बुधवार, 18 मार्च 2015

मुगलों की पहली देन


संघ परिवार के लोग आए दिन मुगलों के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं और समसामयिक जीवन में हिन्दू मुसलमानों के बीच में वैमनस्य पैदा करने के लिए अतीत की बुराईयोंका खूब पारायण करते हैं। हमारा मानना है भारत में धर्मनिरपेक्ष वातावरण बनाने केलिए अतीत की सकारात्मक उपलब्धियों पर नजर रखें तो बेहतर होगा। मुगल शासन की भारतको दस बड़ी देन हैं। इनका जिक्र इतिहासकार यदुनाथ सरकार ने किया है। मुगलशासन कीपहली बड़ी देन है ,'' बाहरी दुनिया केसाथ संबंध –स्थापन,भारतीय नौशक्ति का संगठन और समुद्रपार विदेशों में वाणिज्य।''
सरकार के अनुसार ''आठवीं शताब्दी मेंनवजाग्रत हिन्दूधर्म अपने घर को संभालने में लग गया । उसने हिन्दू समाज को नए रुपमें संगठित करके उसे अति कठिन बंधनों से जकड़ दिया,जिससे विदेशी का संपूर्णबहिष्कार हुआ और समाज के अंगों में नवीनता का संयोग या किसी प्रकार का परिवर्तन मात्र ही पाप और आचारभ्रष्टतासमझी जाने लगी। उस समय हिन्दू समय 'अचलायनी' बन गया,और उसके अपने देश की भौगोलिक परिधि के अंदर ही अपनी दृष्टि कोइस तरह आबद्ध करके रखा,मानो भारत के बाहर कोई देश ही नहीं है । ''


किंतु मुसलमानों के भारत जीतने के बाद भारतवर्षकूप-मंडूक बनकर नहीं रह सका और अन्यान्य देशों के साथ फिर उसका संबंध औरआदान-प्रदान जारी हुआ । विश्व के विभिन्न देशों के साथ व्यापार संबंध स्थापित हुए। उस समय बोखारा,समरकंद बलख औरखुरासान,खारिजम और फारस के देशों के साथ नियमित व्यापार होता था। उस समय अफगानिस्तानदिल्ली-साम्राज्य का सूबा था। बोलनघाटी से हर साल भारतीय मालों से लदे 14हजार ऊँटकंधार और फारस जाया करते थे।मछलीपट्टन बंदरगाह से प्रतिवर्ष असंख्य जहाजसिंहल,सुमात्रा,जावा,स्याम,चीन यहां कि जंजीबार आदि देशों में जाया करते थे। इससेभारत को उदार बनाने में मदद मिली,हिन्दूधर्म की रुढ़ियां कमजोर हुईं।

मुगल शासक और हिन्दू लेखक

        संघ परिवार के मुस्लिम विरोधी कुप्रचार ने देश का सबसे ज्यादा अहित किया है ,खासकर नयी युवा पीढ़ी के दिमाग में मुसलमानविरोधी कु-संस्कार पैदा किए हैं। इससे आधुनिक समाज के निर्माण की प्रक्रिया बाधित हुई है। मुगल शासकों ने बड़े पैमाने पर हिन्दी के कवियों को अपने शासन से मदद दिलवायी। मसलन् ,शहाबुद्दीन गोरी के यहां आश्रित कवि थे- केदार कवि । 

हुमायूं के यहां -क्षेम बंदीजन ।

सम्राट अकबर के आश्रित हिन्दी कवियों में प्रमुख हैं- गंग,नरहरि,करण,होल,ब्रह्म (बीरबल) अमृत,मनोहर,जगदीश,जोध,जयत,जगामग,कुम्हणदास ,टोडरमल,माधौ और श्रीपति आदि।

शाहजहां के यहां पंडितराज जगन्नाथ कविराज,हरिनाथ,कुलपति मिश्र, कवीन्द्र सुंदर, चिंतामणि,शिरोमणि ,दुलह,वेदांगराय,सुकवि बिहारीलाल आदि।

औरंगजेब के यहां -ईश्वर,इंद्रजीत त्रिपाठी ,मतिराम,कालिदास त्रिवेदी,कृष्णपंथी घनश्याम,जयदेव आदि।

मुसलमानों की देन है इतिहास रचना


 
 इतिहास के  बिना मनुष्य बोगस नजर आता है। भारत में मुग़लों के आने के पहले इतिहास लेखन की परंपरा नहीं थी । आरएसएस के लोग मुसलमानों को बर्बर और हिन्दू विरोधी प्रचारित करने के चक्कर में यह भूल ही गए कि मुसलमानों के आने के बाद ही भारत में इतिहास लिखने की परंपरा का श्रीगणेश हुआ है। मुग़लों के आने के पहले हिन्दुओं में सांसारिक घटनाओं और दैनंदिन ज़िंदगी की घटनाओं का इतिहास लिखने की प्रवृत्ति नहीं थी। हिन्दुओं के लिए तो संसार माया था और माया का ब्यौरा कौन रखे ! मुसलमानों को इसका श्रेय जाता है कि हमने उनसे इतिहास लिखना सीखा। मुग़लों के आने के पहले हिन्दूसमाज में दैनंदिन जीवन में क्या घटा और कैसे घटा इसका हिसाब रखना समय का अपव्यय माना जाता था । यही वजह है कि मुग़लों के आने के पहले कभी किसी व्यक्ति ने इतिहास नहीं लिखा। कुछ राज प्रशस्तियाँ या अतिरंजित वर्णन जरुर मिलते हैं। उनमें तिथियों का कोई कालक्रम नहीं है। इतिहासकार यदुनाथ सरकार के अनुसार उस दौर में काल -निरुपण ग्रंथ तो एकदम नहीं मिलते। 
    यदुनाथ सरकार ने लिखा है" अरब लोग पक्के व्यवहारवादी थे और प्रकृत-वस्तुओं पर सर्वदा सजग दृष्टि रखा करते थे। इसीलिए उन्होंने इस्लाम  के आदि युग से लेकर घटनाओं का इतिहास , राजाओं की तिथि-संवत और राजाओं की जीवनियां लिख छोड़ी हैं। उनके इस इतिहास में तिथि संवतों का पूर्ण समावेश पाया जाता है । " यही वह प्रस्थान बिंदु है जहाँ से भारत में इतिहास रचना आरंभ होती है। बाद में हिन्दू लेखकों ने इस पद्धति का प्रयोग किया । मुसलमान इतिहासकारों की रचनाओं के जरिए ही हमें उस दौर के हिन्दू समाज और हिन्दू राजाओं के बारे में जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। 
   कहने का तात्पर्य है कि भारत के निर्माण में मुसलमानों की देन को भूलना नहीं चाहिए। इतिहास रचना हमें मुसलमानों से ही प्राप्त हुई ।
    

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

बलात्कार को भूलो और माफ़ करो के नज़रिए से न देखो !



आज अख़बार से पता चला कि कोलकाता के पार्कस्ट्रीट बलात्कार कांड की पीड़िता की मृत्यु हो गयी , अफ़सोस है कि अपराधी मस्त हैं और पीड़िता चल बसी। यह न्याय और राज्य सरकार दोनों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए कि बलात्कार तो बर्बरता है, औरत पर सामाजिक हमला है। वह कोई 
सामान्य घटना नहीं ।यह शारीरिक हिंसा है, बलात्कार इससे भी जघन्य शारीरिक -मानसिक हिंसाचार के साथ सामाजिक हत्या है।  
   सामान्य हिंसाचार जैसे चांटा मारने का प्रतिकार हो सकता है, बदले में चांटा मार सकते हैं,या सहन करके रह सकते हैं। चांटा मारना सामान्य उत्पीड़न है। फिर भी हिंसा है।निंदनीय है।सामान्य हिंसा या अपमान को एक अवधि के बाद औरत भूल सकती है ,लेकिन बलात्कार तो स्त्री की सामाजिक हत्या है। बलात्कार के बाद औरत मर जाती है। उसका मन , तन और सामाजिक परिवेश नष्ट हो जाता है। 
   हम याद करें द्रौपदी के अपमान को जिसके कारण उसने पांडवों से कह दिया था कि जाओ पहले मेरा अपमान करने वालों का वध करके आओ। मैं फिर में केश बाँधूँगी ।स्त्री का अपमान वह छोटे रुप में हो या बलात्कार जैसे बर्बर रुप में हो , उसे"भूलो और माफ़ करो ", के नज़रिए से नहीं देखना चाहिए। 
      बलात्कार बर्बरता है यह सभ्यता के सभी  मानकों का उल्लंघन है। बलात्कार कभी सामान्य रुप में घटित नहीं होता . वह स्त्री की योनि,मन और सामाजिक ज़िंदगी को हमेशा के लिए नष्ट कर देता । बलात्कार पीड़िता स्वयं तो पीडित होती ही है उसका परिवार भी पीडित होता है, यातनाएँ झेलता है। बलात्कारी को कभी न तो लिंग में कष्ट होता है , न मन में तकलीफ़ होती और न सामाजिकतौर पर उसकी कोई क्षति होती है। 
     हमारे समाज का पुंसवादी ढाँचा , नेतागण और मीडिया का पुंसवादी परिवेश हमेशा बलात्कारी के पक्ष में खडा रहता है। मीडिया में आएदिन औरतों पर हमलों को महिमामंडित किया जाता है, बलात्कार को जायज़ ठहराते हुए फ़िल्में और सीरियल बड़ी संख्या में आते रहते हैं। यहाँ तक कि हमारे तमाम स्वनाम धन्य बडे कलाकार ऐसी फ़िल्मों में अभिनय भी करते हैं। अख़बारों में बलात्कारियों के पक्ष में अनेक पत्रकारगण आएदिन माहौल बनाते रहते हैं। 
               बलात्कार औरत पर बर्बर हमला है,अक्षम्य सामाजिक अपराध है। बलात्कारी का एकमात्र इलाज है कि उसे हमेशा के लिए जेल में बंद रखा जाय और दंड स्वरुप नपुंसक बनाया जाय। बलात्कार सामान्य अपराध नहीं है। बलात्कारी के प्रति कठोर बनें और बलात्कार की पीड़िता के साथ सामाजिक एकजुटता प्रदर्शित करें । 

रविवार, 8 मार्च 2015

'हाय ईसाई-हाय ईसाई' !!

     संघ प्रमुख मोहन भागवत इन दिनों ''हाय ईसाई-हाय ईसाई'' के दर्द से पीड़ितहैं। उनके दर्द की दवा भारत के किसी धर्म में नहीं है । मोहन भागवत की खूबी यह हैकि वे निजीतौर पर ''हाय ईसाई'' की पीड़ा से परेशान नहीं है वे सांगठनिक तौर परपरेशान हैं !राजनीतिकतौर पर परेशान हैं ! ''हाय ईसाई'' धीमा बुखार है। जो भागवतियोंको बारह महिने रहता है ! कभी-कभी पारा कुछ ज्यादा चढ़ जाता है !  खासकर उस समय पारा ज्यादा चढ़ जाता है जब वेईसाईयों को गरीबों की सेवा करते देखते हैं ,स्कूल चलाते देखते हैं ।अस्पताल चलातेदेखते हैं। आम लोगों के घरों में ईसामसीह की तस्वीर देखते हैं।अथवा किसी ईसाई संत कोदेखते हैं ।  
    कोढ़ियों की सेवा या अति गरीबों की सेवा का कामसंघ भी कर सकता है उसे किसने रोका है, उन्होंने यह काम क्यों नहीं किया ?  बतर्जमोहन भागवत ,देस तो हिन्दुओं का है ! फिरदुखी-असहाय हिन्दुओं को ये संघी लोग मदद क्यों नहीं करते ?क्यों ईसाई मिशनरी के लोग ही यह कामकरते हैं ? क्याहमें लज्जा नहीं आती कि देश हमारा है और सेवा बाहर से आया धर्म और व्यक्ति कर रहेहैं । हमें हिन्दूधर्म के मठाधीशों की अमानवीय,अकर्मण्य और संवेदनहीन मनोदशाओं कोआलोचनात्मक नजरिए से देखना चाहिए।
   हमेंसवाल खड़े करने चाहिए कि हिन्दूधर्म के ठेकेदारों ने अति-गरीबों की उपेक्षा क्योंकी ? आम जनता मेंबढ़ती गरीबी-अशिक्षा-बीमारियों की बाढ़ से धर्म के ठेकेदारों के दिल क्यों नहींपसीजे ? शंकराचार्य सेलेकर संघ तक सभी का यह दायित्व बनता है कि वे देस में गरीबों की निःशुल्क चिकित्साव्यवस्था कराएं,हिन्दू कारपोरेट घरानों से कहें कि हिन्दुओं के हितार्थ धन दें ! लेकिन अफसोस है कि आज तक संघ ने हिन्दुओं कीमुफ्त चिकित्सा का कोई बड़ा प्रकल्प  अपनेहाथ में नहीं लिया ? कोढ़ियोंकी मुक्ति का कोई बड़ा हिन्दू नायक पैदा नहीं किया! किसने रोका था संघ को अतिगरीबों की सेवा करने से । किसने रोका थागरीबों के लिए शिक्षा संस्थान खड़े करने से ? संघ ने  हिन्दू मंदिरों सेहोने वाली आमदनी को विकास कार्यों में खर्च करने की कोई मुहिम क्यों नहीं चलायी ?
    संघ के संरक्षण में सैंकड़ोंअखाड़े हैं, हजारों संयासी हैं जिनका वे ख्याल रखते हैं। सैंकड़ों मंदिर और सम्प्रदायहैं जो मंदिरों से धन उठाते हैं ,मंदिर बनवाते हैं या भवन बनवाते हैं या फिर संघका '' हम हिन्दू हमहिन्दू''  प्रचार  करतेहैं। प्रचार से धर्म नहीं बचता। धर्म बचता है जनता की सेवा से। हिन्दू धर्म कोबचाना है तो संघ के लोग सेवा करना सीखें। धर्म में सेवा का महत्व है। प्रेम कामहत्व है। मुश्किल यह है कि संघ को सेवा और प्रेम से कोई लेना-देना नहीं है।उलटेइन चीजों से ऩफरत करते हैं।
    संघपर बातें करते समय संघ के  समग्र आचरण कोदेखें ,उसमें निजी कार्य करने वालों को नहीं। संघ की समग्रता में जो भूमिका रही हैवह सारी दुनिया में चिन्ता पैदा कर रही है। संघ ने ईसाई और इस्लाम के खिलाफ जिसतरह मोर्चे खोले हुए हैं उससे देश में सामाजिक घृणा बढ़ रही है। सामान्य मध्यवर्गके लोगों में ईसाईयों और इस्लाम के खिलाफ नफरत बढ़ी है। फेसबुक पर समझदार लोग भी ''हाय ईसाई –हाय ईसाई'' कर रहे हैं ! यह बेहद चिन्ताजनक स्थिति है।
   ''हाय ईसाई हाय ईसाई''का नारा धार्मिक असहिष्णुता बढ़ाने वाला है और सामान्य सामाजिक परिवेश को घृणा सेभर रहा है। यह संविधान की मूल भावना पर हमला है। असल में मोहन भागवत और उनकीहिन्दूभजन मंडली बुनियादी तौर इस तरह के प्रसंगों को उठाकर  संविधान की मूल धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिकभावना को घायल कर रही है। वे ईसाईयों और मुसलमानों के बारे में आधारहीन औरकाल्पनिक बातों को प्रचारित करते हैं और फिर उन पर विश्वास  पैदा करने के लिए मीडिया का इस्तेमाल करते हैं ।
   घृणाके प्रचारकों की यह विशेषता रही है कि उसको सत्य से नफरत होती है। मोहन भागवत कीभी यही समस्या है,वे सत्य कम बोलते हैं और सत्य अधिक बोलते हैं। किसी संगठन कासरगना यदि असत्य बोले और उसको ही काल्पनिक कहानियों के जरिए प्रचारित करे तो उसेहम एक ही तरीके से रोक सकते हैं, हम उसका प्रतिवाद करें । जिस तरह 'हाय ईसाई हाय ईसाई' का नारा काल्पनिक है और असत्य पर आधारित है, वैसे ही संघ का 'हम हिन्दूसब हिन्दू' का नाराकाल्पनिक है।
   भारतआधुनिक देश में इसमें नागरिक रहते हैं,हिन्दू-ईसाई आदि नहीं रहते। संविधान ने हमेंनागरिक की पहचान दी है। हमें नागरिकों के हक दिए हैं। हिन्दुओं या ईसाईयों के पासउनके धर्म के दिए सीमित अधिकार हैं। असल अधिकार तो वे हैं जिन्हें हम नागरिकअधिकार कहते हैं। देश नागरिक अधिकारों में जीता है,धर्म में नहीं।हम धार्मिक नहीं,नागरिक हैं।

     

गालियाँ और कु-संस्कृति

       पुनरुत्थानवाद की खूबी है कि वह पुराने असभ्य सामाजिक रुपों ,भाषिक प्रयोगों ,आदतों या संस्कारों को बनाए रखता है।गालियां उनमें से एक हैं। पुनरुत्थानवाद के असर के कारण हिन्दीभाषी राज्यों में गालियां आज भी असभ्यता के बर्बर रुप के तौर पर बची हुई हैं और आम सम्प्रेषण का अंग हैं। हिन्दी में रैनेसां का शोर मचाने वाले नहीं जानते कि हिन्दी में रैनेसां असफल क्यों हुआ ? रैनेसां सफल रहता तो हिन्दी समाज गालियों का धडल्ले से प्रयोग नहीं करता। बांग्ला ,मराठी ,तमिल,गुजराती में रैनेसां हुआ था और वहां जीवन और साहित्य से गालियां गायब हो गयीं। लेकिन हिन्दी में गालियां फलफूल रही हैं। गालियां असभ्यता की सूचक हैं। जिस साहित्य और समाज में अभिव्यक्ति का औजार गाली हो वह समाज पिछडा माना जाएगा। गालियां इस बात का संकेत हैं कि हमारे समाज में सभ्यता का विकास धीमी गति से हो रहा है। यथार्थ की भाषिक चमक यदि गाली के रास्ते होकर आती है तो यह सांस्कृतिक पतन की सूचना है। 
हिन्दी में अनेक लेखक हैं जो साहित्य में गालियों का प्रयोग करते हैं। अकविता से लेकर काशीनाथ सिंह तक के साहित्य में गालियां सम्मान पा रही हैं। गाली अभिव्यक्ति नहीं है। यथार्थ कभी गालियों के जरिए व्यक्त नहीं होता। अधिकांश बड़े साहित्यकारों ने यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए कभी गालियों का प्रयोग नहीं किया। गालियों का किसी भी तर्क के आधार पर महिमामंडन करना गलत है। हिन्दी में कई लेखक हैं जो अपनी साहित्यिक अभिव्यक्ति के लिए गालियों का प्रयोग करना जरूरी समझते हैं। युवाओं में गालियों का सहज प्रयोग मिलता है। इन दिनों इलैक्ट्रोनिक मीडिया में भी गालियों का प्रयोग बढ़ गया है।सवाल उठता है हिन्दी समाज इतना गाली क्यों देता है ? क्या हम गालियों से मुक्त समाज नहीं बना सकते ? वे कौन सी सांस्कृतिक बाधाएं हैं जो हमें गालियों से मुक्त नहीं होने देतीं ? प्रेमचंद ने लिखा है '‘हर जाति का बोलचाल का ढ़ंग उसकी नैतिक स्थिति का पता देता है। अगर इस दृष्टि से देखा जाए तो हिन्दुस्तान सारी दुनिया की तमाम जातियों में सबसे नीचे नजर आएगा। बोलचाल की गंभीरता और सुथरापन जाति की महानता और उसकी नैतिक पवित्रता को व्यक्त करती है और बदजवानी नैतिक अंधकार और जाति के पतन का पक्का प्रमाण है। जितने गन्दे शब्द हमारी जबान से निकलते हैं शायद ही किसी सभ्य जाति की ज़बान से निकलते हों।'’
आम तौर पर हिन्दी में पढ़े लिखे लोगों से लेकर अनपढ़ लोगों तक गालियों का खूब चलन है। कुछ के लिए आदत है। कुछ के लिए धाक जमाने,रौब गांठने का औजार हैं गालियां। पुलिस वाले तो सरेआम गालियों में ही संप्रेषित करते हैं। गालियों के इस असभ्य संसार को हम तरह-तरह से वैध बनाने की कोशिश भी करते हैं। कायदे से हमें अश्लील भाषा के खिलाफ दृढ़ और अनवरत संघर्ष करना चाहिए। यह काम सौंदर्यबोध के साथ -साथ शैक्षिक दृष्टि से भी जरूरी है। इससे हम भावी पीढ़ी को बचा सकेंगे।गालियों के प्रयोग के खिलाफ हमें खुली निर्मम बहस चलानी चाहिए। बगैर बहस के गालियां पीछा छोड़ने वाली नहीं हैं। बहस से ही दिमागी परतों की धुलाई होती है।गालियां मिथ्या साहस की अभिव्यक्ति हैं। गालियां एक सस्ती,घृणित और नीच अश्लीलता है। गालियां महज यांत्रिक आघात नहीं करतीं। इनसे न तो सेक्सी बिम्ब उभरते हैं और न कामुक अनुभूतियां ही पैदा होती हैं। सेक्सी गालियां हमारी अरूचिकर और अस्वास्थ्यकर संवेदनशीलता की अभिव्यक्ति हैं। अश्लील गालियां और अश्लील मजाक के जरिए परपीड़न होता है। गंदे किस्से, चुटकुले,चालू अश्लील शब्द मानवीय सौंदर्य की गरिमा को कम करते हैं। मानव इतिहास आदिम शरीरक्रियात्मक मानकों को कूड़े के ढ़ेर पर फेंक चुका है। लेकिन अभी भी हमारे अनेक मित्र गालियों की हिमायत कर रहे हैं। इस प्रसंग में प्रसिद्ध रूसी शिक्षाशास्त्री अन्तोन माकारेंको याद आ रहे हैं उन्होंने लिखा है- '‘पुराने जमाने में शायद गाली-गलौज की गंदी भाषा कमजोर शब्दावली तथा मूक-निरक्षरता के लिए सहायक की तरह अपने ही ढ़ंग से काम आती थी। स्टैंडर्ड गाली की सहायता से आदिम- भावों को अभिव्यक्त किया जा सकता था, जैसे क्रोध,प्रसन्नता, आश्चर्य, निंदा और ईर्ष्या । लेकिन अधिकांशतः यह किसी भी भावना को व्यक्त नहीं करती थी, बल्कि असम्बद्ध ,मुहावरों और विचारों को जोड़ने के साधन का काम देती थी।'’
हमें इस सवाल पर भी सोचना चाहिए कि हिन्दी में गालियां कहां से आ रही हैं? गालियों के मामले में हम लोकल और ग्लोबल एक ही साथ होते जा रहे हैं। जाने-अनजाने असभ्यता का विनिमय कर रहे हैं। कुछ लोग भाषा को उग्र या आक्रामक बनाने के लिए गालियों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि हमारी जनता उग्र और आक्रामक भाषा पसंद नहीं करती। वह इसे असभ्यता मानती है। गालियों से अभिव्यक्ति में पैनापन नहीं आता बल्कि असभ्यता का संचार होता है। तीक्ष्णता और अभद्रता में हमें अंतर करना चाहिए। हमें बहस-मुबाहिसों में असभ्यता से बचना चाहिए। बहस मुबाहिसे में यदि असभ्यता आ जाती है तो फिर गालियां स्वतः ही चली आती हैं। हिन्दी में स्थिति इतनी बदतर है कि एक नामी साहित्यिक पत्रिका के संपादक आए दिन अपने संपादकीय तेवरों को आक्रामक बनाने के लिए असभ्य भाषा का प्रयोग करते थे। वे भाषा में तीक्ष्णता पैदा करने के लिए ऐसा करते थेलेकिन यह मूलतः असभ्यता है। हमें अभिव्यक्ति के लिए तीक्ष्णता का इस्तेमाल करना चाहिए ,असभ्य भाषिक प्रयोगों का नहीं। इन जनाब के संपादकीय अनेक मामलों में अधकचरी विद्वता और अक्षम तर्कपूर्ण शैली से भरे होतेथे।
हमें विचारों की तीक्ष्णता और साहित्यिक अभिव्यंजना की अभद्रता के बीच अंतर करना चाहिए। लेखन में गाली का प्रयोग एक ही साथ गलत और सही दिखता है। एक जमाने में महान रूसी लेखक पुश्किन ने तीक्ष्णता और अभद्रता के अंतर का विवेचन करते हुए लिखा था, ‘ 'गाली कभी-कभी ,निश्चय ही,बिल्कुल अनुचित है। जैसे कि आपको नहीं लिखना चाहिएः ‘‘यह हांफता हुआ बूढ़ा,चश्मा लगाए हुए एक बकरा है,एक कमीना झूठा है,बदकार है,बदजात है।’’- ये व्यक्ति को दी गयी गालियां हैं। किन्तु अगर आप चाहें ,तो लिख और छाप सकते हैं कि ‘‘यह साहित्यिक पुराना उपासक(अपने लेखों में) एक निरर्थक बकवासी है,हमेशा दुर्बल,हमेशा उकताने वाला,कष्टकर और बिल्कुल अहमक़ तक है।’,'’क्योंकि यहां पर कोई व्यक्ति नहीं एक लेखक है।’'
इसी प्रसंग में अन्तोन माकारेंको ने लिखा है, ‘'हमारे देश में गाली-गलौज के शब्दों का ‘‘तकनीकी’’ महत्व खत्म हो गया है, लेकिन भाषा में वे अभी भी मौजूद हैं। अब वे मिथ्या साहस को, ‘‘लौह चरित्र’’ को,निर्णायकत्व,सरलता ,सुरूचि के प्रति तिरस्कार को अभिव्यक्त करते हैं। अब वे एक किस्म के ऐसे नखरे हैं,जिनका मकसद सुनने को खुश करना ,उनको जीवन के प्रति सुनानेवाले के साहसिक रवैय्ये और पूर्वाग्रहहीनता को दर्शाना है।'’
साहित्य में गाली के पक्षधरों का मानना है पात्र यदि गाली देते हैं तो हमारे लिए उससे बचना संभव नहीं है। इस प्रसंग में यही कहना है कि गालियां साहित्य नहीं हैं। गालियां जीवन का यथार्थ भी नहीं हैं। गालियां महिलाओं का अपमान हैं और बच्चों के लिए हानिकारक हैं। गालियों के प्रति हमें लापरवाह नहीं होना चाहिए। गालियों को साहित्य में रखकर हम उन्हें दीर्घजीवी बना रहे हैं। उन्हें मूल्यबोध प्रदान कर रहे हैं। विरासत के रूप में गालियां हमारे समाज और संस्कृति की गंभीर क्षति कर रही हैं। प्रेमचंद ने लिखा है '‘ गाली हमारा जातीय स्वभाव हो गयी है।’','‘गालियों का असर हमारे आचरण पर बहुत खराब पड़ता है। गालियाँ हमारी बुरी भावनाओं को उभारती है और स्वाभिमान व लाज-संकोच की चेतना को दिलों से कम करती हैं जो दूसरी क़ौमों की निगाहों में ऊँचा उठाने के लिए जरूरी है।’'
जब कोई व्यक्ति गालियों का इस्तेमाल करता है तो पढ़ने या सुनने वाला किसी सापेक्ष शब्द को नहीं सुनता बल्कि वह गाली के जरिए उसमें अन्तर्निहित सेक्स के अर्थ तक पहुँचता है। इस दुर्भाग्य का मूल सार यह नहीं है कि सेक्स का राज पाठक या श्रोता के सामने खुल जाता है, बल्कि यह कि वह राज अपने सबसे ज्यादा कुरूप,मानवद्वेषी तथा अनैतिक रूप में उदघाटित होता है। ऐसे शब्दों का बारम्बार होने वाला उच्चारण या लिखित प्रयोग पाठक या श्रोता को सेक्सी मामलों पर अत्यधिक ध्यान देने की,विरूपित दिवास्वप्न देखने की आदत पैदा करता है। इससे लोगों में अस्वास्थ्यकर रूचियों का विकास होता है।
अधिकांश गालियां स्त्रीकेन्द्रित हैं और उनके गुप्तांगों को लेकर हैं या उसके विद्रूपों को लेकर हैं। इससे सामाजिक हिंसा में बढ़ोतरी होती है। साथ ही यह भावना पैदा होती है कि औरत इस्तेमाल की चीज है। अपमानित है। मादा है। आश्चर्यजनक बात है कि हमारे स्कूली पाठ्यक्रमों से लेकर बड़ी कक्षाओं तक गालियों के खिलाफ कोई पाठ नहीं है। सारे देश के बुद्धिजीवी आराम से आए दिन सिलेबस बनाते हैं और पढ़ाते हैं। लेकिन गालियों के बारे में कभी क्लास नहीं लेते। कभी बोलते नहीं हैं। उलटे यह देखा गया है कि जिस बच्चे को डांटना होता है उस पर गालियों की बौछार कर देते हैं।
गालियों का प्रयोग सत्य को स्थगित कर देता है। हम जब गाली देते हैं या गाली लिखते हैं तो उस समय हमारी नजर गाली पर होती है सत्य पर नहीं,हम गाली में उलझे होते हैं। गालियों के प्रयोग से वर्तमान साफ नजर नहीं आता। गालियों का प्रयोग विचारों और यथार्थ को एक नई भंगिमा में तब्दील कर देता है। एक विलक्षण किस्म के पाठ की सृष्टि करता है। वह अवधारणाओं के अर्थ और यथार्थ के अर्थ को संकुचित करता है। अर्थ संकुचन गालियों की पूर्वशर्त है। यह य़थार्थ को उसके स्रोत से काट देता है । जबकि लेखक यही दावा करता है कि वह वास्तविकता दरशाने के लिए गालियों का प्रयोग कर रहा है। गालियों के साहित्यिक प्रयोग को स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में ही पेश किया जाता है। जबकि सच इसके एकदम विपरीत है।गालियों का प्रयोग अर्थविस्तार नहीं करता उलटे अर्थसंकोच करता है। जब कोई लेखक यथार्थ को गालियों में खींच लाता है तो वह यथार्थ के साथ जुड़े बुनियादी तर्कों से उसे अलग कर देता है। यथार्थ के सत्य और असत्य विकल्पों की संभावनाएं खत्म कर देता है। गालियों का प्रयोग यथार्थ की बहस को वर्तमान काल में ले आता है। अब उसके लिए वर्तमान का जीवंत यथार्थ बेमानी होता है। गालियों का प्रयोग वर्तमान यथार्थ को शरणार्थी बना देता है।
वैसे अधिकांश रचनाओं में एकाधिक अर्थ की संभावनाएं होती हैं लेकिन गाली के प्रयोग वाले अंशों में एक ही अर्थ होता है। एकाधिक अर्थ या भिन्न अर्थ की संभावनाओं को गालियां नष्ट कर देती हैं। गालियों का प्रयोग सामाजिक गैर -बराबरी को बनाए रखता है। सामाजिक हायरार्की को आप इसके प्रयोगों के जरिए अपदस्थ नहीं कर सकते। गालियों में परिवर्द्धन और सम्बर्द्धन संभव नहीं है वे जैसी बनी थीं वैसी ही चली आ रही हैं। यह सिलसिला सैंकड़ों सालों से चला आ रहा है। गालियों के जरिए युगीन विचारों को नहीं पकड़ सकते। हिन्दी में जिसे दिल्लगी कहते हैं वह भी गालियाँ है। प्रेमचंद ने दिल्लगी को गालियों से कुछ कम घृणित माना है। गालियों को उन्होंने ‘जातीय कमीनेपन’ और ‘नामर्दी’ का सबूत कहा है। साथ ही इसे ‘जातीय पतन की देन’ माना है। उनके ही शब्दों में गालियां‘' जातीय पतन दिलों की इज़्ज़त और स्वाभिमान की चेतना को मिटाकर लोगों को बेग़ैरत और बेशर्म बना देती है।’'गालियां अनुभूति की शक्ति मिटा देती हैं।

किसान के हक में

       किसान का नाम आते ही राजनीति का रोमांस गायब हो जाता है। किसान के सवाल आते ही राजनीति की वर्गीयबुनाबट खुलने लगती है। लोकतंत्र के विभ्रम टूटने लगते हैं। किसानों का नंदीग्रामप्रतिवाद हाल के वर्षों का ऐसा आंदोलन रहा है जिसने मनमोहन सरकार को पुराना भूमिअधिग्रहण कानून बदलने के लिए मजबूर किया था। जबकि पुराने कानून के तहत सारे देशमें तकरीबन दस लाख एकड़ जमीन विभिन्न सरकारें किसानों से छीनकर कारपोरेट घरानों कोसौंप चुकी थीं। नंदीग्राम आंदोलन ने वाम राजनीति को शिखर से लेकर नीचे तक बुरी तरहक्षतिग्रस्त किया। उस आंदोलन के बाद मनमोहन सरकार ने नया भूमि अधिग्रहण कानूनबनाया था,जिसे पिछली संसद पास कर चुकी थी, नई मोदी सरकार को उसे लागू करना थालेकिन मोदी सरकार ने उसे लागू करने के पहले ही खत्म कर दिया और नया भूमि अधिग्रहणअध्यादेश जारी कर दिया,यह अध्यादेश क्या है इसके परिणाम क्या होंगे इस पर मीडियामें बहुत सार्थक और सटीक सामग्री और सूचनाएं आ रही हैं,यह किसानों के  पक्ष में मीडिया की सकारात्मक भूमिका को सामनेलाता है। इस कानून के खिलाफ बृहत्तर राष्ट्रीय एकता भी बनती नजर आ रही है। जरुरतहै इस कानून के खिलाफ जनांदोलन तेज करने की । भाजपा के दुरंगेपन को नंगा करने की ।

     उल्लेखनीय है कि मनमोहनसरकार में निर्मित भूमि अधिग्रहण कानून को भाजपा ने पूर्ण समर्थन दिया था,यहां तककि संपूर्ण विपक्ष ने समर्थन दिया था, वह कानून संसद की आम सहमति से बना था, मोदीसरकार ने बिना किसी कारण के उस कानून को लागू करने के पहले ही खत्म करके नयाअध्यादेश जारी करके संसद का अपमान किय़ा है, राजनीतिक सहमति को तोड़ा है और इससे भीबड़ी बात यह है कि यह मसला भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में नहीं था। जो मसला चुनावघोषणापत्र में नहीं है उसे मोदी सरकार जोर-जबर्दस्ती से पास करना चाहती है । यदियह कानून इतना ही जरुरी था तो भाजपा ने अपने घोषणापत्र में इसका जिक्र क्यों नहींकिया ? मोदी ने अपने भाषणों में इस तरह का कानूनलाने की मंशा जाहिर क्यों नहीं की ?
        सवाल यह है मोदी सरकारइतने उतावलेपन से कानून क्यों बदलना चाहती है ? क्यादेश के कारपोरेट घराने देश में पैसा निवेश करने के लिए इतने बेचैन हैं कि उनकोरातों-रात देश की जमीन कौडियों के भाव पर सब कानून तोड़कर दे दी जाय ? हम जानना चाहते हैं कि भारत के कारपोरेट घरानों को विगत मनमोहन सरकारने जो जमीन आवंटित की थी क्या उस पर कारखाने लगाए गए हैं ? क्याजो जमीन भारत सरकार ने विकास के नाम पर किसानों से ली है उस पर काम हो रहा है ? यदि पुरानी जमीन खाली पड़ी है और कारपोरेट घराने वायदा नहीं निभा पाएहैं तो फिर नई जमीन हासिल करने के लिए वे बैचैन क्यों हैं ? हमारे देश में लाखों बीमार-बंद कारखाने हैं पहले उनको चंगा करने की ओरकारपोरेट घराने ध्यान क्यों नहीं देते ? वे नई जमीनें क्यों हड़पना चाहते हैं ?क्या जमीनें खरीद लेनेभर से विकास होता है ? क्या हाउसिंग सोसायटियों के बनाने सेदेश का विकास होगा ? क्या इससे देश की उत्पादन क्षमता बढ़ेगी ? क्या किसान औरमजदूरों की उत्पादकता में बढोतरी होगी ?
    अब तक का अनुभव बताता है कि किसानों से विगत सरकारों के जरिए हथियाई गई दसलाख एकड़ से ज्यादा जमीन के बावजूद देश की उत्पादकता में कोई इजाफा नहीं हुआ है।नए कारखाने बहुत कम इलाको में खुले हैं, अधिकतर सेज के इलाके सूने पड़े हैं । मोदीसरकार कम से कम सीएजी की रिपोर्ट को ही गंभीरता से देख लेती तो उसे सेज प्रकल्पोंकी दशा का अंदाजा लग जाता। लेकिन मोदी सरकार ने तो तय कर लिया है हर हालत में राष्ट्रीयसंपदा और संसाधनों को कारपोरेट घरानों के हाथों में सौंप देना है। इससे आरएसएस काहिन्दूमार्ग भी आसानी से समझ में आ सकता है। आरएसएस कहने के लिए राष्ट्रवादी होनेका दावा करता है लेकिन उनका हिन्दू नायक जब पीएम बनता है तो खुलकर किसानों औरगरीबों की संपदा पर डाकेजनी का कानून बनाकर पेश करता है। यह मजेदार तथ्य है किआरएसएस के नियंत्रण में केन्द्र सरकार के आने के बाद से सबसे खुशहाल हैं कारपोरेटघराने। कारपोरेट घरानों को जितना फायदा मिला है और उनकी संपदा में जिस तेज गति सेइजाफा हुआ है उसने संघ को कारपोरेट संघ में रुपान्तरित कर दिया है।
    हमें किसानों के पक्ष में बिना किसी संशय के सोचना चाहिए। किसान के मसलोंके लिए जो भी संगठन संघर्ष करें, जो भी नेता लड़े , हमें उससे सहयोग करना चाहिए।किसान के सवाल और खासकर किसान की जमीन को विकास के नाम पर हथियाने के सभी प्रयासोंको हर स्तर पर विफल करने की जरुरत है । मोदी सरकार का भूमि अधिग्रहण अध्यादेशवस्तुतः किसान और विकास विरोधी है। यह देश के साथ भाजपा की गद्दारी का आदर्शप्रमाण है। यह आरएसएस के दुरंगेपन का भी आदर्श प्रमाण है ।     

        

नागरिक की तलाश में

    सामान्य तौर पर हर प्रोफेसर अपने को विद्वान कहलाना पसंद करता है, लेखक कहलाना पसंद करता है। लेकिन मैं शुरु से विद्वान और लेखक के भावबोध से चिढ़ता रहा हूँ।मेरे अंदर न तो लेखक के गुण हैं और न विद्वान के लक्षण हैं। मुझे अधिकतर लेखक -प्रोफेसर लेखक अहंकारी, खोखले , गैर-ज़िम्मेदार और धूर्त प्रतीत होते हैं। मैं अपने जीवन में कभी न तो विद्वान बन पाया और न मेरी विद्वान बनने की आकांक्षा रही, यही हालत लेखक मन की भी रही है। मैंने अधिकतर प्रोफ़ेसरों को विद्वत्ता के आडंबर में लिपटे देखा है और उनके जीवन पर चालाकियों और धूर्तताओं का जो रंग चढ़ा देखा है उसने मुझे यह महसूस करने के लिए मजबूर किया है कि मैं कम से कम न तो विद्वान हूँ और न लेखक हूँ। मुझे यह देखकर दुख होता है कि हमने प्रोफेसर विद्वानों की ऐसी पीढ़ी तैयार की जो झूठ और अनपढता के मामले में अव्वल है। इनकी विशेषता है कम से कम पढ़ना और बड़ी बड़ी हाँकना, अवैज्ञानिक और अलोकतांत्रिक बातें और आचरण करना । 

मेरे परिचित अधिकांश हिन्दी प्रोफेसर न तो कभी समय पर कक्षा में जाते हैं और न पूरा समय कक्षा में रहते हैं, यहाँ तक कि ये लोग सारी ज़िंदगी न्यूनतम किताबें तक नहीं पढ़ते ।
ये लोग जश्न, मंच,उत्सव, संगोष्ठी में जीना पसंद करते हैं लेकिन कभी कुछ भी न तो नया बोलते हैं और नहीं कभी नए विचार पर सुसंगत लिखते हैं, लेकिन विद्वत्ता की हेकड़ी में रहते हैं। वे नागरिक की तरह आचरण नहीं करते । उनमें न तो नागरिक जैसी सभ्यता है और ना ही नागरिकबोध ही है। ऐसी अवस्था में उनकी सारी भाव-भंगिमाएँ घिन पैदा करती हैं। मैं सोचता हूँ कि जो प्रोफेसर -लेखक आए दिन कबीरदास-तुलसीदास -प्रेमचंद के उद्धरण सुनाते रहते हैं वे कभी सामान्य तौर पर भारत के संविधान की बातें और उद्धरण क्यों नहीं सुनाते ? जिस लेखक में संविधानचेतना और नागरिकचेतना पैदा नहीं हुई है मैं उसे शिक्षित मानने को तैयार नहीं हूँ। लोकतंत्र में मुझे लोकतांत्रिक नागरिक चाहिए , विद्वान-प्रोफेसर-लेखक नहीं।

कुलदीप कुमार की षष्ठीपूर्ति पर विशेष-सर्जनात्मकता के साठ साल


सभ्यता के संस्कार अर्जित करना और उनको जीवन में सर्जनात्मक ढंग से ढालना सबसे मुश्किल काम है। मेरे जिन मित्रों ने सभ्यता और संस्कृति के वैविध्यपूर्ण श्रेष्ठतम मानकों को अपने दैनंदिन जीवन में विकसित किया है उनमें कुलदीप कुमार अद्वितीय है। वह बेहतरीन इंसान होने के साथ बहुत ही अच्छा मित्र भी है। मित्रता ,ईमानदारी, मिलनसारिता,सभ्यता और बेबाक लेखन को उसने जिस परिश्रम और साधना के साथ विकसित किया है वह हम सबके लिए प्रेरणा की चीज है।
कुलदीप से मेरी सन् 1979 में पहलीबार जेएनयू में दाख़िले के बाद मुलाक़ात हुई। संयोग की बात है कि कुलदीप की पत्नी और प्रसिद्ध स्त्रीवादी विदुषी इंदु अग्निहोत्री भी तब से मेरी गहरी आंतरिक मित्र हैं। कुलदीप के स्वभाव में स्वाभिमान कूट -कूटकर भरा है। मध्यवर्गीय दुर्गुणों -जैसे -सत्ताधारियों के बीच जी -जी करके रहना, जी -जी करके दोस्ती गाँठना , नेताओं और सैलीब्रिटी लोगों की चमचागिरी करना , गुरुजनों की चमचागिरी करना , संपादक की ख़ुशामद करना, हर बात में कमर झुकाकर बातें करना, मातहत भाव में रहना आदि , दुर्गुणों से कुलदीप का व्यक्तित्व एकदम मुक्त है। उसके व्यक्तित्व में ईमानदारी,स्वाभिमान और व्यक्तिगत सभ्यता का संगम है।
कुलदीप ऐसा पत्रकार है जिसने अपने लेखन के लिए पार्टीतंत्र के दवाबों को मानने से साफ़ इंकार किया। हमलोगों ने जेएनयू में एक साथ खुलकर एसएफआई के लिए काम किया , सालों माकपा में काम किया, और लोकतांत्रिक छात्र आंदोलन के निर्माण में सक्रिय भूमिका अदा की । कुलदीप ने कभी राजनीति को कैरियर नहीं बनाया और राजनेताओं के साथ अपने संपर्क -संबंधों को अपनी नौकरी हासिल करने या प्रमोशन हासिल करने या सरकारी पद हासिल करने का ज़रिया नहीं बनाया।
कुलदीप ने विगत पैंतीस साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में विभिन्न क्षेत्रों में जमकर लिखा है। राजनीति से लेकर संस्कृति तक कई हज़ार लेख देश के विभिन्न दैनिक राष्ट्रीय अख़बारों (हिन्दू, टेलीग्राफ़, संडे आब्जर्वर, टाइम्स ऑफ़ इण्डिया, इकोनोमिक टाइम्स, नवभारत टाइम्स, पायनियर, जनसत्ता, अमर उजाला आदि, इसके अलावा कई विदेशी पत्र पत्रिकाओं और वेबसाइट के लिए भी नियमित लेखन किया है) में लिखे हैं ।
कुलदीप ने बेहतरीन मर्मस्पर्शी कविताएँ लिखी हैं जो "हिन्दी समय डॉट कॉम "पर उपलब्ध हैं। कुलदीप कुमार ने संगीत पत्रकार के रुप विशेष रुप से जो महारत हासिल की है । मित्रता, मिलनसारिता और सभ्यता विमर्श उसके प्रमुख लक्षण हैं। मैं कई सालों से अनुरोध करता रहा हूँ कि वह अपने लेखन को पुस्तकाकार रुप दे। हम चाहते हैं कि वह जिस कर्मठता और ईमानदारी के साथ अब तक लिखता रहा है वह सिलसिला जारी रखे। हम उसके दीर्घायु जीवन की कामना करते हैं।

'स्त्री असभ्यता' हमारी चिंता में क्यों नहीं है !

       औरत सभ्य होती है,लेकिन औरत के अंदर अनेक ऐसी आदतें,परंपराएं और मूल्य हैं जो उसे असभ्यता के दायरे में धकेलते हैं। औरत को संयम और सही नजरिए से स्त्री के असभ्य रुपों को निशाना बनाना चाहिए। असभ्य आयाम का एक पहलू है देवीभाव ।  औरत को देवीभाव में रखकर देखने की बजाय मनुष्य के रुप में,स्त्री के रुप में देखें तो बेहतर होगा । औरत में असभ्यता कब जाग जाए यह कहना मुश्किल है लेकिन असभ्यता के अनेक रुप दर्ज किए गए हैं। खासकर औरत के असभ्य रुपों की स्त्रीवादी विचारकों ने खुलकर चर्चा की है। हमें भारतीय समाज के संदर्भ में और खासकर हिन्दू औरतों के संदर्भ में उन  क्षेत्रों में दाखिल होना चाहिए जहां पर औरत के असभ्य रुप नजर आते हैं।
       औरत की असभ्य संस्कृति के निर्माण में पुंसवाद की निर्णायक भूमिका है। इसके अलावा स्वयं औरत की अचेतनता भी इसका बहुत बड़ा कारक है। मसलन्, जब कोई लड़की शिक्षित होकर भी दहेज के साथ शादी करती है , दहेज के खिलाफ प्रतिवाद नहीं करती तो वह असभ्यता को बढ़ावा देती है।हमने सभ्यता के विकास को शिक्षा,नौकरी आदि से जोड़कर इस तरह का स्टीरियोटाइप विकसित किया है कि उससे औरत के सभ्यता के मार्ग का संकुचन हुआ है।  
    हमारी शिक्षा लड़कियों को सभ्य कम और अनुगामी ज्यादा बनाती है। औरत सभ्य तब बनती है जब वह सचेतन भाव से सामाजिक बुराईयों के खिलाफ जंग करती है। औरत की जंग तब तक सार्थक नहीं हो सकती जब तक हम उसे आम औरत के निजी जीवन तक नहीं ले जाते। हमारे सभ्य समाज की आयरनी यह है कि वह सभ्य औरत तो चाहता है लेकिन उसे सभ्य बनाने के लिए आत्मसंघर्ष करने की प्रेरणा नहीं देता। मसलन्,औरतों में दहेज प्रथा के खिलाफ जिस तरह की नफरत होनी चाहिए वह कहीं पर भी नजर नहीं आती।
    औरत सभ्य है या असभ्य है यह इस बात से तय होगा कि वह अपने जीवन से जुड़े बुनियादी सवालों और समस्याओं पर विवेकवादी नजरिए से क्या फैसला लेती है ? समाज ने स्त्री के लिए अनुकरण और निषेधों की श्रृंखला तैयार की है और उसे वैध बनाने के तर्कशास्त्र, मान्यताएं और संस्कारों को निर्मित किया है। इसके विपरीत यदि कोई औरत अनुकरण और निषेधों का निषेध करे तो सबसे पहले औरतें ही दवाब पैदा करती हैं कि तुम यह मत करो,ऐसा मत करो, परिवार की इज्जत को बट्टा लग जाएगा। औरत को बार-बार परिवार की इज्जत का वास्ता देकर असभ्य कर्मों को करने के लिए कहा जाता है। खासकर युवा लड़कियों के अंदर दहेज प्रथा के खिलाफ जब तक घृणा पैदा नहीं होगी, औरत को सभ्य बनाना संभव नहीं है। औरत सभ्य बने इसके लिए जरुरी है कि वह उन तमाम चीजों से नफरत करना सीखे जो उसको सभ्य बनने से रोकती हैं। दहेज प्रथा उनमें से एक है।
    औरत के अंदर असभ्यता का आधार है अनुगामी भावबोध ,जब तक औरतें अनुगामी भावबोध को विवेक के जरिए अपदस्थ नहीं करतीं वे सभ्यता को अर्जित नहीं कर पाएंगी। समाज में अनुगामी औरत को आदर्श मानने की मानसिकता को बदलना होगा।
   औरत को असभ्य बनाने में दूसरा बड़ा तत्व है, औरतों और खासकर लड़कियों का सचेतभाव से मूर्खतापूर्ण हरकतें करना, मूर्खता को वे क्रमशः अपने जीवन का आभूषण बना लेतीं हैं। तमाम किस्म के स्त्रीनाटक इस मूर्खतापूर्ण आचरण के गर्भ से निकलते हैं।स्त्री की  मूर्खतापूर्ण हरकतें अधिकांश पुरुषों को अच्छी लगती हैं। फलतः लड़कियां सचेत रुप से मूर्खता को अपने जीवन का स्वाभाविक अंग बना लेती हैं। इससे स्त्री की छद्म इमेज बनती है। स्त्री सभ्य बने इसके लिए जरुरी है कि वह छद्म इमेज और छद्म मान्यताओं में जीना बंद करे।
    छद्म इमेज का आदर्श है लड़कियों में फिल्मी नायिकाओं को आदर्श मानने का छद्मभाव। मसलन्, माधुरी दीक्षित ,रेखा,ऐश्वर्या राय में कौन सी चीज है जिससे लड़कियां प्रेरणा लेती हैं ?  क्या सौंदर्य-हाव-भाव आदि आदर्श हैं ? यदि ये आदर्श हैं तो इनसे सभ्यता का विकास नहीं होगा। सौंदर्य के बाजार और प्रसाधन उद्योग का विकास होगा। यदि इन नायिकाओं के कैरियर और उसके लिए इन नायिकाओं द्वारा की गयी कठिन साधना और संघर्ष को लड़कियां अपना लक्ष्य बनाती हैं तो वे सभ्यता का विकास करेंगी और पहले से ज्यादा सुंदर दिखने लगेंगी। ये वे नायिकाएं हैं जिन्होंने अपने कलात्मक जीवन को सफलता की ऊँचाईयों तक पहुँचाने के लिए कठिन रास्ता चुना और समाज में सबसे ऊँचा दर्जा हासिल किया। अपने अभिनय के जरिए लोगों का दिल जीता।

    कहने का अर्थ है कि फिल्मी नायिका से सौंदर्य टिप्स लेने की बजाय,उसके सौंदर्य का अनुकरण करने की बजाय, कलात्मक संघर्ष की भावनाएं और मूल्य यदि ग्रहण किए जाते तो देश में हजारों माधुरी दीक्षित होतीं! दुर्भाग्य की बात है कि हम यह अभी तक समझ नहीं पाए हैं कि औरत का सौंदर्य उसके शरीर में नहीं उसकी सभ्यता में होता है ! औरत जितनी सभ्य होगी वह उतनी ही सुंदर होगी। सभ्यता के निर्माण के लिए जरुरी है कि औरतें स्वावलंबी बनें। अनुगामी भाव से बचें।