मंगलवार, 25 जून 2013

फेसबुक विचार वैतरणीः भाजपा और 2014 का लोकसभा चुनाव




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BJP अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भाजपा को असली भगवा रंग में पेश करके भाजपा का राजनीतिक भविष्य अंधकारमय कर दिया है। राजनाथ सिंह ने धर्मनिरपेक्षता को बीमारी कहा है और उसे बुरा माना है। उन्होंने कहा- “You know there is a disease called encephalitis which is very bad .....similarly there is another disease called secularitis from which the Congress and its allies are suffering in the manner they have been trying to create a divide on the lines of secularism and communalism in the country,”( हिन्दू,24जून 2013)

राजनाथ सिंह ने इस बयान के जरिए धर्मनिरपेक्षता पर हमला किया है। कल मोदी ने राष्ट्रवादीभावबोध से हमला किया था।आज धर्मनिरपेक्षता पर हमला किया गया,अगला हमला संभवतः राष्ट्रीयएकता पर होगा।
धर्मनिरपेक्षता भारतीय जीवन का महासच है, और साम्प्रदायिकता लघुसच है, यह देखना होगा कि देश की जनता किस सच को स्वीकार करती है।
साम्प्रदायिक भाजपा-संघ परिवार-मोदी को देश की जनता लगातार ठुकराती रही है। भाजपा को अपनी राजनीतिक महत्ता का अहसास हो जाएगा यदि वे इसबार अकेले चुनाव लड़ लें।
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भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा है- “Our country must be saved from this disease (secularitis),” he said and urged all political parties to oppose it.
यानी देश को फंडामेंटलिज्म और प्रतिक्रियावादी राजनीति की ओर ले जाने का आह्वान किया है राजनाथ सिंह ने। राजनाथ सिंह जबाव दें कौन सा देश है जो फंडामेंटलिज्म या अनुदारवादी नीतियों के आधार पर अपना प्रगतिशील ढ़ंग से विकास कर पाया है ? आधुनिक होने के लिए धर्मनिरपेक्ष होना जरूरी है।
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जो लोग गुजराती अस्मिता और गुजराती जातीयता को आगामी चुनाव में भाजपा के वोटबैंक का आधार बनाकर मोदी को नेता बनाना चाहते हैं वे जानलें कि आंध्र में क्या हो रहा है।
आंध्र में आज विभाजन का खतरा साक्षात खड़ा है,यह तेलुगू जातीयता के राज्य विभाजन की नई दिशा है। यह वैसे ही है जैसे राममंदिर आंदोलन के बाद हिन्दू उन्माद पैदा करके भाजपा-कांग्रेस आदि ने मिलकर यूपी-मध्यप्रदेश और बिहार को विभाजित किया।
कहने का मतलब है जातीयता और राष्ट्रवाद के आधार मोदी जो राजनीति कर रहे हैं वह विभाजनकारी है और इसके कभी भी कहीं पर भी सुखद परिणाम नहीं निकले हैं। यह बात योरोप से लेकर भारत तक सही है।
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भाजपा -संघ परिवार और मोदी को इस सवाल का जबाव देना होगा कि उनका आगामी लोकसभा 2014 चुनाव में एजेण्डा राष्ट्रवाद है या राष्ट्रीय विकास है ?
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जो राजनेता अपने तुच्छ राजनीतिक स्वार्थ के लिए राष्ट्रीयता का इस्तेमाल करते हैं वे यह भूल जाते हैं कि राष्ट्रीयता में अंतर्गृथित तौर पर विभाजनकारी तत्व शामिल रहता है। राष्ट्रीयता कभी भी साम्प्रदायिकता या पृथकतावाद या आतंकवाद में रूपांतरित हो सकती है।
नरेन्द्र मोदी ने गुजराती अस्मिता और गुजराती जातीयता के सवाल को जिस शक्ति के साथ उठाया उसने स्वाभाविकतौर पर साम्प्रदायिक हिंसाचार में रूपान्तरण किया, यह हिंसा तब भी होती यदि गोधराकांड न होता।
पंजाब में अकालियों की पंजाबी जातीयता का हश्र हम देख चुके हैं.शिवसेना के मराठी जातीयता के विभाजनकारी रूपान्तरण से हम बाकिफ हैं।
सवाल यह है कि मोदी,भाजपा या संघ परिवार जातीय उन्माद और राष्ट्रवाद को छोड़कर आगामी चुनाव लड़ता है या नहीं ? ये दोनों ही प्रवृत्तियां आधुनिक भारत के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा हैं।
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मोदी और भाजपा को यह बात समझ में आ गयी है कि गुजरात महान,गुजराती जातीयगर्व आदि के आधार पर मोदी राष्ट्रीयनेता नहीं बन सकते। यह राष्ट्रीयता की सीमा है। नरेन्द्र मोदी ,संघ परिवार और भाजपा को यह बात समझनी होगी कि राष्ट्रीयता के ईंधन से देश की अन्य राष्ट्रीयताओं में अपील पैदा नहीं की जा सकती।
राष्ट्रीयता का उन्माद एक सीमा के बाद राजनीतिक बेड़ी बन जाता है और यही कष्ट इनदिनों मोदी का है। वे गुजराती राष्ट्रीयता की जंजीरों में बंधे हैं। ये बेडियां उन्होंने ही डाली हैं, अब वे इनको तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं इसमें उनको शायद ही सफलता मिले। क्योंकि वे अपना राष्ट्रीयताप्रेम खारिज कर नहीं सकते और बिना राष्ट्रीयताप्रेम खारिज किए राष्ट्रप्रेम पैदा नहीं होता। डर है कि गुजराती राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद के द्वंद्व में भाजपा अपनी गुजरात के संसदीय आधार से हाथ न धो बैठे.
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कल (22जून2013 )जब नरेन्द्र मोदी पंजाब से अपना चुनाव अभियान शुरू कर रहे थे तो अचानक उन्हें कश्मीर के युवाओं का खूब ख्याल आया, सवाल यह है कि चुनावी प्रचारसभा में ही ख्याल क्यों आया ,पहले कभी मोदी को कश्मीर के युवा नजर क्यों नहीं आए ? असल में युवाओं को मोदी राष्ट्रवादी उन्माद का ईंधन बनाने की कोशिश कर रहे थे। जो नेता युवाओं को राष्ट्रवाद का ईंधन बनाता है वह उनका सबसे ज्यादा नुकसान करता है। आज के दौर में राष्ट्रवाद कैंसर है।
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कोई ये बता सकता है कि गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने किस फार्मूले से केवल गुजरातियों को चुनचुनकर सड्क और हवाई मार्ग से राहत सुविधाएं मुहैया करवाई होंगी। क्‍या प्रांतीयता पूछकर राहत कार्य संभव है्।(सुधासिंह का स्टेटस)
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केदारनाथ आपदा में फंसा है वहां मदद की जरूरत है ,सन् 2014 के लोकसभा चुनाव अभी बहुत दूर हैं ,लेकिन नरेन्द्र मोदी चुनावप्रचार पर निकल दिए हैं। इसे क्या कहें -चुनावप्रेम या देशप्रेम ?
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बिहार के मुख्यमंत्री ने नरेन्द्र मोदी को कारपोरेट घरानों के साथ जोड़ा है और इसी प्रसंग में मुझे आडवाणी की सबसे रोचक टिप्पणी याद आ रही है। उन्होंने लिखा है- "देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार के बारे में सन 2008 के राष्ट्रमंडल खेलों से सुना जा रहा है जिसके चलते हमारे राष्ट्र की काफी बदनामी हुई है। परन्तु वर्तमान के दौर में अलग श्रेणी के नायकों के शामिल होने से यही तथ्य उभरता है कि इस सभी गिरावट की जड़ में पैसा मुख्य है।

किसी ने सही ही कहा है: धन रखना बहुत अच्छा है; यह एक मूल्यवान चाकर हो सकता है। लेकिन धन आपको रखे तो यह ऐसा है जैसे कोई शैतान आपको पाल रहा है, और यह सर्वाधिक स्वार्थी और खराब किस्म का शैतान है!"
यहां जोडें यदि धनवान पाले तो हैवान हो सकता है।
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मोदी के नवरत्न अदालत के जरिए पुरस्कृत- एनडीए के टूटने की खबरों के बीच बीजेपी कैंपेन कमिटी के अध्यक्ष और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को करारा झटका लगा है। गुजरात में नरेंद्र मोदी सरकार में सीनियर मंत्री बाबूभाई बुखेरिया को अवैध खनन मामले में पोरंबदर की एक अदालत ने सजा सुनाई है। अदालत ने गुजरात के जल संसाधन मंत्री बुखेरिया और 3 अन्य लोगों के साथ 3 साल कैद की सजा सुनाई है। बुखेरिया पर 5 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।
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आज आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और लालकृष्ण आडवाणी के बीच मुलाकात हुई और तकरीबन 45 मिनट बातें हुईं। इस बातचीत में आडवाणी ने मोदी के खिलाफ एक पूरी चार्जशीट दी है और अपनी राय रखकर समझाने की कोशिश की है संघ का नया दांव भाजपा का देश में राजनीतिक अलगाव बढ़ाएगा। इस पर मोहन भागवत सहमत नहीं थे। अंत में दोनों में मोदी पर कोई सहमति नहीं बन पायी है। संभावना यह है कि मीडिया और इंटरनेट में आडवाणी अपने हमले और तेज करेंगे।
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भाजपानेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपने ब्लॉग में एक सुंदर उद्धरण दिया है,
डेविडसन की टिप्पणी है: पैसा नगण्य है। लेकिन इससे जो सिध्दान्त स्थापित हुआ है, और जो इतिहास फिर से लिखा गया है, वह अथाह है।
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भाजपा का पुनःहिन्दुत्व की शरण में लौटना इस बात का संकेत है कि भाजपा के पास 21वीं सदी का कोई सपना नहीं है। वे हिन्दुओं को गरमाकर कुछ समय बाद अलकायदा टाइप दिशा ग्रहण करेंगे। यह बात आडवाणी पहचान रहे हैं और यही वह बिंदु है जहां पर उनको चुप रहने को कहा गया है।
आज भाजपा के सामने दो रास्ते हैं -1.एनडीए का रास्ता और 2.अलकायदा रास्ता। अलकायदा रास्ता प्रकारान्तर से कांग्रेस की सेवा है और भारत की सत्ता राहुल गांधी को सौंपने की एक तरह से प्रच्छन्न घोषणा भी है।
मोदी वैसे ही लड़ रहे हैं कांग्रेस से ,जैसे विन लादेन कभी अमेरिका से लड रहा था ,और अंत में अमेरिका के हाथों अफगानिस्तान सौंपकर ही मरा।
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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने मेरठ में मोदी की हिमायत करते हुए जो बयान दिया है उससे साफ हो जाना चाहिए कि मोदी को अगुवा बनाकर संघ परिवार देश में विकास का नहीं विभाजनकारी एजेंडा लागू करना चाहता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को बीजेपी में राष्ट्रीय भूमिका दिए जाने का समर्थन करते हुए कहा कि "हिन्दुत्व ही वह रास्ता है जिससे देश में परिवर्तन लाया जा सकता है।"

मोदी का कद बढ़ाए जाने का विरोध कर रहे बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि" कोई पसंद करे या नहीं करे, हिन्दुत्व ही वह मार्ग है जो देश में परिवर्तन लाएगा। इसी में देश का सम्मान निहित है"।

भागवत ने सोमवार की शाम संघ के प्रशिक्षण शिविर में कहा कि" हमने नेता और एजेंडा बदल कर देख लिया, कुछ काम नहीं आया। राजनीति के द्वारा भारत को महाशक्ति नहीं बनाया जा सकता है, ऐसा सिर्फ हिन्दुत्व से किया जा सकता है।"

यानी भाजपा में जो कुछ बदलाव आए हैं वे संघ के आदेश पर आए हैं। संघ का इससे चरित्र फिर से साफ हुआ है कि वह सांस्कृतिक संगठन का मुखौटा लगाए राजनीतिक संगठन है।
दूसरी बात यह कि जब सारी दुनिया साइबरयुग में जाने की सोच रही है देश,नस्ल,राष्ट्र,राष्ट्रवाद आदि की सीमाओं का अतिक्रमण कर रही है ऐसी स्थिति में हिन्दुत्व के नाम पर एकजुट करना देश को 14वीं सदी में ले जाने की कोशिश ही कही जाएगी।
तीसरी बात यह कि मोदी के बहाने आनेवाले समय में विकास का नहीं हिन्दुत्व का एजेण्डा आने वाला है।
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कांग्रेस के नेताओं के विलक्षण बयान आने लगे हैं। एक नेता ने कहा है कि धर्मनिरपेक्ष भारत कभी भी नरेन्द्र मोदी को अपना नेता नहीं मानेगा। यह बयान धर्मनिरपेक्षता की गलत समझ पर आधारित है।
धर्मनिरपेक्ष भारत में साम्प्रदायिक व्यक्ति भी प्रधानमंत्री -मंत्री-मुख्यमंत्री आदि हो सकता है। अटल-आडवाणी-नानाजी देशमुख -कल्याण सिंह आदि खांटी साम्प्रदायिक नेता इसके आदर्श उदाहरण हैं। यहां तक कि कागज पर नियमानुसार भाजपा धर्मनिरपेक्ष दल है और यह बात उसने अपने दलीय संविधान में मानी है। यह दीगर बात है कि उसके नेता अहर्निश साम्प्रदायिक प्रचार करते रहते हैं। कांग्रेस के नेताओं को इस तरह के बयानों से बचना चाहिए। धर्मनिरपेक्ष भारत में अनिश्वरवादी भी मंत्री आदि हो सकता है।
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भाजपा या किसी भी दल को साम्प्रदायिक है या धर्मनिरपेक्ष है ,उसके अल्पसंख्यकों के प्रति नजरिए के आधार पर देखना चाहिए।
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भाजपा क्या है और कांग्रेस क्या है,यह मुद्दा यहां बहस तलब नहीं है।एक घटना केन्द्र में है और उसकी संभावित परिणतियों पर अनुमान हमसब लगा रहे हैं। कानूनन भाजपा धर्मनिरपेक्षदल है।हमारा संविधान किसी साम्प्रदायिकदल को चुनावी मान्यता नहीं देता। लेकिन उसकी विचारधारात्मक समझ उसे साम्प्रदायिक बनाती है।इसी तरह कांग्रेस कहने को धर्मनिरपेक्षदल है विचारधारा के आधार पर ,लेकिन उसने अनेकमर्तबा निहितदलीय स्वार्थों के लिए साम्प्रदायिक पत्ते खेले हैं।
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एनडीए का बिखरना लोकतंत्र के लिए अशुभ है,उसमें से धर्मनिरपेक्ष जदयू का निकल जाना और भी अशुभ है,क्योंकि अब यह मोर्चा और भी ज्यादा कंजरवेटिव और विभाजनकारी मुद्दों के आधार पर लोगों में उन्माद पैदा करेगा। जदयू ने अलग होकर साम्प्रदायिक ताकतों के लिए उन्मादी रास्ते तलाशने की मोड़ दिया है।
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नरेन्द्र मोदी -भाजपा के जंजाल से मुक्त होकर नीतीश कुमार ने ठीक वही काम किया है जो किसी जमाने में वीपी सिंह ने कांग्रेस से अलग होकर किया था। भारत की नई लीडरशिप अब नीतीश-अखिलेश यादव -राहुल गांधी और मायावती के चतुष्कोण पर केन्द्रित है और नई लोकसभा की संभावनाओं में वाममोर्चा इनके पूरक होंगे। यह काम यूपीए से अलग तीसरा मोर्चा बनाकर हो या अन्य किसी शक्ल में,वामदलों का आगामी कन्वेंशन इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। नए समीकरण में नीतीश महत्वपूर्ण हैं।
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भाजपा के लोग नीतीश के पुराने भाषणों को बांट रहे हैं, वे नहीं जानते कि उनके नेताओं के पुराने भाषण यदि बंटेंगे तो मोदी,भाजपा और संघ परिवार की क्या गत होगी ? चुनाव में पुराने भाषण कम जाति, नए भाषण और नए मुद्दे ज्यादा काम करते हैं,खासकर बिहार और यूपी में।
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नीतीश कुमार ने मोदी को एक ही एक्शन में नायक से खलनायक बना दिया है और भावी रणनीति अब यादवों और नीतीश कुमार पर निर्भर है। बिहार-यूपी में गणित साफ दिख रहा है कि भाजपा हाशिए के बाहर है।
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नरेन्द्र मोदी बड़े नसीब वाले हैं,कांटे निकालने में माहिर हैं,भाजपा की उलझी जुल्फें संवारने में लगे हैं,इस पर पढ़ें-

उलझी थी ज़ुल्फ़ उस ने सँवारा सँवर गई
शाने को क्या ख़बर ये बला किस के सर गई।।जमील मजहरी।।
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भाजपा-जदयू विवाद में अंदर खाते की बातें आनी बाकी हैं,लेकिन बात बिगड गयी है तो इसका कोई समाधान संभव नहीं है.रहीम ने क्या कहा है पढ़ें-

बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय ।
रहिमन बिगरै दूध को, मथे न माखन होय ॥
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आज भाजपा के सभी नेता चैन की नींद सोएंगे,कई दिनों से नीतीश कुमार से परेशान थे।
कांटा निकल गया और दर्द बंद अब आराम से देश में रामरथ दौडाएंगे,कोई न रोकनेवाला है और न साथ से भागनेवाला।
हमें तो लगता है नीतीश बाबू ने भाजपा का साथ रामजी की कृपा के कारण ही छोड़ा है. राजनाथ सिंह की भगवान ने जिस तरह मदद की है,ईश्वर यूपीए की भी इसी तरह मदद करे।
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नरेन्द्र मोदी के नाम पर भाजपा-संघ परिवार और कारपोरेट मीडिया सुनियोजित प्रचार चला रहा है । कहा जा रहा है भारत की सब बीमारियों की रामबाण दवा है मोदी। मोदी को गद्दी दो और देश की तकदीर बदलो।मोदी को लाने का अर्थ है हिन्दुस्तान को मूर्खिस्तान बनाना। मूर्खिस्तान पर काका की कविता पढ़ें-

मूर्खिस्तान ज़िंदाबाद / काका हाथरसी

स्वतंत्र भारत के बेटे और बेटियो !
माताओ और पिताओ
आओ, कुछ चमत्कार दिखाओ। 
नहीं दिखा सकते ?
तो हमारी हाँ में हाँ ही मिलाओ। 
हिंदुस्तान, पाकिस्तान अफगानिस्तान
मिटा देंगे सबका नामो-निशान
बना रहे हैं-नया राष्ट्र मूर्खितान
आज के बुद्धिवादी राष्ट्रीय मगरमच्छों से
पीड़ित है प्रजातंत्र, भयभीत है गणतंत्र
इनसे सत्ता छीनने के लिए
कामयाब होंगे मूर्खमंत्र-मूर्खयंत्र
कायम करेंगे मूर्खतंत्र।

हमारे मूर्खिस्तान के राष्ट्रपति होंगे-
तानाशाह ढपोलशंख
उनके मंत्री (यानी चमचे) होंगे-
खट्टासिंह, लट्ठासिंह, खाऊलाल, झपट्टासिंह
रक्षामंत्री-मेजर जनरल मच्छरसिंह
राष्ट्रभाषा हिंदी ही रहेगी, लेकिन बोलेंगे अँगरेजी। 
अक्षरों की टाँगें ऊपर होंगी, सिर होगा नीचे
तमाम भाषाएँ दौड़ेंगी, हमारे पीछे-पीछे।
सिख-संप्रदाय में प्रसिद्ध हैं पाँच ककार’-
कड़ा, कृपाण, केश, कंघा, कच्छा। 
हमारे होंगे पाँच चकार’-
चाकू, चप्पल, चाबुक, चिमटा और चिलम।

इनको देखते ही भाग जाएँगी सब व्याधियाँ
मूर्खतंत्र-दिवस पर दिल खोलकर लुटाएँगे उपाधियाँ
मूर्खरत्न, मूर्खभूषण, मूर्खश्री और मूर्खानंद।

प्रत्येक राष्ट्र का झंडा है एक, हमारे होंगे दो
कीजिए नोट-लँगोट एंड पेटीकोट 
जो सैनिक हथियार डालकर 
जीवित आ जाएगा
उसे परमूर्ख-चक्रप्रदान किया जाएगा। 
सर्वाधिक बच्चे पैदा करेगा जो जवान
उसे उपाधि दी जाएगी संतान-श्वान
और सुनिए श्रीमान-
मूर्खिस्तान का राष्ट्रीय पशु होगा गधा
राष्ट्रीय पक्षी उल्लू या कौआ
राष्ट्रीय खेल कबड्डी और कनकौआ। 
राष्ट्रीय गान मूर्ख-चालीसा
राजधानी के लिए शिकारपुर, वंडरफुल !
राष्ट्रीय दिवस, होली की आग लगी पड़वा। 

प्रशासन में बेईमान को प्रोत्साहन दिया जाएगा
ईमानदार सुर्त होते हैं, बेईमान चुस्त होते हैं। 
वेतन किसी को नहीं मिलेगा
रिश्वत लीजिए
सेवा कीजिए !

कीलर कांडने रौशन किया था
इंगलैंड का नाम
करने को ऐसे ही शुभ काम-
खूबसूरत अफसर और अफसराओं को छाँटा जाएगा
अश्लील साहित्य मुफ्त बाँटा जाएगा। 

पढ़-लिखकर लड़के सीखते हैं छल-छंद
डालते हैं डाका
इसलिए तमाम स्कूल-कालेज 
बंद कर दिए जाएँगे काका
उन बिल्डिगों में दी जाएगी हिप्पीवादकी तालीम 
उत्पादन कर से मुक्त होंगे
भंग-चरस-शराब-गंजा-अफीम
जिस कवि की कविताएँ कोई नहीं समझ सकेगा
उसे पाँच लाख का अज्ञानपीठ-पुरस्कार मिलेगा। 
न कोई किसी का दुश्मन होगा न मित्र
नोटों पर चमकेगा उल्लू का चित्र !

नष्ट कर देंगे-
धड़ेबंदी गुटबंदी, ईर्ष्यावाद, निंदावाद। 
मूर्खिस्तान जिंदाबाद !
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नीतीश कुमार-मोदी प्रसंग में-

पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय ।
अब के बिछुड़े ना मिले, दूर पड़ेंगे जाय ॥
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नरेन्द्र मोदी पर कबीर ये पंक्तियां पढ़ें-

जहाँ आप तहाँ आपदा, जहाँ संशय तहाँ रोग ।
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मोदीपंथी मीडिया पर-

फूटी आँख विवेक की, लखे ना सन्त असन्त ।
जाके संग दस-बीस हैं, ताको नाम महन्त ॥कबीर।।
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फेसबुक विचार वैतरणीः नव्य उदारीकरण के दुष्परिणाम



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डिजिटल क्रांति ने सीडी-डिस्क-कैसेट आदि के क्षेत्र में जो तबाही मचायी है उसके परिणाम आने लगे हैं। वीडियोकॉन समूह के प्लैनेट एम की बिक्री में गिरावट आई है और राजस्व में उसकी हिस्सेदारी कुछ साल पहले के 40 फीसदी से घटकर बमुश्किल एक चौथाई रह गई है। अगले साल तक यह घटकर 10 फीसदी रह जाएगी। रहेजा समूह के क्रॉसवर्ड के साथ भी यही किस्सा है। उसके राजस्व में संगीत की हिस्सेदारी बमुश्किल दो फीसदी रह गई है।(बिजनेस स्टैंडर्ड)
यानी नव्य उदार संगीत अब बेसुरा हो गया है।
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डिजिटल क्रांति ने सीडी और कैसेट उद्योग को बर्बाद कर दिया है। एचएमवी-ईएमआई रिकॉर्ड लेबल के स्वामी संजीव गोयनका के आरपीजी समूह ने अपने संगीत क्षेत्र के खुदरा कारोबार को बंद कर दिया है।
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उलटे विकास मॉडल का आलम यह है कि शहरों में पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ नहीं बचे हैं। सवाल यह है कि हमारे विकास मॉडल में फुटपाथ क्यों नहीं आते ?
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पिछले दो साल के दौरान भारत में बेरोजगारी 10.2 फीसदी की दर से बढ़ी है। 1 जनवरी 2012 को देश में बेरोजगारों की संख्या 1.08 करोड़ थी जबकि जनवरी 2010 में यह आंकड़ा 98 लाख था।
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कविता या साहित्यविधाओं का जासूसी एजेंसी से संबंध नहीं होता.नजरिए का संबंध होता है।लक्ष्यों का संबंध होता है। कमलेश के लेखन को खांचे बनाकर नहीं देखना चाहिए। समग्रता में देखना चाहिए। मैं तो इतना ही समझ पाया हूँ कमलेश को खांचों में बांटकर देखा जा रहा है। समग्रता में उनके नजरिए,एक्शन ,सृजन,आचरण,जीवनशैली और विचारधारा सबको मिलाकर देखना चाहिए। महज कवि रूप में देखना उपयोगितावाद है और यह अमेरिकीजीवन दर्शन का मूलाधार है।
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खबर है कि विश्व में अमेरिकी जासूसी को नंगा करने वाला एडवर्ड स्नोवदेन हांगकांग छोड़कर मास्को चला गया है। क्या यह नए शीतयुद्ध का आरंभ है ?
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कमलेश की परायीदृष्टि का आदर्श नमूना है यह वाक्य- "भारत में सभ्यता मृत पड़ी हुई है। भारतवर्ष के पढे-लिखे अपने अज्ञान में ही इतने अभिमानी हो रहे हैं कि उन्हें अपने चारों ओर पड़ी हुई यह लाश दृष्टिगोचर नहीं हो होती। " कमलेश पर हिन्दी में जो लोग माला चढ़ा रहे हैं और उनका भारतज्ञान पर फिदा हैं उनको इन वाक्यों को पढ़ना चाहिए और इसके गंभीर निहितार्थों को समझना चाहिए। कमलेश का भारतप्रेम देखें उनको भारत में सभ्यता मृत नजर आ रही है। बलिहारी अमेरिकीदृष्टि की।यह दृष्टिकोण सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का आदर्श नमूना है जिसमें अपनी भाषा,अपनी सभ्यता,संस्कृति आदि मृत लगती है या हेय लगती है। कहने की जरूरत नहीं है कि सीआईए का सांस्कृतिक साम्राज्यवाद से चोली-दामन का रिश्ता है।
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भारत का सबसे शिक्षित राज्य है केरल और इस राज्य में अपराध समूचे भारत में सर्वोच्च पर है। समूचे भारत में अपराधदर 196.7लोग प्रति एकलाख नागरिकों पर है,,जबकि केरल में 455.8 लोग है जो राष्ट्रीय अपराध दर से भी ऊपर है।
भारत की अपराध राजधानी है कोच्ची,वहां पर अपराधदर प्रति लाखपर 817.9है उसके बाद कोलम का स्थान है,यहां की अपराधदर है 637.3.लोग है .
क्या कारण है केरल जैसा शिक्षित,जागरूक,समाजवादीचेतना संपन्न राज्य अपराधदर में भी सबसे ऊपर चला गया ?
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स्काइप ने अमेरिकी प्रशासन की मदद करने वाला साइबर कार्यक्रम विकसित किया है जिसके तहत स्काइप पर होने वाले कम्युनिकेशन पर अमेरिकी प्रशासन जासूसी कर पाएगा।
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भारत सरकार ने अमेरिका की तर्ज पर ही बिना बताए,अदालत की परमीशन के बिना नागरिकों के फोन सुनने,ईमेल पढ़ने,एसएमएस पढ़ने आदि का पूरा सिस्टम खड़ा कर लिया है और भारत में इंटरनेट से लेकर मोबाइल तक का सारा कम्युनिकेशन सरकार की निगरानी के दायरे में रहेगा। कहां सोए हैं मानवाधिकारों के रखवाले संगठन और राजनीतिकदल ?
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हिन्दी के बुढ़ऊ धार्मिक (पूर्व फर्नाण्डीजपंथी सोशलिस्ट) लेखक कमलेश में अचानक पैदा हुई सीआईएचेतना अवचेतन के गर्भ से पैदा नहीं हुई है,यह सचेत सीआईए प्रचार अभियान का हिस्सा है। यह अकस्मात् नहीं है कि इसे रजा फाउण्डेशन की पत्रिका ने छापा है, रजा फाउण्डेशन के कर्ता हैं अशोक बाजपेयी,जो अमेरिकीपरस्त कलाकर्म के लिए हिन्दी में पहले ही यश कमा चुके हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में हिन्दी अकेली भाषा है जहां आज भी अमेरिकाविरोधी स्वर प्रमुख है और इस चेतना को प्रभावित करने के लिए कमलेश-उदयन बाजपेयी-अशोक बाजपेयी का यह सामूहिक प्रयास है। इसतरह के हमलों का मुँहतोड़ जबाब देने की जरूरत है।
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कुलदीपजी, रामस्वरूप,वह व्यक्ति है जो भारत-चीन आदि के लिए एक साथ जासूसी करता था और रॉ के लिए जासूसी करता था, मुझे याद है वह जब दिल्ली में गिरफ्तार किया गया तो उसके घर से 1 ट्रकभर कर भारत सरकार की गोपनीय फाइलें निकली थीं और वह सरकारी कर्मचारी को एक बोतल,एक औरत और 2हजार रूपये की घूस देकर भारत सरकार के किसी भी मंत्रालय के गोपनीय दस्तावेज सीआईए और चीन आदि देशों को मुहैय्या कराता था और यही रामस्वरूप दिल्ली में केजीवी के खिलाफ पोस्टरबाजी संगठित करता था और सीआईए के प्रचार अभिियान संगठित करता था। मैंने अपने जेएनयू एसएफआई अध्यक्ष के नाते कई पर्चे उस जमाने में इस व्यक्ति के नाम जारी किए थे।
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कमलेश का लेखन चंडूखाने की चिन्ताओं की देन है वहां तथ्य और सत्य ढ़ूंढ़ना सही नहीं होगा।आपने सही जगह रेखांकित किया है। इससे भी बड़ी बात यह है कि इस पत्रिका के संपादकको संपादकीय विवेक नहीं है ,उसने तथ्यों की जांच किए बिना इस तरह की सूचनाएं प्रकाशित करके लघु पत्रिकाओं की परंपरा को कलंकित किया है। लगता है अशोक बाजपेयी के मालगोदाम में सिर्फ भूसा ही भरा है।
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अमेरिका में रहने के दुख-4-

अमेरिका में हैं और सत्तासुख चाहते हैं तो ईसाइ फंडामेंटलिज्म और अन्य किस्म के फंडामेंटलिज्म के साथ याराना रखना होगा। खासकर अमेरिका स्थित ईसाइ फंडामेंटलिस्टों के सामने नतमस्तक करके रहना होगा।
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अमेरिका में रहने के दुख-3-

अमेरिकी सिस्टम के नेता हैं तो गरीबों का भाषण में जिक्र न आए,चुनाव में बोल सकते हैं लेकिन बाद में गरीब का नाम लेना भी गुनाह है।मजदूरवर्ग पदबंध तो एकदम प्रतिबंधित है।
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अमेरिका में रहने के दुख-2-

यदि अमेरिका के राष्ट्रपति हैं तो देश को एक बड़ा युद्ध सौगात में देकर जाएं जिससे हथियार बनाने वाली कंपनियां खुश रहें और आपके दल का ख्याल रखें। युद्ध नहीं तो राष्ट्रपति पद नहीं।
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अमेरिका में रहने के दुख-1-

यदि आप मुसलमान हैं और आपका नाम मुस्लिम परंपरा से आता है तो तय है अमेरिकी पुलिस-जासूसी एजेंसियां आप पर 24 घंटे निगरानी रखेंगी।
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अमेरिकी मिथ-6-

अमेरिका के बारे में यह मिथ है कि वह स्वतंत्र नागरिकों का देश है। सच यह है कि अमेरिका के नागरिकजीवन पर सरकारी एजेंसियों की कड़ी नजरदारी है और निजी कम्युनिकेशन में हस्तक्षेप भी है।
अमेरिकी मिथ-5-

यह मिथ है कि अमेरिका तो सुखियों-धनियों और स्वस्थ लोगों का देश है। सच यह है कि अमेरिका में बड़ी तादाद में गरीब हैं,मुसीबत के मारे हुए लोग हैं और बड़ी संख्या में बीमारलोग भी हैं।
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अमेरिकी मिथ-4-

अमेरिका के बारे में मिथ है कि वहां पर औरतें बड़ी भली होती हैं। सच यह है कि वहां पर औरतों में पुरूषों के ऊपर हमला करने,ब्लिच आंखों में फेंककर हमला करने की प्रवृत्ति बढ़ गयी है।
अमेरिकी मिथ-3-

अमेरिका के बारे मे मिथ है कि वहां चोर.उचक्के,मस्तान ,मवाली टाइप लोग नहीं होते। सच यह है कि वहां हर शहर में अपराधियों के संगठित गिरोह सक्रिय हैं।
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अमेरिकी मिथ-2-

अमेरिका के बारे में मिथ है कि अमेरिका में स्त्रीपीड़क नहीं हैं.सच इसके विपरीत है स्त्रियों के प्रति उत्पीड़न के मामले में अमेरिका अनेक देशों में अग्रणी है।
अमेरिकी मिथ-1-

अमेरिका के बारे में मिथ है कि वहां सबकुछ शांत और सभ्यता के वातावरण में चल रहा है। यह भी मिथ है कि अमेरिकी लोग बड़े भले,शरीफ और सहिष्णु,मिलनसार होते हैं। यह सच है कि अमेरिका में शरीफ,शांत,सहिष्णुओं की संख्या तेजी से घटी है और अब वे अल्पसंख्यक हैं।
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फेसबुक के बिना कितना कष्ट होता है,कोई रहीम से पूछे-

बिन देखें कल नाहिन, यह अखियान ।
पल-पल कटत कलप सों, अहो सुजान ॥
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फेसबुक मित्रता का फंडा-

रहिमन ओछे नरन सों, बैर भलो न प्रीति ।
काटे चाटे स्वान के, दुहूं भांति विपरीति ॥
-21-
फेसबुक पर पूर्वाग्रह या मन की गांठें रखकर बातें न करें,गांठें स्पष्ट कम्युनिकेशन बाधित करती हैं-

रहिमन खोजे ऊख में, जहां रसनि की खानि ।
जहां गांठ तहं रस नहीं, यही प्रीति में हानि ॥
-22-
नए आधुनिक समाज में चिंता एक बड़ी समस्या है,इस पर रहीम को पढ़ें-

रहिमन कठिन चितान ते, चिंता को चित चेत ।
चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत ॥
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फेसबुक और चैटिंग में जो लोग दुख बांटते हैं उनके लिए रहीम का पद-

रहिमन निज मन की विथा, मन ही राखो गोय ।
सुनि अठिलै है लोग सब, बांटि न लैहे कोय ॥
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रहिमन प्रिति सराहिए, मिले होत रंग दून ।
ज्यों जरदी हरदी तजै, तजै सफेदी चून ॥ रहीम।।
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टेंशन फ्री रहने नुस्खा-

चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।

जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह।।
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समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक।

चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक।।रहीम।।
दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोय।

जो रहीम दीनहिं लखै, दीनबंधु सम होय।।रहीम।।
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भरोसो जाहि दूसरो सो करो ।। तुलसीदास।।
सुनि ऊधौ मोहिं नैकू न बिसरत वै ब्रजवासी लोग ।।सूरदास।।

-फेसबुक-ईमेल-एसएमएस से खुश होने वालों के लिए सूरदास का यह पद जरूर पढ़ना चाहिए-

ऊधौ कहा करैं लै पाती ।
जौ लौं मदनगुपाल न देखैं, बिरह जरावत छाती ॥
निमिष निमिष मोहि बिरसत नाहीं, सरद जुहाई राती ।
पीर हमारी जानत नाहीं, तुम हौ स्याम सँघाती ॥
यह पाती लै जाहु मधुपुरी, जहँ वै बसैं सुजाती ।
मन जु हमारे उहाँ लै गए, काम कठिन सर घाती ॥
सूरदास प्रभु कहा चहत हैं, कोटिक बात सुहाती ।
एक बेर मुख बहुरि दिखावहु, रहैं चरन रज-राती ॥
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कमलेश की मुश्किल है वे अंग्रेजी में बौद्धिक होना चाहते हैं,लेकिन वे ठीक से इस भाषा में न तो सोच पाते हैं और न लिख ही पाते हैं। उनको यदि मातृभाषा से प्रेम है तो हिन्दी में लिखें और फिर अपने लिखे को पढ़ें कि वे कैसे दिखते हैं,कम से कम एक लेखक का अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल करना असभ्य माना जाता है। कमलेश ने झूठ का लबादा अपने ऊपर डाला हुआ है फलतः वे झूठ के अलावा और कुछ नहीं देख पा रहे हैं।सीआईए की वैचारिकसेवा इस तरह के लोग ज्यादा मुस्तैदी से करते हैं जो झूठ का लबादा ओढे रहते हैं।
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हिंसा की संस्कृति का जनक अमेरिका- 4-

इराक में तथाकथित मानवीय हस्तक्षेप करने के पहले मीडिया में यह प्रौपेगैण्डा किया गया कि इराक के पास जनसंहारक अस्त्र हैं,रासायनिक अस्त्र हैं और जल्द हमला न किया गया तो इराक अमेरिकी शहरों पर हमले कर देगा। बाद में अमेरिकी सेना के इराक में जाने पर कहीं पर भी जनसंहारक अस्त्र नहीं मिले।इससे मीडिया के झूठ पर से पर्दा उठा।
इसबार सीरिया के संदर्भ में यही कहा जा रहा है असद की सत्ता रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल कर रही है ।इस बहाने अमेरिका हस्तक्षेप करने का बहाना बना रहा है।
असद सरकार के खिलाफ विपक्ष को सैन्यमदद अमेरिका और नाटो देश मदद तुरंत बंद करें।उनका इस तरह का काम सीरिया की संप्रभुता पर हमला है.इससे सीरिया में जन-धन आदि की व्यापक क्षति हुई है।
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हिंसा की संस्कृति का जनक अमेरिका- 3-

जानकार लोग कह रहे हैं कि सीरिया में अलकायदा को अमेरिका की ओर से रासायनिक हथियार और अन्य सैन्य सामग्री इफरात में मुहैय्या करायी जा रही है। इससे मध्यपूर्व और दूसरे देशों में अलकायदा की शक्ति और संहारक क्षमता का विकास होगा।भारत उनके निशाने पर आ चुका है लेकिन मनमोहन सरकार को इस मामले में सख्त नजरिया अपनाना चाहिए।वरना भारत के अफगानिस्तान हितों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
अलकायदा और तालिबान के साथ पाकस्थित आतंकियों का याराना जगजाहिर है,इसके बाबजूद मनमोहन सरकार ने सीरिया के गृहयुद्ध में अमेरिकी भूमिका की अभी तक जिस तरह अवहेलना की है और हमारे देश का विपक्ष (खासकर वामदल)भी शांत है वह हम सबके लिए चिन्ता की बात है।
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हिंसा की संस्कृति का जनक अमेरिका- 2-

सन् 2003 में बुश प्रशासन ने इराक के खिलाफ युद्ध की घोषणा की तो 10साल बाद ओबामा ने सीरिया में विपक्ष को सैन्य मदद की घोषणा करके बुश प्रशासन की युद्धवादी नीति को दोहराया है। सीरिया के गृहयुद्ध में अब तक 80हजार से ज्यादा निरपराध नागरिक मारे गए हैं। एक तरह से समूचे देश को शरणार्थी बना दिया गया है,सीरिया के पड़ोसी देशों में लाखों सीरियाई शरणार्थी की तरह अमानवीय स्थितियों में जी रहे हैं। इस सबके बावजूद अमेरिका की मनमोहन सरकार खुलकर आलोचना नहीं कर रही,इससे हमारे देश की मध्यपूर्व के देशों में साख गिर रही है।
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हिंसा की संस्कृति का जनक अमेरिका- 1-

अमेरिकी प्रशासन ने हाल ही में सीरिया में विपक्ष को हथियारों और अन्य रूप में मदद करने का फैसला किया है और इससे एकबार फिर से पुष्टि हुई है कि अमेरिका हिंसा का उत्पादक देश है।
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अमेरिका की सारी दुनिया में चल रही जासूसी की हरकतों का पिटारा जिस तरह खुला है उसे लेकर कम से कम भारत के इंटरनेट लेखकों,फेसबुक यूजरों और नागरिकों को मिलकर मोर्चा बनाकर सरकार पर दबाब डालना चाहिए। मनमोहन सरकार ने अमेरिकी नजरदारी को जिस तरह ठंड़े बस्ते के हवाले किया है वह हम सबकी कायरता की निशानी है।
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बुधवार, 5 जून 2013

शीतयुद्धोत्तर परिप्रेक्ष्य की तलाश और मार्क्सवादी रूढ़ियां


-1-
फेसबुक पर हिन्दीलेखकों में लेखकीय ध्रुवीकरण शीतयुद्धीय राजनीति के फ्रेमवर्क से बंधा है। कायदे से शीतयुद्धीय राजनीति और सीआईए- -सोवियत कम्युनिज्म के दायरे से बाहर निकलकर चीजों को देखने की जरूरत है। खासकर मार्क्सवादी और प्रगतिशील लेखकों को अपना नजरिया बदलना पड़ेगा। मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य शीतयुद्धीय राजनीति के पक्ष-विपक्ष मे बांधता है।
नए जमाने की मांग है लोकतंत्र और दुर्भाग्य की बात है कि सीआईए या अमेरिकी साम्राज्यवाद या समाजवाद दोनों ही लोकतंत्र की सत्ता-महत्ता और स्वायत्तता को स्वीकार नहीं करते। मंगलेश डबराल,वीरेन्द्रयादव, अशोक पाण्डेय आदि ने मेरी पोस्ट पर अशोक पाण्डेय की फेसबुक वॉल पर जो बहस चलायी है उसमें भागलेने वाले सुधीजन शीतयुद्ध की राजनीति के दायरे के बाहर निकलकर नहीं सोच पाए हैं।
चार्ली चैप्लिन,ब्रेख्त आदि सभी नामी प्रगतिशील लेखकों के नजरिए की मुश्किलें वही हैं जो शीतयुद्धीय राजनीति की हैं। वे भी उसके दायरे के बाहर नहीं देख पाते। प्रगतिशीलों का शीतयुद्धीय राजनीति को समाजवाद के नजरिए से देखना मार्क्सवादी रूढ़िवाद है। मार्क्सवादी रूढ़िवाद हमें लोकतांत्रिक नजरिए से सोचने में बाधाएं पैदा करता है।
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शीतयुद्धोत्तर परिप्रेक्ष्य की तलाश और मार्क्सवादी रूढ़ियां-1-

फेसबुक पर हिन्दीलेखकों में लेखकीय ध्रुवीकरण शीतयुद्धीय राजनीति के फ्रेमवर्क से बंधा है। कायदे से शीतयुद्धीय राजनीति और सीआईए- -सोवियत कम्युनिज्म के दायरे से बाहर निकलकर चीजों को देखने की जरूरत है। खासकर मार्क्सवादी और प्रगतिशील लेखकों को अपना नजरिया बदलना पड़ेगा। मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य शीतयुद्धीय राजनीति के पक्ष-विपक्ष मे बांधता है।
नए जमाने की मांग है लोकतंत्र और दुर्भाग्य की बात है कि सीआईए या अमेरिकी साम्राज्यवाद या समाजवाद दोनों ही लोकतंत्र की सत्ता-महत्ता और स्वायत्तता को स्वीकार नहीं करते। मंगलेश डबराल,वीरेन्द्रयादव, अशोक पाण्डेय आदि ने मेरी पोस्ट पर अशोक पाण्डेय की फेसबुक वॉल पर जो बहस चलायी है उसमें भागलेने वाले सुधीजन शीतयुद्ध की राजनीति के दायरे के बाहर निकलकर नहीं सोच पाए हैं।
चार्ली चैप्लिन,ब्रेख्त आदि सभी नामी प्रगतिशील लेखकों के नजरिए की मुश्किलें वही हैं जो शीतयुद्धीय राजनीति की हैं। वे भी उसके दायरे के बाहर नहीं देख पाते। प्रगतिशीलों का शीतयुद्धीय राजनीति को समाजवाद के नजरिए से देखना मार्क्सवादी रूढ़िवाद है। मार्क्सवादी रूढ़िवाद हमें लोकतांत्रिक नजरिए से सोचने में बाधाएं पैदा करता है।
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तीसरी मार्क्सवादी रूढ़ि है -मार्क्सवादी कल्पनाशीलता। भारत में विभिन्न रंगत के मार्क्सवादियों में एक विलक्षण साम्य है वे रहते पूंजीवाद में हैं,अधिकार पूंजीवाद के चाहते हैं,पूंजीवादी संरचनाओं के दुरूस्तीकरण के लिए संघर्ष करते हैं, लेकिन चाहते हैं समाजवाद ।
हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों-आलोचकों ने कभी गंभीरता के साथ "कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य और साहित्य" के अन्तस्संबंध पर विचार नहीं किया ।वे पूंजीवाद के सरलीकरणों और अमेरिकी बहानेबाजी के जरिए अपने दायित्व से भागते रहे हैं।
भारतीय समाज के निर्माण में कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य की प्रधान भूमिका रही है। इसे सोवियत समाजवादी नजरिए या अमेरिकी नजरिए से नहीं समझा जा सकता। इसे समाजवाद के आग्रह के नजरिए से भी नहीं समझा जा सकता।
समाजवाद का आग्रह लोकतंत्र की शक्ति को समझने में बाधा पैदा करता है। भारत का वर्तमान लोकतंत्र से निर्धारित हो रहा है और भविष्य में भी लोकतंत्र से जल्दी मुक्ति मिलने वाली नहीं है। समाजवाद यहां के लिए कल्पनाशीलता है। लोकतंत्र को हमें लोकतंत्र के नजरिए से देखना होगा। समाजवाद के नजरिए से लोकतंत्र को देखना मार्क्सवादी कल्पनाशीलता है ।
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मार्क्सवादी रूढ़िवाद की चौथी रूढ़ि है लोकतंत्र को हिकारत की नजर से देखना। हिन्दी के प्रगतिशील  लेखकों में बड़ा हिस्सा है जो समाजवाद के आख्यान और गुणों को जानता है लेकिन भारत में लोकतंत्र में लेखकीय और नागरिक अधिकारों की चेतना से शून्य है।
    मसलन्, हिन्दीलेखकों में  लेखक के अधिकारों को लेकर कोई गुस्सा नहीं है। मसलन्, हमने यह कभी नहीं सुना कि नामवर सिंह या अन्य किसी लेखक ने राजकमल के मालिक से लेखकों की रॉयल्टी समय पर देने के लिए कभी संघर्ष किया हो।
     मैं निजी तौर पर दर्जनों लेखकों को जानता हूँ जिनको प्रकाशक रॉयल्टी नहीं देता और लेखकसंघ चुप तमाशा देखते रहते हैं।
      भारत के लेखक के लिए उसके अधिकारों की चेतना समाजवादी चेतना से ज्यादा महत्वपूर्ण है। लेखक के अधिकारों की चेतना लोकतंत्र के प्रति प्रेम और आस्था पैदा करके ही पैदा की जा सकती है। लोकतंत्र में हिकारत से देखना लोकतंत्र का निषेध है।
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हिन्दी लेखकों में मार्क्सवादीदंभ बहुत बड़ी समस्या है । मार्क्सवादीदंभ भाव रहने वाले लेखक बेहतर न लिखकर भी अपने लेखकीय श्रेष्ठत्व का दावा करते हैं।
इसके कवच के तौर पर वे मार्क्सवाद को पहले सर्वश्रेष्ठ घोषित करते हैं ,बाद में मार्क्सवादियों और फिर अपने को सर्वश्रेष्ठ घोषित करते हैं। ये लेखक भूल गए हैं कि मार्क्सवाद का जन्म श्रेष्ठता के सिद्धांत और संस्कार के प्रतिवाद में हुआ था।
मार्क्सवाद ,मार्क्सवादी और निज को श्रेष्ठ मानने का विचार अवैज्ञानिक है। मार्क्सवाद ने कभी श्रेष्ठता का दावा नहीं किया। स्वयं मार्क्स ने श्रेष्ठ होने का दावा नहीं किया।
एक अच्छा मार्क्सवादी दंभी नहीं संवेदनशील होता है,विनयी होता है,अन्य को सम्मान देता है।
दंभी की भाषा हेटभाषा होती है, रूप में भी और अंतर्वस्तु में भी। एक अच्छा मार्क्सवादी वह है जिसके पास अन्य के विचारों और विचारधारा के लिए जगह है। अन्य हैं इसलिए मार्क्सवाद उनसे भिन्न और वैज्ञानिक है।
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मार्क्सवादी लेखकों की इस दौर में सबसे बड़ी असफलता है कि वे शीतयुद्ध में साहित्य के अवमूल्यन को नहीं रोक पाए। साहित्य के जो मानक रचे गए उनमें इजाफा नहीं कर पाए।साहित्य के नए पैराडाइम को पकड़ नहीं पाए। फलतःआज वे हाशिए के बाहर चले गए हैं। लंबे समय से हिन्दी में मार्क्सवादी आलोचना की कोई किताब बाजार में नजर नहीं आई और हिन्दी के मार्क्सवादी आलोचकों ने समीक्षा का कोई नया मानक नहीं बनाया।
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शीतयुद्ध और उसके बाद के दौर में जातीय विध्वंस का ग्लोबल चक्र चला है। पूर्व समाजवादी समाजों से लेकर कांगो-सोमालिया-इराक अफगानिस्तान आदि तक इसका दायरा फैला हुआ है। एक जमाने में समाजवादी समाज में जातीय समस्या के समाधान का हिन्दी में खूब गुणगान किया गया लेकिन जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो इस जातीय विघटन पर हिन्दी में अधिकांश मार्क्सवादी चुप रहे। यहां तक कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां और माओवादी-नक्सल भी चुप रहे। यह चुप्पी अचानक नहीं है बल्कि शीतयुद्धोत्तर यथार्थ को वैज्ञानिक ढ़ंग से न देख पाने का फल है।
शीतयुद्धोत्तर यथार्थ पहले की तुलना में ज्यादा जटिल और संश्लिष्ट है। नए यथार्थ और नई राजनीतिक समस्याओं के खिलाफ मोर्चा लेते हुए आप स्वयंसेवी संगठनों और व्यक्तियों के समूहों को देख सकते हैं लेकिन मार्क्सवादी दलों-संगठनों को कहीं पर भी नहीं देखेंगे।

मसलन् यूनियन कारबाइड के खिलाफ विगत 25 सालों में कौन संघर्ष कर रहा है ?मोदी के दंगों के खिलाफ कौन केस लड़ रहा है ?आदि अनेक समस्याएं हैं जहां पर छोटे स्वयंसेवी संगठन संघर्ष कर रहे हैं ,कम्युनिस्टदल सोए हैं।

मंगलवार, 4 जून 2013

केजीबी और साहित्य



केजीबी सोवियत संघ की खुफिया एजेंसी है,यह लंबे समय तक समाजवादी सोवियत संघ का ,आज अंग है रूस का। इस संस्था ने कला-साहित्य का कोई आंदोलन प्रमोट नहीं किया लेकिन साहित्य-कला के क्षेत्र में सोवियत संघ में काफी बड़ी संख्या में लेखकों को उत्पीडित किया। इनमें बड़े नाम हैं सोल्जेनित्सिन , सखारोव आदि।
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सोवियत संघ ने समाजवाद का जो मॉडल चुना यह वह मॉडल नहीं है जिसकी कल्पना मार्क्स-एंगेल्स ने की थी। समाजवादी सोवियत संघ में मानवाधिकारों को लेकर कोई समझ ही नहीं थी। खासकर व्यक्तिगत स्वतंत्रता,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि के लिए संविधान से लेकर सामाजिक संरचनाओं में कोई जगह नहीं दी गयी।फलतः विभिन्न किस्म की विचारधाराओं के माननेवाले लेखन और लेखकों के लिए भी कोई जगह नहीं थी। इसके विपरीत भारत में लोकतंत्र है और सभी नागरिकों को मानवाधिकारों की संविधान प्रदत्त गारंटी है। यहां पर कम्युनिस्टलेखक, विरोधी विचारधारा की आलोचना का संवैधानिक हक रखते हैं। इसके बाबजूद वे सोवियतसंघ आदि देशों के लेखकों के अभिव्यक्ति की आजादी के दर्द को महसूस करने में असमर्थ रहे।
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कार्ल मार्क्स -एंगेल्स के विचारों में क्रांतिकारी भावबोध इसलिए विकसित हुआ क्योंकि वे पूंजीवाद की उदार परंपराओं में विकसित हुए और क्रांतिकारी परंपराओं की खोज में सफल रहे । उन्हें उदार पूंजीवादी माहौल मिला। यदि सोवियत संघ में मार्क्स-एंगेल्स होते तो उनके साथ वही होता जो प्लेखानोव के साथ हुआ। प्लेखानोव को रूसी मार्क्सवाद का जनक माना जाता है।
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माइकेल एंजेलो ने एक बार स्वयं अपने विषय में कहा था " मेरा उपदेश ज्ञानी होने का दावा करने वाले अनेक अज्ञानियों को जन्म देगा।" इस पर प्लेखानोव ने कहा दुर्भाग्यवश यह भविष्यवाणी पूरी हो गयी है। आजकल मार्क्स का ज्ञान ऐसे अनेक अज्ञानियों को जन्म दे रहा है,जो ज्ञानी होने का दावा करते हैं।स्पष्ट रूप से इसमें मार्क्स का कोई कसूर नहीं है,बल्कि कसूर उन लोगों का है जो उनके नाम पर मूर्खता की बातें कर रहे हैं।ऐसी मूर्खताओं से बचने के लिए हमें भौतिकवाद की प्रणाली के महत्व को समझना आवश्यक है।
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सोवियत संघ के पतन में जिन कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की उनमें KGB की भूमिका प्रधान कारक है। अर्सा पहले इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली ने सोवियत संघ के पतन पर एक विशेषांक निकाला था उसमें केजीबी के पूर्वप्रधान ने यह बात रेखांकित की थी। इसके अलावा केजीबी का काम था सोवियत नागरिकों की इलैक्ट्रोनिक नजरदारी करना और आंतरिक प्रतिवाद का दमन करना। इसके कारण घर-घर में जासूस पैदा हो गए,बाप अपने बेटे पर, बीबी अपने पति पर केजीबी के लिए जासूसी कर रहे थे। यह सीधे नागरिकों के जीवन को नरक बनाने के प्रयास थे जो अंत में सोवियत संघ के विघटन और समाजवाद के पतन तक ले गए।

सोमवार, 3 जून 2013

फेसबुक मित्रों का हिप्पोक्रेटिक चरित्र

                 
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फेसबुक यूजर नई समस्याओं के समाधान रामायण,महाभारत, हनुमान चालीसा ,शिवचालीसा आदि में क्यों खोजता हैं ? अतीत के बोझ को त्यागे बिना आधुनिक नहीं बन सकते फेसबुक यूजर.
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फेसबुक यूजर अपनी वर्तमान इमेज के एक अंशमात्र को अभिव्यक्त करता है। वह अपना अतीत छिपाता है। सच बोलने से कतराता है ,फलतःजो मित्रता बनती है वह खोखली होती है। यह माउस मित्रता है या मूषक मित्रता है।
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फेसबुक में एनीमि यानी शत्रु की केटेगरी नहीं है, फलतः यही लगता है कि यह मीडियम शत्रुरहित है लेकिन अजातशत्रु युधिष्ठिर का हश्र हम देख चुके हैं उनका कोई शत्रु नहीं था लेकिन घर में 100 कौरव शत्रु निकले, क्या आप शत्रुओं से घिरे हैं ?
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फेसबुक में लाइक है ,डिसलाइक नहीं है। मित्रता के लिए मित्र की कठोर बात को भूलने की जरूरत होती है ,संभवतः इसी कारण डिसलाइक का विकल्प नहीं है।
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फेसबुक पर नकली उदारता के जरिए मित्रगण मित्रता का दावा करते हैं। इस मित्रता में कोई सामाजिक बंधन और जिम्मेदारी नहीं है।
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फेसबुक पर नकली उदारता का प्रदर्शन अंततः हिप्पोक्रेसी है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो नकली उदारता की बाढ़ का प्रत्येक वॉल पर सहज ही प्रदर्शन देख सकते हैं। नकली उदारता को बुद्धिमत्तापूर्ण अभिव्यक्ति समझनेकी भूल न करें।
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फेसबुक पर हिप्पोक्रेसी वही करते हैं जो आमजीवन में भी हिप्पोक्रेट हैं। हिप्पोक्रेट बड़े महत्वाकांक्षी होते हैं। लेकिन फेसबुक तो महत्वाकांक्षाओं का अन्त है।
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कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए हिप्पोक्रेसी का निषेध हर स्तर पर किया जाना चाहिए। जो कलात्मक अभिव्यक्ति में अक्षम हैं वे ही नकली अस्मिता का इस्तेमाल करते हैं। हमें इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि फेसबुक आने के बाद हिप्पोक्रेसी बढ़ी है या घटी है ? जो लोग सामने मिलने पर अच्छे से बात नहीं करते वे फेसबुक पर भद्रभाव से बातें करते हैं, यह नकली कम्युनिकेशन का आदर्श प्रमाण है।
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फेसबुक में जो नकली नाम से सक्रिय है वे मूलतःवे लोग हैं जिनका स्वयं के प्रति कोई श्रद्धा और सम्मान नहीं है। नकली लोग और नकली नाम अंततः हिप्पोक्रेसी का वातावरण बनाते हैं और यह कु-कम्युनिकेशन की कोटि में आता है।
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फेसबुक में नकली नामों का जमघट है यह फेसबुक यूजर की हिप्पोक्रेसी है और हिप्पोक्रेट समाज नहीं बदल सकते।
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हिप्पोक्रेसी के कारण शब्द और अर्थ व्यक्ति के विचार और कर्म के बीच फांक नजर आती है। इस दरार को फेसबुक ने और भी चौड़ा किया है।
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फेसबुक यूजर को कलाकार-लेखक की कोटि में नहीं रख सकते। इसका प्रधान कारण है लेखक-कलाकार को कम्युनिकेशन में अंततःसफलता मिलती है लेकिन फेसबुक में कम्युनिकेशन के कु-कम्युनिकेशन में रूपान्तरित होने का खतरा हमेशा बना रहता है।पता नहीं आपकी लिखी पंक्तियां किसे कष्ट दे रही हो ? या कौन गलत ढ़ंग से पढ़ रहा हो ?
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फेसबुक पर हिप्पोक्रेसी खूब दिखती है। हिप्पोक्रेसी के कारण ही मित्रगण कुछ भी वायदा करते हैं, क्योंकि वायदा करने में कोई क्षति नहीं है।
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नया कम्युनिकेशन युग मनुष्य की संप्रेषण क्षमताओं का विस्तार है। साथ ही कम्युनिकेशन तकनीकी मनुष्य की संवेदनशीलता का विस्तार है।
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इंटरनेट कम्युनिकेशन के विभिन्न रूपों के आने के साथ ही प्राइवेसी का नया पैराडाइम सामने आया है।
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फेसबुक में सवारी कोई नहीं सब ड्राइवर हैं।
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फेसबुक वस्तुतः ऑटोमेशन युग का कम्युनिकेशन है इसमें जब भी आप कम्युनिकेट करेंगे अपने आप कम्युनिकेट करना होगा। आप क्या हैं और किस तरह कम्युनिकेट करना चाहते हैं यह निजी तौर पर खोज करनी पड़ेगी।