सोमवार, 31 जनवरी 2011

1857 में भारत से आने वाले समाचार- कार्ल मार्क्स


     भारत से आने वाली पिछली डाक, जिसमें दिल्ली की 17 जून तक की और बंबई की 1 जुलाई तक की खबरें मौजूद हैं, भविष्य के संबंध में अत्यंत निराशापूर्ण चिंताएं उत्पन्न करती हैं। नियंत्रण बोर्ड (बोर्ड ऑफ कंट्रोल) के अध्यक्ष, मि. वर्नन स्मिथ ने जब भारतीय विद्रोह की पहले-पहल कॉमन्स सभा को सूचना दी थी, तो उन्होंने विश्वासपूर्वक कहा था कि अगली डाक यह खबर लेती आएगी कि दिल्ली को जमींदोज कर दिया गया है। डाक आई, लेकिन दिल्ली को अभी तक 'इतिहास के पृष्ठों से साफ' नहीं किया जा सका है। उस वक्त कहा गया था कि तोपखाने की गाड़ी 9 जून से पहले नहीं लाई जा सकेगी और इसलिए शहर पर, जिसकी किस्मत का फैसला हो चुका है, उस तारीख तक के लिए हमला रुक जाएगा। पर 9 जून भी बिना किसी उल्लेखनीय घटना के ही गुजर गया। 12 और 15 जून को कुछ घटनाएं हुईं, लेकिन उलटी ही दिशा मेंदिल्ली पर अंगरेजों का धावा नहीं हुआ, बल्कि अंगरेजों के ऊपर विप्लवकारियों ने हमला बोल दिया। लेकिन उनके बारंबार होने वाले इन हमलों को रोक दिया गया है। इस तरह दिल्ली का पतन फिर स्थगित हो गया है। इसका तथाकथित एकमात्र कारण अब घेरे के लिए तोपखाने की कमी नहीं है, बल्कि उसका कारण जनरल बरनार्ड का यह फैसला है कि और फौजों के आने का इंतजार किया जाए; क्योंकि उस प्राचीन राजधानी पर कब्जा करने के लिए, जिसकी 30 हजार देशी सिपाही हिफाजत कर रहे हैं और जिसके अंदर फौजी सामानों के तमाम गोदाम मौजूद हैं, 3 हजार सैनिकों की फौजी शक्ति एकदम नाकाफी थी। विद्रोहियों ने अजमेरी गेट के बाहर भी एक छावनी कायम कर ली थी। अभी तक फौजी विषयों के तमाम लेखक इस बारे में एकमत थे कि 3 हजार सैनिकों की अंगरेजी फौज 30 या 40 हजार सैनिकों की देशी सेनाको कुचलने के लिए बिलकुल काफी थी। और अगर बात ऐसी नहीं होती, तो लंदन टाइम्स के शब्दों में, इंगलैंड भारत को 'फिर से फतह करने' में समर्थ कैसे हो सकेगा?
भारत की सेना में वास्तव में 30 हजार ब्रिटिश सैनिक हैं। अगले छह महीनों में अंगरेज इंगलैंड से जो सैनिक वहां भेज सकते हैं, उनकी संख्या 20 या 25 हजार सैनिकों से अधिक नहीं हो सकती। इसमें से 6 हजार सैनिक ऐसे होंगे जो भारत में यूरोपियनों की खाली हुई जगहों पर काम करेंगे। बाकी बचे 18 या 19 हजार सैनिकों की शक्ति भी कठिन यात्रा की हानियों, प्रतिकूल जलवायु के नुकसानों और अन्य दुर्घटनाओं के कारण कम होकर लगभग 14 हजार सैनिकों की हो जाएगी। वे ही युध्द के मैदान में उतर सकेंगे। ब्रिटिश सेना को फैसला करना होगा कि या तो वह अपेक्षाकृत इतनी कम संख्या के साथ बागियों का सामना करे, या फिर उनका सामना करने का खयाल एकदम छोड़ दे। हम अभी तक इस चीज को नहीं समझ पा रहे हैं कि दिल्ली के इर्द-गिर्द फौजों को जमा करने के काम में वे इतनी ढिलाई क्यों दिखा रहे हैं। अगर इस मौसम में भी गर्मी एक अविजेय बाधा प्रतीत होती है, जो सर चार्ल्स नेपियर के दिनों में सिध्द नहीं हुई थी, तो कुछ महीनों बाद, यूरोपियन फौजों के आने पर, कुछ न करने के लिए बारिश और भी अच्छा बहाना उपस्थित कर देगी। इस चीज को कभी नहीं भुलाया जाना चाहिए कि वर्तमान बंगावत दरअसल जनवरी के महीने में ही शुरू हो गई थी; और, इस तरह, अपने गोला-बारूद और अपनी फौजों को तैयार रखने के लिए ब्रिटिश सरकार को काफी पहले से चेतावनी मिल चुकी थी।
अंगरेजी फौजों की घेरेबंदी के बाद भी दिल्ली पर देशी सिपाहियों का इतने दिनों तक कब्जा बने रहने का निस्संदेह स्वाभाविक असर हुआ है। बंगावत कलकत्ते के एकदम दरवाजे तक पहुंच गई है, बंगाल की 50 रेजीमेंटों का अस्तित्व मिट गया है, स्वयं बंगाल की सेना अतीत की एक कहानी मात्र रह गई है, और एक विशाल क्षेत्र में विप्लवकारियों ने इधर-उधर बिखरे और अलग-थलग जगहों में फंस गए यूरोपियनों की या तो हत्या कर दी है या वे एकदम हताश होकर अपनी हिफाजत करने की कोशिश कर रहे हैं। इस बात का पता लग जाने के बाद कि सरकार के आसन पर अचानक हमला करने का एक षडयंत्र रच लिया गया था जो, कहा जाता है कि, पूर ब्योरे के साथ मुकम्मिल था, स्वयं कलकत्ते के ईसाई बाशिंदों ने एक स्वयंसेक रक्षा-दल तैयार कर लिया है और वहां की देशी फौजों को तोड़ दिया गया है। बनारस में एक देशी रेजीमेंट से हथियार छीनने की कोशिश का सिखों के एक दल और 13वीं अनियमित घुड़सवार सेना ने विरोध किया है। यह तथ्य बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह मालूम होता है कि मुसलमानों की ही तरह सिख भी ब्राह्मणों के साथ मिलकर आम मोर्चा बना रहे हैं; और, इस तरह, ब्रिटिश शासन के विरुध्द समस्त भिन्न-भिन्न जातियों की व्यापक एकता तेजी से कायम हो रही है। अंगरेजों का यह दृढ़ विश्वास रहा है कि देशी सिपाहियों की सेना ही भारत में उनकी सारी शक्ति का आधार है।
अब, यकायक, उन्हें पक्का यकीन हो गया है कि ठीक वही सेना उनके लिए खतरे का एकमात्र कारण बन गई है। भारत के संबंध में हुई पिछली बहसों के दौरान भी, नियंत्रण बोर्ड (बोर्ड ऑफ कंट्रोल) के अध्यक्ष मि. वर्नन स्मिथ ने एलान किया था कि 'इस तथ्य पर कभी भी जरूरत से ज्यादा जोर नहीं दिया जा सकता कि देशी रजवाड़ों और विद्रोह के बीच किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं है।' दो दिन बाद, वर्नन स्मिथ को एक समाचार प्रकाशित करना पड़ा जिसमें अशुभ सूचक यह परिच्छेद है :
14 जून को अवध के भूतपूर्व बादशाह को, जिनके बारे में पकड़े गए कागजों से पता चला था कि वह षडयंत्र में शामिल थे, फोर्ट विलियम के अंदर कैद कर दिया गया था और उनके अनुयायियों से हथियार छीन लिए गए थे।
धीरे-धीरे और भी ऐसे तथ्य सामने आएंगे जो स्वयं जौन बुल तक को इस बात का विश्वास दिला देंगे कि जिसे वह एक फौजी बंगावत समझता है, वह वास्तव में, एक राष्ट्रीय विद्रोह है।
अंगरेजी अखबार इस विश्वास से बहुत सांत्वना पाते प्रतीत होते हैं कि विद्रोह अभी तक बंगाल प्रेसिडेंसी की सीमाओं से आगे नहीं फैला है और बंबई और मद्रास की फौजों की वफादारी के संबंध में रत्ती भर भी संदेह करने की गुंजाइश नहीं है। लेकिन सुखद विचार के इस पहलू को निजाम की घुड़सवार सेना में औरंगाबाद में शुरू हुई बंगावत के संबंध में पिछली डाक से आई खबर बुरी तरह काटती प्रतीत होती है। औरंगाबाद बंबई प्रेसिडेंसी के इसी नाम के एक जिले की राजधानी है। स्पष्ट है कि पिछली डाक ने बंबई की सेना में भी विद्रोह के श्रीगणेश का एलान कर दिया है। वास्तव में, कहा तो यह जाता है कि औरंगाबाद की बंगावत को जनरल वुडबर्न ने फौरन कुचल दिया है, लेकिन, क्या मेरठ की बंगावत को भी फौरन कुचल दिए जाने की बात नहीं कही गई थी? सर एच. लॉरेंस द्वारा कुचल दिए जाने के बाद, लखनऊ की बंगावत भी क्या पखवाड़े भर बाद पुन: और भी अदम्य रूप में नहीं फूट पड़ी थी? क्या यह याद नहीं है कि भारतीय फौज की बंगावत के संबंध में दी गई पहली सूचना के साथ ही साथ इस बात की भी सूचना नहीं दी गई थी कि शांति स्थापित कर दी गई है? बंबई या मद्रास की सेनाओं का अधिकांश यद्यपि नीची जाति के लोगों का बना है, लेकिन प्रत्येक रेजीमेंट में अब भी कुछ सौ राजपूत मिल जाएंगे। बंगाल की सेना के उच्च वर्ण के विद्रोहियों के साथ संपर्क स्थापित करने के लिए यह संख्या पर्याप्त है। पंजाब को शांत घोषित किया गया है, लेकिन इसी के साथ हमें सूचित किया गया है कि 'फिरोजपुर में, 13 जून को, फौजी फांसियां हुई थीं'! और, इसी के साथ बाघन की सेनापंजाब की 5वीं पैदल सेना की '55वीं देशी पैदल सेना का पीछा करने में सराहनीय कार्य करने' के लिए प्रशांसा की गई है। कहना पड़ेगा कि यह बहुत ही विचित्र प्रकार की 'शांति' है!
(14 अगस्त 1857 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 5091, में प्रकाशित हुआ।)


रविवार, 30 जनवरी 2011

28जनवरी जन्मदिन पर विशेष- जोसे मार्ती की विरासत- फिदेल कास्त्रो

             जोसे मार्ती के जन्म की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित विश्व संतुलन के लिए अंतर्राष्ट्रीय बैठक के विशिष्ट प्रतिभागियो,देशवासियो,
क्यूबावासियों के लिए मार्ती का क्या महत्व है? मार्ती जब 16 वर्ष के थे तब उन्हें पैरों में बेड़ियों के साथ कठोर कारावास में डाल दिया गया था। जब वे मुश्किल से 18 वर्ष के थे तो उन्होंने 'पॉलिटिकल प्रीजन इन क्यूबा' नामक दस्तावेज में दृढ़ता के साथ कहा था,'ईश्वर मौजूद है लेकिन अच्छाई के विचार में। वह प्रत्येक मानव के जन्म के समय मौजूद रहता है और उनकी आत्माओं में एक शुध्द आंसू रोप जाता है। अच्छाई ही ईश्वर है। आंसू शाश्वत अनुभूति का स्रोत है।'
हम क्यूबावासियों के लिए मार्ती अच्छाई के ऐसे ही विचार हैं।स्वतंत्रता के लिए 10 अक्टूबर 1868 से शुरू हुए संघर्ष को मार्ती के जन्म के ठीक 100 साल बाद जब 26 जुलाई 1963 से फिर शुरू किया गया तो उनके नैतिक सिध्दांतों की विरासत हमारे पास थी जिसके अभाव में हम क्रांति की बात सोच भी नहीं सकते थे। उनसे ही हमें देशभक्ति की प्रेरणा मिली और सम्मान तथा मानव गरिमा का विचार मिला। ऐसे उदात्त विचार दुनिया में और कोई हमें नहीं दे सकता था।
वे वास्तव में असाधारण और विशिष्ट व्यक्ति थे। वे एक सिपाही के बेटे थे तथा उनके माता-पिता स्पेनिश थे। वे अपनी जन्मभूमि की आजादी के लिए पैगंबर बने। वे बुध्दिजीवी और कवि थे। महान संघर्ष शुरू होने के समय वे नवयुवक थे। बाद में वे इस युध्द में ख्याति पाने वाले अपने से अधिक उम्र के अनुभवी सेना प्रमुखों के प्रेम, सम्मान, सहायता और श्रध्दा के पात्र बन गए।वे लोगों में शांति, एकता और सद्भाव के प्रबल हिमायती थे, लेकिन उपनिवेशवाद,दासता और अन्याय के खिलाफ न्यायपूर्ण और आवश्यक युध्द शुरू करने में उन्होंने कोई हिचक नहीं दिखाई। सबसे पहले उन्होंने ही अपना खून बहाया और अपने प्राण न्यौछावर किए। यह निजी परोपकारिता और उदारता का अविस्मरणीय प्रतीक था। जिन लोगों की आजादी के लिए वे लड़े, उनमें से अधिकांश ने अनेक वर्षों तक उन्हें भुलाए रखा लेकिन फिनिक्स की तरह उनकी राख से उनके विचार उभर कर सामने आए। उनकी मृत्यु की आधी शताब्दी के बाद पूरा देश विराट संघर्ष में कूद पड़ा। संघर्ष ऐसे जबर्दस्त विरोधी के साथ था जैसा किसी छोटे या बड़े राष्ट्र ने पहले कभी नहीं देखा था।
आज उनके जन्म की 150वीं वर्षगांठ के कुछ घंटों बाद पूरी दुनिया के विचारक और बुध्दिजीवी उनके जीवन और कृत्य के आगे नतमस्तक होकर भावभीनी श्रध्दांजलि दे रहे हैं।क्यूबा के बाहर की दुनिया को उनसे क्या मिला? उसे मिले शताब्दियों तक याद किए जाने योग्य सृजक और मानववादी के पद-चिह्न।
पद-चिह्न किसके लिए और क्यों? उनके लिए जो दुनिया को बचाने की उनकी जैसी आशा और सपने के साथ आज लड़ रहे हैं और जो कल लड़ेंगे। ये पद-चिह्न इसलिए क्योंकि उन्होंने वह नियति अपनाई जिसे आज मानवता अपने रू-ब-रू देख रही है, जिसके खतरों से वह वाकिफ हो रही है और जिसे उन्होंने अपनी गहरी दृष्टि और महान प्रतिभा के बल पर पहले ही भांप लिया और चेतावनी दी थी।
19 मई 1895 को मार्ती ने इस धरती के बाशिंदों के जीवन के अधिकार के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।
अपने नजदीकी दोस्त मैनुअल मरकाडो को लिखे गए अपने विख्यात अधूरे पत्र, जिसे उन्होंने एक औचक लड़ाई में शामिल होने के लिए जाने के कारण बीच में छोड़ दिया था,में उन्होंने इतिहास के लिए अपने अंतरंग विचार छोड़े। ये विख्यात विचार अकसर उध्दृत किए जाते हैं। फिर भी यहां मैं उसका जिक्र करूंगा :मुझे अपने देश के लिए तथा क्यूबा की आजादी के संघर्ष के दौरान अमरीका के एंटिलीज के पार फैलने तथा इस अतिरिक्त ताकत के बल पर हमारी अमरीकी भूमि पर कब्जा करने से रोकने के कर्तव्य के लिए रोजाना अपनी जान का खतरा रहता है। अब तक मैंने जो कुछ किया है और आगे जो कुछ करूंगा वह इसी उद्देश्य के लिए होगा।
अनुकरणीय लैटिन अमरीकी देशभक्त मैक्सिमो गोमेज (जो खुद डोमिनिकन मूल के थे और जिन्हें मार्ती ने क्यूबाई थल सेना का नेतृत्व संभालने के लिए चुना था) के साथ सेंटा डोमिंगो में मोंटे क्रिस्टी घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने के बाद तथा क्यूबा के लिए रवाना होने से पहले मार्ती ने अन्य अनेक दैदीप्यमान तथा क्रांतिकारी विचारों के साथ ऐसी प्रशंसनीय बात लिखी जिसे मैं यहां दोहराना चाहता हूं :'स्वतंत्रता के लिए क्यूबा का युध्द...महान मानववादी महत्व की घटना है। एंटिलीज का विवेकयुक्त शौर्य अमरीकी राष्ट्रों की ताकत तथा उनके साथ सही व्यवहार और दुनिया के अभी भी डावांडोल रहे संतुलन के लिए उपयुक्त सेवा दे रहा है।'
इस समय उस दूरस्थ और मृगमरीचिका लगने वाले संतुलन से अधिक आवश्यक और महत्वपूर्ण कुछ नहीं हैइस अंतिम वाक्य को उन्होंने कितनी दूरदर्शिता के साथ लिखा जो आज इस बैठक का केंद्रीय विषय बन गया है। आज उस दूरस्थ और मृगमरीचिका लगने वाले संतुलन से अधिक आवश्यक और महत्वपूर्ण कुछ नहीं है।
जोसे मार्ती के मैनुअल मरकाडो को लिखे पत्र के एक सौ छह वर्ष चार महीने और दो दिन बाद तथा मार्ती और गोमेज द्वारा मोंटेक्रिस्टी घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए जाने के 106 वर्ष, पांच महीने और छह दिन बाद अमरीका के राष्ट्रपति ने 20 सितंबर 2001 को कांग्रेस के सामने अपने भाषण में ये शब्द कहे :'हम अपने पास उलब्ध हर संसाधन का प्रयोग करेंगे।'
'अमरीकियों को केवल एक लड़ाई की उम्मीद नहीं होनी चाहिए, यह अभूतपूर्व तथा लंबा अभियान होगा।'
'प्रत्येक क्षेत्र में प्रत्येक राष्ट्र को फैसला करना होगा कि आप हमारे साथ हैं या आतंकवादियों के साथ हैं।'
'मेरा अपनी सेना के लिए भी एक संदेश है : तैयार रहो। मैंने सशस्त्र सेनाओं को सतर्क कर दिया है और इसका एक कारण है। वह घड़ी आ गई है जब अमरीका को कार्रवाई करनी होगी और हम आप पर गर्व करेंगे।'
'यह सभ्यता की लड़ाई है।'
'मानव स्वतंत्रता की प्रगति, हमारे समय की महानतम उपलब्धि और हर समय की सबसे बड़ी आशा अब हम पर निर्भर है।'
'यह संघर्ष क्या दिशा लेगा, मालूम नहीं। लेकिन परिणाम निश्चित है...और हम जानते हैं कि ईश्वर तटस्थ नहीं है।'
वेस्ट प्वाइंट सैन्य एकेडेमी की 200वीं वर्षगांठ के अवसर पर दिए गए अपने भाषण में अमरीका के राष्ट्रपति ने अन्य बातों के अलावा यह कहा :
'हम जिस दुनिया में प्रवेश कर गए हैं उसमें सुरक्षा का केवल एक ही रास्ता है और वह है कार्रवाई। हमारा राष्ट्र कार्रवाई करेगा।'
'अपनी सुरक्षा के लिए हमें आपके नेतृत्व वाली सेना का रूप बदलना होगा उसे ऐसी सेना बनाना होगा जो एक क्षण की सूचना पर दुनिया के किसी भी अंधेरे कोने पर हमला कर सके। हमारी सुरक्षा के लिए यह भी जरूरी होगा कि प्रत्येक अमरीकी आशावादी और संकल्पी हो तथा हमारी स्वतंत्रता और हमारे जीवन की रक्षा के लिए जब भी जरूरी हो हम रोकथाम की कार्रवाई कर सकें।'
'हमें 60 या उससे अधिक देशों में आतंक के ठिकानों का पर्दाफाश करना
चाहिए।'
'हम जहां जरूरत है वहां अपने राजदूत भेजेंगे और जहां तुम्हारी, हमारे सिपाहियों की जरूरत है, वहां हम तुम्हें भेजेंगे।'
'हम अच्छाई और बुराई के संघर्ष में डूबे हैं। हम समस्या पैदा नहीं करते, समस्या उजागर करते हैं। इसका विरोध करने में हम दुनिया का नेतृत्व करेंगे।'
आज जब दुनिया में 6.4 अरब बहुत अमीर और बहुत गरीब लोगों को अपने अस्तित्व के लिए खतरा नजर आ रहा है ऐसी स्थिति में ये विचार यदि मार्ती जैसे व्यक्ति की कुशाग्र बुध्दि से तेजी से टकराए होते तो उनके विशाल हृदय को कितनी चोट पहुंचती।
ये शब्द पागलखाने के अंधेरे कोने से किसी पागल ने नहीं बोले हैं। इस दमदार आवाज के पीछे हैं लाखों परमाणु हथियार,करोड़ों विनाशकारी बम और प्रक्षेपास्त्र, निशाना साधे हुए लाखों प्रक्षेपास्त्र, पायलटों वाले और पायलट रहित हजारों बमवर्षक और लड़ाकू विमान, दर्जनों नौसेना स्क्वाड्रन, विमान वाहकों सहित टुकड़ियां, परमाणु चालित या परंपरागत पनडुब्बियां, दुनिया के हर कोने में अनुमति के साथ या अनुमति के बगैर बनाए गए सैनिक ठिकाने, धरती के चप्पे-चप्पे पर टोही नजर रखने वाले सेना के उपग्रह,मजबूत तथा तुरंत संदेश देने वाली संचार व्यवस्था जो दूसरे देशों की संचार व्यवस्था को ठप्प कर सकती है और साथ ही दूसरों के करोड़ों संदेशों को अवरुध्द कर सकती है, अकल्पनीय रसायन तथा जैविक हथियार तथा 400 अरब डालर का सेना बजट जिसके बराबर रकम से दुनिया की बहुत सारी समस्याएं हल की जा सकती हैं। ये धमकियां उस व्यक्ति द्वारा दी गई हैं जिसके पास सामान है और जो इन साधनों का इस्तेमाल कर सकता है। बहाना क्या है? 11 सितंबर का वहशियाना हमला जिसमें हजारों अमरीकी नागरिकों की जानें चली गईं। पूरी दुनिया ने अमरीकी अवाम के साथ हमदर्दी व्यक्त की और रोष के साथ हमले की निंदा की। पूरी दुनिया से इस व्यापक समर्थन के बल पर वह राजनीतिक, धार्मिक हर कोण से आतंकवाद के ज्वार से मुकाबला कर सकता था।
क्यूबा ने प्रस्ताव किया था कि यह लड़ाई बुनियादी तौर पर राजनीतिक और नैतिक होनी चाहिए तथा दुनिया के सभी देशों के हित में और उनके समर्थन के साथ होनी चाहिए। किसी के मन में भी यह विचार नहीं आया होगा कि हमें बेकसूर लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाले तथा व्यक्तियों, समूहों, संगठनों या शासन अथवा सरकार द्वारा मचाए जाने वाले बेतुके, बदनाम और अलोकप्रिय आतंकवाद का सामना करना पड़ेगा जिसमें आतंक को कुचलने के नाम पर वहशी सरकारी आतंक का इस्तेमाल किया जाता है और यह दावा किया जाता है कि महाशक्ति को पूरे राष्ट्रों को नष्ट करने तथा परमाणु और आम विनाश के हथियार इस्तेमाल करने का पूरा अधिकार है। विश्वमत अधिकांशत: इस घोषित युध्द के खिलाफ है। इस क्षण जब हम इतिहास में संभवत: पहली बार विश्व संतुलन का विचार प्रस्तुत करने वाले जोसे मार्ती की 150वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, एक ऐसा युध्द शुरू होने वाला है जो धरती पर अभूतपूर्व सैनिक असंतुलन का परिणाम है। कल वह समय सीमा खत्म हो गई जिसके आधार पर दुनिया की सबसे ताकतवर महाशक्ति संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा या उसके बगैर एक अन्य देश के खिलाफ अत्यंत परिष्कृत हथियार इस्तेमाल करने का इकतरफा बहाना बना रही है। इस संस्था पर भी सवाल खड़े किए जा सकते हैं क्योंकि यहां पांच स्थायी सदस्याें को वीटो का अधिकार है जो संयुक्त राष्ट्र महासभा में शेष लगभग 200 प्रतिनिधि देशों के अत्यंत मौलिक लोकतांत्रिक अधिकार का हनन है।
वीटो के विशेषाधिकार का प्रयोग भी इसी सरकार ने किया है जो परिषद की मर्जी के बगैर आगे बढ़ने को अपना अधिकार बताती है। शेष स्थायी सदस्यों ने इसका बहुत कम प्रयोग किया है। पिछले 12वर्षों में सैनिक ताकत के संदर्भ में इसके सदस्यों में जो बुनियादी बदलाव आया है उसे देखते हुए यह असंभव लगता है कि इनमें से कोई एक देश वीटो का प्रयोग उस सदस्य के खिलाफ करेगा जो कि न केवल जबर्दस्त सैन्य शक्ति बल्कि आर्थिक, राजनीतिक, शिल्प वैज्ञानिक ताकत के कारण महाशक्ति बना हुआ है।
विश्व जनमत अधिकांशत: उस घोषित युध्द के खिलाफ है। लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हाल ही में कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार 65 फीसदी अमरीकी आबादी सुरक्षा परिषद की अनुमति के बगैर उस हमले के खिलाफ है। लेकिन यह कोई बड़ी बाधा नहीं है। सेना भेज दी गई है और वह कार्रवाई के लिए तैयार है। सर्वाधिक परिष्कृत हथियारों की परीक्षा भी तो जरूरी है। जिस देश के अस्तित्व का खतरा है उसके शासकों द्वारा धमकी देने वाले की सभी मांगें मान लिए जाने के अलावा इस युध्द के टलने की कोई संभावना नहीं है।
सैनिक संघर्ष या ऐसी स्थिति में क्या होगा, कोई नहीं जानता। इस समय पक्के तौर पर केवल यह कहा जा सकता है कि इराक युध्द के खतरे के विश्व अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़े हैं। इराक में एक भी गोली चलने से पहले ही वह गंभीर हालत में है। इस संकट को वेनेजुएला की बोलिवेरियन सरकार के खिलाफ फासीवादी तख्तापलट ने और भी गहरा कर दिया है। वेनेजुएला तेल का सबसे बड़ा निर्यातक है। तख्तापलट के कारण इस महत्वपूर्ण उत्पाद की कीमतें इतनी अधिक हो गई हैं कि वह दूसरे देशों विशेषकर गरीब राष्ट्रों की पहुंच के बाहर हो गया है।
अब यह आम राय है कि इराक युध्द का मकसद तेल तथा प्राकृतिक गैस के दुनिया के तीसरे बड़े भंडार पर कब्जा करना है। यह यूरोपियन राष्ट्रों तथा विकसित देशों के लिए चिंता का विषय है जो अमरीका के ठीक विपरीत अपनी ऊर्जा का 80 फीसदी आयात करते हैं। अमरीका अपने उपयोग का केवल 20-25 फीसदी तेल आयात करता है।
कल 28 जनवरी को रात नौ बजे अमरीकी राष्ट्रपति ने कांग्रेस को बताया कि अमरीका इराक की अवज्ञा पर विचार करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक 5 फरवरी को बुलाने के लिए कहेगा। उसने कहा कि यह परामर्श प्रक्रिया गलतफहमी से बचने के लिए चलाई जा रही है तथा अमरीकी जनता तथा विश्व शांति के लिए यदि इराक ने युध्द को निरस्त नहीं किया तो अमरीका उसे निरस्त करने के लिए बने गठजोड़ का नेतृत्व करेगा। उसने यह भी कहा कि यदि अमरीका को युध्द करने लिए बाध्य किया गया तो वह अपने पूरे हथियारों और सशस्त्र सेनाओं को युध्द में झोंक देगा। सुरक्षा परिषद के अनुमोदन के बारे में उसने एक भी शब्द नहीं बोला। एक मात्र महाशक्ति द्वारा अपनी मर्जी से युध्द थोपे जोने के उस क्षेत्र में भयंकर परिणाम तो होंगे ही उनके अलावा आर्थिक क्षेत्र में असंतुलन बहुत बड़ी त्रासदी होगी।
अमीर और गरीब देशों के बीच तथा उनके अपने भीतर विषमता बढ़ती और गहराती जा रही है। दूसरे शब्दों में धन के वितरण में दरार बढ़ती जा रही है। यह हमारे युग की महाविपत्ति बन गई है जिसकी वजह से मनुष्यों में असह्य गरीबी, भूख, अज्ञान, बीमारी और तकलीफें बढ़ती जा रही हैं।
हम यह कहने का साहस क्यों नहीं करते कि भयंकर विषमताओं, अज्ञान, पूर्ण निरक्षरता के बीच तथा राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक और कलात्मक संस्कृति के अभाव में किसी तरह के लोकतंत्र, स्वतंत्र चयन या वास्तविक आजादी की बात नहीं हो सकती? इस समय बहुत कम लोगों को यह सब उपलब्ध है। विकसित देशों में भी भयावह स्थिति है जहां खरबों डालर वाणिज्यिक और उपभोक्तावादी विज्ञापनों पर खर्च किए जा रहे हैं जो जहर फैलाकर कभी पूरी न होने वाली इच्छाएं और सपने पैदा कर रहे हैं। इससे फिजूलखर्ची और परायापन बढ़ रहा है तथा मनुष्य की सहज जीवन स्थितियां हमेशा के लिए खत्म हो रही हैं। मुश्किल से डेढ़ शताब्दी में हमने ऊर्जा के भंडार, पक्के और संभावित भंडार खत्म कर दिए हैं जिन्हें तैयार करने में प्रकृति को 30 करोड़ वर्ष लगे। इनकी मुश्किल से ही पूर्ति होगी।
आज दुनिया की जटिल आर्थिक समस्याओं के बारे में जन समुदाय क्या जानता है? उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक या विश्व व्यापार संगठन और अन्य ऐसी ही संस्थाओं के विषय में किसने जानकारी दी है? आर्थिक संकटों, उनके कारणों तथा परिणामों को उनके सामने किसी ने स्पष्ट किया है? उन्हें किसने बताया है कि पूंजीवाद, मुक्त उद्यम और मुक्त प्रतिस्पर्धा अब बिरले ही देखने को मिलते हैं और वास्तव में 80 फीसदी विश्व उत्पादन और व्यापार पर 500 बड़े अंतर्राष्ट्रीय निगमों का नियंत्रण है? उन्हें स्टॉक एक्सचेंज, जिन उत्पादों पर तीसरी दुनिया के राष्ट्र निर्भर रहते हैं उनकी सट्टाबाजारी, प्रतिदिन खरबों डालर की मुद्रा की खरीद-फरोख्त के बारे में कौन बताता है? उन्हें किसने समझाया है कि तीसरी दुनिया की मुद्राएं कागज के टुकड़े भर हैं जिनका लगातार अवमूल्यन होता रहता है तथा उनकी वास्तविक या लगभग वास्तविक निधियां फिजिक्स के न्यूटन के नियम की तरह धनी देशों की तरफ चली जाती हैं और इस वास्तविकता के भयंकर और भौतिक परिणाम क्या हैं? या हम पर खरबों डालर का कर्ज क्यों है जबकि पांच वर्ष से छोटे बच्चों सहित हमारे करोड़ों लोग भूख और असाध्य बीमारियों से हर साल मर जाते हैं? कितने लोग जानते हैं कि हमारे देशों की प्रभुसत्ता केवल कागजों में है, ऐसी संधियों में जिनमें हमारी तीसरी दुनिया के राष्ट्रों की कोई भागीदारी नहीं होती और इसके विपरीत हमारा और अधिक शोषण और परतंत्रीकरण क्यों हो रहा है? हमारे कितने लोग जानते हैं कि हमारी राष्ट्रीय संस्कृतियों को लगातार नष्ट किया जा रहा है?
ऐसे असंख्य सवाल हैं। एक और सवाल काफी होगा। यह उन लोगों के लिए है जो पाखंडी हैं और मानवों, देशों तथा पूरी मानवता के निहायत पवित्र अधिकारों के बारे में झूठ बोलते हैं। हम मार्ती की एक सूक्ति में समाविष्ट सुंदर तथा गहरे सत्य को जीवन में चरितार्थ क्यों नहीं करते : 'शिक्षा ही मुक्ति का मार्ग है?'
मैं उस देश की ओर से दृढ़ता के साथ यह बात कह रहा हूं जिसने चालीस से अधिक वर्षों से बगैर घबराए जबर्दस्त घेराबंदी और ऐसे कठोर आर्थिक युध्द को झेला है जो समाजवादी जगत और सोवियत संघ के टूट जाने के फलस्वरूप बाजार, व्यापार तथा विदेशी आपूर्ति के नुकसान के कारण और भी प्रबल हो गया है (करतल ध्वनि) और जो देश दुनिया का सर्वाधिक संगठित, सामाजिक दृष्टि से विकसित देश है और जिसके पास बुनियादी ज्ञान तथा राजनीतिक और कलात्मक संस्कृति है। एक छोटा गरीब देश बहुत कम से बहुत कुछ कर सकता है ।जिस वीर पुरुष के सफल जन्म की वर्षगांठ हम यहां मना रहे हैं उसका सम्मान हमने यह दिखा कर किया है कि एक छोटा गरीब देश सीखने के दौरान जरूरी गलतियां करने के साथ-साथ बहुत थोड़े से बहुत कुछ कर सकता है।
उनकी स्मृति में क्यूबा की सबसे बड़ी श्रध्दांजलि यह है कि उसने ऐसी खंदक बनाना और उसकी रक्षा करना सीख लिया है जिसे पार करके बड़ी से बड़ी ताकत अमरीकी और दुनिया के अन्य देशों तक नहीं पहुंच सकती। उनसे हमें विचारों के अथाह मूल्य और उनकी ताकत के बारे में पता चला। उत्तर में स्थित शक्तिशाली पड़ोसी द्वारा मानवता पर लादी गई असह्य आर्थिक व्यवस्था चल नहीं सकती। अत्यधिक परिष्कृत हथियार इतिहास की धारा को नहीं मोड़ सकते।
जो लोग शताब्दियों से बेशी मूल्य और सस्ता श्रम प्रदान कर रहे हैं उनकी संख्या अरबों में पहुंच गई है। उन्हें मक्खियों की तरह नहीं मारा जा सकता। वे अपने साथ हो रहे अन्याय के प्रति लगातार जागरूक होते जा रहे हैं। यह अन्याय भूख, बेइज्जती के जरिए तथा स्कूलों और शिक्षा के अभाव में उनके ऊपर हो रहा है। सबसे बड़ा अन्याय वह घिसा-पिटा झूठ है जिसके जरिए एकाधिकारी सत्ता जनसंचार माध्यमों का उपयोग कर उन्हें
हमेशा के लिए गुलामी की स्थिति में रखना चाहती है। उन्होंने हाल ही में ईरान, इंडोनेशिया, इक्वेडोर और अजर्ेंटीना से बड़े साफ सबक सीखे हैं। एक भी गोली चलाए बगैर, यहां तक कि बगैर किसी हथियार के जन समुदाय सरकारों को धूल चटा सकता है।
राष्ट्रीय सिपाही अपने देशवासियों को गोली मारने से हिचक रहे हैं। प्रत्येक कारखाने, प्रत्येक स्कूल, प्रत्येक पार्क और प्रत्येक समुदाय केंद्र पर राइफल, हैलमेट और संगीन लगाकर कोई एक विदेशी सिपाही दुनिया पर शासन नहीं कर सकता।औद्योगिक राष्ट्रों के अधिकाधिक बुध्दिजीवी, जागरूक मजदूर और मध्य वर्गों के लोग देशों तथा प्रकृति के विरुध्द निर्मम युध्दों से मानवता को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
इतिहास ने दिखाया है कि बड़े संकटों से बड़े समाधान निकले हैं। इनमें से ही नेता पैदा हुए हैं। इस बात में कोई विश्वास नहीं करेगा कि व्यक्ति इतिहास रचते हैं। वे इतिहास की प्रक्रियाओं को प्रभावित करते हैं। वे अपनी निपुणता से उसे आगे बढ़ाते हैं या अपनी कमियों तथा गलतियों से उसे आगे बढ़ने से रोकते हैं लेकिन वे अंतिम परिणाम तय नहीं करते। मार्ती जैसा मेधावी व्यक्ति भी यदि 30 साल पहले या बाद में पैदा होता तो वह भी इतिहास में अज्ञात रहता। वोलिवर, सक्र, जुआरेज, लिंकन तथा ऐसे ही अनेक प्रशंसनीय लोगों के बारे में भी यही कहा जा सकता है।
जहां तक क्यूबा का सवाल है हमारा राष्ट्रीय नायक 1823 में पैदा हुआ तथा उसने बागानों और भारी संख्या में गुलामों से भरे गुलाम समाज में 1853 में अपना 30वां जन्म दिन मनाया। 1868 में हमारा पहला स्वतंत्रता संग्राम शुरू करने वाले महान योध्दाओं ने उस समय जो प्रबल राष्ट्रवादी और देशभक्ति की भावना पैदा की उसके अभाव में वह हमारे देश के इतिहास के लिए इतनी बड़ी भूमिका अदा नहीं कर पाता।
इसलिए मेरा दृढ़ विश्वास है कि सबसे बड़ी लड़ाई विचारों के क्षेत्र में होगी, हथियारों के क्षेत्र में नहीं क्योंकि बुध्दि और सही ध्येय के लिए लड़ रहे लोगों की धैर्यशील चेतना में हर ताकत, हर हथियार, रणनीति और हर युक्ति की काट है। वैसे अगर हम पर युध्द थोप दिया जाता है तो ऐसी स्थिति में हम हथियारों के इस्तेमाल की जरूरत से इनकार नहीं करते।
अमरीका में भी अपनी जड़ों से जुड़े हुए कुछ लोग हैं जिन्हें हमने कभी शत्रु के रूप में नहीं देखा। 40 से अधिक वर्षों से हम जिन धमकियों और हमलों का सामना कर रहे हैं उनके लिए हमने उन्हें कभी दोषी नहीं ठहराया। ऐसे मित्र और मानवता के सही ध्येय के लिए संभावित साथी वहां मौजूद हैं। (करतल ध्वनि)
वियतनाम युध्द के दौरान हमने ये साथी देखे। इसे हमने उस भावना में देखा जो कि छोटे एलियान गोंजालेज के अपहरण की तरह हमें छू गई। इसे हमने मार्टिन लूथर किंग के संघर्ष में सहयोग के रूप में देखा। इसे हमने नव उदार भूमंडलीकरण के खिलाफ खड़े कनाडियाई, लैटिन अमरीकी और यूरोपियाई जनगण के साथ उठी आवाज के रूप में
सीएटल और क्यूबेक में देखा। कम से कम सुरक्षा परिषद के अनुमोदन के बगैर अनावश्यक युध्द के विरोध के रूप में हम यह पहले ही देख रहे हैं। कल हम इसे दुनिया के उन दूसरे देशों का साथ देने के रूप में देखेंगे जो मानव जाति को उसके अपने ही पागलपन से बचाने के एक मात्र रास्ते पर चलना चाहते हैं।
यहां मौजूद प्रतिष्ठित आगंतुकों को सुझाव देने की हिम्मत करते हुए मैं कहना चाहता हूं कि आप अपने काम को जारी रखें। हमें धमकाने तथा एक अन्यायपूर्ण, विवेकहीन तथा न चलने वाली आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था का गुलाम बनाने के लिए जो विनाश के परिष्कृत हथियार लगाए जा रहे हैं उसके खिलाफ आप नए विचार बोएं, नए विचार बोएं, नए विचार बोएं; नई जागरूकता बोएं, नई जागरूकता बोएं, नई जागरूकता बोएं।
बहुत-बहुत धन्यवाद।
(करतल ध्वनि)








शनिवार, 29 जनवरी 2011

जेएनयू छात्र प्रतिवाद का स्वर्णिम पन्नाः इंदिरा गांधी वापस जाओ


( जेएनयू कुलपति के ऑफिस के सामने प्रतिवाद करते हुए छात्र)
     जेएनयू में रहते हुए अनेक सुनहरे पलों को जीने का मौका मिला था। जेएनयू के पुराने दोस्तों ने काफी समय से एक फोटो फेसबुक पर लगाया हुआ है। यह फोटो और इसके साथ जुड़ा प्रतिवाद कई मायनों में महत्वपूर्ण है। छात्र राजनीति में इस प्रतिवाद की सही मीमांसा होनी चाहिए। उन छात्रों को रेखांकित किया जाना चाहिए जो पुलिस लाठाचार्ज में घायल हुए। उन छात्रनेताओं की पहचान की जानी चाहिए जो नेतृत्व कर रहे थे। उन परिस्थितियों का मूल्यांकन भी किया जाना चाहिए जिसमें यह प्रतिवाद हुआ था।
संभवतः 30 अक्टूबर 1981 का दिन था वह। इस दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.श्रीमती इंदिरागांधी जेएनयू में आयी थीं। याद करें वह जमाना जब श्रीमती गांधी 1977 की पराजय के बाद दोबारा सत्ता में 1980 में वापस आयीं। जेएनयू के छात्रों के प्रतिवाद का प्रधान कारण था कि आपातकाल में लोकतंत्र की हत्या में वे अग्रणी थीं,जेएनयू के छात्रों के दमन में भी वे अग्रणी थीं। स्कूल आफ इंटरनेशनल स्टैडीज के तत्कालीन डीन के.पी मिश्रा ने उन्होंने स्कूल के 25 साल होने पर बुलाया था,छात्रों ने आमसभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास करके उनके आने का विरोध किया था। मैं उस समय कौंसलर था।
      छात्रसंघ का एक प्रतिनिधिमंडल वी.भास्कर ,अध्यक्ष छात्रसंघ के नेतृत्व में तत्कालीन कुलपति नायडुम्मा को छात्रों के विरोध और प्रतिवाद से अवगत करा चुका था। इसी बीच में छात्रसंघ के चुनाव आ गए और 22 अक्टूबर1981 को नयी लीडरशिप आ गयी जिसमें सारा नेतृत्व एसएफआई और एआईएसएफ के हाथ में अमरजीत सिंह सिरोही अध्यक्ष ,अजय पटनायक,महामंत्री,आर.वेणु उपाध्यक्ष,सोनिया गुप्ता सहसचिव थीं। रोचक बात यह थी कि मैं उपाध्यक्ष का चुनाव 18 वोट से हार गया था। दो-तिहाई बहुमत से एसएफआई-एआईएसएफ मोर्चा जीता था।
     चुनाव में श्रीमती गांधी के प्रतिवाद का सवाल प्रमुख सवाल था और नये नेतृत्व पर इसकी जिम्मेदारी थी। मैं उस समय एसएफआई का यूनिट अध्यक्ष और राज्य का उपाध्यक्ष था। कैंपस में श्रीमती गांधी के आगमन के खिलाफ जितना गहरा आक्रोश मैंने उस समय देखा था वह आज भी जेएनयू छात्रों की प्रतिवादी लोकतांत्रिक भावनाओं की यादों को ताजा कर रहा है। सारा कैंपस श्रीमती गांधी के खिलाफ प्रतिवाद पर एकमत था। मुझे याद है कर्मचारियों का जिस तरह का समर्थन हमें मिला था वह बहुत महत्वपूर्ण था। के.पी.मिश्रा-नायडुम्मा की लॉबी को कैंपस में अलग-थलग करने में हमें जितना व्यापक समर्थन मिला था उसने छात्रों के हौसले बुलंद कर दिए थे।

(श्रीमती इंदिरा गांधी के आगमन का विरोध करते हुए जेएनयू छात्र)    
याद पड़ रहा है कि श्रीमती गांधी के भाषण को दिल्ली के किसी आखबार ने हैडलाइन नहीं बनाया था सभी अखबारों में एक ही बड़ी खबर थी जेएनयू के छात्रों का प्रतिवाद और मुखपृष्ठ पर लाठीचार्ज की खबरें,लाठीचार्ज के बाद छात्रनेताओं की गिरफ्तारी और कैंपस में जो फूलों के गमले टूटे थे उसकी खबरें।
    दूरदर्शन पर श्रीमती गांधी के भाषण के अंश भी दिखाए गए थे जिसमें वे भाषण दे रही थीं और पृष्ठभूमि में हजारों छात्रों-कर्मचारियों के कंठों से निकला एक ही नारा गूंज रहा था ' इंदिरा गांधी वापस जाओ।' कुल मिलाकर 15 मिनट उन्होंने भाषण दिया और भाषण के दौरान सभास्थल पर अंदर प्रत्येक 30 सैकिण्ड में एक छात्र उठ रहा था और नारा लगा रहा था 'इंदिरा मुर्दाबाद','इंदिरा गांधी वापस जाओ।'
     छात्रसंघ का फैसला था कि इस समारोह का बहिष्कार करेंगे। साथ ही सभा के पण्डाल में जाकर प्रत्येक 5 सीट के बाद हमारा एक छात्र रहेगा जो उनके भाषण के दौरान उठकर प्रतिवाद  करेगा। तकरीबन 30 छात्रों की उस दौरान गिरफ्तारी हुई थी। समूचे पण्डाल में पुलिस ही पुलिस थी कुछ शिक्षक और अधिकारी भी थे। पुलिस की सारी चौकसी भेदकर छात्रों ने पण्डाल में प्रवेश किया था,सभी परेशान थे कि आखिरकार भीतर कैसे जाएंगे। लेकिन हम लोगों ने किसी तरह सेंधमारी करके छात्रों को अंदर घुसेड़ने में सफलता हासिल कर ली थी। जब श्रीमती गांधी अंदर भाषण दे रही थीं बाहर कई हजार छात्र-कर्मचारी एकस्वर से नारे लगा रहे थे। नारों का इतना जबर्दस्त असर और छात्रों-कर्मचारियों और प्रतिवादी शिक्षकों की ऐसी एकता जेएनयू के इतिहास में विरल थी।
     श्रीमती गांधी के कैंपस में आने के पहले से ही नारों से आकाश गूंज रहा था और जब वो आई तो पहलीबार इंटरनेशनल स्टैडीज के सामने और जेएनयू वीसी के ऑफिस के सामने से पुलिस की घेराबंदी को तोड़ने की एकजुट कोशिश आरंभ हुई और पुलिस का बर्बर लाठीचार्ज शुरू हुआ। मुझे याद है उस समय हिंसा छात्रों ने आरंभ नहीं की थी। जेएनयू के दोनों गेट पर छात्र और कर्मचारी प्रतिवाद कर रहे थे।हरबंस मुखिया आदि कुछ शिक्षक भी उसमें शामिल थे। नारेबाजी चल रही थी स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टैडीज के सामने और वीसी ऑफिस के सामने। अचानक पुलिस ने नारे लगाते छात्रों को जबर्दस्ती ठेलने की कोशिश की थी इंटरनेशनल स्टैडीज के सामने और फिर लाठीचार्ज किया जिसमें मुझे पीटते हुए पुलिस ने सबसे पहले गडढे में गिरा दिया उसके बाद छात्रों ने जमकर प्रतिवाद किया।
   वीसी ऑफिस के सामने वहां सिरोही छात्रसंघ के अध्यक्ष के रूप में नेतृत्व कर रहे थे उन्होंने श्रीमती गांधी की कार पर लंबी छलांग लगाई और वे किसी तरह 6-7 मीटर लंबी जंप के बाद श्रीमती गांधी की गाड़ी के सामने सारी सुरक्षा व्यवस्था को तोड़कर जाकर गिरे ,उन्हें पुलिस ने पकड़ा।दोनों ओर तेज लाठीचार्ज हुआ था,200 से ज्यादा छात्रों को चोटें आईं। अनेक को गिरफ्तार करके पुलिस ले गई।
जेएनयू में प्रतिवाद का यह शानदार दिन था।मुझे याद है इंटरनेशनल स्टैडीज के सामने हम सैंकड़ो छात्रों के साथ प्रतिवाद कर रहे थे,मेरे साथ सुहेल हाशमी भी थे, मैं पुलिस की लाठी खाने से डर रहा था,उन्होने मुझे ठेलकर आगे किया और कहा डरो मत,मैंने उस दिन के लिए नई ब्लैक शर्ट बनवायी थी,छात्र ब्लैक बिल्ले लगाए हुए थे। पुलिस की पिटाई से मेरी शर्ट फट गयी, जिस समय पहली लाठी मेरे ऊपर पड़ी थी छात्रों में तो जबर्दस्त आक्रोश की लहर दिखी ही थी साथ ही सबसे आगे आकर हरबंस मुखिया साहब ने चीत्कार करते हुए प्रतिवाद किया था। मजेदार बात यह थी कि मैं उपाध्यक्ष का चुनाव हारा था। वेणु जीता था। वह कहीं नहीं दिख रहा था। प्रतिवाद के बाद नेताओं और छात्रों को पुलिस जब पकड़कर ले जा रही थी तो संभवतः वह पीछे से किसी तरह जाकर गिरफ्तार छात्रों में शामिल हो गया, उस समय उसके फ्री थिंकर्स दोस्तों ने भेजा कि जाओ वरना नाक कट जाएगी। हमारे संगठन का निर्णय था कि मैं गिरफ्तारी नहीं दूँगा बाहर रहूँगा लेकिन पुलिस वाले सबसे पहले लाठीचार्ज करते हुए मुझे ही पकड़कर ले गए।याद पड़ रहा है जिस समय वे पीट रहे थे उस समय एक थानेदार ने मुझे पिटने से बचाया,वह थानेदार जानता था मुझे । क्योंकि उसका एक भाई हरियाणा में एसएफआई करता था।वरना उसदिन मैं बहुत पिटता। लेकिन मुझे पुलिस लाठी खाने के लिए आगे ठेलने के लिए मैं आजतक सुहेल को याद करता हूँ।
इस प्रतिवाद का शानदार पक्ष था कुलपति का लाठीचार्ज के लिए लिखित माफी मांगना और श्रीमती गांधी को बुलाने के फैसले पर खेद व्यक्त करना। जेएनयू में इसके पहले किसी कुलपति ने अपने फैसले पर इस तरह दुख व्यक्त नहीं किया था। यह हमारे लोकतांत्रिक आंदोलन की सफलता थी कि विश्वविद्यालय को अपने फैसले पर अफसोस जाहिर करना पड़ा। सारे छात्रनेताओं को तत्काल रिहा किया गया और सारे मामले वापस लिए गए। यह सब कुछ हुआ अहिंसक ढ़ंग से।

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

हिन्दीभाषी पूंजीपति का हिन्दीभाषा से अलगाव क्यों ?





     हमारे मित्र विमलेश त्रिपाठी युवा कवि हैं और मेरे छात्र भी रहे हैं। वे आए दिन मेरी खबर सुध ले लेते हैं। उनसे चैट के जरिए आज जो बात हुई उसमें अचानक कई विचारणीय समस्याएं अचानक सामने आ खड़ी हुईं। मैं यहां वह बातचीत रख रहा हूँ आप लोग भी इन समस्याओं पर सोचें।- विमलेश ने रोमन हिन्दी में कहा है और मैंने देवनागरी में। 
- good morning sir
- कहिए
कैसे हैं

 kaise hain sir?
main thik hun....thora busy tha idhar kuchh kaamon men....

 एकदम ठीक,
क्या कर रहे हो इन दिनों ,
खूब लिख रहे हो यह अच्छी बात है

nahin sir khub kahan likh raha hun....
aapne ko bachana hai to likhna padega...bas utna hi likh raha hun

 कुछ सामयिक विषयों पर आसपास के हिन्दी-अहिन्दीभाषियों की समस्याओं और जिंदगी पर भी लिखो
पश्चिम बंगाल के बारे में लोग कम जानते हैं
jee 
कम से कम सप्ताह में एक पन्ना जरूर लिखो
jee aapka sujhav dhyan me rakhunga 
मुझे बेहद तकलीफ होती है, यहां के हिन्दीभाषियों को देखकर
jee, ye to hai... ajib log hain....

 मैंने अभिव्यक्तिविहीन हिन्दीभाषी ,वह भी शिक्षित यहीं पर देखे हैं । तुम लोगों की जिम्मेदारी है जो अभिव्यक्त करना नहीं जानते हैं,उनको वाणी दो ।
   jee, sahi kah rahe hain aap
देखो मैंने मीडिया और आलोचना में वह क्षेत्र चुना जिसे हिन्दी वाले नहीं जानते थे,कोलकाता को गंभीर किताबों के लिए नहीं जानते थे। मैंने यहीं रहकर काम किया और हिन्दी वालों की सेवा की। यह हमारी-तुम्हारी जिम्मेदारी है।
jee, aapne to aapne field me bahut kaam kiya hai, aur achha kaam kiya hai 

 एकबार तुम अपना समय गद्य को दो, यहां के यथार्थ पर लिखो, समस्याओं पर लिखो,बेहद जरूरी है। यहां के हिन्दी लेखकों ने पश्चिम बंगाल पर बहुत ही कम लिखा है। 
jee

  यहां के हिन्दी वाले बुद्धिजीवी 1857,भारतेन्दु,नवजागरण,छायावाद पर निरर्थक लिखते रहे हैं। बंगाल पर न लिखना कायरता है। स्थानीय यथार्थ से बेरूखी के कारण हिन्दी के लोगों को यहां और बाहर गंभीरता से नहीं लिया जाता।
ye bhi sahi hai.... aaj ki samsyaon per bhi likhna chhayvad aur anya cheejon se jyada jaroori hai

अर्थहीन प्रायोजनों और लेखन ने बंगाल के हिन्दी वालों को हाशिए पर पहुँचा दिया है।डेढ़ करोड़ के रीब हिन्दीभाषी हैं यहां लेकिन .... पहचान नहीं है । वे पढ़े लिखे हैं, लेकिन उनमें बुद्धिजीवी के गुण नहीं हैं।
hmm, aapas me khincha-tani hai, kamane-khane wali pravriti jyada hai...

सेठ हैं हिन्दीभाषी ,लेकिन सभ्यता के विकास की बजाय पूंजीभोगी का काम कर कर रहे हैं। खाना कमाना सबके लिए जरूरी है लेकिन बुद्धिजीवियों ,शिक्षितों का जो काम है वह भी तो करना चाहिए।

विमलेश त्रिपाठी- अवश्य। 
जगदीश्वर- हिन्दी भाषी बुद्धिजीवियों ने पश्चिम बंगाल पर कभी गंभीरता से काम क्यों नहीं किया, जबकि हिन्दी का उदय यहीं पर हुआ था
विमलेश- सही

जगदीश्वर- मजेदार बात यह है कि वे यहां के मजदूरों में 75 प्रतिशत से ज्यादा हैं लेकिन एक भी मजदूरनेता हिन्दीभाषी नहीं हुआ जिसे दुनिया जानती हो।
कोलकाता में 50 फीसदी हिन्दीभाषी हैं लेकिन उनकी कोई राजनीतिक पहचान नहीं है। वे मात्र इसके या उसके दुमछल्ले होकर रह गए हैं।इसके कारण छोटे किस्म के दलालों ने समूचा माहौल कब्जे में ले लिया है।
sachmuch ye to bahut badi chinta ka vishay hai....

यहां के व्यापार जगत में हिन्दीभाषियों का वर्चस्व है लेकिन उनका कोई राजनीतिक महत्व नहीं है।हिन्दीभाषी पूंजीपति ने कभी हिन्दी से अपने को नहीं जोडा।
aapne kaafi chintan kiya hai is vishay per....
हिन्दीभाषी पूंजीपति का हिन्दीभाषा के साथ जिस तरह अलगाव है वैसे अंग्रेज पूंजीपति का अंग्रेजी से नहीं है।

यहूदी जाति के पूंजीपति अपनी भाषा और संस्कृति के बुद्धिजीवियों का सम्मान करते हैं और बढ़ावा देते हैं लेकिन हिन्दीभाषी पूंजीपति नहीं देता।बंगाली बुर्जुआ ने बांघ्ला के बुद्धिजीवियों को मान-सम्मान दिया है।
ye bhi ek sach hai...

 हिन्दी भाषी पूंजीपति का अपनी भाषा से अलगाव और हिन्दी भाषी बुद्धिजीवी का उसका क्रीतदास बने रहना चिन्ता की चीज है।
hmm ,sachmuch ye chinta ka vishay hai, lekin samadhan kya hai....hum kis trah aage badhen?

पहला कदम है-सामयिक यथार्थ की निर्मम समीक्षा और गहरी समझ पैदा की जाए,उसका ज्यादा से ज्यादा प्रचार किया जाए।
jee

दूसरा कदम है राजनीति से साहित्य तक उन तमाम चीजों के खिलाफ लिखा जाए जो हिन्दी की पहचान नहीं बनने देते। जैसे चाटुकारिता की बजाय सम्मान से बोलना और क्रिटिकली लिखना।
jee
तीसरा कदम-हिन्दी भाषी पूंजीपतिवर्ग ,उच्चमध्यवर्ग-मध्यवर्ग का हिन्दी से अलगाव कम करने के लिए चौतरफा प्रयास किया जाए। स्वार्थहीन मित्रता पर जोर दिया जाए। दबाब बनाने के लिए संगठन भी बनाए जाएं जो आधुनिक क्लब संस्कृति ,मंच जैसे हों।

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

फासीवादी ताकतें मार्क्सवाद का विरोध क्यों करती हैं ? - रोजे बूर्दरों


      जहां तक मार्क्सवाद और मार्क्सवादी पार्टियों का संबंध है, फासीवादी आंदोलनों में प्रयुक्त शब्द बहुत सटीक नहीं है। फासीवादी जानबूझ कर गोलमोल शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। और 'मार्क्सवाद' 'समाजवाद' 'कम्युनिज्म' के बीच फर्क नहीं करते और कम्युनिस्ट आंदोलन और सोशल-डेमोक्रेसी के बीच भी फर्क नहीं करते। इन आंदोलनों के संस्थापक और विचारक जब अपने आंदोलन के सिद्धांत परिभाषित करते हैं तो मार्क्सवादी विचारों के नकार से ही शुरू करते हैं। इसके अनगिनत उदाहरण हैं। 21 जून 1921 को सत्ता प्राप्ति के पहले मुसोलिनी ने संसद में मार्क्सवाद के विध्वंस को सारभूत उद्देश्य के रूप में चिह्नित किया था :
'हम अपनी पूरी शक्ति के साथ समाजीकरण, राज्यीकरण और सामूहिकीकरण की कोशिशों का विरोध करेंगे। राजकीय समाजवाद से हम भर पाए। हम आपके जटिल सिध्दांतों, जिन्हें हम सत्य और नियतिविरोधी करार देते हैं, के विरुध्द अपना सैध्दांतिक संघर्ष छोड़ेंगे नहीं। हम नकारते हैं कि दो वर्गों का अस्तित्व है, क्योंकि और बहुतों का भी अस्तित्व है। हम नकारते हैं कि आर्थिक नियतिवाद के जरिए समस्त मानव-इतिहास की व्याख्या की जा सकती है। हम आपके अतंर्राष्ट्रीयतावाद को नकारते हैं। क्योंकि यह एक बुध्दि-विलास है। इसे केवल उन्नत वर्ग व्यवहार में ला सकते हैं जबकि आम जनता हताश है और अपनी जन्मभूमि से जुड़ी हुई हैं।'
('इस्तुआर द्यू फासिज्म आनीताली' द्वारा आर. पेरिस, पृष्ठ 298 में उध्दृत)
       और बाद में, सत्तासीन होने के बाद मुसोलिनी ने मिलान में मजदूरों को संबोधित करते हुए कहा कि उसकी सरकार के कार्यों के तीन प्रमुख सिध्दांत हैं: राष्ट्र के, जिसका अस्तित्व है और जिसे नष्ट नहीं किया जा सकता, उत्पादन 'हित होते हैं, पूंजीपतियों के ही नहीं मजदूरों के भी, कि उत्पादन बेहतर हो, और अधिकतम हो', और मेहनतकशों के हितों की रक्षा हो। अंतर्राष्ट्रीयता और वर्ग संघर्ष के संघर्ष काफी स्पष्ट है। और उन पर वालिंजियानी की टिप्पणी है :
'मार्क्सवाद का विरोध हमारी नियति है। इस नजरिए से फासीवाद द्वारा निर्मित मजदूर आंदोलन की प्रेरणा का आदर्श और सिद्धांत निश्चित ही समाजवादी आदर्श के विरुद्ध है।'
(वालिंजियानी, 'ल कारपोरालिज्म फासिस्त' 'दला नूवेल रिव्यू क्रितीक', पेरिस 1935, पृष्ठ 19)
     नात्सीवाद में भी यही सैद्धांतिक आधार है। हिटलर मुसोलिनी के प्रति अपने सम्मान को इस तरह परिभाषित करता है :
'जो बात मुसोलिनी को आज के महापुरुषों की कोटि में रखती है वह है इटली में मार्क्सवाद की हिस्सेदारी को नकारने का निश्चय, उसका विनाश और अंतर्राष्ट्रीयवाद से अपने देश की रक्षा'
(माइन कांफ, पृष्ठ 679)
हिटलर सबसे पहले सर्वाधिक स्पष्टता के साथ वह घोषणा करता है कि जर्मनी के विनाश के लिए जिम्मेदार मार्क्सवाद को समाप्त करना सबसे बड़ी समस्या है। और जनता के बीच उसका विकल्प बनने में समर्थ एक नई विचारधारा को स्थापित
करना है :
'इस क्षण जबकि एक पार्टी (मार्क्सवादी पार्टी) समस्त दार्शनिक धारणाओं के साथ एक स्थापित व्यवस्था के विरुध्द आक्रामक है, अगर प्रतिकार में एक नई राजनीतिक शब्दावली नहीं स्थापित होती और कमजोरियों को दूर करते हुए एक साहसिक और निर्मम आक्रमण की घोषणा के साथ रक्षा में नहीं उतरती तो यह आपराधिक होगा।'
(माइन कांफ, पृष्ठ 375)
कुछ पृष्ठ आगे अपने नस्लवादी अवधारणा के सिद्धांतों की व्याख्या के बाद वह अपने प्राथमिक उद्देश्य की गुणवत्ता चिह्नित करता है।
'जनता के लिए नस्लवादी अवधारणा व्यक्ति का मूल्य उद्धाटित करती है,
और उसके माध्यम से विनाशक मार्क्सवाद के रू-ब-रू उसे संगठक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है' (जोर लेखक का)
(माइन कांफ, पृष्ठ 381)
इसी आशय का आह्वान स्पेन के संसद में अंतोनियो प्रीमो ने अक्टूबर 1924 के विद्रोह के बाद एक नई विचारधारा की आवश्यकता के रूप में किया था :'क्रांति की शक्ति इस बात से पैदा होती है कि क्रांतिकारियों के पास एक प्रकार की रहस्यात्मकता होती है। वह बुरी होती है, इसे मैं मानता हूं। लेकिन अंतत: वह एक क्रांतिकारी रहस्यात्मकता होती है, जिसके रू-ब-रू न तो समाज, न ही सरकार, परिस्थितियों से स्वतंत्र एक शाश्वत कर्तव्य की रहस्यात्मकता प्रस्तुत करने की समझदारी दिखा पाएं हैं।
'... त्याग की स्वीकृति के लिए जो जरूरी है, वह है एक धर्म, एक देश, एक समाज की एक नई धारणा के लिए, एक पवित्र आवेग से भर जाना। यही वह आवेग है जिसने इन नेताओं को शक्ति दी है और उन्हें खतरनाक बना दिया है।' (एस.जी. पैन, 'फलांज इस्तुआर द्यू फासिज्म स्पेनियाल', (स्पानी फासीवाद का इतिहास) संपादक रूपदो इबोरिको, 1965, पृष्ठ 54)
तो इस प्रकार इस आंदोलन के संस्थापकों के पास मार्क्सवाद के क्रांतिकारी सिद्धांत के सामने एक विचारधारात्मक शून्य था। मार्क्सवाद के रू-ब-रू ऐसा कुछ भी नहीं था, जो लोगों को एकजुट कर पाता, जो जन के बीच उत्साह और आवेग जगा पाता। इसीलिए एक नया सिद्धांत गढना जरूरी था जो मार्क्सवाद के सामने टिक पाए। इसी बिंदु पर फासीवाद, नाजीवाद और फलांजवाद की प्रासंगिकता है, यहां तक कि मार्क्सवाद की आलोचना करीब-करीब उसी तरह सूत्रीकृत है जिस तरह मार्क्सवाद।
मार्क्सवाद को दो निरपेक्ष कार्यभार चिह्नित करते हैं वर्ग संघर्ष और अतंर्राष्ट्रीयतावाद में विश्वास। अतंर्राष्ट्रीयता व्यक्ति के अपनी जमीन के प्रति नैसर्गिक लगाव को ही भटका देता है, एक समुदाय से संबंध को बाधित करता है। इस प्रकार राष्ट्रीय जीवन के आधार के स्रोत को ही सुखा देता है। वर्ग संघर्ष का सिद्धांत समाज के विभिन्न ग्रुपों की परस्परता को नष्ट करता है, व्यक्तिगत क्षमता का क्षरण करता है, बेहतर लोगों को ही निम्नतर स्तर तक पहुंचा देता है, व्यक्ति की अपने सामाजिक वर्ग में समायोजित होने में उपयोगी लाक्षणिकताओं को नजरअंदाज करता है। और इस तरह उसका अमानवीकरण हो जाता है। वर्ग संघर्ष का सिद्धांत समाज के विरुद्ध है। मार्क्सवाद स्वयं में सारत: विध्वंसक है, यह विशेषण प्राय: प्रयोग में आता है। फासीवादी आंदोलन के संस्थापकों की पैनी समझ थी कि उपस्थित सामाजिक व्यवस्था पर उग्र प्रश्न उठाने वाला एक मात्र सिद्धांत मार्क्सवाद है। (आगे चलकर विशेष रूप से चालक वर्गों की बात करते हुए इस सिद्धांत के सामाजिक प्रभाव का परीक्षण करेंगे।)
नि:संदेह इसीलिए यह तीनों आंदोलन मार्क्सवाद का विरोध यह कहते हुए करते हैं कि समस्त ब्रंह्मांड को संचालित करने वाली श्रेणीबध्दता के विरुद्ध अपनी समानता को खडा करने वाला मार्क्सवाद प्राकृतिक व्यवस्था के ही विरुद्ध है। यह सूत्रवत पुष्टि मार्क्सवाद के नकार को और ठोस ढंग से प्रस्तुत करती है।
इस प्रकार प्रकृतिविरोधी मार्क्सवाद की जीत समस्त सामाजिक संगठन को तहस-नहस कर देगी। इस तथ्य के अनुसार मार्क्सवाद सभ्यता को ही समाप्त कर देगा। संघर्ष का यह ठंडा और बर्फीला सिद्धांत समस्त अध्यात्मिकता को, और इस प्रकार जीवन के उद्देश्य को ही नकारता है। आंतोनियो प्रीमो के अनुसार :'मार्क्सवाद पाश्चात्य और ईसाई सभ्यता के विनाशक का उद्धत प्रादुर्भाव है। यह उस सभ्यता, जिसमें हम पहले पोसे गए हैं और जिसके मूलभूत मूल्यों को हम जीते हैं, के अंत का सूचक है। हम यह मानने से इंकार करते हैं कि यह स्वयं पुराना पड ज़ाएगा।(अंतोनियो प्रीमो, 'फलांज की उद्धोषणा 2 फरवरी, 1936')
'समाजवाद मजदूरों के अंदर से सारी अध्यात्मिकता बाहर कर देता है इसीलिए मजदूरों के लिए धर्म, देशप्रेम और जैसा कि रूस में हो रहा है, पारिवारिक कोमलता तक पर प्रतिबंध लग जाता है।'
(प्रीमो, 'नासियों ए जुसटिस सोसियाल' मई, 1934)
यह भी हो सकता है कि यह विध्वंसकता चारों ओर फैल जाए। भौतिकवाद शब्द की द्विअर्थी संभावना के आधार पर दार्शनिक भौतिकवाद और सभी आध्यात्मिक मूल्यों के नकार और केवल भौतिक संतुष्टि की खोज के बीच विभ्रम पैदा कर प्रीमो घोषित करता है कि मार्क्सवाद का सबसे ताजा रूप बोलशेविज्म है जिसके विनाशक कार्य रूस में उजागर हो रहे हैं। बोलशेविक वह है जो गरीबों की विपदाओं पर बिना ध्यान दिए सारी समृध्दि का उपभोग करता है। कुछ भी हो, जो अनैतिक है, नैतिकता से परे हैं, वह बोलशेविक है।
इससे भी बुरी बात यह है कि हिटलर अपने तर्कों से इन नतीजे तक पहुंचता है कि मार्क्सवाद की विजय धरती पर मानव जीवन का अंत साबित होगा :
'तब हमारी दुनिया लाखों साल पहले की तरह फिर शून्य से शुरू करेगी। धरती की सतह पर आदमी का नामो-निशान नहीं होगा। जब शाश्वत प्रकृति के निदेशों का उल्लंघन होता है तो वह निर्ममतापूर्वक बदला लेती है।'
(माइन कांप्फ, पृष्ठ 71)
       इस तरह मार्क्सवाद की मूलभूत विकृति स्थापित की जाती है। इसके अलावा चूंकि फासीवादी कार्यक्रमों में समाजवाद के कुछ तत्व उधार लिए गए हैं, मार्क्सवाद के खिलाफ कोई विचारधारात्मक कमजोरी दिखाना जरा कठिन होता है। इन कार्यक्रमों में बराबर समाजवाद का संदर्भ होते हुए भी मार्क्सवाद को दूर ही रखा जाता है। अंत में उदारवाद विरोध अगर अंशत: राज्य और व्यक्ति की सकारात्मक अवधारणा से जुडता है, जैसा कि इन तीनों ही आंदोलनों ने विकसित किया था, उदारवाद की आलोचना इस विचार पर आधारित है कि उदार राज्य मार्क्सवाद के खिलाफ प्रभावी संघर्ष में असमर्थ है। राजनीतिक स्तर पर उदार राज्य की जन्मजात कमजोरी उसे मार्क्सवाद के विरुध्द आवश्यक कदम उठाने से रोकता है।
     विचारधारा के स्तर पर न्याय संगत परिवेश के दर्शन के पास बृहत्तर जनता को आकर्षित करने वाली कोई जीवंतता नहीं है। मुसोलिनी अपने वक्तव्यों में उदार राज्य की कृतियों और सिद्धांत की नपुंसकता की भर्त्सना करता है। हिटलर घोषित करता है : 'एक ऐसा राज्य जो एक कोढी, मार्क्सवाद वास्तव में यही तो है, के विकास को नहीं रोक सका वह भविष्य के किसी अवसर का क्या इस्तेमाल कर पायेगा।' (माइन कांफ, पृष्ठ 175) वह गैर मार्क्सवादी सभी पार्टियों की भर्त्सना करता है क्योंकि वे किसी भी राजनीतिक दर्शन के लिए अक्षम हैं। अंतोनियो प्रीमो और आगे तक जाता है। हमने देखा है कि उसने यह तथ्य चिन्हित किया है कि समाज और सरकार एक क्रांतिकारी रहस्यात्मकता (रू4ह्यह्लद्बह्नह्वद्ग) के बरअक्स कोई नई रहस्यात्मकता प्रस्तुत नहीं कर सका है। वह जोर देकर कहता है कि मार्क्सवाद के विकास के लिए आर्थिक उदारवाद ही जिम्मेदार है।
'साम्यवाद का आना रोकने का एक ही गहरा और ईमानदार तरीका है पूंजीवाद को नष्ट करने का साहस।'
(ला फलांज अवां लेजेलेक्सियों द 1936)
राजनीतिक और विचारधारात्मक वंध्यता के कारण उदारवाद ही मार्क्सवाद को पोषित करता है। इसलिए वह पूर्णत: त्याज्य है।तर्कहीन विचारधाराएं इस प्रकार लगता है कि हर फासीवादी आंदोलन 'विध्वंसक' मार्क्सवाद का विरोध करना चाहता है। और इसी के विपरीत उदारवाद के सामने एक ऐसी प्रभावी विचारधारा रखना चाहता है जो उदार राज्य का विरोध कर सफल होने वाले मार्क्सवाद की ऊर्जा के बराबर ऊर्जा रखता हो। इसके लिए जरूरी होगा विचारधारात्मक शून्य को भरना, लेकिन इस नई विचारधारा की अंतर्वस्तु के परीक्षण से पहले उन रूपों का परीक्षण करना जरूरी है, जो वह धारण कर सकती है। क्योंकि अगर एक नई विचारधारा का औचित्य प्रभाविता के संदर्भ में स्थापित करना है अर्थात इस अर्थ में कि उसका समाज पर अपेक्षित प्रभाव क्या है, तो उसका मतलब होगा कि एक सुसंगत सिद्धांत जो तर्क पर आधारित हो, जो संसार की एक धारणा प्रस्तुत करता हो और जो व्यापक अवधारणा प्रस्तुत करता हो, आदि उतना आवश्यक नहीं है जितना ऐसे नारों का समुच्चय जो जनमत गढ सके। इसके अलावा यह भी जरूरी है कि ये नारे विश्वसनीय होंक्योंकि इनके अनुकूल पूर्वग्रहों को लाभ मिल सकता है, क्योंकि ऐसा न होने पर वह जनता पर मार्क्सवादी प्रभाव को रोक नहीं सकेगा। होना यह चाहिए कि वह इस प्रकार निरपेक्ष सत्य को स्थापित करे कि वह शब्दश: अप्रतिकार्य हो जाए। लेकिन कौन ही सर्वोत्तम तर्कसंगत और वैज्ञानिक थियोरी निरपेक्ष सत्य की बात कर सकती है? अगर कोई सिद्धांत अपने को तर्क संगतता पर जोर देते हुए प्रस्तुत करता है तो वह अपने नियोजित लक्ष्य को नहीं पा सकता। इन आंदोलनों के संस्थापक स्वेच्छा से मिस्तीक की बात करते हैं। उदाहरण के लिए, प्रीमो क्रांतिकारी मिस्तीक के बरअक्स 'शाश्वत कर्तव्य का मिस्तीक' प्रस्तुत करता है। नात्सियों के यहां नस्ल का मिस्तीक, फासीवाद में राष्ट्र का। 'हमने अपना मिथ रचा है। हमारा मिथ है राष्ट्र।' (मुसोलिनी, 1922) जर्मनी में नस्लवाद 'बीसवीं शताब्दी का मिथ है।'
जर्मन और इतालवी विचारधाराओं ने अपने सिद्धांतों के अतर्कसंगत आधारों पर जोर दिया है। नए फासीवादी राज्य का विश्लेषण करते हुए जेंतील याद दिलाता है कि एक प्रकार का निरंकुश उदारवाद फासीवादी के लिए अपरिचित नहीं हैं। लेकिन वह यह भी कहता है कि एक शक्तिशाली राज्य की अवधाराणा 'कमोबेश बौद्धिक जड़सूत्र' के अलावा कुछ नहीं है। इस अवधारणा का वास्तव में कोई आधार नहीं है। फासीवाद के कारण यह जड़सूत्र एक विचार-शक्ति, एक आवेग बन गया है। भीड़ और शक्तिशाली विचार के बीच तत्काल एक दिया स्थापित हो जाता है, जैसे उसे प्रकाश मिल गया हो। कर्म पर आवेग हावी हो जाता है। इस प्रकार सुसंगत सिद्धांत से जुड़ाव के कारण गति नहीं पैदा होती है, उल्टे, इसके विपरीत, कर्म द्वारा जनता में विचारशक्ति एक अतर्कसंगत उद्गार और आवेश उद्वेलित करता है एक प्रकार से रहस्यात्मकता का उद्धाटन। इस प्रकार व्यक्ति और सिद्धांत के मिलन की तात्कालिकता नात्सियों में कम नहीं है। कार्ल श्मिट सिध्दांत की समझ और कर्म के प्रारंभ के लिए किसी तर्क संगत या भावात्मक मध्यस्थता को नकारता है।
उल्लेखनीय है कि एक संगत छवि तत्काल छवि या तुलना से बढ क़र लगती है वह स्वयं एक प्रेरणा होती है। हमारी अवधारणा को न तो किसी मध्यस्थ छवि की आवश्कयता है न प्रतिनिधि तुलना की। वह किसी दृष्टांत या बारीक प्रतिनिधित्व से नहीं आती है, न ही देकार्तवादी एक 'सामान्य विचार' से। वह तो एक तत्काल उपस्थित और व्यावहारिक धारणा है। (जोर लेखक काहोफे द्वारा उध्दृतनासिओनाल सोसिआलिज्म पार ले तेक्स्त, पृष्ठ 40)
कहना ही हो तो कहेंगे इस सिध्दांत का उत्स दैवीय है-हिटलर कहता नहीं है कि इसमें ईश्वर की प्रेरणा हैं? 'मैं तो सर्वशक्तिमान अपने रचयिता की प्ररेणा से काम करता हूं, यहूदियों के विरुध्द अपनी रक्षा करते समय मैं ईश्वर के कामों की ही रक्षा में संघर्ष करता होता हूं।' (माइन कांप्फ, पृष्ठ 72)
इस प्रकार, आधार कुछ विचार-शक्तियां होनी चाहिए जो लोगों को आवेग मुक्त कर सकें और ऊर्जा लामबंद की जा सकेकुछ निरपेक्ष सत्य जो बस विश्वास में ही अभिव्यक्त होते हैं। उन्हें बस आधारतत्व के रूप में घोषित किया जा सकता है वांछित तत्काल प्रभाविता के लिए यह जरूरी होता है।
विमर्श की प्रक्रिया इन्हीं संचालक सिध्दांतों से संचालित होती है। अकसर ही शुरुआत होती है कुछ अभिपुष्टियों से बिना किसी और बात का खयाल किए। इटालियन इनसाइक्लोपीडिया में फासीवाद की परिभाषा पर गौर करें तो उसमें कोई तर्कणा या बहस नहीं है बस कुछ सकारात्मक और कुछ नकारात्मक, अभिपुष्टियां हैं। ('फासीवाद है, 'फासीवाद की धारणा', 'फासीवाद का विचार' ऐसा है..) इसके अलावा सत्य का वाहक होने का विश्वास किसी व्याख्या को निरर्थक बना देता है। नेशनल सिंडिकलिज्म की व्याख्या इस प्रकार है : चूंकि वह सत्य का वाहक है और चूंकि सत्य एक ही होता है इसलिए नेशनल सिंडिकलिज्म को लेकर किसी भी प्रकार के विवाद की संभावना स्वीकार्य नहीं हैं।
विचारधारात्मक स्तर पर एक प्रदर्शनात्मक आकर्षण हो सकता है लेकिन उसमें भी पूर्वापेक्षा यही है कि न कोई विवाद हो न निरूपण। इसको विशेष रूप से माइन कांप्फ में देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए 'जन और नस्ल' नामक अध्याय में नस्ल की असमानता की अभिपुष्टि को मान कर ही चला गया हैउसी पर यह बहस आधारित है कि आर्य श्रेष्ठ होते हैं और यहूदियों ने सारे विश्व पर अपना प्रभुत्व कायम कर रखा है। ज्यादा से ज्यादा यह पुष्टि पर्यवेक्षण पर आधारित की जाती है जिसे अपने में एक सबूत, एक बोध, स्वाभाविक, ऐतिहासिक या वैज्ञानिक की तरह पेश किया जाता है। इस प्रकार घोषित सत्य के प्रति एक सावधानी बरतने की बात कर दी जाती है। इस प्रकार तीनों ही आंदोलनों में समान रूप से श्रेणीबध्दता के सिध्दांत और जीवन के लिए संघर्ष के संदर्भ में एक नैसर्गिकता चिह्नित है जिसमें किसी तरह की समानता का कोई अस्तित्व नहीं है न व्यक्तियों के बीच, न नस्लों के बीच। राष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद और नस्ली असमानता को इतिहास में तथ्यसंगत और तथ्यपरक बताया गया है। इस बिंदु पर इन आंदोलनों की विचारधाराएं निर्विवाद रूप से ऐतिहासिक नियति की तरह प्रस्तुत की गई है।
नात्सीवाद ने प्राकृतिक विज्ञान मेंवनस्पति संसार एवं जंतु संसार के उदाहरणों से दिखाया कि एक 'सिध्दांत है 'रचयिता का सिध्दांत और दूसरा है 'परजीविता' का। फिर वह परजीवियों से मनुष्यों के संघर्ष का उदाहरण लेता है और एक 'वैज्ञानिक' सिध्दांत प्रतिपादित करता है कि यह संघर्ष तभी खत्म होगा जब या तो परजीवियों का अंत हो जाए या मानव समाज का। यह बात मानव समाज पर भी लागू होती है क्योंकि नियम सार्विक (यूनीवर्सल) है और इसलिए मानवजाति बच सके इसके लिए परजीवियों का अंत होना चाहिए। इस प्रकार तर्क पूरी गंभीरता के साथ प्रयोग की पध्दति पर आधारित है। लेकिन इस तर्कणा की विकृति एकदम स्पष्ट है।
      1.     सिध्दांत रचयिता और परजीवी का निरपेक्ष सत्य, जिस पर सारी प्रस्तुति आधारित है, एक सामान्य अभिपुष्टि की तरह लिया गया है जिसे प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं समझी गई है।
      2.    समन्वयन के स्तर पर, जिससे झूठे तर्क जुटाए गए हैंजंतु विज्ञान की एक बात को सामाजिक संरचना पर लागू कर दिया गया है। इस तरह दिखाई कुछ भी पडे, यह सब है पूरी तरह अतर्कसंगत।
इस तरह हमें अतर्कसंगतता के स्तर पर पटक दिया जाता है। इस प्रकार हम ऐसी विचारधारा के रूबरू हैं जो उन मूलभूत सत्यों पर आधारित है जिन्हें निर्विवाद और जडसूत्र की तरह अभिपुष्ट मान लिया गया है। जिनका व्यक्ति और जन-समुदाय तत्काल साक्षात्कार करता है। लेकिन अगर हम प्रभाविता की कसौटी पर इसे कसें तो ये विचार शक्तियां खास एक प्रकार का व्यवहार चिन्हित करती हैं। यहीं जरूरत है कि सिध्दांत और व्यवहार के बीच संबंध पर इनकी सोच का विश्लेषण कर लिया जाए।
(साभार- फासीवाद : सिद्धांत और व्यवहार,लेखक-  रोजे बूर्दरों,अनुवाद-लालबहादुर वर्मा, प्रकाशक- ग्रंथ शिल्पी, बी-7,सरस्वती काम्प्लेक्स,सुभाष चौक, लक्ष्मी नगर,दिल्ली-110092 ,मूल्य -275)  


मंगलवार, 25 जनवरी 2011

भारत में विद्रोह- फ्रेडरिक एंगेल्स


गर्मी और वर्षा के गर्म महीनों में भारत का अभियान लगभग पूर्ण रूप में स्थगित कर दिया गया है। सर कॉलिन कैंपबेल ने एक शाक्तिशाली प्रयास के द्वारा अवध और रुहेलखंड के तमाम महत्वपूर्ण स्थानों पर गर्मी के प्रारंभ में ही अधिकार कर लिया था। उसके बाद उन्होंने अपने सैनिकों को छावनी में रख दिया है और बाकी देश को खुले तौर पर बागियों के कब्जे में छोड़ दिया है। और अपनी कोशिशों को वे संचार के अपने साधनों को बनाए रखने तक ही सीमित रख रहे हैं। इस काल में महत्व की जो एकमात्र घटना अवध में हुई है, वह है मान सिंह की सहायता के लिए सर होप ग्रैंट का शाहगंज के लिए अभियान। मान सिंह एक ऐसा देशी राजा है जिसने काफी हीले-हवाले के बाद कुछ ही समय पहले अंगरेजों के साथ समझौता कर लिया था और अब उसके पुराने देशी मित्रों ने उसे घेर लिया था। यह अभियान केवल एक सैनिक सैर के समान सिध्द हुआ-यद्यपि लू और हैजे की वजह से अंगरेजों का उसमें भारी नुकसान हुआ होगा। देशी लोग बिना मुकाबला किए ही तितर-बितर हो गए और मान सिंह अंगरेजों से जा मिला। इतनी सरलता से प्राप्त हुई इस सफलता से यद्यपि यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरा अवध इसी प्रकार आसानी से अंगरेजों के सामने नत-मस्तक हो जाएगा, लेकिन इससे यह तो मालूम ही हो जाता है कि बागियों की हिम्मत एकदम टूट गई है। अंगरेजों के हित में यदि यह था कि गर्मी के मौसम में आराम करें, तो विल्पकारियों के हित में यह था कि वे उन्हें अधिक से अधिक परेशान करें। लेकिन इसके बजाए कि वे सक्रिय रूप से छापामार युध्द का संगठन करें, दुश्मन ने जिन शहरों पर अधिकार कर रखा है उनके बीच के उसके संचार-साधनों को छिन्न-विच्छिन्न करें, उसकी छोटी-छोटी टुकड़ियों को घात लगाकर रास्ते में ही साफ कर दें, दाना-पानी की खोज करने वाले उसके दलों को हलकान कर दें, रसद की सप्लाई के काम को नामुमकिन बना दें, अर्थात उन सब चीजों का आना-जाना एकदम रोक दें जिनके बिना अंगरेजों के कब्जे का कोई भी बड़ा शहर जिंदा नहीं रह सकता हैइन सब चीजों को करने के बजाए, देशी लोग लगान वसूल करने और उसके दुश्मनों ने जो थोडी सी मोहलत उन्हें दे दी है, उसका उपभोग करने में ही वे प्रसन्न हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि, मालूम होता है कि, वे आपस में लड़ भी गए हैं। न ही ऐसा मालूम होता है कि इन चंद शांतिपूर्ण हफ्तों का उपयोग उन्होंने अपनी शक्तियों को पुनर्संगठित करने, गोला-बारूद के अपने भंडारों को फिर से भरने, अथवा नष्ट हो गई तोपों की जगह दूसरी तोपें इकट्ठा करने के ही काम में किया है। शाहगंज की उनकी भगदड़ प्रकट करती है कि पहले की किसी भी पराजय की अपेक्षा अब उनका विश्वास अपने में और अपने नेताओं में और भी कम हो गया है। इसी बीच अधिकांश राजे-रजवाड़ों और ब्रिटिश सरकार के बीच गुप्त पत्र-व्यवहार चल रहा है। ब्रिटिश सरकार ने, आखिरकार, देख लिया है कि अवध की पूरी सरजमीन को हड़प जाना उनके लिए एक अव्यावहारिक सा काम है और इसलिए इस बात के लिए वह अच्छी तरह राजी हो गई है कि उचित शर्तों पर उसे फिर उसके पुराने स्वामियों को लौटा दी जाए। इस भांति, अंगरेजों को अंतिम विजय के संबंध में अब कोई संदेह नहीं रह गया है और इसलिए लगता है कि अवध का विद्रोह सक्रिय छापामार युध्द के दौर से गुजरे बिना ही खतम हो जाएगा। अधिकांश जमींदार-ताल्लुकेदार अंगरेजों के साथ ज्योंही समझौता कर लेंगे, त्योंही विप्लवकारियों के दल छिन्न-भिन्न हो जाएंगे और जिन लोगों को सरकार का बहुत ज्यादा डर है वे डाकू बन जाएंगे और उन्हें पकड़वाने में फिर किसान भी सरकार को खुशी-खुशी मदद देंगे।
अवध के दक्षिण-पश्चिम में जगदीशपुर के जंगल इस तरह के डकैतों के लिए एक अच्छा आश्रय-स्थल मालूम पड़ते हैं। बांसों और झाड़ियों के इन अभेद्य जंगलों पर अमर सिंह के नेतृत्व में विप्लवकारियों के एक दल का कब्जा है। अमर सिंह को छापामार युध्द का अधिक ज्ञान है, ऐसा मालूम होता है और वह क्रियाशील भी अधिक है। जो कुछ भी हो, चुपचाप इंतजार करने के बजाए जब भी मौका मिलता है वह अंगरेजों के ऊपर हमला बोल देता है। उस सुदृढ़ अड्डे से भगाए जाने से पहले ही उसके पास जाकर अवध के विद्रोहियों का एक भाग भी अगर मिल गया जैसी कि आशंका है तो अंगरेजों के लिए मुसीबत हो जाएगी और उनका काम बहुत बढ़ जाएगा। लगभग 8 महीनों से ये जंगल विप्लवकारी दलों के लिए छिपने और विश्राम करने के स्थल बने हुए हैं। इन दलों ने कलकत्ता और इलाहाबाद के बीच की सड़क, ग्रैंड टं्रक रोड को, जो अंगरेजों का मुख्य संचार मार्ग है, अत्यंत असुरक्षित बना दिया है।
पश्चिमी भारत में जनरल रौबट्र्स और कर्नल होम्स अब भी ग्वालियर के विद्रोहियों का पीछा कर रहे हैं। ग्वालियर पर जिस समय कब्जा किया गया, उस समय यह प्रश्न बहुत महत्व का था कि पीछे हटती हुई सेना कौन सी दिशा अपनाएगी; क्योंकि मराठों का पूरा देश और राजपूताने का एक भाग मानो विद्रोह के लिए तैयार बैठा थाइंतजार बस वह इस बात का कर रहा था कि नियमित सैनिकों की एक मजबूत सेना पहुंच जाए जिससे कि विद्रोह का एक अच्छा केंद्र वहां कायम हो जाए। उस वक्त लगता था कि इस लक्ष्य की प्राप्ति की दृष्टि से सबसे अधिक संभावना इसी बात की दिखलाई देती थी कि ग्वालियर की फौजें पैंतरा बदलकर होशियारी से दक्षिण-पश्चिमी दिशा की ओर निकल जाएंगी। लेकिन विप्लवकारियों ने पीछे हटने के लिए उत्तर-पश्चिमी दिशा को चुना है। ऐसा उन्होंने किन कारणों से किया है, इसका उन रिपोर्टों से हम अनुमान नहीं लगा सकते जो हमारे सामने हैं। वे जयपुर गए, वहां से दक्षिण उदयपुर की तरफ घूम गए और मराठों के प्रदेश में पहुंचने वाले मार्ग पर आगे बढ़ने की कोशिश करने लगे। लेकिन इस चक्करदार रास्ते की वजह से रौबट्र्स को यह मौका मिल गया कि वह उनको जा पकड़े। रौबट्र्स उनके पास पहुंच गया और बिना किसी बड़े प्रयास के ही, उसने उन्हें पूरे तौर से हरा दिया। इस सेना के जो अवशेष बचे हैं, उनके पास न तोपें हैं, न संगठन और न गोला-बारूद हैं, न कोई नामी नेता है। नए विद्रोह खड़े कर सकेंऐसे ये लोग नहीं हैं। इसके विपरीत मालूम होता है कि लूट-खसोट में प्राप्त चीजों की जो विशाल मात्रा वे अपने साथ ले जा रहे हैं और जिसकी वजह से उनकी तमाम गतिविधि में बाधा पड़ रही है, उसने किसानों की लोलुपता को जगा दिया है। अलग-थलग घूमते-भटकते हर सिपाही को मार दिया जाता है और सोने की मोहरों के भार से उसे मुक्त कर दिया जाता है। स्थिति अगर यही रही, तो इन सिपाहियों को अंतिम रूप से ठिकाने लगाने के काम को जनरल रौबट्र्स बड़े मजे में अब देहाती जनता के जिम्मे छोड़ दे सकता है। सिंधिया के खजाने को उसके सिपाहियों ने लूट लिया है; इससे अंगरेजों के लिए
हिंदुस्तान से भी अधिक खतरनाक एक दूसरे क्षेत्र में विद्रोह के फिर से शुरू हो जाने का खतरा मिट गया है। यह क्षेत्र अंगरेजों के लिए बहुत खतरनाक था, क्योंकि मराठों के प्रदेश में विद्रोह शुरू हो जाने पर बंबई की फौज के लिए बड़ी ही कठोर परीक्षा का समय आ जाता।
ग्वालियर के पड़ोस में एक नई बंगावत उठ खड़ी हुई है। एक छोटा सरदारमान सिंह (अवध का मान सिंह नहीं), जो सिंधिया के अधीन था, विप्लवकारियों के साथ जा मिला है और पौड़ी के छोटे किले पर उसने कब्जा कर लिया है। लेकिन उस जगह को अंगरेजों ने घेर लिया है और जल्द ही उस पर कब्जा हो जाना चाहिए।
इस बीच, जीते गए इलाके धीरे-धीरे शांत होते जा रहे हैं। कहा जाता है कि दिल्ली के पास-पड़ोस के इलाके में सर जे. लॉरेंस ने ऐसी पूर्ण शांति कायम कर दी है कि कोई भी यूरोपियन अब वहां बिना हथियार के और बिना अंगरक्षकों को लिए पूर्ण सुरक्षा के साथ इधर-उधर आ-जा सकता है। इसका रहस्य यह है कि किसी गांव के क्षेत्र में होने वाले हर जुर्म अथवा बलवे के लिए उस गांव की जनता को अंगरेजों ने सामूहिक रूप से जिम्मेदार बना दिया है; उन्होंने एक फौजी पुलिस संगठित कर दी है; और इस सबसे भी अधिक हर जगह कोर्ट मॉर्शल द्वारा आनन-फानन में सजा देने की व्यवस्था कायम होर् गई। पूर्व के लोगों पर कोर्ट मॉर्शल की व्यवस्था का कुछ खास ही रौब पड़ता है। फिर भी यह सफलता एक अपवाद जैसी मालूम होती है, क्योंकि दूसरे क्षेत्रों से तरह की कोई चीज हमें सुनाई नहीं देती। रुहेलखंड और अवध को, बुंदेलखंड और दूसरे अनेक बड़े प्रांतों को पूर्णतया शांत करने के काम के लिए अब भी बहुत लंबे समय की जरूरत होगी और उसके सिलसिले में अंगरेजी सैनिकों और कोर्ट मॉर्शलों को अब भी बहुत काम करना पड़ेगा।
लेकिन जहां हिंदुस्तान के विद्रोह का विस्तार इतना छोटा हो गया है कि अब उसमें फौजी दिलचस्पी की कोई चीज नहीं रह गई है, वहीं वहां से काफी दूरअफगानिस्तान के अंतिम सीमांतों परएक ऐसी घटना हो गई है जिसमें आगे चलकर भारी कठिनाइयां उत्पन्न होने की आशंका छिपी हुई है। डेरा इस्माइल खान में स्थित कई सिख रेजीमेंटों में अंगरेजों के खिलाफ विद्रोह करने और अपने अफसरों की हत्या कर देने के एक षडयंत्र का पता लगा है। इस षडयंत्र की जड़ें कितनी दूर तक फैली हुई हैं, यह हम नहीं बता सकते। संभव है कि वह केवल एक स्थानीय चीज हो जिसका सिखों के एक खास वर्ग से सबंध हो। लेकिन इस बात को हम साधिकार नहीं कह सकते। कुछ भी हो, यह बहुत ही खतरनाक लक्षण है। ब्रिटिश सेना में इस समय लगभग 1,00,000 सिख हैं, और यह तो हम सुन ही चुके हैं कि वे कितने उद्दंड हैं। वे कहते हैं कि आज वे अंगरेजों की तरफ से लड़ते हैं, पर अगर भगवान की ऐसी ही मर्जी हुई तो कल उनके खिलाफ भी लड़ सकते हैं! वे बहादुर होते हैं, जोशीले होते हैं, अस्थिर होते हैं और दूसरे पूर्वी लोगों से भी अधिक आकस्मिक और अन-अपेक्षित आवेगों के शिकार हो जाते हैं। यदि सचमुच उनके अंदर बंगावत शुरू हो जाए, तब फिर अंगरेजों के लिए अपने को बचाए रखने का काम कठिन हो जाएगा। भारत के निवासियों में सिख हमेशा अंगरेजों के सबसे कट्टर विरोधी रहे हैं; अपेक्षाकृत एक काफी शक्तिशाली साम्राज्य की उन्होंने स्थापना कर ली है; वे ब्राह्मणों के एक खास संप्रदाय के हैं और हिंदुओं और मुसलमानों दोनों से नफरत करते हैं। ब्रिटिश 'राज' को वे अधिकतम खतरे के समय देख चुके हैं, उसकी पुनर्स्थापना के कार्य में उन्होंने बहुत योग दिया है, और उन्हें तो इस बात का भी पूरा विश्वास है कि उनका योग ही वह निर्णायक चीज थी जिसने ब्रिटिश राज्य को बचा लिया है। तब फिर इससे अधिक स्वाभाविक और क्या हो सकता है यदि वे यह सोचें कि ब्रिटिश राज्य की जगह अब सिख राज्य की स्थापना कर दी जानी चाहिए, दिल्ली या कलकत्ते की गद्दी पर भारत का शासन करने के लिए किसी सिख सम्राट का अभिषेक कर दिया जाना चाहिए? संभव है कि यह विचार अभी तक सिखों के अंदर बहुत परिपक्व न हुआ हो, यह भी संभव है कि उन्हें होशियारी से इस तरह अलग-अलग वितरित कर दिया जाए कि हर जगह उनका मुकाबला करने के लिए काफी यूरोपियन मौजूद रहें जिससे कि कहीं भी विद्रोह होने पर उन्हें आसानी से दबा दिया जा सके। लेकिन यह विचार अब उनके अंदर आ गया है, यह चीज, हमारे, खयाल के मुताबिक, हर उस व्यक्ति को स्पष्ट होगी जिसने पढ़ा है कि दिल्ली और लखनऊ के बाद से सिखों के क्या रंग-ढंग हैं।
लेकिन, फिलहाल, भारत को अंगरेजों ने फिर जीत लिया है। वह महान विद्रोह जिसकी चिनगारी बंगाल की सेना की बंगावत से उठी थी, लगता है, सचमुच ही खतम हो रहा है। लेकिन इस दोबारा विजय से इंगलैंड भारतीय जनता के मन पर अपना प्रभाव नहीं बैठा सका है। देशियों द्वारा किए जाने वाले अनाचारों-अत्याचारों की बढ़ी-चढ़ी और झूठी रिपोर्टों से क्रुध्द होकर अंगरेजी फौजों ने बदले की कार्रवाई के तहत जो बर्बर और जघन्य कार्य किए हैं, उनकी क्रूरता ने और अवध के राज्य को पूरे तौर से और टुकड़े-टुकड़े करके, दोनों तरफ से, हड़प लेने की उनकी कोशिशों ने विजेताओं के लिए कोई खास प्रेम की भावना नहीं पैदा की है। इसके विपरीत, अंगरेज स्वयं स्वीकार करते हैं कि हिंदुओं और मुमलमानों दोनों के अंदर ईसाई आक्रमणकारी के विरुध्द पुश्तैनी घृणा की भावना आज हमेशा से ही अधिक तीव्र है। यह घृणा इस समय भले ही दुर्बल हो, लेकिन जब तक सिखों के पंजाब के सिर पर भयानक बादल मंडरा रहा है, तब तक उसे महत्वहीन और निरर्थक नहीं कहा जा सकता। बात इतनी ही नहीं है। दोनों महान एशियाई ताकतें इंगलैंड और रूसइस समय साइबेरिया और भारत के बीच एक ऐसे बिंदु पर पहुंच गई हैं जहां रूसियों और अंगरेजों के स्वार्थों में सीधी टक्कर होना अनिवार्य है। वह बिंदु पीकिंग है। वहां से पश्चिम की और पूरे एशियाई महाद्वीप पर, एक किनारे से दूसरे किनारे तक एक ऐसी रेखा जल्द ही खींच दी जाएगी जिस पर इन दो विरोधी स्वार्थों के बीच निरंतर संघर्ष होता रहेगा। इस प्रकार, वास्तव में संभव है कि वह समय बहुत दूर न हो जब व्यास नदी के मैदानों में अगेरजी फौज और कज्जाक का मुकाबला हो जाए। और अगर यह मुकाबला होना है, तो 1,50,000 देशी भारतीयों की उत्कट ब्रिटिश-विरोधी भावनाएं गंभीर चिंता का विषय बन जाएंगी।
(1 अक्टूबर 1858 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 1443, में एक संपादकीय लेख के रूप में प्रकाशित हुआ।)