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शनिवार, 14 मई 2016

चैनलों का पागलपन


         
टीवी चैनलों की खबरें और टॉकशो यही संदेश देते हैं कि हमारे देश का मीडिया इरेशनल और पगलाए लोगों के हाथों में कैद है। किसी व्यक्ति विशेष या चर्चित व्यक्ति के नाम का अहर्निश प्रसारण पागलपन है।एक जाता है दूसरा आता है। पहला पागल तब तक रहता है जब तक दूसरा पागल मिल नहीं जाता । यह मीडिया पागलपन है। हमें जनता की खबरें चाहिए,पागलों की खबरें नहीं चाहिए। यदि यह रिवाज नहीं बदला तो समाचार टीवी चैनलों को पागल चैनल कहा जाएगा।टीवी पागलपन वस्तुतः मीडिया असंतुलन है ।मीडिया अपंगता है ।मीडिया संचालक अपने को समाज का संचालक या जनमत की राय बनाने वाला समझते हैं। सच इसके एकदम विपरीत है। अहर्निश प्रसारणजनित राय निरर्थक होती है। और चिकित्साशास्त्र की भाषा में कहें तो पागल की बातों पर कोई विश्वास नहीं करता । उन्मादी प्रसारण राय नहीं बनाता बल्कि कान बंद कर लेने को मजबूर करता है ।

मीडिया पागलपन के तीन सामयिक रुप "मोदी महान","कांग्रेस भ्रष्ट" और "विपक्ष देशद्रोही "। टीवी वालो खबरें लाओ। एक बात का अहर्निश प्रसारण खबर नहीं है। चैनलों को देखकर लगेगा कि भारत गतिहीन समाज है। यहां इन तीन के अलावा और कुछ नहीं घट रहा !भारत गतिशील और घटनाओं और खबरों से भरा समाज है।चैनल चाहें तो हर घंटे नई खबरें दिखा सकते हैं। लेकिन पागल तो पागल होता है !एक बात पर अटक गया तो अटक गया !!

टीवी एंकर अपने को समाज का रोल मॉडल समझते हैं और टॉक शो में उनकी भाव-भंगिमाओं को देखकर यही लगेगा कि इनका ज्ञान अब निकला ! लेकिन ज्ञान निकलकर नहीं आता ! वहां सिर्फ एक उन्माद होता है जो निकलता है । उन्माद का कम्युनिकेशन हमेशा सामाजिक कु-संचार पैदा करता है । यह एंकर की ज्ञानी इमेज नहीं बनाता बल्कि उसकी इमेज का विलोम तैयार करता है एंकर ज्ञानी कम और जोकर ज्यादा लगता है । उससे दर्शक खबर या सूचना की कम उन्मादी हरकतों की उम्मीद ज्यादा करता है । अब लोग टीवी खबरें और टॉक शो पगलेपन में मजा लेने के लिए खोलते हैं । हमारे समाज में पागल लंबे समय से सामाजिक मनोरंजन का पात्र रहा है। पागल के प्रति समाज की कोई सहानुभूति नहीं रही है ।न्यूज मीडिया में अचानक यह फिनोमिना नजर आ रहा है कि "हम तो अर्णव गोस्वामी जैसे नहीं हैं"।"सारा मीडिया भ्रष्ट नहीं है। " ´’सब चीखते नहीं हैं”अब इन विद्वानों को कौन समझाए कि मीडिया पर संस्थान के रुप में ध्यान खींचा जा रहा है,यह निजी मामला नहीं है।

मीडिया कैसा होगा यह इस बात से तय होगा कि राजनीति कैसी है ॽ राजनीतिकतंत्र मीडिया के बिना रह नहीं सकता और मीडिया राजनीतिकतंत्र के बिना जी नहीं सकता । ये दोनों एक -दूसरे से अभिन्न तौर पर जुड़े हैं।जब राजनीति में ईमानदारी के लिए जगह नहीं बची है तो मीडिया में ईमानदारी के लिए कोई जगह नहीं होगी।भारत की राजनीति इस समय रौरव नरक की शक्ल ले चुकी है। ऐसे में निष्कलंक मीडिया संभव नहीं है।राजनीति जितनी गंदी होती जाएगी,मीडिया भी उतना गंदा होता जाएगा।

राजनीति की गंदगी से मीडिया तब ही बच सकता है जब वह खबरें खोजे,राजनीति और राजनीतिकदल नहीं।हमारे मीडिया ने खबरें खोजनी बंद कर दी हैं। राजनीतिक संरक्षक-मददगार खोजना आरंभ कर दिया है। फलतः मीडिया में खबरें कम और दल विशेष का प्रचार ज्यादा आ रहा है।यह मीडिया गुलामी है ।

टीवी चैनलों के टॉकशो में आने वाले लोग हैं राजनेता,बैंकर,वकील,राजनयिक, सरकारी अफसर आदि हैं। ये सारे लोग झूठ बोलने की कला में मास्टर हैं। मीडिया की नजर में ये ही ओपिनियनमेकर हैं ।इनमें अधिकांश मनो- व्याधियों और कुंठाओं के शिकार और गैर-जिम्मेदार होते हैं।मीडिया" इनकी खबर को जनता की खबर", "इनकी राय को जनता की राय"।"इनके सवालों को जनता के सवाल " बनाकर पेश कर रहा है।इस तरह के लोग जब मीडिया में जनमत की राय बनाने वाले होंगे तो सोचकर देखिए समाज में किस तरह की राय बनेगी ? मनो-व्याधियों के शिकार की राय कभी संतुलित और सही नहीं होती । वह खुद बीमार होता है और श्रोताओं को भी बीमार बनाता है । यही वजह है आम लोगों में टॉकशो को लेकर बहुत खराब राय है। त्रासद बात यह है कि मनोव्याधिग्रस्त ये लोग अपनी तमाम व्याधियों को सामाजिक व्याधि बना रहे हैं। वे स्वयं सत्तासुख पाने के लिए राय देते हैं और "जनता में भी सत्तासुख असली सुख है" .यही भावबोध पैदा करने में सफल हो जाते हैं ।

जबकि सच यह है जनता के भावबोध,दुख,सुख और खबरें अलग हैं और उनका टीवी मीडिया में न्यूनतम प्रसारण होता है। अधिकांश समय तो ये मनोव्याधिग्रस्त लोग घेरे रहते हैं।इसी अर्थ में न्यूज चैनल पागलचैनल हैं।

टीवी वाले बताते रहते हैं कि ईमानदार लोगों को सत्ता में आना चाहिए । सवाल ईमानदार लोगों के सत्ता में आने का नहीं है। सवाल यह है कि ताकतवर लोगों को, सत्ताधारीवर्ग के लोगों की शक्ति को कैसे कम किया जाय़ ।सवाल यह नहीं है कि अरविंद केजरीवाल लाओ, सवाल यह है कि कांग्रेस-भाजपा आदि दल जो सीधे सत्ताधारीवर्गों की नुमाइंदगी करते हैं उनको कैसे रोका जाए।

हत्यारा हत्याएं करता है। लेकिन कारपोरेट घराने,राजनेता, और धार्मिक मनोव्याधिग्रस्त लोग अर्थव्यवस्था और समाज को नष्ट करते रहते हैं ,और टीवी चैनल इनका महिमामंडन करते रहते हैं ।

कपिल के लाफ़्टर शो कार्यक्रम में औरतों पर वल्गर हमले हो रहे हैं । दादी, भुआ आदि की तो शामत आई हुई है । यह कैसा मनोरंजन है जिसमें औरत को निशाना बनाना पड़े ।घिन आती है ऐसे हास्य पर ।टीवी पर चुनाव की चौपालें अर्थहीन हंगामों में बदल दी गयी हैं । कमाल है !कारपोरेट हस्तक्षेप का !!

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मीडिया और फेसबुक मेँ वाक्य-वीर यौन शोषण पर खूब शब्द खर्च करते हैं, लेकिन श्रमिक या मीडियाकर्मी के शारीरिक और बौद्धिक शोषण पर चुप रहते हैँ.इन शब्दवीरोँ को यौन शोषण के अलावा शोषण के अन्य रुप नजर क्यों नहीं आते ?मीडिया मेँ स्त्री का शारीरिक शोषण गलत है, उससे भी ज्यादा मीडिया मेँ श्रम का शोषण होता है,यौन उत्पीडन का जो विरोध कर रहे हैँ वे मीडियाकर्मियों के शोषण पर बहादुरी से बोलते नहीं हैँ.यौन-उत्पीडन तो मीडिया मेँ चल रहे बृहद शोषण का छोटा अंश है.



गुरुवार, 12 मई 2016

फेसबुक पापाचार


एक सज्जन हैं और लेखक हैं। लेकिन फेसबुक पर लड़की देखकर लंपट भावबोध में चले जाते हैं।फेसबुक पर उनके कुकर्म देखें ,फेसबुक में कुकर्म भाषा में होता है।जैसे, हलो, कैसी हो,अकेली हो,मैं तो अंधेरे में बैठा हूँ। वगैरह -वगैरह।
अब इन जनाब को कौन समझाए कि जान न पहचान बड़े मियाँ सलाम करके लड़की देखी और पीछे हो लिए।काश,ये जनाब सभ्य हो पाते !
जीवन में कमीनापन पसंद नहीं करते तो फेसबुकलेखन में कमीनापन कैसे मान लें। कमीनेपन की लेखन में कोई जगह नहीं है। कमीनापन असभ्यता है। लेखन का काम है कमीनेपन को नंगा करना, न कि कमीनापन करना।
फेसबुक पर सक्रिय पापबुद्धि का एक और रुप है, हाल ही में जिस दिन समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया तो मैंने उसदिन कई पोस्ट लगायीं। एक जनाब चैटिंग में आए और लगे बतियाने,बोले अजी सर,अब आपके पास तो कई समलैंगिकों के प्रस्ताव आ जाएंगे। अब आपलोग ही बताएं इस तरह की मनोदशा के लोगों का पागलखाने के अलावा और कहीं इलाज संभव है ?
     फेसबुक पर पापाचार का आलम यह है कि पढ़ी-लिखी लड़कियों को दुष्टलोग आए दिन सताते हैं। सताने के तरीके जानें - शुरु होतेही कहेंगे, हलो,कैसी हो,इसके बाद नाम-पता-अभिरुचि आदि जानेंगे फिर कहेंगे लेख आदि लिखती हो तो भेजो मैं फलां फलां पत्रिका निकालता हूँ ,मैं फलां प्रकाशक को जानता हूँ, इसके बाद डर्टी भाषा में चले जाते हैं। मैसेज बॉक्स को गंदे संदेशों और फोटो से भर देते हैं। इस तरह के व्यक्ति को नामर्द कहते हैं।फेसबुक पर लड़की की मित्रता मिलती तो उपहार की तरह है लेकिन यदि उसका लंपटगिरी के लिए इस्तेमाल किया जाता है तो हमारे देश में बड़े जालिम कानून हैं लंपटो !!
     फेसबुक पापाचार का नया रुप है लड़की को देखकर उन्मत्त हो जाना । उसकी व्यस्तता और खाली समय की खोजबीन करना। गैर जरुरी पर तौर प्रशंसा करना ।यह फेसबुक पर हताश मन की अभिव्यक्ति है।
फेसबुक पर लड़की देखते ही प्रशंसा करना। मुखमंडल या फोटो पर बलिहारी- बलिहारी हो जाना।यह बीमारी है। फेसबुक पर लड़की को सुंदर और वांछनीय मानना अंततःपापाचार है। इसका वास्तव भावनाओं से कोई सरोकार नहीं है। यह फेसबुक लंपटगिरी है।फेसबुक पर कोई लड़की किसी लड़के से बात करती है तो इसका यह अर्थ नहीं है कि वे प्रेम करते हैं। फेसबुक कम्युनिकेशन प्रेम की नहीं सामान्य कम्युनिकेशन की जगह है। फेसबुक पर अनजान लोगों में ,खासकर लड़की के प्रति घनिष्ठता का प्रदर्शन मात्र कम्युनिकेशन है ,यह न मित्रता है ,और न घनिष्ठता है।
फेसबुक पर लड़कियां स्वतंत्र नहीं होतीं। यहां पर भी उनकी घेराबंदी होती रहती है। स्त्री को मर्दवादी मानसिकता की अभिव्यक्ति के लिए उकसाने का सबसे अच्छा तरीका है औरत को बेबकूफियां करने वाले वाक्य या पोस्ट लिखने दो और धड़ाधड़ लाइक करते जाओ। यह फेसबुक लंपटई का नया देशी मुहावरा है।फेसबुक लंपटता मर्द की अल्पकालिक शाब्दिक तड़प है।
फेसबुक कल्चर स्वस्थ कल्चर बने और इसे फेक होने से यथासंभव बचाएं।यह बडा माध्यम है कम्युनिकेशन का। फेसबुक पर ज्यादा से ज्यादा यथार्थवादी-मानवीय और सरल बनें।तर्क करें और पंगे न करें। नई बातें लिखें ,अपमान न करें। आलोचना लिखें,गाली न दें या हेयभाषा न लिखें। यह नया कम्युनिकेशन है और इसका शास्त्र अभी रचा जाना है।
जिस तरह समाज में मूर्खों की कमी नहीं है ,वैसे ही फेसबुक पर भी मूर्खों की कमी नहीं है,वे बिना बुलाए चले आते हैं। जिस तरह समाज में फंडामेंटलिस्ट और अविववेकवादी हैं, फेसबुक पर भी हैं। फेसबुक को समृद्ध करने का तरीका है मूर्खों और अविवेकवादियों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाए। अविवेकवादी-फंडामेंटलिस्ट किसी भी दल में हो सकते हैं। हम उनको पहचानें और छोडें।
फेसबुक कल्चर है असहमत के साथ बैठना,कम्युनिकेट करना और आलोचना करना। "हेट " ,"निंदा "या "घृणा" से दूर रहना। मोदी हो या फंडामेंटलिस्ट हों या कांग्रेसी हों हम इनको पसंद नहीं करते, फिर भी ये लोग समाज में हैं तो इनकी हरकतों की बार बार आलोचना करते हैं।आलोचना करना लोकतंत्र में जीना है। यह विरोधी को गले लगाना नहीं है।
     फेसबुक शरीफों का वधस्थल है। यहां पर कम्युनिकेशन तो है ही ,वध भी होता है । खासकर यदि कोई व्यक्ति जनप्रिय हो। उसकी समाज में साख हो तो उसका जनता की आलोचना से बचना मुश्किल है ।


सोमवार, 9 मई 2016

मुरारी बापू और बाबा रामदेव का मीडियागेम

           मुरारीबापू और बाबा रामदेव में बुनियादी अंतर है। मुरारीबापू कथा कहते हैं।कथा के बहाने व्यापार नहीं करते। वे जो कथा कहते हैं उसका पारिश्रमिक लेते हैं।अपनी रचनाओं को बेचते हैं,यह उनका एक परंपरागत बुद्धिजीवी के नाते सही काम है।लेकिन बाबा रामदेव तो योग के बहाने उद्योग चला रहे हैं.योग को राजनीतिक प्रचार का मंच और माध्यम के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। संतई में राजनीतिक घालमेल यानी साम्प्रदायिक विचारधारा का प्रचार- प्रसार कर रहे हैं।जबकि मुरारी बापू सीधे परंपरागत पाठ और जीवनमूल्यों की बातों तक सीमित रखते हैं।

सामान्यतौर पर हमारे बौद्धिक जगत का भारतीय ज्ञान और आख्यान परंपरा से कम संबंध है और उनको वह कम जानता है। मुरारीबापू जैसे संतों का महत्व यह नहीं है कि उनके पास कितना बड़ा एम्पायर है,कितनी दौलत है,कितने राजनेता उनकी चरणवंदना करते हैं। ये चीजें गौण महत्व की हैं। काम की बात है आज के आम आदमी के लिए सटीक संदेश।मुरारीबापू ने एक कथा में महात्मा बुद्ध के हवाले से कहा - "कभी किसी के प्रभाव में नहीं जीना, अपने प्रभाव में जीना.सत्य जहाँ से मिले ले लो, पर किसी से प्रभावित नहीं होना."

मुरारीबापू की कथा में अनेक ऐसी बातें आती हैं जो समानतावादी और विवेकपूर्ण विमर्श को बढ़ावा देती हैं। कायदे से मुरारीबापू को मासकल्चर के अंग के रूप में पढ़ें,वे मासकल्चर के अंग के रूप में भारतीय पाठ बना रहे हैं। मुरारीबापू का मानना है विवेक चार प्रकार से मिलता है:

१) एक मांगने से मिलता है. फ़िर वो कृपा करे तो.

२) मंथन से मिलता है. खुद के चिंतन से.

३) सत्संग करने से.

४) हमारा गुरु बिन बोले हमें विवेक प्रदान करता है.

मुझे मुरारीबापू की निम्नलिखित तीन बातें पसंद हैं- वे कहते हैं-

हमारे देश में तीन वस्तु आदमी को आदर के साथ मिलनी चाहिये :

- आगम/ शिक्षण: सबको शिक्षा मिलनी चाहिये.

- उसको अन्न मिलना चाहिये; कोई आदमी भूखा नहीं रहना चाहिये, बच्चे तो खासतौर पर.

- आदमी को आदर के साथ आरोग्य प्राप्त होना चाहिये.

मोक्ष के लिए मरना जरूरी नहीं है, बल्कि पूंजीवाद को खत्म करने से सीधे मोक्ष मिलता है।

भगवान को मानने की नहीं जानने की जरूरत है।

मुरारी बापू ने बाबा कयामुद्दीन द्वारा 325 वर्ष पूर्व भारतीय वेदांत और कुरान का समन्वय करते हुए लिखी गई पुस्तक 'नूर-ए-रोशन' का लोकार्पण करते हुए कहा देश में लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा की तर्ज पर एक 'सद्भावना सभा' भी होनी चाहिए। जहाँ देश के बुद्धिजीवी, संत और विद्वान बैठकर देश की समस्याओं पर चिंतन कर सकें।

मुरारी बापू ने कुँअर बाराबँकी के शेर में अपनी बात यों कही-

न हारा है इश्क़ न दुनिया थकी है,

दिया जल रहा है और हवा चल रही है।

वो जहाँ भी रहेगा रोशनी फैलाएगा,

चिरागों का कोई मकाँ नहीं होता।

तसबी छोड़दी मैने इस खयाल से,

गिनकर नाम क्या लेना, वो तो बेहिसाब देता है।



मुरारी बापू ने भी अपने उद्बोधन में एक घटना सुनाते हुए कहा बरसों पहले जब मैं ऋषिकेश में अकेला रहता था और प्रतिदिन यज्ञ करता था तो यज्ञ समाप्त होने के बाद देर रात एक बजे गंगा नदी पार कर एक सूफी फकीर यज्ञ की वेदी पर आता था। ये सिलसिला सात दिन तक चलता रहा। एक दिन मैने उससे पूछा कि तुम इतनी रात को यज्ञ की वेदी के पास आकर क्यों बैठते हो, तो उसने कहा, मैं एक मुसलमान फकीर हूँ और कहीं मेरी वजह से हिन्दू लोग नाराज नहीं हो जाए इसलिए रात के अंधेरे में आकर इस पवित्र अग्नि के पास आकर बैठता हूँ। मुरारी बापू ने कहा कि इसके बाद हम दोनों देर रात को अकेले ही चुपचाप यज्ञ की वेदी पर बैठे रहते थे, कभी हमने कोई बात नहीं की, मगर ऐसा लगता है कि उस सूफी फकीर ने मुझ पर अपनी सारी करुणा बरसा दी और मैं आज तक उसमें भीगा हुआ हूँ।



इसके विपरी बाबा रामदेव का मानना है देश को गुरू,साधक,योगी,योद्धा चाहिए। सवाल यह है क्या सच में हमें ये लोग चाहिए या नागरिकचेतना सम्पन्न नागरिक चाहिए ?

बाबा रामदेव के दकियानूसी विचारों से क्या देश का विकास होगा ? बाबा का मानना है 'अतीत का गर्व हमारे दिल में हिलोरें ले रहा है।' सवाल यह है आधुनिक समाज का निर्माण क्या अतीत की हिलोरों पर संभव है या विज्ञानसम्मतचेतना के प्रचार से संभव है ?

भारत स्वाभिमान के नाम पर जिस तरह का दकियानूसी शास्त्र प्रचारित किया जा रहा है,उसका नमूना है बाबा रामदेव और उनके प्रौपेगैंडा प्रचारक । वे संस्कार चैनल पर कह रहे हैं न्याय पाने के लिए पुरानी किताबों का अनुकरण करो न्याय मिल जाएगा। इसके लिए वह दयानन्द सरस्वती की किताबों,मनुसंहिता आदि का नाम भी ले रहे हैं। क्या इन किताबों से आधुनिक न्याय संभव है ?

जो पोगापंथ और जातिप्रथा के समर्थक हैं वे पहले आयुर्विज्ञान और विज्ञान का विरोध करते थे वे ही लोग हैं जो आज भी समाज में विज्ञान और विज्ञानसम्मतचेतना के प्रचार-प्रसार का विरोध कर रहे हैं। वे आयुर्विज्ञान के साथ अध्यात्म को जोड़ रहे हैं।फासिस्ट राजनीतिक एजेण्डे को प्रवचनों-कसरतों के बहाने जोड़ रहे हैं। इन संतों-वैद्यों-बाबाओं को सहज ही धार्मिक और लाइफ स्टाइल टीवी चैनलों पर देखा जा सकता है। ये निंदा के नहीं उपेक्षा के पात्र हैं।इन संतों में एक हैं बाबा रामदेव।

भारत में आयुर्विज्ञान ने चिकित्सा के क्षेत्र में जादू-टोने,झाड़-फूंक आधारित चिकित्सा पद्धति से हटकर तर्काश्रित चिकित्सा पद्धति को जन्म दिया। यानी दैव-व्यपाश्रय भेषज के स्थान पर युक्ति -व्यपाश्रय भेषज को प्रतिष्ठित किया। इससे पोंगापंडित,कठमुल्ले,रूढ़िवादी सभी नाराज हो गए। पुरोहित वर्ग के लिए यह चुनौती सांकेतिक थी लेकिन थी महत्वपूर्ण। क्या आज के बाबा लोग आयुर्विज्ञान का विज्ञान के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं ?क्या वे जादू-टोने,झाड़-फूंक को चुनौती दे पा रहे हैं ?



मंगलवार, 25 नवंबर 2014

मिथ्या के संसार का मनुष्य

राजनीति से लेकर निजी जीवन के हर पहलु में अधिकतर लोग मिथ्या का इस्तेमाल करते हैं,मिथ्या असल में प्रौपेगैंडा है,वह बबंडर है,मिथ्या इस युग का सबसे गतिशील तत्व है| मिथ्या में मिथ बनाने और मिथों के दुरुपयोग की अपार शक्ति है,मिथ्या न हो तो जीवन नीरस हो जाता है| मिथ्या के आधार पर ही कल्पना और वायदे के पहाड़ खड़े किए जाते हैं|
लोकतंत्र ,बाजार और मीडिया तो मिथ्या के बिना चल ही नहीं सकता,परिणामत: मिथ्या में रमण करते हुए मनुष्य सत्य से विमुख हुआ है ,अनेक मामलों में सत्य से नफरत करने लगा है| समाज में एकवर्ग है जो मिथ्या को स्वाभाविक मानता है| सामान्यत: मिथ्या को जीवनशैली के रुप में इस्तेमाल करता है| इसके कारण ये लोग मेनीपुलेशन के कौशल में भी माहिर हो गए हैं| यही वजह है कि हर स्तर पर मेनीपुलेशन को जायज मानने लगे हैं|इसके परिणामस्वरुप राजनीति में मिथ्या को सच और सच को मिथ्या मानने लगे हैं| सरकारी संसाधनों के शोषण और लूट को विकास कहने लगे हैं| लोकतंत्र में शोषण और असमानता है लेकिन प्रचार का असर है कि हमें चीजों को उलटा देखते हैं|
झूठ बोलने और झूठा जीवन जीने की कला में हमारा मध्यवर्ग तो गुरु है| अध्ययन-अध्यापन से लेकर राजनीति तक सबमें न्यूनतम काम करते हैं,कामचलाऊ ढंग से काम करते हैं लेकिन दावा बहुत काम का करते हैं| न्यूनतम काम क्यों करते हैं और अधिकतम काम क्यों नहीं करते हमारे पास इसका कोई उत्तर नहीं है|
झूठ को लेकर निष्ठा इतनी गहरी है कि सत्य के पैमानों पर बातें करना अप्रासंगिक हो गया है| सबसे पहले किस सामाजिक संरचना में झूठ दाखिल हुई यह कहना संभव नहीं है लेकिन मानव सभ्यता के विकास के क्र में ईश्वर सबसे पहली झूठ है| ईश्वर का तंत्र जितना प्रचारित - प्रसारित हुआ झूठ का तंत्र भी उतना प्रसारित हुआ है| ईश्वर की वैधता ने झूठ को अपरिहार्य और अनिवार्य बना दिया है|
झूठ की दूसरी बडी संरचना है कला,कलाओं के सृजन का जितना बेहतरीन ढांचा बनता गया झूठ के कलात्मक आयाम उतने ही बड़ी संख्या में विकसित होते गए | कलाओं में यथार्थ का तत्व तो बहुत बाद में दाखिल हुआ है|
झूठ के वैचारिक आयामों को निर्मित करने में दर्शन की बडी भूमिका है| दर्शन का जन्म ही इसलिए हुआ कि जिससे झूठ को वैध और स्वीकार्य बनाया जा सके|
मानव सभ्यता के विकास के काफी लंबे लमय के बाद वास्तववादी दर्शन और कलारुप आए जिनके जरिए झूठ को पहलीबार चुनौती मिली | लेकिन सच यही है कि हमें यथार्थ कम निर्मित यथार्थ ज्यादा अपील करता है | झूठ या कृत्रिमता अपील करती है | वास्तव की बजाय विभ्रम अपील करते हैं|

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

धर्म आनंद और आराम की जुगलबंदी

         धर्ममंदिरों और संतों के आश्रमों का धार्मिकता से बुनियादी सम्बन्ध खत्म हो गया है। खासकर आजादी के बाद के वर्षों में धर्मकेन्द्र और संतकेन्द्र अब आनंद –आराम केन्द्र बन गए हैं। धर्मकेन्द्र और संतकेन्द्र आजादी के पहले धार्मिकता के प्रचार के केन्द्र हुआ करते थे लेकिन इन दिनों यह फिनोमिना बदल गया है। देशी पूंजीवाद के विकास और पूंजीसुख के बढ़ते संसार ने जीवनशैली को रुपान्तरित किया है,इसका धर्म पर भी असर पड़ा है। धर्म-संत केन्द्रों का सारे देश में नियोजित उद्योग की तरह विकास हुआ है। अब इन केन्द्रों पर आनंद-आराम –जीवनशैली और स्वास्थ्य का खासतौर पर ख्याल रखा जाता है।
     स्वातंत्र्योत्तर दौर में पैदा हुए धर्म-संत समाज ने मासकल्चर के साथ अपना सम्बन्ध विकसित किया है।इनके यहां धर्म के मासकल्चर रुपों पर खासतौर पर जोर है। पहले धर्म को साधना के रुप में देखा जाता था,लेकिन मासकल्चर के साथ सम्बन्ध बनाने के कारण अब यही धर्म-संतकेन्द्र 'उपभोग' पर जोर देते हैं। इस तरह वे पूंजीवादी बाजार का विस्तार और विकास भी करते हैं। पूजा-पाठ-उपासना आदि इनमें गौण है और आनंद-आराम प्रमुख चीज है। स्वामीनारायण मंदिर से लेकर श्रीश्रीरविशंकर तक,रजनीश से लेकर महर्षि महेश योगी तक हजारों संत हैं, और उनके हजारों नेटवर्क हैं, जो आनंद-आराम के नेटवर्क के तौर पर काम कर रहे हैं। इस समूचे जगत को आनंद-आराम उद्योग कहना समीचीन होगा। इन संत-धर्मस्थलों का प्रमुख लक्ष्य है आगंतुकों के खालीसमय को आनंद से भरना और आराम की अनुभूति देना। इनके केन्द्रों में जीवनशैली प्रबन्धन कला भी सिखायी जाती है।

रविवार, 5 जून 2011

फेसबुक और बाबा रामदेव का नाटक


      बाबा रामदेव को कल पुलिस ने रामलीला मैदान  के अनशन स्थल पर जाकर गिरफ्तार कर लिया। बाबा की गिरफ्तारी के लिए पुलिस को जमकर लाठीचार्ज करना पड़ा और आंसू गैस के गोले भी छोड़ने पड़े। बाबा की कानूनभंजक राजनीति का इससे बेहतर अंत नहीं हो सकता था।बाबा रामदेव के आंदोलन का पहला निष्कर्ष है कि यह नकली और नियोजित आंदोलन था। दूसरा, किसी आंदोलन के संदर्भ में संचार क्रांति के टांय-टांय फिस्स के आदर्श के रूप में इस घटना को जाना जाएगा। तीसरा. पापुलिज्म और फेकनेस बहुत ज्यादा समय तक बने नहीं रहते। चौथा,फेक और नेक में हमें अंतर करने की समझ पैदा करनी चाहिए।पांचवां, संघ परिवार अपनी राष्ट्रतोड़क-अराजक राजनीति में प्रच्छन्न ढ़ंग से  सक्रिय है। छठा, सत्ता यदि साम्प्रदायिक ताकतों के प्रति सख्ती से पेश आए तो वे भाग खड़े होते हैं। सातवां,बाबा के 50 हजार के जमावड़े को पुलिस ने जिस कौशल से मात्र डेढ़ घंटे में रामलीला मैदान से भगा दिया उससे यह भी पता चलता है कि बाबा आंदोलन के नाम पर सरल-सीधे लोगों को ,बहला-फुसलाकर ले आए थे। इन लोगों ने कोई खास प्रतिवाद नहीं किया।आठवां, दिल्ली पुलिस ने इतने बड़े जमाबड़े को न्यूनतम लाठीचार्ज-आंसूगैस के गोले छोड़कर घटनास्थल से हटाकर भीड़ नियंत्रण की नयी मिसाल कायम की है।
हम अपने ब्लॉग पर पहले भी बाबा के बारे में विस्तार से लिख चुके हैं। वे सभी लेख यहां उपलब्ध हैं। यहां पर हम अपने फेसबुक वॉल पर लिखी टिप्पणियों को दे रहे हैं। ये टिप्पणियां कुछ महत्वपूर्ण सवालों को उठाती हैं।   --

                       -1-

काले धन का मामला बेहद जटिल है,इस पर यही कहना है- "नाड़ी छूअत वैद्यके पड़े फफोले हाथ।।"
                               -2-

बाबा रामदेव की मांग है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देश से निकाल दें। तब मोबाइल,इंटरनेट,कार, जहाज और उनके विदेश में बने आश्रमों का प्रबंध कौन करेगा ?दवाएं कहां से आएंगी ? बाबा के भक्तों से अपील है वे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामान और सेवाओं का इस्तेमाल तत्काल बंद कर दें।
                        -3-


बाबा रामदेव यदि यह मानते हैं कि उनका कोई साम्प्रदायिक एजेण्डा नहीं है तो वे संत का बाना त्यागकर एक नागरिक के बाने में आकर राजनीति करें ? संघ परिवार ने धर्म और राजनीति के मेल पर जोर दिया है और बाबा एक धार्मिक संत के नाते ,संतों के साथ वैसे ही आंदोलन कर रहे हैं,जैसे राममंदिर आंदोलन के समय चलाया था संघ परिवार ने।
                        -4-

सवाल यह है कि सॉफ्ट हिन्दुत्व की लाइन के तहत बाबा को कांग्रेस पटाने में क्यों लगी है ? बाबा से मिलने क्यों भेजा मंत्रियों को ? हम मांग करते हैं कि बाबा और उनके सानिध्य में चलने वाले ट्रस्टों की संपत्तियों की जांच की जाए।



                         -5-
कहो ना प्यार है , मनमोहन दौर की नूरा कुश्तियों का दंगल जिंदाबाद।नव्य -उदारीकरण में लड़ाईयां भी वे ही तय करते हैं जो नव्य उदारपंथी नीतिकार हैं।कितना लड़ोगे,कैसे लड़ोगे,कितना बोलोगे,कहां बोलोगे,सब कुछ तय है। अमेरिकी राजनीति का यह लोकतंत्र को बंधक बनाने वाला नया मॉडल है।मनमोहन सरकार अन्ना हजारे के साथ पहला प्रयोग कर चुकी है,उसमें सफल रही,अब बाबा के साथ भी यह प्रयोग सफल रहा।बेबकूफ बनी जनता ।
                       -6-

हमने पहले भी कहा था अब फिर से दोहरा रहे हैं,यह बाबा रामदेव की मनमोहन सेवा है।सब कुछ तय था। नाटक तय,अभिनय,तय,स्क्रिप्ट भी तय,आदि तय और अंत भी तय था। अब खाली थोड़ी-बहुत नाटकीयता के साथ प्रेस कॉफ्रेंस होगी या प्रेस रिलीज,फिर बाबा रामदेव अपने आश्रम चले जाएंगे कपाल भारती करने और जनता अपना कपाल फोड़े ?

                            -7-

कांग्रेस की कालेधन को देश में वापस लाने में कोई दिलचस्पी नहीं है। वे काले धन के संरक्षण के लिए द्वि-दलीय व्यवस्था की ओट मैं दो फ्रंट बनाए हुए हैं और काला-धन नामक ड्रामा खेल रहे हैं यह शो 3 दशक से चल रहा है।वरना क्या बात अमेरिका अपना काला धन निकालकर ले गया स्विस बैंकों से हम नहीं ला पाए ?
                            -8-


बाबा रामदेव-अन्ना हजारे टाइप आंदोलनों का संबंध मीडिया के उन्मादित कवरेज के साथ है। उन्मादित कवरेज में दर्शक का विवेक बंधक बना लिया जाता है। मीडिया इमेजों के जरिए आम जनता को नचाया जाता है। यह बिलकुल मनमोहन देसाई की अमिताभ बच्चन फिल्मों की तरह है। अमिताभ बच्चन की फिल्मों की सफलता का रहस्य था कि दर्शक 3 घंटे सोचता नहीं था,बंधा रहता था। यही हाल मीडिया के उन्मादित अभियान का है।
                              -9-

बाबा रामदेव पर जो मुग्ध हैं उनके इस भाव को मीडिया ने बनाया है। इसे हम मीडिया में ज्ञात-अज्ञात की नजरों से देखेंगे तो ठीक समझ पाएंगे। बाबा रामदेव मीडिया का सबसे बड़ा ब्राँण्ड है। सबसे महंगा भी ।संपत्ति भी वह सब ब्राँण्डों से ज्यादा कमाता है।वो संत नहीं ब्राँण्ड हैं।
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उपभोक्तावाद का प्रचार वस्तुओं के उपभोग पर बल देता है। उसकी विचारधारा छिपाता है। बाबा के मामले में भ्रष्टाचार पर बात करो,विचारधारा पर नहीं। हमें वस्तुओं का आनंद पसंद है ,लेकिन विचारधारात्मक प्रभाव के बारे में अनभिज्ञ रहते हैं। विचारधारा छिपाओ और वस्तु को बेचो।बाबा के लिए भ्रष्टाचार एक वस्तु है जिसकी वे ब्राँण्डिंग कर रहे हैं.जैसे कोई कार की करता है।                       

                                  -11-
काला पैसा विदेश से वापस लाना देशसेवा है। जो देश छोड़कर आप्रवासी होगए हैं बाबा उनको यहां संपत्ति सहित लाना क्यों नहीं चाहते ?
                                -12-

बाबा रामदेव का अनशन तय था कि कब तक चलेगा और कब वापस लिया जाएगा। यह बात बाबा रामदेव के बांए हाथ आचार्य बालकृष्ण की लिखी चिट्ठी में लिखी है,इसमें लिखा कि अनशन 4-6जून के बीच खत्म हो जाएगा। यह चिट्ठी आंदोलन के पहले दी गयी ।सरकार ने खुलासा किया है यह।स्टार न्यूज पर खबर देखें। नकली देशभक्त ऐसे ही होते हैं।
                                  -13-


आज रात 12.30 बजे बाबा रामदेव को रामलीला मैदान में पकड़ने की कोशिश की।उनको दी गयी योग शिविर की अनुमति को रद्द कर दिया है। बाबा को उनके समर्थक घेरे हुए हैं। पुलिस-जनता में मुठभेड़ चल रही है।
                                   -14-


बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण अचानक मंच से गायब हो गए हैं। माइक काट दिया है। बाबा गायब हैं।पुलिस ने चारों ओर से पुलिस का घेरा कड़ा कर दिया गया है।पत्थरबाजी भी हो रही भी हो रही है।
                                -15-



  सवाल यह है कि सब कुछ जानते हुए दिल्ली पुलिस ने रामलीला मैदान का योगशिविर के नाम पर अनशन आरंभ करने के इस्तेमाल क्यों होने दिया ? जबकि पहले से खबरें आ रही थीं कि बाबा योग शिविर नहीं अनशन करेंगे।
                                 -16-


बाबा रामदेव गिरफ्तार हो गए हैं। रामलीला मैदान में लाठीचार्ज-आंसूगैस के गोले चले हैं। पचासों लोग घायल हुए हैं। बाबा अपनी जनता को असहाय और नेतृत्वविहीन छो़ड़कर पुलिस के कब्जे में हैं।
                         -17-

बाबा रामदेव का आंदोलन आरंभ हुआ जिस जोश के साथ समाप्त भी वैसे ही हुआ। पुलिस और भक्तों को झूठ क्यों बोला बाबा ने ? बाबा आंदोलन करते अनुमति लेते और करते,अनुमति नहीं मिली तो कानूनभंग करके करते,लेकिन करते। योगशिविर की आड़ में लोगों को इकट्ठा करना और फिर पुलिस से पिटवाना उनके नेतृत्व की कायरता और दिशाहीनता का संकेत है।
                           -18-

बाबा रामदेव के अनुयायियों पर पुलिस का लाठीचार्ज निंदनीय है। लेकिन हमें तथ्य और सत्य दोनों को देखना चाहिए। बाबा ने योग शिविर के लिए अनुमति लेकर असत्य क्यों बोला ? एक सन्यासी का असत्य बोलना महापाप की कोटि में आता है। बाबा आंदोलन के लिए अनुमति मांगते और संघर्ष करते समझ में आता है।
                               -19-

बाबा रामदेव ने पुलिस को कहा कि वो योग शिविर लगाना चाहते हैं 20 दिन का और 4हजार लोग आएंगे। लेकिन ये दोनों ही बातें असत्य कहीं बाबा ने। उनके जमावड़े में कोई योगशिविर नहीं था योग तो बहाना था,जनता 50 हजार से ज्यादा थी,पुलिस ने पहले ही दिन दोपहर को बाबा को पत्र दिया कि क्यों न अनुमति रद्द कर दी जाए।बाबा ने जबाव नहीं दिया। वे खेल खेल रहे थे संघ का।
                           -20-

बाबा रामदेव ने अपने आंदोलन के लिए वैसे ही असत्य का सहारा लिया जिस तरह बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय संघ परिवार ने लिया था। इन दोनों में भावुक उत्तेजना साझा तत्व है। आम लोगों को भावुक बनाओ,और फिर अन्य एजेण्डे पर काम करो।बाबा की मंशाएं क्या थीं ? बाबा ने सरकार से लिखित आश्वासन मिलने के बाद आंदोलन तत्काल समाप्त क्यों नहीं किया ?
                           -21-

बाबा रामदेव ने अपने आंदोलन के लिए वैसे ही असत्य का सहारा लिया जिस तरह बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय संघ परिवार ने लिया था। इन दोनों में भावुक उत्तेजना साझा तत्व है। आम लोगों को भावुक बनाओ,और फिर अन्य एजेण्डे पर काम करो।बाबा की मंशाएं क्या थीं ? बाबा ने सरकार से लिखित आश्वासन मिलने के बाद आंदोलन तत्काल समाप्त क्यों नहीं किया ?
                                -22-


बाबा रामदेव ने पापुलिज्म और अराजक राजनीति का जो घोल तैयार किया उसकी यही परिणति हो सकती थी।
                               -23-


 बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलनों का समय ठीक वही है जिस समय 2 जी स्पेक्ट्रम और कॉमनवेल्थ गेम के करप्शन पर बड़े लोग सींखचों में जा रहे हैं। बाबा रामदेव ने जिस भाव से अपना आंदोलन आरंभ किया है और अन्ना हजारे,आरएसएस आदि ने उनका समर्थन किया है उससे शक है कि दूरसंचार कंपनियां सरकार पर दबाब डालने के लिए बाबा,अन्ना और आरएसएस का इस्तेमाल कर रही हैं ?
                               -24-       


काश !बाबा रामदेव सच्चे योगी होते और संघ परिवार के लोग किसी तपे-तपाए तांत्रिक से मंत्र यज्ञ कराते,वो मंत्रजप करता,बाबा योगी रूप में उड़कर जाते और स्विस बैंक से कालेधन की तिजोरी उठाकर ले आते !कहां है वे संत-महंत-तांत्रिक-पंडित जो आए दिन मंत्रशक्ति के नाम पर जनता को ठगते रहते हैं ? क्या कोई मंत्र है जिसके जप से कालाधन वापस भारत आ जाए ?
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संत के पैसा जो चंदा आता है वो पुण्य की कमाई का होता है ?
                             -26-

क्या सुंदर दृश्य है माओवादी+आरएसएस +स्वयंसेवी संगठन + सिविल सोयायटी+भाजपा अब जो बाकी हैं वे भी धीरे धीरे संत के साथ आ ही जाएंगे। कालेधन को विदेश से वापस लाने में संघ परिवार कितना 'सक्रिय' है यह बात तो एनडीए सरकार के 6 साल के शासन में समझ में आ गयी थी ,उस समय विदेशों में कालाधन ज्यादा जमा हुआ है बाबा,जरा संघवालों से पूछो वे उस समय चुप क्यों थे ?
                           -27-


कल्पना करें बाबा रामदेव प्रधानमंत्री होते ,और मनमोहन सिंह संत होते ,मनमोहन सिंह -सोनिया आमरण आमरण अनशन पर इन्हीं मांगों को लेकर बैठ गए होते तो बाबा रामदेव विदेशों में जमा कालाधन कैसे वापस लाते ?जरा बाबा के भक्त जबाव दें ?
                               -28-



बाबा रामदेव और उनका योगशास्त्र मूलतः मर्दानगी का शास्त्र है। नव्य़ आर्थिक उदारीकरण के दौर में योग को हठात महान कला साबित करने में सक्रिय कारपोरेट घरानों ने चालाकी के साथ स्त्री के वैभव और अधिकारों के विकल्प के रूप में बाबा रामदेव को मर्दानगी के नायक के रूप में इस्तेमाल किया है। योग की विचारधारा मूलतःपुंसवाद और पितृसत्ता की पोषक है। हम अपने पुराने ग्रंथों को पढ़ें तो सहज ही पता चल जाएगा।

                                -29-
बाबा रामदेव को योग योद्धा कहते हैं। वे योग और भाववाद के हिमायती हैं। योग ने भौतिकवाद के खिलाफ भाववाद की विचारधारा के विकास का काम किया है। बाबा रामदेव का समस्त योग स्कूल आम जनता में भाववाद का प्रचार करता है। नव्य आर्थिक उदारीकरण के लिए बाबा सबसे उपयुक्त महापुरूष हैं क्योंकि बाबा भौतिकवाद के खिलाफ भाववाद का प्रचार करते रहे हैं। यही वजह है कि नव्य उदारपंथी देशी-विदेशी सभी कारपोरेट घराने और राजनीतिक दलों के नेता उनकी सेवा में खड़े हैं।
                            -30-
                          -31-

बाबा रामदेव के योग-प्राणायाम उद्योग का टर्नओवर पन्द्रह हजार करोड़ रूपये साल का है। उद्योगपति बाबा के खेल ने आम लोगों में स्वास्थ्य की बदहाल दशा के कारण अपील पैदा की है। इस अपील को संघ परिवार अपने राजनीतिक हितों को विस्तार देने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है।

                                  -32-
बाबा रामदेव की बातें निराली हैं,अदा भी निराली है,मांगें भी निराली हैं। हम चाहते हैं कि बाबा रामदेव का सपना पूरा हो व्यवस्था बदले,बस बाबा हमारी तीन मांगों को अपनी लिस्ट में शामिल कर लें।1.भारत के सभी अरबपतियों की संपत्ति और कारखानों का राष्ट्रीयकरण,2.विदेश से पैसा लेने वाले राजनीतिक दलों और स्वयंसेवी संगठनों पर पाबंदी ,3-बंद कल-कारखाने खोलने के लिए पहल और भूमिहीन किसानों में तेजी से भूमि सुधार लागू किए जाएं।
                                   -33-

बाबा रामदेव ने बड़े भोले मन से कहा है सत्ता नहीं,व्यवस्था परिवर्तन चाहता हूँ। सवाल यह है कैसे ?किस नजरिए से और क्यों ? व्यवस्था बदलने की जंग में पहला मुद्दा गरीबी है या काला धन ? मजदूर-किसान का मोर्चा होगा या संघ परिवार और उनके लगुओं-भगुओं का ? व्यवस्था परिवर्तन के पहले सभी मतों के धर्माचार्यों-धर्मपीठों-ईसाई संपदा आदि धार्मिक संपदा को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किया जाए ? कालेधन और भ्रष्टाचार का एक अंश मंदिरों-संयासियों के पास भी जाता है।
                               -34-


ओबामा ने स्विटजरलैंड की बैंकों में जमा काले 4हजार करोड़ डॉलर निकाले,लेकिन उससे अमेरिकी जनता की मंदी कम नहीं नहीं हुई।उलटे उसने कारपोरेट घरानों को सहायता दी। सवाल यह है कि जो धन घर में है और काला -सफेद है, क्या बाबा उसके निकाले जाने के पक्ष में हैं ? 80हजारकरोड़ रूपये बैंकों के भारत के धनियों के पास डूबे पड़े हैं,बाबा उसकी वसूली को मसला क्यों नहीं बनाते ?
                                    -35-

अन्ना हजारे-बाबा रामदेव फिनोमिना वस्तुतः देश की जनता में साम्राज्यवाद विरोधीचेतना के विलोप का कार्य कर रहे हैं। भ्रष्टाचार-कालेधन का मसला अमीरों का मसला है। गरीबों के मसले हैं भूमि,भोजन ,रोजगार,और मकान । इनमें से किसी मसले में इन दोनों महापुरूषों की कोई दिलचस्पी नहीं है। भ्रष्टाचार-कालेधन का संकट सत्ता और अमीरों का संकट है।

                                    -36-

जिन मांगों पर बाबा अनशन करने जा रहे हैं। उनमें से कुछ के बारे में सरकार कहने जा रही है- हम काले धन को वापस लाने के लिए कड़े कानून बनाएंगे। नया कानून बनाने के लिए मसौदा समिति बनाएंगे। करप्शन के खिलाफ यू एन कन्वेंशन को मानेंगे,काला धन वालों को कड़ी सजा के रूप में सजा-ए-मौत का भी प्रावधान होगा। 15 अगस्त तक लोकपाल बिल पास हो जाएगा। अनशन कुछ दिन चलेगा क्योंकि तैयारियों के लिए पेमेंट हो चुका है।
                                    -37-


बाबा रामदेव का अनशन एक मजेदार मेला है। रामलीला मैदान के 2.5 लाख स्क्वेयर फुट के एरिया में शानदार पंडाल लगाया गया है,इसमें 1000हजार सिलिंग फेन लगाए गए हैं।50 एम्बुलेंस रखी हैं। एंटेसिव केयर यूनिट स्थापित की गई है। एक हजार टॉयलेट बनाए गए हैं। 5लाख लीटर पानी का इंतजाम किया गया है,अनशन के दौरान योग कैंप चलेंगे।विलीबोर्ड बनाए गए हैं। कोई कह सकता है कि इस अनशन में कोई कष्ट होगा ? यानी मजे में संघर्ष।
                                     -38-


बाबा रामदेव की मांग यदि यह होती कि सारे देश में भूमिसुधार कार्यक्रम लागू किया जाए और वे अनशन पर बैठते तो क्या सरकार मनाने जाती ? या फिर बाबा रामदेव की मांगों पर लालकृष्ण आडवाणी या वामनेतागण अनशन पर बैठ जाते तो क्या मंत्रियों का झुंड मिलने जाता ?
                                   -39-
बाबा रामदेव अनशन करेंगे।अन्ना हजारे ने आमरण अनशन किया था।सरकार अनशन पर सब तरह की व्यवस्था करेगी। रामलीला मैदान के आसपास पूरा रोशनी-मेला-ठेला -दुकानें-भजन-कीर्तन-जागरण-खाने-पीने की दुकानें-लैट्रीन -बाथरूम सब होगा,सिर्फ एक चीज की गारंटी करनी है बाबा को वहां किसी राजनीतिक दल का नेता अनशन न करे। अन्ना हजारे से भी यही उम्मीद थी उन्होंने माना। यानी राजनीति हो बिना राजनीतिज्ञ और दल के। इसीलिए यह मित्र संघर्ष है।
                              -40-

बाबा रामदेव और मनमोहन मंडली में वर्गीय मित्रता है और बाबा रामदेव का संघर्ष मित्र संघर्ष है।यही वजह है कि 4 मंत्री बाबा को मनाने एयरपोर्ट गए थे।

                                      





















रविवार, 24 अप्रैल 2011

आकाशवाणी और संगीत की धरोहर -कुलदीप कुमार


                                       ( वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप कुमार)
 
हमारे संगीत के संरक्षण और संवर्धन में ऑल इंडिया रेडियो यानी आकाशवाणी की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है. यह दीगर बात है कि अब आकाशवाणी को अपनी इस ऐतिहासिक भूमिका का ज़्यादा अहसास नहीं रह गया है और संगीत, विशेषकर शास्त्रीय संगीत, के प्रति उसका रवैया उदासीनता का बनता जा रहा है. मुझे मालूम है कि आकाशवाणी और उसके अधिकारी संगीत के कार्यक्रमों का विवरण और आंकड़े देकर तत्काल इसका प्रतिवाद करेंगे, लेकिन जिसे भी आकाशवाणी के गौरवशाली इतिहास और संगीत के प्रचार-प्रसार और संरक्षण-संवर्धन में उसकी भूमिका की जानकारी है, वह इस आकलन से असहमत नहीं होगा.
 
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में घटी दो राजनीतिक घटनाओं ने उत्तर भारत के साहित्य और संगीत की दुनिया पर बहुत गहरा प्रभाव छोड़ा. 1856 में लखनऊ के नवाब वाजिदअली शाह की गद्दी छीनकर ईस्ट इंडिया कंपनी ने  उन्हें कोलकाता के पास मटियाबुर्ज़ में बसा दिया. अगले साल सिपाही विद्रोह हुआ जिसे अंग्रेजों ने ग़दर और कार्ल मार्क्स ने भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा. इसके परिणामस्वरूप मुग़ल राजवंश की प्रतीकात्मक सत्ता भी ख़त्म हो गयी और दिल्ली के अधिकाँश मूर्धन्य संगीतकार, जिनमें दिल्ली घराने के शीर्षस्थ गायक उस्ताद तानरस खां भी शामिल थे, रामपुर, हैदराबाद, मुंबई और ऐसी ही अनेक जगहों पर शरण लेने के लिए मजबूर हो गए. यह समय भारत में औद्योगिक एवं वाणिज्यिक पूंजी के विकास और मुंबई तथा कोलकाता के औद्योगिक महानगरों में बदलने की प्रक्रिया के शुरू होने का भी था. इसलिए संगीतकारों को शौक़ीन ज़मींदारों, नवाबों और महराजाओं के अलावा संगीतरसिक सेठों का प्रश्रय भी मिलने लगा. 
बीसवीं शताब्दी के आते-आते संगीत में दो विभूतियों ने क्रांतिकारी परिवर्तन का सूत्रपात किया. पंडित विष्णु नारायण भातखंडे ने देश भर में घूम-घूमकर उस्तादों से बंदिशें एकत्रित करने, विभिन्न रागों पर उनसे चर्चा करके उनके मानक रूप निर्धारित करने और संगीतशास्त्र के रहस्यों से पर्दा उठाते हुए अनेक विद्वत्तापूर्ण पुस्तकें लिखने का महत्कार्य किया. उधर पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने टिकट लगाकर संगीत के सार्वजनिक कार्यक्रम करने की परम्परा शुरू की और लाहौर में पहला संगीत विद्यालय खोला. इन दोनों क्रांतदर्शी संगीतज्ञों के प्रयासों के फलस्वरूप शास्त्रीय संगीत अभिजात वर्ग की महफ़िलों से बाहर निकलकर मध्यवर्ग तक पहुंचा. बीसवीं शताब्दी की आरंभिक वर्षों में ही ध्वनि-टंकण यानी रिकॉर्ड करने की टेक्नोलॉजी आ गयी और 1902 में उस ज़माने की सबसे मशहूर गायिका गौहर जान के रिकॉर्ड बाज़ार में आये. संक्षेप में कहें तो यह शास्त्रीय संगीत के लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया की शुरुआत थी क्योंकि अब संगीत किसी के भी द्वारा कभी भी और कहीं भी सुना जा सकता था. वह सीधे लोगों के घरों के भीतर प्रवेश पा गया था. अब उसे सुनने के लिए किसी रईस के घर की महफ़िल में उपस्थित होना ज़रूरी नहीं रह गया था.
लेकिन टेक्नोलॉजी की सीमा यह थी कि ये रिकॉर्ड तीन से चार मिनट के ही हो सकते थे. रेडियो ने इस सीमा को तोड़ दिया. भारत में रेडियो का युग 1923 में शुरू हुआ और 1936 के आते-आते ऑल इंडिया रेडियो की स्थापना हो गयी. रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एआईआर को आकाशवाणी की संज्ञा दी. आकाशवाणी ने पहली बार संगीतकारों को अखिल भारतीय मंच प्रदान किया. अब उनके कार्यक्रम देश के विभिन्न हिस्सों में बैठे श्रोता एक ही समय पर एक साथ सुन सकते थे.
आज़ादी आने के साथ ही संगीतकारों को मिलने वाला सामंती राज्याश्रय समाप्त हो गया. ऐसे में आकाशवाणी ने उन्हें संभाला और अपने यहाँ नौकरियाँ और काम देकर उनके भरण-पोषण का कुछ हद तक प्रबंध  किया. रेडियो संगीत सम्मेलन और राष्ट्रीय कार्यक्रम के द्वारा उसने शास्त्रीय संगीत के प्रचार-प्रसार और संगीतकारों को प्रोत्साहन देने का ऐतिहासिक कार्य किया. इसी क्रम में उसके पास मूर्धन्य संगीतकारों की प्रस्तुतियों का अनमोल खजाना जमा हो गया जो इस समय उसके संग्रहालय की शोभा बढ़ा रहा है. यूं यह कहना अधिक सही होगा कि वहां धूल खा रहा है. 
किसी को भी यह नहीं पता कि आकाशवाणी के संग्रहालय में किस-किसकी रिकॉर्डिंग है. पारदर्शिता के इस युग में भी, जब सभी सूचनाएं वेबसाइट पर डालने का चलन है, आकाशवाणी की वेबसाइट पर संग्रहालय के बारे में कोई भी सूचना नहीं है. इस वेबसाइट का हाल यह है कि इस पर यदि आप आकाशवाणी के विभिन्न चैनलों पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों की जानकारी लेना चाहें, तो वह भी उपलब्ध नहीं है. पहले आकाशवाणी हीनी और अंग्रेजी में एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया करती थी जिसमें अगले एक माह के कार्यक्रमों की पूरी जानकारी दी जाती थी. लेकिन इनका प्रकाशन बंद कर दिया गया है. इन पत्रिकाओं को बंद हुए कम से कम एक दशक तो हो ही गया होगा. हमारे अखबार केवल टीवी चैनलों पर प्रसारित होने कार्यक्रमों की जानकारी देने में रूचि रखते हैं. रेडियो को उन्होंने भी भुला दिया है. नतीजतन आज किसी भी संगीतप्रेमी के लिए यह संभव नहीं कि वह यह जान सके कि अगले दिन सुबह आठ बजे के समाचार बुलेटिन के बाद किस संगीतकार का गायन या वादन प्रसारित होने वाला है या आज रात को वह किस संगीतकार को सुन सकता है. चूंकि आकाशवाणी संग्रहालय में क्या-कुछ जमा है, इसके बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं है, इसलिए किसी श्रोता के लिए यह भी संभव नहीं कि वह अपनी फरमाइश आकाशवाणी के पास भेज सके. 
कुछ समय पहले आकाशवाणी के एक उच्चाधिकारी ने मेरे साथ बातचीत के दौरान बेबाकी के साथ कहा कि उनके संगठन की नीति अपनी संगीत सम्पदा या उसके बारे में जानकारी को जनता के साथ बांटने की नहीं है. आकाशवाणी एक जन प्रसारण संस्था है और उसका काम संगीत का प्रसारण करना है, जो वह बखूबी कर रही है.
तकनीकी नज़रिए से देखें तो उनकी बात ठीक है. आकाशवाणी से रोज़ ही संगीत का प्रसारण होता है. लेकिन यह प्रसारण कैसा है, इसे आकाशवाणी के कार्यक्रमों को सुनने वाले बदकिस्मत श्रोता ही जानते हैं. आप चौंकिए मत यदि धमार की जगह आपको  'धामड़' सुनने को मिले और राग पूरिया राग प्रिया बन जाए. कभी-कभी आप केदार में राग ख़याल भी सुन सकते हैं.
आकाशवाणी को अपने संग्रहालय के बांरे में जानकारी जनता के साथ बांटने में तो गुरेज़ है ही, वह अपने स्टाफ के साथ भी शायद इसे नहीं बांटना चाहती. इसीलिए इन्द्रप्रस्थ चैनल पर, जिसे पहले हम दिल्ली ए के नाम से जानते थे, हर मंगलवार रात दस बजे प्रसारित होने वाले कार्यक्रम 'चयन' की यह दुर्गति न होती. इस कार्यक्रम में आकाशवाणी के संग्रहालय से चुनकर रिकॉर्डिंग प्रसारित की जाती हैं. लेकिन अब हाल यह है कि इसमें कुछ गिने-चुने कलाकारों की कुछ गिनी-चुनी रिकॉर्डिंग ही पूरे साल हर दो-तीन माह के अंतराल पर दुहराई जाती हैं, मानों संग्रहालय में इनके अलावा और कुछ हो ही नहीं. 
किसी समय आकाशवाणी ने एचएमवी के साथ मिलकर पुराने दिग्गज संगीतकारों के एलपी रिकॉर्ड और कैसेट निकाले थे. बाद में टी-सिरीज़ के साथ मिलकर उस्ताद अलाउद्दीन खां, उस्ताद बिस्मिल्लाह खां और उस्ताद अली अकबर खां जैसे कई महान कलाकारों के सीडी सेट जारी किये गए. लेकिन अब ये सभी अप्राप्य हैं. इन्हें संगीतप्रेमियों को फिर से सुलभ कराने की ओर आकाशवाणी का बिलकुल ध्यान नहीं है. उसने स्वयं पिछले कुछ वर्षों के दौरान उस्ताद अमीर खां, बेगम अख्तर, पंडित डी वी पलुस्कर और पंडित कृष्णराव शंकर पंडित जैसे मूर्धन्य संगीतकारों के सीडी जारी किये हैं, लेकिन इनकी मार्केटिंग की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया है. यदि कोई संगीतप्रेमी इन्हें खरीदना चाहे, तो उसे संसद मार्ग स्थित आकाशवाणी भवन जाकर वहां बने काउंटर से ही उन्हें लेना होगा. यानी दिल्ली जैसी जगह में उसे एक दिन सिर्फ इस काम के लिए समर्पित करना होगा. कितने लोग ऐसा कर सकते हैं? और फिर, इस बात की क्या गारंटी कि जाने पर कांउटर खुला ही मिलेगा? उसे संभालने वाला छुट्टी पर नहीं होगा या फिर लंच के लिए नहीं गया हुआ होगा? भारत के सरकारी दफ्तरों के लंच और उनकी लगातार लंबी होती जाती अवधि तो अब विश्व भर में प्रसिद्द हो चुकी है.
आकाशवाणी ने अधिकांशतः उन्हीं संगीतकारों के सीडी जारी किये हैं जिनके एलपी, कैसेट या सीडी पहले से ही बाज़ार में उपलब्ध हैं. बेहतर हो यदि वह अपने संग्रहालय से ऐसे लोगों की रिकॉर्डिंग चुने जिनका संगीत अब श्रोताओं को उपलब्ध नहीं है, या यदि है भी तो बेहद कम.
यह तभी हो सकता है जब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय किसी ऐसे व्यक्ति के हाथ में हो जिसे स्वयं संगीत में दिलचस्पी हो. अभी तक इस मंत्रालय को केवल दो ही ऐसे मंत्री नसीब हुए हैं--बी वी केसकर और वसंत साठे. या फिर आकाशवाणी को कोई ऐसा महानिदेशक मिले जो संगीत और उसकी गौरवशाली महिमामयी परम्परा के संरक्षण और संवर्धन में गहरी रूचि रखता हो. वर्ना इस अनमोल खजाने का भी वही हश्र होगा जो ज़मीन में गड़े खजानों का होता है. वे किसी के भी काम नहीं आते.   

रविवार, 3 अप्रैल 2011

लोकतंत्र का महा-उल्लास है क्रिकेट


      भारत ने 50 ओवरों वाला विश्वकप क्रिकेट टूर्नामेंट अपने नाम कर लिया है। इस टूर्नामेंट का कई मायनों में महत्व है। यह टूर्नामेंट क्रिकेट के साथ महानतम सामाजिक -राजनीतिक और आर्थिक भूमिकाओं के लिए भी हमेशा याद किया जाएगा। यह टूर्नामेंट मंदी के दौर में हो रहा था और इसने भारत के उपभोक्ता बाजार को चंगा करने और मीडिया उद्योग को मस्त बनाने में बड़ी भूमिका अदा की है। बाजार को आर्थिकमंदी के चंगुल से बाहर निकालने में यह एक महत्वपूर्ण हथियार साबित हुआ है।
     भारत में क्रिकेट खेल नहीं जुनून है। ऐसा जुनून जिसमें सारा देश अपनी सुधबुध खो देता है। क्रिकेट अकेला बड़ा खेल है जिसने भारत के नागरिकों को मनोरंजन का अधिकार दिलाया है। भारत में एक जमाने में लोग मनोरंजन करते थे लेकिन टीवी आने ,मैचों के प्रसारण,विभिन्न निजी चैनलों के प्रसारण और खेल के अहर्निश प्रसारण ने मनोरंजन को अधिकार बना दिया। आज मनोरंजन मानवाधिकारों का हिस्सा है। यह चैनलों, व्यवसायी घरानों,खिलाडियों ,कलाकारों आदि की आय का भी बड़ा जरिया है।
   भारत में क्रिकेट का पहलीबार ऐसा टूर्नामेंट हुआ है जिसमें पाक ने भाग लिया हो और शिवसेना चुप रही हो। पाक के आने पर वे अमूमन हंगामा करते हैं। मीडियातंत्र की इसबार प्रशंसा करनी चाहिए कि उन्होंने भारत-पाक मैच के मौके पर राष्ट्रवादी उन्माद को नहीं उछाला। समूची कमेंट्री,न्यूज और लिखित रिपोर्टिग राष्ट्रोन्माद से एकदम मुक्त थी। यहां तक कि मोहाली मैच के अवसर पर खेल का उन्माद था राष्ट्रोन्माद नहीं था। इस परिप्रेक्ष्य में भारत में क्रिकेट ने राष्ट्रवाद का अंत कर दिया है। यह संयोग की बात है कि 26/11 मुम्बई आतंकी हमले से आरंभ हुआ पाकविरोधी राष्ट्रोन्मादी अभियान फाइनल के साथ मुम्बई में ही खत्म हुआ। भारत-पाक संबंध सामान्य बनने की दिशा पकड़ चुके हैं और पड़ोसी देशों और आम हिन्दुस्तानियों में ऐसा शानदार विरेचन या कैथार्सिस पहले कभी नहीं देखा गया। यह राष्ट्रवाद का रोमांचक अंत है।
    मंदी के कारण बाजार पस्ती थी और मीडिया के आर्थिक हालात भी ज्यादा बेहतर नहीं थे ऐसी अवस्था में विज्ञापनों की बाढ़ और प्रचार ने बाजार में पूंजी को व्यापक रूप में प्रसारित किया है। भारत सरकार ने क्रिकेट प्रेम दिखाते हुए आईसीसी को 45 करोड़ रूपये की आयकर में छूट दी है। विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट से आईसीसी को 1476 करोड़ रूपये की आमदनी हुई और उसने 571 करोड़ रूपये खर्च किए।
      जो मीडिया भ्रष्टाचार के महाख्यान में आकंठ डूबा था उसे क्रिकेट ने आनंद के पैराडाइम में ले जाकर बिठाया है। उल्लेखनीय है 2जी स्पैक्ट्रम और भ्रष्टाचार के समस्त मीडिया प्रचार को उसने कब्र में सुला दिया है। उल्लेखनीय है कि जब मैच पीक पर था तब 2जी स्पैक्ट्रम की चार्जशीट दाखिल की गयी और इस खबर पर टीवी दर्शकों की नजर नहीं थी ,सबकी नजर खेल पर थी। यह भ्रष्टाचार के प्रचार की मनमोहनी क्रिएटिव सफाई है।
   दूसरी ओर क्रिकेट ने लोकतंत्र को ठप्प कर दिया। राजनीति के महानायकों को खेल के महानायकों के सामने नतमस्तक होकर बैठे देखना,विधानसभा चुनावों में राजनीति से ज्यादा क्रिकेट के जुनून का होना इस बात संकेत है कि क्रिकेट का खेल लोकतंत्र के राजनीतिक खेल से भी बड़ा है। देश की आम जनता के मन को स्पर्श करने,रोमांचित करने और एकजुट करने में क्रिकेट पुख्ता लोकतांत्रिक सीमेंट है। यही वजह है कि मनमोहन सिंह से लेकर ममता तक,सोनिया से लेकर राहुल गांधी तक क्रिकेट का आनंद लेते नजर आए। इससे यह भी संदेश निकलता है कि क्रिकेट लोकतंत्र है,मित्रता है,मनोरंजन है और सबसे ऊपर आनंद है। एक ऐसा आंनंद जिसका गरीब-अमीर सभी एक साथ मजा लेते हैं और एक ही जुनून में डूबे रहते हैं। मुकेश अम्बानी से लेकर मनमोहन सिंह,घासीराम से लेकर अभिजन बुद्धिजीवियों तक सबमें क्रिकेट के प्रति जुनूनी भाव भारत की महान उपलब्धि है।
    क्रिकेट का मतलब दौलत कमाना नहीं है। क्रिकेट खेल है व्यापार नहीं है। एक ऐसा खेल जिसे भारत के खिलाडियों ने अपनी प्रतिभा और लगन से साहबों के खेल की बजाय आम जनता का खेल बनाया है। ये जेंटिलमैन गेम था,लेकिन भारत के खिलाडियों ने इस जनता का खेल बनाया दिया। गंवार-अशिक्षित जनता का सबसे प्रिय खेल बना दिया। भारत में यह अमीरों और अभिजनों का खेल नहीं है।यह आम जनता का सबसे प्रिय खेल है। यह बाजार और बाजारवाद का खेल नहीं है। यह मुनाफे का खेल नहीं है। हमने आजतक किसी कारपोरेट घराने के मुनाफों में आए उछाल पर कभी जनता को जुनूनी भाव में नहीं देखा। इस अर्थ में देखें तो भारत में क्रिकेट बाजारवाद का नहीं जनता के विरेचन का हिस्सा है। इसमें बाजारवाद गौण है। लोकतंत्र,मित्रता और मनोरंजन प्रमुख हैं।
हमें क्रिकेट को बाजारवाद का औजार देखने की मूर्खताओं से बचना चाहिए। बल्कि क्रिकेट तो बाजार को मंदी से बाहर लाने का अस्त्र बना है।
भारत में क्रिकेट की अवस्था इश्क जैसी है,इस पर गालिब ने लिखा है- "इश्क से तबीयत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया। दर्द की दवा पाई दर्दे बेदवा पाया।"
गालिब को मैं क्रिकेट के लिए बहुत प्रासंगिक मानता हूँ थोड़े फेर के साथ उनका शेर है- "तुमको हम दिखाएँगे क्रिकेट ने क्या किया। फ़ुर्सत कशाकशे-ग़मे-पिन्हाँ से गर मिले।"यानी हम अपनी व्यथा को छिपाए रखना चाहते हैं परन्तु वह सब पर प्रकट होने के लिए व्याकुल है। इस खींचातानी से फ़ुर्सत मिल जाए तब हमारा क्रिकेट (प्रेम)में पागलपन देखना। क्रिकेट के साथ भारत की जनता का संबंध वैसे ही है जैसे इश्क के प्रति प्रेमीजनों का होता है। भारत की जनता इश्क की हद तक प्यार करती है और उसे आप किसी भी हालत में इश्क करने से रोक नहीं सकते। यह भी कह सकते हैं कि क्रिकेट भारत की जनता की आदत का हिस्सा है। और दुष्यन्त के शब्दों में कहें- "एक आदत सी हो गई है तू। और आदत कभी नहीं जाती."  



रविवार, 9 जनवरी 2011

असफल रैनेसां का प्रतीक हैं गालियां


        हिन्दी में रैनेसां का शोर मचाने वाले नहीं जानते कि हिन्दी में रैनेसां असफल क्यों हुआ ? रैनेसां सफल रहता तो हिन्दी समाज गालियों का धडल्ले से प्रयोग नहीं करता। बांग्ला ,मराठी ,तमिल,गुजराती में रैनेसां हुआ था और वहां जीवन और साहित्य से गालियां गायब हो गयीं। लेकिन हिन्दी में गालियां फलफूल रही हैं और यह हिन्दी जाति के पतन की निशानी है। गालियां असभ्यता की सूचक हैं। जिस साहित्य और समाज में अभिव्यक्ति का औजार गाली हों वह समाज पिछडा माना जाएगा। गालियां इस बात का संकेत हैं कि हमारे समाज में सभ्यता का विकास धीमी गति से हो रहा है। यथार्थ की भाषिक चमक यदि गाली के रास्ते होकर आती है तो यह सांस्कृतिक पतन की सूचना है। गालियां हमारे आदिम जीवन की निशानी हैं।
  हिन्दी में अनेक लेखक हैं जो साहित्य में गालियों का प्रयोग करते रहे हैं। अकविता से लेकर काशीनाथ सिंह तक साहित्य में गालियां सम्मान पा रही हैं। गाली अभिव्यक्ति नहीं है। यथार्थ कभी गालियों के जरिए व्यक्त नहीं होता। अधिकांश बड़े साहित्यकारों ने यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए कभी गालियों का प्रयोग नहीं किया। गालियां हमारे जीवन में असभ्यता की निशानी हैं। गालियों का किसी भी तर्क के आधार पर महिमामंडन करना गलत है। हिन्दी में कई लेखक हैं जो अपनी साहित्यिक अभिव्यक्ति के लिए गालियों का प्रयोग करना जरूरी समझते हैं। युवाओं में गालियों का सहज प्रयोग मिलता है। इन दिनों इलैक्ट्रोनिक मीडिया में भी गालियों का प्रयोग बढ़ गया है।खासकर फिल्मों, रियलिटी टीवी शो और टॉक शो में इसकी झलक मिलती है। हिन्दी में गालियों का बचे रहना इस बात का संकेत है कि हिन्दी अभी आदिम अभिव्यक्ति के रूपों से मुक्त होकर आधुनिक सभ्य भाषा नहीं बन पायी है। समाज में एक बड़ा हिस्सा है जो धडल्ले से गालियां देता है।
    सवाल उठता है हिन्दी समाज इतना गाली क्यों देता है ? क्या हम गालियों से मुक्त समाज नहीं बना सकते ? वे कौन सी सांस्कृतिक बाधाएं हैं जो हमें गालियों से मुक्त नहीं होने देतीं ? प्रेमचंद ने लिखा है ‘हर जाति का बोलचाल का ढ़ंग उसकी नैतिक स्थिति का पता देता है। अगर इस दृष्टि से देखा जाए तो हिन्दुस्तान सारी दुनिया की तमाम जातियों में सबसे नीचे नजर आएगा। बोलचाल की गंभीरता और सुथरापन जाति की महानता और उसकी नैतिक पवित्रता को व्यक्त करती है और बदजवानी नैतिक अंधकार और जाति के पतन का पक्का प्रमाण है। जितने गन्दे शब्द हमारी जबान से निकलते हैं शायद ही किसी सभ्य जाति की ज़बान से निकलते हों।’
  आम तौर पर हिन्दी में पढ़े लिखे लोगों से लेकर अनपढ़ लोगों तक गालियों का खूब चलन है। कुछ के लिए आदत है। कुछ के लिए धाक जमाने,रौब गांठने का औजार हैं गालियां। पुलिस वाले तो सरेआम गालियों में ही संप्रेषित करते हैं। गालियों के इस असभ्य संसार को हम तरह-तरह से वैध बनाने की कोशिश भी करते हैं। कायदे से हमें अश्लील भाषा के खिलाफ दृढ़ और अनवरत संघर्ष आरंभ करना चाहिए। यह काम सौंदर्यबोध के साथ -साथ शैक्षिक दृष्टि से भी जरूरी है। इससे हम भावी पीढ़ी को बचा सकेंगे।  गालियों के प्रयोग के खिलाफ हमें खुली निर्मम बहस चलानी चाहिए। बगैर बहस के गालियां पीछा छोड़ने वाली नहीं हैं। बहस से ही दिमागी परतों की धुलाई होती है।
गालियां मिथ्या साहस की अभिव्यक्ति हैं। गालियां एक सस्ती,घृणित और नीच अश्लीलता है। गालियां महज यांत्रिक आघात नहीं करतीं। इनसे न तो सेक्सी बिम्ब उभरते हैं और न कामुक अनुभूतियां ही पैदा होती हैं। सेक्सी गालियां हमारी अरूचिकर और अस्वास्थ्यकर संवेदनशीलता की अभिव्यक्ति हैं। अश्लील गालियां और अश्लील मजाक के जरिए परपीड़न होता है। गंदे किस्से,चुटकुले,चालू अश्लील शब्द मानवीय सौंदर्य की गरिमा को कम करते हैं। मानव इतिहास आदिम शरीरक्रियात्मक मानकों को कूड़े के ढ़ेर पर फेंक चुका है। लेकिन अभी भी हमारे अनेक मित्र गालियों की हिमायत कर रहे हैं। इस प्रसंग में प्रसिद्ध रूसी शिक्षाशास्त्री अन्तोन माकारेंको याद आ रहे हैं उन्होंने लिखा है- ‘पुराने जमाने में शायद गाली-गलौज की गंदी भाषा कमजोर शब्दावली तथा मूक-निरक्षरता के लिए सहायक की तरह अपने ही ढ़ंग से काम आती थी। स्टैंडर्ड गाली की सहायता से आदिम- भावों को अभिव्यक्त किया जा सकता था, जैसे क्रोध,प्रसन्नता, आश्चर्य, निंदा और ईर्ष्या । लेकिन अधिकांशतः यह किसी भी भावना को व्यक्त नहीं करती थी, बल्कि असम्बद्ध ,मुहावरों और विचारों को जोड़ने के साधन का काम देती थी।’
  हमें इस सवाल पर भी सोचना चाहिए कि हिन्दी में गालियां कहां से आ रही हैं। गालियों के मामले में हम लोकल और ग्लोबल एक ही साथ होते जा रहे हैं। जाने-अनजाने असभ्यता का विनिमय कर रहे हैं। कुछ लोग भाषा को उग्र या आक्रामक बनाने के लिए गालियों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि हमारी जनता उग्र और आक्रामक भाषा पसंद नहीं करती। वह इसे असभ्यता मानती है। गालियों से अभिव्यक्ति में पैनापन नहीं आता बल्कि असभ्यता का संचार होता है। तीक्ष्णता और अभद्रता में हमें अंतर करना चाहिए। हमें बहस-मुबाहिसों में असभ्यता से बचना चाहिए। बहस मुबाहिसे में यदि असभ्यता आ जाती है तो फिर गालियां स्वतः ही चली आती हैं। हिन्दी में स्थिति इतनी बदतर है कि एक नामी साहित्यिक पत्रिका के संपादक आए दिन अपने संपादकीय तेवरों को आक्रामक बनाने के लिए असभ्य भाषा का प्रयोग करते हैं। वे भाषा में तीक्ष्णता पैदा करने के लिए ऐसा करते हैं लेकिन यह मूलतः असभ्यता है। हमें अभिव्यक्ति के लिए तीक्ष्णता का इस्तेमाल करना चाहिए ,असभ्य भाषिक प्रयोगों का नहीं। इन जनाब के संपादकीय अनेक मामलों में अधकचरी विद्वता और अक्षम तर्कपूर्ण शैली से भरे होते हैं।
   हमें विचारों की तीक्ष्णता और साहित्यिक अभिव्यंजना की अभद्रता के बीच अंतर करना चाहिए। लेखन में गाली का प्रयोग एक ही साथ गलत और सही दिखता है। एक जमाने में महान रूसी लेखक पुश्किन ने तीक्ष्णता और अभद्रता के अंतर का विवेचन करते हुए लिखा था, ‘ गाली कभी-कभी ,निश्चय ही,बिल्कुल अनुचित है। जैसे कि आपको नहीं लिखना चाहिएः ‘‘यह हांफता हुआ बूढ़ा,चश्मा लगाए हुए एक बकरा है,एक कमीना झूठा है,बदकार है,बदजात है।’’- ये व्यक्ति को दी गयी गालियां हैं। किन्तु अगर आप चाहें ,तो लिख और छाप सकते हैं कि ‘‘यह साहित्यिक पुराना उपासक(अपने लेखों में) एक निरर्थक बकवासी है,हमेशा दुर्बल,हमेशा उकताने वाला,कष्टकर और बिल्कुल अहमक़ तक है।’’क्योंकि यहां पर कोई व्यक्ति नहीं एक लेखक है।’
  इसी प्रसंग में अन्तोन माकारेंको ने लिखा है, ‘हमारे देश में गाली-गलौज के शब्दों का ‘‘तकनीकी’’ महत्व खत्म हो गया है, लेकिन भाषा में वे अभी भी मौजूद हैं। अब वे मिथ्या साहस को, ‘‘लौह चरित्र’’ को,निर्णायकत्व,सरलता ,सुरूचि के प्रति तिरस्कार को अभिव्यक्त करते हैं। अब वे एक किस्म के ऐसे नखरे हैं,जिनका मकसद सुनने को खुश करना ,उनको जीवन के प्रति सुनानेवाले के साहसिक रवैय्ये और पूर्वाग्रहहीनता को दर्शाना है।’
   साहित्य में गाली के पक्षधरों का मानना है पात्र यदि गाली देते हैं तो हमारे लिए उससे बचना संभव नहीं है। इस प्रसंग में यही कहना है कि गालियां साहित्य नहीं हैं। गालियां जीवन का यथार्थ भी नहीं हैं। गालियां महिलाओं का अपमान हैं और बच्चों के लिए हानिकारक हैं। गालियों के प्रति हमें लापरवाह नहीं होना चाहिए। गालियों को साहित्य में रखकर हम उन्हें दीर्घजीवी बना रहे हैं। उन्हें मूल्यबोध प्रदान कर रहे हैं। विरासत के रूप में गालियां हमारे समाज और संस्कृति की गंभीर क्षति कर रही हैं। प्रेमचंद ने लिखा है ‘ गाली हमारा जातीय स्वभाव हो गयी है।’ ‘गालियों का असर हमारे आचरण पर बहुत खराब पड़ता है। गालियाँ हमारी बुरी भावनाओं को उभारती है और स्वाभिमान व लाज-संकोच की चेतना को दिलों से कम करती हैं जो दूसरी क़ौमों की निगाहों में ऊँचा उठाने के लिए जरूरी है।’
  जब कोई व्यक्ति गालियों का इस्तेमाल करता है तो पढ़ने या सुनने वाला किसी सापेक्ष शब्द को नहीं सुनता बल्कि वह गाली के जरिए उसमें अन्तर्निहित सेक्स के अर्थ तक पहुँचता है। इस दुर्भाग्य का मूल सार यह नहीं है कि सेक्स का राज पाठक या श्रोता के सामने खुल जाता है, बल्कि यह कि वह राज अपने सबसे ज्यादा कुरूप,मानवद्वेषी तथा अनैतिक रूप में उदघाटित होता है। ऐसे शब्दों का बारम्बार होने वाला उच्चारण या लिखित प्रयोग पाठक या श्रोता को सेक्सी मामलों पर अत्यधिक ध्यान देने की,विरूपित दिवास्वप्न देखने की आदत पैदा करता है।  इससे लोगों में अस्वास्थ्यकर रूचियों का विकास होता है।
अधिकांश गालियां स्त्रीकेन्द्रित हैं और उनके गुप्तांगों को लेकर हैं या उसके विद्रूपों को लेकर हैं। इससे सामाजिक हिंसा में बढ़ोतरी होती है। साथ ही यह भावना पैदा होती है कि औरत इस्तेमाल की चीज है। अपमानित है। मादा है। आश्चर्यजनक बात है कि हमारे स्कूली पाठ्यक्रमों से लेकर बड़ी कक्षाओं तक गालियों के खिलाफ कोई पाठ नहीं है। सारे देश के बुद्धिजीवी आराम से आए दिन सिलेबस बनाते हैं और पढ़ाते हैं। लेकिन गालियों के बारे में कभी क्लास नहीं लेते। कभी बोलते नहीं हैं। उलटे यह देखा गया है कि जिस बच्चे को डांटना होता है उस पर गालियों की बौछार कर देते हैं।
   गालियों का प्रयोग सत्य को स्थगित कर देता है। हम जब गाली देते हैं या गाली लिखते हैं तो उस समय हमारी नजर गाली पर होती है सत्य पर नहीं,हम गाली में उलझे होते हैं। गालियों के प्रयोग से वर्तमान साफ नजर नहीं आता। गालियों का प्रयोग विचारों और यथार्थ को एक नई भंगिमा में तब्दील कर देता है। एक विलक्षण किस्म के पाठ की सृष्टि करता है। वह अवधारणाओं के अर्थ और यथार्थ के अर्थ को संकुचित करता है। अर्थ संकुचन गालियों की पूर्वशर्त है। यह य़थार्थ को उसके स्रोत से काट देता है । जबकि लेखक यही दावा करता है कि वह वास्तविकता दरशाने के लिए गालियों का प्रयोग कर रहा है। गालियों के साहित्यिक प्रयोग को स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में ही पेश किया जाता है। जबकि सच इसके एकदम विपरीत है।
गालियों का प्रयोग अर्थविस्तार नहीं करता उलटे अर्थसंकोच करता है। जब कोई लेखक यथार्थ को गालियों में खींच लाता है तो वह यथार्थ के साथ जुड़े बुनियादी तर्कों से उसे अलग कर देता है। यथार्थ के सत्य और असत्य विकल्पों की संभावनाएं खत्म कर देता है। गालियों का प्रयोग यथार्थ की बहस को वर्तमान काल में ले आता है। अब उसके लिए वर्तमान का जीवंत यथार्थ बेमानी होता है। गालियों का प्रयोग वर्तमान यथार्थ को शरणार्थी बना देता है।
वैसे अधिकांश रचनाओं में एकाधिक अर्थ की संभावनाएं होती हैं लेकिन गाली के प्रयोग वाले अंशों में एक ही अर्थ होता है। एकाधिक अर्थ या भिन्न अर्थ की संभावनाओं को गालियां नष्ट कर देती हैं। गालियों का प्रयोग सामाजिक गैर बराबरी को बनाए रखता है। सामाजिक हायरार्की को आप इसके प्रयोगों के जरिए अपदस्थ नहीं कर सकते। गालियों में परिवर्द्धन और सम्बर्द्धन संभव नहीं है वे जैसी बनी थीं वैसी ही चली आ रही हैं। यह सिलसिला सैंकड़ों सालों से चला आ रहा है। गालियों के जरिए युगीन विचारों को नहीं पकड़ सकते। हिन्दी में जिसे दिल्लगी कहते हैं वह भी गालियाँ है। प्रेमचंद ने दिल्लगी को गालियों से कुछ कम घृणित माना है। गालियों को उन्होंने ‘जातीय कमीनेपन’ और ‘नामर्दी’ का सबूत कहा है। साथ ही इसे ‘जातीय पतन की देन’ माना है। उनके ही शब्दों में ‘ जातीयपतन दिलों की इज़्ज़त और स्वाभिमान की चेतना को मिटाकर लोगों को बेग़ैरत और बेशर्म बना देती है।’ गालियां अनुभूति की शक्ति मिटा देती हैं। 

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...