शुक्रवार, 12 जून 2015

ग़ज़ल के मर्म की तलाश में


   ग़ज़ल पर फ़िदा पाठकों की किल्लत नहीं है। सवाल यह है  ग़ज़ल पर इतने पाठक फ़िदा क्यों हैं ? भारत में जिस तरह श्रृंगार रस के चाहने वालों की परंपरा रही है, उसी तरह फारसी और उर्दू की परंपरा में ग़ज़ल के चाहने वालों की परंपरा भी रही है। नवरसों में जिस तरह श्रृंगार रस का वर्चस्व रहा है। उसी तरह उर्दू कविता में ग़ज़ल का वर्चस्व रहा है। ग़ज़ल की लोकप्रियता के कारण ही उसको अनेक स्तरों पर रचने वाले शायरों की जमात पैदा हुई। ग़ज़ल के बहुस्तरीय रुपों को देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि ग़ज़ल दरबारी और बाजारु है।
      ग़ज़ल एक तरह की नहीं बल्कि अनेक किस्म की लिखी गयी है। फिर भी यह सवाल अपनी जगह कायम है कि ग़ज़ल क्या है ? क्या वह स्थायी रुप में कायम है अथवा बदलती रही है ? लेकिन यह बात सच है कि ग़ज़ल पर श्रृंगार –रस का गहरा असर है। जिस तरह श्रृंगारवादी कवि स्त्रीकेन्द्रित पुंसवादी नजरिए का प्रतिपादन करते थे वैसे ही ग़ज़ल लेखक भी औरतों पर पुंसवादी नजरिए से लिखते थे।
     फारसी में 'ग़ज़ल' का अर्थ था औरतोंका जिक्र करना,उनके इश्क़का दम भरना और उनकी मुहब्बतमें मरना। दिलचस्प बात यह थी कि ग़ज़ल में शायर लोग इश्को-मुहब्बतमें इस तरह व्यस्त थे कि उनको परिवारके अन्य सदस्यों के साथ मुहब्बत का ख्याल ही नहीं आया। आरंभिक दौर में ग़ज़ल में काम-भावना से संबंधित विषयों की भरमार थी। इस दौर में कोमल और रसभरी भावनाओं पर केन्द्रित रचनाएं लिखी गयीं। लेकिन ग़ज़ल यहीं तक रुकी नहीं रही। उसमें कालान्तर में ईश्वर और दार्शनिक विषयों का समावेश होने लगा। इससे ग़ज़ल में मिश्रण की परंपरा शुरु हुई।
     आरंभिक दौर के प्रेमकेन्द्रित ग़ज़ल शायरों का हाल यह था कि वे विचारों की जंग तो लड़ना जानते थे लेकिन विचारों का जोखिम उठाना नहीं जानते थे, मसलन् , वे प्रेम या इश्क पर कविता लिखना जानते थे लेकिन सामाजिक बन्धनों से संघर्ष करना नहीं जानते थे। वे पारिवारिक मर्यादाओं को तोड़ना नहीं जानते थे। इनके अलावा इस तरह के शायरों में 'हकीकी ' और 'मजाज़ी ' दो किस्म के शायर थे। इनमें 'हकीकी' शायरों में निराकार ईश्वर का जलवा मिलता है । वे उसे इसी संसार में प्रेयसी के रुप में साकारभाव में देखना चाहते हैं। सूफी शायरों ने इस परंपरा का जमकर विकास किया। उनकी शायरी में मानवीय प्रेम खूब व्यक्त हुआ है।मसलन्, 'रियाज़' खैराबादीने लिखा-
  '' हम आँख बन्द किये तसव्वुरमें पड़े हैं।
    ऐसेमें कहीं छमसे वोह आ जाय तो क्या हो ??''
इसी भाव को इकबाल ने इसतरह व्ययक्त किया-
          '' कभी ऐ हक़ीक़ते -मुन्तजिर! नज़र आ लिबासे-मज़ाज़में।
           कि हजारों सजदे तड़प रहे हैं,मेरी जबीने-नियाजमें।।''
इश्क के सूफियाना अंदाज़ को 'मीर' ने लिखा -'' इश्क बिन यह –अदब नहीं आता।''
आधुनिककाल में इश्क पर लिखने वाले शायरों में दो तरह के शायर मिलते हैं एक वे हैं जो 'स्वानुभव' के आधारपर लिख रहे थे,दूसरे वे हैं  जिन्हें कभी तिरछी नजरसे न तो घायल होना नसीब हुआ , न कभी किसी की चौखट पर सर टेकना मयस्सर हुआ। इनमें अधिकतर नकली आशिक शायर हैं। ये वे शायर हैं जिनकी शायरी में आँसुओं का दरिया बहता नजर आएगा लेकिन जिन्दगी में आंसू की कभी इन शायरों ने एक बूँद भी नहीं गिरायी।
        ऐसे भी शायर रहे हैं जिन्होंने एकबार जिसे दिल दे दिया फिर दिल सारी जिन्दगी उसके नाम कर दिया। ये अनुभवहीन शायर हैं, ये लोग 'खुदा मुहब्बत है, और मुहब्बत खुदा है।'के नारे इर्द-गिर्द शायरी करते रहे हैं। 'मीर' संभवतः पहले शायर हैं जिनके यहां यह परंपरा आरंभ होती है ,'मीर' ने लिखा-
         '' चाहें तो तुमको चाहें,देखें तो तुमको देखें।
          ख़्बाहिश दिलोंकी तुम हो.आंखोंकी आरजू तुम।।''
        ''ज़ौक़'' ने लिखा
          '' मैं ऐसे साहिबे –अस्मत परी-पैकरै आशिक हूँ।
            नमाजैं पढ़ती हैं हूरें,हमेशा जिसके दामन पर।''  
इनमें ही दूसरी कोटि बाजारु शायरों की है।यह कामलोलुप,विषयासक्त लोगों की शायरी है।इस तरह की शायरी पर वेश्याओं के संपर्क और दरबारी संस्कृति का गहरा असर है। चंचल और खण्डिता नायिका का विचार इनके असर से ही आया है। इस तरह के शायरों को कामुक शायर कहना समीचीन होगा। बाजारी इश्क के अलावा बेवफ़ा माशूक आदि विषयों को शायरों ने दरबारों से ग्रहण किया।
     मुश्किल यह भी है कि दिल्ली के शायरों और लखनऊ के शायरों का अनेक विषयों पर नजरिया एक जैसा नहीं था। मसलन्, लखनऊ के शायरों में निराशा और असफलता की अभिव्यंजना बहुत कम मिलती है जबकि दिल्ली के शायरों में यह खूब है, इसका प्रधान कारण है लखनऊ में जिन दिनों अवधप्रांत के दरबारों चमक मार रही थी ,, इसके कारण अवध के शायरों में एक बड़ा अंश श्रृंगार रस और दरबारी संस्कृति से प्रभावित था। वहीं उस समय दिल्ली के शायरों ने कष्ट में जिन्दगी गुजारी। यह कष्ट उनकी शायरी के लिए वरदान साबित हुआ। इसलिए देहलवी शायरों ने दुख दर्द, पीड़ा,भरण-पोषण की चिन्ताएं,असफलता आदि विषयों पर जमकर लिखा।
  जोश मलाहाबादी ने लिखा- '' मेरे रोनेका जिसमें क़िस्सा है।
                          उम्रका बहतरीन हिस्सा है।।''    
जिगर मुरादाबादी ने लिखा - '' इससे बढ़कर दोस्त कोई दूसरा होता नहीं ।
                          सब जुदा हो जायें,लेकिन ग़म जुदा होता नहीं ।।
कहने का आशय यह कि लखनऊ और दिल्ली के शायरों के परिवेशगत अंतर ने उनकी शायरी और नजरिए को गहरे प्रभावित किया। दिल्ली के शायरों की आपदाओं में जवानियाँ गुजरीं. वहीं दूसरी ओर लखनवी शायरोंने भोग-विलास में आँखें खोली थीं ।
        यह भी हकीकत है कि 'मीर' जब लखनऊ जाते तो उनको भी लखनऊ की रंगीन फ़िजा आकर्षित करती और कह बैठते-'' मिलो इन दिनों हमसे एकरात जानी। कहीँ हम कहाँ तुम कहाँ फिर जवानी।'

   सन् 1780 ई. के पूर्व 'हबीब' का तसव्वुर स्पष्ट नहीं था। उसके लिए संज्ञा,विशेषण,क्रिया,सम्बोधन आदि सब स्त्री लिंग के न होकर पुलिंग के व्यवहृत होते थे। हबीब का अर्थ है 'प्यारा' । यानी जिसे प्यार किया जाय वोह हबीब है। ग़ज़लमें सबसे पहले हसरत देहलवी (1772-1797 ई.) ने स्त्री को हबीब का दर्जा दिया। तबसे लखनवी शायरी में स्त्री के लिए हबीब का प्रयोग होने लगा।  धीरे धीरे यही शायरी जनानी शायरी होती चली गयी। उसमें श्रृंगार रस का वर्चस्व बढ़ता चला गया। 

मंगलवार, 9 जून 2015

ग़ज़ल के रुपान्तरण की प्रक्रिया


आधुनिककाल आने के बाद ग़ज़ल का रुप वही नहीं रह गया जो उसके पहले था। खासतौर पर उपन्यास विधा और अखबारों के उदय और प्रसार  ने ग़ज़ल के विधागत चरित्र को सीधे प्रभावित किया। प्रेस और उपन्यास ने आधुनिककाल में यथार्थवादी नजरिए ,विस्तीर्ण भाव से लिखने और समसामयिकता को साहित्य-सृजन का अनिवार्य अंग बनाया। इससे लेखक,लेखन और समाज के बीच में नए किस्म के रिश्ते, नए किस्म के लेखकीय संस्कारों की शुरुआत हुई। यही वजह थी कि गालिब को यह कहना पड़ा 'कुछ और चाहिए वुसअत मेरे बयाँ के लिए'
      गालिब पहले बड़े शायर हैं जिन्होंने ग़ज़ल को नई जिन्दगी दी,नए विषयों और नए नजरिए की ओर मोड़ा।ग़ज़ल को दैनन्दिन जीवन की घटनाओं और सामयिक राजनीतिक घटनाओं से जोड़ा। पहलीबार ग़ज़ल को आंदोलन और राजनीति से सीधे जोड़ने की परंपरा आरंभ हुई। गालिब ने जो सिलसिला आरंभ किया उसे पं.वृजनारायण चकबस्त ने नई बुलंदियों पर पहुँचाया। देशभक्ति और राजनीतिक आंदोलनों से ग़ज़ल को सीधे जोड़ा।
     उल्लेखनीय है ग़ज़ल लिखने वाले शायरों में कई विचारधाराओं के मानने वाले लोग थे।ग़ज़ल एक ही विचारधारा के दायरे में नहीं रही है। इसमें दलीय पक्षधरता भी रही है। नये और पुराने के बीच में वैचारिक और सर्जनात्मक जंग भी रही है।  लोग कहते हैं ग़ज़ल सूत्र है,नज्म भाष्य है।ग़ज़ल संकेत है,नज्म स्वीकृति।नज्म काव्य है,ग़ज़ल सूक्ति है। नज़्मों में समसामयिक घटनाओं और रीतिरिवाजों के बारे में जमकर लिखा गया। इससे नज़्म और राजनीति, नज़्म और आंदोलन,नज़्म और समसामयिकता का नया अंतस्संबंध सामने आया। खासकर राजनीतिक विषयों पर लिखी नज़्में  खूब जनप्रिय हुईं। इस तरह की रचनाओं का तात्कालिक असर खूब होता था,लेकिन तात्कालिक जरुरत खत्म होते ही ये बेकार हो जाती हैं, यह सिलसिला आज भी बरकरार है।
      नज़्म से विचारधारात्मक प्रौपेगैण्डा में बहुत मदद मिली।  आशय यह कि प्रचार खत्म तो नज़्म भी खत्म। इसके विपरीत ग़ज़ल में विधा के तौर पर दीर्घजीवी भाव रहा है। मजेदार बात है उर्दू के तमाम बड़े शायरों ने नज़्म और ग़ज़ल दोनों लिखी हैं। वे इन दोनों ही रुपों का समय देखकर इस्तेमाल करते थे। तमाम प्रगतिशील शायरों की जनप्रियता में नज़्म की भी  भूमिका रही है।
    ग़ज़ल में अप्रत्यक्ष और संकेतात्मक शैली प्रमुख रही है। एक शायर ने लिखा भी है कि ग़ज़लका वार पत्थरकी तरह सीधे न होकर दुशालेमें लिपटा हुआ होता है। ग़ज़ल में कहना है तो उसकी सीमाओं में रहकर ही कह सकते हैं । मसलन्, दानीसे शायर 'अदम' कह रहा है-
' शिकन न डाल जबींपर शराब देते हुए।
यह मुसकराती हुई चीज़ मुसकराके पिला।।'
अब यदि कोई कमअक्ल इसे मयखाने के लिए लिखी शायरी समझे तो हम क्या करें! इसीलिए कहा गया है  ग़ज़ल को जानने के लिए गहरे साहित्यबोध की जरुरत होती है। उसे साहित्यिक कॉमनसेंस या यांत्रिक ढ़ंग से नहीं समझा जा सकता।
मसलन्, व्यवस्था परिवर्तन के सवाल पर आनंदनारायण मुल्ला का यह शेर देखें-
'' निजामे-मैकदा साक़ी! बदलनेकी जरुरत है।
 हजारों हैं सफें जिनमें , न मैं आई, न जाम आया।। ''
ढोंगी और नेताओं पर 'मीर' ने लिखा-
    '' मसजिदमें इमाम आज हुआ,आके वहाँसे।
     कल तक तो यही 'मीर' ख़राबत नशीं था।।'
चेतावनी के प्रसंग में 'मीर' का शानदार शेर पढ़ें-
  '' ऐ वोह कोई जो आज पिये है शराबे-ऐश।
   ख़ातिरमें रखियो कलके भी रंजो-ख़ुमारको।।''

कहने का आशय यह कि ग़ज़लगो शायर हर बात इशारेमें और परदेमें बयान करता है। यही वजह है कि कभी वह विश्ववेदनाको अपनी वेदना बनाकर ग़मे-जानाँके परदे में पेश करता है। मसलन्, '' जो ग़म हुआ,उसे ग़मे –जानाँ बना लिया।।''      

शुक्रवार, 5 जून 2015

ग़ज़ल और सम-सामयिकता की समस्या

  
ग़ज़ल आज सबसे जनप्रिय विधा है। इसके पढ़ने-सुनने वाले बेशुमार हैं। इसके बारे में आमतौर पर सोशलमीडिया में बातें नहीं होतीं,लोग ग़ज़ल के अंश शेयर करते हैं. पूरी ग़ज़ल भी शेयर करते हैं, लेकिन उसकी समस्याओं पर भी कभी ठहरकर सोचना चाहिए। आमतौर पर ग़ज़ल सामयिक विषयों पर नहीं लिखी जाती। शायर का इस संदर्भ में विश्वास यह रहा है कि ग़ज़ल ऐसी हो जो सदाबहार हो,कालातीत हो। ग़ज़ल लेखक अपने सामने घटने वाली भयानक से भयानक घटनाओं को देखकर भी उन पर नहीं लिखते ,असल में शायर की कोशिश रहती है कि इस विधा को समसामयिकता से दूर रखा जाय और इसमें उन विषयों पर लिखा जाय जो चिरकाल तक इस विधा को बनाए रखें। कालातीत सार्वभौम प्रयोग की यह शानदार विधा है। इस विधा में रमने के लिए शायर के पास गम खाने,दुख सहने और व्यथा को काव्यात्मक रुपान्तरण की शक्ति अर्जित करनी पड़ती है।
     अमूमन दो तरह शायर मिलते हैं। एक हैं नज्म-गो शायर और दूसरे हैं ग़ज़ल-गो शायर। इन दोनों में अंतर है। नज्म –गो शायर आपदाओंको अतिरंजित भाव से देखता है, उससे प्रभावित होता है उसका अतिरंजित चित्रण करता है। जबकि ग़ज़ल-गो शायर आपदाओं को अपने अंदर ज़ज्ब कर लेता है,फिर जो जज़्बात उसके मुँहसे निकलते हैं वही ग़ज़ल कहलाते हैं। उर्दू में मीर,गालिब आदि ऐसे ही शायर हुए हैं। जिनके जीवनकाल में अनेक मूलगामी परिवर्तन आए,आपदाएं आईं,दिल्ली लुटी,इन्कलाब आए लेकिन वे अंदर ही अंदर घुटते रहे,मिटते रहे। मीर तो यह कहकर ही चुप हो गए-
                                   दीदनी है शिकस्तगी दिलकी।
                                    क्या इमारत ग़मोंने ढ़ाई है।।
गालिब ने लिखा – चिराग़े-मुर्दा हूँ मैं बे जबाँ गोरे-गरीबाँका-
ऐसा नहीं है कि ग़ज़ल-गो शायरों ने सामयिक घटनाओं पर नहीं लिखा.लेकिन संक्षिप्त और नपे-तुले शब्दों में लिखा है। 'मीर' के जीवनकाल में क़ादिर रहीलाने शाहआलम बादशाहकी आँखोंमें नीलकी सलाइयाँ फेरकर उन्हें ज्योतिहीन कर दिया था। इस दर्दनाक घटना को 'मीर' ने अपनी ग़ज़ल के एक शेरमें यूँ व्यक्त किया है-
          शहाँ कि कुहले-जवाहर थी खाके-पा जिनकी।
          उन्हींकी आँखोंमें फिरती सलाइयाँ देखी।।
इसी घटना को इकबाल ने नज्म में पेश किया है जिसमें काफी अशआर हैं। लेकिन आधुनिक जिंदगी के दवाबों के चलते इधर के वर्षों में ग़ज़ल पर समसामयिकता का दवाब बढ़ा है।
 मसलन् शायर यगाना के साम्प्रदायिकता पर लिखे चंद शेर पढ़ें -
'पढ़के दो कलमें अगर कोई मुसलमाँ हो जाय।
फिर तो हैवान भी दो रोज़में इन्साँ हो जाय!!  
सब तेरे सिवा खाफ़िर,आख़िर इसका मतलब क्या ?
सिर फिरा दे इन्साँ ऐसा खब्ते-मज़हब क्या ?
महराबोंमें सजदा वाजिब ,हुस्नके आगे सजदा हराम।
ऐसे गुनहगारोंपै खुदाकी मार नहीं तो कुछ भी नहीं।।
दुनियाके साथ दीनकी बेगार अलअमाँ ।
इन्सान आदमी न हुआ,जानवर हुआ।।
बस एक नुक़्त-ए-फ़र्जीका नाम है काबा।
किसीको मरकज़-तहकीक़का पता न चला।।
मज़हबसे दग़ा न कर,दग़ासे बाज़ आ।
किस कामका हज़! मकरो-रियासे बाज़ आ।।

ईमान तो कहता है कि इन्साँ बन जा।
बन्देकी मददको आ,खुदासे बाज़ आ।।

इसी तरह आनन्दनारायण मुल्ला ने लिखा- 
मैं फ़कत इन्सान हूँ ,हिन्दू-मुसलमाँ कुछ भी नहीं।
मेरे दिलके दर्दमें तफ़रीके-ईमाँ कुछ नहीं।।
असर लखनवी ने लिखा-
       मसजिदेवाजसे इक रिन्द यह कहते उट्ठा
       ''काफिर अच्छे हैं दिलाज़ार मुसलमानोंसे'' ।।

  

बुधवार, 3 जून 2015

मध्यकालीन पापुलर कल्चर है मुशायरा


पापुलर कल्चर के मध्यकालीन अरब रुपों में मुशायरा सबसे प्रसिद्ध है। मुशायरे की परंपरा का इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है, इस्लाम धर्म के उदय के पहले से अरब देशों में मुशायरे हुआ करते थे। यह पुरानी पापुलर कल्चर का प्रभावशाली रुप है और आज भी इसकी साख बरकरार है।
अरब देशों में कबाइली समुदायों के मेले,जलसों आदि के समय सामान्य अशिक्षित जनता के मनोरंजन में मुशायरों की बड़ी भूमिका थी। इसके अनेक रुप हैं।एक है सीमित शायरों में शेरगोई ,दूसरा है विशाल जनसमूह में शेरगोई,तीसरा है शायरों में प्रतिद्वंद्विता। इसमें खास किस्म तुकबंदी की भी महत्वपूर्ण भूमिका हुआ करती थी।
मथुरा में इस परंपरा का बड़ा असर लावनी,झूलना,सवैया आदि कहनेवाले कवि दलों पर सहज ही देखा जा सकता है। इसे साहित्यिक अखाड़ेबाजी का मध्यकालीन रुप कहें तो समीचीन होगा। इसे कवियों ने शौकिया अपनाया। यह उनके पेशेवर लेखन का अंग नहीं था।
इस शौकिया शैली की खूबी यह थी कि इसके जरिए किसी को भी निशाना बनाया जा सकता था चाहे वह व्यक्ति कितना ही बड़ा हो। बारातों से लेकर अन्य जलसों में इसके शानदार प्रयोग देखने को मिलते थे। बारातियों को सम्बोधित कविता की परंपरा इससे ही निकली है जिसमें सभी बारातियों को कवित्तों के जरिए निशाने पर लाकर खड़ा किया।इससे बारातियों का मनोरंजन होता था। सामने जब कोई परिहास में कवित्त कहता था तो उसका सामने वाले को जवाब कवित्त में ही देना होता था, चौबों में शादी के समय शाखोच्चार और बाद में कवित्तगोई की परंपरा यहीं से निकली है। बारात जब खाने जाती तो छतों पर चढ़कर कवितों के जरिए औरतें बारातियों पर काव्य हमले किया करती थीं, अनेक जातियों में इसके भिन्न रुप भी देखने को मिलते थे।
असल बात यह कि बाराती और घराती एक-दूसरे पर कवित्तों के जरिए नहले पर दहला मारने की कोशिश किया करते। यही मुकाबलेबाजी मुशायरोंं में आम रही है। यही स्थिति लावनी कहने वाले दलों की काव्यभिड़ंत में भी नजर आती थी।
ईरान में मुशायरे 10वीं शताब्दी में सामने आते हैं जबकि भारत में 16वीं शताब्दी में मुशायरे का जन्म होता है। आरंभ में फारसी के मुशायरे होते थे क्योंकि विदेशों से फारसी के शायर बड़ी संख्या में भारत आने लगे थे। खासकर दिल्ली,गोलकुंडा,बीजापुर इसके बड़े केन्द्र थे। कालान्तर में मगलशासन के पतन के दौर में रेख्ते (उर्दू का पूर्व नाम) के मुशायरे होने लगे। फारसी रस्मी रह गयी थी और उसकी जगह रेख्ता ने ले ली थी। रेख्ता के मुशायरों को मुराख्ते कहा गया। आरंभ में मुराख्ते दरबार तक सीमित थे बाद में आम जनता के बीच होने लगे।कालान्तर में मुशायरे के नियम बनाए गए, कहने के तरीके तय किए गए, मसलन गजल कैसे कहें, सभ्यता और असभ्यता के दायरे तय किए गए.अध्यक्ष तय किया गया। नियमों के पालन न करने को बदतमीजी कहा गया। एक झलक देखें-
कमर बान्धे हुए चलनेको याँ सब यार बैठे हैं
बहुत आगे गये,बाकी जो हैं तैयार बैठे हैं ।।

सोमवार, 1 जून 2015

मथुरा के तीन कमाल के साथी

             
       
हम सबकी आदत है कि हम महान लोगों को खोजते हैं और महान लोगों की संगति में रहने का सपना देखते हैं,लेकिन महान लोग मिलते नहीं हैं,खासकर मध्यवर्ग-निम्न मध्यवर्ग के लोगों का जीवन सामान्य और साधारण किस्म के लोगों के बीच में ही आगे बढ़ता है। सामान्य लोगों में ही असामान्य मेधावी और परिश्रमी लोग पैदा होते हैं। मथुरा के अपने अनुभव ने बार-बार यह शिक्षा दी है कि अपने आसपास के लोगों को देखो और उनमें मित्र बनाओ,वहां आपको ऊर्जा मिलेगी,प्रेरणा मिलेगी। प्रेरणा कभी दूर के लोगों से नहीं मिलती,वह तो आसपास के लोगों से मिलती है। आसपास के लोगों में ही अच्छे विचार और अच्छे आचरण की खोज करो तो यथार्थपरक जीवनशैली निर्मित करने में मदद मिलेगी।

आपातकाल के दिनों में जिन तीन मित्रों से परिचय हुआ वे तीनों मेरी यादगार का अभिन्न हिस्सा हैं। इन तीनों से मैंने बहुत कुछ सीखा। ये तीन थे कॉमरेड सव्यसाची (श्यामलाल वशिष्ठ), कॉमरेड ऋषिकांत और कॉमरेड वीरेन्द्र सिंह। इन तीनों से एक साथ मुलाकात नहीं हुई ,सबसे पहले सव्यसाची मिले,बाद में इन दोनों से मुलाकात हुई और फिर तो हम चारों की रोज मुलाकात होती, कभी सव्यसाची के यहां, कभी पार्टी दफ्तर में,कभी पार्टी मीटिंग के दौरान,कभी वैसे ही। लेकिन हम चारों को रोज मिलना ही था। बाद में इस कड़ी में डा.हरीशंकर जुड़ गए,जिन पर मैं बाद में कभी लिखूँगा।

सामान्यतौर पर मित्रों को हम स्वार्थवश याद करते हैं लेकिन हम चारों रोज मिलते थे लेकिन हमारा कोई निजी स्वार्थ नहीं था, हम चारों में सव्यसाची बीएसए कॉलेज में राजनीतिविभाग में प्रवक्ता थे। बाकी हम तीनों छात्र थे। अलग-अलग कॉलेजों में पढ़ते थे। सव्यसाची,वीरेन्द्र और ऋषि के पास साइकिल थी,मैं पैदलयात्री था। बाद में मुझे भी पिता की कृपा से साइकिल मिल गयी। हम चारों में एक-दूसरे की समस्याओं को सुनने और जानने की बेहद उत्सुकता हुआ करती थी, लेकिन कभी कोई एक-दूसरे की समस्याओं में हस्तक्षेप नहीं करता। हमने आपस में अघोषित तौर पर तय कर रखा था कि निजी समस्याओं से निजी तौर पर लड़ेंगे,लेकिन उन पर आपस में विचार-विनिमय जरुर करेंगे। इस तरह हमने निजी और सार्वजनिक जीवन में लक्ष्मणरेखा खींच ली थी।

मथुरा का माहौल बड़ा विलक्षण था वहां आम लोगों में सजगता तो बहुत थी, लेकिन दृष्टिगत सजगता का अभाव था। आम मध्यवर्गीय लोगों में राजनीतिक खबरों पर तीखी बहस करने की आदत थी,हर गली-मुहल्ले के नुक्कड़ पर विभिन्न किस्म के राजनीतिक विषयों पर बहस करते लोग मिल जाते थे,चाय की दुकान, पार्क, मंदिर के बाहर अमूमन बहस करते लोग मिल जाते थे और इन बहसों में कोई अपरिचित भी शामिल हो सकता था । इससे पता चलता था कि आमलोगों में सजगता है, राजनीतिक सचेतनता है, लेकिन दृष्टिकोण का अभाव है। हमलोग रोज अपने तजुर्बों को एक-दूसरे के साथ साझा करते,विश्लेषित करते । इस प्रक्रिया में हमलोगों की समस्याओं पर खुलकर सोचने की बुद्धि का तेजी से विकास हुआ। संयोग की बात थी कि सव्यसाची,ऋषि और वीरेन्द्र पहले से माकपा के सदस्य थे,मैं भी जल्द पार्टी सदस्य बना लिया गया।

सव्यसाची की मथुरा शहर में एक आदर्शवादी कम्युनिस्ट के रुप में साख थी,आम मध्यवर्गके राजनेता, बुद्धिजीवी,शिक्षक,छात्र आदि में उनको बेहद सम्मान की नजर से देखा जाता था। वे ऋषि के घर में एक छोटे से कमरे मे भाड़े पर रहते थे। उनकी बेहद सरल और छोटी जीवनशैली थी। बमुश्किल उनके पास तीन-चार जोड़ी कुत्ता-पाजामा थे,एक चारपाई,एक स्टोव,एक साइकिल तीन मूड़ा यही कुल जमा उनकी संपत्ति थी। आरंभ में वे खाना बाजार से खरीदकर खाते थे। उन दिनों सव्यसाची रिक्शाचालक यूनियन के सचिव हुआ करते थे और डेम्पियर में जहां से रिक्शावाले खाना खाते थे वहीं से सव्यसाची एक रुपये की 6 रोटी दाल खरीदकर लाते और दिन में दोबार वही खाकर रहते, जिस दुकानदार से वह रोटी लाते थे वह भी रिक्शा चलाता था ,बाद में सव्यसाची ने उसे भी पार्टी मेम्बर बना लिया और रिक्शाचालक यूनियन का पदाधिकारी बना दिया।

सव्यसाची में मित्र बनाने और दिल जीतने की अद्भुत क्षमता थी,वे अपनी सादगी और विचारों से सहज ही प्रभावित कर लेते। सव्यसाची सहज,ईमानदार, निष्ठावान मनुष्य थे। वे गंभीर मार्क्सवादी साहित्य कम पढ़ते थे लेकिन दैनंदिन जीवन की घटनाओं को मार्क्सवादी ढ़ंग से कम्युनिकेट करने की उनमें विलक्षण क्षमता थी। सव्यसाची की पार्टीलाइफ की लाइफलाइन थे वीरेन्द्र और ऋषि। इन दोनों की मदद के बिना वे कोई काम नहीं कर पाते।

सव्यसाची का एक गुण यह भी था कि वे संस्कृति और उससे जुड़े सवालों पर स्वतंत्र रुप से संगठन बने,इसकी जरुरत को बड़ी गहराई से महसूस करते थे। वे मानते थे कि कम्युनिस्ट पार्टी के सांगठनिक ढॉंचे में रहकर संस्कृति के कामों को करना संभव नहीं है,यही वजह थी कि मथुरा में उनकी प्रेरणा और युवामित्रों के सहयोग से लोकतांत्रिक संस्कृति के प्रचार-प्रचार के लिए 'जन सांस्कृतिक मंच' नामक संगठन का निर्माण हुआ । इस संगठन का मकसद था बृहत्तर समाज में फैले युवाओं को अपने करीब लाना,उनमें लोकतांत्रिक मूल्यों का बोध पैदा करना । इस संगठन का मुख्य लक्ष्य था संस्कृति और समाजसेवा के सवालों पर युवाओं में सजगता पैदा करना। उन दिनों छात्रों के लिए एसएफआई जैसा संगठन था लेकिन युवाओं के लिए कोई संगठन नहीं था,इसके लिए प्रगतिशील युवा मोर्चा नामक संगठन बनाया गया। उल्लेखनीय है कि माकपा के पास उनदिनों युवाओं के लिए कोई संगठन नहीं था, डीवाईएफआई का गठन बहुत बाद में हुआ।

चौधरी वीरेन्द्र के व्यक्तित्व की विशेषता थी कि वह बेइंतिहा मेहनती,निष्ठावान और मिलनसार था। वह इन दिनों यूपी पुलिस में उच्चपदस्थ पुलिस अधिकारी है। पुलिस में रहते हुए उसने कभी अपने व्यक्तित्व पर दाग नहीं लगने दिया। वह यूपी के उन चंद पुलिस अफसरों में है जो ईमानदारी से अपनी पगार में ही अपना गुजारा करते हैं,उसने कभी जीवन में रिश्वत नहीं ली। वीरेन्द्र के बारे में हम सभी यही मानकर चल रहे थे कि वह तो आगे चलकर होलटाइमर बनेगा,उसकी काम करने की अपार क्षमता हम सबको प्रभावित करती थी। खासकर सव्यसाची का जितना प्रकाशन का काम था,उसे वही संभालता था,उसकी मदद के बिना 'उत्तरार्द्ध' जैसी पत्रिका का सारे देश में पहुँचना संभव ही नहीं था। सव्यसाची के साहित्य को आम जनता में पहुँचाने की उन दिनों एकमात्र वीरेन्द्र पर जिम्मेदारी थी।

वीरेन्द्र,ऋषिकांत और मैं हर रोज कभी सुबह तो कभी शाम को लंबी बातचीत के लिए मिलते, हम तीनों के पास असंख्य राजनीतिक समस्याएं हुआ करतीं जिन पर हमें बहस करनी होती थी, सुबह मिलते तो होलीगेट पर पहलवान कचौड़ीवाले की दुकान पर पहले कचौड़ी-जलेबी का कलेवा करते, बाद में ,भाटिया रेस्टोरैंट में जाकर बैठकर कई कप चाय पीते और जमकर बहस करते। हम तीनों में ऋषिकांत उग्र मार्क्सवादी की तरह पेश आता,वीरेन्द्र शांत मार्क्सवादी की तरह पेश आता,ये दोनों किसी भी समस्या के अनंत विकल्प बनाकर सोचने में माहिर थे। विकल्पों में रखकर मार्क्सवाद को कैसे लागू करें शायद यह पद्धति इसी दौर में हमतीनों में विकसित हुई। हमने विकल्प की परिधि को बहुत ही लोचदार बनाया हुआ था। हम विकल्प को वहां तक रखते जहां तक आदमी हमारे हाथ में रहे,हमारे संपर्क में रहे।

सही विकल्प वह जो आदमी को साथ में बनाए रखे। अमूमन कॉमरेड विकल्प के चक्कर में आदमी को भगा देते हैं,लेकिन उनके पास विकल्प रह जाता था । कोरा विकल्प मार्क्सवाद की मौत है। मार्क्सवाद तब ही काम का है जब आदमी केन्द्र में रहे और विकल्प हाशिए पर रहे। वह विकल्प किसी काम का नहीं है जो आदमी को भगा दे। हमने आदमी को केन्द्र में रखा विकल्प को हाशिए पर रखा, इससे हमें सैंकड़ों युवाओं को मित्र बनाने में सफलता मिली। मथुरा जैसे शहर में इसी आधार पर मैं सैंकड़ों छात्राओं को एसएफआई में शामिल करने में सफल रहा। हमतीनों की रणनीति थी कि मित्र बनाओ,अपना दायरा बड़ा करो, इसके चाहे कुछ देर के लिए विचारों को स्थगित भी करना पड़े । हमारे लिए आदमी प्रधान था,विकल्प गौण था।

हमने जिन युवाओं को मित्र बनाया उनको कभी नहीं छोड़ा ,उनपर कभी कोई विचार नहीं थोपा ,साथ ही उनको कभी अपने विचारों की परिधि के बाहर जाने नहीं दिया। हमारे लिए विचार की परिधि वहां तक फैली हुई थी जहां तक हम मनुष्य को बांधे रख सकें। विचार का काम है मनुष्य को बांधना, विचार को हम वहां तक लचीला रखें जहां तक मनुष्य को आराम मिले,सहजता का अनुभव हो। हम तीनों यही सोचते थे विचार तो मनुष्यों की सेवा के लिए हैं,मार्क्सवाद तो मनुष्यों की सेवा के लिए।

हम मनुष्य को मार्क्सवादी बनाने की कोशिश नहीं करते बल्कि आदमी की जिंदगी के ढांचे में मार्क्सवाद को ढालने की कोशिश करते थे, और इससे हमें अनेक लाभ हुए,हमें सैंकड़ों दोस्त बनाने,उनका दिल जीतने का मौका मिला। विचारों में लचीलेपन की कला मथुरा में इन मित्रों के बीच में ही विकसित हुई। खासकर वीरेन्द्र और ऋषिकांत की बुद्धि विकल्पों की खोज में खूब चलती थी। हम तीनों ने मिलकर सैंकड़ों किताबें पढ़ीं,उन पर आपस में जमकर बहस की,हमारे बीच में किताबें ईंधन की तरह हुआ करती थीं। हम सबमें वीरेन्द्र बहुत ज्यादा किताबें पढ़ता था। दिलचस्प बात यह थी कि वीरेन्द्र और ऋषिकांत में होलटाइमर बनने की इच्छा थी, लेकिन संयोग की बात कि हंसी-हंसी में वीरेन्द्र ने यूपी में थानेदारी परीक्षा दी और वह पास होकर हमारे बीच सेअचानक गायब हो गया। वह मन ही मन किसी नौकरी की तलाश में था, यह बात कभी -कभी कहता था लेकिन कोई प्रयत्न नहीं करता था। पहलीबार प्रयास किया और वह सफल रहा। वह थानेदार हो गया। हम सब बड़े दुखी हुए,मास्साब तो एकदम टूट से गए,क्योंकि वीरेन्द्र उनकी नींव था। हम सब सोचने लगे कि क्या मार्क्सवाद की शिक्षा असफल रही ? कई लोग मानते थे कि मार्क्सवादी को पुलिस में नहीं जाना चाहिए, लेकिन मेरी और कई लोगों की राय थी कि नौकरी के लिए कहीं पर भी जाया जा सकता है। मार्क्सवादी होने का मतलब यह नहीं है कि होलटाइमर ही बना जाय।

एक नागरिक के नाते हम मार्क्सवाद से बहुत कुछ ऐसा सीखते हैं जिससे बेहतरीन नागरिक की भूमिका निभा सकें। मार्क्सवाद का मतलब है बेहतरीन नागरिक बनाना। मार्क्सवाद का मतलब सिर्फ क्रांतिकारी या होलटाइमर बनाना नहीं है। हम तीनों बार –बार इस सवाल पर बातें करते कि भारत जैसे समाज में मार्क्सवाद का लक्ष्य क्या हो सकता है ? कई बार लगता पेशेवर कम्युनिस्ट बनना ही महान कार्य है, लेकिन भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन की दशा देखकर अंत में यही सोचते कि पेशेवर कम्युनिस्ट की जिंदगी संभालने लायक कम्युनिस्ट पार्टी के पास संसाधन ही नहीं हैं। एक बेहतर कम्युनिस्ट वह है जो आत्मनिर्भर हो, नौकरी करता हो,जो कम्युनिस्ट नौकरी नहीं करता ,वह न तो मार्क्सवाद को बचा सकता है और न अपने को बचा सकता है। आजीविका कमाने का काम छोड़कर सभी मार्क्सवादी यदि पेशेवर कम्युनिस्ट बन जाएं तो न तो कम्युनिस्ट पार्टी बनेगी और न समाज बनेगा। एक अवस्था के बाद आम लोग कम्युनिस्ट पार्टी में आना बंद कर देंगे। इसलिए बेहतर है कम्युनिस्ट समाज में घुलेमिले रहें,वैसे ही जिस तरह पानी में मछली रहती है। वीरेन्द्र के पुलिस में जाने के बाद मथुरा एसएफआई का महामंत्री मुझे बनाया गया।

ऋषिकांत की खूबी यह थी कि वह शानदार कार्यकर्ता के अलावा बेहतरीन क्रिकेट खिलाड़ी भी था। के.आर. कॉलेज की ग्राउण्ड पर इसकी गेंदबाजी के कहर को मैंने कईबार देखा है, वह कम्युनिस्ट न बनता तो यह तय था नामी क्रिकेटर बनता,उसकी क्रिकेटर के रुप में मथुरा में धाक थी। ऋषिकांत बेहद संवेदनशील था। हम सबमें संवेदनशीलता के मामले में वह सबसे आगे था। उसने अनेक चीजें साथ में काम करते हुए विकसित कीं इनमें मूल्यवान चीज थी उसकी विलक्षण विश्लेषण क्षमता। वीरेन्द्र और ऋषिकांत में एक और गुण था कि वे दोनों बहुत सुंदर पोस्टर भी बनाते थे। उनके बनाए पोस्टरों से आए दिन मथुरा की दीवारें भरी रहती थीं। हमलोग हर छह महिने में कॉलेजों में दीवार रंगने , नारे लिखने आदि के काम करते थे। मथुरा में जब भी नुक्कड़ सभाओं का सिलसिला शुरु होता था,सव्यसाची,मैं,वीरेन्द्र और ऋषिकांत हमेशा साथ ही रहते। ऋषिकांत ने बाद में अपनी नौकरी की और कुछ समय बाद नौकरी छोड़कर कई सालों तक पार्टी होलटाइमर के रुप में दिल्ली और अंत में मथुरा में काम किया। कालांतर में उसकी परिस्थितियां इतनी तेजी से बदलीं कि उसने होलटाइमरी छोड़ दी और आजीविका के कामों में व्यस्त हो गया।