शनिवार, 30 अप्रैल 2016

टीवीयुग में कन्हैया कुमार की सीमाएं-

        मेरे कल के आलेख ´कन्हैया कुमारःविभ्रम और यथार्थ´ पर टिप्पणी करते हुए प्रियंकर पालीवाल ने कुछ गंभीर सवाल उठाए हैं जिन पर सोचने की जरूरत है। पालीवाल का मानना है,´कन्हैया कुमार,राज ठाकरे, लालूप्रसाद और नरेंद्र मोदी इन सबके भाषण उनके समर्थकों में जबर्दस्त लोकप्रिय हैं . सेंस ऑफ ह्यूमर ? खांटीपन ? देसी मुहावरा ? लफ्फाज़ी ? अन्य के लिए घृणा-प्रचार ? आखिर क्या है इनकी लोकप्रियता का राज ? इसका विश्लेषण होना चाहिए . अगर जे.एन.यू. के पूर्व छात्र नेताओं से ही तुलना करनी हो तो डी.पी.त्रिपाठी या सीताराम येचुरी से कर ली जाए . जगदीश्वर चतुर्वेदी से ही कर ली जाए . पर एक बात तय है कि कन्हैया की लोकप्रियता अभिजात वाम की लोकप्रियता नहीं है. वह वाम के आभिजात्य को तोड़ने वाली ग्रामी-वामी यानी भदेस-वामी लोकप्रियता है .´

इस प्रसंग सबसे पहली बात यह कि कन्हैया कुमार के भाषण को राज ठाकरे,लालू प्रसाद यादव ,नरेन्द्र मोदी के साथ तुलना करके नहीं देखा जाना चाहिए।राज ठाकरे लंपट राजनीति का मीडियानायक है,लालू यादव बिहार का सबसे जनप्रियनेता है,नरेन्द्र मोदी हिन्दुत्व के नायक हैं, जबकि कन्हैया कुमार जेएनयू का छात्रनेता है।इन चारों में यह बुनियादी अंतर है।इन चारों का जनाधार अलग है और राजनीतिक नजरिया भी अलग है।चारों की भाषा और मुहावरे में भी अंतर है।कौन नेता कैसा है यह इस पर निर्भर करता है कि उसका जनाधार किस तरह के लोगों में है और वह राजनीति को किस नजरिए से देखता है।सेंस ऑफ ह्यूमर या देसी खांटीपन,कभी भी टिकाऊ नेता नहीं बनाते।उपरोक्त चारों नेताओ में राज ठाकरे घृणा की राजनीति करते रहे हैं,जबकि लालू यादव और कन्हैया कुमार ने घृणा की राजनीति नहीं की है।उनकी राजनीति का बुनियादी आधार लोकतांत्रिक परिवेश से जुड़े सवालों पर केन्द्रित रहा है।जबकि नरेन्द्र मोदी ने घृणा और विकास के रसायन के आधार पर बहुसंख्यकवाद की राजनीति की है। ।

उल्लेखनीय है वाम विचारधारा कभी आभिजात्य में लोकप्रिय नहीं रही।जेएनयू में भी वह आभिजात्य की प्रिय विचारधारा नहीं है।जेएनयू में वाम राजनीति में शामिल होने वालों में अधिकांश गैर-आभिजात्य वर्ग से आए छात्र रहे हैं।यह मिथ है कि जेएनयू में पढ़ने वाले अधिकांश छात्र आभिजात्य होते हैं।सच्चाई इसके विपरीत है।एक अन्य चीज है जिसे हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए, भाषण की जनप्रियता हमेशा संदर्भ,मीडिया और परिवेश की संगति-असंगति के संबंध पर निर्भर करती है।इसका कोई तयशुदा नियम नहीं है।

कन्हैया कुमार के 9फरवरी के पहले और बाद के भाषण जनप्रिय हुए हैं,वह आम लोगों को इंटरनेट पर अपनी ओर खींचने में सफल रहा है।लेकिन वह उतने लोगों को भविष्य में अपने भाषणों के करीब नहीं खींच पाएगा।इसका प्रधान कारण है कि टीवी प्रसारण में उसकी अनुपस्थिति। टीवी प्रसारण में कन्हैया के पहले वाले भाषण आए,प्रसारित हुए,उसने उसके इंटरनेट पर उपलब्ध भाषणों की दर्शक संख्या भी बढ़ा दी।आज भी हमारे समाज में कम्युनिकेशन में टीवी चैनलों की निर्णायक भूमिका है।मेरा अनुमान है जेएनयू कैंपस के बाहर कन्हैया कुमार तब तक ही जनप्रिय रहेगा जब तक वह टीवी पर रहेगा,टीवी से गायब होते ही उसके भाषण के प्रति आकर्षण कम हो जाएगा। इसका प्रधान कारण है टेलीविजन कम्युनिकेशन। इन दिनों जितने भी नेता जनप्रिय हैं वे अपने भाषणों के कारण जनप्रिय नहीं हैं वे जनप्रिय हैं टेलीविजन कम्युनिकेशन के कारण।



जिस व्यक्ति को टीवी ने उछाल दिया वह जनप्रिय हो गया,चाहे वह निर्मल बाबा हो या श्रीश्री रविशंकर हो या बाबा रामदेव हो,या मोदी हो या लालू हो।इन सबकी जनप्रियता इनके भाषण कला के कारण नहीं है,बल्कि टेलीविजन कम्युनिकेशन के कारण है। इस युग में जो टीवी में है वह जनप्रिय है जो टीवी में नहीं है वह जनप्रिय नहीं है।नरेन्द्र मोदी की महा-लोकप्रियता इसलिए नहीं है कि मोदी ने महान कार्य किए हैं,बल्कि इसलिए है कि उसने टेलीविजन नेटवर्क को सबसे अधिक घेरा हुआ है।इस युग के नेता तब तक जिंदा हैं जब तक वे टीवी पर्दे पर हैं।

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

आतंकवाद,साम्प्रदायिकता और मीडिया

        आतंकवाद और साम्प्रदायिकता जुड़वाँ भाई हैं। इसलिए उनको संक्षेप में ´आ –सा´ कहना समीचीन होगा।इन दोनों में साझा तत्व है कि ये दोनों मीडिया कवरेज के बिना जी नहीं सकते।इनके लिए मीडिया कवरेज संजीवनी है।वे गिनती में कम होते हैं लेकिन टीवी और समाचारपत्र में कवरेज को लेकर पगलाए रहते हैं। वे मीडिया कवरेज के सहारे ही अपना विकास करते हैं। मीडिया कवरेज के जरिए ही ये भारतीय मध्यवर्ग तक अपनी पैठ बनाने में सफल हो जाते हैं।इनके मीडिया कवरेज का अल्पकालिक और दीर्घकालिक दो तरह का असर होता है।ये अपने को राष्ट्र-राज्य के संरक्षक के रूप में पेश करते हैं,उनकी यह छवि मध्यवर्ग को अपील करती है।खासकर पश्चिमी जीवनशैली से प्रभावित मध्यवर्ग को अपील करती है,क्योंकि यह वर्ग भारतीय समाज में अपने को राष्ट्र संरक्षक के रूप में पेश करता है। उनके इस नजरिए का पत्रकारों पर गहरा असर होता है और वे भी अपने मीडिया कवरेज के लिए राष्ट्र संरक्षकों को खोजने लगते हैं और यही वह प्रस्थान बिंदु है जहं पर टीवी बहसों से लेकर समाचारपत्रों तक साम्प्रदायिक लेखक,प्रवक्ता ,नेता आदि राष्ट्र संरक्षक के रूप में हमारे सामने पेश किए जाते हैं। ये वे लोग हैं जो राष्ट्र के प्रति अंधभक्ति का प्रचार करते हैं और राष्ट्र के बारे में किसी भी किस्म के विवेकपूर्ण विमर्श,बहस आदि को एकसिरे से खारिज करते हैं।


      ´आ-सा´के प्रवक्ताओं का मीडिया में मुख्य लक्ष्य होता है ´भय´ के फ्रेमवर्क में हर चीज को पेश करना।दूसरा लक्ष्य है विवेकवान और विवेक को निशाना बनाना,मनमाने ढ़ंग से उनकी हत्या करना,उन पर हमले करना,बोलने न देना आदि।वे शुरूआत किसी एक से करते हैं लेकिन उनके निशाने पर असल में पूरा समाज होता है। वे तकनीकी कौशल,परंपरागत नैतिकता,हिंसा और प्रभुत्वशाली भाषा इन चारों का अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए इस्तेमाल करते हैं।

विज्ञान ,संस्कृत और संघ

        आरएसएस का विज्ञान और संस्कृत से तीन-तेरह का संबंध है।इस संगठन की न तो विज्ञान में रूचि है और न संस्कृतभाषा और साहित्य के पठन-पाठन में दिलचस्पी है।इसके विपरीत इस संगठन का समूचा आचरण विज्ञान और संस्कृत विरोधी है।

आरएसएस के लिए विज्ञान और संस्कृत अन्य पर,विरोधियों पर और ज्ञान संपदा पर हमला करने का बहाना है।वे ज्ञान को अर्जित करने के लिए विज्ञान और संस्कृत के पास नहीं जाते बल्कि ज्ञानसंपदा को नष्ट करने के लिए संस्कृत का बहाने के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं।

भारत की पुरानी परंपरा में संस्कृत साहित्य और संस्कृत भाषा आनंद सृजन और आनंद प्राप्ति का स्रोत थी और आज भी है,लेकिन संघ ने संस्कृत भाषा को आनंद की बजाय टकराव और वर्चस्व की भाषा बना दिया है। बृहदारण्यक उपनिषद में वेदान्त के बारह महावाक्यों में एक ´विज्ञानमानन्दं ब्रह्म´भी है।इसमें विज्ञान को आनंद के समान माना है।यह विज्ञान और कुछ नहीं भाषा ही है।संस्कृत में इसी के आधार पर भाषा को विज्ञान मानने की परंपरा चली आ रही है।अन्यत्र तैतिरीय उपनिषद में ´विज्ञानं देवाःसर्वे ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते´ कहा गया है यानि विज्ञान को ही ज्येष्ठ ब्रह्म माना गया है। कहने का आशय यह है कि प्राचीन परंपरा में ज्ञान का अर्थ था स्थूल वस्तुओं का ज्ञान, जिसे अविद्या या अपरा विद्या कहा गया।जबकि विज्ञान का अर्थ है वस्तुओं का सूक्ष्मज्ञान।इसे विद्या और परा विद्या कहा गया। लेकिन बाल गंगाधर तिलक ने इस परंपरा से विपरीत धारणा प्रतिपादित की, उन्होंने कहा ज्ञान का अर्थ है आध्यात्मिक ज्ञान और विज्ञान का अर्थ है इम्पीरिकल नॉलेज यानि भौतिक ज्ञान।सारी समस्याओं का गोमुख यहीं से आरंभ होता है।

जब हम भाषा के साथ विज्ञान को जोड़ते हैं तो इसका अर्थ यह है कि भाषा का विशेष ज्ञान। इसके अलावा एक और पदबन्ध है ´व्याकरण´ ,इसे लेकर भी गड़बड़झाला है। ´व्याकरण ´यानी विश्लेषण। सवाल यह है विश्लेषण से ये आरएसएस भागते क्यों हैं ॽ हर भाषा और ज्ञान की शाखा का अपना व्याकरण है।विश्लेषण पद्धति है।उसकी स्वायत्त संरचनाएं हैं उनमें गड्डमड्ड करने से बचना चाहिए। आईआईटी में पढाए जाने वाले विषयों की भाषा और व्याकरण वही नहीं है जो संस्कृत साहित्य के काव्यग्रंथों का है।इसी तरह वेद की भाषा और व्याकरण वही नहीं है जो इंजीनियरिंग की है।

भारत में संस्कृत के वैय्याकरणशास्त्रियों की सुदीर्घ परंपरा रही है।यह सच है पाणिनी इनमें सुसंगत हैं। लेकिन पाणिनी भाषा संबंधी सभी समस्याओं का समाधान नहीं करते।आरएसएस के लोग चूंकि ´भारतप्रेमी ´होने का दावा करते हैं और हिन्दूज्ञान में ही विश्वास करते हैं,अतःहम यहाँ भर्तृहरि को उद्धृत करना चाहेंगे।वाचिकरोग या भाषा के अपशब्दों के प्रयोग से बचने के लिए भाषाशास्त्र पढ़ने के लिए कहते हैं।यानि भाषा का ज्ञान आरंभिक कक्षाओं में कराया जाए।आईआईटी के छात्र आरंभिक कक्षा के छात्र नहीं हैं।वे यदि अंग्रेजी भाषा का शुद्ध प्रयोग करना नहीं जानते तो परीक्षा में पास नहीं हो सकते।

पुराने जमाने में वेदाध्ययन आरंभ करने के पहले संस्कृत व्याकरण पढ़ाने पर जोर दिया गया।इसी प्रसंग में कहना चाहते हैं कि भारत में आधुनिक शिक्षा प्रणाली में अन्य विषयों के साथ संस्कृत भाषा और उसका व्याकरण पढ़ाया जाता है।संस्कृत पाठशालाओं में कक्षा 6 यानी प्रवेशिका से उत्तरमध्यमा यानि 12वीं तक व्याकरण पढ़ाया जाता है।इसके आगे व्याकरण यदि कोई पढ़ना चाहे तो वह व्याकरण विषय लेकर शास्त्री(बीए) और आचार्य(एमए) में पढ़ सकता है।अन्य विषयों के संस्कृत के छात्रों के लिए 12वीं के बाद व्याकरण नहीं पढ़ाया जाता,मैं स्वयं इसी परंपरा से पढ़ा हूँ।यानी संस्कृत में यदि कोई स्नातक स्तर पर न्याय,वेद,धर्मशास्त्र,साहित्य आदि विषय लेता है तो उसे संस्कृत व्याकरण नहीं पढाया जाता। संस्कृत में जब स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं में संस्कृत व्याकरण नहीं पढाया जाता तो फिर आईआईटी में ही इसे जबर्दस्ती क्यों पढाने पर जोर दिया जा रहा है।इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाएंगे कि संस्कृत की परंपरा 12वीं तक संस्कृत भाषा और व्याकरण पढाने पर जोर देती है,उसी पैटर्न पर सारे देश में आधुनिक शिक्षा में संस्कृत को 12वीं तक सामान्य विषय के रूप में रखा गया है।इस फैसले को लागू करने के लिए सारे देश में गंभीर मंथन हो चुका है,मुश्किल यह है कि आरएसएस और उनकी मंत्री स्मृति ईरानी बिना कुछ जाने-समझे संस्कृत को आईआईटी के छात्रों पर थोप देना चाहती हैं।यह भारतीय परंपरा में संस्कृत के पठन-पाठन के रिवाज के एकदम खिलाफ है ,यह भाषा पढ़ाने की विश्वपरंपरा के भी खिलाफ है,अतः इसका मुखर विरोध किया जाना चाहिए।










आईआईटी , संस्कृत और संघ का खेल

               मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी का मानना है कि आईआईटी के छात्रों को संस्कृतभाषा की शिक्षा दी जानी चाहिए।सुनने में यह सुझाव बड़ा अच्छा लगता है लेकिन सवाल यह है संस्कृत पढ़कर आईआईटी का छात्र क्या करेगा ॽ क्या संस्कृतभाषा उसके ज्ञान-विज्ञान में कोई इजाफा करेगी ॽइससे भी बड़ी बात यह कि संस्कृत पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों को आईआईटी में क्या दाखिला मिलता है ॽये कुछ सवाल हैं जिनके बारे में ईरानी और उनकी संस्कृतमंडली को जबाव देने चाहिए।

आईआईटी के पाठ्यक्रम का ढ़ांचा कुछ इस तरह का है कि उसमें संस्कृत से कोई मदद नहीं मिलेगी।मसलन्,आईआईटी के पाठ्यक्रम से संबंधित कोई भी सामग्री संस्कृत में नहीं है।दूसरी बात यह कि आईआईटी में भाषा की पढ़ाई नहीं होती बल्कि प्रौद्योगिक,इंजीनियरिंग आदि की पढ़ाई होती।स्मृति ईरानी को यदि संस्कृत के उत्थान की इतनी ही चिन्ता है तो उनको संस्कृत भाषा और साहित्य के पठन-पाठन पर उन विश्वविद्यालयों में जोर देना चाहिए जहां संस्कृत पढायी जाती है।अधिक से अधिक संस्कृत के शिक्षकों की नियुक्तियां कराएं,संस्कृत के विद्यार्थियों को विशेष वजीफे दें,शोध के लिए बड़े-बड़े प्रोजेक्ट दें।संस्कृत के विद्वानों को नए-नए विषयों में अनुसंधान के लिए प्रेरित करें।यह सब करने की बजाय स्मृति ईरानी आईआईटी के छात्रों को संस्कृत पढ़ाकर न तो संस्कृत का भला करेंगी और न छात्रों का ही भला करेंगी।इस प्रसंग में चीन के अनुभव से हम सीख सकते हैं,चीन में सब कुछ चीनी भाषा में पढ़ाया जाता है लेकिन उच्च शिक्षा,प्रौद्योगिकी,इंजीनियरिंग,विज्ञान आदि की शिक्षा में वहां पर भी अंग्रेजी भाषा में पठन-पाठन पर जोर दिया गया है, इसके कारण विज्ञान से लेकर समाजविज्ञान तक हर क्षेत्र में चीनी मेधा का विश्वस्तरीय मानकों के आधार पर विकास करने में मदद मिली है।विश्व के नामी विश्वविद्यालयों में चीन के कई विश्वविद्यलयों के नाम आते हैं,यहां तक कि भारत के हजारों छात्र वहां पढ़ने जाते हैं।वहां माध्यम के रूप में चीनी भी है लेकिन अंग्रेजी भी है।



संस्कृत सुंदर और समृद्ध भाषा है ,लेकिन संस्कृत का व्याकरण तो संस्कृतसाहित्य में मदद करेगा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी,समाजविज्ञान,देशज भाषायी साहित्य में मदद नहीं करेगा।आरएसएस के लोगों की मुश्किल यह है कि संस्कृत से तथाकथित प्रेम करना जानते हैं लेकिन यह नहीं जानते कि संस्कृत प्रेम को हासिल कैसे करें।संस्कृत के विद्वानों ने डंडे और सत्ता के जोर से संस्कृतभाषा और उसके साहित्य का निर्माण नहीं किया ।कोई भी भाषा पर्सुएसन के जरिए ही विकास करती है।संस्कृत भाषा के बारे में यह मिथ है कि वह सबसे वैज्ञानिक भाषा है ,लोग यह भी कह रहे हैं कि कम्प्यूटर की भाषा बनाने में उससे मदद मिल सकती है,हम यही कहेंगे कि भारत सरकार वैज्ञानिकों और भाषावैज्ञानिकों से कहे कि वे संस्कृत में काम करें और सिद्ध करें कि संस्कृत सच में विज्ञान की भाषा बन सकती है और उससे हमें काम करने में मदद मिल सकती है,फिलहाल तो अवस्था यह है कि हिन्दीसहित दस देशी भाषाओं के यूनीकोड फॉण्ट को ही हम इंटरनेट पर जनप्रिय नहीं बना पाए हैं,हिन्दी सबसे पिछड़ी अवस्था में है,ऐसे में संस्कृत को क्षितिज पर लाना तो दिवा-स्वप्न ही कहेंगे।

कन्हैया कुमारः विभ्रम और यथार्थ

       कन्हैया कुमार,जेएनयूएसयू अध्यक्ष, काफी लंबे समय से छात्र राजनीति कर रहे हैं,लेकिन 9फरवरी 2016 की घटना ने उनको रातों-रात जेएनयू कैंपस के बाहर बेहद जनप्रिय बना दिया।इस घटना के पहले वह जेएनयू में जनप्रिय थे,लेकिन 9फरवरी की घटना के मीडिया कवरेज ने उनको राष्ट्रीय स्तर पर जनप्रिय बना दिया।इस जनप्रियता का श्रेय मीडिया,साइबर मीडिया और कन्हैया के वाम नजरिए को जाता है।कन्हैया कुमार ने ऐसा कुछ नहीं कहा जो वह पहले किसी वाम नेता ने नहीं बोला हो।इसके बावजूद किसी युवा वाम छात्रनेता को उतनी जनप्रियता नहीं मिली,जितनी कन्हैया कुमार को मिली।इस जनप्रियता के कारणों और प्रक्रिया की खोज की जानी चाहिए।

कन्हैया कुमार जो कुछ बोलता है, जिस मुहावरे में बोलता है वह वाम छात्र राजनीति की चिर-परिचित शैली है।इसे जेएनयूएसयू के किसी भी वाम छात्रनेता में सामान्यतौर पर देख सकते हैं।इसमें विलक्षण जैसी कोई चीज नहीं है।कन्हैया कुमार जब बोलता है तो सामान्य,सहज और जोशीली भाषा में बोलता है।यह खूबी वाम छात्रनेताओं की है।

उल्लेखनीय है युवा पीढ़ी नरेन्द्र मोदी और दूसरे नेताओं के भाषणों से विगत दो सालों से घिरी रही है,इस पीढ़ी ने कन्हैया कुमार में नएपन का अनुभव किया है।मोदी के केन्द्रीय राजनीति में आने के बाद उसके भाषणों का अहर्निश´फ्लो´ मीडिया और साइबर मीडिया के जरिए प्रवाहित हुआ है।यह सुनिश्चित, अनिवार्य और अपरिहार्य ´फ्लो´है जिससे सभी बोर हो चुके हैं,यह ´भाषण फ्लो´थमने का नाम नहीं ले रहा।जेएनयू और 9फरवरी की घटना को लेकर केन्द्रीय मंत्रियों से लेकर भाजपा के नेताओं, आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत आदि के अविवेकपूर्ण बयानों, आरएसएस और उसके प्रवक्ताओं की मीडिया मूर्खताओं ,कुतर्कों, ताबड़तोड़ हमला करके परास्त करने की शैली, कन्हैया कुमार आदि छात्रों को देशद्रोह के झूठे मुकदमे में पकड़वाने के षडयंत्र, और जेएनयू के बारे में जहरीले प्रचार अभियान ने हठात् कन्हैया कुमार की ओर सबका ध्यान खींचा है ।

मीडिया से लेकर साइबरमीडिया तक कन्हैया कुमार के भाषणों को बेहद सराहा गया,बहुत बड़ी संख्या में सुना गया।असल में,कन्हैया कुमार की लोकप्रियता की आग में घी का काम किया पीएम नरेन्द्र मोदी और संघ परिवार की विगत दो सालों की असफलताओं ने।यही वजह है कि कन्हैया कुमार के निशाने पर केन्द्र सरकार और उसकी जनविरोधी नीतियां हैं।इसके अलावा आरएसएस ने हिन्दू राष्ट्रवाद के नाम पर इसी दौरान जो आंदोलन शुरू किया उसने भी कन्हैया कुमार के लिए पर्याप्त ईंधन जुगाड़ करके दे दिया। आरएसएस और मोदी सरकार ने 9फरवरी की कैंपस स्तर की घटना को स्थानीय घटना की बजाय राष्ट्रीय घटना बना दिया और सारे मामले को जेएनयू कैंपस के बाहर संघ के हिन्दू राष्ट्रवाद की मुहिम का प्रमुख अंग बनाकर पेश किया और यह उनकी सबसे बड़ी भूल थी।यही वह मुख्य बिंदु है जहां से कन्हैया कुमार कैंपस के बाहर निकलता है और मीडिया से लेकर साइबर मीडिया तक नए संघ विरोधी-मोदी विरोधी आख्यान का नया नरेटिव बनाता है।

जबकि सच्चाई यह है जेएनयू छात्रसंघ और कन्हैया कुमार 9फरवरी की घटना के पहले लगातार अनेक मसलों को लेकर आंदोलन करते रहे हैं।इनमें प्रमुख हैं-पूना के फिल्म एवं टेलीविजन इंस्टीट्यूट के छात्रों के समर्थन में किया गया आंदोलन,यूजीसी के खिलाफ चलाया गया आंदोलन,हैदराबाद वि वि के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या के खिलाफ चलाया गया आंदोलन।इन सभी आंदोलनों में जेएनयू के छात्रसंघ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।इन सबमें कन्हैया कुमार की भी सक्रिय भूमिका रही है। लेकिन उसे राष्ट्रीय स्तर पर कोई नहीं जानता था।लेकिन 9फरवरी की घटना और उसे लेकर मीडिया-संघ के हमले ने हठात् कन्हैया कुमार को राष्ट्रीय क्षितिज पर लाकर खड़ा कर दिया।इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो कन्हैया कुमार 9फरवरी की घटना के पहले से सक्रिय था,लेकिन कैंपस तक जनप्रिय था। लेकिन 9फरवरी2016 की घटना ने उसे गुणात्मक रूप से भिन्न भूमिका में ले जाकर खड़ा कर दिया।आज कन्हैया कुमार सारे देश के छात्रों में बेहद जनप्रिय है।उसके बारे में आम लोग तरह-तरह के कयास लगा रहे हैं,उसे राष्ट्रीयनेता बना रहे हैं।लेकिन कन्हैया कुमार राष्ट्रीय नेता नहीं है,वह तो जेएनयूएसयू का अध्यक्ष है,छात्रनेता है,छात्र है।वह छात्र के रूप में ही फिलहाल रहना चाहता है।लेकिन जेएनयू प्रशासन ने संघ के इशारों पर काम करते हुए कन्हैया कुमार सहित 14छात्रों के खिलाफ 9फरवरी की घटना को लेकर दण्डात्मक कार्रवाई करके साफ कर दिया है कि उनका लोकतंत्र,संविधान और न्यायपालिका में कोई विश्वास नहीं है।जेएनयू प्रशासन के इस फैसले का हर स्तर पर विरोध किया जाना चाहिए।



रविवार, 24 अप्रैल 2016

सोशलमीडिया और साहित्य

      इन दिनों अकादमिक जगत का एक वर्ग सोशलमीडिया से क्षुब्ध है।खासकर हिन्दी के प्रोफेसर और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग में सोशलमीडिया को लेकर हेयभाव है।वे इसमें लिखने-पढ़ने को थर्डग्रेड किस्म का काम समझते हैं।यदि सोशलमीडिया पर कोई मेरा जैसा प्रोफेसर सक्रिय है तो उसे एकदम अ-गंभीर और गैर-जिम्मेदार समझते हैं।मेरी फेसबुक वॉल पर आए दिन इस तरह के क्षुब्ध लोग लिखते रहते हैं कि सब समय तो फेसबुक पर रहते हो फिर पढ़ाने कब जाते हो ॽ सच्चाई यह है मैं कक्षा में कभी अनुपस्थित नहीं रहा।कभी कोर्स अधूरा नहीं छोड़ा।बल्कि हिन्दी के जितने भी प्रोफेसर हैं उनमें अब तक सबसे ज्यादा किताबें लिखी हैं।किताबों के पाठक भी हैं।कभी किताब लिखना नहीं छोड़ा।कभी किसी की चमचागिरी नहीं की,किताबें लिखने के लिए किसी से अनुदान नहीं लिया,यहां तक कि यूजीसी और अपने विश्वविद्यालय से भी कोई अनुदान नहीं लिया। इस तरह के लोग यह भी मानते हैं कि हल्के-फुल्के लेखन,फोटो लगाने,दैनंदिन गप्पबाजी करने आदि के लिए सोशलमीडिया ठीक है लेकिन कोई गंभीर साहित्यिक कार्य सोशलमीडिया के जरिए नहीं कर सकते।हम विनम्रता के साथ इस तरह का नजरिया रखने वालों से असहमत हैं।ये वे लोग हैं जो सोशलमीडिया के चरित्र से अंजान हैं या फिर जानबूझकर सोशलमीडिया विरोधी अभियान में लगे हैं।

सोशलमीडिया वस्तुतः भाषा का विस्तार है। यह भाषा का विकसित रूप है।भाषा मूलतः अभिव्यक्ति की तकनीक है। भाषा में दो तरह की अभिव्यक्ति नजर आती है।पहली अभिव्यक्ति वह है जो दैनंदिन जीवन से जुड़ी है।जिसका हम क्षणिक उपयोग करते हैं और वह उपयोग करते ही खत्म हो जाती है। दैनंदिन जीवन की क्षुद्र बातों और क्षुद्र कर्मों की सीमा में भाषा का एक रूप खत्म हो जाता है।लेकिन भाषा का एक रूप वह भी है जो वनस्पति की तरह है।जिस तरह वनस्पति की उम्र लंबी होती है,ठीक उसी तरह भाषा में रचे गए साहित्य की भी उम्र लंबी होती है।जिस तरह वनस्पति में शाखा-प्रशाखाएं होती हैं,उसी तरह साहित्य में भी विभिन्न किस्म की विधाएं होती हैं,विभिन्न माध्यमों की साहित्यिक विधाएं होती हैं।भाषा में हम तथ्य या सूचनाएं भी देते हैं उसी तरह मनोभावों को भी व्यक्त करते हैं।जिस तरह गालियां देते हैं उसी तरह कविता,कहानी आदि भी लिखते हैं।भाषा में गुस्सा,प्रेम,घृणा आदि को भी यथास्थान व्यक्त करते हैं।इसमें ध्वनि और भंगिमाएं भी होती हैं।सभ्यता के विकासक्रम में भाषा के इस रूप से हम बहुत आगे चले आए हैं।भाषा के रूपों के विकास में हमेशा ´मैं´केन्द्र में रहा है। माध्यमों में भी अभिव्यक्ति के विभिन्न विधा रूपों में ´मैं´केन्द्र में है।इसी तरह भाषा में दैनंदिन जीवन ही केन्द्र में नहीं है अपितु ज्ञान भी है।इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाएंगे संचार के तकनीकी रूप वस्तुतः भाषा का विस्तार हैं।

सोशलमीडिया में लिखे को साहित्य कहें या न कहें यह सवाल बहस के केन्द्र लाने की जरूरत है। इससे साहित्य के मौजूदा स्वरूप और दायरे का विकास होगा।इस प्रसंग में मुझे रवीन्द्रनाथ टैगोर की साहित्य संबंधी परिभाषा याद पड़ रही है। टैगोर के अनुसार साहित्य का सहज अर्थ है ´नैकट्य अर्थात् सम्मिलन´।भाषा के क्षेत्र में साहित्य का काम है ´हृदय का योग कराना´।टैगोर ने लिखा है, ´मनुष्य को तरह-तरह के उद्देश्यों के लिए मिलना पड़ता है,इसके अलावा मनुष्य को मिलना पड़ता है केवल मिलने के लिए,अर्थात् साहित्य के उद्देश्य से।´नए मीडिया रूप,खासकर सोशलमीडिया की विशेषता है मिलाना। सम्मिलन की इच्छा को नए किस्म के संचार ने प्रमुख बनाया है।जिससे आप मिलना चाहते हैं उससे अब नए मीडियम के जरिए मिलते हैं।ये मीडियम हैं मोबाइल,इंटरनेट,सोशलमीडिया आदि।अब यह आपके ऊपर है कि संचार के दौरान क्या करना चाहते हैं।यह संचार व्यक्ति का व्यक्ति से भी हो सकता है और व्यक्ति का समाज से भी हो सकता है।यह दैनंदिन जीवन से जुड़ा भी हो सकता है और कलात्मक-साहित्यिक भी हो सकता है।यह मन की इच्छाओं पर निर्भर करता है।मनुष्य के पास दो तरह की इच्छाएं हैं,पहला ,सामान्य इच्छा और दूसरा है अद्भुत इच्छा।सामान्य इच्छा को हम दैनंदिन जीवन की भाषा में अभिव्यक्त करते हैं,जबकि अद्भुत इच्छा हमारे साहित्य सृजन का मूलाधार है।अद्भुत इच्छा के कारण ही मनुष्य अपने को संसार में प्रसारित करता है।साहित्य उसी का विराट रूप है।

जब भी कोई नया मीडियम समाज में जन्म लेता है पुराने मीडियम के प्रयोगकर्ता परेशानी महसूस करते हैं। उल्लेखनीय है मानव समाज ने भाषायी और कलात्मक अभिव्यक्ति के जितने भी रूप अब तक पैदा किए वे सभी आज तक बरकरार हैं और कला या साहित्य परंपरा के अंग भी हैं।इनमें वाचिक परंपरा के रूपों से लेकर भित्तिचित्र,भित्तिलेखन तक,विधाओं जैसे कविता से लेकर निजी चिट्ठी-पत्री तक शामिल है,पोथी से लेकर किताब तक,पत्र-पत्रिकाओं से लेकर सिनेमातक,रेडियो कम्युनिकेशन से लेकर इंटरनेट तक,सोशलमीडिया से लेकर ईमेल तक सब कुछ शामिल है।



साहित्य की परिधि वहां तक है जहां तक भाषा का आकाश फैला हुआ है।दिलचस्प बात यह है कि कम्प्यूटर में कोई काम भाषा के बिना संभव नहीं है।हर चीज पहले भाषा में लिखी जाती है,यहां तक कि रेडियो,टीवी,फिल्म आदि भी भाषा में लिखे जाते हैं,उसके बाद वे हम तक पहुँचते हैं।सभी किस्म के संचार का मुख्य द्वार है भाषा।इसी तरह भाषा का प्रयोग मनुष्य के बिना संभव नहीं है।इसी अर्थ में भाषा मानवीय कार्य-व्यापार की अभिव्यक्ति का मूलाधार है।यह भी कह सकते हैं मनुष्य के बिना भाषा नहीं,भाषा के बिना मनुष्य नहीं।उसी तरह मीडियम के बिना भाषा नहीं होती।भाषा जब रस की सृष्टि करती है तो मनुष्य में मिलने की इच्छा पैदा होती है।उससे मिलन की इच्छा करती है जो सभी कालों के सभी जनों में स्वीकृति पाए।भाषा में जब रस पैदा होता है तो उसे हम अनुभूति कहते हैं और इसी अनुभूति को मनुष्य विभिन्न माध्यमों के जरिए व्यक्त करने को आतुर हो उठता है।भाषा के विभिन्न माध्यमों में जो रूप हम देखते हैं वे मुनष्य ने तब बनाने आरंभ किए जब उसने नैपुण्य की सृष्टि की। नैपुण्य के कारण ही भाषा को अर्थ मिला।इन्द्रियबोध को विभिन्न उपादानों के जरिए व्यक्त करने की संभावनाएं पैदा हुईं।

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

गोपेश्वर सिंह यहाँ से देखें


गोपेश्वर सिंह (प्रोफेसर हिंदी विभाग,दि.वि.वि ने जनसत्ता (17अप्रैल2016)में एक लेख”आभासी दुनिया के राग रंग´´ लिखा है, उससे हम विनम्र असहमति दर्ज करते हैं।

आप यदि सोशलमीडिया,मीडिया और साहित्यालोचना के बारे में नहीं जानते तो जाने बिना लिखते क्यों हैं ॽ कम से कम अपने पद की गरिमा का तो ख्याल करें।सोशलमीडिया-मीडिया पर अंगुली उठाकर मूलतःआप अपने निकम्मेपन पर ही अंगुली उठा रहे हैं।सोशलमीडिया और उस पर लिखने वालों पर बेसिर-पैर की बातें लिखकर आपने सोशलमीडिया के संबंध में अपनी अज्ञानता और घृणा का परिचय दिया है,साथ ही साहित्य और सोशलमीडिया ,साहित्यालोचना के ह्रास पर अपनी जो राय रखी है,वह आपके अज्ञान को सामने लाती है। मुश्किल यह है जब कम्युनिकेट करना नहीं आता तो हम ´हाय हाय´, ´पतन पतन´की भाषा बोलने लगते हैं।

जितने भी आधुनिक मीडियम और विधारूप हैं वे आत्मप्रचार के बिना नहीं बनते। किसी में यह मात्रा कम है तो किसी में ज्यादा।आत्मप्रचार या प्रचार ये दोनों संचार के लिए जरूरी तत्व हैं।हिन्दी साहित्य में इन दिनों साहित्यकार,लेखक,आलोचक आदि की जो दयनीय स्थिति नजर आ रही है उसकी जड़ें हिंदीविभाग की संरचना,शिक्षक की वैचारिक संरचना और ज्ञान की विश्वव्यापी परंपरा से उसके अलगाव में है।आलोचना के ह्रास का सोशलमीडिया या मीडिया से कोई संबंध नहीं है।दूसरी बात यह कि साहित्यालोचना कभी अखबारों या सोशलमीडिया से नहीं बनी.दुनिया के सभी प्रमुख आलोचकों ने जो भी आलोचना लिखी है,वह मीडिया से प्रभावित होकर या मीडिया में रहकर नहीं लिखी है।

साहित्यालोचना की दुर्दशा के लिए लेखक-आलोचक-प्रकाशक और हिंदी के शिक्षक सीधे जिम्मेदार हैं।सवाल यह है आलोचकों ने आलोचना लिखनी क्यों बंद कर दी ॽ क्या सोशलमीडिया या मीडिया ने आलोचना न लिखने के लिए दबाव डाला है ॽ या फिर आलोचना न लिखने के लिए कोई फतवा जारी हुआ है ॽ प्रत्येक माध्यम खास ऐतिहासिक परिस्थितियों में जन्म लेता है,यह आपकी जिम्मेदारी है कि आप जानें कि सोशलमीडिया क्यों और कैसे आया ॽ लेकिन आपकी प्रकृति है कि आप बिना जाने लिखते हैं। यह दोष है,लेकिन हिंदी प्रोफेसरों में बिना जाने लिखना-बोलना अब दोष नहीं माना जाता,हम सभी में यह बीमारी अंदर तक घुस आई है कि हम बिना जाने हर विषय पर बोलने और लिखने को तैयार हो जाते हैं। हर मीडियम की अपनी सर्जनात्मक क्षमता होती है,मीडियम में सर्जनात्मक क्षमता न हो तो वह आम जनता में स्वीकृति अर्जित नहीं कर पाता।सोशलमीडिया की सर्जनात्मक क्षमता अब तक के सभी माध्यमों से कई गुना ज्यादा है।यह मानव सभ्यता का अब तक का सबसे शक्तिशाली माध्यम है।इसमें पहले के सभी माध्यम समाहित हैं।यह माध्यम तिकड़म-घृणा-जोड़तोड़ आदि के आधार पर अपना विकास नहीं करता। सोशलमीडिया वस्तुतः कम्युनिकेशन का मीडियम है।इसमें जो व्यस्त है वह सर्जक है। हिंदी के स्वनामधन्य आलोचकों का इससे कोई संबंध नहीं है।यह सोशलमीडिया है,रीयलटाइम मीडिया है,यह साहित्य नहीं है।यह नए किस्म का कम्युनिकेशन है। यह साहित्य नहीं है।हम जिसे साहित्य कहते हैं वह प्रिंटयुग और उससे पूर्व की विरासत की देन है। सोशलमीडिया और उसके विधारूप भिन्न हैं।उनको पुराने साहित्यरूपों के साथ एकमेक नहीं करना चाहिए। साहित्यालोचना के पतन के कारण सोशलमीडिया में नहीं खोजने चाहिए।साहित्यालोचना के पतन पर हम समय-समय पर बहुत लिख चुके हैं,फुरसत हो तो पढ़ लें।दूसरी बात यह कि सोशलमीडिया आने के बाद पहली,दूसरी,तीसरी साहित्य परंपरा का अंत हो चुका है।साहित्य की मनमानी परंपरा बनाकर जिस रास्ते पर हिंदीवाले चलते रहे हैं उसको हमेशा के लिए दफ्न कर दिया गया है।

सोशलमीडिया के अपने ठाट हैं, अपना मुहावरा है,अपनी सर्जनात्मकता है और विराट संचार का रीयल टाइम फलक है।इसने सामान्य से पाठक को भी शक्तिशाली बनाया है।लेखक को भी ताकत दी है।वे लेखक सोशलमीडिया से शक्ति ग्रहण नहीं कर सकते जोपुराने मीडिया से रीतिवादियों की तरह अभी भी जुड़े हैं।संक्षेप में कहें आपने अनर्गल और अप्रासंगिक लिखा है।सोशलमीडिया के बारे में एक विश्वविद्यालय प्रोफेसर की इस तरह की अज्ञानता सच में पीड़ादायक है।यह स्थिति बदलनी चाहिए।सोशलमीडिया को जानने की कोशिश करें,उस पर रहें ,लिखें,गंभीर लिखें कौन रोक रहा है।सोशलमीडिया का पेट भरने लायक हिंदी आलोचकों-लेखकों के पास बहुत कम सामग्री है।सोशलमीडिया का पेट बहुत बड़ा है।थोड़ा कहा है बहुत जानना।









शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

फ्लाईओवर तबाही और राजनीतिक जबावदेही

        गिरीश पार्क-पोश्ता फ्लाईओवर के एक अंश का कल गिरना ममता सरकार के बारे में बहुत कुछ कहता है। इस फ्लाईओवर का गिरना प्राकृतिक आपदा या ईश्वरलीला नहीं है,बल्कि यह मनुष्यजनित तबाही का आदर्श नमूना है।कोई भी फ्लाईओवर अचानक नहीं गिरता,किसी एक क्षण में नहीं गिरता बल्कि उसके क्षय की प्रक्रिया लंबा समय लेती है,सवाल उठता है कि यह प्रक्रिया इंजीनियरों की नजर से ओझल कैसे रही ॽ उन्होंने समय रहते इसे पकड़ा क्यों नहीं ॽ यह फ्लाईओवर जिस तरह गिरा है उससे पता चलता है कि इंजीनियर इसके निर्माण कार्य के दौरान सजग नहीं थे। इस प्रसंग में महत्वपूर्ण है फ्लाईओवर का अचानक गिरना और व्यापक जनहानि।राजनीति में इसकी जबावदेही होनी चाहिए। यह कहीं न कहीं भ्रष्टाचार का मामला भी है। ममता सरकार अपनी जबावदेही से इसमें बरी नहीं हो सकती।अभी तक समस्त विवरण सामने नहीं आए हैं,लेकिन प्रथमदृष्टया जो चीज नजर आ रही है कि इसके निर्माण में कहीं न कहीं गफलत हुई है,घोटाला हुआ है,निर्माण के नियमों का उल्लंघन हुआ है।यह घटना सामान्य रूटिन दुर्घटना नहीं है,बल्कि असामान्य घटना है,यह घटना बताती है कि ममता सरकार विकास के प्रति किस तरह केजुअल रवैय्या रखती है।साथ ही वह राजनीतिक दुरूपयोग करने से भी बाज नहीं आ रही।ममता बनर्जी ने कल जिस तरह का बयान दिया वह दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है।कायदे से इस घटना से जुड़े अफसरों,इंजीनियरों,मंत्री आदि के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी होना चाहिए।साथ ही जो मंत्रालय इससे जुड़ा है उसके संबंधित अफसर और मंत्री को सीधे गिरफ्तार किया जाना चाहिए,साथ ही फ्लाईओवर बनाने वाली कंपनी के मालिक को गिरफ्तार किया जाना चाहिए।इस घटना को घटे इतना समय हो गया लेकिन ममता सरकार ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है।ममता सरकार जिस तरह अपराधियों और जिम्मेदार लोगों को बचाने में लगी है उससे लगता है ममता के मुख्यमंत्री रहते इस घटना से जुड़े अफसर कभी पकड़े नहीं जाएंगे। राजनीतिक तौर पर ममता सरकार इस तबाही के लिए सीधे जिम्मेदार है और उसे विधानसभा चुनाव में हराकर ही इस फ्लाईओवर तबाही के लिए जिम्मेदार लोगों को दण्डित कराना संभव होगा।