गुरुवार, 26 मई 2011

मनमोहिनी ममता और मीडिया


     मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य की कमान संभाल ली है। वह कोशिश में है कि सभी वर्गों और समूहों की इच्छाओं का ख्याल रखा जाए और इसी दबाब में मंत्रीमंडल की पहली बैठक में 30 मिनट में 18 फैसले कर डाले। यह मनमोहिनी प्रशासनिक कार्यप्रणाली का नमूना है। इसी क्रम में वे अपनी गतिविधियों को खबरों के प्रवाह के रूप में  बनाए रखना चाहती हैं। फलतःप्रशासन और मीडिया के बीच में एक नया संबंध जन्म ले रहा है। अब तक पश्चिम बंगाल में राज्य प्रशासन और मीडिया आमने-सामने थे। पहलीबार मीडिया और राज्य सरकार एक ही धुन में बज रहे हैं। यह मीडिया के लिए खतरे की घंटी है। मीडिया को सरकार और जनता के बीच क्रिटिकल सेतु होना चाहिए। उल्लेखनीय है ममता बनर्जी की जीत के कवरेज में मीडिया ने आम जनता के आनंद को ज्यादा उभारा है। ममता बनर्जी की जीत के राजनीतिक पक्ष पर कम जोर दिया है । जबकि ममता बनर्जी की विजय में राजनीति की बड़ी भूमिका है,इच्छाओं की कम। लेकिन बाजार में मीडिया की प्रतिस्पर्धा राजनीति के साथ कम और इच्छाओं के साथ ज्यादा खेल रही है। भारत में उदार लोकतंत्र है और इसकी विशेषता है सहमति। यहां कहने को सहमति के आधार फैसले होते हैं लेकिन लोकतंत्र में सहमति से भी बड़ी चीज है असहमति। मीडिया पिछले 35 सालों से वाम मोर्चे के शासन के साथ असहमति बनाकर अपने स्पेस का विस्तार करता रहा है। असहमति के कारण ही उसकी एक साख  है। लेकिन ममता बनर्जी की जीत ने सारी स्थितियां उलट दी हैं। कल तक मीडिया और ममता विपक्ष में थे,लेकिन आज ममता सत्ता में है। क्या मीडिया भी सत्ता के साथ रहना पसंद करेगा ? ममता के प्रशासन की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए उदार लोकतंत्र का व्यापक विकास किया जाए। वाम मोर्चा के शासन में राज्य में उदार लोकतंत्र का दायरा सिकुड़ा है। लोकतांत्रिकीकरण के नाम पर सामाजिक नियंत्रण और पार्टी नियंत्रण बढ़ा था। ममता प्रशासन को इसे तोड़ना होगा। इसके जेनुइन विकल्प के रूप में 'तथ्य' और 'ज्ञान' को आम जनता का अस्त्र बनाना होगा। उदार लोकतंत्र के विकास के लिए ये दोनों बेहद जरूरी तत्व हैं। ये दोनों तत्व वामशासन में सबसे ज्यादा क्षतिग्रस्त हुए हैं। शिक्षा से लेकर राजनीति तक इन दोनों तत्वों का क्षय हुआ है। 'तथ्य' और 'ज्ञान' को सामाजिक-राजनीतिक जीवन में बड़े औजार के रूप में विकसित करने का काम किया जाना चाहिए। इस काम में राज्य और मीडिया बड़ी भूमिका अदा कर सकते हैं। आम जनता की ममता बनर्जी के प्रशासन से बड़ी आकांक्षाएं हैं इन आकांक्षाओं में किस तरह और किस हद राज्य प्रशासन भूमिका अदा कर सकता है उस पर आलोचनात्मक ढ़ंग से निरंतर चौकसी की जरूरत है। वाम शासन में राज्य में 'डिफेंसिव आधुनिकीकरण' का मॉडल लागू किया गया। इसके कारण आधुनिकीकरण के मामले में राज्य सरकार का डिफेंसिव रवैय्या था। राज्य को 'डिफेंसिव आधुनिकीकरण' के पैराडाइम से बाहर लाने की जरूरत है। इस मॉडल के कारण राज्य आर्थिक रूप से कमजोर हुआ है आम जीवन में मुद्रा की कमी आई। जीवनशैली में ठहराव आया । सुरक्षा के नाम पर क्लब-पार्टी आदि पर निर्भरता बढ़ी। 'डिफेंसिव आधुनिकीकरण' के कारण ही सड़क-परिवहन आदि का सटीक आधुनिकीकरण नहीं हो पाया। 'डिफेंसिव आधुनिकीकरण' के दायरे के बाहर जाकर संचार और सड़कों का गांवों तक विस्तार करने की जरूरत है। विमानपत्तन और शिपयार्ड के इलाकों की सुविधाओं का विस्तार किया जाना चाहिए। गांवों में कृषि का जबर्दस्त उत्पादन है लेकिन उसके वितरण का देशव्यापी नेटवर्क गायब है। ग्रामीणों को उपज के सही दाम मिलें, ठंडे गोदामघर बनाए जाएं,वितरण की आधुनिक प्रणाली बनायी जाए। मजदूरों-कारीगरों को आधुनिक सामाजिक संबंधों में बांधा जाए और पार्टी-यूनियन के बंधनों से मुक्ति दिलायी जाए। इससे नए किस्म के पेशेवर संबंध जन्म लेंगे। आर्थिक-श्रम-सामाजिक इन तीनों ही स्तरों पर रेशनलाइजेशन किया जाना चाहिए। ममता बनर्जी के प्रौपेगैण्डा ने आम लोगों में यह बात बिठादी कि वाम सरकार झूठ बोलती रही है साथ ही उसने लोगों की वामदलों के द्वारा दी गई व्यक्तिगत यातनाओं की यादों को जगा दिया। इससे वाम के खिलाफ व्यापक जनता ने वोट दिया। वाम मोर्चा लोकतंत्र में वोट से जीतता रहा है लेकिन इस प्रक्रिया में सामाजिक और वैचारिक नियंत्रण की भूमिका की अमूमन अनदेखी होती रही है। ममता बनर्जी के प्रचार अभियान का लक्ष्य यही दो चीजें थीं और इस काम में उनकी चुनाव आयोग ने प्रभावशाली ढ़ंग से मदद की।  वाम मोर्चा ने भूमि वितरण में सफलता पाने के बाद सामाजिक नियंत्रण को गांवों तक फैला दिया । पंचायती व्यवस्था और पार्टीतंत्र का जमकर दुरूपयोग किया गया। कालांतर में इसी के गर्भ से माफियातंत्र के साथ साझा संबंध बने और राज्यभर में विभिन्न रूपों में उगाही तंत्र ने जन्म लिया। नागरिक सुविधाओं और अधिकारों को गौण बना दिया गया। "जिसकी लाठी उसकी भैंस कहावत" के आधार पर समूचे राज्य को एक सूत्र में बांधे रखने की कोशिश की गई। मानवाधिकारों का हनन हुआ। याद रहे वाम मोर्चा हारा है लेकिन वामदल अभी मौजूद हैं।उनके पास 41 फीसदी जनता का समर्थन है,ममता प्रशासन को वाम के पीछे गोलबंद जनता का दिल जीतना होगा। यह काम लोकतांत्रिक माहौल और मानवाधिकारों का विकास करते हुए किया जाना चाहिए। ममता प्रशासन को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शिक्षा व्यवस्था को शामिल करना चाहिए। शिक्षा के समूचे तंत्र को पार्टीतंत्र से मुक्त करके पेशेवर बनाने की जरूरत है। यह काम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों  के आधार पर करना चाहिए। साथ ही कलकत्ता विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिलाने का काम करना चाहिए। इससे राज्य के अकादमिक वातावरण में व्याप्त पिछड़ेपन को दूर करने में मदद मिलेगी। साथ ही संसाधनों और सुविधाओं के अभाव के कारण पैदा हुई परेशानियों से मुक्ति मिलेगी। पश्चिम बंगाल में एक भी संस्कृत विश्वविद्यालय नहीं है। जबकि यहां संस्कृत में बहुत महत्वपूर्ण काम हुआ है । अतः राज्य में एक संस्कृत विश्वविद्यालय खोला जाना चाहिए,इस काम में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान की मदद ली जानी चाहिए।  
                      













रविवार, 22 मई 2011

आधुनिकता की नई चुनौतियां


   हिन्दी साहित्य में आधुनिकता के सवालों पर आए दिन बहस होती रहती है। आधुनिकता की शुरूआत 'अन्य' या विकल्प के उत्पादन से हुई है। आज 'अन्य' को मारने,हत्या करने,,वंचित करने या उसका शोषण करने या सामना करने की जरूरत नहीं है। उससे घृणा,प्रतिस्पर्धा,प्रेम करने की भी जरूरत नहीं है। आज की चुनौती है कि 'अदर' या 'अन्य' को पैदा किया जाय। अब 'अन्य' पेशन की वस्तु नहीं रह गया है।बल्कि उत्पादन की वस्तु बन गया है। पूंजीवाद के बिना आधुनिकता का उदय नहीं होता,व्यक्तिगत मूल्यों और व्यक्तिवाद का उदय नहीं होता ,अतः आधुनिकता पर कोई भी बहस पूंजीवाद को दरकिनार करके संभव नहीं है। आधुनिकता मूलतः पूंजीवादी प्रकल्प का हिस्सा है। आधुनिकता के उदय के साथ अन्य या हाशिए के लोगों के सवाल,स्त्री,मुसलमान,आदिवासी आदि के सवाल केन्द्र में आ गए हैं। आधुनिकता इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि वह अन्य को या हाशिए के लोगों के सवालों को केन्द्र में ले आ जाती है। हाशिए के लोगों पर प्रतीकात्मक हमले तेज हो जाते हैं। 'अन्य' के भविष्य को लेकर हमारा कोई अनुभव नहीं था,अत: 'अन्य' की हमने 'भिन्न' या 'डिफरेंस' के रूप में खोज की। साहित्य से लेकर मासकल्चर तक अन्य के प्रति हमारे सरोकार शरीर,सेक्स और सामाजिक संबंधों की तलाश में व्यक्त हुए।इसके बहाने हम उसके भवितव्य से पलायन कर गए।हमने उसके शरीर,उसके सेक्स,उसके 'अन्यत्व' को ही भवितव्य बना डाला।शरीर को सेक्स की वस्तु बना दिया।इसी के क्रम में लिंगभेद सामने आया।प्रत्येक लिंग का अपना शारीरिक वैशिष्टय होता है।विशिष्ट मानसिक गठन होता है।उसकी अपनी इच्छाएं होती हैं।इसके कारण अघटित घटनाएं सामने आती हैं।जिनमें इच्छा और सेक्स की विचारधारा भी शामिल है।सेक्सुअल  डिफरेंस का यूटोपिया, प्रकृति और कानून के आधार पर खड़ा किया गया।किंतु इन दोनों का कोई अर्थ ही नहीं था।क्योंकि ये दोनों इच्छाओं को फुसलाते थे।इच्छाओं के बारे में सवाल पैदा नहीं करते थे।बल्कि उनसे खेलते थे।ऐसे में दो लिंगों के बीच समानता का सवाल भी कहां उठता है।इनमें परस्पर विनिमय था।प्रत्येक की भिन्नता और अलगाव में विनिमय था।किंतु वैकल्पिकता और 'अन्यत्व' में फुसलाने का तत्व उन्माद की हद तक पहुँच गया।क्योंकि कभी किसी भी लिंग ने अपनी कामुकता को अन्य तक नहीं पहुँचाया है।अत: दूरी तय कर दी गई।'अन्य' या 'भिन्नता' को स्पर्श ही नहीं किया गया।यह भ्रम की महान अवस्था है जब हम इच्छाओं से खेल रहे थे।इस प्रक्रिया में हमने क्या पैदा किया ?हमने मर्दानगी के उन्माद को जन्म दिया।कामुकता के पैराडाइम को बदल दिया।बदले हुए पैराडाइम ने नए सिरे से सामान्य और सार्वभौम संदर्भों में 'अन्यत्व'के पैराडाइम को बदला।
     उन्माद के दौर में पुरूष के अंदर छिपी नारी की छवि को स्त्री के मन में उतारा।स्त्री के आदर्श शरीर के रूप में इसको प्रतिष्ठित किया।अब रोमांटिक प्यार स्त्री के दिल को जीतना नहीं था।उसे फुसलाना नहीं था।बल्कि उसके अंदर एक यूटोपिया को निर्मित किया गया। आदर्श नारी की छवि पैदा की गई। देवी,दुर्गा,सरस्वती,काली आदि रूपकों के माध्यम से अति-प्राकृतिक छवि निर्मित की गई।हमारे नव-जागरण काल में ऐसे लेखन की भरमार है। इसे ही सद्भाव के आदर्श रूप में पेश किया गया।अब ऐसे रूप सामने आए जो प्यार के तत्व से दूर थे।हम यह भी कह सकते हैं कि वे आदर्श से भी दूर थे।इसी के गर्भ से फुसलाने का दोमुँहापन सामने आया।इसे कारण कामुकता के पूरे तंत्र में बदलाव आया।उसका अर्थ और दिशाएं बदल गईं।क्योंकि कामुक आकर्षण 'अन्यत्व' से आ रहा था।अन्य के पागलपन ने एक जैसे या तुलानात्मक रूप में समान के रूप में अभिव्यक्ति पाई।अब हम अन्य की नजर से अपने को देखने लगे।स्वयं को अन्य की नजर से देखने का दुष्परिणाम यह हुआ कि हमने 'अन्य' से अपने को अलगा लिया।अब'अन्य' और 'मैं' में अंतर नहीं रह गया।यही वजह है कि रोमांटिक प्यार और उसके सारे बाई प्रोडक्ट अंतत: मौत की शरण लेते हैं।क्योंकि कामुकता अगम्यागमन और भवितव्य को पा लेती है।इसी आधुनिकता के दौर में 'फेमिनिटी' या स्त्रीत्व का जन्म होता है,जो स्त्री को 'सुपरफ्लुअस' बना देती है।'डिफरेंस' का उदय स्वयं में उस दोमुँहेपन से ध्यान हटाने वाली चीज है। बौद्रिलार्द ने लिखा है कि फेमिनिज्म वस्तुत: मर्दानगी का उन्मादभरा कथन है।स्त्रियां जिस उन्मादभरे ढ़ंग से मर्दानगी को देख रही हैं।मर्द भी उन्मादित ढ़ंग से स्त्रियों को देख रहे हैं। फलतः हमें स्त्री के 'अन्यत्व' को भिन्न तरीके से देखना होगा।स्त्रियों के बारे में विकल्पबोध पैदा करना होगा।स्त्री के असली रूप को सामने लाना होगा।वह पुरूष के मन की इच्छित छवि नहीं है।बल्कि उसकी अलग दुनिया है।हमें स्त्रियों के अंदर भी विकल्प खोजने होंगे।स्त्री की एक जमाना था।'अन्य' के रूप में जरूरत थी।सामाजिक उत्पादक के रूप में जरूरत थी।हम यह मानते थे कि स्त्री नहीं होगी तो संसार नहीं बसेगा।किंतु आज स्थितियां दल गई हैं।जिस तरह 'क्लोन' की खोज हुई है।उसमें पैदा करने के लिए स्त्री की जरूरत ही नहीं होगी।स्त्री की सेक्सुअल भूमिका एकदम अप्रासंगिक हो गई है। आज पुनरूत्पादन के लिए सेक्सुएलिटी एकदम अप्रासंगिक हो गई।इस परिघटना ने हमारे समूचे चिन्तन में भारी परिवर्तन करने शुरू कर दिए हैं।हमने जिस स्त्री की खोज की थी।अपने अनुकूल ढाला था।वह अब अप्रासंगिक हो गई है।हम यह भी कह सकते हैं कि असली औरत गुम हो गई है।अभी तक हमारे बीच में 'भिन्नता' या 'अन्यत्व' के जितने भी तर्क थे वे सब बेमानी हो गए हैं।ये सारे तर्क हमने पुरूष संदर्भ और पुरूष के प्रति आक्रोश के क्रम में निर्मित किए थे। बदली हुई स्थितियों में हमें विचारधारा और स्त्रीवाद के सभी वैचारिक सवालों पर नए सिरे से विचार करना होगा।आज स्त्री अपनी वास्तव इमेज को प्रस्तुत नहीं कर पा रही है।हम स्त्री की अनुमानित इमेजों के आधार पर भूमिका तय कर रहे हैं।इसी क्रम में लिंग और मर्दानगी के वैशिष्टय पर भी हमें नए ढ़ंग से सोचना होगा।विज्ञान की नई खोजों ने स्त्री के वैशिष्टय और भिन्नता को पूरी तरह खत्म कर दिया है।अब लिंगभेद समस्या नहीं रह गई है।बड़े पैमाने पर कामुक रूपान्तरण हो रहा है।मर्दानगी की इच्छाओं के सामने समस्याएं आ खड़ी हुई हैं।यह युग ट्रांससेक्सुअलिज्म का है।जबकि हमारे सारे संघर्ष लिंगभेद पर टिके रहे हैं।असली कामुकता और असली 'अदरनेस' का अब लोप होने वाला है। पुरूष के उन्माद और स्त्री के उन्माद के बीच सफलतापूर्वक सम्मिलन हो चुका है।यहां तक कि शरीरों का भी सम्मिलन हो चुका है।आज 'निज' का 'अन्य' में समावेश हो चुका है।'मैं' और 'अन्य' का भेद खत्म हो चुका है।आज 'अन्यत्व' का कोई भवितव्य हम नहीं जानते।हम इस भवितव्य के बारे में कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हैं। शरीर,सेक्स,बीमारी,मृत्यु,अस्मिता आदि में निरंतर बदलाव आ रहा है।इस परिवर्तन को लेकर आप कुछ भी नहीं कर सकते।यही भवितव्य है।आज व्यक्ति की इच्छा,लुक,हाव- भाव, इमेज आदि सभी में प्लास्टिक सर्जरी का इस्तेमाल हो रहा है।यदि हम अपना शरीर पराया लग रहा है।हम इसकी प्लास्टिक सर्जरी करा सकते हैं।संतोष प्राप्त कर सकते हैं।परिवर्तन करा सकते हैं।इसे आइडियल ऑब्जेक्ट बना सकते है।चुस्त-दुरूस्त बना सकते हैं।शरीर के प्रति आकर्षण,शरीर की चाह अंतत: अन्य का अस्तित्व ही खत्म कर देती है।आज प्रामाणिक संस्कृति की जगह छद्म प्रामाणिकता ने ले ली है।स्वाभाविक संबंधों की जगह 'अन्य' के प्रति कृत्रिम संबंध आ गए हैं।आज सभी अलगाव की बात कर रहे हैं।खासकर 'अन्य' के साथ अलगाव की बातें ज्यादा हो रही हैं।सच यह है कि हमने 'अन्य' पर अलगाव थोपा है।इसके कारण हम 'अन्य' की मौजूदगी के बिना 'अन्य' को पैदा कर लेते हैं।यह सब हम अपनी इमेज और पहचान के आधार पर कर रहे हैं।आज हमारी जो आलोचना हो रही है वह अलगाव के कारण नहीं हो रही।आज हम अपनी इमेज की निन्दा कर रहे हैं।सच यह है कि 'अन्य' गुम हो गया है।अलगाव खत्म हो गया है। आभासी जगत में भी अन्य गायब हो गया है।यह सबसे बड़ी दुर्घटना है।आज प्रत्येक क्षेत्र में प्लास्टिक सर्जरी का साम्राज्य है।आज इसके जरिए सब कुछ बदल सकते हैं।शरीर और चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी तो अदरनेस और भवितव्य का एक छोटा पक्ष है।सवाल उठता है कि क्या करें ? देखिए किसी भी किस्म का कामुकता का आंदोलन इसका समाधान नहीं है। कामुकता के प्रति आकर्षण भी इसका समाधान नहीं है। अन्य का अस्वीकार और उसके भवितव्य का अस्वीकार भी इसका समाधान नहीं है।अन्य को फुसलाने से इसकी मुक्ति संभव नहीं है।फुसलाने को मुक्ति समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।हमें अपने शरीर,प्रकृति, स्त्रीत्व, अन्यत्व,स्व के प्रति असंतोष को बनाए रखना चाहिए।इस असंतोष में ही आकर्षण है।यहीं से हमारी मुक्ति और परिवर्तन की जंग शुरू होती है।प्लास्टिक सर्जरी अन्य की मुक्ति का मार्ग नहीं है।बल्कि भ्रम है। असल में सूचना हाइवे या सूचना समाज एक रूपक है।इसमें तीव्रगामी स्पीड,मोशन और डायरेक्शन संभव है।एक मर्तबा रोलां बार्थ ने लिखा था कि,जब हम ड्राइवर / दर्शक की नजर से इमेजों को देखते हैं तब हमारे सहज मोशन दृश्य अनुभव में बदलते हैं। ऐसे में में इमेजों का रूपान्तरण करते है। वास्तव जगत का नहीं।साइबर स्पेस जो मिथ्याभास पैदा करता है वह स्क्रीन के परे होता है। यहां वास्तव जगत का कोई संदर्भ नहीं होता। सब कुछ अवास्तविक,काल्पनिक,इमेजरी होता है।यह गहराई रहित सतह है।बौद्रिलार्द्र के शब्दों में यह यथार्थ का सैटेलाइजेशन है।जिसे हाईपर रियलिटी की तेज गति से पलायन करके उपलब्ब्ध किया जाता है।यह ऐसी दुनिया है जहां रूपक और इमेज के बीच किसी खेल की अनुमति नहीं है।यहां मेटाफर का परिवर्तन के लिए इस्तेमाल नहीं हो रहा।अपितु मिथ्याभास की दुनिया में भ्रमण के लिए तरह-तरह के रूपकों का इस्तेमाल हो रहा है।हाईपर रियलिटी के रूपकों की इमेजों में हम विचरण करते हैं।पॉल विरलियो के शब्दों में कम्प्यूटर अथवा टेलीकम्युनिकेशन आखिरी वाहन है,जो हमारे सभी तरह के टोपोलॉजिकल या संस्थिति विज्ञान संबंधी सरोकारों से मुक्त कर देता है।मोशन,स्पीड,एवं पर्यटन अपना असली अर्थ खो देते हैं। यह अपनी शक्ति मिथ्याभास से अर्जित करता है।आभासी जगत की जगह गतिमान जगत  आ जाता है।यह भी कह सकते हैं कि वास्तव की जगह गतिमान(काईनेटिक) ऊर्जा जन्म ले लेती है।साइबर ट्रेवल के नामपर हम जिस दुनिया में भ्रमण करते हैं वह रूपकों की दुनिया है,यह कम्प्यूटर स्क्रीन के परे है।आज 'ग्लोब' का अर्थ 'विश्व' नहीं रह गया है।क्योंकि वह अब 'वर्ल्ड' मात्र रह गया है।यदि इस परिप्रेक्ष्य में मीडिया इमेजों और इंटरनेट के बारे में विचार किया जाए तो पाएंगे कि साइबरमेटिक वर्ल्ड के 'स्पेस' के जितने भी तर्क हैं वे जगत से जुड़े नहीं हैं।वे ऐसे जगत से वचित कर देता है जिसे देखा जा सकता था,महसूस किया जा सकता था,जो पारदर्शी था,तत्क्षण उपलब्घ था।टैक्नोलॉजी का यह कार्य था कि वह दूरियां कम करे।किंतु इसने तो दूरी की अवधारणा को ही खत्म कर दिया।इसने स्पेस और टाइम को खत्म कर दिया।आज वह निरंतर किसी न किसी विषय का खास समय और स्थान के संदर्भ से अपहरण कर रही है।  कम्प्यूटर स्क्रीन तो आभासी है।इसे भरा नहीं जा सकता।इसका अतिक्रमण भी नहीं कर सकते।आप इसमें मीडिया के जरिए सर्कुलेट कर सकते हैं।वास्तव दूरी का विस्फोट की तरह गायब हो जाना असल में इसे पानेकी हमारी चुनौतियों को बढ़ा देता है।स्थान और दूरी के अंतराल को शरीर से नहीं भरा जा सकता।अपितु स्वयं की आभासी यात्राओं से ही भर सकते हैं। आभासी संसार वास्तव नहीं होता।इस संसार की शुरूआत सभी किस्म के संदर्भों के खात्मे से होती है। यहां संकेतों की कृत्रिम दुनिया का बोलवाला है।संकेतों की दुनिया में अर्थ सबसे ज्यादा अस्थिर होता है।वहां अर्थ से ज्यादा वस्तु का महत्व होता है।यहां व्यवस्थाएं बराबर हैं।यहां सभी विरोधाभासी चीजें,धारणाएं भी बराबर हैं।









पराजय से क्या सही सबक लेगी माकपा ?- कुलदीप कुमार

                                                         
                                                       वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप कुमार

पश्चिम बंगाल और केरल में वाम मोर्चे को मिली चुनावी हार के बाद लगभग वही माहौल है जैसा 1991 में सोवियत यूनियन के विघटन के बाद था. वाम-विरोधियों के उत्साह का ठिकाना नहीं है. उनकी राय में अब वामपंथी राजनीति को ऐसी पटखनी मिल गयी है कि उसका फिर से उठना मुश्किल है. उधर वामपंथी, विशेषकर मार्क्सवादी, यह दिखाने में लगे हैं मानों कुछ हुआ ही न हो. हम हार गए तो क्या, हमें 41 प्रतिशत वोट नहीं मिले क्या? क्या इससे पता नहीं चलता कि हमारा जनाधार बरकरार है? हमारी हार तो सबको दीख रही है, पर जनाधार नहीं दीख रहा. ठीक है, कुछ गलतियां हुई हैं, लेकिन हमारी पार्टी में इतनी शक्ति है, हमारे यहाँ इतना आतंरिक लोकतंत्र है कि हम इन्हें दूर कर लेंगे.

लेकिन क्या चुनाव परिणामों की समीक्षा करने भर से यह सब हो जाएगा? क्या कम्युनिस्ट पार्टियों को कुछ अधिक बुनियादी सवालों पर विचार करने की ज़रुरत नहीं है? क्या उन्हें इस सवाल पर नहीं सोचना चाहिए कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर लेनिनवादी पार्टी संगठन की संगति बैठती है या नहीं? दूसरे, क्या वह अब उपयोगी भी रह गया है या नहीं? चुनाव परिणाम आने के दो दिन बाद ही एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलितब्यूरो की सदस्य बृंदा कारत ने माओ की उक्ति को याद करते हुए कहा कि पार्टी सदस्यों को जनता के बीच इस तरह रहना चाहिए जैसे नदी के जल में मछली रहती है. आशा है कि उनकी पार्टी केवल चुनाव परिणामों की ही नहीं, अपने पिछले तीन दशकों के कामकाज की भी समीक्षा करेगी और देखेगी कि उसके कार्यकर्ता जनता के बीच जल में मछली की तरह रह रहे थे या मगरमच्छ की तरह.
दरअसल कम्युनिस्ट विचारपद्धति की सबसे बड़ी खामी यह है कि कम्युनिस्टों को अभिव्यक्ति और राजनीतिक कर्म की स्वतंत्रता सिर्फ अपने लिए चाहिए. यानी जब वे सत्ता के विरोध में हों. लेकिन स्वयं सत्ता में आने के बाद वे ये स्वतंत्रताएं दूसरों को नहीं देना चाहते. जैसा कि लेनिन ने पार्टी संगठन के अपने सिद्धांतों में स्पष्ट कर दिया था, स्वतंत्रता भी पार्टी हित के अधीन है. चूंकि पार्टी हित और क्रान्ति के हित में कोई फर्क नहीं है, इसलिए क्रान्ति के हित को ध्यान में रखते हुए सभी प्रकार की स्वतंत्रताओं को पार्टी हित के दायरे में ही देखा जाना चाहिए. सीपीआई हो या सीपीएम, क्रांति के लिए काम करने का दावा किसी ने भी नहीं छोड़ा है. यह एक अजीब विसंगति है कि पिछले छह दशकों से संसदीय व्यवस्था के भीतर काम करने और संविधान के दायरे में राज्य सरकारें चलाने के बावजूद दोनों पार्टियों का दावा है कि वे भारत में क्रान्ति लाने के लिए संघर्षरत हैं.
हर चीज़ को पार्टी हित के अधीन करने की लेनिनवादी धारणा का ही नतीजा था कि चौंतीस वर्षों के वामपंथी शासन के दौरान पश्चिम बंगाल में नौकरशाही और सीपीएम के पार्टी संगठन के बीच का फर्क लगभग समाप्त हो गया. पार्टी की स्थानीय कमिटियाँ जीवन के हर क्षेत्र में हस्तक्षेप करने लगीं. हर स्तर पर छोटे-छोटे तानाशाह पनपने लगे. कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रसंघों के चुनाव मज़ाक बन कर रह गए क्योंकि उनमें अक्सर पदाधिकारी और कार्यकारिणी के सदस्य निर्विरोध चुने जाने लगे. विरोध करने वालों को सबक सिखाया जाने लगा. अवसरवादिता, भ्रष्टाचार और आतंक के ज़रिये बात मनवाने की प्रवृत्ति जड़ पकड़ने लगी. जो लोग समझते हैं कि पश्चिम बंगाल में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था और यदि सिंगूर तथा नंदीग्राम की घटनाएं न हुई होतीं तो राज्य में सत्ता-परिवर्तन नहीं होता, वे खासी ग़लतफ़हमी में हैं. लोगों के भीतर आक्रोश की आग बहुत समय से धधक रही थी. सिंगूर और नंदीग्राम की घटनाओं से वह बाहर आ गयी.
वाम मोर्चे की सरकार की बहुत बड़ी उपलब्धि थी भूमि सुधार. लेकिन ये भूमि सुधार उसके कार्यकाल के प्रारम्भिक वर्षों में ही हो गए थे. इनके कारण जीवन में क्या परिवर्तन आया था, इसका अहसास पुरानी पीढ़ी के किसानों को तो था, लेकिन जो किसान आज तीस वर्ष का है उसे नहीं, क्योंकि उसने तो आँख खोलते ही दुनिया को वैसा ही पाया था जैसी वह आज है. इसलिए उसके मन में वाम मोर्चा सरकार के लिए किसी प्रकार की कृतज्ञता नहीं है. वह तो यह देख रहा है कि उसके जीवन को बेहतर बनाने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा. टीवी और इंटरनेट के इस युग में केवल शहर में रहने वालों की ही आशाएं-आकांक्षाएं नहीं बढ़ी हैं, गाँव वालों के भी सपनों में भी बदलाव आया है. ऐसे में वे यथास्थिति से संतुष्ट रहने वाले नहीं.
वाम मोर्चा सरकार ने बिजली, सड़क, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी ज़रूरतों पर भी ध्यान नहीं दिया जो अपने आप में विस्मयकारी बात है. पश्चिम बंगाल में उसकी एक अन्य बहुत बड़ी उपलब्धि यह भी रही कि राज्य को उसने साम्प्रदायिक हिंसा से मुक्त रखा. लेकिन इसके अतिरिक्त कुछ भी ऐसा नहीं हुआ जिसके लिए राज्य के मुसलमान अल्पसंख्यक उसका शुक्रिया अदा करें. तसलीमा नसरीन को राज्य से खदेड़ कर सरकार ने सोचा कि वह मुसलमानों को रिझा सकेगी, लेकिन इससे केवल उनके बीच पनपने वाले इसलामवादी तत्वों को ही बल मिला. उधर रिजवानुल हक वाले मामले में स्पष्ट हो गया कि राज्य सरकार और प्रशासन एक धनी हिन्दू का पक्ष ले रहे हैं. अल्पसंख्यक वोट इसके बाद भी वाम मोर्चे के पक्ष में कैसे पड़ता?
उधर केरल में सीपीएम के अनुशासन की धज्जियां उड़ गयीं. वहां की राज्य इकाई में वी एस अच्युतानंदन और पिनाराई विजयन के दो गुट हैं जो एक दूसरे को फूटी आँख नहीं देख सकते. केंद्रीय नेतृत्व ने विजयन गुट की तरफदारी करते हुए पांच साल से मुख्यमंत्री के रूप में काम कर रहे अच्युतानंदन के खिलाफ चुनाव से ऐन पहले अविश्वास व्यक्त कर दिया और उनका टिकट काट दिया. जब पार्टी में ज़बरदस्त विरोध हुआ तो ठेठ अवसरवादिता का परिचय देते हुए उन्हें टिकट दे दिया. वहां हालत यह है कि विजयन की छवि एक उदारवादी लेकिन भ्रष्ट नेता की है तो अच्युतानंदन की छवि स्तालिनवादी किन्तु ईमानदार नेता की।
चुनाव परिणामों के विश्लेषण से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा अपनी वर्तमान स्थिति का आकलन और विश्लेषण. सीपीएम ने 1978 में सल्किया प्लेनम आयोजित करके वहां हुए विचार-विमर्श के बाद तय किया था कि अब उसकी प्राथमिकता हिंदी प्रदेशों में पार्टी के विस्तार की होगी. यह प्लेनम पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु के नेतृत्व वाली सरकार के गठन के एक साल बाद हुआ था. इसके बाद ही पार्टी का मुख्यालय कोलकाता से दिल्ली लाया गया. शुरू के एक-दो साल ज्योति बसु ने भी दिल्ली और हिंदी राज्यों के कुछ शहरों में जाकर जनसभाएं संबोधित कीं लेकिन फिर उनका उत्साह ठंडा पड़ गया और वह अपने राज्य में ही उलझ कर रह गए. उस समय सीपीएम पंजाब में काफ़ी मजबूत थी. उत्तर प्रदेश के भी कुछ हिस्सों में उसका अच्छा-खासा असर था. अन्य हिंदी प्रदेशों में भी उसकी थोड़ी-बहुत उपस्थिति थी. लेकिन आज क्या स्थिति है? आज वह हिंदी प्रदेशों से लगभग गायब हो चली है. सीपीआई की हालत भी ऐसी ही है. इसके बावजूद वर्ष 2008 में, जब सीपीएम की अगुवाई में वाम दलों ने यूपीए सरकार से समर्थन वापस लिया था, वाम दलों का राष्ट्रीय राजनीति में अच्छा-खासा प्रभाव था. इस स्थिति में लौटने में अब उन्हें बहुत समय लगेगा.
सीपीएम के केरल और पश्चिम बंगाल के नेता अपने राज्यों में ही सीमित रहे. केंद्रीय नेतृत्व उन्होंने उन लोगों को सौंप दिया जिनका ज़मीनी आधार नहीं है. व्यक्ति के रूप में ये नेता बहुत प्रतिभाशाली, कर्मठ और सक्षम हो सकते हैं, लेकिन जनता की नब्ज़ पर इनकी उंगली कभी नहीं रही. अब इन राज्यों के नेताओं के सामने दो विकल्प हैं. या तो वे अपने-आपको अपने राज्य में पार्टी को मजबूत बनाने के प्रयास में पूरी तरह से झोंक दें, या फिर केंद्रीय नेतृत्व की ओर भी ध्यान दें. सीपीएम महासचिव प्रकाश कारत ने पिछले दिनों एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में बहुत भोलेपन के साथ कहा है कि पार्टी महासचिव पोलितब्यूरो सदस्यों में से एक होता है और वह सिर्फ पार्टी का प्रवक्ता है. वरना उसमें और दूसरों में कोई फर्क नहीं. लेकिन कम्युनिष पार्टियों के कामकाज से परिचित लोग जानते हैं कि वास्तविकता इससे बिलकुल भिन्न है. पार्टी महासचिव के पद का इस्तेमाल करके ही स्टालिन ने सोवियत संघ में अपना वर्चस्व कायम किया था. महासचिव के हाथ में संगठन के सारे सूत्र होंते हैं. वह पार्टी का ही नहीं, उसके द्वारा लागू की जा रही राजनीतिक लाइन का भी प्रतिनिधित्व करता है. किसी भी कम्युनिस्ट पार्टी में यह नहीं हुआ कि पार्टी की लाइन बदल जाए पर महासचिव वही रहे. सीपीएम के इतिहास में ही इसके उदाहरण मिल जायेंगे. क्या पी. सुन्दरैया को लोग भूल गए हैं?
एक बात वाम-विरोधियों को भी याद रखनी चाहिए. जब तक समाज में शोषण, भूख, गरीबी और बेरोज़गारी है, वाम राजनीति की प्रासंगिकता बनी रहेगी. उस वाम राजनीति की बागडोर सीपीआई या सीपीएम या माओवादियों के हाथ में ही हो, ऐसा भी ज़रूरी नहीं है. वक़्त की ज़रुरत के मुताबिक़ जनता अपने संघर्ष के हथियार तैयार कर लेती है. लेकिन शोषण और उत्पीडन के खिलाफ संघर्ष कभी भी बंद नहीं होता. उसकी धार कभी तेज़ और कभी कुंद अवश्य हो सकती है. इन दिनों मनमोहन सिंह की सरकार जिस तरह की नव-उदारवादी नीतियाँ अपना रही है, वे केवल अमीरों के प्रति उदार हैं. आम आदमी से उन्हें कोई सरोकार नहीं. ऐसे में वाम राजनीति के लिए स्वयं के पुनराविष्कार का सुनहरी मौक़ा है. देश में उसका प्रभाव तभी फ़ैल सकता है जब आम आदमी अपने जीवन में उसकी उपस्थिति की ज़रुरत महसूस करे और उसके माध्यम से अपने सपनों के साकार होने की संभावना देखे. वाम दल अपनी चुनावी पराजय से सबक सीख कर आगे बढ़ेंगे, तभी राष्ट्रीय राजनीति में सार्थक हस्तक्षेप कर सकेंगे.
( 22 मई के जनसत्ता में प्रकाशित ,जनसत्ता से साभार)

गुरुवार, 19 मई 2011

1857 के एलाननामे और हुक्मनामे -इंकबाल हुसैन



1857 की जंगे-आजादी का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि यह जंग हथियारों के अलावा एलाननामों और हुक्मनामों के द्वारा भी लड़ी गई थी, जो स्वतंत्रता सेनानियों ने उर्दू और हिंदी भाषा में प्रकाशित किए थे। यह जंग भारतीय फौजों ने शुरू की थी, बाद में उनके साथ अवाम और खवास विभिन्न कारणों से सभी शामिल हो गए थे। स्वतंत्रता संग्रामियों ने आम भारतीयों के अंदर राष्ट्रीय और धार्मिक एकता पैदा करने के लिए आवश्यकतानुसार बहुत सारे एलाननामे जारी किए थे। अफसोस है कि एलाननामों की मूल कापियां नहीं के बराबर मिलती हैं। 1858 तक ये मौजूद थीं जिन्हें अंगरेज हुकूमत ने स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ किए मुकदमों में सबूत के तौर पर अंगरेजी में अनुवाद करवा कर पेश किया था जो राष्ट्रीय अभिलेखागार नई दिल्ली, इलाहाबाद, यूपी में सुरक्षित हैं। मैंने गोरखपुर के सैयद हामिद अली साहब के पुस्तकालय में मौजूद एलाननामों की मूल कापियां प्राप्त की हैं। इनमें अधिकतर उर्दू में हैंतीन एलाननामे उर्दू और हिंदी और कई फारसी में हैं। इन एलाननामों को हम तीन विभिन्न दौर में बांट सकते हैं। पहले दौर के एलाननामों में जोशो-वलवला के साथ जनता को संबोधित किया गया है, अंगरेजों की बुराइयां बताई गई हैं और हिंदू-मुसलिम एकता का महत्व बताया गया है। दूसरे दौर के एलाननामों में हिंदू-मुसलिम की एकता पर जोर, एक दूसरे के धर्म की रक्षा, अंगरेजों का पूर्ण सफाया, नई हुकूमत के बनने के बाद अच्छी व्यवस्था, धर्म की आजादी, बेहतर खेती-बाड़ी और आर्थिक बंदोबस्त आदि के वादे हैं। तीसरे दौर के एलाननामों से मालूम होता है कि स्वतंत्रता सेनानी बचाव के लिए जंग लड़ रहे थे। इनमें अवाम-खवास सबसे अपील की गई है कि वह दिलोजान से अंगरेजों के विरोध में एकजुट हों। जंग में विशेष सफलता पाने वालों को पुरस्कार देने के वादे भी किए गए हैं। भारतीयों को इस बात से भी खबरदार कराया गया है कि अगर अंगरेज दोबारा सत्ता में आ गए तो भारतीयों का क्या हाल होगा। 

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि अधिकतर एलाननामे उर्दू में हैं। अगर हम उन्नीसवीं सदी के मध्य में प्रकाशित होने वाले अखबारों का जायजा लें तो मालूम होगा कि उनमें से ज्यादातर हिंदुस्तानी भाषा और फारसी लिपि में छप रहे थे। अब उसे उर्दू जबान के नाम से जानी-पहचानी जाती है। ये उर्दू के अखबारों के मालिक ज्यादातर हिंदू थे, वही उनके संपादक और प्रकाशक थे। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उस वक्त उर्दू भाषा एक मिली-जुली राष्ट्रीय भाषा की हैसियत से अपनी जगह बना चुकी थी जिसकी उन्नति में हिंदू और मुसलमान बराबर के भागीदार थे। 1857-58 के स्वतंत्रता सेनानियों के द्वारा जारी किए गए एलाननामों से इसकी और जानकारी मिलती है। पहली जंगे-आजादी के एलाननामों से न केवल स्वतंत्रता सेनानियों की भावनाओं का पता लगता है बल्कि हमें समस्याओं का भी पता चलता है कि वे इतनी बड़ी जंग में क्यों कूद पड़े थे, उन्होंने जनता से क्या-क्या वादे किए थे और वे अंगरेजों के चंगुल से आजाद कराने के बाद देश को किस प्रकार चलाना चाहते थे। एलाननामों से यह भी मालूम होता है कि स्वतंत्रता सेनानी जिनमें अंगरेजी फौज के बागी सिपाही थे, अंगरेजों के आर्थिक शोषण, रंग-भेद, असामान्य टैक्स, खेती-बाड़ी पॉलिसी, बेरोजगारी और भारतीय कल-कारखानों के सर्वग्रासी विनाश को पिछली एक सदी से बर्दाश्त करते चले आ रहे थे। इस गरीबी के बावजूद वे शांत थे और सब्र कर रहे थे। लेकिन उनके सब्र का पैमाना उस वक्त टूट गया जब अंगरेजी शासन के प्रोत्साहन में ईसाई मिशनरीज द्वारा धर्मांतरण का प्रयास किया गया। यह एक ऐसा कारण था जिसने उन वफादार फौजियों को भी अंगरेजों के खिलाफ हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया, जो भारत में अंगरेजी शासन के उद्भव और विकास में एक सदी से लगे हुए थे। 10 मई 1857 को मेरठ में बंगावत का आरंभ करके फौजियों की टोली दिल्ली पहुंची और 11 मई 1857 को उनका पहला एलाननामा पेश किया गया, 'सब हिंदू-मुसलमान, रिआया और मुलाजिम हिंदुस्तानियों को अफसरान फौजें-अंगरेजी मुकीम दिल्ली और मेरठ की तरफ दरयाफ्त होवें कि अब सब फिरंगियों (अंगरेज) ने ऐसा किया है कि अव्वल सब फौज हिंदुस्तानी को बेधर्म करके फिर सब रिआया को बजोरे-तदब्बुर क्रिस्टान (ईसाई) कर लें चुनांचे हम सबने फकत दीन (धर्म) के वास्ते मय-रिआया के इत्तिफाक करके एक-एक काफिर (अंगरेजों) को जिंदा न छोड़ा और बादशाहते-दिल्ली इस अहद पर कायम है कि फौज कंपनी के फिरंगियों को कत्ल करे।

ये एलाननामा बंगाल आर्मी के फौजियों ने जारी किया था जिसमें अधिकतम ऊंची जाति के हिंदू थे। इसमें यह भी कहा गया था, 'अब लाजिम यह है कि जिसको क्रिस्टान होना दुश्वार होवे, रिआया और फौज हर मकाम की एकदम होकर हिम्मत करे और तुख्म इन काफिरों (अंगरेजों) का बाकी न रखें।'

एलाननामे में हिंदू और मुसलमानों के मजहब की रक्षा और अंगरेजों के खिलाफ नफरत और गुस्सा यूं ही नहीं था। उस समय के एक पादरी शेयरिंग के खयाल देखें, 'तमाम मुल्क मिशनरीज की सरगर्मियों से सख्त खौफजदा हो चुका था। हिंदू अपने धर्म और मुसलमान अपने मजहब के लिए परेशान थे।'

यहां यह बात गौर करने की है कि एलाननामे में अंगरेजों को काफिर बताया गया है। महाराजा पेशवा नाना साहब, रानी झांसी, खान बहादुर खान, बिरजिस कदर, बहादुरशाह, शाहजादा फिरोज शाह और मौलवी लियाकत अली के एलाननामों में सभी अंगरेजों को नसारा (ईसाई) और काफिर ही कहा गया है। नाना साहब ने ये भी लिखा है, 'काफिर अंगरेजों ने इस हद तक मजलिम, बदमाशियां, नाइनसाफियां की हैं जिनकी वजह से ईश्वर ने इन काफिरों को सजा देने और उखाड़ फेंकने और हिंदू-मुसलमान शासन को दोबारा कायम करने के लिए, मुल्क के तहफ्फज (रक्षा) के लिए मुझे मुअय्यन (तय) किया है।'

एलाननामों के अंदाज से यह समझा जा सकता है कि सेनानी हिंदू धर्म और इसलाम की रक्षा को बहुत आवश्यक समझ रहे थे। इस कर्तव्य को पूरा करने के लिए उन्होंने धर्मयुध्द छेड़ दिया था। और उस वक्त एक आम राय यह भी थी कि धर्म तो सिर्फ दो ही हैं, 'धर्म तो दूई हैं, हिंदू का धर्म और मुसलमान का ईमान।'|

स्वतंत्रता सेनानी हिंदू धर्मों के बारे में जो भावना रखते थे वह उनके इस नारे से भी समझा जा सकता है, 'एक पिता के दुई पुत्र, एक हिंदू एक तुर्कउनका चोली-दामन का साथ।' दुर्गा दास बंदोपाध्याय अंगरेजी फौज में मुलाजिम थे। वह एक नारे का वर्णन करते हैं जिसे सेनानियों ने बरेली में लगाया था, 'हिंदू-मुसलमान एक, राम-रहीम एक, श्रीकृष्ण-अल्लाह एक।'~ यह धर्मिक एकता एक दिन की पैदावार या 1857 के हालात के कारण नहीं थी, बल्कि यह हिंदू और मुसलमानों के हिंदुस्तान में सदियों की एकता और एक दूसरे की विचारधाराओं को समझ लेने के बाद पैदा हुई थी। रामबख्श (जनरल ऑफ डिवीजन) मंशा राम, ब्रिगेड मेजर ने स्वतंत्रता सेनानियों के कैंप से महाराजा जंग बहादुर नेपाल के नाम अपनी अर्जी में लिखा था कि उन्होंने और उनके पूर्वजों ने एक सदी तक अंगरेजों की मुलाजमत ईमानदारी के साथ की थी जिसके कारण वह इस देश के मालिक बन गए, लेकिन उन्होंने हमारी धार्मिक भावनाओं का खयाल न करते हुए ऐसे कारतूस बनाए जिनमें सूअर और गाय की चर्बी की मिलावट थी जिससे वह हमारा धर्म खराब करना चाहते थे, 'इससे पहले कभी हिंदुस्तान में बहुत से बादशाह गुजरे हैं लेकिन किसी ने कभी हमारा धर्म और ईमान खराब करने की कोशिश नहीं की। अगर किसी हिंदू या मुसलमान का मजहब ही खतम हो जाए तो फिर दुनिया में क्या रह जाएगा।' यही वे भावनाएं थीं जिनके कारण बागी फौजी बिना किसी भेदभाव के अपने-अपने धर्म की रक्षा के लिए अंगरेजों के आमने-सामने हुए थे। वे यह मानते थे कि अंगरेज जिस मजहब को मानते हैं वह झूठा है। वह तीन ईश्वरों में विश्वास करने वाले थे जबकि हिंदू और मुसलिम एक-एक ईश्वर के मानने वाले थे। इसीलिए हिंदुस्तान में हिंदू, मुसलमान, आतिश-परस्त और यहूदी उनके मजहब को सच मजहब नहीं मानते थे। स्वतंत्रता सेनानियों ने पहली जंगे-आजादी के दौरान इसी पर कायम रहते हुए हुकूमत से जंग किया। 

1857 के एलाननामों से यह भी मालूम होता है कि बागी फौजियों को जनता का समर्थन प्राप्त था। जनता को विश्वास था कि अंगरेजों के शासन में हिंदुस्तानियों की जान, माल और आबरू सुरक्षित नहीं थी। वह अंगरेजों की धोखेबाजी और शातिराना चालों को खूब समझ रहे थे।

एलाननामों के द्वारा स्वतंत्रता के सिपाहियों ने जनता को यकीन दिलाया था कि हिंदुस्तानियों की हुकूमत में पूरी धार्मिक आजादी होगी जैसे कि पहले थी। हर आदमी अपने दीन-धर्म पर कायम रहेगा, हर किसी की इज्जत-आबरू कायम रहेगी और किसी बेगुनाह का कत्ल नहीं किया जाएगा। किसी का माल जोर-जबरदस्ती से हासिल नहीं किया जाएगा। शाहजादा फिरोज शाह ने अपने एलाननामे में यह विश्वास दिलाया था कि बादशाही के बाद देश के हर वर्ग को व्यवसाय, नौकरी में आसानी होगी और जमींदारों को भी अंगरेजों के अत्याचार से राहत मिलेगी।
कुछ एलाननामे, जैसे मौलवी लियाकत अली का एलाननामा फारसी शब्दों और कुरआन की आयतों से भरा हुआ है। इस एलाननामा का आरंभ खुदा के नाम से और पैगंबर मुहम्मद की प्रशंसा से होता है।

एक विशेष एलाननामा पत्रिका फतहुल-इसलाम 1857 की जंगे-आजादी का एक अमूल्य दस्तावेज है। इस पत्रिका को निकालने वाले का नाम नहीं मिलता लेकिन पत्रिका के विषय और दूसरे विवरण से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसे मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने जो 'फैजाबाद के मौलवी' के नाम से भी प्रसिध्द थे, निकाला था। इस पत्रिका में अंगरेजों के जुल्म की दास्तान लिखने के बाद अवाम से जिहाद करने की अपील की गई है। इस पत्रिका की भाषा सामान्य है। इसमें अरबी और फारसी के शब्द कम हैं। पत्रिका में सेनानियों को युध्द के तरीके सिखाने का प्रयास किया गया है। इसके अलावा इस एलाननामे में नेतृत्व के बारे में समझाया गया है जो दिलचस्प है, 'अक्ल और दीन (धर्म) की शर्म भी यही कहती है कि मलेका विक्टोरिया काफिरा और दीन की दुश्मन, अंगरेजों की ताबेदारी से मुसलमान अमीर (बादशाह) की ताबेदारी और बादशाह के ताबेदार राजा की ताबेदारी करोड़ों दर्ज अफ्जल (उत्तम) है... और सब हिंदू दिलो-जान से इसलाम और बादशाह के खैर-खाह थे। तो अब भी वही हिंदू और वही मुसलमान हैं और वही किताब है। अपने दीन पर वह रहें और अपने दीन पर हम रहेंगे। हम उनकी मुहाफिजत (सुरक्षा) करेंगे वो हमारी मदद और मुहाफिजत करेंगे। ईसाइयों ने हिंदू और मुसलमान दोनों को ईसाई करना चाहा था, अल्लाह ने बचा लिया। उल्टे वो आप ही खराब हो गए।'

इस पत्रिका के अंत में अंगरेजों से किसी भी प्रकार का संबंध न रखने को कहा गया है और यह निवेदन किया गया है, 'सारे हिंदू और मुसलमान उनकी किसी किस्म की नौकरी न करें।'

1857 में दिल्ली से बहुत से फरमाननामे, एलाननामे और हुक्मनामे जारी हुए थे जो अधिकतर उर्दू ही में थे और कुछ फारसी में। ये दस्तावेज राष्ट्रीय अभिलेखगार नई दिल्ली में सुरक्षित हैं। इस लेख में कुछ दस्तावेजों को बतौर हवाला पेश किया जा रहा है। 1857 में दिल्ली पर स्वतंत्रता सेनानियों के काबिज होने के बाद नई आजाद हुकूमत विभिन्न समस्याओं से दो-चार हुई थी। अमनो-अमान खतम हो चुका था। दिल्ली और उसके आसपास के थानों से रिपोर्ट आनी बंद हो चुकी थी। बहादुरशाह ने अपने हुक्मनामा (19 मई 1857) के द्वारा थानेदारों को रोज रिपोर्ट भेजने की ताकीद की, कि वो अपने-अपने थानों पर मौजूद रहें और शहर में अमनो-अमान बहाल करें। रोजाना गश्त लगाएं और शहर में होने वाली सारी घटनाओं की रिपोर्ट कोतवाल को भेजते रहें। हुक्म की खिलाफवर्जी पर सख्त सजा देने का इशारा किया गया था।
बहादुरशाह के सतर्क रहने के बावजूद भी दिल्ली की जनता और विशेष रूप से व्यापारी वर्ग लूटमार की घटनाओं से परेशान थे। 13 मई को बहादुरशाह ने चांदनी चौक का दौरा करके लोगों की हिम्मत बढ़ाई थी जिसकी वजह से दुकानें खुलनी शुरू हुई थीं लेकिन दुकानदारों ने जल्द ही दुकानें बंद कर दीं। बहादुरशाह ने 11 जून के फरमान में शहर के कोतवाल को हिदायत दी थी कि वो एलान कर दें कि दुकानदार अपनी-अपनी दुकानें खोल लें। उनकी सुरक्षा की पूरी व्यवस्था की जाए, चौकीदारों के द्वारा दिन-रात अवाम की खबरगीरी की जाए। बहादुरशाह के प्रयास और हुक्म के बावजूद शहर के हालात में कोई बेहतरी नहीं हुई। दुकानदार डरे-सहमे रहे। उन्होंने बादशाह से इसकी शिकायत की। बहादुरशाह ने 9 अगस्त 1857 को फौज के तीनों विभागों के अफसरों के नाम यह जारी करवाया कि अगर यही स्थिति रही तो शहर कैसे खुशहाल रह सकेगा, लोग भी तकलीफ उठाएंगे।
स्वतंत्रता सेनानियों ने अंगरेजों को दिल्ली से बाहर कर दिया था लेकिन वे दिल्ली से दूर भी नहीं थे। उनको यह आशा थी कि आने वाली बकरीद के अवसर पर वह दिल्ली के हिंदू-मुसलमानों के बीच गौकुशी की समस्या पर फूट डालने और शांति भंग कराने में सफल हो जाएंगे। बहादुरशाह ने हालात की नजाकत को समझते हुए जनरल बख्त खां को हुक्म दिया था कि गौकुशी पर पाबंदी का हुक्म जारी करें। बख्त खां ने 28 जुलाई से 31 जुलाई 1857 तक कई एलाननामे और हुक्मनामे जारी किए जिनमें गौकुशी, गाय की खरीदो-फरोख्त और उसके गोश्त को दिल्ली लाने पर पूर्ण पाबंदी के हुक्म थे। हुक्म की खिलाफवर्जी करने वालों को मौत की सजा तजबीज की गई थी। सख्त एहतिहयात और निगरानी के कारण बकरीद का त्योहार ठीक से गुजर गया। लेकिन अंगरेजों का खतरा बना रहा। उन्होंने दिल्ली के पास पहाड़ी पर अपनी फौजी चौकी कायम कर ली थी। बहादुरशाह जफर ने उस पहाड़ी पर कब्जा करने के लिए कई हुक्मनामे जारी किए थे। 10 दिसंबर 1857 के हुक्मनामे में फौज के अफसरों को लिखा था, 'हिंदू को गाय और मुसलमान को सूअर का लिहाज करके और दीन-धर्म को समझकर चलना चाहिए। मेरी मर्जी और जिंदगी तुमको मंजूर हो तो देखते ही देखते पलटनें और तोपखाना तैयार करके ऊपर कश्मीरी दरवाजे पर हाजिर होकर इन बदमाश अंगरेजों पर धावा बोलो। इसमें एक लम्हे का भी तामुल और तगाफुल (लापरवाही, देरी) न करो.... तुम इस तख्त की शर्म रखो और जो दीन और इमान पर आए हो तो इसका लिहाज करो।'
1857 के उर्दू एलाननामों का एक विशेष बिंदु यह भी है कि उनमें हिंदी शब्द लगातार प्रयोग में लाए गए हैं, जैसेशरीर, रीत, रांड, धर्मसती, पवित्र, देश, मानुस, मास, लुका-छिपा धावा और दाता इत्यादि। इससे यह नतीजा निकाला जा सकता है कि 1857 तक उर्दू-हिंदी जबान का कोई झगड़ा नहीं था लेकिन 1857 की पहली जंगे-आजादी ने अंगरेजों को चौंका जरूर दिया था। उन्होंने देखा कि किस तरह हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के धर्म की रक्षा के लिए एक हो गए थे और दुनिया की बड़ी शक्ति को अपनी बेमिसाल एकता से करारा जवाब दिया था। अंगरेजी राज के भविष्य की हिफाजत के लिहाज से उनके लिए हिंदू-मुसलिम एकता बहुत खतरनाक थी। इसलिए उसे तोड़ने के लिए उन्होंने मिलजुल कर प्रयास शुरू कर दिया।

उर्दू से अनुवाद : इंजहार अहम नदीम



बुधवार, 18 मई 2011

नयी सरकार की नयी चुनौतियां


     ममता बनर्जी के नेतृत्व में नई सरकार 20 मई को शपथ लेगी। वाम मोर्चे का इसबार के विधानसभा चुनाव में हारना कई मायनों में महत्वपूर्ण है। ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस गठबंधन की जीत का पहला संदेश है कि लोकतंत्र में अकल्पनीय शक्ति है। लोकतंत्र को पार्टीतंत्र के नाम पर बंदी बनाकर रखने की राजनीति पराजित हुई है।  पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने पिछले दिनों एक महत्वपूर्ण बात कही थी कि कम्युनिस्ट अपने पुराने सोच से बाहर नहीं निकलते तो उनको जनता खारिज कर देगी। यह भविष्यवाणी सही साबित हुई है। वाम मोर्चा और खासकर माकपा ने अपनी विचारधारा में युगानुरूप परिवर्तन नहीं  किया। पार्टी के अंदर लोकतंत्र की संगति में परिवर्तन नहीं किए । इसके कारण ही पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की अभूतपूर्व पराजय हुई है। वाम की पराजय पहला कारण है वाम मोर्चे और माकपा का सरकारी दल में रूपान्तरण। माकपा ने 1977 में सत्ता संभालने के बाद वाम मोर्चे ने भूमि सुधार आंदोलन के अलावा कोई भी बड़ा आंदोलन नहीं किया। खासकर अपनी सरकार के खिलाफ कोई संघर्ष नहीं किया। माकपा के नेतृत्व वाले जनसंगठनों की भूमिका जनप्रबंधक की होकर रह गयी। जनसंगठनों को जनप्रबंधन संगठन बनाकर उन्हें जनता को नियंत्रित और शासित करने के काम में लगा दिया गया। साथ ही राज्य सरकार की अनेक बड़ी कमियों और जनविरोधी नीतियों के प्रति आँखें बंद कर लीं । इसके कारण आम जनता के साथ वाम मोर्चे का अलगाव बढ़ता चला गया और उसने ही ममता बनर्जी को राजनीतिक हीरो बनाया है। ममता बनर्जी को मिला जन समर्थन सकारात्मक है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। वाम मोर्चे के जनता से अलगाव का दूसरा बड़ा कारण है मंत्रियों की निकम्मी फौज। वाम मोर्चे ने विगत 35 सालों में कभी खुलकर किसी भी मंत्री या मुख्यमंत्री के कामकाज की आलोचनात्मक समीक्षा प्रकाशित नहीं की। निकम्मेपन के कारण किसी भी मंत्री को पदमुक्त नहीं किया । इससे प्रशासनिक स्तर पर निकम्मेपन को बढ़ावा मिला। आम जनता की तकलीफें इससे बढ़ गयीं। पश्चिम बंगाल के इतिहास में पहलीबार हिंसारहित मतदान हुआ है। इक्का-दुक्का हिंसा की घटनाओं को छोड़कर शांतिपूर्ण और निर्भय होकर मतदान करने के कारण आम जनता की वास्तविक भावनाओं को हम सामने देख रहे हैं। वाम मोर्चा लाख दावे करता रहे लेकिन वो चुनावों को हिंसारहित नहीं बना पाया।
ममता बनर्जी की महत्ता को कभी वामनेता नहीं मानते थे। वे कभी ममता बनर्जी को सम्मान के साथ ममताजी कहकर नहीं बुलाते थे। इससे उनके अंदर छिपे असभ्यभावों को समझा जा सकता है। वाम मोर्चे ने ममता बनर्जी को नेता के रूप में सम्मानित करने की बजाय बार-बार अपमानित किया। इस तरह की घटनाएं विगत 12 सालों में आम रही हैं। यह वामदलों में सभ्यता के क्षय का संकेत है।  वामदल यह देख नहीं पाए हैं कि ममता बनर्जी ने अपनी संघर्षशील-जुझारू नेता की इमेज विकसित करके आम जनता में वाममोर्चे और खासकर माकपा के जनविरोधी कामों और आतंक के वातावरण को नष्ट करने का ऐतिहासिक काम किया है। ममता बनर्जी का राजनीतिक वर्गचरित्र कुछ भी हो लेकिन उसके जुझारू तेवरों ने माकपा के खिलाफ आम जनता को गोलबंद करने और गांधीवादी ढ़ंग से शांति से चुनाव जीतने का शानदार रिकार्ड बनाया है। ममता बनर्जी के प्रचार ने माकपा के 34 सालों के शासन को समग्रता में निशाना बनाया और खासकर उन बातों की तीखी आलोचना की जहां पर मानवाधिकारों का माकपा द्वारा हनन किया गया। पार्टीतंत्र बनाम लोकतंत्र में से चुनने पर जोर दिया।
   ममता बनर्जी की जीत में राज्य कर्मचारियों की बड़ी भूमिका रही है। वाम मोर्चे की मजदूर विरोधी कार्यप्रणाली और नीतिगत फैसलों से राज्य कर्मचारी लंबे समय से नाराज चल रहे हैं ,ममता को इसका राजनीतिक लाभ मिला है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले मोर्चे के मतों में वृद्धि हुई है। ममता बनर्जी के नेतृत्व में जो नई सरकार आ रही है उसके सामने तात्कालिक तौर पर निम्न कार्यभार हैं- 1. राज्य में राजनीतिक हिंसा की बजाय राजनीतिक भाईचारे का माहौल बनाया जाए। 2.राज्य कर्मचारियों को मंहगाई भत्ते की बकाया समस्त राशि का तत्काल भुगतान किया जाए। वेतन संबंधी अनियमितताएं खत्म की जाएं। कॉलेज और विश्वविद्यालय शिक्षकों की अवकाश प्राप्ति की उम्र को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की सिफारिशों के अनुसार 60 से बढ़ाकर 65 साल किया जाए। 3. जेल में बंद सभी राजनीतिक बंदियों की तुरंत रिहाई की जाए और राजनीतिक हिंसा और धौंसपट्टी के खिलाफ पुलिस सक्रियता बढ़ायी जाए। 4. मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों पर संवेदनशील ढ़ंग से प्रशासन काम करे। 5. राज्य में सूचना अधिकार कानून को पारदर्शिता और सख्ती के साथ लागू किया जाए। 6. भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए राज्य में लोकायुक्त का गठन किया जाए,जिससे विभिन्न भ्रष्टाचार के मामलों की सही ढ़ंग से प्रभावी जांच हो सके। विभिन्न स्तर पर खाली पड़े जजों और न्यायिक प्राधिकरणों के जजों के रिक्त पदों को तुरंत भरा जाए। 7. शिक्षा क्षेत्र में प्राथमिक स्तर से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक लोकतांत्रिक व्यवस्था के नाम पर चल रहे पार्टीतंत्र को तुरंत खत्म करके राज्य में व्यापक पारदर्शिता वाले 'राज्य शिक्षा पुनर्गठन आयोग' का निर्माण किया जाए ,अशोक मित्रा कमीशन की रिपोर्ट प्रकाशित की जाए। 'राज्य शिक्षा पुनर्गठन आयोग' बताए कि नई परिस्थितियों में क्या करें? नई प्रभावी संरचनाएं कैसे हों ? किस तरह के बुनियादी सुधारों की जरूरत है ? शिक्षा व्यवस्था के मौजूदा प्रबंधन को तत्काल खत्म करके नयी लोकतांत्रिक-पेशेवर-अनुभवसंपन्न प्रशासनिक प्रणाली लागू की जाए। राज्य में सक्रिय विभिन्न शिक्षा आयोगों और संस्थाओं के ढ़ांचे को तुरंत बदला जाए। 8.गांवों में पंचायतों के स्तर पर नरेगा आदि योजनाओं को बिना किसी भेदभाव के तुरंत लागू किया जाए। 9.राज्य अर्थव्यवस्था को सही मार्ग पर लाने के लिए कर वसूली के काम को गंभीरता से किया जाए और आर्थिक कुप्रबंधन पर एक श्वेतपत्र जारी किया जाए।










अम्मा का मंगलसूत्र- डा.सुधा सिंह



अन्नाद्रमुक पार्टी की नेत्री और तमिलनाडु में चौथी बार चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बनी जयललिता ने शपथग्रहण के तुरंत बाद ही अपने कई चुनावी वादे पूरे किए। जयललिता ने अपने चुनावी घोषणापत्र में कहा था कि वे चुनाव जीतीं तो शादी करनेवाली लड़कियों को चार ग्राम का मंगलसूत्र देंगी। अब जयललिता चुनाव जीत चुकी हैं और उन्होंने अपना यह वायदा भी पूरा कर दिया है। शादी करनेवाली लड़कियों को चार ग्राम सोने का मंगलसूत्र सरकार की ओर से दिया जाएगा।


वायदे उन्होंने और भी किए थे पर पहले पूरा होनेवाले वायदों में से एक वायदा यह भी है। इससे समझा जा सकता है कि मुख्यमंत्री अपने इस वायदे को लेकर गंभीर थीं। जिन सात वायदों को तुरंत पूरा किया गया है उनमें स्त्रयों से जुड़े दो वायदे हैं – एक तो यह कि शादी करनेवाली लड़कियों को जयललिता सरकार चार ग्राम सोना देगी और महिला सरकारी कर्मचारियों का मातृत्व अवकाश तीन महिने के बजाए छः महीने मिला करेगा। दोनों वायदों में दो तरह के तबके की महिलाओं की जरूरतों का ध्यान रखा गया है- घरेलू और कामकाजी। महिलाओं को मातृत्व अवकाश ज़्यादा समय का मिले- ये तमाम भारतीय और विश्व महिला संगठनों की पुरानी मांग है। निश्चित ही इस दिशा में सुधारमूलक क़दम उठाकर जयललिता सरकार ने प्रशंसनीय कार्य किया है। लेकिन इस दिशा में अभी और बहुत कुछ किया जाना बाकि है। मातृत्व के दौरान स्त्री तमाम भावनात्मक और शारीरिक बदलावों से गुजरती है। मातृत्व तो एक पूरा प्रकल्प है पर गर्भधारण की अवधि भी काफी लंबी होती है। इस लिहाज से छः महीने का अवकाश बहुत नहीं है। शिशु के थोड़ा बड़े होने और स्त्री को अपना स्वास्थ्य पुनः प्राप्त करने के लिए यह समय कम शहरों के एकल परिवार की नौकरीपेशा स्त्री के पास अबोध शिशु को ‘क्रेच’ जैसी जगहों पर जो आज भी हिंदुस्तान में ज़्यादातर अकुशल और गैर-पेशेवराना लोगों द्वारा चलाया जा रहा है , छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। है। साथ ही अपने पेशे में कुशलता को बनाए रखने के लिए स्त्री को अतिरिक्त परिश्रम करना होता है। इस समय की भरपाई भी किसी न किसी रूप में ‘इंसेंटिव’ देकर किया जाना चाहिए। यह अपनेआप में शोध का दिलचस्प विषय हो सकता है कि भारत के विभिन्न राज्यों में मातृत्व अवकाश का प्रावधान क्या है ? 

जयललिता की दूसरी घोषणा है कि उनकी सरकार विवाह करनेवाली लड़कियों को चार ग्राम सोने का मंगलसूत्र देगी। यह बड़ी लुभावनी घोषणा है। हिंदुस्तान में गहने और उसमें भी सोने के गहने के प्रति स्त्री ही नहीं पुरुषों की भी आसक्ति है। गहना एक अच्छा निवेश भी है इससे इंकार नहीं। पर किसी सरकार द्वारा विवाह करनेवाली कन्याओं के लिए चार ग्राम के मंगलसूत्र की घोषणा अत्यंत लुभावनी है। सरकारें कई तरह के जनकल्याण और सामाजिक कार्य करती रहीं हैं। कई राजनीतिक पार्टियां और सामाजिक संस्थाएं सामूहिक विवाह का आयोजन करती हैं और उनमें वर-वधू को कुछ उपहार भी देती हैं। एक समय में अंतर्जातीय विवाह को बढ़ावा देने के लिए कुछ धन या वस्तु देने की घोषणा कुछ सरकारों ने की थी। पर जयललिता की यह घोषणा उन घोषणाओं से भिन्न है। इसके साथ कोई सुधारवादी या प्रगतिशील नजरिया नहीं दिखता बल्कि विवाह संस्था की पुरानी तस्वीर को ही वैधता मिलती है। चार ग्राम के मंगलसूत्र की जरूरत उन लड़कियों को होगी जो ग़रीब परिवारों से हैं। ये लड़कियां मंगलसूत्र का क्या करेंगी- परंपरित चलन के अनुसार गले में पहनेंगी और यदि आर्थिक मदद का नुक़्ता शामिल कर लें तो यह भी सोच सकते हैं कि वक्त-जरूरत यह एक संपत्ति के रूप में उनकी मदद करेगा। लेकिन हिंदू परंपरा के अनुसार यह सुहाग की निशानी है और सुहागिन स्त्री इसे अपने से अलग नहीं करती। ऐसे में जयललिता सरकार ने संपत्ति के रूप में मंगलसूत्र दी होगी, यह बात औचित्यपूर्ण नहीं लगती। यह निर्विवाद रूप से एक गहना है और सुहाग की निशानी होने का सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्य भी इससे जुड़ा है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जयललिता सरकार गहने का यह तोहफा सन् 2011 में भारत की स्त्रियों को दे रही है। हमारे देश में एक जननायक गांधीजी हुए थे। उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन के दौरान विभिन्न कामों के लिए धन इकट्ठा करने का अद्भुत तरीका निकाला था। वे जहां भी भाषण या सभा-सम्मेलन के लिए जाते, चंदा मांगते थे। स्त्रियों से वे विशेष तौर पर उनके गहनों का दान मांगा करते थे। यहां तक कि उन्होंने अपने हस्ताक्षर का मूल्य संपन्न परिवार की स्त्रियों के लिए एक हाथ की सोने की चूड़ी रखी थी। गांधीजी जानते थे कि स्त्रियों को अपने गहनों से बहुत मोह होता है। यह आम स्त्री मनोविज्ञान है। ध्यान रखना चाहिए कि इसी आम स्त्री मनोविज्ञान को ही भुनाते हुए जयललिता ने मंगलसूत्र देने की घोषणा की है और इसी आम स्त्री मनोविज्ञान का संज्ञान लेते हुए गांधीजी ने स्त्रियों के गहना प्रेम को लक्ष्य बनाया था और चाहा था कि स्त्रियां अपने गहनों का मोह त्याग दें। एक कुशल जननेता की तरह गांधीजी ने एक समयसीमा रखी थी कि जब तक भारत परतंत्र है भारत की स्त्रियां गहना न पहनें। पर ये प्रतीकात्मक था। इस गहना दान को ग्रहण करने की गांधीजी ने जो शर्त रखी थी वो ध्यान देने लायक और सीखने लायक है। गांधीजी स्त्रियों को विशेषकर बालिकाओं और किशोरियों को उकसाते थे कि वे अपने गहनों का दान करें। भावी पीढ़ी पर उनकी नज़र थी। लेकिन इस दान को स्वीकार करने के पहले कुछ नियम थे उनमें से पहला नियम यह था कि जो स्त्री अविवाहित है वो अपने पिता और विशेषकर माता से गहना दान करने की अनुमति लेगी, वो दोबारा उसी तरह का गहना बनवा देने का आग्रह नहीं करेगी, संभव हो तो आजीवन गहना न पहनने का व्रत लेगी। गांधीजी जानते थे हिंदुस्तानी समाज में गहना एक रोग है और यह न केवल स्त्री को बल्कि पुरुष को भी ग्रसे हुए है। इस कारण गहना दान करनेवाली और आजीवन गहना न पहनने का व्रत लेने वाली लड़की के लिए लड़का मिलना कठिन होगा। इसलिए लड़की को यह भी वचन देना पड़ता था कि वो ऐसे ही लड़के से विवाह करेगी जो उसे फिर से गहना पहनने के लिए बाध्य नहीं करेगा। स्वयं गांधीजी ऐसी व्रती लड़कियों के लिए लड़का ढूंढ़ने का आश्वासन माता-पिता को देते थे। गाधीजी के द्वारा इस काम में सहयोग के कई उदाहरण हैं। 

गांधीजी ने स्त्रियों में आभूषण विमुखता की प्रक्रिया को एक नाम दिया था-‘आभूषण-सन्यास’। इस आभूषण–सन्यास के लिए स्त्रियों को उत्प्रेरित करने के पीछे गांधीजी के तर्क बहुत ठोस थे। उनका मानना था कि गहना मनुष्य की स्वाभाविकता को नष्ट करता है। उसके व्यक्तित्व को कृत्रिम बनाता है। गांधीजी का कहना था- ‘मैं जानता हूं कि लड़कियों के लिए यह त्याग कितना कठिन है। हमारे समाज में आज अनेक प्रकार के फैशन देखने में आते हैं, पर मैं तो उसी को सुंदर कहता हूं, जो सुंदर काम करते हैं।’ गांधीजी स्त्री का गहना उसके संस्कार और कर्म को मानते थे। गांधीजी की विचारधारा से प्रभावित होकर प्रसिद्ध उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद ने ‘गबन’ नाम का एक महत्वपूर्ण उपन्यास ही लिख डाला था। इस उपन्यास में नायिका जालपा का आभूषण प्रेम और नायक रमानाथ का गहनों के लिए गबन और अंत में नायिका का कर्ममय व्यक्तित्वान्तरण होता है। इस उपन्यास की उपलब्ध आलोचनाओं में स्त्री के आभूषण प्रेम का समस्यावादी पाठ बनाया गया है पर मेरी जानकारी में अब तक इसकी आलोचना गांधीवादी विचारधारा के इस पक्ष से नहीं की गई है। 
ऐसे में सन् 2011 की भारतीय स्त्रियां चाहे वे गांव की हों या शहर की , के लिए अगर ‘अम्मा’ के नाम से मशहूर महिला नेत्री जयललिता उनके व्यक्तित्व के विकास और आर्थिक मदद के लिए कोई और लुभावना तोहफा देती तो क्या ज़्यादा मुफीद नहीं होता ! पर तोहफा तो तोहफा होता है, लेनेवाले से ज़्यादा इसमें देनेवाले की मरजी होती है। लेकिन भारत की स्त्रियों जिसका एक हिस्सा तमिलनाडु की स्त्रियां हैं को ये तोहफा क़बूल करते हुए इसके अन्य पक्षों का भी ध्यान रखना चाहिए। यह जनता के पैसे का ही जनता को तोहफा है जिसमें घरेलू से लेकर काम-काजी स्त्री का भी श्रम लगा हुआ है। क्या जनता को हक़ नहीं कि पूछे कि इससे बेहतर भी कुछ हो सकता था या नहीं ! क्यों स्त्री के मामले में लुभावनी लेकिन ख़तरनाक परंपराओं को ही पोषणा चाहते हैं, शायद स्त्रियां नहीं बोलतीं, उनके प्रतिनिधि संगठन नक्कू बनने का ख़तरा नहीं उठाते इसीलिए न! 
(नई रोशनी ब्लॉग से साभार)
                                                                                               

मंगलवार, 17 मई 2011

बुद्ध जयंती पर विशेष- धर्म की नई भूमिका की तलाश


     बौद्ध धर्म के बारे में अनेक मिथ हैं  इनमें एक मिथ है कि यह शांति का धर्म है।गरीबों का धर्म है। इसमें समानता है। सच इन बातों की पुष्टि नहीं करता। आधुनिककाल में श्रीलंका में जातीय हिसा का जिस तरह बर्बर रूप हमें तमिल और सिंहलियों के बीच में देखने को मिला है। चीन, बर्मा,कम्बोडिया आदि देशों में जो हिंसाचार देखने में आया है उससे यह बात पुष्ट नहीं होती कि बौद्ध धर्म शांति का धर्म है। बौद्ध धर्म के प्रति आज (अन्य धर्मों के प्रति भी) सारी दुनिया में इजारेदार पूंजीपतियों और अमीरों में जबरदस्त अपील है। इसका प्रधान कारण है बौद्ध धर्म में आरंभ से ही अमीरों की प्रभावशाली उपस्थिति। एच.ओल्डेनबर्ग ने "बुद्धः हिज लाइफ ,हिज टीचिंग्स,हिज आर्डर" ( 1927) में लिखा है कि बुद्ध को घेरे रखने वाले वास्तविक लोगों और प्रारंभिक धर्माचार्यों में जो लोग थे उन्हें देखने से प्रतीत होता है कि समानता के सिद्धान्त का पालन नहीं होता था।प्राचीन बुद्ध धर्म में कुलीन व्यक्तियों के प्रति विशेष झुकाव बना हुआ प्रतीत होता है जो अतीत की देन था।
धर्म का प्रचार करने वाले विश्व के प्रथम प्रचारक तापस और भल्लिक व्यापारी वर्ग से थे। बनारस में उपदेश देने के बाद बुद्ध में आस्था रखने वालों की संख्या में इजाफा हुआ। बाद में संघ में आने वाला दूसरा व्यक्ति यसं था। जो बनारस के सम्पन्न परिवार का सदस्य था। उसके माता-पिता, बहिन आदि भी बौद्ध धर्म में आ गए। इसी यस के बहुत से मित्र व्यवसायी और परिचित,पड़ोसी आदि भी शामिल हुए।ओल्डनहर्ग ने विस्तार के साथ उन तमाम लोगों की जानकारी दी है जो सम्पन्न परिवारों से आते थे या राजा थे। इनमें मगध नरेश बिंबसार का नाम प्रमुख है।

महात्मा बुद्ध ने धर्म और धार्मिकपंथों में व्याप्त जातिभेद को चुनौती देते हुए अपने पंथ का मार्ग निचली या अन्त्यज जातियों के लिए खोला था। इससे इन जातियों में जबर्दस्त आकर्षण पैदा हुआ। बुद्ध के संघ के महत्वपूर्ण व्यक्तियों में से एक था उपालि जो संघ के नियमों के अनुसार गौतम के पश्चात प्रमुख पद पर आसीन हुए था। वह पहले नाई था। उसके व्यवसाय को घृणित व्यवसायों में गिना जाता था। इसी प्रकार सुनीत भी एक नीची जनजाति 'पुक्कुस' से आया था ,जबकि वह उन बंधुओं की श्रेणी में था ,जिनकी रचना,थेरगाथा में सम्मिलित करने के लिए चुनी गई थीं। जबरदस्त नास्तिकता का प्रचारक सती नामक व्यक्ति धीवर जाति का था। नंद ग्वाला था। दो पंथक, एक कुलीन परिवार की अविवाहित कन्या के किसी दास के साथ यौन संबंधों की देन था। चापा नामक लड़की एक शिकारी की पुत्री थी। पुन्ना और पुन्निका दास पुत्रियां थीं। सुमंगलमाता सनीठे के वनों में काम करने वाले लोगों की पुत्री और पत्नी थी। सुभा एक लौहार की बेटी थी। इस तरह के असंख्य उदाहरण भरे पड़े हैं। यही कारण है महात्मा बुद्ध ने बड़े पैमाने पर अंत्यजों-वंचितों और अछूतों को अपनी ओर खींचा और उन्हें सामाजिक अलगाव और वंचना से मुक्ति दी। हिन्दू धर्म ऐसा करने में असफल रहा। 
   बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर ने ''बुद्ध और उसके धर्म की भवितव्यता" शीर्षक से एक लेख लिखा है । यह लेख महाबोधि संस्था के मासिक में 1950 में प्रकाशित हुआ था। इसमें उन्होंने संक्षेप में अपने नजरिए से बौद्ध धर्म के विचारों को व्यक्त किया है। उन्होंने लिखा- (1) समाज की स्थिरता के लिए कानून या नीति का आधार अवश्यंभावी है। इनमें किसी भी एक के अभाव में समाज निश्चय ही तितर-बितर हो जाएगा। अगर धर्म का अस्तित्व चलते रहना है तो उसका बुद्धि प्रामाण्यवादी होना आवश्यक है। विज्ञान बुद्धि प्रामाण्यवाद का दूसरा नाम है। (3) धर्म के लिए यह काफी नहीं है कि वह केवल नैतिक संहिता बने। धर्म की नैतिक संहिता को स्वतंत्रता ,समता,बंधुता -इन मबलभूत तत्वों को स्वीकृति देनी चाहिए। (4) धर्म के कारण दरिद्रता को पवित्र न मानें और उसे उदात्त रूप भी न दें।  

बुधवार, 11 मई 2011

बांग्ला चैनलों में प्रतिगामी राजनीति का अंत


   बांग्ला चैनलों के आने बाद से पश्चिम बंगाल का राजनीतिक वातावरण बुनियादी तौर पर बदला है। बांग्ला चैनलों ने नए सिरे से राजनीतिक ध्रुवीकरण किया है। नव्य उदार आर्थिक नीतियों और पूंजीवाद विरोधी वातावरण को तोड़ा है। यह प्रक्रिया 2006 में आरंभ हुई थी। इस समय तारा न्यूज,महुआ खबर,स्टार आनंद,24 घंटा,न्यूज टाइम,कोलकाता टीवी, आर न्यूज , आकाश आदि आधे दर्जन से ज्यादा समाचार चैनल हैं जिनसे अहर्निश खबरों का प्रसारण होता है। इनमें '24 घंटा' और 'आकाश' चैनल की 'वामचैनल' हैं।माकपा के प्रति इनकी सहानुभूति है। अन्य चैनलों का किसी दलविशेष से संबंध नहीं है। इन्हें 'अ-वाम चैनल' कहना समीचीन होगा। इन चैनलों की राजनीतिक खबरों का फ्लो वामविरोध पर आधारित है। वामविरोधी समाचार फ्लो बनाए रखने के नाम पर वाम उत्पीड़न पर इन चैनलों ने व्यापक कवरेज दिया है।  अन्य विषयों को मुश्किल से 5 फीसदी समय दिया है।
    'अ-वाम चैनलों' की प्रस्तुतियों ने स्टीरियोटाइप वक्ता और रूढ़िबद्ध तर्कों के आधार पर वाम राजनीति के बारे में नए आख्यान को जन्म दिया है। इससे वामविरोधी राजनीतिक दलों की इमेज चमकी है। इससे वामविरोधी समूहों को एकताबद्ध करने में मदद मिली और नव्यउदार राजनीति के प्रति आकर्षण हुआ है। साथ ही माकपा की वैचारिक घेराबंदी टूटी है। मसलन् एक जमाने में वामदलों ने नव्य आर्थिक उदारवाद के खिलाफ जमकर प्रचार अभियान चलाया था लेकिन विगत पांच सालों में चैनल संस्कृति का असर है कि वामदलों ने नव्य उदारतावाद के खिलाफ अपना राजनीतिक प्रतिवाद धीमा किया है। साथ ही नव्य उदार संस्कृति के विभिन्न रूपों को धीमी गति से राज्य में पैर फैलाने में मदद की है। आज टीवी संस्कृति के दबाव के कारण वाम और गैर-वाम दोनों ही धड़े नव्य उदार संस्कृति के प्रभावमंडल में चमक रहे हैं।
   टेलीविजन में अंतर्वस्तु महत्वपूर्ण नहीं होती 'फ्लो' महत्वपूर्ण होता। वामचैनलों 'चौबीस घंटा" और "आकाश" ने  अधिनायकवादी मॉडल को आधार बनाकर इसबार विधानसभा का चुनाव कवरेज दिया है। इन चैनलों की समस्त कार्यप्रणाली और अंतर्वस्तु को माकपा के मीडिया बॉस ऊपर से नियंत्रित करते हैं।  संवाददाताओं की रिपोर्ट में किसी भी किस्म का पेशेवर भाव नहीं होता। वे बड़े उग्र भाव से पार्टी सदस्य की तरह डिस्पैच भेजते हैं।  संवाददाता जब पार्टी का भोंपू बन जाता है तो सत्य की हत्या कर बैठता है। यह बीमारी किसी भी दल में पैदा हो सकती है। 'वाम चैनल' मानकर चल रहे हैं जनता अनुगामी है और उसे जो बताया जाएगा वह उस पर विश्वास करेगी। यह मॉडल आम दर्शकों में साख नहीं बना पाता क्योंकि दर्शक अन्य चैनलों  का कवरेज भी देखते हैं। वाम चैनलों की आक्रामक प्रस्तुतियों में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों पर जोर कम है और वामदलों की नीतियों पर जोर ज्यादा रहा है। इस तरह का प्रसारण दर्शक को लोकतंत्र से बांधने की बजाय विचारधारा से बांधता है। फलतः वामचैनल तटस्थ दर्शकों को आकर्षित नहीं कर पाते। इसबार वामचैनलों ने ममता बनर्जी की रेल मंत्रालय की गतिविधियों को निशाना बनाया था। मजेदार बात यह है रेल मंत्रालय का राज्य विधानसभा चुनाव से कोई संबंध नहीं है। इस प्रौपेगैण्डा मॉडल की स्थिति यह है कि इसमें सत्य अनुपस्थित नहीं रहता अपितु भिन्न किस्म का सत्य रहता है। इसमें अर्द्ध सत्य,सीमित सत्य और संदर्भ के बाहर का सत्य भी शामिल है। रेल मंत्रालय का सत्य पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाहर का सत्य है।यह राज्य का सत्य नहीं है। माकपा नियंत्रित चैनलों ने माकपा समर्थक बुद्धिजीवियों और शिक्षितों को सबसे ज्यादा असुरक्षित किया है। ये लोग इकतरफा प्रचार अभियान से सबसे ज्यादा परेशान हैं और अपने को असुरक्षित महसूस करते हैं। वाम चैनलों ने वाम की पूर्वनिर्मित इमेज,धारणाओं और एटीट्यूट को प्रचारित किया। वाम की पहले से जो राय रही है उसका ही प्रचार करता है। सिर्फ गौतमदेव के भाषणों में वाम की पूर्व निर्धारित नीतियों का विकल्प तेजी से सामने आया। माकपा नियंत्रित प्रचार अभियान लोकतंत्र को आधार नहीं बनाता बल्कि पार्टी और उसकी नीतियों को आधार बनाता है। इस तरह के प्रचार का लक्ष्य है पार्टी के पीछे आम लोगों को गोलबंद करना। इस प्रचार का सामान्य लोकतांत्रिक प्रचार मॉहल के साथ तीखा अंतर्विरोध है।इसके विपरीत  'अ-वाम चैनलों' के समूचे समाचार फ्लो और टॉकशो फ्लो ने तटस्थ सूचनाओं और गैर वाम विकल्पों को व्यापक कवरेज दिया है। इस क्रम में विभिन्न रूपों में लोकतंत्र को बुनियादी आधार के रूप में प्रचारित किया।  'अ-वाम चैनलों' ने सत्ता और जनता के बीच में व्याप्त असमानता और वैषम्यपूर्ण संबंधों को उजागर किया । सत्ता में जनता के प्रति उपेक्षा, अलगाव और संवेदनहीनता से जुड़ी खबरों को तत्परता के साथ उजागर किया है। सत्ता के अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने की भावना पैदा करके आंदोलनों में जनता की शिरकत को बढ़ाया है। जनता की आंदोलनों में शिरकत बढ़ाना मीडिया की लोकतांत्रिक भूमिका है। इन चैनलों से जो खबरें आयी हैं उनमें कम से कम झूठी खबरें अभी तक दिखाई नहीं दी हैं। ऐसी खबर नहीं दिखाई गयी जो घटना घटी ही न हो। 'अ-वाम चैनलों'  ने उन समस्याओं,घटनाओं ,राजनीतिक विकल्पों को सामने रखा जिनकी राज्य प्रशासन और वामचैनलों ने उपेक्षा की या दबाया।  'अ-वाम चैनल' उस वातावरण को नष्ट करने में सफल हुए हैं जिसे वामदलों ने भय और असुरक्षा के आधार पर निर्मित किया था। निर्भीक होकर बोलने की आजादी का विस्तार किया है। बंद दिमागों को खोला है। यह संदेश भी दिया है कि मुक्त दिमाग के खिलाफ पार्टीतंत्र का बौना है। इस तरह की प्रस्तुतियां स्वैच्छिक और विकेन्द्रित हैं। इसके विपरीत 'वाम चैनलों' में आत्म-नियमन और आत्म-सेंसरशिप हावी रही है। इन चैनलों ने एक ओर समाचारों को नियंत्रित करने की कोशिश की वहीं दूसरी ओर खबरों को नियंत्रित किया। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य  ने वाम चैनलों के अलावा अन्य चैनलों को एकदम समय नहीं दिया।यह स्वयं में अलोकतांत्रिक है। दूसरी ओर ममता बनर्जी का वामचैनलों ने इंटरव्यू नहीं लिया। राज्य के दो बड़े नेताओं का यह भावबोध भविष्य में टीवी और इन दो नेताओं के बीच में टकराव के बने रहने का संकेत है।  
      

सोमवार, 9 मई 2011

साहित्य का मायाजाल और यथार्थ


     साहित्य इन्द्रधनुषी मायाजाल है। इसमें फंसा व्यक्ति हमेशा ख्बाबों की दुनिया में रहता है। ख्बाबों में खोए रहना,इच्छित यथार्थ की कामना के लिए के लिए लिखना और फिर उसे ही सच मान लेना। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो लेखक में निजी और समाज ,अवधारणाओं और आंदोलनों के बारे में विभ्रम की सृष्टि करती है। जो लेखक इस तिलिस्म को जानते हैं वे विभ्रम में नहीं रहते। यही वजह है लेखक के जीवन में कष्ट होते हैं लेकिन रचना में सुख रहता है। पाठक को साहित्य सुख देता है लेकिन लेखक को दुख देता है। साहित्य सृजन से लेखक के लिए दुख और समाज के लिए सुख मिलता है। साहित्य के मायाजाल की धुरी है लेखक का विचारधारा और अवधारणाओं के सम्मोहन में बंधा रहना।  
साहित्य में जब भी किसी अवधारणा का प्रयोग आरंभ होता है तो एक अवधि के बाद वह रूढ़ि बन जाती है। लेखक इससे जल्द मुक्त नहीं हो पाता। सवाल यह है साहित्यकार नई अवधारणा को जल्द ही रूढ़ि क्यों बना देता है ? फिर उसके विभ्रम में लंबे समय तक क्यों फंसा रहता है ? असल में अवधारणा और यथार्थ की सटीक समझ के अभाव में वह अवधारणा के विभ्रम में फंसा रहता है। इसके कारण वह खास विषय,शैली,भाषा और साहित्यिक व्यवहार का प्रयोग करता है। साहित्यिक रूढ़ियां साहित्यिक एकता का निर्माण करती हैं। रूढ़ियां ,पर्शुएसन का काम करती हैं। इसलिए लेखक इनसे बंधा रहता है। ये औद्योगिक समाज को जोड़ने में सीमेंट का काम करती हैं। रूढ़ियों के प्रयोग में जोखिम नहीं होता। साहित्य और समाज दोनों खतरों से मुक्त रहते हैं। साहित्य जब रूढ़ियों का आदी हो जाता है तो शासकों की सेवा करने लगता है,चाहे उसकी अंतर्वस्तु कुछ भी हो।नई अवधारणाएं नई भौतिक परिस्थितियों के कारण जन्म लेती हैं। वे लेखक के दिमागी फितूर की देन नहीं होतीं। हिन्दी लेखक में नए को पाने की ललक है लेकिन पुराने को छोड़ने आदत नहीं है। इसके कारण हिन्दी में खारिज हो चुकी पुरानी रूढ़ियों, स्टीरियोटाइप, अवधारणाओं और मान्यताओं का अम्बार लगा है। बार-बार इसी पुराने ढ़ेर से साहित्य का उत्पादन और पुनरूत्पादन हो रहा है। इसके कारण बार बार लेखक अपनी पैकेजिंग बदल रहे हैं। अंतर्वस्तु और यथार्थ नहीं बदल रहे। वे परिवर्तित यथार्थ को पकड़ने और समझने का प्रयास नहीं करते। यही साहित्य का मायाजाल है। मायाजाल में फंसा लेखक छद्म में जीने लगता है। हिन्दी में बहुत लेखक हैं जो आए दिन साहित्य और जीवन में छद्म को जीते हैं और उसकी किसी न किसी रूप में हिमायत भी करते हैं। छद्म की हिमायत मूलतः पूंजीवाद की हिमायत है। जो वास्तव अर्थ में परिवर्तनकामी साहित्यकार-संस्कृतकर्मी हैं। वे जब तक छद्म के खिलाफ खड़े नहीं होते सचमुच में परिवर्तन नहीं कर सकते। किसी नेता,दल और विचारधारा की हिमायत में परिवर्तन का जयगान करना एक हद तक प्रचार में मदद करता है लेकिन ऐसी स्थिति का बहुत जल्दी अंत हो जाता है। जिस लेखक के पास सामाजिक परिवर्तन का विज़न है वह सच और छद्म दोनों के प्रति सचेत होता है। मसलन् यदि कोई लेखक क्रांति या बुर्जुआजी पर फिदा है । उसके दल और विचारधारा का प्रचारक है तो उसे इनके छद्म रूपों के प्रति भी सतर्क होना चाहिए। साहित्य के लिए सत्य के उदघाटन से ज्यादा महत्वपूर्ण छद्म का उदघाटन करना है। छद्म की आड़ में अनेक प्रतिगामी रूप और अंतर्वस्तु सक्रिय रहती हैं। इसी प्रसंग में बाबा नागार्जुन याद आ रहे हैं ,वे प्रगतिशील थे। सामाजिक परिवर्तन के हिमायती थे। क्रांति और कांतिकारी ताकतों के हिमायती थे,लेकिन क्रांति की आड़ में चल रहे छद्म के प्रति भी सचेत थे। उन्होंने लिखा-  "क्रान्ति तुम्हारी तुम्हें मुबारक /भ्रान्ति तुम्हारी तुम्हें मुबारक/कूट-कपट की भीतरघाती/शान्ति तुम्हें मुबारक/" बाबा ने कम्युनिस्टों में अंधभक्ति देखी तो लिखा- "तुम्हें चाहिए अंधअनुगमन/ तुम्हें चाहिए ठकुरसुहाती/अनुजों तक के स्वाभिमान से/अब तो तुमको हिचकी आती।" सत्तामद ने कम्युनिस्टों को मदमत्त राजनीतिज्ञों में तब्दील कर दिया था और एक बड़ा हिस्सा आए  दिन नेताओं के भाषणों और लेखों के उद्धरणों का गीता की तरह पाठ किया करता था। इस पर लिखा- "क्रांन्ति जवाबी तुम्हें मुबारक/अक्ल नवाबी तुम्हें मुबारक/मार्क्स और लेनिन-स्तालिन के/ताला-चाबी तुम्हें मुबारक ।"
    पश्चिम बंगाल में 1972-77 के बीच असामान्य हालात थे और उन समय के हालातों पर बाबा ने जो लिखा वो लोकतंत्र के छद्म आवरण को खोलने में हमारी मदद कर सकता है। उससे हम पश्चिम बंगाल में खासकर राजनीति में घुस आयी अपराधी संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को आसानी से समझ सकते हैं। उस समय लोकतंत्र के क्षय पर बाबा ने एक शानदार बड़ी कविता लिखी थी,शीर्षक है- "देवी ,तुम तो काले धन की बैसाखी पर टिकी हुई हो।" यह कविता आज भी प्रासंगिक है। यह कविता लोकतंत्र पर मोहित लोगों में इंजेक्शन का काम करती है और बुर्जुआ लोकतंत्र की बजाय आलोचनात्मक लोकतंत्र की तलाश की ओर प्रेरित करती है। बुर्जुआ लोकतंत्र में नेताओं पर भ्रष्टाचार और काले धन के उपयोग के आए दिन आरोप लगते रहे हैं। साथ ही कालेधन की लोकतंत्र और नेताओं के व्यक्तित्व के निर्माण में जो भूमिका है उस ओर भी बाबा ने ध्यान खींचा है। बाबा ने देवि के रूपक के बहाने असल में बुर्जुआनेता के वर्गीय चरित्र को गहराई में जाकर उदघाटित किया है। बाबा नागार्जुन ने लिखा है-  "जन-मन भरम रहा है नकली/मत-पत्रों की मृग-माय़ा में/विचर रही तू महाकाल के/काले पंखों की छाया में/सौ कंसों की खीझ भरी है/इस सुरसा के दिल के अंदर/ कंधों पर बैठे हैं इस के/धन-पिशाच के मस्त-कलंदर/गोली-गोले,पुलिस -मिलिटरी/ इर्द-गिर्द हैं घेरे चलते/इसकी छलिया मुस्कानों पर/धन-कुबेर के दीपक जलते।" आम राजनीति में साधारण जनता की ज्वलंत समस्याओं की बजाय गैर जरूरी मसलों पर जमकर भाषण होते रहते हैं,इसी फिनोमिना को ध्यान में ऱखकर नागार्जुन ने लिखा- "मँहगाई का तुझे पता क्या ! जाने क्या तू पीर पराई !इर्द-गिर्द बस तीस-हजारी/ साहबान की मुस्की छाई !तुझ को बहुत-बहुत खलता है/'अपनी जनता ' का पिछड़ापन/ महामूल्य रेशम में लिपटी/यों ही करतीं जीवन-यापन/ठगों-उचक्कों की मलकाइन/प्रजातंत्र की ओ हत्यारी/अबके हमको पता चल गया/है तू किन वर्गों की प्यारी।" छद्म को लोकतंत्र का दादागुरू कहते हैं। इसका पूरे समाज पर गहरा असर है। साहित्य में वे लेखक या रचनाएं कालजयी हैं जो छद्म अवधारणा के विभ्रम को तोड़ती हैं।  हिन्दी में प्रगतिशील-जनवादी-समाजवादी-क्रांतिकारी-आधुनिकतावादी और उत्तर आधुनिकतावादी अंततः ढर्रे या रूढ़ि में बदल गए हैं। इनमें रूढ़िबद्धता से निकलने की छटपटाहट नहीं दिखती। यह सच है नई अवधारणा नए यथार्थ के साथ जन्म लेती है। नए विज़न को जन्म देती है। जड़ रूपों को तोड़ती है लेकिन इसके लिए लेखक में यथार्थ के परिवर्तित रूपों को सही परिप्रेक्ष्य और साहस के साथ देखने की दृष्टि होनी चाहिए। रघुवीर सहाय ने लिखा है- "कविता शब्द का निरा आडम्बर नहीं है। न वह वर्तमान की निरी व्याख्या है, न इतिहास का निरा पुनरावलोकन और न अतीत से भविष्य के निरे अंतरावलंबन का औचित्य। इन सबके समेत वह कुछ है तो साहस है जो हमारे जाने बिना दूसरे को मिलता है बशर्ते कि वह दूसरा हमारी कविता में हो।"हिन्दी में जिन लेखकों ने साहित्य को क्रांति के हवाले किया। राजनीतिक विषयों पर लिखा उसमें वास्तविकता से पलायन का भाव भी था। इसके प्रति आगाह करते हुए रघुवीर सहाय ने दो खतरों की ओर ध्यान खींचा है- "कवि कहीं क्रांति का पुजारी और मसीहा एक साथ बनकर दिखाने में अपने कर्त्तव्य से भागने का रास्ता न निकालने लगे,या कहीं आत्मदया के आत्मपीड़क भाव में लिप्त होकर लोगों से वैसी सहानुभूति न माँगने लगे जो न केवल लोगों की रागात्मक शक्ति का शोषण करेगी बल्कि उन्हें स्वयं अपनी वेदना पहचानने में भटकाएगी।जिस एक खतरे में ये दोनों हैं वह अहंवाद का ही खतरा है। अहंवाद को पहले के आलोचकों ने शायद पूरी तरह नहीं पहचाना था। जिस कवि को उन्होंने अपने बारे में कुछ भी ऐसा कहते पाया जो सतही तौर पर दूसरों के बारे में न हो ,उसे अहंवादी कहकर दुत्कार दिया। वास्तव में अहं खुलेआम जनसाधारण के बारे में लिखने का अहंकार करनेवाले कवियों में भी हो सकता है,यह आज ही प्रकट होकर दिख रहा है।जैसे राजनीति में वैसे ही कविता में भी जन के साथ कानूनी रिश्ते तो बने हुए हैं ,लेकिन एक इंसानी रिश्ता नहीं रह गया है। इससे कवि भी राजनीतिज्ञों की तरह आत्मरहित बनता जा रहा है।" 
    मासकल्चर और मासमीडिया के व्यापक प्रचार-प्रसार ने साहित्य से लेकर जीवन तक छद्म की सत्ता को विस्तार दिया है। उसे वैध बनाया है। इस पर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है '' आज हम बाजार की भीड़ और शोर-गुल में सम्‍मि‍लि‍त हो रहे हैं,नीचे उतर आए हैं,ओछे हो गए हैं। कलह से हमारा सन्‍तुलन जाता रहा है। पदवि‍यों-उपाधि‍यों को लेकर आपस में झगड़ा कर रहे हैं। बड़े-बड़े अक्षरों के और ऊंचे स्‍वर के विज्ञापनों से अपने को औरों से बड़ा घोषित करने में हमें संकोच नहीं होता। और मजे की बात तो यह है कि जो कुछ हम कर रहे हैं सब 'नकल' है। इसमें सत्‍य की मात्रा नहीं के बराबर है। इसमें शान्ति नहीं,संयम नहीं,गाम्‍भीर्य नहीं, शालीनता नहीं।''रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने सादगी और मानवता पर जोर दिया और ऊपरी आडम्‍बर की जबर्दस्‍त मुखालफत की थी। भद्रता को वे आंतरि‍क चीज मानते थे, भद्रता कोई बाजार में मि‍लने वाली वस्‍तु नहीं थी जि‍से जाकर खरीद लो और पहनकर भद्र बन जाओ।" टैगोर के शब्‍दों में  आज हमारी भद्रता सस्‍ते कपड़ों से अपमानि‍त होती है,घर में वि‍लायती ढंग की सजावट न हो तो उस पर आंच आती है बैंक में हमारे नाम पर जो अंक लि‍खे हैं वे कम हों, तो हमारी भद्रता कलंकि‍त होती है। हम यह भूल बैठे हैं कि‍ ऐसी प्रति‍ष्‍ठा को सि‍र पर ढोकर उसका आदर करना वास्‍तव में लज्‍जा का वि‍षय है। जि‍न बेकार की उत्‍तेजनाओं को हमने सुख मानकर चुना है उनसे हमारे समाज का अन्‍त:करण दासता के पाश में जकड़ा जा रहा है। टैगोर ने यह भी लिखा है मनुष्‍य मधुमक्‍खी की तरह नहीं है जो एक ही तरह का छत्‍ता बनाती है, न वह मकड़ी की तरह है जो एक ही 'पैटर्न' का जाल बुनती है।उसकी सबसे बड़ी शक्‍ति‍ है उसका अन्‍त:करण। मनुष्‍य का पूरा दायि‍त्‍व अन्‍त:करण के सामने है। अभ्‍यासपरता के सामने नहीं।  रवीन्द्रनाथ टैगोर का मानना है  मनुष्‍य की शक्‍ति‍ के दो पक्ष हैं : एक पक्ष का नाम है 'कर सकता है' और दूसरे पक्ष का नाम है 'करेगा'। पहला पक्ष उसके लि‍ए सहज है,लेकि‍न उसकी तपस्‍या दूसरे पक्ष की ओर है। धर्म मनुष्‍य के 'करेगा' पक्ष के सर्वोच्‍च शि‍खर पर खड़ा होकर उसके समस्‍त 'कर सकता है' को पुकारता है ; उसे वि‍श्राम नहीं करने देता ; उसे कि‍सी सामान्‍य लाभ से ही सन्‍तुष्‍ट नहीं होने देता। जहॉं मनुष्‍य का 'कर सकता है' इसी 'करेगा' के नि‍र्देशन में आगे बढ़ता जाता है वहीं मनुष्‍यता की वीरता है-वहीं उसका सत्‍य -रूप से आत्‍मलाभ है।''  धर्म और कलाओं के प्रति‍ हमें पुराने नुस्‍खे को अपनाना होगा,पुराना नुस्‍खा था '' अभी और'',हम जहां थे उससे आगे के बारे में सोचें। कला और धर्म जहां है उससे आगे के बारे में सोचें। इस प्रक्रि‍या को जि‍तनी दूर तक ले जा सकें,ले जाएं। इससे मानवीय चेतना के नए दि‍गंत खुलेंगे। रवीन्‍द्रनाथ टैगोर ने लि‍खा है '' धर्म मनुष्‍य की पूर्ण शक्‍ति‍ की अकुण्‍ठि‍त वाणी है। उसमें कोई द्वि‍धा नहीं है। वह मनुष्‍य को मूर्ख कहकर स्‍वीकार नहीं करता,और न दुर्बल कहकर अवज्ञा करता है। वह मनुष्‍य को पुकारकर कहता है- ' तुम अजेय हो,अभय हो,अमर हो।' धर्म की शक्‍ति‍ से ही मनुष्‍य असंभव लगने वाले कामों में जुट जाता है, और ऐसे स्‍तर पर पर पहुँच जाता है जि‍सकी वह स्‍वप्‍न में भी कल्‍पना नहीं कर सकता।




शनिवार, 7 मई 2011

पश्चिमबंगाल में 'स्वशासन' बनाम 'सुशासन' की जंग

पश्चिम बंगाल में इसबार का विधानसभा चुनाव 'स्वशासन' ( पार्टी शासन) बनाम 'सुशासन' के नारे के तहत लड़ा जा रहा है। 'सुशासन' की धुरी है जनता और कानून का शासन। 'स्वशासन' की धुरी है पार्टीतंत्र की मनमानी और सामाजिक नियंत्रण। इसके आधार पर वोट पड़ने जा रहे हैं। इसबार का चुनाव नव्य आर्थिक उदारीकरण के सवालों पर नहीं हो रहा। यह चुनाव माओवादी हिसा के सवाल पर भी नहीं लड़ा जा रहा। इस चुनाव में ममताबनर्जी की इमेज और वर्गीय चरित्र को लेकर पर भी बहस नहीं हो रही। इस चुनाव का प्रधान मुद्दा 'स्वशासन' बनाम 'सुशासन' है। मुख्य सवाल है राज्य में पार्टीतंत्र का शासन चलेगा या भारतीय कानून का शासन चलेगा। ममता ने सुशासन के सवालों को प्रधान मुद्दा बनाया है और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। 

इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पश्चिम बंगाल विधानसभा के आगामी चुनाव असाधारण होंगे। 35 सालों में वाम मोर्चे ने सातबार आराम से चुनाव जीता है लेकिन इसबार ऐसा लग रहा है कि वाम मोर्चा कठिन चुनौती का सामना कर रहा है। वाम मोर्चा और खासकर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ( मार्क्सवादी) या माकपा और ममता बनर्जी दोनों के लिए यह चुनाव आर-पार की लड़ाई है। इस चुनाव में कई बुनियादी सवाल उठे हैं जिनसे वाम मोर्चा और राज्य की राजनीति पहलीबार मुखातिब है। विलक्षण आयरनी है वाम मोर्चे का एक तबका यह चाहता है कि इसबार वाम मोर्चा चुनाव हारे। इससे वाम के अंदर जो सामाजिक गंदगी है वो साफ होगी। सामाजिक नियंत्रण टूटेगा। इसबार का बुनियादी मुद्दा है माकपा के सामाजिक नियंत्रण तंत्र को ध्वस्त करो।

उल्लेखनीय है माकपा ने 2009 में लोकसभा चुनाव के पहले एक शुद्धीकरण अभियान चलाया था । कई हजार दोषी पार्टी सदस्यों को अपने दल से निकाला था ये हजारों लोग बाद में ममता की राजनीतिक पार्टी में चले गए । उसकी राजनीतिक ताकत बन गए। फलतःसन् 2009 के लोकसभा चुनाव में वाम मोर्चे को अभूतपूर्व पराजय का सामना करना पड़ा। सन् 2009 की पराजय के बाद वाम मोर्चे को छोड़ने वालों का सिलसिला थमा नहीं है। ऐसी अवस्था में वाम की पहली बड़ी चुनौती है अपने संगठन और सांगठनिक जनाधार को बचाने की ।दूसरी चुनौती है विधानसभा चुनाव जीतने की।

वाम और खासकर माकपा की कुछ बुनियादी भूलें रही हैं जिनके कारण बड़े पैमाने पर जनता नाराज है और चाहती है ममता बनर्जी को कम से कम एकबार मौका दे दिया जाए। इसके कारण पहलीबार वाम मोर्चा प्रत्याशी क्षमाप्रार्थी हैं। 23 मार्च को राज्य के मुख्यमंत्री और माकपा के पोलिट ब्यूरो सदस्य बुद्धदेव भट्टाचार्य ने प्रेस कॉफ्रेस में पार्टी सदस्यों की नागरिक जीवन में हस्तक्षेप करने वाली हरकतों की पहलीबार तीखी आलोचना की है। उन पहलुओं पर पहलीबार खुलकर बोला है जिन पर वे अब तक पार्टी के अंदर बोलते रहे हैं। असल में गड़बड़ियां ज्यादा गहरी हैं। इन्हें संक्षेप में मार्क्सवाद की 5 भूलों के रूप में देख सकते हैं। पहली भूल , पार्टी और प्रशासन के बीच में भेद की समाप्ति। इसके तहत प्रशासन की गतिविधियों को ठप्प करके पार्टी आदेशों को प्रशासन के आदेश बना दिया गया । दूसरी भूल ,माकपा कार्यकर्ताओं ने आम जनता के दैनंन्दिन-पारिवारिक -सामाजिक जीवन में व्यापक स्तर पर हस्तक्षेप किया है,और स्थानीयस्तर पर विभिन्न संस्थाओं और क्लबों के जरिए सामाजिक नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की । तीसरी भूल , अनेक कमेटियों ने कामकाज के वैज्ञानिक तौर-तरीकों को तिलांजलि देकर तदर्थवाद अपना लिया । अवैध ढ़ंग से जनता से धन वसूली और अपराधी लोगों का लोकल तंत्र स्थापित किया । चौथी भूल ,बड़े पैमाने पर अयोग्य,अक्षम और कैरियरिस्ट किस्म के नेताओं के हाथों में विभिन्न स्तरों पर पार्टी का नेतृत्व आ गया है।

मसलन् जिन व्यक्तियों के पास भाषा की तमीज नहीं है,मार्क्सवाद का ज्ञान नहीं है,पेशेवर लेखन में शून्य हैं ,बौद्धिकों में साख नहीं है,ऐसे लोग पार्टी के अखबार,पत्रिकाएं और टीवी चैनल चला रहे हैं। वैचारिकगुरू बने हुए हैं। अलेखक-अबुद्धिजीवी किस्म के लोग बुद्धिजीवियों के संगठनों के नेता बने हुए हैं। जो व्यक्ति कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में सामान्य विचारधारात्मक ज्ञान नहीं रखता वह नेता है। जिस विधायक या सांसद की साख में बट्टा लगा है वह अपने पद पर बना हुआ है।

पांचवी भूल, राज्य प्रशासन का मानवाधिकारों की रक्षा के प्रति नकारात्मक रवैय्या रहा है। मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री तक सबके अंदर 'हम' और 'तुम' के आधार पर सोचने की प्रवृत्ति ने राज्य प्रशासन के प्रति सामान्य जनता की आस्थाएं घटा दी हैं। आम जनता के दैनन्दिन जीवन में प्रशासन सहयोगी की बजाय सबसे बड़ी बाधा बन गया है और निहित स्वार्थी लोगों ने राज्य प्रशासन को मानवाधिकारों के हनन का औजार बना दिया है।

विगत 35 सालों में विकेन्द्रीकरण के बाबजूद राज्य में प्रत्येक स्तर पर लोकतंत्र पंगु बना है। विकेन्द्रीकरण और लोकतांत्रिक संस्थाओं के चुनाव प्रत्येक स्तर पर मखौल बनकर रह गए हैं। स्थिति की भयावहता को समझने के लिए एक-दो उदाहरण ही काफी हैं,मसलन राज्य में छात्रसंघों के नियमित चुनाव होते हैं लेकिन विपक्षी उम्मीदवारों को नामांकन पत्र तक दाखिल नहीं करने दिया जाता । मजेदार बात है ज्यादातर कॉलेज और विश्वविद्यालयों में वाम प्रत्याशी बगैर किसी प्रतिद्वंद्विता के जीत जाते हैं। जो छात्र वाम प्रत्याशियों खासकर एसएफआई के खिलाफ अपना नामांकन भरना चाहता है उसे तरह तरह से आतंकित किया जाता है,परेशान किया जाता है,यहां तक कि उसके परीक्षा के नम्बर कटवाने की धमकियां भी दी जाती हैं और साथ में रहने,मुँह बंद करके रहने के लिए परीक्षा में अच्छे नम्बर देने का आश्वासन दिया जाता है। इस काम में घृणिततम ढ़ंग से शिक्षकों का एक धड़ा उनकी मदद करता है और ये ही लोग शिक्षा में सामाजिक नियंत्रण का काम भी करते हैं। इसके बाबजूद भी यदि कोई छात्र चुनाव लड़ना ही चाहे तो बमबाजी का सामना करना होता,कॉलेज के रास्ते में कई दिनों तक अशांति बनी रहती है ,बमबाजी होती रहती है। इस पूरे काम में स्थानीय पुलिस घृणिततम ढ़ंग से उत्पातियों की मदद करती है।

कायदे से छात्रसंघ चुनावों में आम छात्रों की शिरकत बढ़नी चाहिए लेकिन व्यवहार में देखा गया है कि शिरकत घटी है,रस्मीतौर पर चुनाव होते हैं , इनकी वास्तविक प्रक्रिया अलोकतांत्रिक है। कागज पर लोकतांत्रिक नियम हैं लेकिन व्यवहार में विशुद्ध सामाजिक नियंत्रण के फार्मूले हैं जिनका छात्रनेता पालन करते हैं।यही दशा तकरीबन सभी स्तरों पर होने वाले चुनावों की है। 35 सालों में पहलीबार नंदीग्राम-सिंगूर की घटना के बाद माकपा के सामाजिक नियंत्रण के खिलाफ व्यापक विक्षोभ दिखाई दिया और वाम और खासकर माकपा के मजबूत किलों में भी जनता ने सामाजिक प्रतिवाद किया और ममता बनर्जी को जो राजनीत्क हाशिए पर थी हठात रातोंरात बड़ी राजनीतिक ताकत बना दिया।

आम लोगों में माकपा के सामाजिक नियंत्रण की नीति के खिलाफ व्यापक असंतोष है। मसलन आप कोई मकान खरीदना चाहते हैं तो स्थानीय माकपा पार्टी इकाई के सहयोग के बिना यह काम नहीं कर सकते। यदि आप अपना मकान बनाना चाहते हैं तो मिट्टी,सीमेंट,चूना,ईंट किससे लेंगे यह भी पार्टी ही तय करेगी,अन्य को वे सप्लाई नहीं करने देंगे। आपके साथ कोई आपराधिक कांड हो जाए और आप थाने में एफआईआर दर्ज कराने जाएं तो पुलिस शिकायत दर्ज नहीं करेगी जब तक आप किसी लोकल पार्टी ऑफिस से फोन नहीं करा देते। आम रिवाज रहा है कोई भी परेशानी है पहले पार्टी ऑफिस जाओ,वहां बैठे नेता को कहो ,वो फिर सोचेगा कि क्या किया जाए,यहां तक कि हत्या होने पर भी पुलिस एफआईआर नहीं लिखती।

यदि आप कॉलेज-विश्वविद्यालय शिक्षक हैं और आपका माकपा के साथ मतैक्य नहीं है तो तय मानिए आपको भेदभाव,उपेक्षा,बहिष्कार,अपमान आदि का सामना करना पड़ेगा। जीवन के प्रत्येक स्तर पर पार्टी वफादारी को बुनियादी पैमाना है और यह सारा खेल लोकतंत्र,मार्क्सवाद आदि की ओट में चलता रहा है। इसके कारण व्यापक सामाजिक असंतोष पैदा हुआ है। यह असंतोष शांत होगा इसमें संदेह है। इस असंतोष को ममता ने पापुलिज्म के जरिए अभिव्यक्ति दी है।

ममता के पापुलिज्म की सामाजिक धुरी है माकपा के सामाजिक नियंत्रण से सतायी जनता। इस क्रम में ममता बनर्जी के पापुलिस्ट राजनीतिक खेल ने पश्चिम बंगाल में अस्मिताओं को जगाया है। ममता बनर्जी की राजनीति के दो छोर हैं एक है अस्मिता की राजनीति और दूसरा है पापुलिज्म। इसके तहत ही उसने मुस्लिम धार्मिक अस्मिता को हवा दी है। विभिन्न जिलों में अस्मिता के मोर्चों के साथ गठबंधन किया है।

पश्चिम बंगाल में अस्मिता की राजनीति के उभार के दो बड़े कारण हैं। पहला , निरूद्योगीकरण और जंगी मजदूर आंदोलन का लोप। दूसरा ,विगत 10 सालों में राज्य सरकार ने किसानों की जमीन का बड़े पैमाने पर अंधाधुंध अनियोजित -लक्ष्यहीन ढ़ंग से अधिग्रहण किया है। यह जमीन बिना किसी योजना के किसानों से ले ली गयी और इससे बड़े पैमाने पर छोटी जोत के किसान प्रभावित हुए हैं। इनमें मुस्लिम किसानों की संख्या काफी है। इस मौके का लाभ उठाते हुए ममता ने अस्मिता और किसानों की जमीन रक्षा के सवाल को बड़ा मसला बना दिया है। ममता जानती है अस्मिता की राजनीति का मुस्लिम खेल खतरनाक साम्प्रदायिक खेल है। यह नियंत्रण के बाहर न चला जाए इसलिए वाम ने सरकारी नौकरियों में मुसलमानों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की है। लेकिन क्या इससे अस्मिताएं शांत होंगी ?

उल्लेखनीय है वाम मोर्चे ने बड़े ही कौशल के साथ बंगभाषायी श्रेष्ठत्व और वर्गीय राजनीति का मिश्रित रसायन तैयार किया था। इसमें अल्पसंख्यकों और उनकी भाषाओं को दोयमदर्जे के रूप में देखा गया। वाम ने अपनी भूलों से ममता बनर्जी को अस्मिता की राजनीति का कार्ड खेलने के लिए भौतिक परिवेश प्रदान किया और देखते ही देखते वह विभिन्न समूहों और समुदायों में जनप्रिय हो उठीं। माकपा विरोधी मुस्लिम असंतोष को उसने वोटबैंक में तब्दील किया। वाम के खिलाफ एकमुश्त वोट देने पर जोर दिया। वाम मोर्चे के 35 साल के शासन में मुसलमानों की उपेक्षा को बहाना बनाया ।

सच यह है सारे देश में मुसलमानों को दोयम दर्जे के नागरिक का जीवन जीना पड़ रहा है,इसकी तुलना में पश्चिम बंगाल में वाम ने मुसलमानों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान की। गांवों में भूमिसुधार कार्यक्रम के तहत हजारों मुसलमानों को जमीनों के पट्टे दिए । हाल ही में मुसलमानों के लिए सरकारी नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण दिया। साम्प्रदायिक सदभाव का माहौल दिया। लेकिन यह सब किया सामाजिक नियंत्रण के दासरे और पार्टी वर्चस्व के तहत। सामाजिक वर्चस्व की निकृष्टतम परिणति है सरकारी नौकरियों में पार्टी मेम्बरों और हमदर्दों की भरती। इसके तहत पूरे राज्य में सरकारी विभागों में विगत 35 साल में माकपा और वाम के अलावा अन्य किसी दल के कार्यकर्ता की नौकरी नहीं लगी।

ममता बनर्जी की रणनीति है छोटे मसलों को बड़ा बनाना। स्थानीय मसलों को राष्ट्रीय और आर्थिक समस्याओं से ऊपर स्थान देना। वे राजनीतिक हथियार के तौर पर वाम के प्रति किसी एकल स्थानीय मसले को उठाती हैं । वह वाम की किसी एक गलती को पकडती है और फिर कारपोरेट मीडिया के जरिए 'माकपा शैतान' 'माकपा शैतान' का प्रचार आरंभ कर देती है। वे यथार्थ के अंश को समग्र राज्य का सच कहकर प्रचारित करती हैं। यह पद्धति उन्होंने लैटिन अमेरिका के कम्युनिस्ट विरोधियों के प्रौपेगैण्डा से सीखी है।

मसलन वाम शासन में नंदीग्राम में पुलिस गोलीबारी में किसानों के मारे जाने को उन्होंने इतना बड़ा घटनाक्रम बनाया कि देखने वाले को लगे कि देश में उससे ब़ड़ा जघन्य कांड और कहीं नहीं हुआ ! नंदीग्राम पर वे जितनी बेचैन रही हैं वैसी बेचैनी और आक्रोश उनमें गुजरात के दंगों को लेकर नहीं दिखाई दिया।

असल में अस्मिता की राजनीति का पाठ ममता बनर्जी ने नरेन्द्र मोदी से पढ़ा है। गुजरात में हिन्दू अस्मिता के खेल की सफलता ने उन्हें पश्चिम बंगाल में मुस्लिम अस्मिता का कार्ड चलाने की प्रेरणा दी है। अस्मिता की राजनीति मूलतः खोखली राजनीति है। यह सामाजिक विभाजन पैदा करती है। ममता बनर्जी जब भी कोई मसला उठाती हैं तो 'मैं सही' की राजनीति पर जोर देती हैं। प्रचार की यह कला उन्होंने संघ परिवार से सीखी है।

उल्लेखनीय है वामदलों का मुसलमानों में एक अंश पर प्रभाव रहा है। राज्य सारे मुसलमान कभी भी वामदलों को वोट नहीं देते थे। अधिकांश मुसलमान पहले कांग्रेस के साथ थे आज भी वे कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के साथ हैं। अंतर एक है कि मुसलमानों के सवालों को ममता ने सीधे सम्बोधित किया है। अस्मिता की राजनीति के फ्रेम में रखकर उठाया है। मुस्लिम प्रतीकात्मकता का जमकर दोहन किया है। इसके विपरीत वामदलों ने अस्मिता के रूप में मुसलमानों को कभी नहीं देखा। उन्होंने सामाजिक सम्मिश्रण बनाने के लिए हिन्दुओं-मुसलमानों के बीच सदभाव स्थापित करने की कोशिश। उनकी स्थानीय धार्मिक पहचान की बजाय बंगला जातीय पहचान पर जोर दिया। यह काम बड़े ही सचेत ढ़ंग से किया गया।

वाम आंदोलन का यह बड़ा योगदान है कि उसने मुसलमानों को धर्मनिरपेक्ष पहचान दी और धार्मिक पहचान से मुक्ति दिलायी। ममता बनर्जी ने नंदीग्राम आंदोलन के बहाने मुसलमानों की धार्मिक अस्मिता और उसकी रक्षा के सवालों को प्रमुख सवाल बना दिया है और मुसलमानों की संपत्ति और खेती की जमीन खतरे में है, मुसलमानों के लिए वाम मोर्चे ने कुछ नहीं किया आदि बातों को उठाते हुए विकास पर कम मुसलमान की अस्मिता के उभार और माकपा विरोध में मुस्लिम एकजुटता पर जोर दिया है। यह आश्वासन दिया है कि वे और उनका दल मुसलमानों का सबसे बड़ा हितैषी है। मुसलमानों का हितैषी होने का ममता बनर्जी का दावा एकसिरे से बुनियाद है। वे वाम मोर्चा विरोध के नाम पर मुसलमानों को प्रतिक्रियावादी और धार्मिक अस्मिता के आधार पर गोलबंद कर रही हैं । यह पुराना कांग्रेसी फार्मूला है कि मुसलमान को मुसलमान रहने दो।

वाम मोर्चे ने सचेत रूप से इस फार्मूले को धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक-सांस्कृतिक रसायन के जरिए तोड़ा था। मुसलमानों को धर्मनिरपेक्ष जातीय भाषायी पहचान के साथ एकीकृत किया है। यह मुसलमानों की जिंदगी में एक बड़ा मूलगामी कदम था लेकिन ममता बनर्जी महज वोटों की खातिर मुसलमानों को धर्मनिरपेक्ष जातीय भाषीय पहचान से वंचित करके उन्हें महज मुसलमान बनाने पर तुली हैं। ढ़ोंगी राजनेताओं की तरह विभिन्न मुस्लिम त्यौहारों पर मुस्लिम वेशभूषा पहनकर नाटक करती रहती हैं। इस संदर्भ में ही ममता बनर्जी का मुस्लिमों औरतों की तरह सिर ढकना और प्रार्थना करना आदि सहज ही देखा जा सकता है।

ममता बनर्जी जानती हैं वे मुसलमान नहीं हैं और वे मुस्लिम वेशभूषा और आचरण करके मुस्लिम समुदाय के सबसे प्रतिक्रियावादी तबकों को आकर्षित करके मुसलमान की धर्मनिरपेक्षता अस्मिता को अपदस्थ करके धार्मिक अस्मिता की स्थापना करना चाहती हैं और यह अस्मिता की राजनीति का खतरनाक खेल है। उल्लेखनीय है कम्युनिस्टों में शानदार मुस्लिमनेताओं की परंपरा रही है और वे कम्युनिस्ट पार्टी से लेकर राज्य प्रशासन के सर्वोच्च पदों पर आसीन रहे हैं ,कभी भी उनको सार्वजनिक मंचों पर तथाकथित मुस्लिम ड्रेसकोड में नाटक करते नहीं देखा गया। मसलन मुजफ्फर अहमद और विधानसभा स्पीकर हाशिम अब्दुल हलीम को कभी किसी ने सार्वजनिक राजनीतिक मंचों पर मुस्लिम अस्मिता के साथ जुड़ने के लिए मुस्लिम वेशभूषा बदलकर नाटक करते नहीं देखा। इन लोगों का एक भी फोटो नहीं मिलेगा कि ये अपने को धार्मिक पहचान के साथ जोड़ रहे हैं,जबकि ये पक्के धर्मनिरपेक्ष मुसलमान हैं और इस्लाम के भी बड़े सुंदर ज्ञाता रहे हैं,और वे मुसलमानों की धार्मिक अस्मिता की बजाय जातीय बंग भाषायी अस्मिता पर जोर देते रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे ने धार्मिक अस्मिता को गौण बनाया और बांग्ला जातीय गौरव पर जोर दिया है। सामाजिक नियंत्रण के फार्मूले को लागू करने के चक्कर में उसने कभी अस्मिता की राजनीति को पनपने नहीं दिया। अन्य के लिए राजनीतिक स्पेस नहीं दिया। लेकिन आज वाम की यह वैचारिक घेराबंदी टूट चुकी है। वाम ने जनता से लेकर बुद्धिजीवियों तक सबको पार्टी पक्षधरता और बंगला जातीय श्रेष्ठत्व के दायरे में कैद रखा। पार्टी और जातीय श्रेष्ठत्व की वैचारिक नाकेबंदी की संसार के अनेक साम्यवादी देशों में दुर्गति हुई है। पश्चिम बंगाल में यह काम वाम मोर्चा कैसे करता रहा है इसका एक ही उदाहरण देखें।यहां पर दुर्गापूजा पंडालों में लाउडस्पीकर खूब बजते हैं ,गाने भी बजते हैं,लेकिन पंडालों में हिन्दी गाने बजाने पर पाबंदी है। लेकिन विगत लोकसभा चुनाव में वाम की जबर्दस्त पराजय के बाद पहलीबार अधिकांश पूजा पंडालों में बंगला की बजाय हिन्दी फिल्मी गानों की गूंज रही। वाम दलों को ध्यान रखना होगा इंटरनेट के युग में सामाजिक नियंत्रण की रणनीति पिटेगी। वे इससे बाज आएं। यही स्थिति उन अधिकांश रिहाइशी कॉपरेटिव सोसायटियों की है जो बंगालियों ने बनाई हैं। इनमें अधिकांश में भेदभावपूर्ण नियम हैं,मसलन बंगाली ही मकान खरीदने या कॉपरेटिव सोसायटी का सदस्य होने का अधिकारी है।हिन्दी भाषी और मुसलमानों को यह हक प्राप्त नहीं है।

हाल ही में बंगला के नामी संस्कृतिकर्मियों ने बांग्ला में डबिंग किए गए महाभारत सीरियल के प्रसारण का विरोध किया और उसका प्रसारण बंद करा दिया। ये लोग पहले भी इस तरह के प्रसारण रूकवा चुके हैं। इनका मानना है डबिंग कार्यक्रमों से बांग्ला मर जाएगी। कलाकर भूखे मर जाएंगे। यह राज्य में वाम अंधलोकवाद की सबसे खराब मिसाल है। डबिंग और अनुवाद से कोई भाषा नहीं मरती। यदि ऐसा होता तो हिन्दी सिनेमा को तो तबाह हो जाना चाहिए था।

बंगाल के इस आख्यान का लक्ष्य यह तय करना नहीं है कि विधानसभा चुनाव कौन जीतेगा ? बल्कि यह बताना है कि पश्चिम बंगाल की जमीनी हकीकत के बारे में आम लोग बहुत कम जानते हैं। यहां तक कि राष्ट्रीय मीडिया भी सामाजिक नियंत्रण के सवाल पर चुप्पी लगाए है। विधानसभा चुनाव में वामदलों का सारा जोर इस बात पर है कि हमसे गलतियां हुई हैं हमें माफ कर दो, लेकिन वे यह नहीं कह रहे कि वे सामाजिक नियंत्रण नहीं करेंगे और जो लोग इसके लिए दोषी रहे हैं उनको वे दण्डित नहीं कर रहे। ऐसे में वाम के प्रति आम जनता का गुस्सा कम होगा ,इसमें संदेह है।

दूसरी ओर ममता बनर्जी की आक्रामक प्रचार शैली ने वाम को स्थानीयस्तर पर रक्षात्मक मुद्रा में पहुँचा दिया है। ममता बनर्जी इसबार कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही हैं। वे पहले भी मिलकर लड़ चुकी हैं लेकिन वे सफल नहीं हो पायीं।

ममता बनर्जी की मुश्किल यह है कि वे माकपा की कैडरवाहिनी से मुखातिब हैं और इसबार वे यदि सफल होती हैं तो यह निश्चित रूप से वाम के लिए गहरे सदमे से कम नहीं होगा। क्योंकि पश्चिम बंगाल में 35 सालों तक शासन करते करते वामदल यह भूल ही गए कि लोकतंत्र में पराजय भी होती है। लोकतंत्र में हार-जीत सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं है। वे निहितस्वार्थी और अपराधी गिरोह अब रातों-रात ममता के साथ आ खड़े हुए हैं जो कल तक माकपा के बैनरतले सामाजिक नियंत्रण और लूट कर रहे थे। ऐसी स्थिति में भविष्य में सामाजिक नियंत्रण का मसला खत्म हो जाएगा इसमें संदेह है। बल्कि संभावनाएं यही हैं कि खूंरेजी बढ़ेगी। पश्चिम बंगाल के चुनावों की घोषणा होने के बाद से गांवों में हिंसाचार अचानक थम गया है ,शहरों में हिसा नहीं हो रही है। यह अस्वाभाविक शांति है।