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September, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

राष्ट्रवादी नंगई के प्रतिवाद में

कल से मोदी के अंधभक्तों ने फेसबुक से लेकर टीवी चैनलों तक जो राष्ट्रवादी नंगई दिखाई है वह शर्मनाक है।ये सारी चीजें हम सबके लिए बार-बार आगाह कर रही हैं कि देश को हमारी जनता ने कितने खतरनाक लोगों के हाथों में सौंप दिया है.इससे एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि टीवी न्यूज चैनल समाचार देने के लक्ष्य से काफी दूर जा चुके हैं।जो लोग मोदी के हाथों में देश को सुरक्षित देख रहे थे ,वे भी चिन्तित हैं कि किस कम-अक्ल नेता के पल्ले पड़े हैं !

सवाल किए जा रहे है आप सर्जीकल स्ट्राइक के पक्ष में हैं ॽआप इसका स्वागत करते हैं ॽमेरा मानना है ये दोनों ही सवाल बेतुके और गलत मंशा से प्रेरित हैं। लेखकों-बुद्धिजीवियों और अमनपसंद जनता कभी भी इस तरह के सवालों को पसंद नहीं करती।लेखक के नाते हम सब समय जनता के साथ हैं और शांति के पक्ष में हैं।हमारे लिए राष्ट्र,राष्ट्रवाद,सेना आदि से शांति का दर्जा बहुत ऊपर हैं।जेनुइन लेखक कभी भी सेना ,सरकार और युद्ध के साथ नहीं रहे।जेनुइन लेखकों ने हर अवस्था में आतंकियों और साम्प्रदायिक ताकतों का जमकर विरोध किया।सिर्फ भाड़े के कलमघिस्सु ही युद्ध और उन्माद के पक्ष में हैं …

वे 27साल और कलकत्ते का हिन्दी छंद

आज से 27 साल पहले कलकत्ते में मेरी शिक्षक के रूप में पहली और आखिरी पक्की नौकरी लगी। कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में 22अप्रैल 1989 को प्रवक्ता के रूप में मैंने नौकरी आरंभ की।बाद में सन् 1993 में रीडर और 2001 में प्रोफेसर बना। जिस समय नौकरी आरंभ की थी तो मेरे पास 2शोध डिग्रियां थीं,उनके शोध –प्रबंध थे,वे अप्रकाशित थे।जेएनयू में पढ़ने और छात्र राजनीति में सक्रिय रहने के कारण सारे देश में कमोबेश प्रगतिशील खेमे से जुड़े लोग मुझे जानते थे।मैं शुरू से ही रिजर्व प्रकृति का रहा हूँ।कोई बोलता है तो बोलता हूं,हलो करता है तो हलो करता हूँ,अधिकतम समय घर पर रहना और पढ़ना-लिखना,यही मेरी दिनचर्या रही।इस चक्कर में कलकत्ते में 27साल तक रहने के बाद भी मैं न तो बहुत सारे लोगों को नहीं जानता और न मेरी मित्रता है।

मैं जब दिल्ली में जेएनयू में पढ़ता था तो 1979 से 1987 के बीच में मेरा अधिकतर समय जेएनयू कैम्पस में ही गुजरा,दिल्ली के लेखकों में बहुत कम आना जाना होता था,जब कभी जनवादी लेखक संघ के ऑफिस जाता तो वहां लेखकों से मुलाकात हो जाती थी,बातें हो जाती थीं।उससे ज्यादा लेखकों से मिलने का मौका मुझ…

दिल्ली की बर्बरता का रहस्य

दिल्ली ने बर्बरता के नए मानक बनाए हैं।दिल्ली में केन्द्र सरकार है,संसद है,सुप्रीम कोर्ट है, पुलिस है,सेना है,सबसे ज्यादा लेखक-बुद्धिजीवी है,राजनीतिक नेताओं का जमघट है।आईआईटी,एम्स,जामिया,डीयू जैसे संस्थान हैं। लेकिन दिल्ली में बर्बर समाज है।ऐसा बर्बर समाज जिसकी रोज दिल दहलाने वाली कहानियां मीडिया में आ रही हैं,आखिर दिल्ली इतनी बर्बर कैसे हो गयी,एक सभ्य शहर असभ्य और बर्बर शहर कैसे हो गया,इसके लक्षणों पर हम बहस क्यों नहीं करते,दिल्ली में बर्बरता के खिलाफ आम लोगों का गुस्सा कहां मर गया,वे कौन सी चीजें हैं जिनसे दिल्ली में बर्बर समाज बना है,वे कौन लोग हैं जो बर्बरता के संरक्षक हैं,क्या हो गया दिल्ली में सक्रिय राजनीतिकदलों और स्वयंसेवी संगठनों को.वे चुप क्यों हैं ?

दिल्ली के बर्बर समाज का प्रधान कारण है दिल्ली के लोगों और संगठनों का दिल्ली के अंदर न झांकना,दिल्ली से अलगाव,स्वयं से अलगाव, वे हमेशा दिल्ली के बाहर झांकते हैं,बाहर जो हो रहा है,उस पर प्रतिक्रिया देते हैं,वे मानकर चल रहे हैं कि दिल्ली में तो सब ठीक है,गड़बड़ी तो यूपी-बिहार-हरियाणा-पंजाब आदि में है,वे मानकर चल रहे …

युद्ध का मतलब है राजनीतिक पराभव !

कल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब कोझीकोड में बोल रहे थे तो उनके चेहरे पर चिन्ताएं साफ नजर आ रही थीं,उनकी स्वाभाविक मुस्कान गायब थी,उनके ऊपर मीडिया का उन्मादी दवाब है।यह उन्मादी दवाब और किसी ने नहीं उनकी ढोल पार्टी ने ही पैदा किया है।इसे स्वनिर्मित मीडिया कैद भी कह सकते हैं। यह सच है कि भारत ने आतंकियों के उडी में हुए हमले में अपने 18बेहतरीन सैनिकों को खोया है।ये सैनिक न मारे जाते तब भी मीडिया उन्माद रहता।क्योंकि मोदी सरकार के पास विकास की कोई योजना नहीं है,उनकी सरकार को ढाई साल होने को आए वे अभी तक आम जनता को यह विश्वास नहीं दिला पाए हैं कि वे अच्छे प्रशासक हैं।अच्छे प्रशासक का मतलब अपने मंत्रियों में आतंक पैदा करना नहीं है,उनके अधिकार छीनकर पंगु बनाना नहीं है।मोदी ने सत्ता संभालते ही सभी मंत्रियों को अधिकारहीन बनाकर सबसे घटिया प्रशासक का परिचय दिया और आरंभ में ही साफ कर दिया कि वे एक बदनाम प्रधानमंत्री के रूप में ही सत्ता के गलियारों में जाने जाएंगे।

मैंने आज तक एक भी ऐसा अफसर नहीं देखा जो उनकी कार्यशैली की प्रशंसा करता हो।उनकी कार्यशैली ने चमचाशाही पैदा की है।नौकरशाहों म…

कम्प्यूटर युग में हिन्दी

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सरकार की आदत है वह कोई काम जलसे के बिना नहीं करती। सरकार की नजर प्रचार पर होती है वह जितना हिन्दीभाषा में काम करती है उससे ज्यादा ढोल पीटती है। सवाल यह है दफ्तरी हिन्दी को प्रचार की जरूरत क्यों है ॽ जलसे की जरूरत क्यों है ॽ भाषा हमारे जीवन में रची-बसी होती है।अंग्रेजी पूरे शासनतंत्र में रची-बसी है,उसको कभी प्रचार की या हिन्दी दिवस की तरह अंग्रेजी दिवस मनाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। भाषा को जब हम जलसे का अंग बनाते हैं तो राजनीतिक बनाते हैं।हिन्दी दिवस की सारी मुसीबत यहीं पर है।यही वह बिन्दु है जहां से भाषा और राजनीति का खेल शुरू होता है।भाषा में भाषा रहे,जन-जीवन रहे,लेकिन अब उलटा हो गया है। भाषा से जन-जीवन गायब होता जा रहा है।हम सबके जन-जीवन में हिन्दी भाषा धीरे धीरे गायब होती जा रही है,दैनंदिन लिखित आचरण से हिन्दी कम होती जा रही है।भाषा का लिखित आचरण से कम होना चिन्ता की बात है।हमारे लिखित आचरण में हिन्दी कैसे व्यापक स्थान घेरे यह हमने नहीं सोचा,उलटे हम यह सोच रहे हैं कि सरकारी कामकाज में हिन्दी कैसे जगह बनाए।यानी हम हिन्दी को दफ्तरी भाषा के रूप में देखना चाहते हैं !

हिन्दी सरकारी भ…

मित्रता के मायने

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एक जमाना था जब राजनीति देखकर मित्र बनाया जाता था।मित्रता की राजनीति पर बातें होती थीं,केदारनाथ अग्रवाल और रामविलास शर्मा के बीच का मित्र संवाद जगजाहिर है।

मित्रता में राजनीति की तलाश का दौर क्या अब खत्म हो गया है ?मुझे लगता है अब खत्म हो गया है,अब स्वार्थों की मित्रता रह गयी है।यह उत्तर शीतयुद्धीय मित्रता का दौर है।इसमें मित्रता नहीं स्वार्थ बड़ा है।

सबसे अच्छी मित्रता वह है जो अज्ञात से ज्ञात की ओर ले जाए,लेकिन इन दिनों बीमारी यह है कि मित्रता में हम ज्ञात से ज्ञात की ओर ही जाते हैं।इस क्रम में वर्षों दोस्त रहते हैं लेकिन एक-दूसरे से कुछ नहीं सीखते। इस तरह के मित्र अज्ञात से डरते हैं,अज्ञात सामने आता है तो नाराज हो जाते हैं,बुरा मान जाते हैं।मुक्तिबोध के शब्दों में कहें " यह तो अपनी ही कील पर अपने ही आसपास घूमते रहना है।यह अच्छा नहीं है।इसलिए अज्ञात से डरने की जरूरत नहीं है। "

मुक्तिबोध ने मित्रता की पेचीदगियों के समाधान के रूप में बहुत महत्वपूर्ण समाधान पेश किया है,मैं स्वयं भी मुक्तिबोध के समाधान का कायल रहा हूँ और इसका पालन करता रहा हूँ।

मुक्तिबोध के अनुसार- "…

जेएनयू और हम

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मैं१९८०-८१ में जेएनयू छात्रसंघ के चुनाव में कौंसलर पद पर एक वोट से जीता था। वी. भास्कर अध्यक्ष चुने गए।उस समय जेएनयू के बाइस चांसलर वाय. नायडुम्मा साहब थे, वे श्रीमती गांधी के भरोसे के व्यक्ति थे विश्वविख्यात चमड़ा विशेषज्ञ थे। स्वभाव से बहुत ही शानदार, उदार और वैज्ञानिक मिज़ाज के थे। बीएचयू से पढ़े थे।भास्कर के साथ पूरी यूनियन उनसे मिलने गयी, सबने उनको अपना परिचय अंग्रेज़ी में दिया मैंने हिन्दी में दिया , क्योंकि मैं अंग्रेज़ी में परिचय देना नहीं जानता था।
नायडुम्मा साहब अंग्रेज़ी में परिचय सुनते हुए एकाग्र हो चुके थे मैंने ज्योंही हिन्दी में परिचय दिया सारा माहौल बदल गया, वे तुरंत टूटी फूटी हिन्दी में शुरू हो गए और बोले आज मैं कई दशक बाद हिन्दी बोल रहा हूँ। तुमने मेरी बीएचयू की यादें ताज़ा कर दीं। इसके बाद मैं उनसे भास्कर के साथ विभिन्न समस्याओं को लेकर अनेकबार मिला वे भास्कर को बीच में टोकते और कहते जगदीश्वर को बोलने दो, मुझे हिन्दी सुनना अच्छा लगता है कहते इसके बहाने मैं काशी में लौट जाता हूं। वे जानते थे मैं सम्पूर्णानंद वि वि से सिद्धांतज्यौतिषाचार्य कर चुका हूं, मेरा ब…

कश्मीर पर मैनस्ट्रीम मीडिया और बुद्धिजीवी चुप क्यों हैं ॽ

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कश्मीर में कर्फ्यू लगे 70 दिन हो गए। अब 85 लोग मारे जा चुके हैं।लेकिन हमें नहीं मालूम कि वहां क्या हो रहा है,हमारे देश के बुद्धिजीवियों को भी इससे कोई परेशानी नजर नहीं आ रही,किसी भी लेखक संघ ने प्रतिवाद करते हुए आवाज बुलंद नहीं की है,समझ में नहीं आ रहा कि प्रगतिशील लेखक संघ ,जनवादी लेखक संघ आदि संगठनों में कश्मीर को लेकर चुप्पी क्यों है ॽ कश्मीर की पीड़ा हमें तकलीफ क्यों नहीं देती ॽक्या उत्तर प्रदेश या बिहार में दो महिने तक कर्फ्यू लगा रहे तो हम सब इसी तरह चुप बैठे रहते ॽ मुझे बेहद झल्लाहट हो रही है कि हमारे तमाम बेहतरीन बुद्धिजीवी और मानवाधिकार संगठन कश्मीर के मसले पर राष्ट्रीय स्तर पर कोई मुहिम अभी तक क्यों नहीं छेड़ पाए ॽ
          मैं जब कश्मीर में कुछ समय पहले वहां घूमते हुए कश्मीर के बुद्धिजीवियों-लेखकों-रंगकर्मियों और आम लोगों से बातें कर रहा था तो एक बात सबने कही कि आरएसएस और मीडिया के कश्मीर विरोधी अभियान ने कश्मीर को लंबे समय से मुख्यधारा से अलग-थलग कर रखा है।आम कश्मीरी के सुख-दुख को देस के बाकी हिस्से में रहने वाले लोग नहीं जानते ,और न मीडिया बताना चाहता है।सबसे पीड…

भाषा सीखना और भाषा जीना एक-दूसरे से भिन्न है

महादेवी वर्मा पर लिखते समय हमेशा यह संकट रहता है कहां से लिखूँ।उनके विभिन्न किस्म के विचार उद्वेलित करते हैं।इधर फेसबुक-ब्लॉगिंग-मोबाइल आदि ने हम सबके संप्रेषण का मूलाधार बदल दिया है।नए दौर की समस्याएं अनेक मायनों में नई हैं।मसलन्,लेखन को ही लें,हम इन दिनों इतना लिख रहे हैं,इतना पहले कभी नहीं लिखते थे।हर व्यक्ति के लेखन की क्षमता में,भाषायी कम्युनिकेशन में कई गुना इजाफा हुआ है। इस तरह का लेखन या कम्युनिकेशन पहले कभी नहीं देखा गया,मोबाइल से लेकर फेसबुक तक भाषा का इतना व्यापक और बड़ी मात्रा में प्रयोग मनुष्य ने पहले कभी नहीं किया।

सवाल उठता है इतनी बड़ी मात्रा में भाषायी कम्युनिकेशन अंततःहमें अलगाव में क्यों रखे हुए है ॽ ऐसी भाषा क्यों लिख रहे हैं जिसमें प्राण नहीं होते ॽ संवेदनात्मकता नहीं होती ॽ कहा गया था हम संप्रेषण करेंगे तो संवेदनशीलता बढ़ेगी ,लेकिन यथार्थ में उलटा नजर आ रहा है।दावा था संवेदनशीलता के आधिक्य का लेकिन घटित एकदम उलटा हो रहा है।

संभवतः महादेवी वर्मा पहली हिन्दी लेखिका हैं जिन्होंने पूंजीवादी समाज में सबसे पहले इस आने वाले संकट को पहचाना था और रेखां…

मार्क्सवादी प्रकाशक श्याम बिहारी राय

डा.श्याम बिहारी राय हिन्दी प्रकाशन जगत का जाना-पहचाना चेहरा है।हिन्दी का आदर्श प्रकाशक कैसा हो और उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए,प्रकाशन के जरिए मार्क्सवाद का प्रचार -प्रसार कैसे करें,इन सब सवालों के उत्तर लेने हैं तो राय साहब से मिलो।
राय साहब बेहद सुलझे मार्क्सवादी हैं,एमए पीएचडी हैं,हिन्दी के प्रख्यात आलोचक नंददुलारे बाजपेयी के छात्र रहे हैं।अनेक वर्ष केन्द्र सरकार के संस्थान नीपा में काम करने के बाद प्रकाशन में लगे हुए हैं।उनसे मैं जब भी मिलता हूँ,मुझे मन में शांति मिलती है।उनके साथ मेरा परिचय तकरीबन 35सालों से हैं।मैं जब जेएनयू पढ़ने आया तो उनसे मेरी मुलाकात हुई ,मित्रता हुई,हम दोनों लंबे समय तक एक-दूसरे के सुख-दुख के साझीदार भी रहे हैं।राय साहब जैसा बेहतरीन मनुष्य,बेहतरीन निष्ठावान मार्क्सवादी मैंने नहीं देखा।
इस समय राय साहब ग्रंथ शिल्पी के नाम से प्रकाशन चलाते हैं।संभवतः भारत में यह अकेला प्रकाशन है जो सिर्फ अनुवाद छापता है।समाजविज्ञान, शिक्षा, साहित्य,मीडिया,दर्शन आदि की तकरीबन 300 से ज्यादा विश्व विख्यात किताबें अकेले राय साहब ने छापी हैं।इतनी किताबें भारत का कोई…

राधा कहां मिलेगी !

आज राधा अष्टमी है।मैं संभवतःकिसी चरित्र से इतना प्रभावित नहीं हुआ जितना राधा के चरित्र से प्रभावित हुआ। तकलीफ यह है कि हमने श्रीकृष्ण की बातें कीं,उनकी लीलाओं का आनंद लिया,राम की बातें की,लेकिन राधा के चरित्र पर कभी साहित्यकारों और आलोचकों ने खुलकर बहस नहीं की।

राधा अकेला चरित्र है जो अनुभूति में रूपान्तरित हुआ है। वह मात्र मिथकीय चरित्र नहीं है। बल्कि वह एक भावबोध,संस्कार और उससे भी बढ़कर आदतों में घुल-मिला चरित्र है।संभवतः हिन्दुओं का कोई ऐसा चरित्र नहीं है जो राधा की तरह हम सबकी आदतों-संस्कारों और अनुभूति में घुला मिला हो।कहने के लिए राधा के जन्म की कहानी मिलती है।

लेकिन राधा तो कवि शुद्ध कल्पना की सृष्टि है।जिसने भी राधा को सृजित किया वो बड़े विज़न का लेखक है।लोक साहित्य से लेकर साहित्य तक,संस्कारों –आदतों से लेकर शास्त्र तक राधा का कैनवास फैला हुआ है।संभवतःआभीर जाति में जनप्रियता का जन्मजात गुण है।यही वजह है आभीर जाति के नायक-नायिकाएं जल्द ही जनमानस में अपना स्थान बना लेते हैं।हजारी प्रसाद द्विवेदी-मैनेजर पांडेय ने राधा को प्रेमदेवी बना दिया।लेकिन उसे इस रूप में द…

´नवजागरण´ कहना एक फैशन है

हमारे हिन्दी आलोचकों में ´´नवजागरण” या ´रैनेसां´ पदबंध और उसके आधार पर परिप्रेक्ष्य बनाकर आलोचना लिखने का जबर्दस्त आकर्षण है।भारत में ´रैनेसां´ हुआ है यह सभी हिन्दी आलोचक मानकर चलते हैं,अनेक हैं जो यह मानकर चलते हैं कि हिन्दी में बंगला की तरह नवजागरण हुआ है। मोटे तौर पर ´रैनेसां´ या ´नवजागरण´ का दौर 1814 से आरंभ होता है और 1919 प्रथम असहयोग आंदोलन तक रहता है। यानी राजा राममोहन राय के 1814 में कलकता में आकर रहने से लेकर महात्मा गांधी के राजनीतिक क्षितिज में छा जाने के दौर को नवजागरण कहते हैं। सवाल यह है क्या महान् विभूतियों के पदार्पण या राजनीतिक आंदोलन विशेष को ´नवजागरण´का आधार बनाकर देखना सही होगा ॽ क्या ´नवजागरण´ के चरित्र को इससे समझने में बुनियादी तौर पर मदद मिलेगी ॽ

´नवजागरण´के प्रसंग में सबसे सटीक सवाल तो सुशोभन सरकार ने ही उठाए हैं।उन्होंने ´रवीन्द्रनाथ टैगोर तथा बंगाल का नवजागरण´ निबंध में ये सवाल उठाए हैं,यह 1961 में लिखा निबंध है, उन्होंने लिखा है ´बंगाल की 19वीं शताब्दी की सचेतनता को नवजागरण कहना आजकल फैशन सा हो गया है जिसे पिछले दो दशकों में विशेष लोकप्रि…

वल्गर मार्क्सवाद के खतरे

वल्गर आलोचना और वल्गर मार्क्सवाद का गहरा संबंध है।यह संयोग की बात है कि जब मार्क्सवाद की वल्गर धारणाएं सामने आई हैं उसी दौर में सबसे ज्यादा वल्गर साहित्यालोचना भी लिखी गयी है।दोनों में एक चीज साझा है और वह है सत्य की वस्तुगत सत्ता का अस्वीकार।वे जगत और कलाओं के यांत्रिक और इच्छित चित्रण और इच्छित व्याख्या पर जोर देते हैं।इच्छित आलोचना संसार रचने के लिए अपने पक्ष में मनमाने और अप्रासंगिक उद्धरणों का उपयोग करते हैं जिससे यथार्थ को और भी आँखों से ओझल कर सकें।यह काम आलोचना बचाने और आलोचना संवारने के नाम पर करते हैं।इससे आलोचना संवरती नहीं है बल्कि पसर जाती है।

बेहतर आलोचक वह है जो आलोचना के सारवान सवालों को उठाए और उन पर केन्द्रित होकर बहस सृजित करे।बहस सृजित करने के लिए पुराने प्रचलित आलोचना के ढाँचे और साँचों से बाहर निकलने की जरूरत है।नया पाठक सीधे विषय पर केन्द्रित लेखन पढ़ना चाहता है ,वह आलोचना को आलोचना के रूप में देखना चाहता है।वह आलोचना और साहित्य के सुसंगत संबंध को देखना चाहता है।वह समस्या पर केन्द्रित विवाद देखना चाहता है।वह महाख्यान नहीं सुनना चाहता।वह हिमायत में दि…

जेएनयू में आइसा-एसएफआई जिताओ

मैं नहीं जानता कि इस समय जेएनयू छात्रसंघ के चुनाव में किन मुद्दों पर बहस हो रही है।लेकिन एक बात तय है कि जेएनयू के छात्र आंदोलन के सामने गंभीर संकट है।यह संकट ´वैचारिक´ज्यादा है। फरवरी जेएनयू आंदोलन के बाद जो व्यापक छात्र एकता लोकतांत्रिक सवालों और लोकतांत्रिक हकों पर निर्मित हुई है,वह इसबार के चुनाव में अपनी पहली बड़ी परीक्षा से गुजरेगी।सुखद बात यह है कि ´देशद्रोह´के मसले पर हाल ही में सुप्रीमकोर्ट ने जो फैसला दिया है उससे जेएनयू छात्र आंदोलन को बहुत बड़ी मदद मिलेगी।हमने फेसबुक पर पहले देशद्रोह के प्रसंग में जो कुछ लिखा था सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने उसको अपने नए आदेश से पुष्ट किया है।किसी भी किस्म की नारेबाजी,सरकार के खिलाफ आलोचना आदि देशद्रोह नहीं है।देशद्रोह तब बनता है जब हिंसा की जाय या फिर हिंसा के लिए उकसाया जाय।महज भाषण या लेखन को हिंसा नहीं कहते,देशद्रोह नहीं कहते।

जेएनयू छात्र आंदोलन की दूसरी सबसे बड़ी उपलब्धि है जेएनयू प्रशासन के द्वारा जिन छात्रनेताओं और छात्रों के खिलाफ फरवरी आंदोलन के संदर्भ में अनुशासनात्मक कार्रवाई की थी उसको लागू करने पर अदालत ने रोक लगा दी…

मार्क्स-हेगेल के परे जाओगे तो रवीन्द्र को पाओगे

रवीन्द्रनाथ टैगोर को अपना बनाने के चक्कर में आप यदि उनको मार्क्सवादी बनाएंगे तो दिक्कत होगी।हजारी प्रसाद द्विवेदी ने रवीन्द्र को रवीन्द्र रहने दिया।रवीन्द्र के विचार और अनुभूतियां खांटीं भारतीय हैं।रवीन्द्र की मूल भावभूमि है मानवीय अनुभूति।उसे आप मार्क्स,हेगेल,कांट,देरिदा के जरिए नहीं पा सकते।यही वह प्रस्थान बिंदु हैं जहां से आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने रवीन्द्रनाथ टैगोर से रस प्राप्त किया ।रवीन्द्र का विश्वदृष्टिकोण प्रमुख है।हम य़दि वह ग्रहण करते हैं तो शायद वे हमारे लिए आज भी प्रासंगिक हैं।इन दिनों प्रगति पर बहुत बहस है।रवीन्द्रनाथ टैगोर के लिए इसका क्या अर्थ है ॽ
साहित्य और समाज के प्रसंग में ´प्रगति´ का सवाल बेहद महत्वपूर्ण है।इसकी तरह-तरह की परिभाषाएं हो रही हैं।आज प्रगति का मतलब है सड़क,बिजली और पानी।लेकिन रवीन्द्रनाथ के जमाने में प्रगति का अर्थ था ´महान् परिवर्तनों की ओर अग्रसर होना´।एक जमाने में साम्यवाद की ओर अग्रसर होने को प्रगति कहा गया। इस दृष्टिकोण से अलगाते हुए रवीन्द्रनाथ के लिए प्रगति का अर्थ है ´नूतन दृष्टिकोण´।रवीन्द्रनाथ ने सामाजिक उत्पीड़न और रूढ़िवादि…

आलोचना और इतिहास का संकट

हिन्दी आलोचना संकट में है,इसमें दो राय नहीं हैं।अरूण माहेश्वरी ने ´आलोचना के कब्रिस्तान से´अपनी नई किताब में अपने तरीके से इस संकट की ओर ध्यान खींचा है। इस किताब में आलोचना के क्षय के अनेक रूपों का जिक्र आया है। इस किताब में सात लेख हैं।ये सातों लेख मूल्यवान हैं। लेकिन समस्या यह है क्या ´खीझ´या ´गुस्सा´ या ´धिक्कार´ से आलोचना का विकास संभव है ॽयह चीज बार-बार अरूण माहेश्वरी के नजरिए में अभिव्यक्त हुई है।अरूण मेरा सबसे अच्छा मित्र है।हम दोनों एक-दूसरे को करीब से जानते हैं ।मैं आम तौर पर मित्रों की किताब पर आलोचना लिखने से परहेज करता हूँ।लेकिन अरूण का आग्रह था कि मैं उसकी किताब पर कुछ कहूँ।अरूण की आलोचना के क्षय को लेकर चिन्ताएं जेनुइन हैं।लेकिन वो जिस पद्धति के जरिए उनको हल करना चाहता है.वह सही नहीं है। अरूण की अच्छी बात यह है वह निडर होकर धारावाहिक ढंग से लिखता है।उसके इस धारावाहिक लेखन का परिणाम है प्रस्तुत किताब। वह जब लिखता है तो एकायामी होकर राजनीतिक नजरिए से लिखता है।उसकी किताब पढ़ते हुए कुछ सवाल मेरे मन में उठे हैं जिनको मैं शेयर करना चाहता हूँ।

आलोचना कोई दुर्वास…

शिक्षक के रूप में फेसबुक

गुरू वह जो सम्प्रेषक बनाए।फेसबुक इस अर्थ में हम सबका गुरू है ,उसने हम सबको कम्युनिकेटर बनाया है।कम्युनिकेशन की कलाओं से लैस किया है। जो लोग फेसबुक पर सक्रिय है उन सबका अप्रत्यक्ष रूप में फेसबुक गुरू है।यह हमारी दिमागी हरकतों का नियंत्रक और नियामक है।

हर मीडियम हमें सिखाता है।लेकिन हम उसे उपकरण से अधिक महत्व नहीं देते।वास्तविकता यह है आधुनिक युग में मीडियम हमारे गुरू हैं। पहले हम शिक्षक से सीखते थे लेकिन औद्योगिक क्रांति के बाद शुरू हुई तकनीकी क्रांति ने मीडियम को शिक्षक और छात्र के बीच में लाकर खड़ा कर दिया है।हम देखें फिल्म ने एक मीडियम के रूप में समाज को किस तरह सिखाया-पढ़ाया और सजाया-संवारा है।उसी तरह फेसबुक ने लेखन और अभिव्यक्ति के तौर-तरीकों के संबंध में हमारी नए सिरे से शिक्षा की है।

मैंने निजी तौर पर मीडियम के तौर पर फेसबुक से बहुत कुछ सीखा है,रोज कोई न कोई नई चीज हम यहां सीखते हैं।फेसबुक हमारा नया शिक्षक है।फेसबुक की वॉल जब सामने खुली होती है तो हर शिक्षित व्यक्ति लिखने के पहले छह बार सोचता है कि क्या लिखूँॽ लिखते हुए भय और संकोच में रहता है। भय-संकोच में वे ल…

एक शिक्षक का दुख

आज शिक्षक दिवस है।फेसबुक पर हजारों पोस्ट देख सकते हैं।अपने शिक्षक की प्रशंसा भरी पोस्ट भी देख सकते हैं।लेकिन हम कभी शिक्षक के दुख को नहीं देखते।एक शिक्षक का क्या दुख है यह हमने कभी जानने की कोशिश ही नहीं की। शिक्षक के बिना समाज की कल्पना असंभव है,शिक्षक के दुखों को जाने बिना समाज को जानना भी असंभव है।कोई समाज कैसा है यह तय करना हो तो शिक्षकों को देखो ,उनकी समस्याओं को देखो,उनके जीवन में घट रहे अंतर्विरोधों को देखो।शिक्षक के दुख निजी और सार्वजनिक दोनों किस्म के हैं।मैं यहां जिस दुख की ओर ध्यान खींचना चाहता हूँ वह सार्वजनिक दुख हैं,जिनसे एक शिक्षक को गुजरना पड़ रहा है।

आज के शिक्षक का सबसे बड़ा दुख यह है कि वह ´विदेशी´की जकड़बंदी में कैद है। ´विदेशी´ बनने में उसे बहुत ज्यादा ऊर्जा खर्च करनी पड़ रही है। ´विदेशी´ बनने की पीड़ा उसकी अपनी निजी पीड़ा नहीं है बल्कि उस पर व्यवस्था ने थोपी है। ´विदेशी´भावबोध अर्जित करने के लिए इन दिनों भयानक होड़ मची हुई है।इस क्रम में शिक्षक अनुवाद कर रहा है। अनुवाद में जी रहा है।शिक्षक का अनुवाद में जीना,अनुवाद में सोचना उसकी सबसे बड़ी पीड़ा है…

एक शिक्षक के नोट्सः आत्मकथ्य

मैंने जब सन् 1989 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रवक्ता पद पर काम करना शुरू किया यहां का हिन्दी विभाग और यहां काम कर रहे शिक्षकों के पढ़ाने की परंपरा को समझना सबसे पहली चुनौती थी।सामान्य तौर पर विद्यार्थियों की पढ़ने-पढ़ाने की आदत बनाने में विभाग की सामूहिक जिम्मेदारी होती है।पढ़ाने की दूसरी बड़ी चुनौती छात्र-छात्राओं की अकादमिक अभिरूचियों को जानना था। कक्षा में मुझे हिन्दी साहित्य का इतिहास, संस्कृत काव्यशास्त्र और पाश्चात्य काव्यशास्त्र पढ़ाना था।बाद में हिन्दी पत्रकारिता पढ़ाने की जिम्मेदारी दी गयी।

मैं जब पहलीबार अप्रैल1989 में कक्षा में गया तो विद्यार्थियों से पूछा कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल या हजारी प्रसाद द्विवेदी के इतिहासग्रंथ पढ़े या देखे हैं,तो कक्षा में सबने कहा न तो देखे हैं और न पढ़े हैं। यह मेरा पहला अनुभव था।मैं कई साल तक एम ए प्रथम वर्ष में आने वाले विद्यार्थियों से नियमित यही सवाल पूछता रहा और हमेशा उनको शुक्लजी और द्विवेदीजी के इतिहास ग्रंथ पढ़ने के लिए कहता रहा।तकरीबन छ-सात साल बाद पहलीबार यह सुनने को मिला कि हां शुक्लजी या द्विवेदीजी के इत…

कश्मीर में युवाओं के हाथ में पत्थर क्यों हैं ॽ

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श्रीनगर के डाउनटाउन इलाके में जाइए और आम लोगों से बातें कीजिए,अधिकतर लोग आतंकियों के खिलाफ हैं,वे बार -बार एक ही सवाल कर रहे हैं कश्मीर में इतनी सेना –सीमा सुरक्षा बलों की टुकड़ियां चप्पे-चप्पे पर क्यों तैनात हैं ॽ हमने क्या अपराध किया है ॽवे यह भी कहते हैं अधिकांश जनता आतंकियों की विरोधी है,पृथकतावादियों के साथ नहीं है।सामान्य लोगों से बातें करते हुए आपको यही लगेगा कि कश्मीर के लोग सामान्य जिन्दगी जीना चाहते हैं।वे यह भी कहते हैं निहित स्वार्थी लोगों ने कश्मीर का मसला बनाकर रखा हुआ है,ज्योंही सामान्य स्थिति होने को आती है कोई छोटी सी घटना होती है और आम लोगों के घरों पर सेना-पुलिस के छापे पड़ने शुरू हो जाते हैं।

मैं जब डाउनटाउन की प्रसिद्ध हमदान मसजिद को देखने पहुँचा तो वहां पर एकदम भिन्न माहौल था, लोग वहां प्रार्थना करने आ-जा रहे थे। बहुत ज्यादा भीड़भाड़ नहीं थी।हमदान मसजिद इस शहर की सबसे बेहतरीन मसजिद है।इसका इतिहास भी है,उसे लेकर अनेक विवाद भी हैं।इस मसजिद में बैठे रहने वाले लोगों से जब बातें कीं तो पता चला कि वे विकास पर बातें करना चाहते हैं।उनका मानना है कश्मीर को अमन-चैन …