद्ध है। जो किसी भी एक व्याख्या या निष्कर्ष की योजना को चुनौती है। इसका आशय यह है कि इसमें अराजकता की दिशा में चले जाने का खतरा भी है। उत्तर-आधुनिक इसे रेडीकल तत्व कहते हैं।

उत्तर- आधुनिकों में ल्योतार का नाम सबसे आगे है; वह उत्तर-आधुनिकता को आधुनिकता से जोड़कर देखता है। उसी का विस्तार मानता है। सुधीश पचौरी ने लिखा है कि ''वे मानते हैं कि बहुत से उपकेन्द्र उपलब्ध हैं जिनमें झगडे हैं;जो सत्ता के नए रूपों को प्रगट करते हैं। आधुनिकता ल्योतार के लिए औद्योगिक पूँजीवाद का अंग है। आधुनिकता का महत्व यह नही है कि वह सभी क्रियाओं के नियम खोजती ;स्थापित करती है; बल्कि यह है कि ऐसा वह अपने समग्रतावाद के तहत निरंकुशता लागू करके सम्भव करती है। यह एकता ;एकसूत्रता और समग्रता ' झूठी' है; क्योंकि यहीं महावृत्तान्त बनते हैं।

यह सच है कि उत्तर-आधुनिकता ने महावृत्तान्त को समाप्त कर दिया है। प्रश्न यह है कि ऐसा क्यों होता है? अधिकतर उत्तर-आधुनिकतावादी इसका उत्तर खोजने में असफल रहे हैं। उत्तर आधुनिकता वस्तुत:पूंजीवादी फिनोमिना है। यह पूंजीवाद विरोधी फिनोमिना नहीं है। पूंजीवाद की सामान्य विशेषता है कि वह अपने आधार में निरन्तर परिवर्तन करता रहता है। बल्कि यों कहें जो तत्व अप्रासंगिक होते जाते हैं उन्हें अपदस्थ करता रहता है। इस तरह वह अपनी अधिरचना को नियमित बदलता रहता है। वैसे यह काम समाजवाद भी करता है।जो भी व्यवस्था अपने को बरकरार रखना चाहती है उसे यह कार्यनीति अपनानी पड़ सकती है। अधिरचना के परिवर्तनों को देखकर वही चौंकते हैं जो व्यवस्था को शाश्वत मानकर जी रहे होते हैं। सामाजिक व्यवस्थाएं शाश्वत नही हैं और न उनकी अधिरचनाएं ही शाश्वत हैं ।आज जो लोग चौंक रहे हैं या अवाक् हैं उसका प्रधान कारण है पूंजीवाद की अपरिवर्तनीय छबि में गहरी आस्था। उत्तर आधुनिक परिवर्तन इस आस्था को तोड़ते हैं और परिवर्तन के नियम की तरफ ध्यान खींचते हैं।

ध्यान रहे परिवर्तन की जरूरत प्रत्येक वर्ग को है और प्रत्येक वर्ग परिवर्तन के नियम का इस्तेमाल करता है।दूसरा प्रश्न यह है कि आखिरकार ये परिवर्तन किस दिशा की ओर ले जा रहे हेैं?क्या इन परिवर्तनों से 'अन्य' को या उन लोगों को लाभ मिलेगा जो 'हाशिये' पर हैं?अथवा इन परिवर्तनों के जरिये पूंजीपतिवर्ग अपने वैचारिक आधार का विकास करना चाहता है?यह भी सोचना चाहिए कि पूंजीपतिवर्ग को और समाज के 'अन्य' वर्गों को इन परिवर्तनों से क्या मिला? ये परिवर्तन किसके लिए फायदेमन्द साबित हुए? क्या उत्पादक शक्तियों को इन परिवर्तनों से बुनियादी तौर पर कोई लाभ पहुंचा? क्या मजदूरों -किसानों की जिन्दगी में कोई प्रगति हुई? सच यह है कि समाज की उत्पादक शक्तियों के जीवन में प्रतिगामिता में इज़ाफ़ा हुआ है। उत्पादन के उपकरणों में तेजी से बदलाव आया है। सूचना; , संचार और परिवहन के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तनों की लहर आयी हुई है। ये तीन क्षेत्र हैं जहां से पूंजीपति वर्ग बेतहाशा मुनाफा कमा रहा है। इन क्षेत्रों के परिवर्तनों ने शोषण की गति में कई गुना इज़ाफ़ा किया है। 'अन्य' या'हाशिये' के समूह और भी ज्यादा पिछड गए हैं।

यह कहा जा रहा है कि जो समूह हाशिये पर थे वे केन्द्र में आ गए हैं जो समूह अपना हक नहीं मांगते थे वे हक मांगने लगे हैं। सच यह है कि सोये हुए समूह शोषण की निर्मम मार के कारण जगे हैं; वे शोषितों के जनसंघर्षों के कारण जो जागरूकता आयी है उसके प्रभाववश जगे हैं। दूसरी बात यह कि उत्तर-आधुनिक परिवर्तन न आए होते तब भी ये वर्ग जागते।ध्यान रहे परिवर्तन की गति सभी समूहों और वर्गों में एक जैसी नहीं होती। किन्तु परिवर्तन की लहर शोषितों में आती है। यह लहर कब आएगी? कैसे आएगी?इसका कोई निश्चित फार्मूला नहीं है।'परिवर्तन' के नियम का विमर्श के केन्द्र में आना वस्तुत: शोषितों की विचारधारात्मक जीत है।

आज बहस परिवर्तन के नियमों और परिवर्तन के रूपों पर हो रही है इससे पूंजीवाद की समझ और भी ज्यादा समृध्द हुई है। कुछ मूढमति इससे यह निष्कर्ष निकालने लगे हैं कि पूंजीवाद की माक्र्सीय व्याख्याएं गलत साबित हुई हैं।माक्र्सवाद अप्रासंगिक हो गया है। सोवियत संघ में समाजवाद का पतन वस्तुत:माक्र्सवाद ही गलत है इस विचार की पुष्टि करता है। फलश्रुति यह कि माक्र्सवाद से बचकर रहो। कम्युनिस्टों से बचकर रहो। इस तरह की तर्कप्रणाली के हिमायतियों को उत्तर-आधुनिक चिन्तन में तरज़ीह दी गयी।किन्तु उत्तर-आधुनिक विचारकों में सभी इसी मत के नहीं हैं। इनमें कुछ माक्र्सवादी भी हैं जो बुनियादी वर्गों की जिन्दगी में बदलाव चाहते हैं। कुछ ऐसे भी विचारक हैं जो पूंजीवाद के गम्भीर आलोचक हैं। इन दोनों किस्म के विचारकों से माक्र्सवादी काफी कुछ सीख सकते हैं। ध्यान रहे यह दौर अवधारणाओं के बदलने का दौर भी है। हमें इसके लिए प्रस्तुत रहना होगा कि हम जिस चीज पर विचार कर रहे हैं क्या उसे पढने के औजार ठीक हैं?हो सकता है जब हम किसी नई चीज या स्थिति का अध्ययन करें तो हमारे औजार किसी काम ही न आएं?जिन माक्र्सवादियोंने उत्तर -आधुनिकता पर विचार किया है उन्होंने वस्तुत:औजारों को बदला है। मार्क्सवाद के बुनियादी उद्देश्य में बदलाव नहीं किया है।

पचौरी ने प्रसिद्ध उत्तरआधुनिक चिन्तक ल्योतार का मूल्यांकन करते हुए लिखा हैकि''ल्योतार कहीं भी उत्तर-आधुनिक को आधुनिक से पृथक् नहीं मानते हैं-'उत्तरआधुनिकता आधुनिकता का आखिरी बिन्दु नहीं है;बल्कि उसमें मौजूद एक नया बिन्दु है और यह दशा लगातार है। उत्तर-आधुनिकता की यह सातत्यमूलक छबि महत्वपूर्ण है। ''

पचौरी की मान्यता है कि '' कुछ भंग; विकेन्द्रित स्थिति तथा कुछ नवकेन्द्रित स्थिति समाज की एक नई छबि तो बना ही देती है; जो ल्योतार के परम निराशावादी उत्तर-आधुनिक विकेन्द्र को फिर चुनौती देती है। ल्योतार जिस 'समग्रता' पर हमला बोलने की बात करते हैं ;वह बहुराष्ट्ीय निगमों के विश्व बाजार या विश्वव्यापार संगठन के केन्द्रवाद या पूॅजी के केन्द्रवाद में बदल जाता है। ल्योतार ने जिस प्रक्रिया को खत्म हुआ मान लिया था ; वह फिर शुरु हो सकती है। राष्ट् ; राज्यों की जगह विश्व बाजार और उस पर बहुराष्ट्ीय निगम आ जाते हैं; जिसका पर्याप्त जिक्र ' दि पोस्टमॉडर्न कंडीशन' में स्वयं ल्योतार ने किया है। ल्योतार की समस्यायह है कि वे बहुराष्ट्ीयनिगमों के केन्द्र को; राष्ट् राज्यों के केन्द्र को अपदस्थ करते तो दिखते हैं;लेकिन उनकी समग्रतावादी शक्ति पर हमला बोलने की कोई रणनीति नहीं सुझाते।जान रंडेल उनकी इसी सीमा की इंगित करते हुए कहते हैं क उत्तर-आधुनिकता में समाज एक ओर विखंडित और श्रेणीयुक्त बन जाता है; दूसरी ओर सूचना निर्भर प्रबन्धन में नियुक्त हो जाता है और इस जगत में हर विखंडित समूह अपने आसपास फिर केन्द्र को बनाता पाता है।''ल्योतार की सीमा यह है कि वह टकराव को स्चीकार ही नहीं करते । उनके लिए यह सब भाषा है। वह ज्ञान और समाज के बीच सहजात सम्बन्ध मानता है। वह उपकेन्द्रों की उपस्थिति तो मानता है किन्तु इनकी मीमांसा नहीं करता।

ल्योतार का मानना है कि महावृत्तान्तीय मानक दूसरी लडाई के बाद बदल गए।ज्ञान की वैधता की साख खत्म हो गयी।तकनीकी ने उसे बदल दिया।बाजार की शक्तियों के नए तरीकों ने उसे बदल दिया। जिसके आगे कल्याणकारी राज्य भी हाशिए पर चला गया।ज्ञान के क्षेत्र एक- दूसरे से स्वतन्त्र हो गए।उनकी वैधता राज्य से नहीं;उन्हीं से आने लगी। इस स्थिति ने ज्ञान के पोजिटिविज्म और उपयोगितावाद को ध्वस्त कर दिया। फलत: महावृत्तान्त या महानता के प्रति सन्देह उत्पन्न हो गया। महानता अविश्वसनीय हो उठी। महानता या महावृत्तान्तों की 'अविश्वसनीयता' के अलावा उत्तर-आधुनिकता की विशेषता वैधता का विकेन्द्रण है;विद्रूपण है।उत्तर-आधुनिकता में सम्बन्ध 'व्यवहारिक' होते हैं; सभंग होते हैं; विपदग्रस्त होते हैं; असुधार्य होते हैं और विडम्बनात्मक होते हैं। व्यावहारिकता उत्तर-आधुनिक सम्बन्धों का सार है।आदर्शहीन,प्रतिबध्दताहीन सम्बन्ध,जो क्षण-क्षण बदलते हेैं, वे मूलत: सत्तात्मक सम्बन्ध होते हैं। यह अराजकता ही 'लीला' है,जिसे ल्योतार भाषा की लीला कहते हैं।

भाषा के नियम तभी बदलते हैं जब उन्हें खेलने वाला बदले। बतर्ज ल्योतार सूचना और तकनीक पर पहुंच और नियन्त्रण ही वह मार्ग है जहाँ 'खेल' बदला जा सकता है। यह खेल कैसे बदलें? किन नियमों से बदलें? खेल-खेल में हम और अन्य कहॉ पहुँचेंगे? इन प्रश्नों का ल्योतार के पास कोई उत्तर नहीं है। वे वैध को अवैध और अवैध को वैध घोषित करते हैं। ल्योतार के अनुसार हर वह स्थिति अथवा प्रक्रिया आधुनिक है जो अपनी वैधता की सिध्दि के लिए दूसरे अतिवृत्तान्त पर है , कुछ के लिए साम्राज्यवादी षडयंत्र , कुछ के लिए प्रगतिशील तो कुछ के लिए प्रतिक्रियावादी फिनोमिना है।






 

उत्तर आधुनिक तर्कशून्यता और अप्रासंगिकता

     कार्ल मार्क्स का मानना था कि जो विचार जीवन में खरा उतरे उसे मानना चाहिए। विचार की कसौटी जीवन है विचार नहीं। यह बात मार्क्सवाद पर भी लागू होती है मार्क्सवाद के अनेक विचार जीवन पर खरे साबित नहीं हुए हैं। व्यवहार में जिस विचार को सही सिद्ध नहीं किया जा सके तो उसे त्यागने में कोई असुविधा नहीं है। उत्तर आधुनिकों के जितने भी भारतीय संस्करण प्रचलन में हैं उनमें से ज्यादातर विचार जीवन की कसौटी पर खरे नहीं उतरे हैं।
    स्वतंत्र भारत में उत्तर आधुनिक विचारधारात्मक प्रयोगों का बड़ा जखीरा फैला हुआ है। इस जखीरे का मूल्यांकन करने की जरूरत है। मार्क्सवाद को सर्वसत्तावादी और जनविरोधी विचारधारा के रूप में चित्रित करने में उत्तर आधुनिकों ने विगत 40 सालों में एड़ी-चोटी का पसीना एक किया है। वे किसी भी किस्म का सार्थक विकल्प किसी भी क्षेत्र में पेश नहीं कर पाए हैं।
   मसलन उत्तर आधुनिकों के द्वारा भाषावार राज्यों के निर्माण के विरोध के सवाल को ही लें और उनके द्वारा छोटे राज्यों के गठन के तर्क और अनुभव पर गौर करें तो छोटे राज्यों की निरर्थकता समझ में आ जाएगी। भाषावार राज्यों के गठन के कारण सामाजिक स्थायित्व,बहुलतावाद का विकास, अल्पसंख्यक भाषायी समूहों और बहुसंख्यक भाषायी समूहों के बीच सदभाव बहुत बड़ी उपलब्धि है। साथ ही व्यक्ति को पहचान के पुराने अप्रसंगिक रूपों से मुक्ति दिलाने और आधुनिक अस्मिता का निर्माण करने में भाषावार राज्यों के गठन से मदद मिली है।
      एक भाषा-भाषी समूहों को मिलाकर राज्य की परिकल्पना को हमने यदि उसके संतुलित आर्थिक विकास के साथ जोड़कर देखा होता,संतुलित आर्थिक विकास के प्रयास किए होते तो मामला कुछ और होता। कांग्रेस ने भाषावार राज्यों का गठन ते किया लेकिन आर्थिक विकास का संतुलित मार्ग नहीं चुना। यही वजह है कि चारों ओर आर्थिक वैषम्य खड़ा हुआ है। इस आर्थिक वैषम्य को बहाना बनाकर भाषावार राज्यों के बुनियादी आधार को ही चुनौती दे दी। हिन्दीभाषी क्षेत्र में तीन नए राज्य इनसे यू.पी.,बिहार और मध्यप्रदेश का विभाजन करके बना दिए गए। लेकिन राज्यों के आर्थिक विकास की समस्या के समाधान की ओर हम एक कदम आगे भी नहीं जा पाए हैं। इन राज्यों में भाषायी टकराव और भी गंभीर रूप ग्रहण कर चुका है।
   स्वतंत्र भारत में अंग्रेजी हटाओ हिन्दी लाओ का आंदोलन आरंभ करने वाले भू.पू.समाजवादी विचारकों का विचार एक जमाने में सबसे आकर्षक उत्तर आधुनिक विचार था। इस विचार के कारण भाषाओं के प्रति अतार्किक समझ का प्रसार हुआ,भाषाओं के प्रति, शिक्षा संस्थानों और बाजार में भाषायी व्यवहार को लेकर सबसे ज्यादा बेबकूफियां देखी गयीं। इस समूची प्रक्रिया में देशी भाषाएं कमजोर हुईं। भाषाओं का सामाजिक आधार कमजोर हुआ।
  सभी भाषाएं और बोलियां समान हैं और सभी के विकास के लिए समान अवसर प्दान करने चाहिए। भाषा की प्रासंगिकता का फैसला सिरों की गिनती के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। कम या ज्यादा लोगों के प्रयोग के आधार पर भाषाओं का संरक्षण और विकास नहीं किया जा सकता। जिस भाषा को एक हजार लोग बोलते हैं उसकी उतनी ही महत्ता और उपयोगिता है जितनी पचास करोड़ं लोगों के द्वारा बोली जाने वाली भाषा की है।
       किसी भाषा विशेष को अतिरिक्त महत्व देने भाषायी संतुलन खतरे में पड़ सकता है। खड़ी बोली हिन्दी की हिमायत के चक्कर में हिन्दीभाषी क्षेत्र की अन्य भाषाओं और बोलियों की उपेक्षा हुई है और उसका ही परिणाम है भाषावार राज्यों के गठन का विरोध करने वाला सिद्धान्त।
    पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष में भाषाएं हमारी सामाजिक एकता को मजबूत बना सकती थीं,लेकिन भाषाओं के आपसी संघर्ष को हवा देकर हमने पूंजीवाद विरोधी साझा मोर्चा तोड़ दिया। किसी भी तरह पूंजीवाद के खिलाफ व्यापक मोर्चा नहीं बने यही पूंजीपतिवर्ग चाहता है और उसे अपने इस लक्ष्य को हासिल करने में सफलता मिली है। दूसरी बात यह कि पूंजीपतिवर्ग और उनके दलों का भाषाप्रेम खोखला होता है उसका भाषायी वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। इसके विपरीत भाषा विशेष से प्रेम करने या तरक्की देने की आड़ में पूंजीपतिवर्ग भाषाओं की हत्या करता रहा है। भाषाओं को मारता रहा है। पूंजीवाद में भाषाओं की मौत धड़ाधड़ हो रही है,इसके विपरीत समाजवादी देशों में भाषाओं को जिंदा किया गया उन्हें शक्तिशाली बनाया गया। सोवियत संघ में समाजवादी व्यवस्था आने के बाद पचासों मृतप्राय भाषाओं को जिंदा किया गया जबकि किसी भी पूंजीवादी देश में जिंदा भाषा धीरे-धीरे मुर्दाभाषा में तब्दील होने लगती हैं। भारत इसका साक्षात प्रमाण है।
   एलेन मिकसिंस वुड ने ‘उत्तर आधुनिक एजेण्डा क्या है’ निबंध में लिखा ‘पूंजीवादी व्यवस्था के विरोध के लिए हमें उन हितों और संसाधनों को एकजुट करने की आवश्यकता है जो पूंजीवाद विरोधी संघर्ष को जोड़ते हैं न कि इसे विखंडित करते हों। पहली दृष्टि में तो ये वर्ग के हित और संसाधन हैं। वर्ग एक मात्र सर्वाधिक सार्वभौम शक्ति है जो विविध मुक्तिकारी संघर्षों को जोड़ने में सक्षम है। लेकिन अंतिम विश्लेषण में हम अपनी मानवता के सामान्य हितों और संसाधनों की बात कर रहे हैं और वह भी इस विश्वास के साथ कि हमारे नानाविध विभेदों के बावजूद मानव कल्याण तथा आत्म-परितोष की कुछ मौलिक तथा अपरिवर्तनीय रूप से सामान्य स्थितियां हैं, जिन्हें पूंजीवाद संतुष्ट नहीं कर सकता लेकिन समाजवाद कर सकता है।’
       उत्तर आधुनिकतावाद के प्रति आकर्षण का प्रधान कारण है इसका प्रतीयमान खुलापन। हमें सोचना चाहिए क्या विगत 40 सालों में सामाजिक खुलेपन का विस्तार हुआ है या पहले की तुलना में और भी ज्यादा कंजरवेटिव बने हैं ? अपने चारों ओर के विश्व परिदृश्य पर नजर डालें तो पाएंगे कि समाज में खुलापन घटा है। पारदर्शिता घटी है, उदारता, सहिष्णुता,सामंजस्य,सद्भाव आदि घटे हैं। अन्य के प्रति हमदर्दी,संवेदनशीलता घटी है। निहित स्वार्थ,परजीवीपन,कूपमंडूकता,अंधविश्वास आदि में इजाफा हुआ है। ज्ञान में कमी आयी है। भाषाएं मरी हैं। विचारधारात्मक  और धार्मिक कठमुल्लापन बढ़ा है। धार्मिक सद्भाव कम हुआ है। मौलिक अच्छी बातों से हम दूर होते चले गए हैं। ये सभी चीजें उत्तर आधुनिकता की तर्कहीनता को समाने लाती हैं।            






सोमवार, 28 जून 2010

मुर्दों के मसीहा और उत्तर आधुनिकता का अंत


      यह आयरनी है कि जिस आंदोलन के लिए लोग पागलपन की हद तक दीवाने थे, गलियों-मुहल्लों में वैचारिक मुठभेड़ें हो रही थीं और चारों ओर लग रहा था कि यह आंदोलन मूलगामी परिवर्तनों का वाहक बनेगा। एक अवधि के बाद पाते हैं कि वही आंदोलन और उससे जुड़ा विचार गायब है.मेरा संकेत रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद  आदि विषयों को लेकर उठे उत्तर आधुनिक आंदोलनों की ओर है।
       आरएसएस जैसा अनुशासित संगठन जिस आंदोलन का आधार हो और संगठित कार्यकर्ताओं की जिसके पास फौज हो,ऐसी फौज जो कभी भी कुछ भी कर सकती हो,ऐसे नेता जो सोई हुई जनता को जगा सकते हों। जिनके पास हिन्दुत्व का प्रखर विचार हो। अकाट्य तर्कप्रणाली हो। हिन्दुत्व पर जान देने वालों की पागलों जैसी संगठित शक्ति हो। ऐसे आंदोलन जब गायब हो जाते हैं तो सोचने के लिए बाध्य होना होता है कि उत्तर प्रदेश और देश में यह आंदोलन कहां गुम हो गया ? सारे देश में हिन्दुत्व और राममंदिर का बिगुल बजाने वाले संत-महंत-तोगडिया-आडवाणी-अटलजी जैसे नेता कहां गायब हो गए ?
       मूल सवाल यह है कि राममंदिर या उसके जैसे उत्तर आधुनिक आंदोलनों का अंत कैसे हो जाता है ? कल तक जो जनांदोलन लग रहा था वह अचानक कहां गायब हो गया ? जो विचार कल तक भौतिक शक्ति नजर आ रहा था अचानक मुर्दा विचार में तब्दील कैसे हो गया ? क्या जे.पी. आंदोलन में कम ऊर्जा थी ? लेकिन वह भी गायब हो गया। पंजाब के सिख राज्य के आतंकी आंदोलन, असम के छात्र आंदोलन ,मेधा पाटकर के नर्मदा बचाओ आंदोलन, चंड़ीभट्ट के उत्तराखंड़ में चले  पेड़ बचाओ -पहाड़ बचाओ आदि आंदोलन कहां गायब हो गए ? इनके साथ जुड़े विचार क्यों असरहीन हो गए ?
     ये सब उत्तर आधुनिक आंदोलन हैं।  उत्तर आधुनिक आंदोलनों के नायक और उनके विचार जीते जी क्यों निरर्थक हो जाते हैं ?  क्या इन आंदोलनों से जुड़े लोग कभी गंभीरता के साथ इनके जबाब देंगे ?
      क्या अमेरिका-इस्राइल के अंधभक्त बताएंगे कि उनके आतंकवाद विरोधी आंदोलन को सारी दुनिया की जनता में लगातार अलगाव क्यों झेलना पड़ रहा है। इराक में सद्दाम हुसैन के खिलाफ सारी दुनिया के मीडिया और सेना की शक्ति झोंकने के बाबजूद इराक की जनता का दिल जीतने में अमेरिका और उसके मित्र राष्ट्र असफल क्यों रहे हैं ? इराक पर हमला करने पक्ष में दिए गए उनके सारे दावे और प्रमाण क्यों गलत साबित हुए हैं ? क्या वजह है कि अफगानिस्तान और इराक की जनता का विश्वास जीतने में अमेरिका असफल रहा है ,उसके सैन्य मिशन असफल रहे हैं।
     सारी दुनिया में समाजवादी व्यवस्था को गिराकर ग्लोबलाईजेशन के नाम पर खुशहाली का नारा अब अपनी प्रासंगिकता खो चुका है । उत्तर आधुनिक सपने क्यों बिखर गए ? आज इन आंदोलनों की धारणाएं गलत लग रही हैं और इनके विचार बिखर चुके हैं। क्या कोई वामपंथी आलोचक बताएगा कि उत्तर आधुनिक आंदोलन क्यों गायब हो गया ? ये सभी आंदोलन सिर्फ पुरातात्विक महत्व के होकर रह गए हैं।
    आज उत्तर आधुनिक आंदोलनों की भाषा मर गयी है। उसके विचार भी मर गए हैं। उत्तर आधुनिक आंदोलनों की भाषा अब अटपटी लगने लगी है। ऐसा क्यों हुआ कि अधिकांश उत्तर आधुनिक आंदोलन दक्षिणपंथी राजनीति की ओर ही अंततः चले गए। कुछ ऐसे सिर फिरे भी हैं जो माओवाद के नाम क्रांति की तलाश करते हुए क्रांति की डाल को ही काट रहे हैं और अपने युग के कालिदास बने बैठे हैं।
    उत्तर आधुनिक आंदोलन कालिदासों का आंदोलन था। वे कालिदास की तरह जिस ड़ाल पर बैठे थे उसी को काट रहे थे। थोड़ा और विवाद को आगे बढ़ाएं और सोचें कि हाशिए और केन्द्र के संघर्ष का क्या हुआ ? व्यवस्था को चुनौती देने वाली शक्तियां कहां चली गयीं ? हाशिए के लोगों को आरक्षण मिल गया ,उन्होंने जश्न मनाया,लेकिन विषमता का क्या हुआ ? विषमता घटने की बजाय क्यों बढ़ती चली गयी ? यदि ग्लोबलाईजेशन से सारी जनता को लाभ मिलता है, हाशिए के लोग सबसे ज्यादा लाभान्वित होते हैं, तो आरक्षित जातियां अभी भी पिछड़ी क्यों हैं ? अधिकांश इलाकों में सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक वैषम्य और भी क्यों बढ़ा है ? जो लोग अल्पसंख्यकों की हिमायत करते थे और जो बहुसंख्यकों की हिमायत करते थे वे इन दोनों समुदायों में विषमता कम करने में असफल क्यों हुए हैं ? कहने का तात्पर्य यह है कि जो आंदोलन कभी व्यापक,केंद्रीय तथा सृजनात्मक था वह अब कुल मिलाकर सक्रिय नहीं रहा। कल तक जो आंदोलन और उसकी धारणाएं प्रासंगिक थी अब निरर्थक हो गयी हैं। अब वे विरोधाभासी लगने लगी हैं। यही उत्तर आधुनिकता के अंत की घोषणा है। वह दूसरों को नष्ट करते-करते स्वयं को ही नष्ट कर बैठा।     
   

सीएनएन- आईबीएन 7 और टोरंटो के सत्य का विकृतिकरण

   ‘सीएनएन -आईबीएन 7’ चैनल के समाचारों का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। इस चैनल की खबरों में असत्य के प्रयोग बढ़ गए हैं। जनता के हितों के लिए संघर्ष करने वालों को तरह-तरह से कलंकित किया जा रहा है। इस कड़ी में नया मामला टोरंटो से जी-20 देशों की बैठक के मौके पर हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन की खबर से जुड़ा है।
    चैनल ने जी-20 देशों की बैठक के मौके पर हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन को ‘उत्पात’ की संज्ञा दी। लगता है किसी कमअक्ल के संवाददाता ने यह खबर लिखी है। उसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन और उत्पात में भाषिक अंतर और अर्थ का ज्ञान नहीं है। शांतिपूर्ण प्रदर्शकारियों को ‘हिंसा पर उतारू’ कहा। आरंभ में लिखा ‘दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों के समूह जी-20 की शिखर बैठक की मेजबानी कर रहे कनाडा के सबसे बड़े शहर एवं देश की वित्तीय राजधानी टोरंटो में हजारों प्रदर्शनकारी हिंसा पर उतारू हो गए।’प्रदर्शनकारियों को चैनल ने ‘उपद्रवी’ कहा। (विस्तार से इस चैनल की बेवसाइट पर जाकर देखें)  
 (शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी को पीटते पुलिस वाले)    
     इस खबर के प्रसंग में पहली बात यह कि यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण था। दूसरी बात यह कि प्रदर्शन की खबर को तोड़मरोड़ करके पेश किया गया है।
   इस प्रदर्शन में क्या हुआ इसके बारे में समग्रता में सूचनाएं देने की आईबीएन 7 ने जरूरत ही महसूस नहीं की। तथ्य यह हैं कि सम्मेलन स्थल पर किसी भी प्रदर्शन को कना़डा सरकार ने रोकने के आदेश पहले से ही दिए हुए थे।
    

(तोड़फोड़ करते पुलिस वाले)
      दूसरी महत्वपूर्ण सूचना यह कि पुलिस ने बड़ी निर्ममता के पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार किया। पत्रकार आग नहीं लगा रहे थे। वे समाचार संकलन कर रहे थे,लेकिन कनाडा पुलिस नहीं चाहती थी कि पुलिस की बर्बरता को कैमरों में कैद किया जाए।
     प्रेस फोटोग्राफरों की पीठ में प्लास्टिक गोलियां मारी गयीं और अनेक पत्रकार जख्मी भी हुए हैं। टोरेंटो के अखबार पुलिस के प्रेस फोटोग्राफरों पर किए गए हमलों की खबरों से भरे पड़े हैं लेकिन आईबीएन7 के संवाददाता को यह सब नजर नहीं आया। यह सब लोग जानते हैं कि इस शांतिपूर्ण प्रदर्शन में कुछ अराजकतावादी भी थे और जो कुछ तोड़फोड़ हुई उसमें इनका और कनाडा पुलिस के सादा कपड़ों में मौजूद पुलिस वालों का हाथ था।जिससे प्रदर्शनकारियों को बदनाम किया जा सके।   
    यहां हम कॉमन ड्रीम डॉट कॉम  में छपी रिपोर्ट का एक अंश उद्धृत करना चाहेंगे।
लिखा है-
 In a remarkable series of Tweets early Sunday morning, journalist Steve Paikin of public broadcaster TV Ontario said he witnessed "police brutality" against a reporter and the arrests of peaceful demonstrators.
"I saw police brutality tonight. It was unnecessary. They asked me to leave the site or they would arrest me. I told them I was doing my job," he Tweeted.
"As I was escorted away from the demonstration, I saw two officers hold a journalist. The journalist identified himself as working for 'the Guardian.' He talked too much and pissed the police off. Two officers held him a third punched him in the stomach. Totally unnecessary. The man collapsed. Then the third officer drove his elbow into the man's back. No cameras recorded the assault. And it was an assault."
Paikin had been at a demonstration in Toronto's Esplanade neighborhood, a densely-populated area near the waterfront. He said police moved in on a crowd of peaceful, "middle class" protesters and began arresting them.
"Police on one side screamed at the crowd to leave one way. Then police on the other side said leave the other way. There was no way out," he Tweeted. "So the police just started arresting people. I stress, this was a peaceful, middle class, diverse crowd. No anarchists. Literally more than 100 officers with guns pointing at the crowd. Rubber bullets and smoke bombs ready to be fired. Rubber bullets fired."
Paikin, a respected journalist who has hosted national election debates in Canada, said he was "escorted" away by police before he could see how many people were arrested, "but it must have been dozens."
"I have lived in Toronto for 32 years. Have never seen a day like this. Shame on the vandals and shame on those that ordered peaceful protesters attacked and arrested."
Earlier in the day, police told media that a small group of "Black bloc" demonstrators broke off from a protest of 10,000 people and began smashing storefront windows along the city's trendy Queen Street.
The CBC News Network reported that protesters smashed in the windows of an American Apparel outlet, pulled out the mannequins and spread feces on the floor. The storefronts of McDonald's and Starbucks locations were also damaged, as were numerous bank branches.
Police shut down all public transit in the city center, including subway and streetcar lines. They also shut down a large downtown shopping complex after reports of looting. AFP reported that some 200 people were trapped inside, unable to leave after the mall was put into lockdown.

"When the G20 protest began turning violent Saturday, police abandoned some of their police cars,"  "This one was briefly occupied on Queen Street."
एक अन्य बेवसाइट ने लिखा है कि प्रदर्शनकारियों में से जिन लोगों ने उपद्रव मचाया वे सादा बर्दी में पुलिसवाले ही थे। ‘ग्लोबल रिसर्च डॉट कॉम’ ने लिखा है-
Toronto is right now in the midst of a massive government / media propaganda fraud. As events unfold, it is becoming increasingly clear that the 'Black Bloc' are undercover police operatives engaged in purposeful provocations to eclipse and invalidate legitimate G20 citizen protest by starting a riot. Government agents have been caught doing this before in Canada.
 Montebello 2007 Riot Prevented - Identical Boots Exposed Undercover Police Provocateurs
 At the ‘Security and Prosperity Partnership’ meeting protests at Montebello Quebec on August 20, 2007, a Quebec union leader caught and outed three masked undercover Quebec Provincial Police operatives dressed as ‘black bloc’ protestors about to start a riot by throwing rocks at the security police. See the following videos documenting this event.
इस सिलसिले में ‘ग्लोबल रिसर्च डॉट कॉम’ ने 2007 और 2010 के पुलिसवालों के जूतों के फोटोग्राफ दिए हैं जिन्हें हम यहां पर दे रहे हैं। इससे आईबीएन 7 के इस झूठ का खंडन होता है कि उपद्रव करने वाले प्रदर्शनकारी थे। विस्तार से ये तथ्य ‘ग्लोबल रिसर्च डॉट कॉम’ पर देखे जा सकते हैं।










प्रणव राय-विनोद दुआ की कार-सेवा


      एनडीटीवी की प्रणवराय-विनोद दुआ टीम अब नंगे रूप में मनमोहन सरकार और कांग्रेस की भक्ति में सक्रिय हो गई है। ये लोग खबरों में कारसेवा कर रहे हैं। इस चैनल की खबरों में खासकर हिन्दी चैनल एनडीटीवी इंडिया में कांग्रेस की भक्ति और विपक्ष पर कटाक्ष का धारदार तरीके से इस्तेमाल हो रहा है। कांग्रेस और मनमोहन सरकार की भक्ति का ताजा उदाहरण है 26 जून को आपातकाल की बरसी पर किसी कार्यक्रम का टीवी पर न होना। वैसे सीएनएन-आईबीएन ने भी 26 जून पर कोई कार्यक्रम नहीं दिया।
   सन् 1975 को इसी दिन भारत में आपातकाल लगाया था। आपातकाल पर किसी भी कार्यक्रम का न आना टीवी चैनलों में बढ़ रहे नव्य-उदार नजरिए को सामने लाता है। आपातकाल कोई साधारण घटना नहीं थी,बल्कि स्वतंत्र भारत की असाधारण राजनीतिक घटना थी। इन दोनों ही चैनलों की बेवसाइट पर आपातकाल से संबंधित किसी भी कार्यक्रम की कोई जानकारी नहीं है।
    दूसरा प्रसंग हाल ही में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों के बढ़ाए जाने और सरकारी नियंत्रण हटाने का है। एनडीटीवी इंडिया ने इस पर जिस तरह से खबरें दी हैं वह इस बात का प्रमाण है कि यह चैनल बड़े ही घटिया तरीके से विपक्ष और प्रतिवाद के बारे में प्रचार कर रहा है।
       एनडीटीवी ने काग्रेस के प्रवक्ता की प्रेस कांफ्रेंस की रिपोर्टिंग की तो उसके बयान को वगैर किसी टिप्पणी के पेश किया। इसके विपरीत जब विपक्ष की रिपोर्टिंग की तो खबर के बीच में अपने मंतव्य को व्यक्त किया,विपक्ष का मूल्य-निर्णय किया ।
     एनडीटीवी यह तो जानता है कि पेशेवर ढ़ंग से खबर पेश करने का मनलब क्या है ? प्रणवराय-विनोद दुआ यह भी जानते हैं कि खबर में संवाददाता की राय का समावेश नहीं किया जाना चाहिए। यदि संवाददाता अपनी राय व्यक्त करना चाहे तो यह काम वह स्वतंत्र रूप से कर सकता है। लेकिन खबर में राय देना और मूल्य निर्णय देना पेशेवर प्रस्तुति नहीं कही जाएगी। यह खबर का मेनीपुलेशन है। नमूना देखें कांग्रेस प्रवक्ता के बयान को शीर्षक दिया - ‘तेल की कीमतों में बढ़ोतरी मजबूरी में की गई’, इस खबर में संवाददाता ने अपनी राय व्यक्त करने की कोशिश नहीं की। साथ ही यह भी आभास दिया कि पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत बढ़ाना अपरिहार्य कदम था। मजबूरी थी।
   दूसरी खबर का शीर्षक था -ईंधन कीमतों में वृद्धि पर बीजेपी-लेफ्ट का प्रदर्शन’, इस खबर को उसी तरह पेश नहीं किया जैसे काग्रेस की खबर को पेश किया था। इस खबर में खबर के अलावा संवाददाता ने भाजपा के बारे में, उसके प्रतिवाद के बारे में मूल्य-निर्णय किया है जो समाचार-मूल्य का सीधे उल्लंघन है। इस खबर को पूरा पढ़ना समीचीन होगा।-
ईंधन कीमतों में वृद्धि पर बीजेपी-लेफ्ट का प्रदर्शन
एनडीटीवी इंडिया
दिल्ली/कोलकाता, शनिवार, जून 26, 2010

यूपीए सरकार ने जैसे ही शुक्रवार को तेल और गैस की कीमतें बढ़ाने का ऐलान किया विपक्ष विरोध में खड़ा हो गयातेल गैस की बढ़ी हुई कीमतों के खिलाफ शनिवार को दिल्ली में बीजेपी ने चक्का जाम किया। दिल्ली के सबसे व्यस्त आईटीओ चौराहे पर बीजेपी के कार्यकर्ता धरना प्रदर्शन पर उतर आए और यहां घंटों जाम लगा रहा। वहीं मुंबई में भी बीजेपी के कई बड़े नेताओं ने तेल-गैस की बढ़ी कीमतों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। इनमें गोपीनाथ मुंडे, स्मृति ईरानी ने बीजेपी के कई कार्यकर्ताओं समेत गिरफ्तारी भी दीं।
उधरईंधन कीमतों में वृद्धि के खिलाफ माकपा समर्थित सीटू की हड़ताल के आह्वान का असर सार्वजनिक परिवहन पर देखने को मिला है।  राज्यभर में 24 घंटे की हड़ताल के कारण बस, मिनी बस और टैक्सियां सड़कों पर नहीं दिखीं लेकिन मेट्रो सेवाएं सामान्य हैं। पूर्वी रेलवे के सूत्रों ने कहा कि हड़ताल से रेल सेवाओं को अलग रखा गया है।  हवाई अड्डा के सूत्रों ने कहा कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर विमान सेवाएं सामान्य थीं।
एक तरफ सरकार आम लोगों को महंगाई से मार रही है तो दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी दल बीजेपी विरोध की नौटंकी कर रही है। उसने शुक्रवार को दिल्ली में ऐसे लोगों को लेकर जूलूस निकाला जिनको बेघर होने का दर्द है लेकिन बीजेपी ऐसे जता रही है जैसे कि वे पेट्रोल-डीज़ल के खिलाफ सड़कों पर हैं। पेट्रोल-डीज़ल और रसोई गैस की बढ़ी क़ीमतों के खिलाफ बीजेपी ने दिल्ली के गोल डाकखाने पर एक प्रदर्शन का आयोजन किया। पुलिस ने ज्यादातर कार्यकर्ताओं को एहतियातन हिरासत में ले लिया। जुलूस में चल रही महिलाओं की गोद में छोटे बच्चे भी थे। हमें शक हुआ कि आखिर इतने छोटे बच्चों के साथ क्या ये वाकई महंगाई के लिए सड़क पर उतरी हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि इन पर महंगाई की भी भारी मार पड़ रही है लेकिन बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टी के कुछ कार्यकर्ता अपना उल्लू सीधा करने के लिए इनकी भावनाओं से खेल रहे हैं। इन लोगों का घर टूटा है लेकिन वे इनका इस्तेमाल महंगाई के मुद्दे पर सरकार को घेरने के लिए कर रहे हैं।’’
     यहां पर जो पंक्तियां रेखांकित की गई हैं उन्हें गौर से देखने से चैनल की पक्षधरता सहज ही समझ में आ जाएगी। सवाल यह है कि क्या खबर में संवाददाता की राय को शामिल करना सही होगा ? खबर या राय या मूल्य-निर्णय का फार्मूला सही है तो उसे कांग्रेस वाली खबर पर लागू क्यों नहीं किया ? असल में , यह मंहगाई के प्रतिवाद का उपहास उड़ाना है। नव्य-उदारतावाद की नीतियों के प्रतिवाद का उपहास करो,यही नीतिगत फार्मूला है जिससे टीवी चैनल संचालित हैं। वे प्रतिवाद को नौटंकी कह रहे हैं और चैनल के द्वारा की जा रही सरकारी कारसेवा को खबर की वस्तुगत प्रस्तुति कह रहे हैं।