रविवार, 31 मई 2015

आरएसएस संगठन नहीं दुकान है

                      
        आरएसएस के नायक और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अध्यक्षता में बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर की 125वीं जयन्ती को बड़े धूमधाम से मनाने का फैसला लिया गया है। मोटे तौर पर यह फैसला स्वागत योग्य है। हमारे स्वाधीनता सेनानियों के ऊपर सरकार कुछ भी करे हमें स्वागत तो कम से कम करना चाहिए। इस बहाने कुछ चर्चाएं होंगी, गोष्ठियां होंगी, प्रकाशन निकलेंगे,जलसे होंगे ,बाजार में सरकारी खजाने से पैसा निकलकर आएगा। कुछ बाबू,बुद्धिजीवी,राजनेता और स्वयंसेवी संस्थाएं खाएंगी-कमाएंगी,इस लिहाज से मुझे सरकारी जलसे हमेशा अच्छे लगते हैं। यह एक तरह का सरकार की ओर से सांस्कतिक पूंजी निवेश है।

समस्या जलसे की नहीं है, समस्या अम्बेडकर पर माला चढ़ाने और जलसे को लेकर नहीं है, यह तो कोई भी दल कर सकता है, सवाल यह है कि क्या अम्बेडकर के विचारों का आरएसएस और भाजपा पर कोई असर है ? क्या अम्बेडकर के विचारों से संघ के विचार से मेल खाते हैं या फिर अम्बेडकर पर जलसे करना एक खाना पूर्ति है, वोटबैंक राजनीति का अंग है ? हमें यही लगता है कि मोदी सरकार,संघ और भाजपा के लिए अम्बेडकर वोट बैंक राजनीति के प्रचार का अंग है। यह असल में दुकानदार की 'सेल-सेल' की मार्केटिंग रणनीति का अंग है।

उल्लेखनीय है आरएसएस अकेला ऐसा संगठन है जो कभी अपनी आत्मालोचना नहीं करता, अपने वैचारिक दृष्टिकोण को हमेशा सच और अपरिवर्तनीय मानता है। इन दिनों संघ के लोग सत्ता पर कब्जा जमाए बैठे हैं और हेकड़ी का आलम यह है कि टीवी टॉक शो तक में अन्य को बोलने में बाधाएं देते हैं, जानते हैं गलत बोल रहे हैं लेकिन अहंकार में डूबे हुए नेता की तरह प्रवक्ता बोलते रहते हैं। मनमोहन सिंह के अंतिम दो सालों में कांग्रेसी मंत्रियों में यही राजनीतिक अहंकार देखा गया था, आम जनता राजनीतिक अहंकार से नफरत करती है। लेकिन आरएसएस –भाजपा के लोग लगातार इस राजनीतिक अहंकार पर हिन्दुत्व की मालिश कर रहे हैं।

संघियों का मानना है देश में अब तक सबकुछ गलत हुआ है, शिक्षा से लेकर विज्ञान तक भारतीय परंपरा की उपेक्षा हुई है,अतःभारत की उपेक्षित परंपराओं और विश्वासों को नए सिरे से सत्ता के जरिए आम जनता पर थोपने की जरुरत है। वे यह भी मानकर चल रहे हैं कि धर्मनिरपेक्षता जहर है,जबकि अम्बेडकर ने धर्मनिरपेक्षता को भारत,भारतीय संविधान और भारतीय समाज की आत्मा के रुप में पेश किया।

संघ के संगठन लगातार धर्मनिरपेक्षता पर हमले करते रहे हैं। आम जनता में धर्मनिरपेक्षता का मतलब मुस्लिम तुष्टीकरण कहकर साम्प्रदायिक घृणा भरते रहे हैं।इस चक्कर में संघ के विचारक आए दिन यही बताते रहते हैं कि वे तो देश का सुधार करने के लिए सरकार में आए हैं। संस्कृति से लेकर राजनीति तक उनको सुधार की चिन्ता इस कदर सताए हुए है कि वे यह मानने को तैयार ही नहीं है उनके अंदर जो वैचारिक खोट है, उसको भी दूर करने की जरुरत है ।

यह विलक्षण सत्य है कि संघ के विचारों में स्थापना से लेकर आजतक कोई मूलगामी वैचारिक बदलाव नहीं हुआ है। यानी वे यह मानकर चल रहे हैं कि उनकी हिन्दुत्ववादी विचारधारा निष्कलंक और निर्दोष है। वे इन दिनों बल्लभभाई पटेल से लेकर अम्बेडकर तक सबका वैचारिक चीरहरण करने में लगे हैं। इस चक्कर में संघ और उसके नेतागण बार-बार वैचारिक गर्भपात के शिकार भी हुए हैं।

मोदी सरकार के आने के पहले से संघ कई दशकों से समाज में वैचारिक प्रदूषण फैलाने का काम करता रहा है। अम्बेडकर जयन्ती के आयोजन उसी कड़ी का अंग है। साथ ही वे पटेल-अम्बेडकर आदि के जरिए वोटबैंक की राजनीति कर रहे हैं और धर्मनिरपेक्ष विचारों की परंपरा को प्रदूषित करने की कोशिश कर रहे हैं। वे पटेल-अम्बेडकर के पास अपनी विचारधारा में परिवर्तन करने के लिए नहीं जा रहे ,बल्कि वे तो उनकी विचारधारा का विकृतभाष्य रचने के लिए जा रहे हैं। उनके अंदर धर्मनिरपेक्ष बनने की भावना अभी तक नहीं जगी है उलटे वे धर्मनिरपेक्ष नेताओं की विचारधारा को हिन्दुत्ववादी घोषित करने का प्रयास कर रहे हैं।

अम्बेडकर और आरएसएस में जमीन-आसमान का अंतर है। मसलन्, संघ के लोग कई दशकों से गऊ-हत्या बंद हो, का नारा लगा रहे हैं। उनके इस नारे का ही असर था कि भारत की धर्मनिरपेक्ष सरकार ने गऊहत्या पर उनके मत को मान लिया। अम्बेडकर आदि मनीषियों का इस मसले पर भिन्न नजरिया था। इसी तरह अस्पृश्यता के सवाल को अम्बेडकर जिस नजरिए से देखते हैं, संघ वैसे नहीं देखता। संघ के लिए जाति और वर्ण ईश्वरकृत हैं। अम्बेडकर यह नहीं मानते। वे अस्पृश्यता को गुलामी सभी बदतर मानते हैं।

अस्पृश्यता दूर करने के जितने तेज प्रयासों की समाज को ,खासकर हिन्दू समाज को जरुरत है ,उसे संघ महसूस नहीं करता। आज भी देश के बहुत बड़े हिस्से में समाज का एक वर्ग अस्पृश्यता का शिकार है। अस्पृश्य हमेशा अस्पृश्य रहता है। संविधान में तमाम हकों के बाद भी अस्पृश्यता के खिलाफ कोई संघर्ष संघ और उनके जैसे हिन्दू संगठनों ने नहीं चलाया। गऊ के लिए आंदोलन करने वालों को कभी अस्पृश्यता के खिलाफ एक वाक्य बोलते नहीं सुना।

सवाल उठता है कि संघ ने अस्पृश्यता के खिलाफ कोई आंदोलन क्यों नहीं किया ? समाज में जिसे अस्पृश्य घोषित कर दिया गया उसे हमेशा के लिए समाज,संस्थान और संस्कृति से बहिष्कृत कर दिया गया। अस्पृश्यता को तकदीर का खेल,पुनर्जन्म के पाप का परिणाम मानकर वैधता प्रदान की गयी, संयोग की बात है कि एकमात्र अम्बेडकर ने इस पहलु पर सबसे निर्मम ढ़ंग से रोशनी डाली। उन्होंने लिखा कि अस्पृश्यता तो गुलामी से भी बदतर व्यवस्था है। आज भी देश के विभिन्न इलाकों में अछूतों के मुहल्ले हैं और उनमें आना-जाना-रहना एकदम मुश्किल है। कोई भी सामान्य मनुष्य इन बस्तियों में रह नहीं सकता। इन बस्तियों में किसी भी किस्म की नागरिक सुविधाएं दूर-दूर तक नजर नहीं आतीं।

इन दिनों एक मुस्लिम लड़की को घर न मिलने पर मीडिया ने हंगामा खड़ा कर दिया लेकिन अस्पृश्य बस्तियों पर कभी कोई न्यूज आइटम तक नहीं आया। यही मीडिया कभी झांककर नहीं देखता कि सवर्णों की बस्तियों और हाउसिंग सोसायटी में दलितों को घर भाड़े पर मिलने में किस तरह की असुविधा का सामना करना पड़ता है। समाज में अस्पृश्य और पृश्य के रुप में घिनौना वर्गीकरण अभी भी जारी है। कहने का अर्थ है कि अस्पृश्यता को दूर करने के लिए भी यदि सामाजिक स्तर पर प्रयास किए जाएं तो देश में बहुत कुछ परिवर्तन हो सकता है। अस्पृश्यों के प्रति हिंसा, अलगाव,वर्जनाओं, और घृणा को हर स्तर पर चुनौती दी जाय। जो लोग चुनौती दे रहे हैं उनका साथ देने की मनोदशा तैयार करें। संघ की मुश्किल यह है कि वह अस्पृश्ता के उन्मूलन के प्रति प्रतिबद्ध नहीं है वह तो हिन्दुत्व के लिए वचनवद्ध है। हिन्दुत्व के पैकेज में अस्पृश्यता निवारण के काम नहीं आते।

कुछ अर्सा पहले गुजरात के किसी शहर में ही अस्पृश्यों के लिए अलग श्मशान होने की बात सामने आई थी।यह स्थिति तब की है जब गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी थे। सवाल यह है यदि किसी महापुरुष की जयन्ती मना रहे हो तो कम से कम उसके विचारों को सामने रखकर अपने कर्म-दुष्कर्म और कुकर्म की मीमांसा तो कर लो ! संघ ,भाजपा और उनके लगुए-भगुए कभी महापुरुषों के विचारों कीरोशनी में अपनी आत्मालोचना नहीं करते , सवाल यह है कि वे क्यों नहीं करते ? कभी पलटकर बोलें तो सही कि आखिरकार अम्बेडकर के विचारों से वे इतने दूर क्यों हैं ? अम्बेडकर के कौन से विचार हैं जिनको वे अपने संगठन की विचारधारा में शामिल करना चाहते हैं ?

सवाल यह है कि संघ क्या धर्मनिरपेक्ष महापुरुषों की महिमा का गायन सिर्फ दिल बहलाने,जनता को दिग्भ्रमित करने के लिए करता है या वह सच में कुछ उनसे सीखना भी चाहता है ? अब तक रवैय्या यह है संघ के लिए भारत के धर्मनिरपेक्ष महापुरुष तो किसी दुकानदार की मौसमी 'सेल -सेल' से ज्यादा महत्व नहीं रखते। जिस तरह दुकानदार हर किस्म का माल बेचता है, लेकिन उसकी किसी माल विशेष से मुहब्बत नहीं होती। उससे जुड़े विचार से मुहब्बत नहीं होती। उसकी तो मुनाफे और बिक्री में दिलचस्पी होती है। यही हास संघ और मोदी सरकार का है।

अधिकतर दुकानदार पुराने विचारों,मूल्यों आदर्शों को अपने जेहन में बनाए रखते हैं। जबकि वे नए युग के अनुरुप आई नयी वस्तु की बिक्री करते हैं, उसका उपभोग भी करते हैं, लेकिन उस वस्तु से जुड़े नए विचारों और आदतों को आत्मसात नहीं करते। यही हाल आरएसएस और उसके शाखामृगों और शाखा नायक का है। वरना विवेकानंद से लेकर महात्मा गांधी तक ,भगतसिंह से लेकर अम्बेडकर तक सबकी संघ के यहां जयन्ती मनायी जाती हैं लेकिन ये सभी जयन्तियां दुकानदार के भाव से मनायी जाती हैं। उत्सवधर्मी भाव से मनायी जाती हैं। जितनी देऱ उत्सव उतनी देर बातें,उसके बाद बातें बंद, इसलिए हम तो कहते हैं संघ एक दुकान है और संघी दुकानदार हैं, ये बेचें कुछ भी ,लेकिन रहेंगे हिन्दुत्ववादी ही।


मथुरा के चार हजार चौबे

       
          जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने मथुरा के चौबों के बारे में लिखकर बहस का मुद्दा खड़ा कर दिया। काटजू ने क्या कहा यह तो मैं नहीं पढ़ पाया लेकिन हमारे पुराने मित्र गंगानाथ चतुर्वेदी के सुपुत्र माधव चतुर्वेदी ने आज फोन करके जब चौबों के बारे में बात की तो मैंने सोचा कि क्यों न इस पहलू को लिख ही देते हैं। उल्लेखनीय है माधव जब बात कर रहा था तो मैंने परिचय पूछा तो उसने पिता का नाम बताया तो मैंने कहा वे तो हमारे यजमान हैं और तुम भी,मुझे बेहद खुशी हुई कि मैं गंगानाथजी के बारे में तकरीबन 4दशक बाद बातें कर रहा था. वे मथुरा में आकाशवाणी पर अधिकारी थे, हमारे घर नियमित आना जाना था, सतीघाट पर नियमित गप्पें होती थीं।बाद में दिल्ली ट्रांसफर होकर चले गए, वे जिंदा हैं और स्वस्थ हैं,यह
मेरे लिए बहुत बड़ी खुशी की बात है। खैर गंगानाथ जी पर फिर कभी मौका लगा तो जरुर लिखूँगा।

मथुरा के चौबे देश में अन्यत्र रह रहे ब्राह्मणों जैसे नहीं हैं। उनके भिन्न होने के ऐतिहासिक और ऐतिहासिक परिस्थितियां रही हैं । मथुरा में चौबे कैसे और कब से हैं यह हम कभी बाद में विस्तार से विचार करेंगे। लेकिन कुछ सामान्य किंतु महत्वपूर्ण तथ्य हैं जिनको जानना बेहद जरुरी है।

पहला, चौबों की जीवनशैली समूहबद्ध समुदाय यानी आदिवासी शैली है। अपनी ही जाति में खान-पान-रोटी-बेटी के संबंध रखने की लंबे समय से परंपरा चली आ रही है। यह समूची जाति शाकाहारी है। अंदर से जातिगत एकता,पवित्रता और निजता को बचाए रखने की इसमें प्रवृत्ति रही है। ये अन्य ब्राह्मणों से भिन्न क्यों हैं इसके कई महत्वपूर्ण कारण हैं। पहला कारण यह है कि यह जाति सैंकड़ों सालों से राजतंत्र से जुड़ी रही है। मुगलों के पहले ,मुगलों के शासन में और उसके बाद भी राजशाही से इस जाति का गहरा संबंध रहा है। देश के अधिकांश राजा इस जाति के यजमान रहे हैं। यहां तक कि सभी मुगल शासकों के ये प्रोहित रहे हैं। इसके कारण इनके पास कभी तंत्र से विच्छिन्न होकर जीने या सामाजिक अलगाव में रहने की प्रवृत्ति नहीं रही है। इसके अलावा सैंकड़ों सालों से देश के अधिकांश भागों में लाखों गांवों में इनके यजमान फैले हुए हैं। हाल के दशकों में यजमानी प्रवृत्ति में गिरावट आई है,लेकिन आज से चालीस –पचास साल पहले तक स्थिति यह रही है कि देश के अधिकांश बाशिंदों में इनकी यजमानी रही है।

मथुरा के चौबे यजमानों से संपर्क-संबंध रखने के मामले में बड़े कुशल रहे हैं। जिन चौबों के यहां यजमानी रही है वे लोग साल में एकबार अपने यजमान के घर जरुर जाते थे और उससे सालाना दक्षिणा वसूल करते थे, खाने-पीने का सामान एकत्रित करते थे, इसके कारण इनके गांव-गांव सभी जाति के लोगों से गहरे आत्मीय संबंध रहे हैं। मैंने देखा है कि मेरे पिता और ताऊ को हजारों गांवों के हजारों लोगों के नाम पते याद रहते थे। मसलन्, हमारे यहां कन्नौज,एटा,इटावा,फर्रूखाबाद ,फतेहगढ़,छपरा,आजमगढ़,देवरिया, छपरा आदि जिलों की यजमानी थी। इसके अलावा कई रजबाड़े भी यजमान थे, जिनमें शिवाजी का परिवार,ग्वालियर ,जयपुर आदि के रजवाड़े प्रमुख हैं। हमारे पूर्वज इन जिलों में गांव-गांव जाकर दक्षिणा वसूली करते थे, इन इलाकों से सावन,भादों के महिने में सैंकड़ों लोग मथुरा तीर्थयात्रा पर आते थे और हमारे घर पर ही रहते थे, कोई भी मथुरा आता था तो उसे स्टेशन से पकड़कर घर ले जाते ,उसके रहने की व्यवस्था करते थे, उसके घूमने की व्यवस्था करते थे और उसके लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाता था। मेरा निजी तौर पर बचपन यजमानों को मंदिरों के दर्शन कराने में बीता है। यजमान को उसकी सुविधा के अनुसार दान कराना, उसकी सुविधा से दक्षिणा लेना, पैसे खत्म हो जाएं तो पैसा उधार देना, बाद में एक साल बाद जब यजमान के घर जाते थे तो उससे वसूल करना,यह वह तरीका था जिसने मथुरा के चौबों को विलक्षण जनसंपर्क में कुशल बना दिया था।

चौबों के विभिन्न जाति के यजमान होते थे, उनमें दलित और गैर दलित सभी रंगत के लोग यजमान होते थे, अधिकतर यजमान औसत स्तर के होते थे अतः उनसे सामान्य सी दक्षिणा ही मिलती थी, सामान्य सी दक्षिणा में जब तक मन हो बिना भाड़ा दिए अपने गुरु के घर रहने का जो सुख और सुविधा यजमानों को मिलती थी उसको यजमान कभी भूलता नहीं था, यदि किसी यजमान के पैसे खत्म हो जाते या जेब कट जाती या चोरी हो जाती तो उसे उधार में रुपये भी देते थे और उसके लिए वे कोई ब्याज आदि नहीं लेते थे, कई बार यह पैसा डूब भी जाता था। इस समूची प्रक्रिया ने मथुरा के चौबों का अपने यजमान से विलक्षण आंतरिक संबंध बना दिया था। चौबों के मथुरा में चार हजार परिवार रहते हैं,इन दिनों हो सकता है यह संख्या कुछ बढ़ गयी हो, लेकिन आम कहावत थी मथुरा के चार हजार चौबे।

मथुरा के चार हजार चौबे निजी पारिवारिक जीवन में शुद्धतावादी रहे हैं । वे अपनी जाति के अलावा किसी और के यहां खाते नहीं थे, बाद में यह स्थिति बदल गयी। लेकिन कमोबेश इसने उनके शुद्धतावादी रुझानों को बनाए रखा। मसलन् , मथुरा के चौबों के शादी आदि मथुरा के ही चौबों में होते रहे हैं। आज भी अधिकांश लोग मथुरा में ही अपनी जाति में ही शादी करते हैं। आजादी के बाद चौबों में अंतर्जातीय विवाह की प्रवृत्ति पैदा हुई।

चौबों की आर्थिक स्थिति अन्य जातियों की तुलना में बेहतर रही है। सभी चौबों के पास निजी जायदाद-संपत्ति रही है। वे कभी किराए के मकान में नहीं रहते थे। दूसरी बात यह कि उनके पास सालाना आय का जरिया यजमानी वृत्ति थी। वे बहुत अच्छे जनगणना अधिकारी भी रहे हैं। यजमानों की समूची वंशावली को लिखकर संयोजित करके रखना और उसको समय-समय पर अपडेट करते रहना उनका काम रहा है। भारत के अधिकांश राजाओं से उनको संपति आदि बड़ी मात्रा में दान में मिली थी। जो हिन्दुत्ववादी मुगल शासकों को आए दिन गरियाते रहते हैं उनको जानकार आश्चर्य होगा कि मुगलों के प्रोहित भी मथुरा बड़े चौबेजी हुआ करते थे। आज भी उनके पास मुगल शासकों और उनके अधीन रियासतों के राजाओं के दानपत्र-मानपत्र आदि मौजूद हैं। महमूद गजनवी से लेकर औरंगजेब तक सभी के प्रोहित वे रहे हैं। इसलिए चौबों में विभिन्न संस्कृतियों और सभ्यताओं के साथ संवाद,विमर्श आदि की दीर्घकालिक परंपरा रही है। निजी संस्कृति और सामाजिक बहुलतावाद का ये लोग बेहतर ढ़ंग से सैंकड़ों सालों से सामंजस्य बिठाकर अपना विकास करते रहे हैं। इनमें कम्युनिकेटर के बेहतरीन गुण भी रहे हैं। संभवतः प्रोहिताई करने वाली यह अकेली ऐसी जाति है जिसके घर पर सभी जाति के यजमान आकर ठहरते रहे हैं। मथुरा में दान के जरिए निर्मित धर्मशालाओं का बहुत बड़ा नेटवर्क इनके पास है जिसमें मुफ्त में रहने की व्यवस्था लंबे समय से चली आरही है। कुछ में नाममात्र का भाड़ा लेकर रहने के लिए कमरे दिए जाते हैं। विभिन्न किस्म की जातियों के संपर्क-संबंध में रहने के बावजूद कैसे यह जाति अपनी शुद्धता बचाए रख पायी यही हमारे लिए विस्मय की बात है।

शनिवार, 30 मई 2015

संघ की खुराफाती हरकतें और राजनीतिक दुष्कर्म


            आरएसएस के संगठन निरंतर आक्रामक होते जा रहे हैं और खुलेआम राजसत्ता का अपने लक्ष्यों के विस्तार के लिए दुरुपयोग कर रहे हैं। संघ का लक्ष्य है अ-लोकतंत्र की स्थापना करना और कारपोरेट लूट का माहौल बनाना। वह समाज सेवा के नाम पर खुराफाती राजनीति करने वाला संगठन है। सवाल यह है  आम जनता की आंखों में,खासकर मध्यवर्ग की आंखों में धूल झोंकने में यह संगठन कैसे सफल हो जाता है ? आंखों में धूल झोंकना इनकी पुरानी आदत है। इसके लिए वे हर किस्म का हथकंड़ा अपनाते हैं। धूल झोंकने की कला का लक्षण  है  कहो कुछ, करो कुछ,बोलो कुछ और करो कुछ।
      मसलन्, पीएम नरेन्द्र मोदी कहें मैं तो व्यक्ति,धर्म आदि की आजादी का पक्षधर हूँ ,लेकिन जमीनी स्तर पर उनसे जुड़ा संगठन व्यक्ति और धर्म की आजादी पर हमले करे,दंगों में भाग ले,हत्याकांडों में भाग ले, संवैधानिक हकों पर खुलेआम हमले करे तो सच कौन सा मानें ? भाषण वाला या एकेशन वाला ? समाज किससे चलता है भाषण से या एक्शन से ? जाहिर है जीवन में पहचान एक्शन से होती है भाषण और भाषा से नहीं।  मोदी और संघ को एक्शन के आधार पर देखो ,बयानों के आधार पर नहीं। सच भाषा में नहीं, बयान में नहीं.एक्शन में,यथार्थ में होता है। जब हंगामा होता है तो विभ्रम पैदा करने के लिए,आंखों में धूल झोंकने के लिए पुलिस कार्रवाई कर दी जाती है। इसके बावजूद संघियों के एक्शन जारी रहते हैं। जनता के जीवन पर संघियों के हमले जारी रहते हैं। संघी एक्शन में विश्वास करते हैं,भाषण में नहीं।   
     पीएम से लेकर मोहन भागवत तक अम्बेडकर की मूर्तियों पर माला पहना रहे हैं और अम्बेडकर की जय हो -जय हो कर रहे हैं। लेकिन व्यवहार में अम्बेडकर विरोधी कार्य कर रहे हैं,अम्बेडकर विरोधी एक्शन कर रहे हैं, अम्बेडकर के अनुयायियों पर हमले कर रहे हैं।
      सवाल यह है संघ कहां मिलेगा ? मोदी के बयान में या जमीनी संगठनों की हरकतों में ? संघ के जमीनी एक्शन देखें तो नरेन्द्र मोदी बहुत बौने और कमजोर पीएम नजर आते हैं। संघ की विचारधारा बेहद ताकतवर और अ-लोकतांत्रिक नजर आती है। टीवी टॉक शो में अमूमन भाजपा के प्रवक्ता या अन्य लोग पीएम मोदी के तथाकथित सदभाव बनाए रखने वाले बयानों का हवाला देते हैं, लेकिन पीएम मोदी के बयानों का न तो देश पर कोई असर हो रहा है और न संघ के खुराफाती संगठनों पर ही । स्थिति इस कदर बदतर हो चुकी है कि अब तो केन्द्रीय मंत्रालय भी संघ के खुराफाती संगठनों के इशारों पर काम करने लगे हैं। मद्रास आईआईटी के एक छात्रसमूह पर हाल ही में लगाया प्रतिबंध,पाठ्यक्रमों को बदलने की कोशिशें, आईआईटी की कार्यप्रणाली में दखलंदाजी की कोशिशें बता रही हैं कि संघ और मोदी  को देखना हो तो संघ के संगठनों की हरकतों में देखो, मोदी को काम करते आप पीएम हाउस में नहीं खुराफाती संगठनों में देखें तो बेहतर होगा। क्योंकि संघ के खुराफाती संगठनों का काम ही असल काम है, सरकार तो उनके लिए बहाना है। मोदी को पहचानना है तो मुख्यतौर पर संघ के संगठनों के कामों को देखें । सरकार के काम तो पूरक मात्र हैं।
        मोदी को 'महान' बनाने में गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर उनके काम की भूमिका न्यूनतम है,उनकी असली इमेज तो संघ के जमीनी संगठनों की खुराफातों ने बनाई है,मोदी के व्यक्तित्व और कृतित्व का आधार सरकारी या संवैधानिक पद नहीं है,उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के निर्माता हैं संघ के संगठन। मोदी को देखना हो तो संघ के संगठनों की हरकतों के आईने में देखो, वहीं पर रीयल मोदी नजर आएगा। संविधान के आईने में मोदी नजर नहीं आएगा। संविधान तो मोदी के लिए मृग मरीचिका है।    
     उल्लेखनीय है आरएसएस का तथाकथित सामाजिक संगठन का स्वरुप पूरी तरह राजनीतिक है।  यह वैसा ही सामाजिक संगठन है जैसे कि अन्य देशों में साम्प्रदायिक-पृथकतावादी –फंडामेंटलिस्ट संगठन होते हैं। सारी दुनिया का यह अनुभव है कि तमाम किस्म के इस तरह के खुराफाती संगठन खुलकर समाज सेवा करते हैं और उसकी आड़ में जमकर राजनीतिक दुष्कर्म करते हैं, तमाम किस्म का राजनीतिक व्यभिचार करते हैं।
      राजनीतिक व्यभिचार वह है जो इन दिनों कारपोरेट घरानों के पक्ष में संघ कर रहा है। राजनीतिक दुष्कर्म वह है जो इनदिनों आम जनता के जीवन में विभिन्न रुपों में हमले के रुप में सामने आ रहा है। संघ खुलकर किसानों के खिलाफ और कारपोरेट घरानों के पक्ष में मैदान में आ चुका है। सवाल उठता है संघ का लैंडबिल से क्या संबंध है ? वह तो सामाजिक संगठन है ! वह भूमि अधिग्रहण के पक्ष में मैदान में क्यों उतरा ? वह दावा करता है कि उसका काम है सामाजिक सेवा करना। लेकिन लैंड बिल के जरिए वह किसानों की जमीन हथियाने और किसानों को लूट के लिए तैयार करने के अभियान में जुट गया है। इसे समाजसेवा नहीं कहते , यह तो खुली और नंगी किसानविरोधी राजनीति है। यह किसानों के हितों पर संघ का हमला है।
    किसान पर हमले के रुप में ही हमें संघ की गऊवध विरोधी मुहिम को देखना चाहिए। किसान के लिए गाय पशुधन है। वह पुण्य या भगवानसेवा नहीं है। वह पशुधन का अपने कृषिकर्म में उपयोगी पशु और उत्पादन के औजार  के रुप में इस्तेमाल करता है। जिस तरह अनुपयोगी उपकरण को कंपनी या कारखानेदार निकालकर फेंक देता है वैसे ही किसान भी अनुपयोगी पशु को निकालकर फेंक देता है ,बेच देता है, उसका वध करके अन्य कामों में इस्तेमाल कर लेता है। पशुधन किसान के कृषिकर्म का उपकरण है, वह उसका साधन है, वह उसका लक्ष्य नहीं है, लेकिन संघ के लोग इस समूचे प्रसंग में गऊवध रोकने के नाम पर किसान की अर्थव्यवस्था पर ही हमला बोल रहे हैं।

       संघ की यदि जनांदोलनों में दिलचस्पी है तो उसे खुलकर अपना स्वरुप बदलकर मैदान में आना चाहिए। वे हर चीज को धर्म से जोड़कर पेश कर रहे हैं। गऊ को भी उन्होंने धार्मिक दृष्टिकोण से जोड़ दिया है फलतः समाज में धार्मिक घृणा का भी विभिन्न रुपों में प्रचार होने लगा है। हर चीज को धर्म से जोड़ना खासकर हिन्दूधर्म से जोड़ना एकसिरे से अनैतिक और अनैतिहासिक है। गाय तो गाय के मालिक की संपत्ति है वह उसे पाले या खाए, यह फैसला करने वाला कानून कौन होता है और यह कौन सा शास्त्र है कि व्यक्ति की निजी संपत्ति पर संघ राजनीति करे , संघ को कोई हक नहीं है कि वह बोले कि गाय का मालिक गाय को पाले या मारे या बिक्री करे। गाय यदि निजी संपत्ति है तो उसके मालिक को हक होगा कि वह गाय का क्या करे,इसके बारे में अन्य किसी को कोई हक नहीं है कि वह तय करे कि गाय का क्या होगा। संघ के जो लोग गाय पालते हैं वे संघ की विचारधारा के अनुसार गाय पालें इस पर किसी को आपत्ति नहीं होगी ,लेकिन जो संघ की विचारधारा को नहीं मानते और नहीं जानते,वे किसान गाय के बारे में निजी तौर पर फैसला करें कि उनको गाय के साथ क्या करना है ।   

शुक्रवार, 29 मई 2015

मथुरा के शानदार युवामित्र


बचपन को याद रखना बहुत मुश्किल काम है, मैं धीरे धीरे बचपन की ढ़ेरों बातें भूलता जा रहा हूँ। बचपन में जिन मित्रों को मैं आज भी मूल्यवान मानता हूँ उनमें मेरे आरंभिक मित्र हैं वामनजी चतुर्वेदी,दिनेश चतुर्वेदी,राजेश चतुर्वेदी,बाँके बिहारी चतुर्वेदी और शिवदत्त चतुर्वेदी। हम पांचों की मित्रता बेहद रोचक,उत्तेजक और साम्यवादी ओज से भरी हुई थी। दिलचस्प बात थी कि मैं इन पांचों के पिता से भी परिचित था और खूब घुला मिला हुआ था। वे हमारे मंदिर पर नियमित आते भी थे। मसलन् ,शिवदत्त के पिता गौरीदत्त चतुर्वेदीजी से आए दिन खूब बातें होतीं, वे पक्के कांग्रेसी,स्वाधीनता सेनानी और ईमानदार सामाजिकनेता थे। उनके दोनों बेटे पक्के वामपंथी थे।राजेश के पिता राधेश्याम चतुर्वेदी सोशलिस्ट थे और पेशे से वकील थे,दिनेश और बाँके के पिता सामान्यजन थे और उनकी ज्ञान-विज्ञान में कम रुचि थी,जबकि वामनजी के पिता शाक्त सम्प्रदाय के गुरुओं में गिने जाते थे,उनको समाज गुरुजी की तरह मानता था, वे भी नियमित हमारे मंदिर आते थे और मैं उनके घर नियमित जाता था और अनेक किस्म की शास्त्रचर्चा होती थी, मजेदार पहलू यह था कि हम सबके पिता साम्यवादी नहीं थे , हां, गौरीदत्त जी और राधेश्यामजी साम्यवाद को जरुर मानते थे।
    मेरे घर में पिता की ओर से साम्यवादियों से मित्रता करने और मार्क्सवादी साहित्य पढ़ने को लेकर तकरीबन पाबंदी थी,अनेक बार इसके कारण मेरी कसकर पिटाई भी हुई,अनेक मार्क्सवाद की किताबें पिता ने फाड़कर फेंक दीं, साम्यवादियों से दूर रहने की बार-बार हिदायत भी दी,लेकिन मैं आदत से लाचार था, दिल था कि मानता ही नहीं था। आधा समय पंडितों और संस्कृतशास्त्रियों में गुजरता और आधा समय साम्यवादी युवामित्रों में। मेरे दोस्त मेरे मंदिर पर दर्शन करने के बहाने आते और मीटिंग -गोष्ठी की सूचना मुझे देकर चले जाते। अजीब सी स्थिति हुआ करती थी। मेरे मित्रों को मेरे पिता से आए दिन साम्यवादियों को लेकर खरी-खोटी सुननी पड़ती। मेरे पिता का मानना था  साम्यवादी बच्चों को बिगाड़ देते हैं। जबकि सच्चाई यह थी कि साम्यवादियों की संगत में मुझे बहुत कुछ सीखने और जानने को मिला।
   शिवदत्त चतुर्वेदी पर खासतौर पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गहरा असर था। वह भाकपा का सदस्य था। उसका बंगाली घाट स्थित घर तो भाकपा का ऑफिस ही था। हम चारों की कैसे मुलाकात हुई याद नहीं पड़ता ,लेकिन हल्की सी याद है शिवदत्त ने पहल करके मुझसे पहले घर आकर परिचय किया। उन दिनों मैं अपने कॉलेज माथुर चतुर्वेद  संस्कृत महाविद्यालय के छात्रसंघ का महासचिव था, वियतनाम के मुक्ति दिवस पर संभवतःमिलने आया था और मुझे पहलीबार किसी आधुनिक कार्यक्रम में शामिल होने का सौभाग्य उसके जरिए ही मिला। वहीं पर मेरी  मथुरा के कम्युनिस्टों से मुलाकात हुई, दिनेश से मुलाकात हुई,बाद में वामनजी और राजेश से मित्रता हो गयी।
     दिलचस्प बात यह थी कि दिनेश और शिवदत्त के विचार एक जैसे हुआ करते थे,जबकि वामनजी,मैं और बांके के विचार एक जैसे हुआ करते,इस तरह आपस में दो गुट बन गए बादमें मैं,वामनजी,बाँके और राजेश ने एसएफआई की सदस्यता ले ली,खुलकर माकपा के लिए काम करने लगे,दिनेश और शिवदत्त ने भाकपा में सक्रिय रुप से भाग लेना आरंभ कर दिया। लेकिन हम पांचों पक्के मित्र थे। तकरीबन रोज मिलना-बहस करना,नए मित्रों की तलाश करना,उनको साम्यवादी विचारों के करीब लाना,हम लोगों का साझा काम था, आरंभ में एसएफआई से जुड़ते समय चौधरी वीरेन्द्र सिंह और अन्य कॉमरेडों से मित्रता हो गयी,उस पर फिर कभी बातें करूँगा।
दिलचस्प बात यह थी कि हम पाँचों ऐसे माहौल में रहते थे जिसमें साम्यवाद के लिए कोई जगह नहीं थी, साम्यवादी विचारों को सुनकर लोग भड़कते थे। मेरे लिए तो खास करके बहुत दिक्कत होती थी क्योंकि मुझे मंदिर पर बैठना पड़ता,ज्योतिष का काम भी करना पड़ता था और मेरे मंदिर पर आने वाले अधिकतर लोग कांग्रेसी या आरएसएस से प्रभावित लोग हुआ करते थे। सुखद बात यह है कि मेरे पांचों मित्र आज भी किसी न किसी रुप में लोकतांत्रिक और साम्यवादी विचारों से जुड़े हैं। वामनजी बैंक कर्मचारियों के नेता हैं,फेसबुक मित्र हैं.,शिवदत्त आज भी जुझारु भाव से मथुरा में जनांदोलनों से जुड़े हैं, दिनेश और राजेश वकालत कर रहे हैं और लोकतांत्रिक आंदोलन के साथ हैं, मैं काफी लंबे समय से इन दोनों(दिनेश और राजेश) से नहीं मिला हूँ, हम पांचों का उस दौर में एक ही लक्ष्य होता था कि नए मित्र बनाओ,उनमें राजनीतिक अभिरुचि पैदा करो और मथुरा जैसे धर्मप्राण शहर में आधुनिक चेतना जगाओ।

     हम पांचों की अन्य विचारधारा के युवाओं से भी मित्रता थी और वे लोग यदि अपने कार्यक्रम में बुलाते थे तो हमलोग जाते थे और उनके भाषण भी सुनते थे। मित्रता रखना और उसे निभाना हमने बचपन में सीखा। मित्रता का आधार विचारधारा नहीं होती थी। मित्रता तो बस मित्रता थी बस एकबार मिल तो लो । जिससे एकबार परिचय हो जाता उसे छोड़ते नहीं थे । मुझे याद है एक बार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के स्थापना दिवस के कार्यक्रम में मैं,वामनजी और बाँके चले गए, उस समय अरुण मिश्रा संघ के छात्रनेता हुआ करते थे ,हमारे मित्र थे,उन्होंने कहा कभी हमारे यहां भी आओ। हम चले गए। दिलचस्प घटना यह हुई कि हमारे जाने के बाद सभी संघी वक्ताओं ने पानी-पी पीकर खूब साम्यवादियों और खासकर चीन के साम्यवादियों को जमकर खरी-खोटी सुनाई और हमारी उपस्थिति मात्र से उनका समूचा कार्यक्रम चीनविरोधी गोष्ठी में रुपान्तरित हो गया। हमने एकाग्र भाव से दो घंटे जमकर चीन की निंदा सुनी और बाद में जमकर ठहाका मारकर संघियों की मूर्खता पर हँसे कि मूर्खों ने हमें गाली देने के चक्कर में अपनी विचारधारा पर एक वाक्य भी न बोलकर सारा कार्यक्रम साम्यवाद की निंदा पर खर्च कर दिया, उस घटना के बाद संघियों के निमंत्रण पत्र आने बंद हो गए ।  

रविवार, 24 मई 2015

अफसरसाहित्यकार के प्रतिवाद में


आजकल अफसरलेखक को हिन्दी साहित्यवाले सम्मान देते हैं। अफसरलेखक की भूमिका को वे गंभीरता से विश्लेषित नहीं करते,जन सरोकारों के संदर्भ में उसकी भूमिका को खोलकर नहीं देखते। इसने साहित्य के जन सरोकारों को प्रदूषित किया है, संघर्षशील कतारों को कमजोर किया है। 
एक जमाना था हिन्दी में जन सरोकारों से जुड़े साहित्यकार महत्वपूर्ण माने गए, बाद में ऐसा दौर आया कि अफसरसाहित्यकार ही साहित्य के सितारे बन गए। अशोक बाजपेयी को इस परंपरा को स्थापित करने का श्रेय जाता है।
आज साहित्यकारों में अफसरसाहित्यकारों के इर्दगिर्द जमघट लगा रहता है, ये अफसरसाहित्यकार साहित्य को कुछ नहीं दे पाए हैं,हां, एक काम जरुर हुआ है कि साहित्य में अफसरों की आदतें आ गयी हैं।
साहित्यकारों में वे सारी तिकड़में आ गयी हैं जो अफसर में होती हैं,तिकड़मी और ऊपर के कनेक्शनवाला मजेदार साहित्यकार पैदा हुआ है जो साहित्य में मजे ले रहा है और साहित्य को मजमे की तरह इस्तेमाल करके विनिमय कर रहा है।
अफसरसाहित्यकारों के पास एक अच्छी खासी जमात सरकारी तंत्र और राजनेताओं की है इसने साहित्य को सत्ता के तंत्र का पुर्जा बनाकर रख दिया है।
सवाल यह है कि साहित्यकार की भूमिका को समग्रता में देखें या अंश में देखें ? कहां से देखें ? साहित्यकार को समग्रता में देखना सही होगा इससे साहित्य में आए अफसरों और प्रशासनिक अधिकारियों ,कुलपति,कुलाधिपति आदि की बीमारियों से साहित्य को बचाने में मदद मिलेगी।
एक जमाना था लेखक हुआ करता था, बाद में कार्यकर्ता -लेखक आया, लेकिन इसके बाद अफसरलेखक ने साहित्य के क्षितिज को अपने कब्जे में ले लिया है। अफसरलेखक आज महान लेखक है! यह वह व्यक्ति है जिसके सामाजिक सरोकार सत्ता से अभिन्न रुप से जुड़े हैं और यह अपनी संगत,शोहरत,संपर्क आदि के जरिए साहित्य जगत को प्रभावित कर रहा है। इसे साहित्य में करप्शन का गोमुख भी कह सकते हैं। साहित्य की प्रतिवादी भूमिका,नागरिक की प्रतिवादी भूमिका आदि को विकृत करने में अफसरसाहित्यकार की विगत 40सालों में महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

शनिवार, 23 मई 2015

मूल्यहीन मोदी की बम बम बम


       प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासन को एक साल हो गया।इस एक साल में मोदी की बहुत सारी खूबियां और खामियां सामने आई हैं। मोदी की सबसे बड़ी खामी यह है कि उसने कारपोरेट मीडिया में स्व-सेंसरशिप लागू कराकर अभिव्यक्ति के दायरे को ही सीमित कर दिया है। कायदे से प्रधानमंत्री बनने के बाद मीडिया कवरेज में कमी आनी चाहिए।
    कवरेज तब अच्छा लगता है जब पीएम या उनके मंत्री कोई नया काम कर रहे हों, नीतियां लागू कर रहे हों, खबर बना रहे हों। लेकिन अफसोस की बात यह है कि मोदी ने चुनाव अभियान में जो पद्धति अपनायी उसे पीएम बनने के बाद भी जारी रखा। चुनाव के पहले वे सत्ता के प्रत्याशी थे लेकिन पीएम बनने के बाद वे देश के प्रधानमंत्री हैं, देश का प्रधानमंत्री यदि बंधुआ मीडिया की परिकल्पना को साकार करने लगे तो यह तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी कु-सेवा है।
       पीएम मोदी को मीडिया को भांड़ और भोंपू बनाने के लिए कभी क्षमा नहीं किया जा सकता। कम से कम कांग्रेस पर विगत दस सालों में यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि मीडिया को पीएम ने बंधुआ बनाने की कोशिश की थी। इन दिनों मीडिया के मालिकों पर पीएम दफ्तर का दबाव इस कदर हावी है कि हर चैनल मोदी –मोदी की रट लगाए हुए है। यह मोदी की लोकतांत्रिक इमेज की नहीं बल्कि तानाशाह इमेज की ओर संकेत है। उम्मीद थी कि लोकसभा चुनाव के बाद मीडिया कमोबेश मोदी के प्रौपेगैण्डा से मुक्त होकर काम करेगा लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। अधिकांश मीडिया घराने मोदी की चाटुकारिता में आपातकाल के दौर को भी काफी पीछे छोड़ चुके हैं। इस नजरिए से देखें तो नरेन्द्र मोदी का पहला वर्ष मीडिया के एकवर्ग को बधिया बनाने का वर्ष कहा जाएगा। हमें देखना है कि मीडिया का कब मोदी से मोहभंग होता है।
       मीडिया के मोहपाश को यदि देखना हो तो मीडिया में मोदी के शारीरिक हाव-भाव पर आ रहे विवेचन और विश्लेषणों को पढ़ें। बॉडी लैंग्वेज के नाम पर जो विवेचन आ रहे हैं,वे कमोबेश उसी पैटर्न का अंग हैं जिसमें मीडिया को बंधुआ भाव में रहना है।
    सवाल यह है कि मोदी किस तरह के मूल्यों को प्रचारित –प्रसारित कर रहे हैं ? उनकी कायिक भंगिमाओं से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं या उनकी मूल्यदृष्टि ? इस पर संपादकगण चुप क्यों हैं ? पहले हम देखें कि कायिक भंगिमाओं पर संपादक क्या सोच रहे हैं , मसलन्, बिजनेस स्टैंडर्ड के संपादक टी.एन.नाइनन ने (22मई2015 )  लिखा है
   '' यह बात जिज्ञासा जगाती है कि नरेंद्र मोदी जब स्वदेश में होते हैं तो वह शायद ही कभी मुस्कराते हों लेकिन जब वह विदेश में होते हैं तो कैमरा अक्सर उनको मुस्कराते, हंसते और दमकते हुए दर्ज करता है। देश में वह कठोर या भावशून्य नजर आते हैं। उनकी भाव भंगिमा में गंभीरता, अधिकार और गहन उद्देश्य नजर आता है। किसी वरिष्ठ  सहयोगी के साथ अभिवादन के दौरान भले ही वह मुस्कराते हुए दिख जाते हों लेकिन ज्यादातर समय वह यह भी नहीं करते।''  

''जब वह सार्वजनिक स्थानों पर चलते हैं या किसी समारोह में एकत्रित लोगों के बीच होते हैं तो उनके चेहरे पर न कोई रेखा नजर आती है न आंखों के इर्दगिर्द कोई झुर्री। अगर उनकी नजरें किसी से टकराती भी हैं तो वह केवल सामने वाले को घूर रहे होते हैं। सार्वजनिक सभाओं में उनकी शारीरिक भंगिमा आक्रामक होती है, आवाज में दबदबा और हावभाव पूरी तरह उन्मुक्त। उनकी तर्जनी अंगुली हमेशा संकेत कर रही होती है और जब वह अपनी बात कह रहे होते हैं तो आवाज में नाटकीय प्रभाव नजर आता है। वह अब तक के भारतीय प्रधानमंत्रियों में सबसे मुखर और दबदबे वाले साबित हो रहे हैं। ''
      ''स्तंभकार आकार पटेल ने मोदी के ट्विटर होम पेज पर लगी तस्वीर की सटीक व्याख्या की है। प्रधानमंत्री संसद भवन से बाहर आ रहे हैं। सुरक्षाकर्मी पीछे से घेरा बनाए हुए हैं और कुछ दूरी पर उनका एसयूवी वाहन खड़ा है। यह पूरा दृश्य सरकार में उनकी इकलौती कद्दावर हैसियत का सचित्र वर्णन करता है। परंतु यही प्रधानमंत्री विदेश जाते ही एकदम बदल जाते हैं। वह पुरलुत्फ नजर आते हैं। एकदम सुकून में और मुस्कराते हुए, सेल्फी लेते हुए। विदेशों में रहने वाले भारतीयों की ठकुरसुहाती के बीच कई बार वह मगन होकर ऐसी बातें कह जाते हैं जो शायद उनको सोचनी भी नहीं चाहिए। ''

''बात केवल विदेशों की नहीं है। कई बार देश में भी जब वह किसी विदेशी नेता के सान्निध्य में होते हैं तो अपेक्षाकृत मुखर और सौहार्दपूर्ण छवि पेश करते हैं। बराक ओबामा के साथ उनका अतिउत्साही व्यवहार लगभग शर्मिंदा करने की हद तक चला गया। कुछ कुछ नेहरू और एडविना की तस्वीर की याद दिलाता हुआ जिसमें माउंटबेटन दूर नजर आ रहे हैं। लोगों को देश के प्रधानमंत्री से थोड़े और नियंत्रण की उम्मीद रही होगी। मोदी अपनी जो दो छवियां पेश करते हैं वे एक दूसरे से एकदम अलग हैं। इतनी कि लोगों के मन में सवाल पैदा होता है कि असली नरेंद्र मोदी कौन से हैं? ''

अधिकांश लोग नेताओं के निजी पक्ष से वाकिफ नहीं होते। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके बारे में जो थोड़ी बहुत जानकारी बाहर आई वह उनकी उस सत्ता से लगाव रखने वाली महिला की छवि से एकदम अलग थी जो आलोचक समझते रहे। एक बार खबर आई थी कि मोदी ने एक नेपाली बच्चे को गोद लिया था। पहले इसके बारे में कुछ नहीं सुना गया था, न इस खबर के बाद ही ऐसी कोई खबर आई। या फिर क्या उनकी जापान यात्रा के पहले कोई जानता था कि वह ड्रम पर भी हाथ आजमा सकते हैं? प्रधानमंत्री का काम अपने आप में एक दुष्कर कार्य है ऐसे में हर प्रधानमंत्री थोड़ी राहत की सांस चाहता है। नरसिंह राव शिखर वार्ताओं से लौटते वक्त उड़ान के दौरान स्पैनिश फिल्में देखा करते थे। राजीव गांधी हर बैठक के बाद तेज गति से गाड़ी चलाते थे और इस क्रम में अपने सुरक्षाकर्मियों के साथ लुकाछिपी का खेल खेलते। कई बार तो वह लक्षद्वीप या अंडमान पर छुट्टियां बिताने चले जाते थे। मोदी के लिए यही काम आधिकारिक यात्राएं करती हैं। उनकी चीन यात्रा में यह बात अहम थी कि आधिकारिक बैठकों में सख्त लहजा अपनाने तथा पूरे आत्मविश्वास और नियंत्रण में नजर आने के बावजूद सार्वजनिक रूप से वह बहुत सहज नजर आए। सवाल यह है कि वह देश में ऐसे क्यों नहीं दिखते? पारिवारिक छवियों की मदद से अक्सर नेताओं की एक नरम तस्वीर पेश की जाती है। नेहरू की अपने नातियों के साथ बाघ के बच्चों से खेलने की तस्वीर और कैनेडी की ओवल कार्यालय में अपनी खूबसूरत पत्नी और नन्हे शिशु के साथ सामने आई तस्वीर इसका उदाहरण हैं। दुर्भाग्यवश मोदी के पास ऐसे विकल्प नहीं हैं। शायद उनको राजनीति और योग से इतर रुचियां सामने लाकर अपनी मानवीय छवि पेश करनी चाहिए। वह वाद्य यंत्र पर हाथ आजमाने को बतौर रुचि आगे बढ़ा सकते हैं।''  सवाल यह है कि व्यक्ति की भाव-भंगिमाएं क्या मूल्यहीन होती हैं ?

गुरुवार, 21 मई 2015

राजीव गांधी के बहाने



फ़ेसबुक पर जस्टिस मार्कण्डेय काटजू की राजीव गांधी पर पोस्ट पढ़कर लगा कि हमारे मध्यवर्ग में एक तबक़ा ऐसा पैदा हुआ है जो मानवीय संवेदनाओं और लोकतांत्रिक संवेदनाओं के मामलों में एकसिरे से अमानवीय हो चुका है या जैसी करनी-वैसी भरनी की मनोदशा का शिकार है। 
      राजीव गांधी की स्वाभाविक मौत नहीं हुई थी, वे लंकाई तमिल आतंकी संगठन लिट्टे के हाथों मारे गए , उनकी लिट्टे मरजीवडों ने हत्या की थी। इस हत्या की किसीभी रुप में हिमायत सही नहीं है। राजीव गांधी की मृत्यु सामान्य मृत्यु नहीं है। वह राजनीतिक हत्या है । हत्यारों ने ख़ास मंशा और उद्देश्य को ध्यान में रखकर हत्या की थी। यह भारत के प्रधानमंत्री की हत्या है। यह हत्या ऐसे समय में की गयी जब भारत लिट्टे की आतंकी मुहिम से श्रीलंका में जूझ रहा था। आतंकी गिरोह के हाथों हमारे प्रधानमंत्री का मारा ज़ाना मार्कण्डेय साहब को क्यों नहीं दिखा ? लिट्टे के ख़िलाफ़ भारत ने यदि श्रीलंका में अभियान न चलाया होता तो आज वह समूचे एशिया में वह सबसे ताक़तवर आतंकी संगठन होता । लिट्टे को नेस्तनाबूद करने बाद ही हम श्रीलंका में शांति स्थापित करने में मदद कर पाए। 
     हमारे देश के राजनेताओं की मुश्किल यह है कि वे आरंभ में आतंकी संगठनों की भावी रणनीतियाँ भाँप नहीं पाते। यही स्थिति भिण्डरावाले के संदर्भ हुई और यही स्थिति लिट्टे के संदर्भ में हुई। भारतीय राजनेता आतंकी या पृथकतावादियों की हर राजनीतिक गतिविधि को अपने तात्कालिक वोट बैंक के फ़ायदे और नुक़सान के आधार पर तय करते रहे हैं। फ़िलहाल जम्मू-कश्मीर में मोदी यही चाल चल रहे हैं। जबकि भिण्डरावाले और लिट्टे के प्रसंग में यह रणनीति पूरी तरह पिट चुकी है । इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक सभी का आरंभ में आतंकी और पृथकतावादी संगठनों के प्रति सॉफ़्ट रवैय्या था । इसका ख़ामियाज़ा इन दोनों नेताओं को जान गँवाकर भुगतना पड़ा । इसका यह अर्थ नहीं है कि इन दोनों नेताओं की आतंकियों के द्वारा की गयी हत्या जायज़ है। 
             इसके विपरीत हमें देखना चाहिए कि राजीव की हत्या का मतलब क्या है ? राजीव की हत्या का मतलब है भारत की संप्रभुता और लोकतंत्र पर हमला। आज का दिन राजीव गांधी से हिसाब माँगने का दिन नहीं है बल्कि राजीव गांधी के हत्यारों के ख़िलाफ़ एकजुट होकर आवाज़ बुलंद करने का दिन है। काटजू साहब बाक़ी किसी दिन राजीव गांधी की करनी का हिसाब कांग्रेस से माँग लीजिए, लेकिन खुदा के वास्ते आज के दिन बख़्श दीजिए। 

      लोकतंत्र में प्रधान और हाशिए के अंतर्विरोध में अंतर करना चाहिए। हम यह देखें कि आतंकी संगठन लिट्टे के ख़िलाफ़ एकजुट हैं या नहीं ? लिट्टे के ख़िलाफ़ एकजुटता दिखाने की बजाय काटजू साहब तो राजीव गांधी पर हमले कर रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है संप्रभु राष्ट्र के लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री की हत्या के पीछे कार्यरत  राजनीतिक मंशा को काटजू जैसा सुलझा हुआ व्यक्ति नहीं समझ पाया ! 
      हमें कारण खोजना चाहिए कि जस्टिस काटजू से चूक क्यों हुई ? असल में इन दिनों संकीर्ण फलक पर रखकर देखने की हवा चल रही है, हम अपनी पीड़ा और अपने नज़रिए को ही प्यार करते हैं उसके आगे देख ही नहीं पाते । इस तरह बम राजीव गांधी की हत्या को ठीक से समझ ही नहीं पाएँगे, इसे निजी या सामाजिक हानि लाभ के राजनीतिक व्यवहारवाद से भी समझ में नहीं आएगी । इसे लोकतांत्रिक नज़रिए से देखने की ज़रूरत है। 
       प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या हमारे लोकतंत्र और राष्ट्रीय संप्रभुता पर किया गया हमला थी और सारे देश ने एकजुट होकर उसका प्रतिवाद किया था । आज हम यह सबक़ लें कि आतंकी और पृथकतावादी संगठनों के प्रति नरम रुख़ नहीं अपनाएँगे । राजीव गांधी को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 

रविवार, 10 मई 2015

माँ की सामाजिक ताकत

 माँ के बारे में लिखना बेहद मुश्किल काम है।सामने वो प्रशंसा सुनती नहीं थी, इस समय वो मौजूद नहीं है। जब तक रही अपार ऊर्जाका स्रोत बनी रही। हम सब भाई-बहन बेहद खुश रहते थे। कभी किसी चीज के बारे मेंमैंने निजी तौर पर कमी महसूस नहीं  की। वह हम सबकी सामाजिक ताकत थी। माँ का जन्म जिसपरिवार में हुआ वह  मथुरा के पढ़े-लिखे परिवारों में से एक बेहतरीन परिवारथा। उस परिवार के पास   बेहतरीनसांस्कृतिक और बौद्धिक परंपराएं थीं,नानाजी सोहनलाल चतुर्वेदी  संगीत के विद्वान थे, दोनों मामा पक्के खांटीमार्क्सवादी बुद्धिजीवी थे। मथुरा के चौबों की पंडिताई-प्रोहिताई की परंपरा सेमुक्त इस परिवार में तमाम किस्म के आधुनिक संस्कार थे।  माँ बचपन में टाइफायडके कारण गूंगी-बहरी हो गई, इसके अलावा उसकी छोटी उम्र में ही शादी भी हो गयी,शादी तकरीबन 6-7साल की उम्र में हुई,सात साल बाद द्विरागमन हुआ, वह मुश्किल से15-16साल की रही होगी जब मेरा जन्म हुआ। वह जब तक जिंदा रही मैं अधिकांश समय छायाकी तरह उसके साथ रहा। वह पढ़ी लिखी नहीं थी, लेकिन शिक्षा की ताकत जानती थी, नएविचारों और खासकर प्रगतिशील विचारों को व्यवहार से पहचानती और मानती थी। प्रगतिशीलविचारों का संस्कार मुझे माँ से ही मिला।
         माँके अंदर विलक्षण शारीरिक क्षमता थी और वह इसका अपने परिवार के साथ ,अपनी माँ औरनानी की मदद के लिए जमकर इस्तेमाल करती थी, उसके पास कभी खाली समय नहीं होता था,वहबेहद संगठित थी और परिवार के दूसरे लोगों की मदद करने में उसकी गहरी रुचि थी। आजकललड़कियों में जिस तरह  घरेलू काम के प्रति अरुचि दिखती है,वह उसमें एकदम नहींथी।  हमलोगों का संयुक्त परिवार था,तीनआंगन का बड़ा घर था और उसमें नौ कमरे थे, मेरी दादी और माँ ये दोनों उस घर की एकतरह स्वामिनी थीं,ताई मस्त थी ,उसकी घरेलू कामों में कोई दिलचस्पी नहीं थी, वहसुबह होते ही यमुना नहाने, मंदिरों में दर्शन करने चली जाती थी,वहां से समय बचतातो गप्प करने अपनी माँ के यहां चली जाती और दोपहर  खाने के वक्त घर लौटती । ऐसी अवस्था में संयुक्तपरिवार के समस्त घरेलू काम  माँ और दादी मिलकर करते थे, घर में कोई नौकर नहींथा।
    कालान्तर में परिवार मेंबंटबारा हो जाने बाद माँ ने घर के काम के साथ मंदिर की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लीऔर पिता को उस काम में मदद की, मंदिर का काम बहुत ही परिश्रम साध्य था,वह घर औरमंदिर के काम में सुंदर संतुलन बनाकर काम करती थी और धीरे धीरे उसने पिता को मंदिरसे तकरीबन मुक्त ही कर दिया था।
         माँ केअंदर यह भावबोध था कि वह जिस परिवार में जन्मी है वह बहुत पढ़ा लिखा सांस्कृतिक तौरपर समृद्ध परिवार है। इसलिए उसकी यह मंशा थी कि मैं खूब पढूँ । संयोग की बात थीमेरे तीन भाई-बहन कम उम्र में ही विभिन्न बीमारियों के कारण मर गए। बाद में हम दोभाई बच गए । मेरे छोटे भाई की पढ़ने में कोई रुचि नहीं थी। लेकिन मेरी रुचि थी, इसरुचि को बनाने में परिवार के अन्य सदस्यों जैसे माता-पिता के अलावा दोनों मामा कीभी भूमिका रही है। लेकिन मैं नियमित संगठित ढ़ंग से पढूँ इस भावबोध को निर्मितकरने में माँ की केन्द्रीय भूमिका थी। माँ के कारण ही यह संभव हो पाया किचौदह-पन्द्रह साल की उम्र में ही मेरे लिए अलग से कमरा बनवा दिया गया जिसमेंपढ़ने-सोने की व्यवस्था के साथ एक रेडियो भी लगवा दिया गया जिससे में अपडेट करकेरहूँ।
      मैं वैसे संस्कृत पाठशालामें पढ़ता था लेकिन माँ के संस्कारों के असर के कारण मुझे स्वतंत्र रुप सेकमरा मिला,इसने  मेरे अंदर आधुनिक भावबोध ने जगह बनाने में मदद की। मैंने अधिकांश आधुनिकबातें माँ से ही सीखीं। माँ के कारण मुझे स्वतंत्र कमरा मिला,यह मेरे जीवन की सबसेबड़ी घटना थी, मेरे किसी भी संगी-साथी के पास अपना निजी कमरा नहीं था। इसके अलावा मुझेरोज सुबह चार बजे जगाने का काम भी माँ करती थी। 
      मैं सुबह उठकर पढता था और माँ केसाथ में  एक कप चाय भी पीता था, चाय पिलाकरवह चली जाती थी, लेकिन नजर रखती थी कि मैं कहीं बाद सो न जाऊँ, यदि कभी सोने कीकोशिश करता तो आकर जगा देती थी, उसका मानना था  सुबह पढ़ने से चीजें जल्दी याद हो जाती हैं औरसारी जिन्दगी मन में रहती हैं। खैर, बचपन में सुबह चार बजे उठने की जो आदत उसनेडाली वह आज भी मेरी सबसे बड़ी ताकत है ।
      मित्रलोग पूछते हैं मैं लिखता-पढ़ता कब हूँ, मैंयही कहता हूँ सुबह चार बजे।बचपन में संस्कार बना कि सुबह चार बजे उठने का मतलब हैमाँ से जुड़े रहना।किताबें पढ़ने का मतलब है माँ से जुड़े रहना।
      बाद में 1967-68 में माँके दबाव के कारण ही मुझे एकदम नया जापानी टेपरिकॉर्डर मेरे पिता ने खरीदकर दिया।जो मेरे पास अभी तक सुरक्षित है। संभवतः कम्युनिकेशन के संस्कार बनाने और बाद मेंकम्युनिकेशन और मीडिया पर लिखने की आदत इससे ही पड़ी। मैं तो यही सोचता हूँ कि माँये कम्युनिकेशन और स्वाध्याय के संस्कार न बनाती तो मैं लिख ही नहीं पाता।
     माँ के लिए वह क्षण बड़ा ही महत्वपूर्ण होता थाजब मैं परीक्षा में पास होता था, वह श्रेणी नहीं समझती थी,पास-फेल समझती थी। मुझेयाद है मैंने जब शास्त्री की परीक्षा पास की,तो वह बेहद खुश हुई थी ,उसने पिता कोबुलाकर कहा ,आज मैं बहुत खुश हूं मेरा बेटा तुमसे ज्यादा पढ़ गया। मेरे पिताशास्त्री प्रथम वर्ष तक पढ़ाई कर पाए, धनाभाव और घरेलू जिम्मेदीरियों की वजह से वेआगे नहीं पढ़ पाए,मैंने जब शास्त्री द्वितीय वर्ष की परीक्षा पास की तो मैंने उसेसमझाया कि मैं पिता से पढाई में आगे निकल गया हूँ तो वह बेइंतहा खुश हुई, यह अजीबसंयोग ही था कि मेरा शास्त्री का परीक्षाफल  आने के चार दिन बाद ही सन् 1976 में उसकी अचानकहृदयाघात के कारण मौत हो गयी।   

शुक्रवार, 8 मई 2015

न्याय का अन्यायमुख


            कानून के खिलाफ बोलना या न्याय का विरोध करना अपने आपमें जोखिम का काम है,  आमतौर पर भारत में जो कानून के जानकार या विशेषज्ञ हैं वे कानून के दार्शनिक-वैचारिक पहलुओं पर कम  बोलते हैं । सामान्य तौर पर पूंजीवादी समाज में कानून के पास फरियाद लेकर जाओ तब कानून हस्तक्षेप करता है, अपनी पहल पर वह कभी हस्तक्षेप नहीं करता। इससे यह भी पता चलता है कि कानून में निजी पहलकदमी का अभाव है। कानून की धुरी न्याय नहीं है, बल्कि युक्तियां और फैसले हैं,न्याय की परंपरा है, फैसलों की परंपरा है।फलतःकानून किताबों और दलीलों का विशाल जंजाल है।
      न्यायालयों में वही नियम लागू होता है जो समाज में लागू होता है। समाज  जिस तरह बल प्रयोग के आधार पर चलता है, वैसे ही बल के आधार पर लोकतंत्र भी चलता है,उसी तरह न्यायालयों में भी बल के आधार पर ही फैसले होते हैं।  अदालत के अंदर बली होने के लिए जरुरी है कि आप जमकर पैसा फेंकें और अदालत में बल का प्रदर्शन करें। बड़े से बड़े वकील को खड़ा करें। बड़े वकील का मतलब ज्यादा फीस और मुकदमा लड़ने वाले की ताकत । इसीलिए यह कहते हैं कि कानून का समूचा दारोमदार न्यायिक बल -संतुलन पर टिका है। जिस तरह हिंसा में बल की भूमिका होती है ,उसी तरह कानून में भी बल की भूमिका होती है।
     कहने के लिए लोकतंत्र आम आदमी के ऊपर टिका है लेकिन वस्तुगत तौर पर देखें तो लोकतंत्र सामाजिक-आर्थिक शक्ति संतुलन पर टिका है। लोकतंत्र में वही सफल है जो अपने पक्ष में सामाजिक-आर्थिक शक्ति संतुलन एकत्रित करने में सफल हो जाता है। मसलन् नरेन्द्र मोदी की जीत के पीछे मात्र 31फीसदी वोटरों की भूमिका है 69फीसदी वोटर उनके खिलाफ हैं ,लेकिन आर्थिक शक्तियों का संतुलन वे अपने पक्ष में लामबंद करने में सफल हो गए और पीएम बन गए।

      समग्रता में अदालतों में वही सफल होता है जिसके पास ताकत है,संसाधनों की शक्ति है। न्याय के आधार पर अदालतों में फैसले नहीं होते, अदालतों में फैसले तो न्यायबल के आधार पर होते हैं, न्यायबल में महत्वपूर्ण न्याय नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण है 'बल' । पूंजीवादी न्याय में असमानता अन्तर्निहत है, वह सतह पर समानता का लाख जयगान करे लेकिन व्यवहार में वह असमानता को ही तरजीह देता है। असमानता का आचरण करता है। यह असमान व्यवहार चौतरफा सहज ही देख सकते हैं। भारतीय न्याय प्रणाली की मूलभूत अनुभवजन्य विशेषता है कि कानून स्वयं जिन बातों का दावा करता है उन बातों का पालन नहीं करता। मसलन् कानू यह दावा करता है कि वह करप्ट नहीं है लेकिन यह पाया गया कि भारत के सुप्रीमकोर्ट के 9 में से 7मुख्यन्यायाधीश करप्ट थे जिनके बारे में प्रसिद्ध कानूनविद शांतिभूषण ने सीधे आरोप लगाया था। कानून में करप्शन का स्रोत है नियमहीनता का सिद्धांत। मसलन्, न्यायालयों में वकीलों की फीस का कोई नियम नहीं है, वकील लोग मनमानी फीस लेते हैं,सुप्रीम कोर्ट से लेकर निचली अलत तक हमें करप्शन के दर्शन सहज ही मिल जाएंगे। अदालत से यह तो पूछा ही जाना चाहिए कि वकीलों की फीस का मानक क्यों नहीं बनाया गया ? क्यों किसी वकील की फीस करोडों में होती है और किसी की हजारों में होती है ? क्या न्यायालय को पता नहीं है कि आम आदमी की आमदनी कितनी है ? सारी दुनिया को ईमानदारी,नियम,पारदर्शिता का उपदेश देने वाली न्यायपालिका में इतनी अंधेरगर्दी क्यों है ? प्रमाण और फैसलों के जंजाल में न्याय पाना आज सबसे मुश्किल काम है। कानून की किताबें सहज,सरल और छोटी क्यों नहीं होती ?       

गुरुवार, 7 मई 2015

सलमान,मध्यवर्गीय लंपटता और समाज सेवा


     सलमान के कवरेज ने एकबार फिर से हमें मध्यवर्ग के अपराधी मनोभावों पर सोचने के लिए विवश किया है। भारत का महान मध्यवर्ग का व्यापक अंश मूल्यों की दृष्टि से महान मूल्यों की ओर नहीं जा रहा,बल्कि अ-सामाजिक मूल्यों की ओर इसका स्वाभाविक रुझान देखने में आ रहा है। मध्यवर्ग के इस बड़े समूह की सामान्य विशेषता है अ-सामाजिक मूल्यों को वैधता प्रदान करना,उनका महिमा मंडन करना और उनके लिए सामाजिक समूहों और दवाब ग्रुपों का निर्माण करना ।इसे हम लंपट मध्यवर्ग कहें तो बेहतर होगा।
     स्वभाव से लंपट मध्यवर्ग अविवेकवादी और कानूनभंजक है।  यह हाशिए के लोगों से नफरत करता है,उनको कीड़े-मकोड़े से ज्यादा नहीं समझता, गायक अभिजीत का कल सलमान प्रसंग में आया बयान इस वर्ग में हाशिए के लोगों के प्रति व्याप्त घृणा का आदर्श नमूना है।
    मीडिया में बार-बार सलमान समर्थक लोग सलमान के सुधार कार्यों का उल्लेख करके मानवीय आबोहवा पैदा कर रहे थे, लेकिन सामाजिक जीवन में ऐसे समाजसुधार और मानवीय कार्यों का कोई स्वस्थ लक्ष्य नहीं है जो निहित स्वार्थ और सामाजिक जन समर्थन जुटाने के लिए किया जाय।  
     लंपट मध्यवर्ग-उच्चमध्यवर्ग के  कानूनभंजकों में माफिया और फंडामेंटलिस्ट भी आते हैं और वे लोग तमाम किस्म के असामाजिक,लोकतंत्रविरोधी,न्यायविरोधी कामों के साथ-साथ समाजसुधार के काम भी करते हैं । उनकी समाजसेवा का लक्ष्य है गुनाहों पर परदा डालना। वे चाहते हैं आम जनता उनके गुनाहों की अनदेखी करे और उनके लिए सामाजिक आधार का काम करे।
     लोकतांत्रिक समाज में समाजसुधार का मतलब है न्याय और समानता के भाव का कड़ाई से पालन। मानवाधिकारों के पक्ष में निष्ठा के साथ खड़े रहने की भावना। सलमान के मामले में ये सारी चीजें एकसिरे से नदारत हैं,उलटे सलमान पतंगबाजी के बहाने मानवाधिकार भंजकों के नायक के प्रचारक की भूमिका अदा करते नजर आए हैं।
    समाजसुधार का अर्थ किसी का ऑपरेशन कराना या पैसे देना या आर्थिक मदद कर देना मात्र नहीं है बल्कि इस मदद के साथ दानदाता किस तरह के मूल्यों का आचरण करता है यह भी देखना चाहिए। सामान्य सी बात है कि समाजसुधार का दावा करने वाला दारु पीकर ,बिना लाइसेंस के गाड़ी चलाता है तो वह कानून तोड़ता है, गाड़ी से कुचलते हुए चला जाता है, लेकिन पीड़ितों को अस्पताल नहीं ले जाता, उनको आर्थिक मदद नहीं देता,बल्कि अदालत में सौदेबाजी करता है,सामाजिक सुधार को मानने का अर्थ है दण्ड को नतमस्तक होकर स्वीकार करना, न कि पैसे के बल पर,तिकड़मों के जरिए अपने पक्ष में करना। 
  सलमान टाइप चैरिटी या दान-पुण्य-मदद का लक्ष्य है अपने लिए जनाधार और जन-समर्थन तैयार करना, इसका लक्ष्य समाजसेवा नहीं है। इसका लक्ष्य है अपने लिए प्रशंसकों की भीड़ जुगाड़ करना, इसका लक्ष्य है सलमान के अमानवीय और कानूनभंजक रुप पर पर्दा डालना। इस तरह की समाजसेवा को लंपट समाज सेवा कहते हैं। जो लोग समाज सेवा करते हैं वे उसके जरिए जन-समर्थन या निजी स्वार्थों की पूर्ति नहीं करते। समाज सेवा का मतलब है कि सेवा करने वाला बदले में अपने लिए कुछनहीं चाहता, लेकिन सलमान के समाजसेवा कार्यों में खर्च हुए 42करोड़ रुपयों का बार-बार हवाला देकर यह मांग की जा रही है कि उसे कानून बरी कर दे, वह मानवीय है ,हत्यारा नहीं है । उसके समाजसेवा के तमगों के नाम पर यह भी कहा जा रहा है कि उसने कितने लोगों के हृदय के ऑपरेशन में मदद की ,कितने जरुरतमंदों के काम आया। यानी सलमान के लिए समाजसेवा का मतलब आम जनता को अपने पीछे गोलबंद करना है और यही वह बिंदु है जहां पर हमें सोचना चाहिए कि इस तरह की समाजसेवा क्या सच में समाजसेवा है या निजीसेवा है ?
     सलमान मार्का चैरिटी का सारा धंधा या इसी तरह की समाजसेवा करने वाले संगठन जब बदले में वोट मांगते हैं या राजनीतिक तौर पर साथ रहने की मांग करते हैं तो समाजसेवा को कलंकित करके उसे निहितस्वार्थ सेवा में तब्दील कर देते हैं। हमारे देश में अनेक संगठन हैं जो समाजसेवा के नाम पर शिक्षा,स्वास्थ्य आदि के क्षेत्र में काम कर रहे हैं,साम्प्रदायिक विभाजन और घृणा का काम कर रहे हैं, लेकिन बदले में वोट की राजनीति भी कर रहे हैं या साम्प्रदायिक या फंडामेंटलिस्ट राजनीति कर रहे हैं। देश का सबसे बड़ा संगठन आरएसएस समाजसेवा ही कर रहा है।साथ में अन्य राजनीतिक लक्ष्यों में लगा है। यह समाजसेवा नहीं है यह समाज मेनीपुलेशन है।
     कहने का आशय यह है कि समाजसेवा को तब ही समाजसेवा कहते हैं जब आप अन्य की मदद करें और भूल जाएं,बदले में उससे कुछ न चाहें, समाजसेवा का ढोल बजाकर जिक्र न करें। मसलन् ,समाजसेवा का रामकृष्ण परमहंस मिशन का तरीका देखें तो यह बात सहज ही समझ में आ जाएगी। वह समाजसेवा किसी काम की नहीं है जो बदले में निहितस्वार्थों की पूर्ति की मांग करे, राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति की मांग करे।
      समाजसेवक न्यायप्रिय और सभ्य होता है। सलमान और उनके जैसे सामाजिक संगठन या समाजसेवक इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते। वे न तो न्यायप्रिय हैं और न सभ्य ही हैं। बल्कि स्थिति यह है कि वे लंपटता और मीडियाप्रेशर के जरिए सामाजिक माहौल को अपने अनुकूल बनाने की घृणिततम कोशिश कर रहे हैं. इन लोगों ने बड़े पैमाने पर लंपट मध्यवर्ग को अपने साथ गोलबंद कर लिया है। यह लंपट मध्यवर्ग आए दिन उन सभी नेताओं और अभिनेताओं के पीछे गोलबंद नजर आता है जिनकी नागरिक समाज में कोई आस्था नहीं है,जिनकी भारत के कानून में कोई आस्था नहीं है, वे समूह या भीड़ के दवाब के जरिए कानून से लेकर सरकार तक सबको प्रभावित करना जानते हैं। मीडिया को वे अपने प्रौपेगैण्डा अस्त्र के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।   

    

रविवार, 3 मई 2015

पंडित जवाहरलाल नेहरु और धर्मनिरपेक्षता की चुनौतियाँ

                
         भारत जब आजाद हुआ तो उसकी नींव साम्प्रदायिक देश- विभाजन पर रखी गयी।फलतः साम्प्रदायिकता हमारे लोकतंत्र में अंतर्गृथित तत्व है। लोकतंत्र बचाना है तो इसके खिलाफ समझौताहीन रवैय्या रखना होगा। साम्प्रदायिकता के औजार हैं आक्रामकता और मेनीपुलेशन । इसने सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक संरचनाओं को गंभीरता से प्रभावित किया है। त्रासद पक्ष यह है कि हाल के वर्षों में साम्प्रदायिकताविरोधी चेतना का ह्रास हुआ है।खासकर आपातकाल के बाद पैदा हुए नागरिकों में यह फिनोमिना व्यापक रुप में नजर आता है। साम्प्रदायिकता को हम तदर्थवादी और वोटवादी धर्मनिरपेक्ष कॉमनसेंस नजरिए से देखते हैं।फलतः यह भी कहने लगे हैं सभी राजनीतिक दल एक जैसे होते हैं। इस धारणा ने साम्प्रदायिक और गैर-साम्प्रदायिकदल के बीच के भेद को खत्म करने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की है। जबकि सच यह है साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता एक ही चीज नहीं है। साम्प्रदायिकदल और धर्मनिरपेक्षदल एक ही जैसे नहीं होते। हम इनमें समानताएं दरशाने के लिए राजनीतिक एक्शन के बीच समानताएं बताने लगते हैं। राजनीतिक एक्शनों में समानताओं के आधार पर कोई भी निर्णय सही नहीं हो सकता। सवाल विचारधारा का है। साम्प्रदायिक विचारधारा और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के नजरिए में समानता का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता बल्कि ये दोनों एक-दूसरे के अंतर्विरोधी हैं।
     साम्प्रदायिकता को  धर्मनिरपेक्ष कॉमनसेंस के जरिए अपदस्थ नहीं किया जा सकता।पंडित नेहरु का 'विविधता में एकता' का नारा धर्मनिरपेक्ष कॉमनसेंस केन्द्रित नारा था, जिसके आधार पर हम साम्प्रदायिकता को हाशिए पर ठेलने की कोशिश करते रहे हैं। यह सबसे असफल नारा साबित हुआ है। कायदे से 'विविधता और लोकतंत्र' के आधार पर समाज को संगठित किया जाता तो बेहतर सामाजिक-सांस्कृतिक परिणाम हासिल किए जा सकते थे।
पंडित जवाहरलाल नेहरु ने आजादी के साथ ही 'विविधता में एकता' का नारा दिया। यह नारा सतह पर आकर्षक है लेकिन इसकी वैचारिक जड़ें खोखली हैं और इसमें राजनीतिक अवसरवाद की अनंत संभावनाएं  हैं। आमतौर पर यह मान लिया गया कि पंडित नेहरु सही कह रहे हैं। लेकिन सच यह है 'विविधता में एकता' के नाम पर देश में समय –समय पर साम्प्रदायिक ताकतों के प्रति नरम रुख की कांग्रेस के अंदर से ही शुरुआत हुई। मसलन्, महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर जब प्रतिबंध लगा दिया गया तो कायदे से यह प्रतिबंध हटाने की जरुरत नहीं थी, लेकिन यह जानते हुए भी कि संघ की विचारधारा क्या है उस पर से प्रतिबंध हटा लिया गया,उसे खुलकर काम करने का मौका दिया गया। सवाल यह है क्या साम्प्रदायिक संगठन को लोकतंत्र में काम करने की अनुमति देनी चाहिए ? लोकतंत्र में उन संगठनों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए जो लोकतंत्रविरोधी आचरण करते हैं। साम्प्रदायिकता वस्तुतःलोकतंत्रविरोधी विचारधारा है और इसे हमने फलने-फूलने का अवसर देकर यह भावना पैदा की कि लोकतंत्र में सबके लिए समान अधिकार हैं यानी उन विचारधाराओं के लिए भी समान अधिकार हैं जो लोकतंत्र को नहीं मानतीं और लोकतंत्र विरोधी आचरण करती हैं। सामाजिक कार्य हो या राजनीतिक कार्य हो, यदि उससे साम्प्रदायिकता फैलती है तो हमें उसे हर स्तर पर राजनीतिक और प्रशासनिक तौर पर रोकने के बारे में सोचना होगा।
      पंडित नेहरु साध्य और साधन की एकता में गहरा विश्वास करते थे लेकिन आचरण करते समय साध्य-साधन के बीच में सामंजस्य रखने में एकसिरे से असफल रहे। मसलन् 1962 में भारत- चीन युद्ध के समय रास्ता वे रास्ता चूक गए और आरएसएस से मदद मांग बैठे,उनके जमाने में ही गणतंत्र दिवस की परेड में संघ की टुकड़ी मार्च करते हुए दिल्ली में राजपथ पर निकली थी । कहने का आशय यह है कि धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए साम्प्रदायिकता के खिलाफ समझौताहीन संघर्ष पहली शर्त है। इसी तरह लोकतांत्रिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक आदेशों का ईमानदारी से पालन करना दूसरी शर्त है। पंडित नेहरु में शासन में आने के बाद लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अ-सम्मान का भाव सबसे पहले पैदा हुआ। केरल की पहली कम्युनिस्ट सरकार को जो 1957 में चुनकर आई थी उसे 1959 में एक आंदोलन के बहाने  उन्होंने गिरा दिया गया।जबकि यह सरकार पांच साल के लिए चुनकर आई थी।  बाद के वर्षों में कांग्रेस ने इस तरह की अनेक गलतियां लगातार कीं। 
    कहने का तात्पर्य यह कि धर्मनिरपेक्षता का भविष्य दो बातों पर टिका है ,पहला, साम्प्रदायिकता के खिलाफ समझौताहीन संघर्ष,दूसरा लोकतांत्रिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक आदेशों का अडिगभाव से पालन। भारत में साम्प्रदायिकता पर विचार करते समय यह भी ख्याल रखें कि साम्प्रदायिकता कभी भी पृथकतावाद या क्षेत्रीयतावाद में रुपान्तरित हो सकती है। यही बात पृथकतावाद और क्षेत्रीयतावाद पर लागू होती है वे कभी भी साम्प्रदायिक रंग में रुपान्तरित हो सकते हैं। इसी तरह राजनीति,राज्यसत्ता को धर्म और धार्मिकता से पूरी तरह विच्छिन्न किया जाय। धर्म और धार्मिकता के साथ इनका संबंध साम्प्रदायिकता के प्रचार-प्रसार में मदद करता है।
       लोकतंत्र का स्वस्थ व्यवस्था के तौर पर विकास करने के लिए जरुरी है कि राजनीति से लेकर समाज तक सबको अतीत के बोझ से मुक्त करें। अतीत के मलबे के जरिए जनता में एकता कायम करने से साम्प्रदायिकता तात्कालिक तौर पर कमजोर होती दिखती है लेकिन वह कमजोर नहीं होती। अतीत का मलबा साम्प्रदायिकता को ईंधन देता है ,उसे दीर्घजीवी बनाता है। लोकतंत्र में अतीत प्रेम कैंसर है। इससे आप टाइमपास कर सकते हैं लेकिन सामाजिक विकास नहीं कर सकते। लोकतंत्र में अतीत को जानना चाहिए लेकिन अतीत को पाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। साम्प्रदायिक ताकतों ने अपने विकास के लिए अतीत के मसलों को औजार की तरह इस्तेमाल किया है। पंडित नेहरु ने लिखा है '' गुजरे जमाने का- उसकी अच्छाई और बुराई दोनों का ही- बोझ एक दबा देनेवाला
और कभी –कभी दम घुटानेवाला बोझ है,खासकर हम लोगों के लिए,जो ऐसी पुरानी सभ्यता में पले हैं,जैसी चीन या हिंदुस्तान की है। जैसा कि नीत्शे ने कहा है -'' न केवल सदियों का ज्ञान ,बल्कि सदियों का पागलपन भी हममें फूट निकलता है। वारिस होना खतरनाक है।'' 
        हमारी मुश्किल है कि हमने विरासत के नाम पर बहुत सारी चीजों का बोझ अपने लोकतंत्र पर लाद दिया है। लोकतंत्र को पुरानी चीजों का वारिस न बनाया जाया।लोकतांत्रिक मनुष्य को पुराने लबादों में न बांधा जाय, लोकतंत्र पर अतीत की विरासत का एक ही असर है और एक ही मूल्यवान चीज है जो हमें विरासत मिली है वह है शिरकत। लोकतंत्र शिरकत के जरिए विकास करता है। अतीत की चीजें भी मानवीय शिरकत से बनी थीं, हमें बाकी अतीत को उसके हाल पर छोड़कर आगे निकल जाना चाहिए।
    पंडित नेहरु पर महात्मा गांधी का गहरा असर था और उन्होंने गांधी को 'हिंदुस्तान की कहानी' में उद्धृत किया है ,लिखा ,' मुझे गांधीजी के वे लफ्ज याद हैं,जो उन्होंने 7अगस्त,1942 की भविष्य –सूचक शाम को कहे थे-

'' दुनिया की आंखें अगरचे आज खून से लाल हैं,फिर भी हमें दुनिया का सामना शांत और साफ़ नज़रों से करना चाहिए। ''

शनिवार, 2 मई 2015

नामवर सिंह सिर्फ 'देह' हैं

        साहित्य इन दिनों भेडों से घिर चुका है। आप भेड़ नहीं हैं तो साहित्यकार नहीं हैं। सत्ता ने साहित्यकार को सम्मान दिया,पुरस्कार दिए लेकिन भेड़ का दर्जा भी दिया। हम खुश हैं कि हम भेड़ हैं। भेड़ की तरह रहते हैं,जीते हैं, लिखते हैं,भेड़ होना बुरी बात नहीं है लेकिन साहित्यकार का भेड़ होना बुरी बात है। साहित्यकार जब भेड़ बन जाता है तो यह साहित्य के लिए अशुभ-संकेत है। हम असमर्थ हैं कि साहित्यकार को भेड़ बनने से रोक नहीं रोक पा रहे,साहित्य में भेडों का उत्पादन जितनी तेजी से बड़ा है उतनी तेजी से साहित्य का उत्पादन नहीं बढ़ा।
        एक जमाना था साहित्यकार का दृष्टिकोण महत्वपूर्ण होता था लेकिन इन दिनों 'दृष्टिकोण' की जगह 'कोण' ने लेली है। 'दृष्टि' बेमानी हो गयी है। साहित्यकार का 'कोण' उसकी पहचान का आधार बन गया है । साहित्यकार के दृष्टिलोप की सटीक जन्मतिथि हम नहीं जानते,लेकिन एक बात जरुर जानते हैं कि विवेक जब मर जाता है तब 'कोण' पैदा है। विवेक जब तक जिंदा रहता है दृष्टिकोण बना रहता है लेकिन जब विवेक मर जाता है तो सिर्फ 'कोण' रह जाता है।
       विवेक  मर जाने पर साहित्यकार मात्र सिर्फ देह रह जाता है। यानी वह मंच पर ,सभा में, गोष्ठी में ,लोकार्पण में,समीक्षा में बैठा हुआ शरीर मात्र रह जाता है। साहित्यकार का 'देह' में रुपान्तरण स्वयं में लेखक के लिए चिन्ता की बात नहीं है, यह इन दिनों साहित्यिक जगत में भी चिन्ता की बात नहीं है,क्योंकि साहित्यिक जगत तो 'देह' से काम चलाता रहा है, उसके लिए तो 'देह' ही प्रधान है । साहित्यकार का 'देह' में रुपान्तरण एकदम नई समस्या है और इस समस्या पर हमें गंभीरता से सोचना चाहिए। सवाल यह है कि साहित्यकार क्या मात्र 'देह' है ? खासकर नामवर सिंह के प्रसंग में यह सवाल मेरे दिमाग में कौंधा है।
     नामवर सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व के अनेक आयाम हैं। उनमें से एक आयाम यह भी है कि उनके यहां साहित्यकार का 'शरीर' में रुपान्तरण हो चुका है। वे सशरीर किसी भी कार्यक्रम में चले जाते हैं, लेकिन वे दसियों वर्ष पहले अपने को साहित्यकार के नजरिए से मुक्त कर चुके हैं। मेरे लिए यह इसलिए भी त्रासद है क्योंकि वे मेरे शिक्षक रहे हैं, हमने उनसे पढ़ा है। अपना शिक्षक जब विवेक को त्याग दे तो बड़ी पीड़ा होती है। मैं नहीं जानता नामवर सिंह को विवेक त्यागने पर कोई पीड़ा होती है या नहीं ? पर मुझे होती है।
     नामवर सिंह के व्यक्तित्व मूल्यांकन में यह प्रश्न विचारणीय है कि साहित्यकार का नजरिया महत्वपूर्ण है या शरीर महत्वपूर्ण है ? साहित्यकार का लिखा महत्वपूर्ण है या उसके लिंक ,सत्ताधारियों के प्रति भक्ति महत्वपूर्ण है ? क्या साहित्यकार प्रतीकात्मक तौर पर कहीं पर कुछ भी विवेकहीन बोल सकता है ? कर सकता है ? क्या लेखक के लिए विवेकवाद का कोई मूल्य नहीं रह गया  ?
    नामवर सिंह के चाहने वाले असंख्य हैं , ये चाहने वाले वैसे ही हैं जैसे माधुरी दीक्षित के होते हैं। माधुरी दीक्षित के चाहने वाले उसके 'देह' और उससे जुड़े कलाप्रदर्शन पर मुग्ध हैं, इस समूची प्रक्रिया में माधुरी दीक्षित वही सब करती है जो उसे फिल्म निर्देशक करने के लिए कहता है। वह महज 'देह' के तौर पर उपलब्ध रहती है, निर्देशक जैसे नचाता है वह नाचती है, जैसे कहता है वैसे ही अभिनय करती है। इस अभिनय में  सब कुछ निर्देशित है, सब कुछ निर्मित है,  कुछ भी स्वाभाविक नहीं है, सामान्य नहीं है,यहां तक कि उसके व्यक्तित्व की मार्केटिंग भी निर्देशक और संस्कृति उद्योग करता है। यही वह बिंदु है जहां से नामवर सिंह को देखना चाहिए। वे साहित्य में साहित्यकार की देह हैं। संभवतः यही बात दिमाग में रखकर उन्होंने ज्ञानपीठ के एक कार्यक्रम में साफ कहा मैं फरमाइशी लेखक हूँ।