रविवार, 26 जून 2016


सोशल मीडिया के डिजिटल संस्कार

       फेसबुक पर अश्लील वीडियो पोस्ट करने,अश्लील गालियां लिखने,औरतों के प्रति अशालीन आचरण करने,गद्दी बातें लिखने वालों की संख्या बढ़ रही है। कायदे से फेसबुक प्रबंधकों को अश्लील, अपमानजनक भाषा और कामुक सामग्री आदि को निजी पहल करके सेंसर करना चाहिए। अश्लील -कामुक सामग्री और गालियां फेसबुक की आचारसंहिता का उल्लंघन है।सभी यूजरों को अश्लील भाषा और कामुक सामग्री के फेसबुक पर प्रचार-प्रसार का विरोध करना चाहिए।

फोटोग्राफी,डिजिटल तकनीक और विज्ञापनों के दबाब ने हमारे चेहरे-मोहरे सब बदल दिए हैं। खासकर नकली शरीर और नकली शक्ल की जो संस्कृति पैदा हुई है उसने असली चेहरे और असली शरीर के बोध ही खत्म कर दिया है। सवाल यह है कि नकली शक्ल और नकली स्कीन से हमारे नकली विचारों और व्यवहार का संबंध भी बन रहा है क्या ?उल्लेखनीय है भारत के मीडिया और सोशलमीडिया में बेरोजगारी, निरूद्योगीकरण और किसानों की बदहाली पर न्यूनतम कवरेज है । मीडिया से लेकर इंटरनेट तक सैलीब्रिटी चेहरे,फिल्म-टीवी,क्रिकेट आदि का ज्यादा कवरेज है। यह वस्तुतः डिजिटल संस्कृति है।इससे राजनीतिक अचेतनता बढ़ती है।

सोशल नेटवर्क और खासकर फेसबुक को जो लोग आजादी का मंच समझ रहे हैं वे गलतफहमी के शिकार हैं। फेसबुक का अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठानों ,जैसे सीआईए,एफबीआई आदि से याराना है,वे सभी फेसबुक यूजरों की नजरदारी कर रहे हैं,अब इसी पैटर्न पर भारत सरकार भी नजरदारी कर रही है। फेसबुक यूजर शालीनता,लोकतांत्रिकबोध और परिपक्व नागरिक की तरह इस माध्यम का इस्तेमाल करें।

हमारे समाज में मध्यवर्ग के एक बड़े तबके में फैशन की तरह ग्लोबलाईजेशन का प्रभाव बढ़ा है,सरकार की नीतियों में ग्लोबलाइजेशन का अंधानुकरण चल रहा है,यहां तक कि अब तो वे लोग भी ग्लोबलाइजेशन के पक्ष में बोलने लगे हैं जो कल तक उसका विरोध करते थे,ऐसे विचारकों और राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं की तादाद तेजी से बढ़ रही है, वे यह कह रहे हैं कि पूंजीवाद का अब कोई विकल्प नहीं है,ग्लोबलाईजेशन के तर्कों को मानने के अलावा और कोई विकल्प नहीं हैं। यही स्थिति ग्लोबल मीडिया चैनलों की है, उनके उपभोक्ताओं में किसी भी किस्म का प्रतिवाद का स्वर दिखाई नहीं देता बल्कि उल्टे राजनीतिक हल्कों में ज्यादा से ज्यादा चैनल और अखबार समूहों को अपने राजनीतिक रुझान के पक्ष में करने की होड़ चल निकली है।



समग्रता में देखें तो फेसबुक पर हम असहिष्णु समाज बना रहे हैं ?सामान्यतौर पर कम्युनिकेशन सहिष्णु बनाता है,लेकिन फेसबुक ने यूजर के अवचेतन को जगाया है। अवचेतन में पड़ी घृणा,गंदगी, अश्लीलता आदि को अभिव्यक्त करने का सहज मौका दिया है। हमें सोचना चाहिए कि चेतनमन को जगाते हैं या अवचेतन मन को? फिलहाल तो अवचेतन की हवा बह रही है। कम्युनिकेशन के लिए चेतनमन सक्रिय रहे तो सुरक्षा है वरना खतरे ही खतरे हैं।

सोशलमीडिया को लेकर भारत सरकार की सचेतनता का कोई अर्थ नहीं है। असलमें ,सबसे पहले भारत सरकार को पोर्न सामग्री के वितरण पर पाबंदी लगानी चाहिए। पोर्न दिखाना-बेचना अपराध है।इसके सामाजिक दुष्प्रभावों पर सारी दुनिया में बहस हो रही है। लेकिन केन्द्र सरकार और उसके विरोधीदल पोर्न के मामले पर चुप हैं।महिला संगठन भी चुप्पी लगाए हुए हैं।इंटरनेट पर आपत्तिजनक सामग्री की निगरानी को लेकर जारी विवाद के बीच नामी सर्च पोर्टल गूगल ने अपनी पारदर्शिता रिपोर्ट में जनवरी 2011 से लेकर जून 2011 के बीच सरकार की ओर से सामग्री हटाने की सिफारिशें जारी की हैं। गूगल ने बताया है कि इस अवधि में सरकार ने उससे 358 आइटम और 68 कंटेंट हटाने की मांग की थी, जिसमें से कंपनी ने 51 फीसदी मांगों को आंशिक या पूरे तौर पर मान लिया था।

गूगल ने बताया, 'राज्य और स्थानीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने हमसे सामाजिक नेताओं के विरोध में प्रदर्शन, आपत्तिजनक भाषा वाले वीडियो यू ट्यूब से हटाने के लिए कहा था। हमने इनमें से ज्यादातर वीडियो हटाने से मना कर दिया था और महज उन्हीं वीडियो को हटाया था, जिनके कारण समुदायों में रंजिश बढऩे की आशंका थी।

सोशल मीडिया के नियंत्रण के बारे में केन्द्र सरकार की चिन्ताएं अन्ना आंदोलन के समय सामने आ गयी थीं। मोदी सरकार आने के बाद भी केन्द्र सरकार का पुराना नजरिया बदला नहीं है।यह एक तरह से सोशल मीडिया की संचालक कंपनियों को धमकी है कि 'सावधान रहो अपने दायरे के बाहर मत जाओ।' विचारणीय बात यह है जो केन्द्र सरकार दूरसंचार विभाग को नहीं चला पायी और उसे निजी स्वामित्व में दे दिया। वह सोशलमीडिया को क्या नियंत्रित करेगी ! ये सिर्फ कागजी कानूनी शेरों की बातें हैं ! इसके बावजूद हम यह कहना चाहेंगे कि हमारे फेसबुक बंधुओं को शालीन भाषा,सभ्य राजनीति और संस्कृति के नए मानकों को बनाना चाहिए। फेसबुक पर गली-मोहल्लों की भाषा ,खासकर गाली-गलौज की भाषा से बचना चाहिए। अन्ना भक्तमंडली से लेकर भाजपा की वानरटोली तक यह फिनोमिना देखा गया है। इन लोगों के एक धड़े ने फेसबुक पर आएदिन जो गंदगी की है,उसने सोशलमीडिया की साख को बट्टा लगाया है।



फेसबुक पर यूजर्स की निजी सूचना निकालने और उसे विज्ञापनदाताओं को 'बेचने' का

आरोप है और इस मुद्दे पर उसे यूरोप में कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। ' संडे टेलिग्राफ ' की एक रिपोर्ट के अनुसार , फेसबुक अपने यूजर्स के राजनीतिक विचार, लैंगिक पहचान, धार्मिक आस्थाएं और यहां तक कि उनका अता-पता भी जमा कर रही है। यूरोपीय आयोग इस मुद्दे पर कार्रवाई करने की योजना बना रहा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि लोग चाहे अपना 'प्राइवेसी सेटिंग' कुछ भी रखें, फेसबुक अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर का उपयोग कर सोशल नेटवर्किंग साइट पर लोगों की गतिविधियों की सूचना जमा कर रही है और उसे विज्ञापनदाताओं को उपलब्ध करा रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरोपीय आयोग 2012 जनवरी में एक नया निर्देश जारी करने वाला है जिसमें इस तरह के विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है।

दूसरे उद्योगों की तरह भारतीय दूरसंचार के आंकड़े भ्रमित करने वाले हैं। देश में 85 करोड़ से अधिक पंजीकृत मोबाइल नंबर हैं। पर स्पेक्ट्रम आवंटन का ढांचा सेवा प्रदाताओं के लिए इनकी संख्या बढ़ाने में मदद करता है। इसमें से एक तिहाई नंबर ऐक्टिव नहीं हैं। बाकी बचे नंबरों में से भी कई उन ग्राहकों के नाम पर पंजीकृत हैं जो ऑफिस या निजी इस्तेमाल के लिए अलग-अलग नंबर रखते हैं। पिछले कुछ वर्षों से लगातार प्रति ग्राहक औसत राजस्व घटा है। इस कारण से सेवा प्रदाताओं का मुनाफा भी कम हुआ है। हर सर्किल में दर्जनों टेलीकॉम सेवा प्रदाता कंपनियां हैं। इनमें से कुछ ही पैसा बना पाती हैं और नई कंपनियां तो अब तक अपने निवेश का बड़ा हिस्सा तक नहीं वसूल पाई हैं। इस बदहाल अवस्था के बाद तो दूरसंचार क्षेत्र के निजीकरण को यहीं रोकना चाहिए।

सीईए के साथ समझौते और तकनीकी सहमेल के कारण फेसबुक अपने यूजर की प्राइवेसी में हस्तक्षेप और तांक-झांक कर रहा है। फेसबुक अधिकारियों के अनुसार फेसबुक अपने यूज़र के लॉग ऑफ करने के बाद भी इस बात पर नजर रखता है कि उसके यूजर्स कौन सी वेबसाइट विजिट कर रहे हैं।

चीन में इंटरनेट के 50 करोड़ के करीब यूजर हैं और सबसे शक्तिशाली इंटरनेट सेंसरशिप भी है। सर्वसत्तावादी एकतंत्र में यह व्यवस्था बेहद परेशानी खड़ी करने वाली है। नव्य आर्थिक उदारीकरण और विश्व व्यापार संगठन की नीतियों के दायरे में आने के बावजूद वहां पर इंटरनेट सेंसरशिप में कोई ढ़ील नहीं आयी है। कायदे से उसे अपने सिस्टम को और उदार बनाना था,लेकिन उन्होंने नहीं किया। चीन पर विश्व जनमत का भी कोई दबाव नहीं है।इसका अर्थ यही है कि लूट की उदारता में चीन हिस्सेदार है,लोकतांत्रिक छूट देने के मामले में चीन आज भी कंजरवेटिव है। चीन का मॉडल है राजनीति में सर्वसत्तावाद,आर्थिक क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कारपोरेट तंत्र,उपभोक्तावाद और सख्त सेंसरशिप।

भारत में फेसबुक और इंटरनेट पर साइबर हैकरों के हमले बढ़ गए हैं। अभी तक भारत फेसबुक संतों की शांत रमणस्थली था लेकिन विगत एक सप्ताह से साइबर अशांति की खबरें आ रही हैं। भारत सरकार के संस्थानों की बेवसाइट हैक करके नकली लोग अन्य देशों की बेवसाइट पर हमले कर रहे हैं। इसी तरह फेसबुक को बाजार में डाउन करने के लिए नए तरीकों से पोर्न सामग्री फेसबुक पर भेजी जा रही है। साइबर हैकरों की इन शैतानियों के प्रति सजगता जरूरी है। इस विषय पर फेसबुक दोस्तों को अपनी वॉल पर लिखना चाहिए।भारत में संचार क्रांति के दुरूपयोगों के प्रति सचेतनता बढ़ रही है। इंटरनेट,फेसबुक,सोशल साइट ,ब्लॉग आदि पर अपमानजनक बातें लिखने वालों के प्रति अब आम यूजर सचेत हो रहा है। इस सचेतनता के कारण ही एक युवक को एक लड़की के प्रति अपमानजनक और अशालीन बातें नेट पर लिखने के लिए अदालत ने 20हजार रूपये का जुर्माना लगाया है। आप भी आई टी एक्ट के प्रति जागरूक बनें ।

दूसरी ओर सीआईए ने फेसबुक और ट्विटर पर निगरानी तेज कर दी है। वे विभिन्न देशों में चल रही राजनीतिक और अन्य किस्म की गतिविधियों पर गहरी नजर रखे हैं। इसके आधार पर वे अपने रणकौशल को भी बदल रहे हैं ,साथ ही यूजरों का व्यापक प्रोफाइल भी बना रहे हैं। यह यूजरों की निजता का उल्लंघन है ?

इंटरनेट आने के बाद से ऑनलाइन छेडखानी ,उत्पीड़न और अपमान की घटनाओं में इजाफा हुआ है। मसलन् ,आस्ट्रेलिया में 2008 में की गयी रिसर्च में पाया कि 42प्रतिशत युवाओं को ह्रासमेंट का सामना करना पड़ा।एक अन्य सर्वे में 36 फीसद लड़कियों और 32 फीसद लड़कों ने ह्रासमेंट की शिकायत की। ऑनलाइन ह्रासमेंट की घटनाओं से भारत में भी एक बड़ा तबका परेशान है । लेकिन अभी तक ऑनलाइन ह्रासमेंट की सटीक अवधारणा विकसित नहीं हो पायी है ।

फेसबुक के 80 करोड़ यूजर हैं और उसकी विज्ञापनों से इस साल 4.27 बिलियन डालर की आमदनी हुई है जो उसकी सकल आय का 85 फीसदी है। ऐसे में फेसबुक पर मंथली चार्ज लेने की अफवाह उसके प्रतिद्वंद्वी सोशल मीडिया साइट के लोगों ने ही उड़ायी है। फेसबुक पर जो लिखा जाता है उस पर सहज में विश्वास न करें। उसकी अन्य स्रोतों से पुष्टि करें। फेसबुक पर अफवाहें भी चलती हैं।

फेसबुक पर कभी आर्थिक तबाही के घटनाक्रमों पर मित्रलोग बहस क्यों नहीं करते ? क्या भारत में आर्थिक खुशहाली आ गयी है ? क्या मंदी की मार के सवाल सताते हैं ? सवाल यह है फेसबुक को हम भारत की मूल समस्याओं का मंच क्यों नहीं बना पाए हैं ?

फेसबुक पर वर्चुअल कामुक औरतें सक्रिय हैं।ये फेसबुक और चैटिंग के बहाने मोहित करती हैं। वर्चुअल प्रेम में फंसाती हैं और अंतमें गहरी निराशा और हताशा में धकेल देती हैं। आज इनके एक शिकार युवा ने फेसबुक से विदा ले ली। कहने का अर्थ है फेसबुक पर वर्चुअल औरतों से चैटिंग ओर वर्चुअल प्रेम न करें। यह आत्मघाती है।

नए साइबर जमाने के युवाओं में लोकतांत्रिक प्रतिवाद की आकांक्षाएं कम है। यह समाज से विच्छिन्न है और पूरी तरह मोबाइल और सोशल नेटवर्किंग से सम्बद्ध है। इस युवा की मनोसंरचनाएं उपभोग,अकेलेपन , क्षण में पाने की आकांक्षा और प्रतिहिंसा ने निर्मित की है।

इंटरनेट महान है,फेसबुक महानतम है और लुढ़कता बाजार और आर्थिक मंदी इन सबसे महान है। संचार क्रांति और भूमंडलीकरण जिस स्वर्ग का सपना लेकर आए थे वहां इन दिनों वैचारिक-सांस्कृतिक सन्नाटा पसरा हुआ है। हमारे दोस्त इन सब सवालों पर चुप हैं । क्या ये सवाल बहस के लायक नहीं हैं ॽ

फेसबुक तो स्वर्ग की इन्द्रसभा है इसमें सुख है,आनंद है,विचार हैं,अमरता है,गान,संगीत, नृत्य, चित्र,मित्र सब हैं,इन्द्रसभा की तरह यहां रसोई ,खाना ,महंगाई ,मंदी ,राक्षस ,पति, पत्नी, संतान,समाज आदि की चिन्ता नहीं है। यहां सिर्फ रस , आनंद और अभिव्यक्ति है।यह सुखियों का संसार है।फेसबुक क्षणिक और अधूरी अभिव्यक्ति का माध्यम है।फेसबुक सिरपड़ों का खेल है,यहां अपरिचय के परिचय,बिना दीवार के वॉल,बिना स्याही कागज का लेखन,मुँह देखी मीठी बातें और खोखली प्रशंसाओं की लंबी सूची,सूचनाओं का ढ़ेर, बिना मांगे उपदेश,मजे की बातें,बोरिंग बातें,विज्ञापन और नकली व्यक्तिवाद का खोखला ताण्डव और फेसबुक का अरबों का धंधा।यानी फेसबुक उल्लू है उसकी सवारी लक्ष्मी करती है।फेसबुक में स्वर्ग और नरक भी हैं , स्वर्ग में उत्तर अमेरिका है वहां की 41 प्रतिशत आबादी ऑनलाइन है । नरक में विश्व की बाकी आबादी है जिसमें मात्र 10 प्रतिशत लोग ऑनलाइन हैं।अफ्रीका की मात्र 1 प्रतिशत आबादी ऑनलाइन है। ऑनलाइन स्वर्ग है और जो लाइन में है वो नरक में हैं। फेसबुक पर कुछ लोग हैं जो 11बजे के बाद अवतरित होते हैं वे फेसबुक के यक्ष-यक्षिणी हैं।

परवर्ती पूंजीवाद में सबसे बड़े किराए वसूलने वाले कारपोरेट घराने हैं। वे केबल टीवी से लेकर डीटीएच तक,इंटरनेट से टेलीफोन तक,डिस्नी लैंड से लेकर साइंस सिटी तक आम जनता से आनंद और कम्युनिकेशन के बदले किराया वसूलते हैं। यह किराया ही मोनोपोली कैपीटलिज्म के मुनाफे और आनंद का मूल स्रोत है। क्या इसके बाद भी हमें पूंजीवाद से प्यार करना चाहिए ?

पूंजीवाद में कोई भी कम्युनिकेशन फोकट में नहीं होता।दूरसंचार -मीडिया के इजारेदार घरानों की मुनाफाखोरी के बिना नहीं होता। मसलन् फेसबुक,ब्लॉग आदि इंटरनेट कम्युनिकेशन के लिए हम किराया देते हैं। दूरसंचार मुगल इस किराए से अमीर बनते हैं।यह परवर्ती पूंजीवाद का किराए का कम्युनिकेशन है और इसी अर्थ में बुर्जुआ कम्युनिकेशन है।

फेसबुक के मित्र किस विचारधारा के हैं यह जानने का आसान तरीका है कि वे किन विषयों पर वॉल पर लिखते हैं,किन विषयों पर अन्यत्र जाकर पढ़ते हैं और आमतौर पर उनकी किस तरह के राजनीतिक-आर्थिक सवालों में रूचि रखते हैं ? टिप्पणी करते हैं ?सवाल यह है कि क्या फेसबुक विचारधारारहित कम्युनिकेशन है ? फेसबुक पर शिक्षित युवा और अधेड़ आमतौर पर जिस भाषा का प्रयोग करते हैं वो प्रतिगामी भाषिक- सांस्कृतिक मनोदशा की अभिव्यक्ति है। ये,नकली फोटो लगाना, गलत सूचनाएं देना,विभ्रम की बातें करना,अश्लील भाषा या द्वयर्थक भाषा में लिखना,चैट करते हुए किसी भी लिंक को भेज देना आदि। अनेक लोग हैं जो फेसबुक पर लड़की देखी और लगे पीछा करने, ये लोग फेसबुक पर लड़की को पीछा किए बिना क्यों नहीं रह पाते ? पहले दोस्त बनाते हैं फिर चैट में पीछा करते हैं,क्या यह नेट पर स्त्री उत्पीड़न है ?

इंटरनेट पर सत्ता की नजरदारी लगातार बढ़ रही है।लैटिन अमेरिका में इंटरनेट को राजनीतिक औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।प्रतिवादियों पर नजर रखी जा रही है,उन पर नियंत्रण लगाया जा रहा है। पेरू से लेकर बोलविया तक इंटरनेट की नजरदारी हो रही है। ईमेल,फेसबुक,ब्लॉग,ई मूवमेंट आदि पर विभिन्न तरीकों से नजर रखी जा रही है। यह नेट प्राइवेसी का अंत है।

इंटरनेट और कम्प्यूटर का ज्यादा उपयोग स्मृति में संचित करने की दिशा बदल सकता है। आमतौर पर अभी वैज्ञानिक नहीं जानते कि इससे मनुष्य की स्मृति का क्षय हो रहा है या स्मृति समृद्ध हो रही है। लेकिन मन के बाहर जो चीज संग्रहीत करना चाहते हैं उसके लिए इंटरनेट और कम्प्यूटर सुंदर माध्यम और संग्रहशाला है। मनुष्य का दिमाग इस मीडिय़म की संगति में धीरे धीरे बदल रहा है।

यह संचार क्रांति की आजादी के अंत की बेला है। संचार क्रांति ने जिस तरह की स्वतंत्रता और प्राइवेसी का आरंभ में वायदा किया था उसका धीरे धीरे अंत हो रहा है। आम लोगों की प्राइवेसी को नियंत्रित और नियोजित किया जा रहा है। बेहतर है नेट की दुनिया में हम अपने निजी पत्ते न खोलें।

साइबर साँड मात्र शब्दों से ही अपमानित नहीं करते वे इलैक्ट्रोनिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। मसलन वे किसी को अपमानित या परेशान करने के लिए गंदे,अश्लील वीडियो फेसबुक की वॉल पर लगा देते हैं।अपमानजनक एमएमएस या ईमेल करते हैं। अपमानजनक या नेगेटिव साइबर टेक्स्ट भेज देते हैं।

साइबर बांस करने के तरीके क्या हैं- पहला तरीका है आघात पहुँचा,अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना,सेक्सुअल लैंग्वेज का इस्तेमाल करना, परेशान करना,मसलन् , बार-बार यह कहना 'बात कीजिए प्लीज' आदि । जो व्यक्ति इस तरह की भाषा का प्रयोग कर रहा है वह कितनी बार दोहराता है अपने व्यवहार को,महिने में एक बार,दो बार ,तीनबार या रोज।इससे आप उसके असंतुलन का अंदाजा सहज ही लगा सकते हैं।साइबर साँड मूलतःसामाजिक जीवन में मौजूद दादागिरी का ही साइबर रूप है। साइबर साँड ज्यादातर वे युवा और तरूण हैं जो एडजेस्टमेंट प्रॉब्लम के शिकार हैं। इसे साइबर भाषा में रिस्क ग्रुप में रखा जाता है और ये लोग भिन्न किस्म के व्यवहार की मांग करते हैं।साइबर पंगेबाज को साइबर बैल कहना ज्यादा सही होगा।वे अपनी नेगेटिव हरकत को बार बार दोहराते हैं। मसलन् साइबर बैल चैट में आकर पूछते हैं '' क्या आप मुझे पसंद करते हैं'। 'सेक्स करोगे',या वे कोई व्यक्तिगत आक्षेप करने वाले वाक्य या शब्द का इस्तेमाल कर बैठते हैं। साइबर स्पेस में किया गया एक नेगेटिव एक्शन दूरगामी असर छोड़ता है। नेगेटिव एक्शन की पुनरावृत्ति तुरंत प्रतिक्रिया पैदा कर सकती है।साइबर पंगेबाज कैसे लोग होते हैं ,किस उम्र के होते हैं,उनके पंगा लेने का तरीका क्या वे साइबर कम्युनिकेशन में कैसे परेशान करते हैं। इसे साइबर में 'बांस' करना भी कहते हैं।पश्चिम में इसमें ज्यादातर 10-18साल की उम्र के तरूण आते हैं।भारत में ऐसे लोगों में वयस्कों की संख्या ज्यादा है। इन लोगों का काम है नेट,फेसबुक,ब्लॉग,ईमेल,चाट आदि के जरिए आघात पहुँचाना।ये नेगेटिव एक्शन में ज्यादा रहते हैं।

नेट पर किए गए अनेक अनुसंधान बताते हैं कि जो ज्यादा चैट ,ईमेल और शॉपिंग करते हैं उनमें अवसाद के लक्षण ज्यादा होते हैं।ताइवान के कॉलेज छात्रों में किए अध्ययन से पता चला है कि इंटरनेट की लत का पढ़ाई ,दैनिक रूटीन पर असर होता है। जिनको लत है वे अवसाद में कष्ट पाते हैं।फेसबुक की बढ़ती आदत ने अमेरिकी तरूणों की स्कूली पढ़ाई को प्रभावित किया है।इंटरनेट में उन्हीं यूजरों के साथ दुर्व्यवहार या एब्यूज की घटनाएं देखी गयी हैं जिनमें आमने-सामने बात करने की क्षमता का अभाव होता है अथवा जो अवसाद में रहते हैं।रिसर्च में पाया गया है कि इंटरनेट यूजरों में जो अकेलेपन में नहीं हैं वे भावनात्मक सहयोगी की तलाश में नेट पर आते हैं। ऑनलाइन मित्र यहां ऑफलाइन मित्रों से मिलकर संतोष पाते हैं। इस तरह के यूजर भी हैं जो मनो व्यथाओं के शिकार हैं और अपनी व्यथा का समाधान खोजने आते हैं। इनमें बेचैनी,अवसाद और आत्मविश्वास की कमी देखी गयी है।

सन् 1990 के आसपास जब इंटरनेट का चलन तेज हुआ तो उस समय इसे लेकर भय और उत्साह का भाव था।आरंभ के शोध बताते हैं इंटरनेट के उपयोग ने अकेलेपन ,अवसाद और तनाव में वृद्धि की।नेट विशेषज्ञों का मानना है कि संचार की नई तकनीक के कारण हठात कम्युनिकेशन बढ़ जाने का सामाजिक-मनोवैज्ञानिक नकारात्मक असर होता है। इससे लत और अवसाद की जुगलबंदी पैदा होती है।क्या सोशल मीडिया नेटवर्क में गालियों का वही स्थान है जो उसे हमने सामाजिक जीवन में दिया है ? क्या सोशल मीडिया गालियों से ऊर्जा प्राप्त करता है ?गालियां संवादहीनता का संकेत है ।

फेसबुक आने के बाद विरही-विरहिणियों की संख्या बढ़ी है या घटी है ? विरह का प्रसार हुआ है या अवसान हुआ है ?मनमाने ढ़ंग से अपनी बात कहने का ढ़ंग अभागों का ढ़ंग है।कहते-कहते ऐसा भी कुछ सुनने को मिल जाता है जो पहले कभी नहीं सुना था।कहने के स्रोत में जब ज्वार आता है तब न जाने किस गुफा के भीतर की अनजान सामग्री बहती-बहती आकर घाट पर लग जाती है। क्या आपने ऐसा अनुभव किया है ?



सौंदर्य मनुष्य को संयम की ओर खींचता है,शालीनता का विकास करता है। इसके अलावा हमारी क्षुधा तृप्ति के साथ -साथ सदा उच्चतर सुर जगाता है।फेसबुक ने आम लोगों में खासकर मध्यवर्ग के लोगों में झूठ बोलने,फुसलाने,हां में हां मिलाने या निरर्थक समय खर्च करने की आदत में इजाफा किया है। छद्म या आभासी यथार्थ में जीने की भावना को पुख्ता बनाया है। आदमी का कम्युनिकेशन फास्ट किया है लेकिन संचार ,समाज ,व्यक्ति और वस्तु के बीच में महा-अंतराल पैदा किया है।फेसबुक यूजरों की संख्या 70 करोड़ के करीब हो गई है। आश्चर्यजनक बात है कि अमेरिका में फेसबुक यूजरों की संख्या में 6 मिलियन की गिरावट आई है।इसी तरह कनाडा,रूस,ब्रिटेन,नार्वे में फेसबुक यूजरों की संख्या घटी है। लेकिन विकासशील देशों में बढ़ रही है। क्या अमेरिकी लोग त्रस्त हैं फेसबुक से ?क्या फेसबुक सामाजिक-भावनात्मक अलगाव पैदा कर रहा है ?फेसबुक की खूबी है "जान ना पहचान मैं तेरा मेहमान",अनजाने लोगों से राजनीतिक-सामाजिक चर्चा तो ठीक है लेकिन इमोशनल बातें करना,व्यक्तिगत जानकारियां देना खतरनाक है।



यूरोपीयन आर्थिक यूनियन से ब्रिटेन के अलग होने का मतलब

       ब्रिटेन के जनमत संग्रह का मूल संदेश - शासकदल आम जनता की भावनाओं और संवेदनाओं से पूरी तरह कट चुका है।वे आम जनता के असंतोष को सही ढ़ंग से समझ ही नहीं पाए। शासकवर्ग का जनता के दिलोदिमाग से कट जाना कोई नई बात नहीं है,हमारे यहां मनमोहन सिंह सरकार का पतन इसके कारण ही हुआ।इसी तरह स्कोटिस जनमत संग्रह,स्पेन के आम चुनाव,ग्रीस के चुनाव,डोनाल्ड डम्प के समर्थन में उठ रही आवाजों में इस जन -को देखा जा सकता है।

ब्रिटेन के जनमत संग्रह में मजदूरों ( औद्योगिक और खान मजदूरों) के बड़े तबके ने यूरोपीयन यूनियन से बाहर निकलने के पक्ष में वोट दिया है,इसका प्रधान कारण यह है कि मजदूरों का यह अनुभव है कि यूनियन में रहने के कारण उनकी आर्थिकदशा में कोई बडा परिवर्तन नहीं आया ।उलटे बहुत ही सीमित अमीरवर्ग को इससे लाभ हुआ।गरीबी,बेकारी और हाशिए पर ठेलकर रखने की घटनाएं बढ़ी हैं,इसलिए मजदूरों ने निकलने के पक्ष में वोट दिया।

ब्रिटेन के जनमत संग्रह का पहला साइड इफेक्ट -सारे पीआए एजेंसियों के जनमतसंग्रह के बारे में पूर्वानुमान गलत साबित हुए हैं।अधिकांश पूर्वानुमान बता रहे थे कि लघु बहुमत से ब्रिटेन ईयू में बना रहेगा।लेकिन हुआ एकदम उलटा।

यूरोपियन आर्थिक यूनियन से ब्रिटेन के निकलने को लेकर मीडिया से लेकर प्रचार अभियान तक एक खास किस्म का स्टीरियोटाइप प्रचार किया गया।इसमें खासकर ईयू देशों के माइग्रेंट वर्करों को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की गयी,इसके अलावा आईएसआईएस के खतरे को खूब उछाला गया ,यह कहा गया कि ईयू के सस्ते मजदूरों,घरों की कमी,खस्ता हाल जनसेवाओं के कारण ब्रिटेनवासी परेशान हैं।

तथ्य यह है कि ईयू के मजदूर ज्यादा टैक्स देते थे,इसकी तुलना में उनको लाभ कम मिलता था,सेवाएं कम मिलती थीं।ब्रिटेन के शासन को उनसे सालाना 2बिलियन पॉण्ड का लाभ मिलता था।ब्रिटेन में घरों की कमी और महंगे मकानों का सबसे बड़ा कारण नव्य आर्थिक उदार नीतियां और लोभी मकान मालिकों का रवैय्या है।

विगत 25सालों नव्य आर्थिक उदारीकरण के कारण निजीकरण और कल्याण के कामों में सरकारी निवेश में आई कटौती के कारण जनसेवाएं पूरी तरह खस्ताहाल होकर रह गयी हैं।इन सबके खिलाफ वहां कोई न तो आंदोलन हुआ और न सरकार ने ही कोई कदम उठाए,इसके कारण जनसेवाएं लगातार महंगी होती चली गयी हैं।

एक जमाना था ब्रिटेन कल्याणकारी राज्य था लेकिन विगत 25 सालों से नव्य आर्थिक नीतियां लागू होने के बाद से वह बाजार का राज्य हो गया है।अब कल्याण की बजाय बाजार के हितों को ध्यान में रखकर फैसले लिए जाते हैं।इसी तरह नव्य आर्थिक नीतियों का अनुकरण करने के कारण यूरोप भी बदला है,पहले सामाजिक यूरोप था,अब मुक्त बाजार यूरोप है।इसके कारण मजदूरों के हितों,मजूरी और अवस्था पर लगातार हमले बढ़े हैं।यही वह बृहद परिप्रेक्ष्य है जिसमें ब्रिटेन में जनमत संग्रह हुआ है।

ब्रिटेन के जनमत संग्रह की सबसे बड़ी कमी यह थी कि इसमें मतदाता के सामने दो ही विकल्प थे,कायदे से दो से अधिक विकल्प रहते तो बेहतर होता,मसलन् यह विकल्प था कि यूरोपीय यूनियन में रहोगे या निकलोगे,असल में ये दोनों विकल्प समस्यामूलक हैं और इनमें से कोई भी विकल्प मूल समस्या को सम्बोधित नहीं करता।



यूरोपीय यूनियन और ब्रिटेन दोनों ने कल्याणकारी राज्य का रास्ता त्यागकर बैंकरों और कारपोरेट घरानों के हितों की सेवा करने का मार्ग अपना लिया,जिसके कारण समूचे यूरोप और ब्रिटेन में अशांति फैली हुई है।ब्रिटेन की अशांति जनमत संग्रह से कम होने वाली नहीं है।क्योंकि जनमत संग्रह तो नव्य आर्थिक उदारीकरण की नीतियों को हटाने की मांग नहीं कर रहा।बैंकरों और कारपोरेट घरानों की साजिशों से जन्मी समस्याओं को जनमत संग्रह सम्बोधित नहीं करता।बैंकरों और कारपोरेट घरानों को राष्ट्र की संप्रभुता से ऊपर स्थापित किया गया है। जनमत संग्रह से इसे चुनौती नहीं मिलती।आज वास्तविकता यह है कि बैंकरों-कारपोरेट घरानों की सत्ता के मातहत राष्ट्र की सभी शक्तियों को रख दिया गया है।एक जमाना था आम जनता की शक्तियों को सर्वोपरि दर्जा हासिल था आजकल बैंकरों और कारपोरेट घरानों को सर्वोपरि दर्जा हासिल है।जनता के हितों के ऊपर मुनाफे के हितो को सर्वोच्च बना दिया गया है।लोकतंत्र को बैंकरतंत्र बना दिया गया।जनमत संग्रह में पेश दोनों विकल्प इस समस्या को स्पर्श ही नहीं करते।इसलिए जनमत संग्रह से बेहतर ब्रिटेन के निकलने की कोई संभावना नहीं है।

मोदी का भयाक्रांत लोकतंत्र

                मोदी के सत्तारूढ होने के बाद "लोकतंत्र" का "भयाक्रांत लोकतंत्र " में रूपान्तरण करने की कोशिशें हो रही हैं।इस खतरे को गंभीरता से लेने की जरूरत है।मोदीजी चाहते हैं लोकतंत्र,लेकिन साथ में यह भी चाहते हैं कि लोग भयभीत होकर रहें।हमें "भयाक्रांत लोकतंत्र" के समूचे तानेबाने को तोड़ना होगा और "वास्तव लोकतंत्र" स्थापित करने की दिशा में बढ़ना होगा।

सच यह है दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अकेले इस पहलू की ओर विभिन्न बयानों के जरिए ध्यान खींच रहे हैं लेकिन विपक्ष उसे गंभीरता से नहीं ले रहा है।"भयाक्रांत लोकतंत्र " बहुत ही भयानक अवस्था है इसकी परिकल्पना संविधान में भी नहीं है,यह फासीवाद की हरकतों और लक्षणों से भिन्न है।

मोदीजी का "भयाक्रांत लोकतंत्र" वस्तुतःसत्ता को दलीय आधार पर देखता है। सत्ता को दल के आधार पर देखना,संसद में बहुमत के आधार पर देखना,उसके आधार पर सत्ता , संसाधनों और नीतियों का डंडे के बल पर अमल कराना मुख्य विशेषता है।आम जनता के आधार पर सत्ता को न देखना,इसकी मुख्य विशेषता है। जबकि सत्ता का आधार है आम जनता,लेकिन मोदीजी के सत्ता में आने के बाद से सत्ता का समूचा खेल बदल गया है। वे रीयल लोकतंत्र के मानकों,मूल्यों और मान्यताओं पर निरंतर हमले कर रहे हैं। वे आम जनता के जीवन में मच रही तबाही की अनदेखी कर रहे हैं और बार बार अपनी निजी उपलब्धियां गिना रहे हैं,मीडिया का व्यापक तौर पर इसके लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।मीडिया में वे खबरें एकसिरे से नदारत हैं जो आम जनता के कष्टों से जुड़ी हों।सारा मीडिया "भयाक्रांत लोकतंत्र " की चपेट में है।वे कोई भी मसला उठाते हैं तो उन्मादी ढ़ंग से उठाते हैं।मसलन् ,देश योग करे यह भी उन्मादी ढ़ंग से संप्रेषित करते हैं।

लोकतंत्र में उन्माद कैंसर है।"भयाक्रांत लोकतंत्र" का उन्मादी प्रचार सबसे प्रभावशाली हथियार है।मोदीजी के राष्ट्रीय क्षितिज पर आने के बाद कोई भी नीति सामान्य रूप में लागू नहीं हुई है।वहीं दूसरी ओर आम जनता के पहले से अर्जित हकों,कार्यक्रमों आदि पर सुनियोजित हमले हो रहे हैं और उनको बंद किया जा रहा है। "भयाक्रांत लोकतंत्र" का मुख्य लक्ष्य हैं गरीब,आदिवासी,किसान और शिक्षित समाज,अपने अब तक के नीतिगत आदेशों के जरिए इन वर्गों को आतंकित करने में वे व्यस्त हैं।



मोदीजी के "भयाक्रांत लोकतंत्र" की राजनीति व्यक्तिकेन्द्रित है।मोदीजी ने पंडित नेहरू ,सोनिया आदि व्यक्तियों के खिलाफ घृणा प्रचार करते हुए अपना राजनीतिक स्पेस बनाया और समूचे प्रचार और सत्ता तंत्र को मोदीकेन्द्रित बनाकर रख दिया है।इस मॉडल में पक्ष-विपक्ष और प्रचार में व्यक्ति ही मुख्य है।मसलन्,पटेल मुख्य हैं,उनकी राजनीति गौण है।यह निकृष्ट किस्म का व्यक्तिवाद है जो व्यक्ति को उसकी राजनीति से अलग रखकर देखता है।यह नेताकेन्द्रित राजनीति का सबसे घटिया मॉडल है।इस मॉडल में नेता ही महान है और नेता ही अधम है।भयाक्रांत लोकतंत्र अपने लिए जन समर्थन जुटाने के लिए आमतौर पर अविवेकवादी औजारों का प्रयोग करता है।



मंगलवार, 21 जून 2016

योग - संयोग और शासन

मैं योग दिवस के पक्ष में हूँ !!मैं बाबा रामदेव आदि के भी पक्ष में हूँ! क्योंकि इन लोगों ने योग को मासकल्चर का अंग बना दिया, कल तक योग ,कल्चर का अंग था। मैं बाबा रामदेव और मोदीजी से बहुत ख़ुश हूँ कि उन्होंने योग को ग्लोबल ब्राण्ड बना दिया। पूँजीवादी विरेचन का हिस्सा बना दिया।

योग करने के कई फ़ायदे हैं जिनको योगीजन टीवी पर बता रहे हैं।लेकिन सबसे बडा फ़ायदा है कि वह अब सरकारी फ़ैशन, सरकारी जनसंपर्क और सरकारी जुगाड़ का अंग बन गया है। योग आसन था लेकिन अब योग शासन है।पहले योग स्वैच्छिक था कल अनिवार्य होगा!केन्द्र सरकार से लेकर तमाम देशी -विदेशी सरकारों तक योग अब शासन का अंग है ,यूएनओ कोई जनसंगठन नहीं है वह सत्ताओं का संगठन है। योग को ११७ देशों का समर्थन है योग अब आसन नहीं शासन की क्रिया है!

माकपावालो बंगाल लाइन भ्रष्ट लाइन

       माकपा का संकट कम होने का नाम नहीं ले रहा।समूची पोलिट ब्यूरो और केन्द्रीय कमेटी भ्रष्ट बंगाल माकपा यूनिट को बचाने में लगी है।जिस बंगाल लाइन को लेकर हंगामा मचा है उसके लिए मेनीपुलेशन और इस्तेमाल का आधार तो विगत सीसी और पीबी ने ही तैयार किया था।संध्याभाषा में बंगाल में मोर्चा बनाने का जो आह्वान किया गया उसके ही गर्भ से बंगाल लाइन निकली है।मीडिया की मानें तो इसके निर्माता हैं बुद्धदेव भट्टाचार्य,सूर्यकांत मिश्रा,गौतमदेव,मोहम्मद सलीम।इन चार नेताओं ने गंभीरता के साथ बंगाल लाइन को लागू किया,इसके अलावा इसे लागू करने में पश्चिम बंगाल के सभी पोलिट ब्यूरो और केन्द्रीय समिति सदस्य अग्रणी भूमिका निभाते रहे हैं। कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास में यह विरल घटना है कि पार्टी ने किसी दल के साथ समझौता किया या मोर्चा बनाया या सीटों पर समझौता किया लेकिन उसके बारे में पोलिट ब्यूरो,केन्द्रीय कमेटी और राज्य कमेटी किसी ने भी आधिकारिक तौर पर कोई लिखित बयान जारी नहीं किया,हमने इस संदर्भ में फेसबुक पर लिखा भी था। लिखिततौर पर बयान जारी न करके दलीय समझौता करके चुनाव लड़ना स्वयं में अनैतिक ,नीतिहीन और भ्रष्ट आचरण है।

सवाल यह है बंगाल लाइन आई कहां से और क्यों आई ॽ बंगाल लाइन का स्रोत है पार्टी का भ्रष्टतंत्र।मैंने करीब से इस भ्रष्टतंत्र को देखा है ।माकपा में भ्रष्ट दलतंत्र का जन्म ज्योति बाबू के शासनकाल में ही हुआ।इसकी उस जमाने में विनयकृष्ण चौधुरी और नृपेन चक्रवर्ती जैसे धाकड़ नेताओं ने जमकर आलोचना की,अफसोस की बात है कि उनकी आलोचना की ओर किसी ने द्यान नहीं दिया और पार्टी ने सामूहिकतौर पर अनुशासनभंग करने के नाम पर इन दोनों नेताओं को आम जनता में अपमानित किया और अनुशासनात्मक कार्रवाई की गयी।

34साल तक शासन के बाद माकपा में यह भावना और आदत गहरे जड़ जमा चुकी है कि वे तो सरकार के लिए बने हैं और उनको हर हालत में सरकार में ही होना चाहिए। यहां तक कि पार्टी मेम्बरों में भी यही भावना बनी कि वे सरकार के लिए बने हैं।यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से माकपा मेम्बरों का चरित्र गठन हुआ।संयोग से ममता ने 2011 में वाम मोर्चे को हराकर विधानसभा कब्जे में कर ली,यह स्थिति माकपा के सदस्य झेलने को तैयार नहीं थे,देखते ही देखते रातों-रात बगैर किसी विवाद के हजारों माकपा सदस्यों और हमदर्दों ने ममता का दामन धाम लिया,ममता का दामन थामने का यह सिलसिला अभी भी जारी है।इसका प्रधान कारण है माकपा का विचारधाराहीन पार्टी में रूपान्तरण,34साल के शासन के दौरान माकपा ने सचेत रूप से कम्युनिस्ट विचारधारा का त्याग किया और सत्ता की विचारधारा को अपने सदस्यों में प्रचारित किया,इसके कारण माकपा एक कम्युनिस्ट दल की बजाय सत्ताधारी दल के रूप में परिवर्तित हो गयी,यह स्थिति लगातार बद-बदतर अवस्था की ओर ले गयी।माकपा यह भूल गयी कि वह कम्युनिस्ट दल है,संघर्ष के लिए बनी पार्टी है,उसने सचेत रूप से सत्ता के संस्थान के रूप में यहां पर अपना विकास किया और यही वह बृहत्तर प्रक्रिया है जिसने माकपा को नीतिहीन दल के रूप में परिणत करके रख दिया।नंदीग्राम आंदोलन के समय और उसके पहले भी मैंने निजी तौर पर इस पहलू पर बहुत लिखा था जिसके कारण मेरी तीखी आलोचना हुई और माकपाईयों ने मेरा बड़े पैमाने पर अपमान किया,सामाजिक बहिष्कार किया और सारी प्रशासनिक मशीनरी का दुरूपयोग मेरे खिलाफ किया।



मैं निजी तौर पर मार्क्सवाद को पसंद करता हूं जिसके कारण मुझे वाम अच्छा लगता है लेकिन इसका कतई मतलब नहीं है कि मैं माकपा के बारे में अपनी दो-टूक राय व्यक्त न करूँ,मैंने जबभी उचित समझा जमकर माकपा की खुली आलोचना की और उसकी कीमत भी दी,दुखद बात यह है कि माकपा जैसे सुंदर दल को लीडरशिप ने सचेत रूप से नष्ट किया है।आज स्थिति यह है कि बंगाल में माकपा की कोई साख नहीं है।ममता के महान भ्रष्टाचार,हिंसाचार आदि के बावजूद आम जनता माकपा पर विश्वास नहीं करती।कायदे से बंगाल लाइन के नाम पर जो घोटाला हुआ है उसके लिए पश्चिम बंगाल की पूरी पार्टी को भंग किया जाना चाहिए और निचले स्तर से लेकर राज्य स्तर तक नए सिरे से पार्टी का निर्माण किया जाना चाहिए।

रविवार, 19 जून 2016

न्याय की गुलामी

         विचारों की दरिद्रता कहें या फिर गुलामी कहें न्यायपालिका की प्रशंसा करते थकते नहीं हैं,सच यह है न्याय प्रक्रिया एकदम भ्रष्ट और उत्पीड़नकारी है,इ सके बावजूद न्यायपालिका की प्रशंसा बढती ही जा रही है।यही है हमारे समाज का संकट ।वह सच को देखने,और सच बोलने से डरता है।
हम सब जानते हैं अदालतों में हर ईंट घूस खाती है लेकिन कभी. कोई पकडा नहीं गया।वकील बेहिसाब पैसे लेते हैं लेकिन कोई नियमन नहीं है।अदने से अहलकार से लेकर पेशकार तक सब पैसे लेते हैं,बिना पैसे लिए कोई काम नहीं करता,इसके बावजूद कभी कोई बोलता नहीं है,सिस्टम चलाने वालों से लेकर जजों तक सबको मालूम है कि पेमेंट की दर क्या है,जब न्यायपालिका भ्रष्ट होगी तो देश भी भ्रष्ट होगा,न्याय दुर्लभ होगा।न्याय कभी समय पर नहीं होगा।जिस देश में न्याय समय पर न हो,जल्दी फैसले न हों तो उस देश का अपराधीकरण तो होगा ही।

पेशेवर लोगों में कभी वकील और जजों को भी आलोचनात्मक नजरिए से देख लिया करो।वकील और जज के पेशे में दिन प्रतिदिन स्वस्थ मूल्यों की गिरावट आई है,जगह जगह राजनीतिक गिरोह बनाकर वकील काम कर रहे हैं। हर दल का वकीलों में नेटवर्क है।जब वकील नेटवर्क का अंत बनेंगे तो न्यायपालिका अपाहिज होगी।इसी तरह संवैधानिक मूल्य,मान्यताएं सबसे ज्यादा दैनंदिन आचरण से नष्ट होते हैं,इस मामले में भी अधिकांश वकीलों का आचरण ईमानदारी भरा नहीं है।इसमें सबसे करप्ट रूप है वकील की फीस का पेमेंट।इसका कोई मानक नहीं है,अकल्पनीय मनमानी है इस मामले में।


दूसरी ओर जजों के फैसले असभ्यों के तर्कों या फासिस्ट मीडिया के तर्कों के सहारे जब लिखे जाने लगे हैं। न्याय को सभ्यता का अंग होना चाहिए लेकिन कई न्यायाधीशों पर इन दिनों पापुलिज्म का दबाव बहुत है।हाल में कई इस तरह के फैसले आए हैं जिनमें भारत के फासिस्टों और नरसंहार करने वालों के तर्कों को आधार बनाकर जजमेंट आए हैं।इस तरह के लक्षणों को गुजरात से लेकर जेएनयू तक के मामलों में आए अनेक फैसलों में देखे जा सकते हैं।

मुफ़्तख़ोर आतंकी जुनून

          श्रीनगर के पुराने शहर यानी डाउनटाउन इलाक़े में आज भी विलक्षण पुराने क़िस्म की रमणीयता नज़र आती है। छोटी गलियाँ, छोटे पुराने घर,सामान्य और सरल क़िस्म के लोग, पुराने क़िस्म की दुकानें, पुरानी तहज़ीब इसके समूचे परिवेश में फैली हुई है।एक ख़ास क़िस्म की अनौपचारिकता और मधुरभाव यहाँ की तहज़ीब में सहज ही महसूस कर सकते हो।
पुराने शहर का बाज़ार जब बंद हो जाता है तब गलियों का सौंदर्य नज़र आता है। लेकिन जब बाज़ार खुला होता है तो लोगों से भरा, माल से भरा लगता है। मैं जब फ़ोटो खींच रहा था तो एक बुज़ुर्ग ने कहा हमारी ग़ुरबत यानी ग़रीबी को मत दिखाना। यह वह इलाक़ा है जिसने १९८९ के बाद तक़रीबन २० साल तक चैन नहीं देखा। कब और किस तरह इस शांत इलाक़े में अशांति चली आई यह अपने आपमें सबसे जटिल सवाल है। लोग अभी भी चुप हैं और सही उत्तर खोज रहे हैं।
यहाँ के लोग आज भी वह सुबह याद करते हैं तो भय से काँपने लगते हैं। पुराने शहर का कोई घर नहीं होगा जिसमें पुलिस-बीएसएफ़ या सेना कभी घुसी न हो, कोई घर नहीं है जिसकी अंदर की साँकल -कुंडी -चटखनी लात मार -मारकर सैन्यबलों ने तोड़ी न हो,एक समय तो लोगों ने अंदर से घर बंद करना ही बंद कर दिया । त्रासद पहलू यह था कि इस इलाक़े में एक तरफ़ पाकिस्तान की ओर से अबाध हथियार और पैसा आ रहा था तो दूसरी ओर से भारतीय सेना नव्य आतंकियों से जूझ रही थी। मैं नव्य आतंकी इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ये वे नौजवान थे जो आरंभ में जानते तक नहीं थे कि वे क्या करने जा रहे हैं। एक वाक़या है जिसे समझकर आप स्थिति का अंदाज़ा लगा सकते हैं।
एक दिन अचानक पुराने शहर में सुबह पाँच बजे क़रीब अत्याधुनिक हथियारों से भरा एक ट्रक मुहल्ले के बीच में आकर खड़ा हो गया और उसमें सवार चंद नौजवानों ने आसपास के लोगों से कहा कि जिसे जो हथियार चाहिए वह मुफ़्त में घर ले जाएँ। देखते ही देखते चारों ओर से युवाओं की भीड़ आई और हर घर में बंदूक़ , पिस्तौल, एके ४७ आदि पहुँच गए। देखते ही देखते पुराने शहर में सड़कों और पार्क में युवाओंमें अपने अपने हथियार चमकाने दिखाने की होड़ लग गयी और यही वह प्रस्थान बिंदु है जहाँ से पुराने शहर के अधिकांश युवा अनजाने पाक से भेजे हथियारों की गिरफ़्त में आ गए। जो युवा मुफ़्त हथियार घर ले आए वे जानते ही नहीं थे कि जो मुसीबत वे अपने घर लेकर आए हैं वह उनको किस नर्क तक ले जाएगी। चंद दिनों में ही युवाओं को पुराने शहर में अत्याधुनिक हथियारों से सड़कों पर हवाई फ़ायर करते देखा गया इस समूचे उपक्रम में कब किसने युवाओं के मन में भारत से मुक्त होकर अलग कश्मीर बनाने की बात बिठा दी इसे कोई नहीं जानता।
जिन युवाओं ने मुफ़्त हथियार लिए वे न तो राजनीति जानते थे और नहीं हथियार चलाना जानते थे, वे सब शहरी युवा थे,मुफ़्त के हथियारों के पीछे सक्रिय राजनीति से एकदम अनभिज्ञ थे। आज उन युवाओं में से सैंकड़ों परिपक्व हो गए हैं। वे पिछले दो दशक की पीड़ाओं को आज तक भूल नहीं पाए हैं। वे आज भी आज़ादी का मतलब समझ नहीं पाए हैं। उनके लिए "भारत से आज़ादी का "नारा चंद दिग्रभ्रमित युवाओं द्वारा पाकजनित जुनून में दिया गया नारा था। वे जिस समय मुफ़्त में हथियार लाए तो सतह पर यह मुफ़्त का माल लग रहा था और उसने सामान्य युवा के लोभी मन को अपनी ओर खींच लिया, लेकिन यह विवेक और राजनीति नज़रिए के आधार पर लिया गया फ़ैसला नहीं था।यह बात पुराने शहर का हर शहरी मानता है।

शुक्रवार, 17 जून 2016

आलोचना की समस्याएँ -



हिन्दी में रचनाएँ हैं, रचनाकार भी हैं।लेकिन कोई बहस नहीं है।एक ज़माना था हमारे पास नामवर सिंह ,रामविलास शर्मा थे, लेकिन आज आलोचक नहीं है। आज के लेखक के पास जीवन के व्यापक अनुभव हैं और उन पर वह जमकर लिख रहा है।वह अपनी अनुभूतियों से इस तरह चिपका हुआ है कि वह निजी अनुभूतियों के परे कुछ भी देख नहीं पा रहा। इस पूरे परिदृश्य में यह सवाल उठा है कि क्या साहित्य के लिए अनुभूतियों का होना ही ज़रूरी है ? क्या दुख या उत्पीड़न के अनुभवों के आधार पर ही महान रचना बन सकती ? ग़ौर से सोचें नामवरजी ने भी दुख देखा है, ग़रीबी भी देखी है, लेकिन क्या ग़रीबी और दुख की अनुभूति या उसे देखने मात्र से बेहतरीन साहित्य रचा जा सकता है ? कहने का आशय यह कि लिखने के लिए अनुभूति के अलावा भी चीज़ें चाहिए। अनुभूतियों अलावा सबसे बड़ी चीज़ है विचारधारा , लेकिन लेखक के पास जब तक एक सुसंगत वैचारिक दृष्टि न हो वह चीज़ों को देख ही नहीं सकता।दूसरी चीज़ चाहिए अकादमिक अनुशासन।अनुभूति, वैचारिकदष्टि और अकादमिक अनुशासन इन तीनों चीज़ों के सहमेल से साहित्य का सर्जनात्मक फलक बनता है।
अभी जितने बडे पैमाने पर लेखन आ रहा है वैसा लेखन प्रवाह पहले कभी नहीं देखा गया, इस प्रवाह में बहुत कुछ "लेखन के लिए लेखन"की तर्ज़ पर लिखा हुआ है।

आलोचना के अनुपलब्ध क्षेत्र-

भारत में चार बडे पैराडाइम शिफ़्ट हुए हैं, पहला है लोकतंत्र का उदय,दूसरा,भारत विभाजन,तीसरा है आपातकाल और चौथा है इंटरनेट -डिजिटल क्रांति । सवाल यह है कि हिन्दी साहित्य और आलोचना इन चारों पैराडाइम को कैसे अभिव्यंजित करती है ।
पहले हिंसा थी इन दिनों डिजिटल हिंसा है।पहले कम्युनिकेशन था आज नेट कम्युनिकेशन है।अहिंसा का व्यापक चित्रण है लेकिन मानवतावाद ग़ायब है। पहले अभिव्यक्ति थी अब कोलाहल है।अब चुप रहनेवालों की निंदा ख़ूब होती है। पहले किताब आती थी अब किताब का इवेंट्स होता है। किताब पर बातें कम और इवेंट्स पर बातें ज़्यादा होती हैं।इन दिनों हिंसा पर टीवी या नेट पर आलोचना ज़्यादा दिखती है नीचे ज़मीनी स्तर पर आलोचना नज़र नहीं आती।यह एक तरह से हाइपर वायरलेंस है।उसी तरह स्त्री भी हाइपर सैक्सुअलिटी में रूपान्तरित हो गयी है। अब हम स्त्री के नहीं हाइपर स्त्री के रूपों और विमर्शों में उलझे हैं।फलत: रीयल औरत और रीयल हिंसा को लेकर यथार्थजीवन में चुप्पी साधे हैं। इसी तरह आजाद भारत में दंगे कभी आलोचना का मूल विषय नहीं बन पाए।साम्प्रदायिकता के वैचारिक स्वरूप पर तो लिखा गया लेकिन दंगा पीड़ितों पर कुछ भी नहीं लिखा गया।दंगाई संगठनों की सांगठनिक और वैचारिक सारणियों को हमने कभी खोला तक नहीं। भारत विभाजन हमारे समाज का सबसे भयानक पहलू है लेकिन आलोचना उस पर चुप है, यह चुप्पी क्यों? इस सवाल को बहसयोग्य क्यों नहीं माना गया ? इससे भी भयानक पहलू है दोनों विश्वयुद्ध का समीक्षा से ग़ायब रहना, अकाल का मुख्य एजेंडा न बन पाना ।

यथार्थहीन समीक्षा -

सवाल यह है क्या अकाल, दो विश्वयुद्ध और भारत विभाजन के बिना आधुनिककाल और आधुनिक समीक्षा पर बातें करना संभव है। आलोचना का काम है अनुपब्ध को उपलब्ध कराना। लेकिन अधिकतर मामलों में आलोचना उपलब्ध को ही उपलब्ध कराती रही है। युद्ध और भारत विभाजन ने अमानवीकरण के सवालों को केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया लेकिन हमने अमानवीकरण पर बातें ही नहीं कीं।साहित्य और मानवीयता के अंतस्संबंधपर विचार करने की बजाय अन्य मसलों पर बहस करते रहे।अत:इसे "यथार्थहीन समीक्षा" कहना समीचीन होगा। "यथार्थहीन समीक्षा" वह है जिसमें समसामयिक सामाजिक जीवन नदारत है। यह जीवंत यथार्थ से संवाद नहीं करती।यह ऐसी आलोचना है जो पब्लिक ओपिनियन नहीं बनाती ।यह लोकतांत्रिक संस्थानों की समस्याओं को नहीं उठाती।
हिन्दी आलोचकों ने स्थिर यथार्थ पर ख़ूब लिखा है, लेकिन रूपान्तरित यथार्थ पर कम लिखा है।रूपान्तरित यथार्थ के सवालों का वर्तमान से संबंध है जबकि स्थिर यथार्थ का अतीत से संबंध है।टीवी इमेजों से प्रभावित आक्रामकता का अभिव्यक्ति के रूपों के साथ गहरा संबंध है।टीवी से प्रभावित समीक्षा और इमेज स्वभक्षक है।यह लेखक और आलोचक के स्थान को छीन रही है।
मज़ेदार बात है कि साहित्य और समीक्षा की किताबें आ रही हैं, तरह तरह के विषयोंपर प्रस्तुतियाँ आ रही हैं, लेखकों के जमघट लग रहे हैं , साहित्यमेले हो रहे हैं लेकिन हार्दिकता और संवेदनाएँ ग़ायब हैं। साहित्य की इस तरह की हृदयहीन प्रस्तुतियाँ ने व्यापक फलक को घेर लिया है।आज आलोचना और साहित्य की यह सबसे बड़ी चुनौती है कि वह वर्तमान के ज्वलंत सवालों पर बोले। वह उन विषयों पर समर्पण न करे जो मीडिया या सत्ता निर्मित हैं या फिर तात्कालिकता के दबाव में हैं। वह सवालों से भी बचे जो कुछ क्षण बाद ख़त्म हो जाते हैं। आलोचना और कला में रीयल सवाल ग़ायब हुए हैं उसके दो बडे कारण हैं, पहला, भूमण्डलीकरण और दूसरा है तकनीकी-वैज्ञानिक प्रौपेगैण्डा ।इन दोनों ने मिलकर एक ऐसे समाज का निर्माण किया है जो वास्तविकता से नहीं मिलता।इन दोनों के कारण यथार्थ की बजाय निर्मित यथार्थ सामने आया , मनुष्य ग़ायब हो गया है।

यहाँ उदाहरण के लिए निर्मल वर्मा के लिखे आलोचना निबंधों को लें, जब यह भाषण दिया गया तो देश को आजाद हुए ५० साल हो गए थे। उस मौक़े पर उन्होंने विषय चुना " मेरे लिए भारतीय होने का अर्थ " सतह पर देखने पर यह विषय सुंदर है लेकिन , निर्मल वर्मा के यहाँ भारत और भारतीयता की धारणा स्थिर और सामयिक सच से कोसों दूर है, " भारतीय" और " भारतीयता " या किसी भी अवधारणा का सामयिकता और प्रक्रियाओं से संबंध होता है ? यदि हाँ तो निर्मल वर्मा ने इस ओर ध्यान क्यों नहीं दिया ? भारतीयता या देशप्रेम या राष्ट्र राज्य आदि की धारणाएँ प्रक्रिया में ही समझी जा सकती हैं ।
(जामिया मिलिया में आज रिफ्रेशर कोर्स में दिए व्याख्यान का अंश)


शुक्रवार, 3 जून 2016

लिबरल कश्मीर से गुज़रते हुए



कश्मीर के बारे में जब भी बातें होती हैं तो मीडिया निर्मित मिथ हमेशा दिमाग़ में छाए रहते हैं। अपनी कश्मीर यात्रा के दौरान जिस कश्मीर को क़रीब से देखा है वह मीडिया निर्मित धारणाओं से एकदम मेल नहीं खाता।यह भी कह सकते हैं कश्मीर अपनी नई पहचान बना रहा है। मसलन्, कश्मीर के विभिन्न जिलोंके  इलाक़ों और मुहल्लों आदि में घूमते हुए , आम लोगों से बातें करते हुए यह एहसास पैदा हुआ कि हम कश्मीर के बारे में जो कुछ जानते हैं वह इकतरफ़ा और स्टीरियोटाइप है, इस स्टीरियोटाइप समझ को बनाने में मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका रही है।
       इस प्रसंग में पहली धारणा मुसलमान की है। कश्मीर के मुसलमानों को कठमुल्ला और पृथकतावादी के रूप में जमकर चित्रित किया गया है जो कि एक सिरे से ग़लत है। हमने गलियों और मुहल्लों से लेकर श्रीनगर के हलचल भरे इलाक़ों में घूमकर देखा और पाया कि अधिकतर मुसलमान दिखने में वैसे नहीं हैं जैसी इमेज हमारे ज़ेहन में मीडिया ने बनायी है। ज़्यादातर कश्मीरी युवा मुसलमान फ़ैशन की ओर बढ़ रहे हैं। वे फ़ैशनेबल बालों को रखते हैं।बढ़ी हुई दाढी और टिपिकल मुस्लिम ड्रेस अब गुज़रे ज़माने की चीज़ हो गयी है,बहुत कम लोग हैं जो दाढी रखते हैं या पठान ड्रेस पहनते हैं।अधिकतर मुसलमान पैंट शर्ट , टी शर्ट आदि पश्चिमी कपड़े पहनते हैं। यह वह ड्रेस है जो आम हिन्दुस्तानी पहनता है।
यही हाल औरतों का है,अधिकांश औरतें बुर्क़ा नहीं पहनतीं। बहुत कम संख्या में मुस्लिम लड़कियाँ बुर्क़ा पहनती हैं। हाँ औरतें चुन्नी से सिर ज़रूर ढकती हैं।मजेदार बात यह है कि मुस्लिम लड़कियों में कपड़ों के फ़ैशन दिखाने का चलन बढ़ रहा है, ख़ासकर उन औरतों में यह चलन ज़्यादा है जो बुर्क़ा पहनती हैं।बुर्क़ा पहनने वाली मुस्लिम औरतें कीव पहनती हैं जिसमें काले कीव से सिर्फ़ मुँह ढका रहता है लेकिन बाक़ी शरीर के वस्रों के फ़ैशन को सभी देख सकते हैं।
      कश्मीर में विभिन्न इलाक़ों में मुस्लिम लड़कियों में प्रेम विवाह करने का रूझान बढ़ा है। श्रीनगर- पहलगाम-गुलबर्ग में मोटर साइकिल में प्रेमी युगलों को सहज ही देखा जा सकता है।देर रात गए रेस्टोरेंट में खाना खाते मुसलिम युवक- युवतियों को देखा जा सकता है। यह वह मुसलमान है जो लिबरल है। जिसकी दिलचस्पी अस्मिता की राजनीति में नहीं है बल्कि उसकी रूचि इच्छाओं में है। पहचान की राजनीति से निकलकर कश्मीरी मुसलमान इच्छाओं की राजनीति करने लगा है।उपभोग करना और शांति से रहना उसकी स्वाभाविक प्रकृति है।वह हर तरह के झगड़ों से दूर इच्छाओं और आकांक्षाओं के सवालों पर बातें कर रहा है।यह बुनियादी तौर पर लिबरल मुसलमान है और यही  आज के कश्मीर का सच है।