एडवर्ड सईद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
एडवर्ड सईद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 25 जनवरी 2010

फिलीस्तीन मुक्ति सप्ताह- फिलीस्तीनियों की अतुलनीय कुर्बानी और मानवता




  (हैती की प्राकृतिक आपदा की शिकार जनता के लिए सहायता एकत्रित करते फिलीस्तीनी लोग ) 
                                                 

जो लोग मुक्ति के लिए संघर्ष करते हैं वे खुदगर्ज नहीं होते। फिलीस्तीनियों का स्वभाव भी कुछ ऐसा ही है उनमें अपने वतन को पाने की जितनी चाह है उससे भी ज्यादा गहरी सहानुभूति दूसरों के प्रति है। बीबीसी लंदन ने 19जनवरी 2010 को खबर दी कि गाजा में बाढ़ आ गयी है। बाढ़ से व्यापक क्षति होने का अनुमान है। जिस समय बाढ़ आयी उसी समय जबर्दस्त बारिश भी हुई। सैंकड़ों परिवार इससे प्रभावित हुए हैं।
     
 बाढ़ और बारिस ने इतनी व्यापक तबाही मचायी कि गाजापट्टी में आपात्काल की घोषणा करनी पड़ी। समूचे इलाके में पानी भर गया। यहां तक कि पशु वगैरह भी पानी में ही फंसे हुए हैं, घरों ,खेतों और और सड़कों पर पानी भरा हुआ है। बाढ के कारण सड़कें और पुल नष्ट हो गए हैं।गाजा शहर का दक्षिणी भाग से संबंध कट गया है।
     
गाजा में 27 दिसम्बर 2008 से आरंभ हुए 3 सप्ताहव्यापी युद्ध में 1500 से ज्यादा फिलीस्तीनी मारे गए। इनमें 252 बच्चे मारे गए और आधे से ज्यादा नागरिक मारे गए। इसके अलावा बड़े पैमाने पर घर, बिजनेस,और इंफ्रास्ट्रक्चर नष्ट हो गया। दूसरी ओर फिलीस्तीनी फायरिंग से 9 इस्राइली,जिनमें 3 नागरिक मारे गए। इस्राइल की संपत्ति का कोई नुकसान नहीं हुआ। पिछले एक साल से इस्राइल के द्वारा गाजा की नाकेबंदी और पाबंदी चल रही है। इसके कारण फिलीस्तीनी जनता की व्यापक क्षति हुई है।



गाजा की इस्राइल द्वारा नाकेबंदी का एक साल पूरा होने पर हाल ही में एक किताब आयी है जिसका शीर्षक है My Father Was A Freedom Fighter: Gaza’s Untold Story । लेखक रमजी बरौद ने बड़े ही प्रभावशाली ढ़ंग से गाजा की तबाही का वर्णन किया है। गाजा में किस तरह क्रांतिकारी माताएं, पिता और बच्चे समूचे जीवन को मानवीय संवेदनशीलता और जोश से भरे हुए हैं। किस तरह घरों से खदेड़कर फिलीस्तीनियों को शरणार्थी शिविरों में भेजा गया और वहां पर उन्हें नारकीय जीवन जीने के लिए मजबूर किया जा रहा है। शरणार्थी शिविरों से अपनी जान जोखिम में डालकर फिलीस्तीनी युवा मुक्ति संग्राम के लिए हथियार उठाने के लिए मजबूर किए जा रहे हैं।
  गाजा में एक तरफ इस्राइली आतंक का तांडव चल रहा है और फिलीस्तीनी जनता बहादुरी के साथ उसका सामना कर रही है। दूसरी ओर फिलीस्तीनी जनता ने मानवीय एकता की शानदार मिसाल कायम करते हुए हैती में प्राकृतिक आपदा के शिकार लोगों के प्रति समर्थन व्यक्त करते हुए एक समारोह का हाल ही में आयोजन किया।



इस मौके पर फिलीस्तीन के सांसद जमाल अल खुदरी ने कहा कि हम लोग मनुष्यकृत तबाही के शिकार हैं लेकिन हम हैती के लोगों के बहाने यह संदेश देना चाहते हैं कि प्राकृतिक आपदा के शिकार हैती के नागरिकों के लिए यत्किंचित सहायता राशि गाजा की पीडित जनता भेज रही है। यह सहायता राशि इस बात का संकेत भी है कि गाजा के पीडितों में मानवीय एकता बची है।
गाजा में आम लोगों में हैती की जनता के प्रति उत्साह देखने लायक था, साधारण लोग अपने घरों से खाने का सामान ,कपड़े आदि लेकर जा रहे थे और गाजा में रेडक्रास के आफिस जाकर जमा कर रहे थे।
    उल्लेखनीय है कि गाजा की 15 लाख आबादी में 80 प्रतिशत आबादी बाहर से आने वाली खाद्य सहायता पर आश्रित है।  उद्योग बंद हैं। सारी जनता बेकार है। ऐसी दयनीय अवस्था में हैती की जनता के लिए प्रतीकात्मक सहायता राशि एकत्रित करना मानवीय एकता की अविस्मरणीय मिसाल ही कही जाएगी।


फिलीस्तीन जनता के कष्टों और मानवीयता के आपको बहुराष्ट्रीय मीडिया में कहीं पर भी नजारे देखने को नहीं मिलेंगे। इस समस्या को गंभीरता से समझने की जरुरत है।
 एडवर्ड सईद ने ''कवरिंग इस्लाम''(1997) में विस्तार से भूमंडलीय माध्यमों की इस्लाम एवं मुसलमान संबंधी प्रस्तुतियों का विश्लेषण किया है।सईद का मानना है  भूमंडलीय माध्यम ज्यादातर समय इस्लामिक समाज का विवेचन करते समय सिर्फ स्लाम धर्म पर केन्द्रित कार्यक्रम ही पेश करते हैं।इनमें धर्म और संस्कृति का फ़र्क नजर नहीं आता। भूमंडलीय माध्यमों की प्रस्तुतियों से लगता है कि इस्लामिक समाज में संस्कृति का कहीं पर भी अस्तित्व ही नहीं है।इस्लाम बर्बर धर्म है। इस तरह का दृष्टिकोण पश्चिमी देशों के बारे में नहीं मिलेगा।ब्रिटेन और अमरीका के बारे में यह नहीं कहा जाता कि ये ईसाई देश हैं। इनके समाज को ईसाई समाज नहीं कहा जाता।जबकि इन दोनों देशों की अधिकांश जनता ईसाई मतानुयायी है।
            भूमंडलीय माध्यम निरंतर यह प्रचार करते रहते हैं कि इस्लाम धर्म ,पश्चिम का विरोधी है।ईसाईयत का विरोधी है।अमरीका का विरोधी है।सभी मुसलमान पश्चिम के विचारों से घृणा करते हैं।सच्चाई इसके विपरीत है।मध्य-पूर्व के देशों का अमरीका विरोध बुनियादी तौर पर अमरीका-इस्राइल की विस्तारवादी एवं आतंकवादी मध्य-पूर्व नीति के गर्भ से उपजा है।अमरीका के विरोध के राजनीतिक कारण हैं न कि धार्मिक कारण।
            
 एडवर्ड सईद का मानना है 'इस्लामिक जगत' जैसी कोटि निर्मित नहीं की जा सकती।मध्य-पूर्व के देशों की सार्वभौम राष्ट्र के रुप में पहचान है।प्रत्येक राष्ट्र की समस्याएं और प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।यहाँ तक कि जातीय ,सांस्कृतिक और भाषायी परंपराएं अलग-अलग हैं।अत: सिर्फ इस्लाम का मतानुयायी होने के कारण इन्हें 'इस्लामिक जगत' जैसी किसी कोटि में 'पश्चिमी जगत' की तर्ज पर वर्गीकृत नहीं किया जा सकता।
            
ऐतिहासिक दृष्टिकोण देखें तो पाएंगे कि भूमंडलीय माध्यमों का मध्य-पूर्व एवं मुस्लिम जगत की खबरों की ओर सन् 1960 के बाद ध्यान गया।इसी दौर में अरब-इस्राइल संघर्ष शुरु हुआ।अमरीकी हितों को खतरा पैदा हुआ।तेल उत्पादक देशों के संगठन'ओपेक' ने कवश्व राजनीति में अपनी विशिष्ट पहचान बनानी शुरु की।तेल उत्पादक देश अपनी ताकत का एहसास कराना चाहते थे वहीं पर दूसरी ओर विश्व स्तर पर तेल संकट पैदा हुआ।ऐसी स्थिति में अमरीका का मध्य-पूर्व में हस्तक्षेप शुरु हुआ।अमरीकी हस्तक्षेप की वैधता बनाए रखने और मध्य-पूर्व के संकट को 'सतत संकट' के रुप में बनाए रखने के उद्देश्य से भूमंडलीय माध्यमों का इस्तेमाल किया गया।यही वह दौर है जब भूमंडलीय माध्यमों से इस्लाम धर्म और मुसलमानों के खिलाफ घृणा भरा प्रचार अभियान शुरु किया गया। माध्यमों से यह स्थापित करने की कोशिश की गई कि मध्य-पूर्व के संकट के जनक मुसलमान हैं। जबकि सच्चाई यह है कि मध्य-पूर्व का संकट इस्राइल की विस्तारवादी-आतंकवादी गतिविधियों एवं अमरीका की मध्य-पूर्व नीति का परिणाम है।     

  सईद ने लिखा है पश्चिमी जगत में इस्लाम के बारे में सही ढ़ंग़ से बताने वाले नहीं मिलेंगे।अकादमिक एवं माध्यम जगत में इस्लामिक समाज के बारे में बताने वालों का अभाव है।         
भूमंडलीय माध्यमों के इस्लाम विरोध की यह पराकाष्ठा है कि जो मुस्लिम राष्ट्र अमरीका समर्थक हैं उन्हें भी ये माध्यम पश्चिमी देशों की जमात में शामिल नहीं करते।यहाँ तक कि ईरान के शाह रजा पहलवी को जो घनघोर कम्युनिस्ट विरोधी था और अमरीकापरस्त था,बुर्जुआ संस्कार एवं जीवन शैली का प्रतीक था,उसे भी पश्चिम ने अपनी जमात में शामिल नहीं किया।इसके विपरीत अरब-इस्राइल विवाद में इस्राइल को हमेशा पश्चिमी जमात का अंग माना गया और अमरीकी दृष्टिकोण व्यक्त करने वाले राष्ट्र के रुप में प्रस्तुत किया गया।
आमतौर पर इस्राइल के धार्मिक चरित्र को छिपाया गया। जबकि इस्राइल में धार्मिक तत्ववाद की जड़ें अरब देशों से ज्यादा गहरी हैं।इस्राइल का धार्मिक तत्ववाद ज्यादा कट्टर और हिंसक है।आमतौर पर लोग यह भूल जाते हैं कि गाजापट्टी के कब्जा किए गए इलाकों में उन्हीं लोगों को बसाया गया जो धार्मिक तौर पर यहूदी कट्टरपंथी हैं।इन कट्टरपंथियों को अरबों की जमीन पर बसाने का काम इस्राइल की लेबर सरकार ने किया, जिसका तथाकथित 'धर्मनिरपेक्ष' चरित्र था।इतने बड़े घटनाक्रम के बाद भी भूमंडलीय प्रेस यह प्रचार करता रहा कि मध्य-पूर्व में किसी भी देश में जनतंत्र कहीं है तो सिर्फ इस्राइल में है।

मध्य-पूर्व में पश्चिमी देश इस्राइल की सुरक्षा को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित हैं।अन्य किसी राष्ट्र की सुरक्षा को लेकर वे चिंतित नहीं हैं।अरब देशों की सुरक्षा या फिलिस्तीनियों की सुरक्षा को लेकर उनमें चिंता का अभाव है।इसके विपरीत फिलिस्तीनियों के लिए स्वतंत्र राष्ट्र की स्थापना के लिए संघर्षरत फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन को अमरीका ने आतंकवादी घोषित किया हुआ है।
            आज अमरीका ने अरब देशों और फिलिस्तीनियों की सुरक्षा की बजाय इस्राइल की सुरक्षा के सवाल पर आम राय बना ली है।इस इलाके में अमरीका पश्चिम का वर्चस्व स्थापित करना चाहता है।वे यह भ्रम पैदा कर रहे हैं कि 'ओरिएण्ट' के ऊपर'पश्चिम' का राज चलेगा।दूसरा भ्रम यह फैला रहे हैं कि पश्चिम की स्व-निर्मित इमेज सर्वश्रेष्ठ है।तीसरा भ्रम यह फैलाया जा रहा है कि इस्राइल पश्चिमी मूल्यों का प्रतीक है। एडवर्ड सईद ने लिखा कि इन तीन भ्रमों के तहत अमरीका का सारा प्रचारतंत्र काम कर रहा है।इन भ्रमों के इर्द-गिर्द राष्ट्रों को गोलबंद किया जा रहा है।
          
ध्यान रहे माध्यमों में जो प्रस्तुत किया जाता है वह न तो स्वर्त:स्फूर्त्त होता है और न पूरी तरह स्वतंत्र होता है और न वह यथार्थ की तात्कालिक उपज होता है।बल्कि वह निर्मित सत्य होता है।यह अनेक रुपों में आता है।उसके वैविध्य को हम रोक नहीं सकते।इसकी प्रस्तुति के कुछ नियम हैं जिनके कारण हमें यह विवेकपूर्ण लगता है।यही वजह है कि वह यथार्थ से ज्यादा सम्प्रेषित करता है।उसकी इमेज माध्यम द्वारा प्रस्तुत सामग्री से निर्मित होती है।वह प्रच्छन्नत: उन नियमों के साथ सहमति बनाता है या उनको संयोजित करता है जो यथार्थ को 'न्यूज' या'स्टोरी' में रुपान्तरित करते हैं।चूँकि माध्यम को सुनिश्चित ऑडिएंस तक पहुँचना होता है,फलत: उसे इकसार शैली में यथार्थ अनुमानों से नियमित किया जाता है।इकसार छवि हमेशा संकुचित और सतही होती है।इसी कारण जल्दी ग्रहण कर ली जाती है,मुनाफा देने वाली होती है और इसके निर्माण में कम लागत लगती है।इस तरह की प्रस्तुतियों को वस्तुगत कहना ठीक नहीं होगा।बल्कि ये विशेष राजनीतिक संदर्भ और मंशा के तहत निर्मित की जाती हैं।इसके तहत यह तय किया जाता है कि क्या प्रस्तुत किया जाय और क्या प्रस्तुत न किया जाय।
    









रविवार, 24 जनवरी 2010

फिलीस्तीन मुक्ति सप्ताह- फिलीस्तीन के महान गुरु इब्राहिम अबू लोग़द - एडवर्ड सईद



[ इब्राहिम अबू लोग़द (Lughod)  अमरीकी विश्वविद्यालयों में फिलीस्तीन मुक्ति के सवाल पर संघर्षशील वैचारिक आन्दोलन के असली उद्योक्ता थे। यहां एडवर्ड सईद का लिखा लेख प्रस्तुत है जिसमें उन्होंने इब्राहिम लोग़द को अपना गुरु कहा है । साथ ही उन दिनों का विवरण दिया है जिसके कारण खुद एडवर्ड सईद 'ओरियन्टलिज्मके लेखन की ओर बढ़ पाये। अल-अहराम  पत्रिका में छपे इस लेख का अनुवाद डा. रूपा गुप्ता ,रीडर ,हिन्दी  विभाग,वर्धमान विश्वविद्यालय ,वर्धमान,प.बंगाल ने किया है ।]








लंबी बीमारी के बाद बहत्तर वर्ष की आयु में 23 मई को इब्राहिम अबू लोग़द अपने रामल्लाह स्थित घर में चल बसे। वे नॉर्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक रहे और बाद में बीर .जेट यूनिवर्सिटी, वेस्ट बैंक के उपाध्यक्ष बने। तेलअवीव एयरपोर्ट पर उनसे मिलने के लिए जाते समय मुझे उनकी मृत्यु का समाचार मिला। वे मेरे सबसे पुराने और सबसे प्रिय मित्र थे ।
     वे एक ऐसे आत्मविश्लेषक चिन्तक, करिश्माई राजनैतिक गुरू एवं नेता थे जिनकी अन्तर्दृष्टि के कारण हमारी पचास वर्षों की मित्रता निभ सकी। जाफा में हुए उनके अंतिम संस्कार 'आजा-जागरण' - रामल्लाह के कतन केन्द्र उनके घर पर कई सौ शोक संतप्त लोग एकत्रित हुए। उनके दफनाये जाने के अगले दिन उनकी स्मृति में रामल्लाह के थियेटर में हुई स्मृति सभा में उनके कई मित्रों ने अपनी भावनाएं प्रकट कीं। इब्राहिम को पहाड़ के समीप उस कब्रिस्तान में उनके पिता के बगल में दफ़नाया गया जिसकी गोद में बसी जलराशि में इब्राहिम अपने अतिथियों को तैरने के लिए ले जाते थे और हमेशा पास के उस इजरायली बीच कैफे में जाने से इंकार कर देते थे जो अत्यन्त आकर्षक था और निमन्त्रण देता प्रतीत होता था। जाफा में हुई उनकी शोकसभा के एक वक्ता फ़ैसल हुसैनी भी थे जो लोग़द की मृत्यु के ठीक एक सप्ताह बाद कुवैत के अपने होटल के कमरे में गुजर गये।
            फिलिस्तिनी अनुभवों के केन्द्र में जो उथल-पुथल और वेदना रही है वह इब्राहिम के सार्थक जीवन और उनकी मृत्यु में भी आद्योपान्त विद्यमान रही है, इसलिये उनके जीवन की पड़ताल जरूरी हो जाती है। यह इसलिये भी जरूरी हो जाती है क्योंकि यह फिलिस्तीनी स्थिति की सारी अनिश्चततताओं का वहन करती है। उनकी मृत्यु के समय सभी ने यह स्पष्ट अनुभव किया कि अबू लोग़द का जाफ़ा लौटने का निर्णय नितान्त व्यक्तिगत था, उनके जैसी अद्भुत इच्छा शक्ति रखने वाला ही कोई व्यक्ति ऐसा कर सकता था। उनके 1992 में फिलिस्तीन लौटने पर सभी ने टिप्पणी की जहां वे चवालीस (44) वर्षो की अनुपस्थिति के बाद लौटे थे। फिलिस्तीन में एक शिक्षक, जन बुद्धिजीवी और बहुत सी संस्थाओं के संस्थापक के रूप में बिताये उनके जीवन का एक दशक भी सभी की दृष्टि का केन्द्र रहा।
            उनके जीवन के सारे नाटकीय निष्कर्षों के उपरान्त भी एक विराट अस्थिरता बनी रही। वे अभी भी निश्चिन्त नहीं थे। यद्यपि उनकी वापसी ने उन्हें बदला नहीं फिर भी घर लौट कर वे निर्वासन से अधिक संतुष्ट थे। फिलिस्तीन एक सवाल था जिसका पूरा उत्तर कभी नहीं दिया गया यहां तक कि पर्याप्त रूप से इसकी प्रस्तुति भी नहीं की गई। उनके व्यक्तित्व की हर बात इस अस्थिरता की पुष्टि करती थी, उनकी मिलनसारिता से लेकर उनकी मूडी आत्मालोचना तक, उनके आशावाद और ऊर्जा से लेकर उनके उस जड़ताबोध तक जो पूरी तरह निष्क्रिय कर देती है और जिसकी जकड़ में हम में से बहुत लोग हैं। उनका जीवन एक साथ पराजय और जय, दीनता और उपलब्धि, हताशा और दृढ़ निश्चय को अभिव्यक्त करता है। संक्षेप में हमारे समय के सबसे अच्छे फिलिस्तिनियों में से एक इब्राहिम का जीवन फिलिस्तीनी जटिलताओं की ही छवि था।
            इब्राहिम जो निष्ठुरता की सीमा तक कुशल वक्ता थे, अपने लेखन के लिए कम याद किये जायेंगे। उनका लेखन उनकी सांगठनिक योग्यता की तुलना में कम सघन है। अमेरिका में वे एएयूजी (द एसोसियेशन ऑव अरब-अमेरिका यूनिवर्सिटी ग्रेजुएट्स), द यूनाइटेड होली लैंड फंड, द इंस्टीटयूट ऑव अरब स्ट्डीज क्वार्टरली और मदीनी प्रेस की स्थापना के माध्यम बने। वे फिलिस्तीन मुक्त विश्र्वविद्यालय की स्थापना के मुख्य प्रेरक थे। जिसका मुख्यालय 1982 के लेबनान युद्ध तक बेरुत में रहा। वेस्ट बैंक पर उन्होंने एक पाठयक्रम सुधार केन्द्र की परियोजना तैयार की और उसके बाद शोध और शिक्षा के लिए कतन केन्द्र की परिकल्पना की। इसके बाद भी वे इस तथ्य से भली-भांति परिचित थे कि फिलिस्तीन के लिए किए जा रहे संघर्ष को इस तरह के संस्थानों द्वारा नहीं जीता जा सकता। लोगों के अपने देश लौटने या जबरन कहीं भेजे जाने पर भी। ये अन्ततः स्वतः स्फूर्त स्वयं संदर्भित ही होंगे एवं किसी प्रकार का अत्याचार, संघर्ष और अंतहीन नुकसान इन्हें नष्ट या बर्बाद कर देगा। कॉनराड के नायक की तरह इब्राहिम सदैव अपने आस-पास होते नाटकीय घटनाक्रम से यहां तक कि अपनी खुद की कमजोरियों से एक सार्थकता और गर्वबोध ग्रहण करने का प्रयास करते रहे।
            उनके जीवन को घेरे रखने वाली नाटकीय घटनाओं पर विचार करें। उनकी मृत्यु के समय उनके घर के बाहर अत्यन्त शक्तिशाली पर दिशाहीन झंझावात चल रहा था। 1982
में बेरूत पर अधिकार और परिणामस्वरूप साबरा और शातिला का हत्याकाण्ड और लेबनान से निर्वासन (उनके साथ ही पी एल ओ के सदस्यों का भी) 1948 में जाफ़ा का पतन उनके परिवार का बिखरना, अमेरिका में उनके लंबे निर्वासित जीवन का और फिलिस्तीन के पक्ष में उनकी मुखरता का आरंभ साथ ही 1992 में उनका अचानक वेस्ट बैंक लौटना। हर वह अरब नागरिक जो नस्लवादी बद्धमूढ़ता और विचारधारा, इस्लाम के प्रति पुराने बैर भाव से लड़ रहा था इब्राहिम का भारी कर्जदार है। उन्होंने ही यह संघर्ष आरंभ किया और उसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी।

अमेरिका के अपने चालीस वर्षों के संघर्ष के बाद भी उनके लिए लौटने की गुंजाइश बची थी पर यह लौटना विपत्ति भरी स्थितियों की ओर लौटना था। यह लौटना मुक्त फिलिस्तीन में नहीं बल्कि ओस्लो के क्षेत्रक में अमेरिकी पासपोर्ट के साथ लौटना था, यह उस जाफा में लौटना था जो इजरायली अधिकार क्षेत्र में था। फिलीस्तीन लौटना इजरायली  P(A) अधिकार क्षेत्र में लौटना है - यह समझने वाले वे पहले व्यक्ति थे। और उनके अंतिम संस्कार को रोक देने की धमकी तक दी गयी ।
 फिलीस्तीन नेशनल काउन्सिल और पी.एल.ओ. के चरित्रगत परिवर्तन को 1988 में ही लक्षित करने वाले वे पहले व्यक्ति थे। वे यह समझ गये थे कि अपने मुक्ति संग्राम का लक्ष्य छोड़ कर पी.एल.ओ ने राष्ट्रीय स्वाधीनता-संग्राम की राह पकड़ ली है जो हर हाल में उसके पहले उद्देश्य से कमतर था। जैसा कि बाद  में ओस्लो अनुबंध से भी प्रमाणित हुआ।
            पराजय की गहन हताशा को भी किस प्रकार छोटी ही सही - उपलब्धि में बदला जाता है यह इब्राहिम से बेहतर कोई नहीं जानता पर वे केवल नैतिक विजयों से संतुष्ट नहीं थे। फौजी शक्ति के यथार्थ से वे भलीभांति परिचित थे। उदाहरण के लिए 1982 में बेरुत की प्रलयंकारी घटना से अराफ़ात के बचने पर उन्होंने कहा - ''हमारे पास टैंक नहीं है मतलब हमारे पास वास्तविक शक्ति नहीं है। इसीलिए इजराइलियों के लिए हमारे संस्थानों को नष्ट करना एवं हमारे लोगों को मार डालना संभव हुआ।''
            मैं इब्राहिम से सन् 1954 में प्रिन्सटन में मिला था। उन दिनों विश्र्वविद्यालय में विदेशी स्नातक नहीं हुआ करते थे - न कोई अफ्रीकी अमेरिकन, न औरतें। वहां थे केवल वे उच्च वर्गीय श्वेतवर्णी युवक जिन्हें सबसे अच्छी शैक्षणिक सुविधा मिली थी जिन्हें सदा यह महसूस करवाया जाता था कि वे दुनिया पर शासन करने के लिए जन्मे हैं। बाद में उनमें से बहुतों ने शासन किया भी। उन्हीं दिनों शहर के एक धनिक ने संगीत विभाग को एक राशि दी ताकि प्रिन्सटन के अत्यन्त सम्मानजनक संगीत समारोह में विद्यार्थियों को टिकटें मुहैया करवाई जा सकें। मुझे टिकटों को बांटने का काम सौंपा गया। सितम्बर की एक खासी गर्म शाम को एक चपल नीली हरी तीव्र आंखों और उच्चारण के विशेष लहजे वाले एक युवक ने आकर मुझसे टिकट मांगा। उसने मुझे जल्दी से अपना परिचय पत्र दिखाया। (मैं उसका नाम नहीं देख पाया मैंने उसे केवल स्नातक विद्यार्थी में रूप में दर्ज किया।) जाते जाते हठात्‌ मुड़कर उसने मेरा नाम दोबारा पूछा मेरे फिर से बताने पर वह लौट कर आया और पूछा कि मैं कहां का हूँ । अभी इजिप्ट का हूँ पर पहले मैं फिलीस्तीन का था'' ऐसा ही कुछ मैंने कहा । उसका चेहरा चमक उठा - मैं भी फिलीस्तीन का हूं'' उसने कहा - ''जाफा से''। यह युवक जो थे इब्राहिम फिलिप हित्ती (Hitti) के साथ अध्ययन कर रहे थे जो लेबनान के मूल निवासी थे और उन्होंने 'ओरियन्टल स्टैडीज' (प्राच्य अध्ययन) विभाग की स्थापना की थी। यह विभाग मुख्यतः अरब के इतिहास एवं संस्कृति से सम्बद्ध था। इब्राहिम ने मुझे दूसरे अरब स्नातकों से मिलाया और पलक झपकते ही वे मेरे पुराने मित्र बन गये जिनके साथ मैं अरबी भाषा बोल सकता था। प्रिन्सटन में जियोनिस्ट उपस्थिति पर शोक कर सकता था जो स्वेज (Suez) संकट के समय सबसे अधिक प्रत्यक्ष थी।
            हम दोनों ने 1957 में प्रिन्सटन शहर छोड़ा। वे तब तक पीएचडी कर चुके थे और मैं बी.ए.। मैं एक वर्ष में लिए इजिप्ट लौट गया। मैं इब्राहिम और उनकी पत्नी जैनेट से काइरो में नियमित रूप से मिलता रहा। इब्राहिम वहां यूनेस्को के लिए काम कर रहे थे। फिलवक्त हम दोनों के अंदर संचित राजनैतिक ऊर्जा का अल्पांश ही दिखाई पड़ा था। मैं बहता बहता हार्वर्ड के स्नातक स्कूल से जा लगा। अबू लोग़द से मेरी मुलाकातें कम हो गयीं । हालांकि मैं जानता था कि वे शिक्षक के रूप में अमेरिका लौट चुके थे। तभी अचानक 1967 के झंझावात ने हम सबको हिला कर रख दिया। इब्राहिम ने मुझे एक पत्र लिख कर पूछा  क्या मैं न्यूयॉर्क से प्रकाशित होने वाली अरब लीग मासिक ''अरब वर्ल्ड'' के विशेष अंक के लिए कुछ लिख सकता हूँ , जिसके वे अतिथि संपादक थे, और युद्ध पर अरब दृष्टिकोण से प्रकाश डालना चाहते थे। मैंने इस अवसर का उपयोग किया। मैंने मीडिया और लोकप्रिय साहित्य में अरब की छवि पर प्रकाश डालते हुए मध्य युग तक इसके सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व को सामने रखा। यही मेरी पुस्तक ओरियन्टलिज्म का उत्स था जिसे मैंने जैनेट और इब्राहिम को समर्पित किया।
            बाद के वर्षों में यद्यपि लोग़द दम्पति शिकागो में रहते थे और मैं न्यूयॉर्क में फिर भी हम राजनीति के कारण एक दूसरे के नजदीक आते गये। हम एक साथ कांग्रेस के साक्षी रहे, 1988 में जॉर्ज शुल्त्ज से मिले, बॉस्टन में हमने 'अरब स्टैडीज' संस्थान बनाया, ''अरब स्टैडीज क्वार्टरली की स्थापना की और काइरो, अम्मान एवं अल्जीयर्स में फिलिस्तीन नेशनल काउन्सिल के अधिवेशनों में भाग लिया। महत्वपूर्ण गतिविधियों के उन वर्षों में अमेरिका और अरब की प्रतिभाओं को पहचानने में इब्राहिम ने अद्भुत बुद्धिमानी का परिचय दिया। उन्होंने इन प्रतिभाशाली लोगों का आपस में परिचय करवा कर उनके मिल-जुल कर कार्य करने का मार्ग प्रशस्त किया ।
पेरिस में एक वर्ष रहने के पश्चात्‌ 1982 के जून में वे मुक्त विश्र्वविद्यालय की स्थापना के लिए बेरूत चले आये। यह कार्य उन्होंने यूनेस्को और पीएलओ के साथ मिल कर किया । उनके बेरूत आगमन के दो दिनों के बाद आइ डी एफ (IDF) ने लेबनान पर आक्रमण कर दिया और उसके तुरन्त बाद ही उनक नया घर एक इजरायली रॉकेट द्वारा ध्वंस हो गया । अगले दो महीने वो बेरूत में फंसे रहे । यह समय उन्होंने अपने घनिष्ठ मित्र सोहेल मियारी के साथ मेरी मां के घर में गुजारा। उन कठिन दिनों में हम निरन्तर एक दूसरे के सम्पर्क में थे। इसमें अराफात ने हमारी सहायता की । अराफात में अमेरिकी प्रशासन से मध्यस्थत्ता में बहुत से लोगों की सहायता ली जिनमें एक मैं भी था।
            बेरूत संभवतः इब्राहिम के जीवन के अब तक और बाद के अनुभवों में सबसे महत्वपूर्ण रहा । इस अनुभव ने सबसे पहले उन्हें यह सिखाया कि मध्य पूर्व में किस प्रकार श्रेष्ठ संगठनों को औसत बुद्धि के लोगों और राजनैतिक तथा सामाजिक क्रूर अस्थिरता ने नष्ट कर दिया। दूसरी सीख उन्होंने यह ली कि सत्ता की शक्ति का वास्तविक समीकरण किस प्रकार सत्तानशीनों को प्रभावित करता है और उन्हें भी जो सत्ताविहीन हैं। तीसरी और शायद सबसे महत्वपूर्ण बात उन्होंने यह जानी कि जीवन में प्रयास करते रहना चाहिये भले ही असफलता कितने ही डरावने रूप में मंडरा रही हो। इब्राहिम का यही रूप सबसे वास्तविक था - एक ऐसा आदमी जो लगातार प्रयत्नशील रहने के महत्त्व को समझता है, अपने साथियों के प्रति सदैव निष्ठा रखता है, जो सर्वदा आशावादी बना रहता है (और मृत्युदंश जैसी परिस्थितियों में भी अपना हास्य बोध बनाये रखता है)।
            वे मुझसे अक्सर कहा करते थे - हमलोग बहुत सामान्य लोग हैं एडवर्ड, बहुत सामान्य पर अंत में देखना इजरायलियों की सारी प्रतिभा को यही सामान्यता पराजित करेगी किन्तु साथ ही यह अवश्य कहते - हम अच्छे इंसान हैं और .जिद्दी भी, हांलाकि हम हमेशा चतुर नहीं हैं। उन्हें ओस्लो अनुबंध की सबसे अधिक परेशान करने वाली बात फिलिस्तीनियों की अवमानना लगती थी। अराफ़ात की दीनता और विदूषक जैसी भावभंगिमा ने हम दोनों को बहुत उद्वेलित किया था और हम इस बात पर बहुत शर्मिन्दा थे कि ओस्लो अनुबंध के पहले हम उसके साथ थे। मुझसे विपरीत इब्राहिम फिलिस्तीन के उस भाग में रहना चाहते थे जो ओस्लो अनुबंध द्वारा तैयार हुआ था और आंशिक रूप से ,जबरन इजरायली 'एरिया ए' से दूर था और यही वह स्थान था जहां इब्राहिम ने स्वयं को, अपने साथियों को और अपने विद्यार्थियों का कर्म-स्थल बनाया।
            इब्राहिम विद्वानों और बुद्धिजीवियों में आस्था रखते थे - वे चाहे अरब के हों या पश्चिम के । किसी में प्रतिभा देखकर वे उत्साहित हो जाते थे क्योंकि इससे उन्हें उस छिपी हुई प्रतिभा को सामने लाने का अवसर मिलता था। उनके द्वारा प्रशंसित एवं श्रेणीबद्ध लोगों को हमेशा लगा कि दुनिया में लोग तो बहुत से हैं पर मैं विशिष्ट हूं। उनके जैसा उत्साहबर्द्धक संरक्षक और प्रायोजक कोई नहीं था। उनके मुंह से 'तुम अद्भुत तो' सुनने जैसा और कोई अनुभव नहीं था पर साथ ही जब वे किसी के लिए यह कहते थे कि वह मूर्ख (Jerk) है तो प्रथम ध्वनि को अपनी भारी जाफा उच्चारण के साथ और भारी कर देते थे।

 शिक्षक के रूप में वे दो मनःस्थितियों के मध्य झूलते रहे। विद्यार्थियों को प्रभावित एवं शासित करने की इच्छा और उनके साथ समान होने की कामना । तीन प्रतिभाशाली पुत्रियों के पिता और बेहद प्रतिभा सम्पन्न नारी के पति होने के कारण वे अन्य अरब अथवा पश्चिमी पुरूषों की तुलना में स्त्रियों के प्रति अधिक सहिष्णु थे। यहां तक कि पितृवत् व्यवहार करते समय भी वे भ्रातृवत् समानता बनाये रखते थे किसी ने शायद ही कभी उनके तानाशाह रूप को देखा हो हांलाकि किसी महत्वपूर्ण लक्ष्य के लिए वे तानाशाही बहुत प्रभावशाली ढंग से उपयोग कर सकते थे। उनके व्यक्तित्व की दहाड़ती सतह के नीचे एक बेहद दयालु हृदय धड़कता था।
            हममें से बहुतों की तरह इब्राहिम भी कभी फिलिस्तीन के अभाव को भूल नहीं सके, उनके आरम्भिक जीवन के शरणार्थी दिनों की स्मृति उन्हें कभी नहीं भूली । हांलाकि उन दिनों की स्मृतियों को उन्होंने कभी अभिव्यक्त नहीं किया पर इजरायल के प्रति उनके क्रोध का वे सदैव एक अंश बनी रहीं और इसी कारण वे जानते समझते थे कि यह संघर्ष जटिल है और लंबा चलने वाला है, हमारे जीवन में हमें आत्म निर्णय का अधिकार मिलने वाला नहीं है। ''फिलीस्तीन के रूप परिवर्तन'' (उनके सुप्रसिद्ध निबन्ध संग्रह का शीर्षक भी है जिसमें उन्होंने .जियोनिज्म द्वारा देश की लूट को कठोर शब्दों के स्थान पर तनिक कोमलता से व्यक्त किया है) ने उनके जीवन के कार्यों को किसी न किसी रूप में प्रभावित किया, किन्तु वे विचारहीन उग्रपंथी नहीं थे बल्कि भयजनक सीमा तक स्वतंत्र चिन्तक थे। वे अक्सर धीमी गति से प्रहार करने वाले आलोचना मूलक बुद्धिजीवी थे। इस तथ्य के उपरान्त भी कि वे आजीवन व्यक्तिगत एवं पेशागत रूप में किसी विशेष उद्देश्य के लिए कार्य करते रहे उन्हें किसी भी तरह पेशेवर नहीं कहा जा सकता बल्कि वे सदा एक ऐसे अनाड़ी की तरह कार्य करते रहे जो प्यार और प्रतिबद्धता से चालित था।
            इब्राहिम ने मुझे फिलिस्तीन के वास्तविक विषयों और अनुभवों से परिचित करवाया था । वे मुझसे सात वर्ष बड़े थे और फिलिस्तीन की अवश्यम्भाविता से ज्यादा गहरे गुंथे हुए थे । उन्होंने मुझमें और मेरे जैसे बहुतों में अपनी दफनायी हुई आरम्भिक स्मृतियों को फिर से पाने की इच्छा जगायी, इसके पहले कि नक्ब सब कुछ समाप्त कर दे। उन्हें हमारे इतिहास की विस्तृत और सूक्ष्म जानकारी थी, वे इतिहास बहुत अच्छा समझते थे साथ ही उन्हें अद्भुत रूप से यह स्मरण था कि कौन सी वस्तु और व्यक्ति कहां से आये, कहां गये, वे अब कहां हैं अथवा वे कब लुप्त हो गये।
            सन्‌ 1940 के दशक में जाफ़ा का उल्लेखनीय महत्व है। इब्राहिम के स्कूल 'अमरिये' से चकित कर  देने वाले प्रतिभाशाली किशोरों - युवकों का दल निकला । इनलोगों ने शरणार्थी के रूप में, कार्यकर्त्ता, विद्वान और व्यवसायी बन कर जीवन आरम्भ किया। इब्राहिम ने इनलोगों से मेरा परिचय करवाया और वे मेरे घनिष्ठ मित्र बने। उन्हीं में इब्राहिम के भव्य, पी.एल.ओ. महारथी एवं कुशल वक्ता मित्र शफ़ीक-अलहुत भी थे जिन्होंने बेरूत कभी नहीं छोड़ा, 1982 की शरत्‌ ऋतु में शहर के इजरायइलियों द्वारा हस्तगत कर लेने पर भी नहीं। हां ओस्लो अनुबंध में अराफ़ात से तीव्र असहमति के कारण उन्होंने कार्यकारी समिति से त्यागपत्र अवश्य दे दिया था। और थे अब्दुल मोहसिन-अल-क़तन - एक सफल व्यवसायी जिन्होंने फिलिस्तिनियों की संस्थाओं की स्थापना के लिए अपनी अधिकांश सम्पत्ति दी और शफ़ीक तथा इब्राहिम की तरह वे भी ओस्लो अनुबंध के मुखर आलोचक थे।
            इब्राहिम इन सबों को अपने मध्यकालीन तिथिविज्ञान और अद्भुत उत्साह से दीप्त रखते थे। नेशनल काउन्सिल वेलफेयर ऐसोसियेशन की सभाओं में उन्होंने संख्या में सदैव विस्तारित होते फिलिस्तीनियों को एक दूसरे से मिलवाया। इन संकोची और शर्मीले लोगों से वे आश्चर्यजनक सूचनाएं एकत्रित कर लेते थे जिनका वे बड़ा समुचित उपयोग करते थे। फिलिस्तीन की कहानी के सबसे ठोस पक्ष के रूप में वे शिक्षकों, वकीलों, विद्वानों, बैंक कर्मचारियों और इंजीनियरों को विशेष महत्व देते थे। जैसे-जैसे वे कहानी कहते जाते थे सुनने वाले को लगता था कि वे कुछ भी भूलते नहीं हैं। उनकी कॉनरेडी (Conradian) विशिष्टता उनकी कही हुई हर बात को गहराई प्रदान करती थी। अरब और उस के राष्ट्रीय मुक्ति संग्रामों और उत्तर औपनिवेशिक राजनीति का अमेरिका से परिचय हो जाता है।
       इब्राहिम में क्षेत्रीयतावाद नहीं था वे केवल फिलिस्तीनी राष्ट्रवाद के समर्थक नहीं थे। उनका व्यापक दृष्टिकोण एवं पूरी दुनिया घूमने की उनकी आकांक्षा ईर्ष्या योग्य थी। वे उन स्थानों के बारे में अत्यन्त अधिकार पूर्वक बात करते थे जहां जाने के बारे में मैं सोच भी नहीं सकता था। ऐसे स्थानों की सूची में पेरू, चीन और रूस भी थे। वे बड़े शहरों में रहना पसंद करते थे और अक्सर अपना समय पेरिस, काइरो और शिकागो में व्यतीत करते थे।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फिलिस्तीनी मुद्दे पर लोगों की सहायता करने की शक्ति और सीमा से वे भली-भांति परिचित थे। जैसे मुझसे एक दशक पहले ही वे इस बात को समझ गये थे कि सी.एल.आर. जेम्स अपने को पश्चिम के व्यक्ति के रूप में देखता है अरबों के साथ अपने को जोड़ा जाना वह सहज ही स्वीकार नहीं करेगा। इसी के साथ वे अफ्रीकी अध्ययन के नार्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटीज प्रोग्राम के निदेशक होने के नाते अफ्रीका के मुक्ति संग्राम से बहुत अच्छी तरह परिचित थे। इसके कुछ महत्वपूर्ण नेताओं को उन्होंने नॉर्थवेस्टर्न निमंत्रित भी किया था। अमिलकर काबराल और ऑलिवर टैम्बो जैसे व्यक्तित्वों की सराहना वे बहुत पहले ही कर चुके थे। न केवल उन्होंने इन व्यक्तित्वों की विशिष्टता पहचानी थी बल्कि वे उन कारणों के महत्व को भी रेखांकित कर सके थे जिनके लिए ये महान शख्सियतें संघर्ष कर रही थी। उन्होंने इन सभी संघर्षों एवं समस्याओं से फिलिस्तीन को जोड़ कर देखा। उन्हीं के माध्यम से अरब राष्ट्रवादी विमर्श के महान व्यक्तित्वों से परिचय संभव हो जाता है जैसे मुहम्मद हसनैन हकाल और मुनीफ़ अल रजाज से परिचय संभव हो पाता है।
            अपने दूसरे साथी इकबाल अहमद से 1970 में पहली बार मैं इब्राहिम के सौजन्य से ही मिला। इकबाल अहमद की असमय मृत्यु ने मुझे बहुत खालीपन से भर दिया। इब्राहिम की तरह इकबाल भी (अगर इब्राहिम द्वारा किसी की प्रशंसा में कहे गये सर्वोच्च शब्द का व्यवहार करूं तो) 'असल' इंसान थे - 'सच्चे', 'खरे'। इब्राहिम की ही तरह वे भी अत्यन्त उर्वर प्रतिभा के धनी थे, किसी बात को समझाने में वे अपनी सानी नहीं रखते थे। इन दोनों के साथ देर रात तक बैठकर उनकी सम्मोहक, विस्तीर्ण और ज्ञानप्रद बातें कभी कभी रहस्यमयी भी सुनते हुए खामोशी के गहन आगोश में डूबते जाना एक अद्भुत अनुभव था।
बातचीत की शैली चाहे जैसी भी रही हो पर वार्ता अपने लक्ष्य से कभी नहीं भटकी। मेरे दोनों गुरूओं में से कोई भी वक्त के प्रति कभी कंजूस नहीं रहा शायद इसी वजह से वे प्रिंट मीडिया की सापेक्षिक कंजूसी के प्रति लापरवाह रहे। मेरी बीमारी के दिनों में उन लोगों ने अपनी भाषा शैली, कई भाषाओं के ज्ञान और किस्से कहानियों और अपने विचारों की उदारता से मुझे जिस प्रकार उपकृत किया उसे स्वीकार कर मैं आज भी संकोच में पड़ जाता हूँ । यह संकोच मुझे उन बातों का यहां उल्लेख करने से रोक रहा है । मुझे सबसे अधिक सदमा उस बात से लगा है कि वे मुझसे पहले चले गये, वह भी आज के इन हालातों में जब मानवता के हक में उनकी आवाजों की सबसे अधिक जरूरत थी।
            दो वर्ष पहले इक़बाल की मृत्यु के समय उन पर लिखते हुए और आज इब्राहिम पर लिखते हुए उनकी उपलब्धियां गिनवाना मेरे लिए एक कठिन कार्य है। ये दोनों जिससे भी मिले उस पर उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी। इनकी उपलब्धियां किसी एक संस्था में सीमाबद्ध नहीं थी वे तो विभिन्न सभाओं, संस्थाओं, दलों, संगठनों और परिवारों के बीच बिखरी हुई हैं । उन्होंने अपने सम्पर्क में आने वाले हर व्यक्ति को प्रभावित किया प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में।
            अपने जीवन के अंतिम वर्षों में दोनों अपनी जड़ों की और लौट गये; इकबाल, बिहार के मूल निवासी, इस्लामाबाद और इब्राहिम, जाफा के मूल निवासी, रामल्लाह लौट गये। पर असल में घर नहीं लौटे।
अपनी स्मृतियों को पुनः पाने की प्रक्रिया में हम उसे अधिक जड़ बनाते चलते हैं, उन्हें कैद करने के इस प्रयास में हम उन स्मृतियों से धोखा करते हैं - उन स्मृतियों से जिनके पक्ष में ये लोग खड़े थे - ऊर्जा, प्रवाह, खोज और खतरे उठाने की क्षमता । फिलिस्तीन के लंबे इतिहास की स्मृति में इब्राहिम सदा अनुकरण योग्य व्यक्तित्व बने रहेंगे। किसी लक्ष्य के प्रति समर्पित होना किसे कहते हैं इब्राहिम को देख कर समझा जा सकेगा। वे केवल श्रद्धानत नहीं करते बल्कि उसी प्रकार जीने और जीवन के निरन्तर पुनर्परीक्षण के लिए प्रेरित करते हैं। उन्हें पूरी तरह समझने के लिए उन संघर्षों और सिद्धांतों को अच्छी तरह समझना होगा जिनसे उनका जीवन एक क्षण भी विलग नहीं हुआ, उनकी सार्थकता उनके अनुकरण में नहीं उनके जिये सिद्धांतों को फिर से जीने में है इस गुंजाइश के साथ कि भविष्य में इनके प्रति आलोचनात्मक दृष्टि रख इन्हें सुधारा जा सके।









शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

फिलीस्तीन मुक्ति सप्ताह - फिलीस्तीन के बिना अधूरा है प्राच्यवाद - सुधा सिंह






आलोचकगण जब 'ओरिएण्टलिज्म' पर विचार करते हैं तो यह भूल जाते हैं कि आखिरकार सईद को यह किताब लिखने की जरूरत क्यों पड़ी ?
     यह किताब जब लिखी गयी थी तब सारी दुनिया में नए सिरे से नव्य-औपनिवेशिकता और नव्य-आर्थिक उदारतावाद की मुहिम शुरू हो चुकी थी। इस मुहिम का लक्ष्य नए किस्म की वैचारिक गुलामी था। द्वितीय विश्वयुध्दोत्तार दौर में मध्य-पूर्व से इसका सिलसिला आरंभ हुआ था और आज वह अपनी पकड़ में सारी दुनिया को ले चुका है। यही वह प्रस्थान-बिंदु है जिसके कारण 'ओरिण्टलिज्म' का संदर्भ-सूत्र मध्यपूर्व और साम्राज्यवाद विरोध है। 'ओरिण्टलिज्म' लिखने का मकसद विचार-विमर्श करना मात्र नहीं है बल्कि साम्राज्यवाद के वैचारिक ताने-बाने से कैसे मुक्त हुआ जाए,उसके रास्ते तलाशना भी है। युध्दोत्तार दौर में साम्राज्यवाद के खिलाफ विश्वव्यापी चेतना पैदा करने में इस कृति को केन्द्रीय भूमिका है। यह किताब साम्राज्यवाद निर्मित विचारों ,केटेगरी,संस्थान, प्रक्रिया और प्रभाव का समग्रता में मूल्यांकन पेश करती है। इस किताब का लक्ष्य है साम्राज्यवाद के द्वारा निर्मित केटेगरी ,अवधारणाओं आदि को चुनौती देना और उनके विकल्पों की खोज करना। उल्लेखनीय है कि नई समीक्षा,रूपवादी समीक्षा,संरचनावाद,कांग्रेस फोर कल्चरल फ्रीडम आदि के माध्यम से संस्कृति,साहित्य और कला जगत में जिस तरह का अ-राजनीतिक,जनतंत्र विरोधी और वर्चस्ववादी माहौल बनाया गया था उसे विश्वस्तर पर अपदस्थ करने में इस किताब की केन्द्रीय भूमिका है।
         'ओरिण्टलिज्म' को पढ़ते समय अनेक बार यही लगता है कि 'यह छूट गया' ,मेरी बात भी कह दी जाती अथवा मेरा संदर्भ होता तो अच्छा होता। यह अनुभूति स्वयं इस किताब की सबसे बड़ी ताकत है। मानविकी और समाजविज्ञान में साम्राज्यवादी विचारों के वर्चस्व को इस अकेली किताब ने जितनी बड़ी चुनौती पेश की,वैसे चुनौती माक्र्स रचित 'कम्युनिस्ट घोषणापत्र'' के बाद अन्य कोई किताब पैदा नहीं कर पायी है। जिस तरह पश्चिम से लेकर पूरब तक सभी विचारधारा के लोगों को 'कम्युनिस्ट घोषणापत्र '' ने आकर्षित किया, उसे मानव मुक्ति का महापाठ बनाया ठीक वैसे ही 'ओरिण्टलिज्म' को साम्राज्वाद विरोधी मुक्तिकामी ताकतों ने अपना महापाठ बनाया। माक्र्स ने मजदूरों और समूचे समाज की मुक्ति के सपने को केन्द्र में रखकर पूंजीवाद की तीखी आलोचना की और समाजवाद का विकल्प पेश किया। वहीं सईद ने 'ओरिण्टलिज्म' के जरिए साम्राज्यवाद से मुक्ति और समतावादी जनतंत्र का सपना पेश किया। फर्क यह है माक्र्स पूंजीवाद की जगह समाजवाद चाहिए था, जबकि सईद को पूंजीवाद में ही गैर-साम्राजी जनतांत्रिक विकल्प चाहिए। आत्मनिर्भर संप्रभु राष्ट्र और जनतांत्रिक समाज व्यवस्था चाहिए।
   सईद ने जब प्राच्यवाद पर लिखा तो उस पर व्यापक प्रतिक्रिया व्यक्त हुई। सईद ने 'पश्चिम' और 'प्राच्य' की एक ही केटेगरी बनायी, जबकि सच यह है कि 'पश्चिम' एक नहीं अनेक हैं, उसी तरह 'प्राच्य' एक नहीं अनेक हैं। इन दोनों के बीच के अन्तर्विरोधों को सामान्यीकरणों के सहारे नहीं समझा जा सकता। समय-समय पर इनके अंतर्विरोध के मुख्य बिंदु में भी बदलाव होता रहा है। स्वयं सईद ने माना है कि प्राच्यविदों ने काफी काम किया है उन्होंने भाषा के नियम बनाए,डिक्शनरी,मृतयुगों को जिंदा किया, सैंकडों किताबों का अनुवाद किया, सीखने लायक बहुत कुछ निर्मित किया।
      'ओरिएण्टलिज्म'  में शुरू से अंत तक सईद का प्राच्यवादी ज्ञान को लेकर एक तरह संदेह का भाव  है। वे इस ज्ञान को सत्ता के आईने में रखकर देखते हैं। सत्ता के संबंधों के साथ जोड़कर देखते हैं। सवाल यह है क्या यह बात भाषा के नियमों अथवा संहिता पर भी लागू होती है ? क्या यह बात अनुदित पाठ पर भी लागू होती है ? सवाल यह है कि किस तरह का ज्ञान साम्राज्य के संपर्क के कारण दुरंगी भूमिका अदा करता है ? उसे हम स्वीकार करें या न करें ? प्राच्यवाद का आम विमर्श के रूपों और प्रस्तुतियों के साथ किस तरह का संबंध है ? व्यक्तिगत का प्राच्यवाद से क्या संबंध है ? सईद ने जब प्राच्यवाद के बारे में लिखना शुरू किया था तो कहा था कि प्राच्यवाद उन्माद है। प्राच्यवाद एटीट्यूट यानी संस्कार है। यह मूलत:''इम्पीरिकल'' विरोधी है। सवाल यह है ये तीनों बातें सभी प्राच्यविदों पर लागू होती हैं अथवा कुछ पर ही लागू होती हैं।
      'ओरिएण्टलिज्म' के पन्द्रह साल बाद 'कल्चर एंड इम्पीरियलिज्म' नामक किताब आयी और इस किताब में सईद ने व्यापक तौर पर यह स्थापित किया कि ज्ञान और सत्ताा का गहरा रिश्ता होता है। इसकी व्याख्या के क्रम में संस्कृति और साम्राज्य के अन्तस्संबंध पर सईद ने नयी धारणाएं पेश कीं, कुछ लोगों को इनमें स्पष्टता का अभाव भी नजर आता है। समग्रता में संस्कृति और साम्राज्य के अन्तस्संबंध की धारणा उलझनें ज्यादा पैदा करती है। इसमें भी सामान्यीकरण्ा के फार्मूलों को सईद ने लागू किया है। सईद के लेखन की विशेषता है कि उन्होंने बार-बार प्राच्यवाद पर ही लिखा है। सवाल यह पैदा होता है कि प्राच्यवाद के विभिन्ना विमर्शों को पेश करते हुए सईद आखिरकार क्या कहना चाहते हैं ? वह किस तरह के विचारों के इतिहास को पेश करना चाहते हैं ?प्राच्यवाद के विमर्श में कौन सा विचारक सबसे ज्यादा प्रभावित करता है और किन लोगों को प्रभावित करता है ? वर्चस्वशाली अभिजन कौन है ?राज्य के संस्थान किस तरह के हैं ? जनता की राय क्या है ? ये सवाल हैं जिन पर सईद के यहां साफ नजरिया दिखाई नहीं देता। यह भी स्पष्ट नहीं होता कि विभिन्ना विधा रूपों का आपस में किस तरह का संबंध था ? अपने युग के साथ किस तरह का संबंध था ? अथवा विभिन्ना युगों के साथ विधा का किस तरह का संबंध था ? विभिन्ना संस्कृतियों और इतिहास के बीच किस तरह का संबंध था ? विभिन्ना साम्राज्यवादी देशों का अपने उपनिवेशों के साथ किस तरह का संबंध था ?
     सईद के ओरिएण्टलिज्म में अनेक महत्वपूर्ण चीजें अनुपस्थिति हैं। मसलन् इसमें किपलिंग के मात्र पांच संदर्भ हैं। फ्रांसीसी भाषा विज्ञानियों और ब्रिटिश घुमंतू बौध्दिकों ,जर्मन प्राच्यविदों का कहीं पर भी जिक्र नहीं है। इसके अलावा पापुलर कल्चर के बारे में एकसिरे से मूल्यांकन गायब हैं। 19वीं और बीसवीं सदी के उत्तारार्ध्द के प्रेस को लेकर कोई समझ नजर नहीं आती। सईद के एकांगी नजरिए का ही परिणाम है कि उन्हें पश्चिम की आक्रामकता नजर आती है किंतु पूरब की आक्रामकता नजर नहीं आती। क्या यह संभव है कि मध्ययुग के पूरब के हमलावरों को भूल जाएं ? सईद के अनुसार प्राच्य पीड़ित रहा है पश्चिम के द्वारा। पश्चिम का वर्चस्व रहा है। सवाल यह है कि पश्चिम का जिस जमाने में वर्चस्व था उस समय पश्चिम का प्रतिरोध हो रहा था या नहीं ? उस प्रतिरोध की आवाज को खोजने में सईद असमर्थ रहे हैं। सईद की प्राच्यवाद संबंधी प्रस्तुति यही संदेश देती है गैर पश्चिमी जगत पराजित हो रहा है अथवा चुप है। वे यह बात कहीं पर भी रेखांकित नहीं करते कि गैर पश्चिमी समाज के प्रतिरोध और प्रतिवाद के क्या रूप रहे हैं ? इन समाजों के आंतरिक क्या कारण अथवा अंतर्विरोध रहे हैं ? साम्राज्यवाद का फिनोमिना बहुत बाद के वर्षों में आया है इसे मध्यकाल में अथवा मध्यकालीन मानसिकताओं और मूल्यों की जड़ों में खोजना मूर्खता होगी। यह सच है कि साम्राज्यवाद ने मध्यकालीन रूढ़ियों का अपने पक्ष में इस्तेमाल किया है। किंतु प्रत्येक देश में उसके आंतरिक ताने-बाने पर नजर डालने की जरूरत है ,आंतरिक अन्तर्विरोधों और पहले से चली आ रही मूल्य-संरचनाओं और संस्कृति के बीच के द्वंद्वात्मक संबंध की जटिलताओं को खोला जाना चाहिए। सईद के नजरिए में असल कमजोरी यहीं पर है। सईद की सबसे बड़ी कमजोरी है कि उन्होंने सारी बीमारियों की जड़ साम्राज्यवाद को बना दिया है। काले और गोरे के भेद को बना दिया है। आधुनिककाल में सामाजिक,सांस्कृतिक अध्ययन में साम्राज्यवाद समस्या का एक बड़ा बिंदु है किंतु इसे सर्वस्व नहीं समझना चाहिए। आज भी मध्यकालीन प्रेतबाधाएं और मूल्य हैं जो पूरब के देशों में तबाही मचा रहे हैं। कायदे से देशज समस्या की आंतरिक सांस्कृतिक परतों का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।  
      'ओरिएण्टलिज्म' में फिलीस्तीन व्यापक संदर्भ में दाखिल होता है। अरब,इस्लाम,पूरब आदि के प्रति साम्राज्यवाद के पूर्वाग्रहों और घृणा के वे अंतिम पीड़ितों में से एक हैं। साम्राज्यवाद के पूर्वाग्रह सिलेसिलेबार,योजनाबध्द और सुसंगत रूप में काम करते हैं। उन्हें ही सईद ने 'ओरिएण्टलिज्म' की संज्ञा दी है। इस किताब का इसलिए भी महत्व है कि इसने प्राच्यवाद की परिभाषा और दायरा भी बदला है। पहले प्राच्य अध्ययन की शाखाएं यूरोपीय परंपरा का अध्ययन करती रही हैं। खासकर यूरोपीय इतिहासकारों और कला संग्रहकत्तर्ााओं का अध्ययन करती रही हैं।
         सईद का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने प्राच्यवाद को 'भेद की विचारधारा' के आधार पर व्याख्यायित किया है। यह ऐसी विचारधारा है जो पूरब पर अपने आधिपत्य को हर तरह से वैध ठहराने की कोशिश करती रही है। प्राच्यवाद एक तरह से प्रच्छन्ना नस्लवाद है जो अपनी प्रतिगामिता और निरंतरता को होमर के समय से लेकर आज तक बनाए हुए है। खासकर इनलाइटेनमेंट से आज तक अपनी निरंतरता बनाए हुए है। सईद के अनुसार 'प्रत्येक यूरोपीय अपने को प्राच्यविद ,नस्लवादी,साम्राज्यवादी और कुल मिलाकर जातीयकेन्द्रिक मानता है।'' अपने तर्क की पुष्टि के लिए सईद ने व्यापक परिप्रेक्ष्य में विभिन्ना विधा रूपों में काम करने वाले बौध्दिकों के संदर्भ का इस्तेमाल किया है। ये सारे संदर्भ और विधा रूप मिलकर एक ही विमर्श तैयार करते हैं जिसे हम प्राच्यवाद के नाम से जानते हैं। ज्ञान की विभिन्ना शाखाओं के पाठ का इस्तेमाल करते हुए सईद ने इन पाठों के बीच के अन्तर्सबंधों का भी खुलासा किया है। विभिन्ना शाखाओं के पाठ मिलकर किस तरह प्राच्यवाद का पाठ तैयार करते हैं और किस तरह यह प्रक्रिया प्रच्छन्ना तरीके से हमारी चेतना में प्रवाहित होती रहती है और किस तरह साम्राज्यवादी पूर्वाग्रह हमारे बौध्दिक चिन्तन और संस्कृति में घुस आए हैं, इन सब पहलुओं पर 'ओण्टिलिज्म' में प्रकाश ड़ाला गया है।
सईद के 'ओरिएण्टलिज्म' संबंधी विवेचन की मूल चिन्ता प्राच्यवाद को समग्रता में उद्धाटित करने की है। वे प्राच्यवाद के संभावित दायरों का भी खुलासा करते हैं। साथ ही प्राच्यवादी कठमुल्लेपन को निशाना बनाते हैं। प्राच्यवादी कठमुल्लापन कविता,कहानी,उपन्यास आदि के जरिए साधारण जनता के बीच प्रवाहित होता रहा है। प्राच्यवादी चिन्तकों ने अपनी एक खास किस्म की पहचान बनायी हुई है। वे अपने को खोजी, सत्यान्वेषक के रूप में पेश करते रहे हैं। सईद उनके इसी पाखण्डी रूप को उद्धाटित करते हैं। सईद ने लिखा है कि प्राच्यविद वे लोग हैं जो पश्चिम के श्रेष्ठत्व को किसी न किसी रूप में पेश करते हैं उसकी वकालत करते हैं। ये साम्राज्यवादी सत्ता के खेल का हिस्सा हैं। इस प्राच्यवादी मानसिकता के लेखक और बुध्दिजीवी अरब और मुस्लिम जगत में साम्राज्यवाद के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जाने-अनजाने मदद करते रहे हैं।  इससे तीसरी दुनिया के देशों के ज्ञान को सत्ता को प्रदूषित करने में सफलता मिली है। सत्ता के प्रदूषण से बचने का क्या उपाय है ? सईद ने सन् 1981 में लिखा '' मैं सोचता हूँ कि ज्ञान को गैर-विशेषज्ञों के लिए खोल देना चाहिए।''

( लेखिका- सुधा सिंह , एसोसिएट प्रोफेसर , हिन्दी  विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय , दिल्ली )
  




फिलीस्तीन मुक्ति सप्ताह - फिलीस्तीन के ध्रुवतारे थे एडवर्ड सईद - हितेन्द्र पटेल





                                                                                        

           
प्रख्यात विद्वान एडवर्ड सईद (1935-2003) अब नहीं हैं । इनकी मृत्यु के बाद सारी दुनिया के बौद्धिक जगत में एक खालीपन का अहसास बहुतों को हुआ होगा। आज के उत्तर-आधुनिक दौर में जहां विचारों और विचारकों के हस्तक्षेप की महत्ता कम होती दीखती है एडवर्ड सईद की उपस्थिति और हस्तक्षेप का महत्त्व वे तमाम लोग समझते हैं जो अमरीकी साम्राज्यवाद का विरोध करते रहे हैं। सईद की अमरीका में उपस्थिति इस बात के लिए आश्वस्त करती थी कि इस्राइली समर्थक अमरीकी मीडिया के चौंधिया देने वाली ताकत के मुकाबले खड़ी रहने वाली यह आवाज दब नहीं सकती । अमरीकी ताकत का असली अंदाजा उन लोगों को होता है जो फिलीस्तीन जैसी 'आशा' और प्रेरणा के साथ अमरीकी 'प्रौपेगैण्डा' के सामने खड़े रहे हैं। निश्चय ही सईद इस 'आशा' की सबसे प्रतिनिधि आवाज थे।
            जिन लोगों से एडवर्ड सईद का परिचय थोड़ा कम है उनकी सुविधा के लिए उनके बारे में कुछ तथ्य इस प्रकार हैं। अब्राहिम वडी (Wadie) एक फिलीस्तीनी प्रोटेस्टैंट ईसाई थे। उनका जन्म 1895 में हुआ था। 16 वर्ष की आयु में उन्हें ऑटोमन साम्राज्य की सेना में भर्त्ती कर लिये जाने के भय से बाहर भेज दिया गया। लिवरपूल होते हुए अब्राहिम अमरीका पहुंचे जहां वे विलियम सईद बन गये। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फ्रांस में रहकर अमरीका की ओर से सैनिक सेवा में योगदान किया। उन्हें अमरीकी नागरिकता मिल गयी लेकिन 1919 में वे वापस अपने वतन फिलीस्तीन लौट गये । वहां अपने चचेरे भाई की कम्पनी - फिलीस्तीन ऐडुकेशन कंपनी में बराबर के पार्टनर बन गये। 1929 में वे मिस्र गये। वहीं उन्होंने अपनी एक कंपनी बनायी - स्टैंडर्ड स्टेशनरी कंपनी। विलियम वडी (Wadie) ने व्यापार में बहुत सफलता पायी और उनकी कम्पनी की शाखाएं काहिरा, एलेक्जेन्ड्रिया और कई अन्य जगहों पर खोली गयीं।
            विलियम और उनकी पत्नी ने काहिरा में होते हुए भी यरूसलम से लगातार सम्पर्क बनाये रखा। वहां वे जाते रहते थे और उनकी इच्छानुसार उनकी संतान का जन्म यरूसलम में ही हुआ। 1 नवम्बर 1935 को यरूसलम में पुत्र के उत्पन्न होने पर विलियम की पत्नी ने उसका नाम रखा - एडवर्ड । वे प्रिंस ऑव वेल्स को बहुत पसंद करती थीं और उन्हीं के नाम पर उन्होंने अपने पुत्र का नामकरण किया था।
         एडवर्ड का बचपन और प्राथमिक शिक्षा-दीक्षा काहिरा में ही हुई हांलाकि विलियम परिवार यरूसलम से अपना सम्पर्क बनाये हुए था। एडवर्ड की शिक्षा-दीक्षा एकदम अंग्रेजी साहबों के बच्चों की तरह हुई। काहिरा में वे जिस अमरीकी स्कूल में पढ़ते थे उस स्कूल में हैंडबुक के प्रथम पृष्ठ पर लिखा होता था - ''अंग्रेजी इस स्कूल की भाषा है। जो विद्यार्थी अंग्रेजी के अलावा किसी अन्य भाषा में बातें करते पकड़े जायेंगे उन्हें दंड दिया जायेगा।''
इस स्कूल के सभी शिक्षक अंग्रेज थे। एडवर्ड सईद लिखते हैं कि उस स्कूल में किसी भी छात्र की भाषा अंग्रेजी नहीं थी। उन सभी विद्यार्थियों (जो अर्मेनियन, ग्रीक, इटालियन, यहूदी और तुर्क थे) की अपनी-अपनी भाषाएं थीं पर उनका प्रयोग विद्यालय में निषिद्ध था। हांलाकि हमलोग आपस में हमेशा अरबिक या फ्रैंच में बातें करते थे।''

सईद ने लिखा है कि भाषा, संस्कृति, नस्ल और जाति ('एथनिक') के आधार पर हमें ब्रिटिश लोगों से कमतर समझा जाता था। इस कमतरी के एहसास और अपनी संस्कृति के प्रति दमनकारी पश्चिमी सांस्थानिक दबावों से सईद इस स्कूल के माध्यम से परिचित हुए। बाद में मशहूर विक्टोरिया कॉलेज में दाखिल हुए जहां उनके सहपाठियों में थे - जार्डन के किंग हुसैन और माइकेल शैलहॉब (Shalhoub) माइकेल शैलहॉब बाद में ओमर शरीफ के नाम से विख्यात अभिनेता हुए।
            अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़े रहने की प्रवणता पिता विलियम की तरह एडवर्ड में भी थी। एडवर्ड सईद ने चालीस वर्षों तक अमेरिका में अंग्रेजी साहित्य पढ़ाने के बाद भी कहा था कि उन्हें मालूम नहीं कि उनकी पहली भाषा कौन सी है - अंग्रेजी या अरबी। वे लिखते हैं ''जब भी मैं अंग्रेजी का कोई वाक्य बोलता हूं इसकी अरबी मेरे दिमाग में ध्वनित (echo) होती है।''
            1951 में उन्हें विक्टोरिया कॉलेज से निकाल दिया गया। कारण था अंग्रेज शिक्षकों और छात्रों के साथ दुर्व्यवहार । उस समय तक मिश्र की राजनैतिक परिस्थितियां बदल रही थी। (1952 में मिश्र स्वाधीन हुआ और नासिर सत्ता में आये।) 1951 की सितंबर में
विलियम ने एडवर्ड को मैसैसचर्स (अमरीका) के एक स्कूल में दाखिला करा दिया। एडवर्ड सईद ने लिखा है - ''जिस दिन मेरे माता पिता स्कूल के गेट पर मुझे छोड़कर अपने देश चले गये वह दिन मेरे जीवन का सबसे दुःखद दिन था।''
            अमरीका में आने के बाद एडवर्ड के लिए एक नया माहौल सामने था। उसका नाम था - एडवर्ड, जातीयता थी - फिलीस्तीनी और वह अरबी बोलता था। एडवर्ड ने उन दिनों को याद करते हुए लिखा है कि उनकी समझ में नहीं आता था  कि वे क्या करें। किसी ने उन्हें बताया कि एक शिक्षक है जो मिस्र से आया है। संयोग से उस शिक्षक से एडवर्ड के परिवार का सम्पर्क रहा था। एडवर्ड उनके पास गया और अपना परिचय देने के बाद उनके अरबिक बोलने लगा शिक्षक ने उसे तुरन्त टोका और कहा - ''यहां अरबी में बात मत करो। वहां की चीज मैं वहीं छोड़ कर आया हूं।''
            एडवर्ड पढ़ाई में अच्छे थे इसीलिए धीरे-धीरे आगे बढ़ते गये। बाद में वे यूनीवर्सिटी में अंग्रेजी साहित्य पढ़ाने लगे। 1963 में उनका परिवार मिस्र से लेबनान चला गया। इस बीच सईद का अध्ययन चलता रहा। इस प्रक्रिया में वे एक 'पश्चिमी' व्यक्ति बन गये जिसने साहित्य, संगीत और दर्शन का व्यापक अध्ययन किया था। पर उन्होंने लिखा है - ''इन सबके साथ मेरी परम्परा (Tradition) का कोई सम्बंध नहीं था।'' अपनी परम्परा के सन्दर्भ में अपने ज्ञान को रखने का कार्य उन्होंने कुछ दिनों बाद किया।
            1967 में सईद समेत बहुत सारे लोगों को झटका लगा। अरब-इजरायल युद्ध में इजराइल की विजय के बाद फिलीस्तीनी राष्ट्रवाद ने जोर पकड़ा जिसका मुख्य केन्द्र बना - जॉर्डन उस दौरान सईद के अनुभवों ने उसे बहुत कुछ सिखाया। अमरीका में सभी लोग इस्राइल की विजय का जश्न मना रहे थे। गोल्डा मेयर (Meir) ने 1969 में कहा था - ''कोई भी फिलीस्तीनी नहीं है।'' सईद के अनुसार इतिहास को दबाने की कोशिश की जा रही थी। सईद और उनके 'गुरू और साथियों' के लिए कुछ कर गुजरने का समय गया था।
            एडवर्ड सईद ने फिलीस्तीन के प्रश्न पर लिखना शुरू किया। उन्हें लगने लगा कि पश्चिमी ज्ञान की पूरब संबंधी अज्ञानताओं के खिलाफ लिखना चाहिए। अपनी संस्कृति और इसके इतिहास का अध्ययन करना उन्हें जरूरी लगा। 1972 में एक वर्ष की छुट्टी लेकर उन्होंने अरब के दर्शन और साहित्य का अध्ययन किया। इसने उन्हें 'ओरियन्टलिज्म' की प्रेरणा दी। 1978 में 'ओरियन्टलिज्म' के छपने के बाद तो उन्हें विश्र्वव्यापी ख्याति मिल गयी। तब से लेकर मृत्यु पर्यन्त वे लाखों लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बने रहे। कई पुस्तकें लिखीं और फिलीस्तीन की संघर्षशील जनता की आवाज़ से शुरू करके तृतीय विश्र्व की प्रमुख आवाज़ के रूप में भी चिन्हित हुए।
            बेहद मिलनसार, भावुक, परिश्रमी सईद ने संगीत पर भी पुस्तकें लिखी हैं और वे खुद एक कुशल संगीतज्ञ भी थे।
            1993 में उन्हें डाक्टरों ने बताया कि उन्हें ल्यूकेमिया है और वे अब अधिक दिनों तक नहीं जी पायेंगे। तब जीवट वाले सईद ने कहा था कि मुझे 10 साल और मिल जाये तो मैं अपने बारे में खास तौर पर अपने शुरुआती दिनों के बारे में कुछ लिखूंगा। खुशकिस्मती से उन्हें ठीक दस साल मिले। इस दौरान वे लगातार लिखते रहे। पूरी जीवटता और निर्भीकता के साथ। इस बीच वे अपने देश भी जाते रहे, इस्राइल के विरूद्ध सभाओं में भी शामिल होते रहे, अमरीका की साम्राज्यवादी नीतियों की तीखी आलोचना भी करते रहे और डाक्टरों की हिदायतों के बावजूद लगातार सक्रिय रहे।
            एडवर्ड सईद अमरीका में सक्रिय एक षडयंत्र को साफ-साफ देख समझ रहे थे जहां अमरीकी प्रभुत्व की लालसा में पूरे इस्लामी जगत को एक दुश्मन के रूप में देखा जा रहा था। एडवर्ड सईद ने 9/11 सितंबर 2001 की घटना के बाद अमरीकी रवैये पर दुःख प्रगट करते हुए कहा था कि इस्लाम एक नहीं है जैसे कि अमरीका एक नहीं है। इस्लाम के भी कई रूप हैं। जैसे कि अमरीका के भी कई रूप हैं। सईद ने लिखा है कि अमरीका कैप्टन वहाब की तरह का आचरण कर रहा है जो मॉबी डिक को मारने की जिद के कारण खुद अपने को भी नष्ट करने की ओर बढ़ रहा है।

            सईद का भारत के साथ लगाव था। जब वे कुछ साल पहले भारत आये थे तो जहां जहां वे गये उन्हें, अमरीकी साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ लोकतांत्रिक तरीके से लड़ने की प्रेरणा देते रहे। भारत के मामले में एक ट्रैजेडी यह है कि जब भी ई.पी. टॉम्सन, चॉम्स्की, एडवर्ड सईद जैसे विद्वान भारत आते हैं उन्हें असली भारत से रूबरू होने नहीं दिया जाता। दिल्ली, कलकत्ता और मद्रास के अंग्रेजी (जिसमें वामपंथी कहे जाने वालों की संख्या भी कम नहीं है) ऐसे घेर लेते हैं कि उन्हें जरूर लगता होगा कि वे दिल्ली, कलकत्ता में नहीं किसी अमेरिका या यूरोप की यूनीवर्सिटी में उत्साही लोगों से बातें कर रहे हैं। देशी भाषाओं के मीडिया, संस्थानों और बुद्धिजीवियों को इस ओर ध्यान देना चाहिए। इन सबके बावजूद टाम्सन, चॉम्स्की और सईद की आंखों ने बहुत कुछ देख-सुन लिया। सईद ने कलकत्ता में एक भाषण देते हुए कहा कि भारत का स्वतंत्रता संग्राम उसी समय शुरु हो गया जिस समय अंग्रेजी ताकत ने यहां पांव धरे।

यह बात गौरतलब है कि सईद की पुस्तक 'ओरियन्टलिज्म' (1978) की प्रेरणा ने भारत के इतिहासकारों के एक बड़े मंडल - 'सब-आल्टर्न' -को वैचारिक आधार और दृढ़ता दी। 'ओरियन्टलिज्म' के बगैर 'सबआल्टर्न स्टैडीज' की कल्पना कठिन है।
            सईद ने कई पुस्तकें लिखीं, सैकड़ों लेख लिखे, असंख्य जगहों पर निर्भीक होकर बोलते रहे लेकिन उन्हें इतिहास 'ओरियन्टलिज्म' के लेखक के रूप में ही याद करेगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाना चाहिए कि इस पुस्तक का लगभग 'ग़लत पाठ' ही
सईद की व्यापक प्रसिद्धि का कारण बना। सईद को विख्यात और 'कुख्यात' इसी पुस्तक ने बनाया। इस पुस्तक के बारे में पर्याप्त चर्चा हुई है लेकिन इसको ठीक तरह से नहीं पढ़ा जाता है।

युवा सईद इस बात से परेशान थे कि अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दियों ने 'पूरब' को 'पूरब' बनाया। ये चूंकि 'पश्चिम' की सदियां थी इस पूरी प्रक्रिया को 'पश्चिम' ने नियंत्रित किया। कुल मिलाकर 'पूरब' का एक पाठ बना जिसे 'पूरब' के आधुनिक लोगों ने भी मान लिया। यह दमनकारी पाठ साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा नियंत्रित था। यानि हमारा 'आधुनिक ज्ञान' भी साम्राज्यवादी निर्मिति का ही एक अंग है।
            'ओरियंटलिज्म' ने अधिकतर उन बातों को ही अकादमिक तरीके से पेश किया है जिसे अरब और भारत जैसे देशों के कई विद्वान कहते रहे थे। इस पुस्तक में कई त्रुटियां भी रही हैं। एजाज अहमद ने 'इन थ्योरी' में इस पर विस्तार से लिखा भी है। दो 'त्रुटियों' की ओर इशारा जरूरी है।
प्रथम - इस पुस्तक ने पश्चिम को कर्त्ता (subject) के रूप में देखा। मानो पूरब और उसके सारे संस्थानों में कोई ताकत ही नहीं थी। पश्चिम आया और हमें बदल गया। और हम ताकते रहे। यह दृष्टि ग़लत है। पूरब के संघर्ष को इतिहास ने दर्ज नहीं किया इसीलिए शायद आज हम उससे परिचित नहीं हैं। द्वितीय - अंजाने ही 'ओरियंटलिज्म' ने अरब-जगत में चल रहे इस्लामी जेहादियों को मजबूती दे दी। पश्चिम ओरियंटलिज्म में 'विलेन' और नायक दोनों बन कर उभरा।
सईद ने बाद में 'कल्चर एंड इम्पीरियलिज्म' लिखकर और अपने साक्षात्कारों में लगातार इस बात को दोहराया कि वे युवा थे, कुछ उद्देश्यों को ध्यान में रखकर लिख रहे थे और उनके 'गलत पाठ' को ज्य़ादा महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। भारत में उनके दिए गये एक लम्बे इन्टरव्यू में उन्होंने इस पर खुल कर चर्चा की। यह इन्टरव्यू 'बुक रिव्यू' में छपा भी था।
            इन सबके बावजूद सईद और 'ओरियन्टलिज्म' एक दूसरे के पर्याय ही बने रहे। यह विडंबना पूर्ण है, लेकिन इसके पीछे भी कई कारण रहे हैं जिसकी चर्चा यहां अप्रासंगिक होगी।
            सईद की विद्वता और निर्भीकता के सीधे दर्शन उनके 'एक्टिविज्म' में होते हैं। फिलीस्तीन के लिए संघर्ष में योगदान करने वाले सईद ने भले ही इस संघर्ष को वाणी दी लेकिन इस संघर्ष को शुरू करने वाले विद्वान इब्राहिम अबू लोग़द हैं। सईद ने लोग़द को अपना गुरू कहा है। अपने गुरू (अंग्रेजी में लिखे लेख में सईद ने उन्हें 'माई गुरू' कहा है) की मृत्यु के बाद सईद ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है और उनके साथ ही हाल ही में विदा हुए इकबाल अहमद को भी याद किया है। इन दोनों के साथ सईद का सबसे गहरा रिश्ता रहा था। इकबाल अहमद बिहारी थे। इस लेख में सईद के उस दौर से हमारा परिचय होता है जिसके बीच से 'ओरियन्टलिज्म' का जन्म हुआ।
            सईद मार्क्सवादी थे या नहीं यह खुद उनके लिए भी कहना कठिन था। कुछ दिन पहले एक इन्टव्यू में उन्होंने कहा था कि मेरे लिए मार्क्सवादी होना और होना महत्त्वपूर्ण नहीं है। मैं हमेशा स्वतंत्र बुद्धिजीवी के रूप में रहना चाहता हूं। राजनीति से प्रेरित बुद्धिजीवियों (जिन्हें वह 'politically invested' बुद्धिजीवी कहते हैं) ने अपनी स्वतंत्रता खोकर नुकसान किया है। हैबरमास की तरह सईद भी विद्वानों के विमर्श और राजनैतिक विमर्श को मिला देने के पक्ष में नहीं थे। वे फूको के 'पावर डिस्कोर्स' (शक्ति विमर्श) से भी प्रभावित थे और अडोर्नो और ग्राम्शी से भी। आज के इस दौर में स्वतंत्र और निर्भीक बौद्धिक कर्म के समर्थक सईद ने सारी दुनिया की संघर्षशील मानवतावादी ताकतों को म.जबूत करने में जिस जीवट का परिचय दिया उसने उन्हें दुनिया की सबसे ताकतवर आवाज बनाया। वे अपने समय के एक नायक थे।
 (  लेखक- हितेन्द्र पटेल, एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास विभाग, रवीन्द्रभारती विश्वविद्यालय, कोलकाता)


विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...