रविवार, 10 मार्च 2013

असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का दिल जीतने में जुटी ममता सरकार


     
       पश्चिम बंगाल का बजट आनेवाला है और राज्य का आर्थिक संकट गहरा हो गया है।नियमानुसार कोई राज्य अधिकतम जितना रूपया उधार ले सकता है उस सीमा तक ममता सरकार उधार ले चुकी है। आज स्थिति यह है कि राज्य को यदि किन्ही कारणों से जरूरत पड़े तो बैंक से लेकर बाजार तक कोई कर्ज नहीं मिल सकता। पिछले साल अक्टूबर2012 में राज्य सरकार के कर्मचारियों आदि की तनख्बाह –पेंशन आदि देने के लिए 45दिन के लिए 4000 हजार करोड़ का कर्ज लिया था। पिछले साल रिजर्व बैंक ने कर्ज के नियमों में दोबार ढ़ील देकर राज्य को 22,423करोड़ रूपये का कर्ज दिया। सन् 2012-13 के बजट दस्तावेज के अनुसार राज्य की कर से होने वाली अनुमानित आय 76,943करोड़ रूपये और व्यय 83,801 करोड़ रूपये आंका गया है। यानी अनुमानित बजट घाटा 6,585करोड़ रूपये का आंका गया है। लेकिन सन् 2013-14 में यह घाटा बढ़ जाने की संभावनाएं हैं। इसके अलावा राज्य पर इस साल कर्ज की रकम 2.26लाख करोड़ हो जाएगी। फलतःभारत के कर्जगीर राज्यों में उसका नाम सबसे ऊपर आ गया है। मार्च 2012 तक पश्चिम बंगाल के ऊपर 2,08,382 करोड़रूपये का कर्ज था मूलधन और ब्याज चुकाने के लिए उसे सालाना 23,199 करोड़ रूपये का भुगतान करना होगा। ममता के शासन में आने के बाद कर वसूली में सुधार आया है लेकिन राज्य सरकार की फिजूलखर्ची कम नहीं हुई है। इसके अलावा छठे वेतन आयोग का राज्य कर्मचारियों का एरियर का पैसा अभी तक नहीं मिला है। इसके कारण राज्य कर्मचारियों में क्षोभ बढ़ता जा रहा है। राज्य कर्मचारियों के ऊपर सरकार का दबाव है कि अपनी वफादारी वाम यूनियनों के प्रति खत्म करें और इंटक(तृणमूल कांग्रेस) के साथ अपने को जोड़ें। इसके अलावा राज्य सरकार 'मनरेगा' योजना को क बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में लागू करने जा रही है। ममता की यह चिन्ता है कि किसी भी तरह राज्य कर्मचारियों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का भरोसा हासिल किया जाय. यही वजह है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आनेवाले दिनों में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा संचालित  'मनरेगा' स्कीम को हथियार बनाने जा रही है। टीएमसी नेतृत्व का मानना है कि 'मनरेगा' योजना में दैनिक मजदूरी पानेवाले मजदूरों की दैनिक मजदूरी बढ जाती है तो वे इसे वाम के खिलाफ प्रचार में इस्तेमाल कर सकते हैं और इसी मंशा के तहत  पश्चिम बंगाल के 'मनरेगा' योजना में काम करने वाले मजदूरों की दैनिक पगार को प्रतिदिन 136रूपये से बढ़ाकर 151रूपये कर देने के प्रस्ताव को केन्द्र सरकार ने मान लिया है। 'मनरेगा' के मजदूरों की पगार में की गयी इस वृद्धि को ममता सरकार अपनी ओर से मजदूर हितैषी उपलब्धि के रूप में प्रचारित करने जा रही है। यह पगारवृद्धि एक अप्रैल 2013 से लागू होगी।
    ममता का मानना है यदि 'मनरेगा' को ठीक से लागू कर दिया जाय और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों में इसे एक उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया जाय तो मजदूरों के बड़े हिस्से को वाममोर्चे से विमुख किया जा सकता है। अब देखना यह है कि क्या 'मनरेगा' के मजदूरों की पगार में की गयी बढोत्तरी से ममता के वोट बैंक में कोई इजाफा होता है या नहीं ?
      उल्लेखनीय है कि वाममोर्चे के शासन के दौरान दो बार 'मनरेगा' मजदूरों की पगार बढ़ायी गयी थी लेकिन वामशासन इस स्कीम को लागू करने में असफल रहा। ममता सरकार में पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्री सुब्रत मुखर्जी को यह दायित्व सौंपा गया है कि वे 'मनरेगा' योजना के जरिए ममता का जनाधार बढाएं। पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी ने अप्रैल2012 के बाद से 'मनरेगा' की मजदूरी बढ़ाने के लिए केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय को 9 पत्र लिखे थे ,इसके पहले केन्द्र सरकार ने 'मनरेगा' मजूरी को एक अप्रैल 2012 से 130रूपये से बढ़ाकर 136 रूपये कर दिया था जिससे ममता सरकार खुश नहीं थी ,इसके बाद से राज्य के पंचायतमंत्री ने मजदूरी बढ़ाने के लिए 9पत्र लिखे। इन पत्रों के जबाव में पिछले सप्ताह केन्द्र सरकार ने उनको सूचित किया कि पश्चिम बंगाल में 'मनरेगा' मजदूरों की मजदूरी 136रूपये से बढ़ाकर 151रूपये की जाती है। इस बढोत्तरी को राजनीतिक हलकों में कांग्रेस के खिलाफ दबाव की राजनीति के रूप में देखा जा रहा है वहीं पर राज्य कांग्रेस अध्यक्ष ने इस तरह के किसी दबाव से साफ इंकार किया है।जबकि इस मजदूरी का कृषि मजदूरों के लिए 2011 के आधार पर निर्धारित उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और महंगाईभत्ते की दर से संबंध है। मजूरी कम से कम कितनी दी जाय यह तय है लेकिन अधिकतम की सीमा तय नहीं है। ममता शासन में 'मनरेगा' मजदूरी में 15रूपये की वृद्धि हुई है। लेकिन वामशासन के दौरान सन् जनवरी 2010 में 25 रूपये और जनवरी 2011 में 30रूपये की बढोत्तरी हुई थी।सामान्यतौर पर पश्चिम बंगाल में न्यूनतम दैनिक पगार 67 रूपये सन् 2005-06 में तय की गयी थी।
     उल्लेखनीय है कि 'मनरेगा' स्कीम में काम करने वाले मजदूरों को 9 राज्यों और 3 केन्द्रशासित क्षेत्रों में पश्चिम बंगाल से ज्यादा मजदूरी मिलती है।

गुरुवार, 7 मार्च 2013

हूगो चावेज और फेसबुक




वेनेजुएला के राष्ट्रपति हूगो चावेज नहीं रहे। वे लंबे समय से कैंसर से जूझ रहे थे।चावेज ने अपने कामों से वेनेजुएला और लैटिन अमेरिकी देशों पर जबर्दस्त असर पैदा किया था,फिदेल के बाद वे इस क्षेत्र के सबसे जनप्रियनेता भी थे और सारी दुनिया में अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष के सबसे बड़े प्रतीक भी थे.क्रांतिकारी चावेज को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि।
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वेनेजुएला के क्रांतिकारी नेता चावेज की विशेषता थी कि वे प्रति सप्ताह 40 घंटे से ज्यादा टीवी -रेडियो से सीधे अपने देश की जनता के साथ संवाद करते थे। वे लिखी स्क्रिप्ट देखकर भाषण नहीं देते थे और न उनके लिए कोई स्क्रिप्ट लिखी गयी। स्वतःस्फूर्त बोलना,सोचना और आम जनता की इलैक्ट्रोनिकी माध्यमों के जरिए लाइव प्रसारण के माध्यम से समस्याओं पर खुलकर विचार विमर्श करना उनकी आदत थी.अपने देश की जनता से वे किस हद तक जुड़े थे यह इस बात से समझ में आएगा कि उन्होंने अपने देश की जनता के साथ जो वायदे किए उनको काफी हद तक पूरा किया। क्रांति को पार्टी के ऑफिस से निकालकर आम जनता का औजार बनाया और क्रांतिकारी विचारों के पारदर्शी और अबाधित बहस-मुबाहिसे की अपने देश में स्वस्थ परंपरा डाली। चावेज ने समाजवाद,क्रांति और लोकतंत्र के बीच में नए किस्म के पारदर्शी सामाजिक-राजनीतिक दर्शन और विश्वदृष्टिकोण को जन्म दिया।
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चावेज का वेनेजुएला में बड़ा योगदान यह है कि वे देश में साइबर क्रांति के जनक भी बने। एक जमाने में स्वयॆ ट्विटर पर ट्विट भी किया करते थे बाद में उनको किंही कारणों से अपना एकाउंट बंद करना पड़ा। वेनेजुएला की आम जनता में साइबर संसार के प्रति व्यापक आकर्षण है, 86 प्रतिशत इंटरनेट यूजरों के फेसबुक एकाउंट हैं। Tendencias Digitales नामक पत्रिका ने वेनेजुएला के सन् 2008 के आंकड़े जारी किए हैं इनके अनुसार वेनेजुएला में फेसबुक में 1,200 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वेनेजुएला में पांच लाख से ज्यादा ब्लेकबेरी फोन हैं। यह समूचे बाजार का 7 प्रतिशत हिस्सा है। यह लैटिन अमेरिका की तुलना में ढ़ाई प्रतिशत ज्यादा है।
जबकि ट्विटर में अभी 4 प्रतिशत लोग वेनेजुएला से हैं। वेनेजुएला के विपक्षी टीवी चैनल ग्लोबविजन के अनुसार विश्व के 20 सबसे ज्यादा प्रभावशाली ट्विटरएकाउंट वेनेजुएला के हैं। ये न्यूयार्क टाइम्स और सीएनएन जैसे महारथियों के साथ तेज प्रतिस्पर्धा में हैं। अकेले ग्लोबविजन के दो लाख अनुयायी हैं। ये आपस में भी संवाद करते हैं।
उल्लेखनीय है चावेज के खिलाफ कारपोरेट घरानों के नायक और संगठकर्ता की भूमिका टीवी चैनल निभाते रहे हैं। स्वयं चावेज ने सबसे जनप्रिय टीवी चैनल और 34 रेडियो स्टेशनों को देश के कानूनों का उल्लंघन करने के कारण बंद कर दिया। साथ ही ‘‘कम्युनिकेशन गुरिल्लाओं’’ की एक फौज गठित की है जो साइबर से लेकर मीडिया और स्कूलों तक चावेज और क्रांति का प्रचार करते रहते हैं।
वेनेजुएला की 28 मिलियन आबादी में अभी 90 लाख इंटरनेट यूजर हैं। सरकार की योजना है कि सोशल नेटवर्किंग साइट को देश की नीतियों पर बहस के लिए शामिल किया जाए ,साधारण जनता को नीतियों के सवालों पर सक्रिय किया जाए।
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चावेज ने वेनेजुएला में विश्व के शानदार लोकतांत्रिक चुनाव की मिसाल कायम की थी और जीत हासिल की थी। अमेरिका पूर्व राष्ट्रपति जिमी कॉर्टर ने कहा कि मैंने अपने जीवन में दुनिया में 92 चुनावों की निगरानी की है और उनको संपन्न किया है लेकिन चावेज का चुनाव दुनिया का बेहतरीन लोकतांत्रिक चुनाव था। क्रांतिकारी लोग चुनावों के जरिए जनता का दिल कैसे जीतें और आम जनता में विचारों का युद्ध कैसे लड़ें इसके जो मानक चावेज ने बनाए हैं उनसे हमसब बहुत कुछ सीख सकते हैं।
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लैटिन अमेरिकी देशों में क्रांतिकारियों के एकवर्ग में सत्ता में आने के बाद फिर से अपने ही कुनबे के लोगों का दमन करने का रिवाज रहा है लेकिन वेनेजुएला में अपने 14साल के शासन में चावेज अपने से भिन्न मत रखने वाले सैनिकों और पार्टी नेताओं का कभी दमन नहीं किया। दमनरहित 14शासन और साइबर क्रांति के जरिए प्रचार,संवाद और जनता को गोलबंद करने का काम किया। क्रांति को दमनरहित बनाया।
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हूगो चावेज ने ऐसे दौर में अपने देश में अमेरिकी तेल कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया जिस समय सारी दुनिया में अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामने दुनिया की अधिकांश सरकारें नतमस्तक हो गयी थीं और सारी दुनिया में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का निजीकरण हो रहा था। चावेज ने तेल को क्रांति के संरक्षण के लक्ष्य के साथ नत्थी किया और उन तमाम देशों की मदद की जो समाजवाद के लिए जंग कर रहे थे।
उल्लेखनीय है मध्यपूर्व के तेलधनी देश सऊदीअरब ने तेल को प्रतिक्रियावाद-फंडामेंटलिज्म और अमेरिकी साम्राज्यवाद के विस्तार का औजार बनाया तो चावेज ने तेल के बहाने ही अमेरिकी विस्तारवाद को पंक्चर किया और गरीबों की जिन्दगी की रक्षा के साथ तेल को जोड़ा।
वेनेजुएला में सबसे ज्यादा स्कॉच ह्विस्की पी जाती है लेकिन चावेज शराब नहीं पीते थे। सादगीपूर्ण जीवनशैली,गरीब जनता से सीधे संवाद और संपर्क उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी।
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जो लोग कहते हैं कि बुर्जुआ मीडिया ईमानदार और निरपेक्ष होता है उनको चावेज के मरने के बाद अमेरिकी बहुराष्ट्रीय मीडिया में चावेजविरोधी घृणा प्रचार को देखना चाहिए।
चावेज की मौत के बाद उनके बारे में अफवाहें फैलाने और उनका चरित्रहनन करना कारपोरेट मीडिया की निरपेक्ष छवि पर कभी न मिटनेवाला काला धब्बा है।
अमेरिकी मीडिया की केन्द्रीय विशेषता है समाजवाद को कलंकित करो, चावेज और वेनेजुएला में सत्तारूढ़ सरकार को षडयंत्रकारी और जनविरोधी घोषित करो।
वेनेजुएला और चावेज पर नेट पर पढ़ते समय कम्युनिस्ट विरोध और चरित्रहनन को माइनस करके पढ़ा जाए तो बेहतर समझ बन सकती है।
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चावेज की विशेषता है कि उसने क्रांतिकारियों को जंगलों में गुरिल्ला जिंदगी जीने और जंगल-जंगल भटकने की बजाय आम जनता और खासकर सत्ता के सामाजिक संतुलन को बदलने का नया पाठ निर्मित किया। गुरिल्ला रणनीति का क्रांतिकारी आंदोलन से अंत किया।
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एक जमाना था सीआईए और उसके खरीदे हुए भाड़े के सैनिक लैटिन अमेरिका में दनदनाते हुए प्रतिक्रांतिकारी हमले किया करते थे,लेकिन चावेज के सत्ता में आने के बाद भाड़े के सैनिकों और सीआईए के हमलों का लैटिन अमेरिकी जनता ने जमकर एकजुट प्रतिवाद किया ,इस काम में चावेज क्रांतिकारियों के प्रेरणास्रोत बने रहे।
चावेज ने दूसरा बड़ा काम यह किया कि मीडिया में अहर्ऩिश मौजूदगी के जरिए भाड़े के क्रांतिविरोधी पत्रकारों-विद्वानों-सैनिक अफसरों आदि के प्रचार को असरहीन बना दिया।
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रविवार, 3 मार्च 2013

चुनावी पापुलिज्म की आम बजट से विदाई


       

      एक जमाना था केन्द्रीय बजट के आने के पहले आमलोगों में उत्सुकता होती थी ,आम आदमी मन लगाकर रेडियो –टीवी पर सुनता-देखता  था कि केन्द्र सरकार के आमबजट में नया क्या आनेवाला है ?  लेकिन इनदिनों बजट को लेकर जिज्ञासा एकसिरे से खत्म हो गयी है।मीडिया का भी वित्तमंत्री पर कोई दबाब नजर नहीं आया।  
     आमबजट को लेकर सांसदों से लेकर आम आदमी तक बढ़ते बेगानेपन ने एक नए किस्म के आर्थिक अज्ञान को बढ़ावा दिया है। कायदे से संचारक्रांति के दौर में बजट की सूचनाओं का विवेचन ज्यादा से ज्यादा होना चाहिए लेकिन हो उलटा रहा है। आम बजट आज सबसे ज्यादा रहस्यमय दस्तावेज है और इस रहस्य को कारपोरेट मीडिया ने जमकर बढ़ावा दिया है।
वित्तमंत्री पी.चिदम्बरम् ने जब पिछले सप्ताह सन् 2013-14 का आमबजट पेश किया तो उन्होंने पहला अच्छा काम यह किया है कि बजट को चुनावी राजनीति से पृथक् कर दिया है। पहले बजट में चुनावी प्रलोभन हुआ करते थे लेकिन इसबार के बजट में कोई आर्थिक प्रलोभन नहीं हैं।
यह मनमोहन सरकार का आखिरी बजट है। बजट को चुनावी राजनीति से अलग करने का अर्थ है देश की अर्थव्यवस्था को पापुलिज्म से अलग करना। इससे यह भी संकेत मिलता है कि आगामी चुनाव में कॉग्रेस कोई पापुलिज्म का नारा और योजनाएं उछालने नहीं जा रही है ।इसका एक अन्य आयाम यह भी है मीडिया प्रौपेगैण्डा के जरिए मौजूदा विकास योजनाओं की उपलब्धियों को आने वाले समय में खूब उछाला जाएगा।
   सन् 2013-14 के आमबजट की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इससे मंदी से लड़ने में कोई बड़ी मदद नहीं मिलेगी। इसका प्रधान कारण यह है कि केन्द्र सरकार के पास बजटघाटा कम करने के वैज्ञानिक विकल्पों का अभाव है। बजटघाटा 5,20,925 करोड़ रूपये का है।  जबकि लक्ष्य था 5,73,630करोड़ रूपये। यानी केन्द्र सरकार सारी कोशिशों के बावजूज बजटघाटा कम करने का लक्ष्य हासिल नहीं कर पायी है। मनमोहन सरकार के बजटघाटे के लक्ष्य को हासिल न कर पाने के पीछे प्रधान कारण है अमीरों को दी गई आर्थिक सुविधाएं। जबकि केन्द्र सरकार ने आम आदमी को मिलने वाली सब्सीडी में कटौती की है। पिछले साल के बजट की तुलना में इस साल 4फीसदी की कटौती की गयी है।
  सन् 2013-14 के आम बजट में चमड़े से बनी चीजें और सिलेसिलाए कपड़े सस्ते होने की संभावना है वहीं दो हजार से ज्यादा की कीमत के मोबाइल फोन महंगे हो जाएंगे। इसके अलावा वातानुकूलित रेस्टोरैंट में खाना महंगा होगा।
  एक करोड़ रूपये से ज्यादा आमदनी वाले 42,800 लोगों पर 10 फीसदी अधिभार लगाने की घोषणा की है जो इस इन धनियों के लिए कोई खास मायने नहीं रखता। इससे इसवर्ग के लोगों में कम आमदनी दिखाने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। महिलाओं के विकास के लिए महिला बैंक खोलने का बजट में प्रस्ताव पेश किया गया और इसके लिए आरंभिक पूँजी के तौर पर एक हजार करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं। इस बैंक की परिकल्पना आंध्र में राज्य सरकार द्वारा संचालित श्रीनिधि बैंक से ली गयी है। महिला बैंक को रिजर्व बैंक के दिशा निर्देशों से मुक्त रखा गया है ,इस बैंक को सार्वजनिक क्षेत्र में खोला जाएगा और इसके लिए अलग से कानून भी बनाया जाएगा।
    इसी तरह छोटे शहरों में अपना पहला मकान खरीदने का सपना देख रहे लोगों को वित्त मंत्री ने ब्याज पर छूट का तोहफा दिया है। वित्त मंत्री ने कहा कि 40 लाख रुपये मूल्य तक के मकान खरीदने वालों को ब्याज पर मिलेगी अतिरिक्त 1 लाख रुपये की छूट मिलेगी। सरकार की शर्त के मुताबिक 25 लाख रुपये के आवास ऋण पर पहली बार घर खरीदने वालों को ही कर छूट मिलेगी। इसके अलावा यह प्रावधान बेहद छोटी अवधि के लिए किया गया है और अप्रैल 2013 से मार्च 2014 तक मकान खरीदने वालों को ही यह छूट प्राप्त होगी। 2 से 5 लाख के स्लैब में आने वालों को अब 2,000 रुपये का टैक्स क्रेडिट मिलेगा।
     आमआदमी का उपभोगखर्चा विगत 3सालों से 8फीसदी चला आ रहा है उसमें इस साल मात्र 4फीसदी इजाफा हुआ है। लेकिन इससे महंगाई पर अंकुश लगाने में सफलता नहीं मिली है। पिछले साल की तुलना में सब्सीडी कम हुई है। खाद्य सब्सीडी का मनमोहन सरकार खूब हल्ला मचाती रही है लेकिन इसबार के बजट में खाद्य सब्सीडी में पिछले साल की तुलना में पांच हजारकरोड़ रूपयों की कटौती की गयी है। जबकि वित्तमंत्री ने फूड़ सब्सीडी के लिए 10हजार करोड़ रूपये अतिरिक्त देने की बात कही है। लेकिन वास्तव अर्थ में फूड़सब्सीडी में पिछले साल की तुलना में इस साल 5हजार करोड़ रूपये की कटौती की गयी है। साथ ही पिछले साल की तुलना में इस साल तेल और पेट्रोलियम पदार्थों की सब्सीडी में तीस हजार करोड़ रूपये की कटौती की गयी है। संशोधित आंकड़े ज्यादा ही होंगे।
    मनरेगा योजना के मद में पिछले साल की तुलना में कोई बढोत्तरी नहीं हुई है। जबकि गांवों से लेकर शहरों तक बेकारी में इजाफा हुआ और आर्थिकमंदी चरम पर है।ऐसी दशा में मनरेगा के लिए अतिरिक्त राशि आवंटित करने की जरूरत थी। दूसरी ओर सार्वजनिक क्षेत्र की पचास हजार करोड़ रूपये की संपदा के विनियमन का प्रस्ताव रखा गया है। यानी मनरेगा आदि के लिए धन केन्द्र सरकार सार्वजनिक संपत्ति को निजी हाथों में बेचकर जुगाड़ करेगी।
   इस साल के बजट में पिछले साल की तुलना में शिक्षामद में आवंटित राशि में भी गिरावट आई है। स्वास्थ्य और चिकित्सा के मद में जरूरत से बहुत कम धनराशि आवंटित की गयी है। इसी तरह सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में ग्रामीण विकास के लिए आवंटित राशि कम रखी गयी। आदिवासियों के विकास के चिदम्बरम ने जो धनराशि आवंटित की है वह संवैधानिक नियमों के अनुसार आवंटित धनराशि से कम है। इससाल आदिवासियों के लिए 20900 करोड़ रूपये आवंटित किए गए हैं जो संवैधानिक नियमों के अनुसार तयशुदा आनुपातिक आवंटन से कम है।यही दशा अनुसूचित जाति के लिए आवंटित राशि की है वहां पर भी संवैधानिक नियमों का उल्लंघन करते हुए 50फीसदी कम राशि (47000 हजार करोड़) आवंटित की गयी है।