रविवार, 24 फ़रवरी 2013

आर्थिकमंदी में फंसी मनमोहन सरकार की मुश्किलें



      राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने संसद का बजटसत्र आरंभ होने पर अपना जो अभिभाषण पढ़ा है वह नई उम्मीदों की बात करता है। भारतीय राजनीति की बिडम्बना है कि राष्ट्रपति के भाषण को हमारे नेता-सांसद और अन्य जागरूक लोग ध्यान से नहीं पढ़ते। असल में राष्ट्रपति का अभिभाषण तो मनमोहन सरकार की नीतियों का आधिकारिक बयान है इस बयान में कई नए सवालों और संभावनाओं को पेश किया गया है। इस भाषण में आगामी लोकसभा चुनाव का पापुलिज्म झलक मार रहा है। आने वाले 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपीए सरकार और खासकर कांग्रेस किस-किस क्षेत्र के मतदाताओं की ओर नजर गढ़ाए है और किनकी ओर भविष्य में देख रही है इसकी झलक देखी जा सकती है। यह भी सच है कि मनमोहन सरकार अकल्पनीय भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी होने के बावजूद कई मामलों में कुछ मूल्यवान काम कर बैठी है। विपक्ष की सारी रणनीति इस पर टिकी है कि किसी तरह मनमोहन सरकार को अपनी उपलब्धियां प्रचारित न करने दिया और उस पर दनादन हमले जारी रहें।
    प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों का पहला विश्वव्यापी असर यह हुआ है कि आज विकसित पूंजीवादी मुल्कों के राज्याध्यक्ष हमारे देश में पूंजीनिवेश का अनुरोध करने आ रहे हैं। वे चाहते हैं कि भारत के पूंजीपति उनके देश में जाकर निवेश करें और वहां के लोगों को रोजगार दें।
    एक जमाना था कि भारत का प्रधानमंत्री विदेश जाता था और विकसित देशों से अपील करता था कि आपलोग भारत आएं और पूंजी निवेश करें।लेकिन इन दिनों उलटा हो रहा है। अमेरिका,फ्रांस,ब्रिटेन,जर्मनी आदि विकसित देशों से लेकर तीसरी दुनिया के देशों खासकर अफ्रीकी देशों के राष्ट्राध्यक्ष भारत से मदद मांग रहे हैं । यह बहुत बड़ा परिवर्तन है। पंडित नेहरू के शासनकाल  में विदेशनीति में सब हमारी ओर टकटकी लगाए देखते थे आज उद्योग-धंधों के लिए भारत से मदद मांग रहे हैं।इससे भारत की आर्थिक शक्ति का अंदाजा लगता है। यही वो परिदृश्य है जिसको ध्यान में रखकर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने  कहा 'एक महत्वाकांक्षी भारत का उदय हो रहा है, एक ऐसा भारत जहां अधिक अवसर, अधिक विकल्प, बेहतर आधारभूत संरचना तथा अधिक संरक्षा एवं सुरक्षा होगी। हमारे युवा जो हमारी सबसे बड़ी राष्ट्रीय धरोहर हैं, आत्मविश्वास और साहस से परिपूर्ण हैं। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि इनका जोश, इनकी ऊर्जा और इनका उद्यम भारत को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा।'
   सपनों को देखना और उनको साकार करना भी एक राजनीतिक उपलब्धि है। मसलन् अल्पसंख्यकों की उन्नति के सवाल को ही लें और मनमोहन सरकार के रिकॉर्ड को देखें कि तथ्य और सत्य क्या है ? यह सच है कि कांग्रेस के शासनकाल में अल्पसंख्यक सबसे ज्यादा अभाव में रहे हैं और सामाजिक विकास की दौड़ में एकदम पिछड़ गए थे जिसकी ओर सच्चर कमीशन ने ध्यान खींचा था। लेकिन इस रिपोर्ट के आने के बाद अल्पसंख्यकों के विकास के लिए केन्द्र सरकार ने जो 15सूत्री कार्यक्रम सारे देश में लागू किया उसके अभीप्सित परिणाम सामने आने लगे हैं। बड़े पैमाने पर अल्पसंख्यकों के बच्चे पढ़ने जाने लगे हैं और उनमें नई उम्मीदें जगी हैं।
अल्पसंख्यक समुदायों का शैक्षिक सशक्तीकरण सुनिश्चित करने के लिए तीन छात्रवृत्ति स्कीमों का कार्यान्वयन किया गया है  और प्रत्येक स्कीम में 30 प्रतिशत निधि छात्राओं के लिए निर्धारित की गई है। वर्ष 2012-13 में 31 दिसंबर तक 55 लाख से अधिक विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति के रूप में लगभग  880 करोड़ रूपये की राशि का वितरण किया जा चुका है। अल्पसंख्यक समुदायों के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने के लिए मौलाना आजाद राष्ट्रीय छात्रवृत्ति योजना के तहत 66 करोड़ की राशि दे दी गई है। 15 सूत्री कार्यक्रम के तहत वर्ष 2012-13 के दौरान दिनांक 30.09.2012 तक राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यकों को ` 1,71,960 करोड़ प्राथमिकता क्षेत्र ऋण दिया गया, जो कि कुल प्राथमिकता क्षेत्र ऋण के 15 प्रतिशत से अधिक है।
इसी तरह अनुसूचित जाति के कक्षा IX और X में पढ़ने वाले छात्रों के लिए केन्द्र प्रायोजित छात्रवृत्ति योजना शुरू की गई है, जिससे लगभग 40 लाख छात्रों को लाभ पहुँचा है।  
 ग्रामीण वोटरों का दिल जीतने के लिए राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत एक लाख से अधिक ऐसे गांवों में बिजली पहुंचाई गई, जहां अभी तक बिजली नहीं थी, लगभग 2,85,000 गांवों को सघन रूप से बिजली दी गई है और गरीबी रेखा से नीचे के 2 करोड़ से अधिक परिवारों को नि:शुल्क बिजली कनेक्शन दिए गए हैं।
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के अभिभाषण का सबसे कमजोर हिस्सा अर्थव्यवस्था को लेकर था। मनमोहन सरकार के पास अर्थव्यवस्था को चंगा करने का कोई प्रभावी फार्मूला लागू करने में विगत 4सालों में सफलता नहीं मिली है।  चालू वित्त वर्ष की प्रथम छमाही में सकल घरेलू उत्पाद की वास्तविक वृद्धि दर 5.4 प्रतिशत रही। यह पिछले दशक के लगभग 8 प्रतिशत वार्षिक विकास औसत दर से काफी कम है। यह सच है कि मंदी से निकलने का कोई फार्मूला किसी के पास नहीं है लेकिन मनमोहन सरकार को अपनी प्राथमिकताएं बदलनी होंगी। वर्चुअल और मैन्यूफैक्चरिंग अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता देने की बजाय औद्योगिक उत्पादन बढ़ने और नए उद्योग खोलने पर जोर देना होगा। कायदे से देश के विभिन्न इलाकों में प्राथमिकता के अनुसार बड़ी क्षमता वाले उद्योग खोले जाने चाहिए। सिर्फ मैन्यूफैक्चरिंग के जरिए मंदी और आर्थिक संकट से नहीं निकला जा सकता। साथ ही उन नीतियों को भी बदलने की जरूरत है जिनके कारण नए रोजगार पैदा करने में बाधाएं आ रही हैं। आज स्थिति बदतर है राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 5.3 प्रतिशत के बराबर हो गया है। इसका अर्थ यह है कि मनमोहन सरकार ने कमाई कम की है,निवेश भी कम किया है और खर्चे ज्यादा किए हैं। रोजगारोन्मुख उद्योग –धंधों को सर्वोच्च प्राथमिकता दिए बिना मंदी के संकट से निकलना संभव नहीं है । साथ ही कृषिक्षेत्र में व्याप्त अराजकता की समस्याओं पर भी मनमोहन सरकार को ध्यान देना होगा। किसानों की सब्सीड़ी में कटौती बंद की जानी चाहिए। कृषिक्षेत्र को और भी शक्तिशाली बनाने की जरूरत है इसके लिए उनकी सब्सीड़ी में इजाफा किया जाना चाहिए। किसानों की सब्सीड़ी ऐसे समय में काटी जा रही है जब वे उत्पादन बढ़ा रहे हैं। कृषिक्षेत्र में  11वीं योजना में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में विकास दर, 10वीं योजना के 2.4 प्रतिशत की तुलना में 3.7 प्रतिशत रही। इसके अलावा मनमोहन सरकार को संगठित और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की समस्याओं की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। हाल ही में 2दिवसीय राष्ट्रीय हड़ताल के संदेश को केन्द्र सरकार को गंभीरता से लेना होगा और मजदूरों से संबंधित मांगों और कानूनों को सख्ती से लागू करने की दिशा में प्रयास करने होंगे वरना सन्  2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का गणित गड़बड़ा सकता है।

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

फांसी के उन्माद और भ्रष्टाचार में फंसी मनमोहन सरकार


        
  कमजोर का लक्षण है कि वह मीडिया उन्माद से डरता है। यह आभास दिया जा रहा है कि मनमोहन सरकार राजनीतिक तौर पर सबसे कमजोर सरकार है। वह मीडिया के दबाब में फांसी दे रहे है। मीडिया में जब भी किसी मसले को लेकर हो-हल्ला आरंभ होता है ,सरकार ऐसा आभास देती है कि वह मीडिया की सुन रही है। असल में भ्रष्टाचार के आरोपों पर केन्द्र सरकार मीडिया का सामना करने से कतराती रही उसने है और मीडिया के दबाब में हमेशा काम करती रही है। भ्रष्टाचार के मामलों में अपने विवेक से बहुत कम एक्शन लिए हैं।  
     हाल ही में विचारधीन फांसी के कैदियों की मर्सी पिटीशनों पर सरकार ने जिस तरह की सक्रियता दिखाई है वैसी सक्रियता पहले कभी नहीं दिखाई।
   उल्लेखनीय है दामिनी बलात्कार कांड के प्रतिवाद में जब जुलूस निकल रहे थे और देश में चारों ओर प्रतिवाद हो रहा था उस समय एक ही नारा सभी दिशाओं से मीडिया से गूंज रहा था बलात्कारी को फांसी दो। लगता है इस नारे को केन्द्र सरकार ने अपनी नई न्यायनीति का एक्शन प्लान बना लिया है।
     राष्ट्रपति पद संभालने के बाद प्रणव मुखर्जी की सक्रियता देखने लायक है। केन्द्र सरकार की फांसी की सजा को लागू करने की अतिसक्रियता किसी भी तर्क से स्वीकार्य नहीं है। आज के दौर में अधिकतर देशों में फांसी की सजा खत्म करने की ओर न्यायप्रणाली जा रही है। यहां तक कि दामिनी बलात्कार कांड के बाद बने वर्मा आयोग ने भी बलात्कारी को फांसी की सजा दिए जाने की सिफारिश नहीं की थी। उसने यह रेखांकित किया कि न्याय करते समय या कानून बनाते समय मीडिया के दबाब से बचना चाहिए।
कहा जा रहा है आतंकी कसाब और अफजल गुरू को फांसी दिए जाने के बाद से देश में जिस तरह का माहौल बना है उसने राष्ट्रपति को जल्दी-जल्दी फांसी के मर्सी पिटीशन सिलटाने को प्रेरित किया है। लेकिन आंकड़े इसकी पुष्टि नहीं करते।
    आंकड़े बताते हैं कि भारत में 2001 से 2011 के बीच में 1455लोगों को फांसी की सजा दी गयी और 4321लोगों की फांसी माफ करके उसे आजन्म कैद में बदला गया । इस अवधि में यूपी में 370 को फांसी दी गयी,बिहार में132,महाराष्ट्र 125, कर्नाटक 95,तमिलनाडु 95,पश्चिम बंगाल 79,दिल्ली 71,गुजरात 57,राजस्थान 38,केरल 34,उड़ीसा 33,हरियाणा31, असम 21,जम्मू-कश्मीर 20,पंजाब 19,छत्तीसगढ़ 18,उत्तराखण्ड 16,आंध्रप्रदेश 8, मेघालय 6,चंडीगढ़,दमन एवं दीउ में प्रत्येक में 4-4,हिमाचल प्रदेश3,मणिपुर 3, त्रिपुरा 2,पांडिचेरी 2 और गोवा में 1 अभियुक्त को फांसी की सजा दी गयी।
हाल ही में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कर्नाटक-तमिलनाडु में सक्रिय चंदन माफिया वीरप्पन के 4 साथियों की मर्सी पिटीशन खारिज कर दी है।अब जल्दी ही उनको भी फांसी देदी जाएगी। इनलोगों पर 9अप्रैल 1993 में पालार में  5पुलिसकर्मियों, 15 पुलिस मुखबिरों और 2 वनकर्मियों सहित 22 लोगों को बारूदी सुरंग के जरिए विस्फोट करके हत्या कर देने का आरोप है।इस मामले की बिडम्बना यह है कि दोषी पाए गए  4में से 2 अपराधियों को पहले अदालत ने आजन्म कैद की सजा सुनाई। बाद में 2004 में सुप्रीमकोर्ट ने चारों को फांसी की सजा सुना दी। जिन अपराधियों की मर्सी पिटीशन राट्रपति ने खारिज की है उनके परिवारीजनों को अभी तक इसकी कोई आधिकारिक जानकारी तक नहीं दी गयी है।
   इसके अलावा राष्ट्रपति ने 7 अन्य मामलों में फांसी की सजा पाए अपराधियों के मर्सी पिटीशन को खारिज करके भेज दिया है। इनसब सूचनाओं को देखकर यह आभास मिलता है कि राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने तेजी से मर्सी पिटीशन सिलटाने के काम को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है।
    जिस तरह आतंकी अफज़ल गुरू की फांसी के खिलाफ कश्मीर में उत्तेजना है । ठीक इसी तरह की स्थिति कर्नाटक और तमिलनाडु के उन इलाकों में भी हो सकती है जो चंदन माफिया वीरप्पन के प्रभावक्षेत्र में रहे हैं।एक जमाना था चंदन माफिया वीरप्पन के प्रभाव में कर्नाटक- तमिलनाडु की 50 विधानसभा सीटें हुआ करती थीं और सभी राजनीतिक दल उससे मदद मांगते थे।
सारी दुनिया में जिस तरह मानवाधिकारों की चेतना बढ़ रही है उसी अनुपात में न्याय और दण्ड को रूपान्तरित करने की मांग भी बढ़ रही है।
    सारी दुनिया में फांसी की सजा खत्म करने के खिलाफ आवाजें उठ रही है। लेकिन भारत में अभी तक फांसी के खिलाफ आम जनता से लेकर राजनीतिकदलों तक इस मसले पर आम राय नहीं बन पायी है। इस मसले पर मानवाधिकार संगठन एकस्वर से फांसी की सजा को खत्म करने की मांग कर रहे हैं। लेकिन वोटबैंक की राजनीति इस मामले में सभी राजनीतिकदलों को एकमत राय कायम करने से रोक रही है।
राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की फांसी पर सक्रियता का एक और कारण है हाल ही में उठा हेलीकॉप्टर घोटाला कांड।इटली के हेलीकॉप्टर सौदे को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के 2005 में रक्षामंत्रीकाल में मंजूरी दी थी और यह मसला इटली की अदालत में विगत 8महिनों से चल रहा है। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व इस केस के बारे में जानता है। इस समूची प्रक्रिया में राष्ट्रपति पर आंच न आए इसके लिए ध्यान हटाने की रणनीति के तहत राष्ट्रपति की फांसी के खिलाफ मर्सी पिटीशनों पर सक्रियता बढ़ा दी गयी है। जिससे उनको बेदाग रखा जा सके। यदि हेलीकॉप्टर घोटाले में घूसखोरी के आरोप इटली की अदालत में सिद्ध होते हैं तो यह भारत के लिए बहुत  शर्मनाक होगा।     

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

हिन्दी साहित्य के जुगनूओं की बोगस दुनिया



हिन्दी लेखकों पर दलितलेखकों ने बहुत सही जगह आलोचनात्मक हमला किया है और इसके कारण हिन्दी के आलोचक दलितलेखकों से घबडाए हुए बात करते हैं। प्रार्थनाशैली में बात करते हैं,झूठी प्रशंसाभाव करते हैं। इस आलोचना का सामाजिक परिणाम यह निकला कि हिन्दी के एक नामी कथाकार को 60साल बाद पता चला कि वह आरक्षित जाति में आता है। अब समझ जाइए इस शर्मनाक चालाकी को कि ये 60साल तक साहित्य की मलाई खाते रहे। जबकि साहित्य को कोटि को ही दलित लेखक नहीं मानते। वे कहते हैं यह वर्णवादी कोटि है। वे दलितसाहित्य की नई कोटि की हिमायत करते हैं। अब सवर्णलेखक अपने पूर्वजों में दलितजाति खोज रहे हैं और बेशर्मी से कह रहे हैं मेरे पूर्वज दलित थे। असल में साहित्य की यह नई बीमारी है। वर्ण बीमारी।
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हिन्दी में लेखक-प्रोफेसर आए दिन गरीबीभरा अतीत, सत्ता के दबाब, ह्रासमेंट, विक्टमाइजेशन आदि के आए दिन किस्से सुनाते हैं और सहानुभूति जुगाड़ करने की कोशिश करते हैं। ये साहित्य के थोथे किस्से हैं। थोथे किस्सों से लेखक- प्रोफेसर समझ में नहीं आता।
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यह दौर अमीरों पर भी तबाही लेकर आया है किंगफिशर और सहारा के मालिकों पर जिस तरह कानून की गाज गिरी है उसने कारपोरेट ईमानदारी को नंगा कर दिया है।
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हिन्दी में जो लोग कहते हैं साहित्य की गोष्ठियां और धड़ेबंदी महान बनाती है वे जरा रामविलास शर्मा से सीखें कि किस तरह साहित्य साधना महान बनाती है. हिन्दी के ज्ञानी गुणी और पुरस्कार प्राप्त लेखक शोहरत के नशे में इस कदर डूबे हैं कि वे रामविलास शर्मा की पूजा करना जानते हैं लेकिन उनसे कोई बात सीखना नहीं चाहते। यह बीमारी बड़े लेखक -आलोचक से लेकर नए लेखकों तक फैली हुई है।
जो लेखक अपनी भाषा के साहित्यकार की मूल्यवान बातों को ग्रहण नहीं करते वे जल्द ही अंतर्ध्यान हो जाते हैं। वे साहित्य में जुगनू की तरह हैं।
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हिन्दी में चुगद किस्म के लेखकों की भीड़ पैदा हो गयी है,इनमें कुछ नामी लेखक भी हैं , अकादमी पुरस्कार प्राप्त हैं , ये लोग अहर्निश आत्मप्रशंसा में लीन रहते हैं, आत्मप्रशंसा कोसाहित्य का चुगद भाव कह सकते हैं।ये लोग कम से कम लिखते हैं, हेकड़ी,शोहरत और दौलत के शुरूर में डूबे रहते हैं। इन लेखकों को मंन्नू भंडारी,मृदुलागर्ग,मैत्रेयी पुष्पा जैसी लेखिकाओं से अभी बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। इन लेखिकाओं ने बिना किसी अंहकार, हेकड़ी, चमचागिरी के किस तरह हिन्दी साहित्य को श्रेष्ठतम रचनाएं दी हैं। खासकर मैत्रेयी पुष्पा ने तो कमाल किया है उसने बहुत कम समय में अनेक श्रेष्ठ उपन्यास दिए हैं।
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जब पाठक लेखक के सामने हां -हां करता रहता है और लेखक की महानता का जयगान करता रहता है तो इस तरह के पाठक को हिन्दी का लेखक सुधीपाठक - जागरूकपाठक कहता है।
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कोलकाता से दिल्ली,दिल्ली से मद्रास तक हिन्दी के जो लेखक सनसनाते चमचों के साथ मस्ती लेते नजर आते हैं और यह दावा करते हैं वे बेहद जनप्रिय हैं। वे एक सामान्य तथ्य की उपेक्षा करते हैं.वह यह कि हिन्दी के अधिकांश लेखकों से हिन्दीभाषी लड़कियां मिल नहीं पातीं या मिलना तक नहीं चाहतीं।
मसलन् आपको लेखक के इर्दगिर्द 3-4चार चमचे मिल जाएंगे, लेकिन चमचागिरी करते लड़की नजर नहीं आएगी।
कहने का अर्थ है कि लेखक को चमचाकल्चर को साहित्यसंस्कृति समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।
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आप यात्री की तरह कोलकाता को देखेंगे तो आपको यह शहर कभी समझ में नहीं आएगा।आज के दिन यही लगेगा कि यह शहर सरस्वती पूजा में डूबा है ,लेकिन यथार्थ एकदम विलोम है और भयावह है।
देश में बलात्कार के मामलों में यह राज्य विगत आठ सालों में टॉप पर है। अभी कुछदिन पहले ही एक शिक्षित परिवार के लोगों ने अपनी वृद्धा माँ को पीट-पीट कर अधमरा कर दिया और बाद में उसकी मौत हो गया। मुहल्ले के लोगों के दबाब में पूरे परिवार,जिसमें उस औरत का पति,बेटा,बहू आदि को गिरफ्तार करना पड़ा। पता चला वृद्धा को विगत दो सालों से अहर्निश यातनाएं दी जा रही थीं। इस तरह की औरतों को यातना की घटनाएं यहां आम हो गयी हैं। इसके बावजूद आप यदि सरस्वती पूजा के रस में निमग्न हैं तो रहें लेकिन इससे स्त्री के सम्मान और सुख का पता नहीं चलता। कोलकाता आज स्त्री के लिए सबसे त्रासद शहर में तब्दील हो चुका है। यदि आपके पास साहित्यिक नजरिया है तो आपको औरत की बदहाल अवस्था नजर क्यों नहीं आती ?
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हिन्दी आलोचक का ईंधन है ईर्ष्या ! ये बेचारे नहीं जानते इससे निजी ब्लडप्रेशर हाइ रहता है।
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हरिशंकर परसाई ने लिखा है - "श्रद्धेय, बड़े बौड़म लगते हैं। "
ये पंक्तियां हमारे उन तमाम लेखकों को अपने सीने पर लगानी चाहिए जो नगरी-नगरी श्रद्धालु खोजते फिर रहे हैं।
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हरिशंकर परसाई ने लिखा है -" देश में जो मौसम चल रहा है उसमें श्रद्धा की टांग टूट चुकी है। " क्या हिन्दीलेखक गण सुन रहे हैं ?
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हिन्दी में महानता का ढ़ोंग वे ज्यादा कर रहे हैं जो आत्ममुग्ध हैं और आत्मप्रशंसा में लीन हैं। ये लोग पढ़ते कम हैं हांकते ज्यादा हैं। भक्ति ( चाटुकारिता) करने वालों को ज्ञानी मानते हैं।
सवाल यह है कि यदि इस तरह के लोग ज्ञानी हैं तो लिखकर आम पाठकों को अपने ज्ञान से लाभान्वित क्यों नहीं करते ? ज्ञान पेट में रखने की चीज नहीं है अन्य को बताने की चीज है।
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हरिशंकर परसाई ने विकलांग श्रद्धा का दौर निबंध में लिखा है- "यह चरण छूने का मौसम नहीं ,लात मारने का मौसम है।मारो एक लात और क्रांतिकारी बन जाओ।"
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मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

फेसबुक और पुस्तकमेला



कोलकाता पुस्तकमेला में साहित्यिक पत्रिकाओं का सबसे बड़ा पंडाल होता है और उसमें अनेक लेखक अपनी पत्रिकाएं लिए बैठे रहते हैं। कुछ मेले में बिक्री करते भी नजर आते हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं के स्टॉल देखने लायक होते हैं। जिस पुस्तकमेले में साहित्यिक पत्रिकाओं का वैभव दिखता है वहां पर साहित्यप्रेम की जड़ें गहरी होती हैं।
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कोलकाता बुकफेयर में देश के बड़े लेखक और विचारक जितनी बड़ी तादाद में भाग लेते हैं और तरह -तरह के विषयों पर भाषण देते हैं वह अपने आप में विलक्षण अनुभव है यह अन्यत्र दुर्लभ है। इस मेले का आयोजन राज्य सरकार की मदद से प्रकाशक गिल्ड करता है।
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कोलकाता पुस्तकमेला में रविवार-शनिवार को इतनी भीड़ होती है कि आपको लोगों से सटकर चलना-निकलना होता है। औसतन 7-8लाख आते हैं। 15दिन तक चलने वाले मेले में कुल मिलाकर 35-40लाख लोग आएंगे।
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मुंबई में दौलत है और लाखों शिक्षितजन हैं। दिल्ली में पैसा है,शोहरत है,सत्ताकेन्द्र हैं,मध्यवर्गीय लेखकों की हेकड़ी है ,लेकिन बुकफेयर में भीड़ नहीं है। कोलकाता में न सत्ता है,न शोहरत है, न पैसा है,किताबें ही किताबें हैं और लाखों की भीड़ है। किताबों के खरीददार हैं। मुंबई,दिल्ली,मद्रास आदि किसी भी शहर में बुकफेयर में लोग सपरिवार बुकफेयर नहीं जाते लेकिन कोलकाता में सपरिवार बुकफेयर जाने का रिवाज है।
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जयपुर साहित्य मेले को टीवीवालों ने जिस तरह से प्रायोजित कवरेज के जरिए उछाला और साहित्य के नाम पर नॉनसेंस का प्रचार किया,जयपुर मेले की जनता की शिरकत को जिस तरह सनसनीखेज ढ़ंग से पेश किया उसे देखकर यही आभास मिलता है टीवीवालों ने साहित्यमेले देखे नहीं हैं।
कोलकाता पुस्तकमेला वास्तव अर्थ में पुस्तकमेला है। यहां सालाना मेले में 20करोड़ का कारोबार होता है और इसमें बहुत बड़ा हिस्सा निजी खरीद का है। इस मेले में किसी भी किस्म का कारपोरेट प्रायोजन नहीं है। यहां कोई पांचसितारा लॉन,हॉल और पण्डाल नहीं है,कोई टीवी पर सनसनीखेज कवरेज नहीं है लेकिन स्थानीयस्तर पर आम जनता की शिरकत मन को मुग्ध कर लेती है।
कोलकाता बुकफेयर में बड़ी तादाद में बूढ़े मर्द और औरतों को देख पाएंगे। ये वे लोग हैं जो बुद्धिजीवी हैं या पढ़ने के शौकीन हैं। जयपुर -दिल्ली बुकफेयर या साहित्यमेले में बूढ़े नहीं दिखते। किताबें हैं लेकिन बूढ़े नहीं हैं,यह चिन्ता की बात है। पुरानी किताब और पुराना पाठक समाज की शक्ति हैं।
हर मध्यवर्गीय बंगाली के घर में बच्चे को बुकफेयर के लिए अलग से पैसे हर साल दिए जाते हैं। बुकफेयर उनके सालाना-दैनन्दिन बजट का वैसे ही हिस्सा है जैसे वे अन्य चीजों पर खर्च करते हैं। काश ,बाकी महानगरों के शिक्षितलोग कुछ कोलकातावासी बंगालियों से यह सीख पाते !
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कोलकाता बुकफेयर का सबसे दुखदपक्ष है हिन्दीभाषियों की कम से कम शिरकत। यह शहर मारवाडियों से भरा पड़ा है। इनलोगों की सैंकड़ों संस्थाएं हैं। भारतीय भाषा परिषद जैसी शक्तिशाली संस्था है लेकिन इस संस्था का कोलकाता बुकफेयर में एक स्टॉल तक नहीं है। हिन्दी की पत्रिकाएं कहीं पर भी नजर नहीं आतीं। गिनती की तीन-चार हिन्दी किताबों की दुकान हैं। हिन्दीक्षेत्र के प्रकाशक यहां आते नहीं,कोलकाता में रहने वाले हिन्दीभाषी बुकफेयर जाते नहीं।जबकि कोलकाता में 50 लाख से ज्यादा हिन्दीभाषी लोग रहते हैं। कोलकाता के बाजार पर इनका एकाधिकार है। सारा बिजनेस नियंत्रित करते हैं।
एक ही शहर में रहने वाले मध्यवर्गीय बंगाली परिवारों और हिन्दीभाषी मध्यवर्गीय परिवारों में बुकफेयर को लेकर अंतर साफ देख सकते हैं। बंगाली बुकफेयर जाता है हिन्दीभाषी नहीं जाता। हिन्दीभाषियों की कमाने-खाने और सोने की आदत ने बुककल्चर को यहां के हिन्दीभाषियों में विकसित नहीं होने दिया।
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कोलकाता बुकफेयर का कोलकाता के हिन्दी लेखकों,हिन्दी के कॉलेज-विश्वविद्यालय शिक्षकों आदि पर न्यूनतम असर है। इनमें से अधिकांश लोग किताबें नहीं खरीदते और किताबें नहीं पढ़ते। वे हिन्दी में हांकते बहुत हैं। कोलकाता के हिन्दी के तथाकथित लेखक -शिक्षक आपको किताब खरीदने के लिए प्रेरित नहीं करेंगे। यदि आप किताब खरीद रहे हैं या किताब पर बात करना चाहते हैं तो हतोत्साहित जरूर करेंगे।
मसलन् आपने काशीनाथ सिंह की कोई किताब खरीदी और पूछा कि यह किताब कैसी है तो हिन्दी शिक्षक कहेगा अरे यार ,यह क्या है, मेरी तो कल ही काशीजी से एक घंटा बात हुई थी। पाठक भौंचक्का रह जाता है कि कमाल के लोग हैं ये ,मेरे किताब खरीदने और इनके 1घंटा काशीनाथ से बात करने के बीच में क्या रिश्ता है ?
कहने का आशय यह कि कोलकाता के हिन्दी के शिक्षकों-लेखकों ने किताब पढ़ने-पढ़ाने और लेखक पर बात करने की संस्कृति को विकसित ही नहीं किया। इसके विपरीत बंगाली शिक्षक-लेखक यह सब नहीं कहता।
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कोलकाता बुकफेयर ज्ञानसमुद्र है। यहां सनसनी नहीं बिकती। यहां किताबें बिकती हैं। जयपुरमेले पर जो संपादक और मीडिया महर्षि वाह-वाह और आह-आह कर रहे थे वे सोचें कि कोलकाता बुकफेयर में सलमान रूशदी को रोका गया ,मीडिया में खबर बनी और बात खत्म हो गयी। साहित्य में सनसनी नहीं होती।
यहां रोज लेखक एक से बढ़कर एक बेहतर बातें कहते हैं लोग सुनते हैं,मीडिया में रिपोर्ट होती हैं,लेकिन वे सनसनी नहीं बन पातीं। अमर्त्यसेन से लेकर गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक तक विश्वविख्यात लेखक आए ,अपनी बात कही और चले गए।असल में साहित्य एक कम्युनिकेशन है। वह कलह, सनसनी, पुलिस,थाना,मुकदमा नहीं है। जयपुरमेले ने साहित्य को साहित्य नहीं रहने दिया ,उसने साहित्य की मान-मर्यादा भ्रष्ट की है।
कुछ तो कोलकाता बुकफेयर से सीख सकते हैं मीडियावाले !!
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हिन्दी में जो लोग कहते हैं नवजागरण हो गया या हुआ था वे सही नहीं कहते। पुस्तक संस्कृति विकसित किए बिना नवजागरण नहीं होता। हिन्दी में सबकुछ है लेकिन पुस्तक संस्कृति नहीं है।
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हिन्दी लेखक दिल्ली में लाला की दुकान की शोभा बढ़ाते हैं ,किताबें नहीं खरीदते । यहां कोलकाता में बुकफेयर में लेखक मिलेगा लेकिन लाला की दुकान पर शोभा बढ़ाते नहीं ,बल्कि किताबें खरीदते हुए मिलेगा,पाठकों से बात करते मिलेगा,पाठकों को आशीर्वाद देते मिलेगा।
एकबार बुकफेयर में मैं महाश्वेता देवी से बातें कर रहा था देखा एक लड़की आई और उसने पैर छुए और उसकी माँ ने कहा आप लेखिका हैं,इसे आशीर्वाद दीजिए, इसकी हाल ही में शादी हुई है,यह आपका आशीर्वाद लेने बुकफेयर आई है।

सत्यजित राय के सपनों का अंत


            
 पश्चिम बंगाल में विलक्षण फिनोमिना देखने में आया है। यहां पर नेता एक-दूसरे की नकल में व्यस्त हैं। राजनीति में नकल सबसे बुरी छवि बनाती है। राजनेता का अनुकरणीयभाव कभी नए की सृष्टि नहीं करता। बुरी नीतियों का तबाही मचा सकता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जिस पार्टी (माकपा) से सबसे ज्यादा नफरत करती हैं व्यवहार में उसी पार्टी की गलत नीतियों का इन दिनों अनुसरण कर रही हैं। हाल ही में राज्य सरकार संचालित फिल्म लेबोरेटरी रूयायन को बंद किए जाने का ममता सरकार ने मन बना लिया है। रूपायन लेबोरेटरी का स्टूडियो  सॉल्टलेक सेक्टर -5 में है और इस स्टूडियो के पास अपना बहुत बड़ा फिल्मी जखीरा है। यह राज्य में फिल्म संपादन की एकमात्र लेबोरेटरी है। सॉल्टलेक में इसके पास 2.5 एकड़ जमीन है जिसमें एक एकड़ में लेबोरेटरी है और बाकी जमीन का अन्य कामों में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस लेबोरेटरी में फिल्म संपादन की तमाम अत्याधुनिक सुविधाएं और तकनीक उपलब्ध है लेकिन पेशेवर लोग नहीं हैं।
     इनदिनों इस लैब में बंगाली फिल्मकार अपनी फिल्मों का संपादन कम करते हैं,ज्यादातर फिल्मकार फिल्म संपादन के लिए चेन्नई जाते हैं.वाममोर्चा शासन के अकुशल प्रबंधन ने इस लेबोरेटरी को कबाड़ बनाया। वामशासन की मंशा थी कि इसे निजीक्षेत्र के हवाले किया जाय।
   ममता सरकार आने के बाद बंगाली फिल्मकार उम्मीद कर रहे थे कि इस लेबोरेटरी को नए सिरे से संगठित किया जाएगा। लेकिन ममता बनर्जी ने भी वही रास्ता पकड़ा जो वाम मोर्चा सरकार ने पकड़ा। 
राज्य सरकार के सूत्रों के अनुसार ममता बनर्जी के निर्देश पर इसे बंद करने का फैसला लिया जा चुका है और इसमें काम रहे सभी 49कर्मचारियों को वीआरएस देने का फैसला ले लिया गया है।
    उल्लेखनीय है कि रूपायन इस राज्य की बेहतरीन फिल्म संपादन लेबोरेटरी है .विगत बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार इस लैब को जीन्यूज को औने-पौने दामों पर बेचने का फैसला लेचुकी थी .लेकिन उस समय यहां के सभी संस्कृतिकर्मियों और फिल्मी हस्तियों के जमकर प्रतिवाद किया। फलतः वाम सरकार को फैसला बदलना पड़ा और इसे बीमार उद्योग घोषित करके पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिए नए सिरे संगठित करने का फैसला लिया गया। संयोग की बात है कि जब यह फैसला लिया  गया उसके कुछ महिने बाद ममता बनर्जी की सरकार आ गई और रूयायन को नए सिरे से संगठित करने का फैसला ठंड़े बस्ते में चला गया। दो सप्ताह पहले ममता सरकार को ख्याल आया कि रूपायन लेबोरेटरी को बंद कर दिया जाय।
   रूपायन को समूचे उत्तर-पूर्वी राज्यों में श्रेष्ठतम फिल्म लेबोरेटरी माना जाता है। इसमें बंगाली ,असमिया,संथाली,उड़िया, मणिपुरी,  भोजपुरी,नागपुरी, छत्तीसगढ़ी फिल्मों के संपादन के अलावा बड़े पैमाने पर डबिंग का काम भी होता रहा है। इसके अलावा बंगलादेश की फिल्मों के संपादन के काम में इस लेबोरेटरी की बड़ी भूमिका है।
   आधिकारिक तौर पर रूपायन लेबोरेटरी पश्चिम बंगाल फिल्म विकास निगम के तहत संचालित संगठन है। पश्चिम बंगाल फिल्म विकास निगम की आय में वामशासन काल में ही गिरावट आनी शुरू हो गई थी और इस संगठन पर कर्ज का आर्थिक बोझ बढ़ गया था। नई सरकार ने इस समस्या पर विचार ही नहीं किया और सीधे  लेबोरेटरी बंद करने का फैसला ले लिया है।
  उल्लेखनीय है ममता सरकार आने के बाद संस्कृति के क्षय की जो प्रक्रिया में तेजी आई है। सत्ता ने संस्कृति के संरक्षण के काम को त्याग दिया है।  अब संस्कृति संरक्षण के नाम पर सत्ता के संसाधनों का अपव्यय हो रहा है। जो राज्य संस्कृति संरक्षण के लिए विख्यात खा आज सांस्कृतिक अपव्यय में सर्वोपरि है।  राज्य सरकार की संस्कृति के विकास और नवनिर्माण में कोई दिलचस्पी नहीं है। ममता बनर्जी संस्कृति का जितना गायन कर रही हैं उससे कई गुना ज्यादा बुनियादी क्षति कर रही हैं। वे नई नई योजनाएं घोषित कर रही हैं, शिलान्यास कर रही हैं,मेले-समारोह-उत्सव-जलसे कर रही हैं। इससे यह आभास मिलता है कि ममता की संस्कृति में गहरी दिलचस्पी है लेकिन इसके ठीक विपरीत वे सत्ता में बैठकर इस तरह के फैसले ले रही हैं जिससे पश्चिम बंगाल का सांस्कृतिक और बौद्धिकवैभव क्षतिग्रस्त हो रहा है। रूपायन के बंद करने का फैसला सत्यजित राय के सपनों का अंत है। यह लेबोरेटरी उनके सपने की उपज है।यह वही लेबोरेटरी है जिसमें सत्यजित राय की महान फिल्म पाथेर पांचाली तैयार की गयी।इस लेबोरेटरी के साथ बंगाल के अग्रणी फिल्मकारों की स्मृतियां जुड़ी हैं। यह बिडम्बना है कि एक तरफ मता सरकार राज्य में फिल्म उद्योग को चंगा करने के लिए 20करोड़ रूपये खर्च करके नई फिल्म सिटी बनाने र शाहरूख खान को ब्रॉण्ड एम्बेसडर बनाकर यश कमाना चाहती है वहीं दूसरी एर रूपायन को बंद करने जा रही है। रूपायन के साथ टॉलीबुड की यादें जुड़ी हैं। रूपायन के बंद होने का अर्थ है टॉलीवुड के एक बड़े अध्याय का अवसान।
   उल्लेखनीय है कोलकाता में प्रतिवर्ष 35-40 बंगला फिल्में रिलीज होती हैं और तकरीबन 50 करोड़ रूपये का कारोबार करती हैं। राज्य में 522 सिनेमा पर्दे हैं इनमें मात्र 52 डिजिटल पर्दे हैं।राज्य में फिल्म संस्कृति के विकास के लिए राज्य सरकार को तेजी से सिनेमाघरों के नवीनीकरण के लिए कार्ययोजना बनानी चाहिए। इसके अलावा रूपायन को बंद करने का फैसला वापस लेना चाहिए।    




सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

अफजल गुरु को फांसीःभाजपा की बेचैनी बढ़ी


          
शुक्रवार 8फरवरी को शाम 5बजे अफजल गुरू को सूचना दी गयी कि 9फरवरी को सुबह उसे 8 बजे फांसी दी जाएगी। शुक्रवार शाम को उसे फांसी घर के पास की बैरक में ले जाया गया , जो फांसीघर से करीब 30 कदमों की दूरी पर था। रास्ते में पड़ने वाले बैरकों से कैदियों को हटा दिया गया था, ताकि किसी को इस बात की भनक तक न लग सके।फांसी घर में अफजल का वजन तोला गया।लम्बाई नापी गयी। ताकि फंदे की रस्सी उसका वजन सह सके।  तमाम जरूरी चीजें देख लेने  के बाद अफजल को उसके बैरक में भेज दिया गया। जेल अधिकारियों ने उससे पूछा कि अगर कोई चीज़ चाहिए हो तो बता दे। इस पर अफजल ने कहा कि उसे कुरान चाहिए।फांसी के पहले उसने कुरान पढ़ी। 9फरवरी की सुबह सात बजे उसका रक्तचाप देखा गया और आठ बजे फांसी पर लटका दिया गया ।उसके तत्काल बाद टीवी चैनलों को कहा गया कि अफजल गुरू को फांसी दे दी गयी है। इसी दौरान फांसी घर के सामने ही अफजल के लिए कब्र खोद ली गई  और इस्लामिक रीति-रिवाजों के मुताबिक मौलाना की मौजूदगी में नमाज-ए-जनाजा पढ़ी गई और उसे दफन कर दिया गया।
उल्लेखनीय है अफजल गुरु का मर्सी पिटीशन 3 फरवरी को खारिज हुआ।4फरवरी को गृह मंत्रालय ने मोहर लगायी और अदालत से 9फरवरी को फांसी दिए जाने का आदेश ले लिया गया। इस समूची प्रक्रिया को गोपनीय रखा गया। यहां तक कि फांसी की तिथि को उसके परिवारीजनों से भी छिपाकर रखा गया।  उल्लेखनीय है 12 साल पहले 13 दिसंबर 2001 को देश की संसद पर सफेद एंबेसडर कार में सवार होकर आए 5 आतंकियों ने हमला किया था।  इन हमलावरों को स्थानीयस्तर पर सभी किस्म की  सुविधाएं मुहैय्या कराने का काम अफजलगुरु ने किया था। वह हमला होने के 5मिनट पहले तक आतंकियों से मोबाइल के जरिए जुड़ा था और लगातार सूचनाएं दे रहा था। उसने कभी अपने किए पर पश्चाताप नहीं किया और अदालत में अपना अपराध स्वीकार किया।
अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के साथ ही आतंकी संगठनों में एक बड़ा संदेश गया है कि भारत उसके लिए ऐशगाह नहीं है। पकडे जाने पर मौत तय है। इस फांसी का एक अर्थ यह भी है मनमोहन सरकार अपनी प्रशासनिक सक्रियता का भी दावा कर सकती है। इससे प्रकारान्तर से भाजपा को थोड़ा विचारधारात्मक धक्का लग सकता है। कसाब और अफजलगुरु को फांसी देकर कांग्रेस ने भाजपा के उन्माद पैदा करने वाले दो आईकॉन छीन लिए हैं। लेकिन इससे मुस्लिम वोटबैंक पर कोई असर नहीं होगा।
अफजलगुरु को फांसी दिए जाने पर सरकार दावा कर रही है कि उसने न्याय प्रक्रिया का पालन किया है।सरकार एक हद तक सही कह रही है।  लेकिन कई सवाल उठ रहे हैं जिनका केन्द्र सरकार को भविष्य में जबाब देना होगा। मसलन् अफजल गुरु की मर्सी पिटीशन खारिज होने के बाद सरकार ने उसकी पत्नी को खबर क्यों नहीं दी ? फांसी दिए जाने से पहले परिवारीजनों को खबर क्यों नहीं दी ? अफजल गुरू का परिवार भारत में रहता है और वे भारत के नागरिक हैं। उसके शरीर को दफनाए जाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।    
शनिवार की सुबह टीवीवाले कह रहे थे अफजल की फांसी के बारे में किसी को पता नहीं था ।लेकिन यह झूठ है,संबंधित जेल अधिकारियों,गृहमंत्रालय के उच्च अधिकारियों, जम्मू-कश्मीर  राज्य सरकार को पहले बता दिया गया कि अफजल को फांसी किस दिन और किस समय दी जाएगी।
  आतंक के मामले में सरकार को सत्ता और न्याय के वर्चस्व के आधार पर देखना चाहिए।सत्ता और न्यायपालिका ने आतंक के मुकाबले अपना वर्चस्व स्थापित किया है। अफजलगुरू की फांसी के बाद एक दार्शनिक सवाल भी उठा है फांसी देने के बाद अभियुक्त के शरीर का मालिक कौन है ?  व्यक्ति का परिवार मालिक है ? या सरकार मालिक है ? क्या फांसी के बाद आतंकी के शरीर का स्वामित्व सरकार का होगा ?  
अफजल गुरू ने आतंकी गिरोह में शामिल होकर अपने को आतंकी बनाया, लेकिन उसके एक एक्शन ने उसके पूरे परिवार,नाते,रिश्तेदारों आदि का वर्तमान और भविष्य सब कुछ नष्ट कर दिया। वह आतंकी बना और उसने अपने सभी मानवाधिकार खो दिए । साथ ही प्रकारान्तर से अपने रिश्तेदारों के भी मानवाधिकार और सामाजिकता को हमेशा के लिए कलंकित कर दिया।नष्ट कर दिया। एक आतंकी स्वयं को ही नष्ट नहीं करता अपितु पूरे कुनबे के वर्तमान और भविष्य को नष्ट कर देता है।

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

मुक्तिबोध और फेसबुक

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लाभ-लोभ से प्रेरित समझदारी ने मौजूदा संकट पैदा किया है। इस संकट को हम राजनीति से लेकर साहित्य तक सुरसा की तरह विराटरूप में देख रहे हैं। लाभ-लोभ से प्रेरित समझदारी के आप जितने गुलाम होते जाएंगे आप उतने टुच्चे,कमीने,भ्रष्ट और ओछे होते चले जाएंगे।

-2-

भीड़ और जुलूस में शामिल होने का अर्थ है आंतरिक व्यक्तित्व का संहार। जिन लोगों ने जुलूस को महान बनाया वे सोचें कि जुलूस महान कर्म है तो भीड़ का हमला भी महानता का डंका बजाएगा।

-3-

जो फटेहाल है,सामान्य है, उसे मान्यता देने के लिए कोई हिन्दीवाला विद्वान तैयार नहीं है। वे रावण की दासता स्वीकार करने की नेक सलाह देते हैं। वे समझदारी को पागलपन कहते हैं। व्यवहारवादी को दुनियादार कहते हैं। यदि उनके गुट में है तो समझदार है, और अन्य के गुट में हैं या किसी गुट में नहीं हैं तो बेबकूफ है,घटिया है,बोगस है। इस तरह की मनोदशावाले हिन्दीवाले वस्तुतःनैतिक और दैहिक तौर पर मृतवत् हैं। उनके यहां नैतिकता का अर्थ सौदेबाजी और अवसरवादिता है।

-4-

गधे को काका कहो। शैतान से समझौता करो। बड़ों की हाँ में हाँ मिलाओ ।यह बुर्जुर्गों ने सिखाया। सारी प्रगतिशीलता इस बीमारी से ग्रस्त है।

-5-

भ्रष्टाचार,अवसरवादिता और अनाचार वस्तुतःबुजुर्गों की देन हैं.यही बुनियादी कारण युवाओं की बुर्जुर्गों के प्रति कोई आस्था नहीं बची है।

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कोर्स के लिए गेसपेपर लेखन वेश्यावृत्ति है।

-7-

हिंदी के शिक्षितों और खासकर लेखक-बुद्धिजीवियों की यह बीमारी है कि ये अपनों से ऐंठना और अपनों की उपेक्षा करना जानते हैं।वे अपनों को गले पड़ी चीज समझते हैं।

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इस दौर में धुन का पक्का होना जरूरी है,इसके बिना आप कुछ भी नया रच नहीं सकते और नहीं नया सोच सकते हैं। यह दौर मनुष्य को उसकी धुन से वंचित करके बोरा बनाने में लगा है। जो धुन हो वो करो।

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हिंदी की चरणस्पर्श संस्कृति की विशेषता है जब एकबार इसके चक्कर में फंसे तो फिर इससे बाहर कभी नहीं निकल सकते।

-10-

हिन्दीवाले की मनोदशा पर जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में सही लिखा था-

' सब मत्त लालसा घूँट पिये '.

-11-

महिला के ये रूप बड़े खतरनाक हैं- डॉन,(अनुसूया,म.प्र. की शराब डॉन और संतोषी), महिला डकैत, अधिनायकवादी राजनेत्री।

-12-

हिन्दी के प्रोफेसरों ने आत्म-श्रेयवाद और प्रतिष्ठावाद के नाम पर सारे नियम तोड़े हैं और साहित्यिक भ्रष्टाचार फैलाया है। वह अपने सुख की आराधना को साहित्य का महाधर्म मानता है। बल्कि यह साहित्य का भ्रष्टाचार है।

-13-

कोलकाता में बंगाली बच्चे सीधे चरण छूते हैं और लड़कियां खासतौर पर बड़े कायदे से सचमुच में चरणों को स्पर्श करके माथे से लगाती हैं।यह सारा खेल निस्वार्थ भाव से करती हैं। लेकिन हिन्दीवाला चरणस्पर्श नहीं करता घुटना स्पर्श करता है ,झुकता है लेकिन चरणों तक नहीं जाता। बड़ा चतुर है हिंदीवाला !!

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हिन्दी का प्रोफेसर चरण छुओ संस्कृति को निजी परिस्थितियों को सुधारने का वैध उपाय मानता है। इसे वह चारित्रिक संकट नहीं ,बल्कि समझदारी कहता है।

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सुबह फोन करके कई हिंदी प्रोफेसर गरिया चुके हैं। कह रहे हैं तुम बड़े बुरे हो । पेशे के कौशल का मखौल उड़ाते हो। मैंने कहा मैं जब पढ़ाता हूँ तब तक मास्टर हूँ ,बाद में नागरिक हूँ। मैं 24 घंटे प्रोफेसरभाव में नहीं रहता। वे बोले हम तो सारी जिंदगी प्रोफेसरभाव में रहते हैं। मैंने कहा आप धन्य हैं और महान हैं ! मैं तो सारी जिंदगी नागरिकभाव में रहना चाहता हूँ।

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हिंदी के प्रोफेसर में ज्ञान और कर्म के अनुष्ठान में विश्वास नहीं है। वह तिकड़मबाजी को कर्म और ज्ञान मानता है।

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मैं हिंदी का प्रोफेसर हूँ लेकिन चरण स्पर्श के अनुपम सुख से वंचित हूँ। मेरे पास सबकुछ है लेकिन नौकरी दिलाने का हुनर नहीं है। मित्र लोग कहते हैं नौकरी लेनी है तो जगदीश्वर के पास मत जाओ। यानी नौकरी दिलाने वाले शिक्षक अलग और पढ़ानेवाले अलग। मैंने दिल्ली में मित्रों से पूछा बोले हमारे यहां भी यह परंपरा है और मजबूत परंपरा है। जब दिल्ली-कलकत्ते में यह हाल है तो बनारस-प्रयाग-मुंबई में भी चरणस्पर्श की बयार जरूर बह रही होगी। काश! हिन्दीवाले के चरण न होते !!नौकरियां न होतीं !!

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हिन्दी शिक्षकों में चरणस्पर्श और चरणरज की महिमा अपरम्पार है। जो काम नियम,तर्क और ज्ञान से नहीं होता वह यहां चरणरज के स्पर्श से हो जाता है। चरणस्पर्श करो और मनवांछित फल पाओ।

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पुराने लोग कहते हैं गायदर्शन से पुण्य मिलता है लेकिन भैंस दर्शन होने पर क्या गाँठ का पुण्य भी चला जाता है ?

( उपरोक्त विचारों के प्रेक मुक्तिबोध हैं)