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शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

नामवर सिंह और रसशास्त्र का विखंडन

        रस पर इन दिनों तकरीबन बातें नहीं हो रही हैं।जबकि रसशास्त्र ने 18सौ साल तक रचना और आलोचना को प्रभावित किया,हमारे सौंदर्यबोध के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की ।सवाल यह है कि वह अचानक गायब कैसे हो गया ? क्या रस आज भी प्रासंगिक है ? क्या रसशास्त्र के जरिए नाटक, साहित्य और समाज का नया मूल्यांकन संभव है ? बकौल नामवर सिंह “रसःजस का तस या बस ?” हमें इस लक्ष्मणरेखा का मूल्यांकन करना चाहिए।अनेकबार अकादमिक आलस्य के कारण हम परंपरा में जाना बंद कर देते हैं और यही बड़ी वजह है कि रस पर हमने बातें बंद कर दी हैं।

सवाल उठता है रचना लिखने के बाद और रचना लिखने के दौरान लेखक अपनी रचना का आनंद लेता है या नहीं ? कुछ कह रहे हैं रचना लिखने के बाद रचना स्वायत्त हो जाती है। यह भी कहा जा रहा है कि रचना कभी स्वायत्त नहीं होती,वह पाठक से हमेशा जुड़ी रहती है,पाठक के आत्मगतबोध से जुड़ी रहती है। सृजन के बाद लेखक से रचना अपने को स्वायत्त कर लेती है , लेखक अपनी रचना का लिखने के दौरान आस्वाद भी लेता है लेकिन असल आस्वाद तो पाठक लेता है। लेखक को तो लिखकर ही शांति मिलती है,सुख मिलता है। रचना कैसी है यह तो पाठक ही बेहतर ढ़ंग से बता सकता है। संस्कृत कवि कहते हैं कवि को तो सहृदय की अवस्था में ही आनंद की प्राप्ति होती है।लेखक लिखता जरुर है लेकिन लेखन के सार का आनंद तो सहृदय लेता है। इस नजरिए से देखें तो संस्कृत का कवि रचना को ‘एक तैयार माल’ मानकर चलता है।इससे रचना का गतिशील आनंद उपेक्षित होता है। मसलन्,इसमें भोक्ता के आनंद का तो महत्व है लेकिन कवि के आनंद का कोई महत्व नहीं है। जबकि लेखक लिखते समय आनंद लेता है और रचना के संपूर्ण होने के बाद भी आनंद लेता है।इस प्रक्रिया में रचना के गतिशील पक्ष की उपेक्षा होती है और रचना के बाह्य स्थिर या जड़ उपकरणों के साज-संवार पर लेखक ज्यादा जोर देने लगता है।

आज लेखक के सामने सामाजिक सरोकारों को व्यक्त करने की चुनौती है,लेकिन इस तरह की कोई चुनौती रसयुग में नहीं थी,रसयुग में तो रचनाकार का एकमात्र लक्ष्य था रसग्राही सहृदय जुगाड़ करना और लेखक को अजर-अमर बनाने के सूत्रों की खोज करना। इसलिए उसने रचना बाह्य उपकरणों के सजाने-संवारने पर ज्यादा ध्यान दिया। नए विषयों की खोज पर कम ध्यान दिया।फलतः रचना में बड़े पैमाने पर अभिव्यक्ति के नए उपकरणों का सृजन तो हुआ लेकिन नई विषयवस्तु का प्रवेश नहीं हो पाया।इसने रचना के उपकरणों का निर्वैक्तिक तंत्र निर्मित किया। यह ऐसा तंत्र है जिसका सतह पर समाज से कोई संबंध नजर नहीं आता लेकिन गहराई में जाकर देखें तो रचना के उपकरणों के निर्वैयक्तिक तंत्र का गहरा संबंध वस्तुतःराज दरबार,राजस्तुति,सुभाषित और समाज की अगतिशीलता के साथ है।इस प्रक्रिया में सर्जना के गतिशील पक्ष की ओर लेखक ने ध्यान देना ही जरुरी नहीं समझा। यही वह बिंदु है जहाँ से खड़े होकर कवि के निरंकुश भावबोध का जन्म होता है। कवि निरंकुश होता है यह धारणा जन्म लेती है।

रचना में बाह्य उपकरणों,रुढ़िगत प्रतिमानों और सरस विषयों का आग्रह रहेगा तो कवि के निरंकुश होने की संभावनाएं ज्यादा होंगी।खासकर जब लेखक भावविशेष पर ही केन्द्रित होकर बार-बार रचना लिखेगा तो उसके रुपवादी होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। कहने के लिए नौ रस थे लेकिन लिखा गया श्रृंगार रस पर ही,खोज-खोज कर उससे संबंधित विषयों पर नई शैली,नई भाषा,नए अलंकारों में रचनाएं लिखी गयीं इसके कारण आलोचना में रुपवादी रुझानों का आरंभ हुआ। साहित्य और समाज के बीचमें अलगाव की सृष्टि हुई।लेखक और प्रकृति में अलगाव का आरंभ हुआ। “समग्रालक्ष्मी” की अवधारणा से क्रमशःलेखक दूर होता चला गया। आरंभ में समग्र व्यक्ति के बोध पर जोर था लेकिन बाद में व्यक्ति के भावविशेष पर जोर दिया गया।शास्त्रज्ञान पर जोर दिया गया।पहले प्रकृति को जानने और चित्रित करने पर जोर था बाद में शास्त्र जानने पर जोर दिया गया।इसके कारण आलोचना में रुपवादी तत्वों की जमकर सृष्टि हुई।

पहले लेखक के लिए प्रकृति प्रमुख थी,बाद में लेखक को ब्रह्मानंद सहोदर कहा गया,बाद में इन सबसे दूर निकलकर लेखक ने स्थिर विषयों और परब्रह्म के रुपों पर लिखना आरंभ करना दिया ।इस क्रम में मनुष्य उपेक्षित हो गया परंपराएं निर्जीव हो गयीं और रचना के बाह्य उपकरण प्रमुख हो गए। रचनाकार के अंदर आए इन बदलावों का रचनाकार के सामाजिक नजरिए से गहरा संबंध है। रचनाकार पहले प्रकृति से जुड़ने के कारण समाज से जुड़ा हुआ था,बाद में ज्योंही उसने दरबार की ओर रुख किया वह प्रकृति से कट गया और अभिव्यक्ति के लिए उसने रुढ़िबद्ध रुपों को अपना लिया,साहित्य में यहीं से स्टीरियोटाइप चीजों का प्रवेश होता है। उसके इस तरह के रुख का एक अन्य कारण था लेखक का मूल्यबोध और सामाजिक सरोकारों का अभाव।यह भी सच्चाई है कि संस्कृत में कोई विद्रोही कवि नहीं हुआ और न विद्रोही साहित्य ही लिखा गया। इन दोनों के अभाव के कारण के रुप में हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अंधविश्वास,कर्मफल के सिद्धांत और पुनर्जन्म की धारणा के असर को जिम्मेदार ठहराया।

सवाल यह है इन मूल्यों और विचारों का लोकभाषा के साहित्य और कवियों पर असर क्यों नहीं पड़ा ? जनभाषाओं में ऐसे लेखक है जिनकी रचनाओं में अंधविश्वास,कर्मफल के सिद्धांत आदि का न्यूनतम असर है। जबकि संस्कृत के लेखकों में व्यापक असर है। उन लेखकों पर इन मूल्यों का ज्यादा असर था जिन्होंने अपने लिए विषयवस्तु “रामायण” और “महाभारत” से चुनी। क्योंकि इन दोनों महाकाव्यों में अंधविश्वास आदि से जुड़ी बातें बड़ी संख्या में नजर आती हैं। इस प्रसंग में हमें देखना चाहिए कि लेखक रचना के लिए विषय कहां से चुनता है ? लोकभाषाओं के अनेक लेखकों ने साहित्यिक रुढ़ियों और रुढ़िगत प्रतिमानों का जमकर विरोध किया और अभिव्यक्त के लिए संस्कृत परंपरा से भिन्न विकल्पों की खोज की, “रामायण” और “महाभारत” जैसे महाकाव्यों से विषय न चुनकर जीवन से विषय चुने। यही वजह है उनके साहित्य में संस्कृत साहित्य की तुलना में सर्जनात्मकता का विकास बेहतर ढ़ंग से हुआ। उनके साहित्य को आम जनता में जनप्रियता मिली। इसके विपरीत संस्कृत साहित्य शिक्षित संस्कृत समाज तक ही सीमित रहा।इसका एक आशय यह भी है कि संस्कृत के लेखकों पर अंधविश्वास,पुनर्जन्म और कर्मफल के सिद्धांत का ज्यादा असरथा।यही वजह है कि वहां साहित्यिक रूढ़ियों का व्यापक रूप में विकास हुआ।

इसके अलावा संस्कृत के अधिकांश लेखक आस्तिक थे ,फलतःउनमें स्वतंत्र चिन्तन के प्रति कोई आग्रह या पहल नजर नहीं आती। साहित्य में स्वतंत्र चिन्तन,नए विषय पर लिखने की इच्छा का लेखक के स्वतंत्र भावबोध से गहरा संबंध है। लोकभाषाओं के लेखकों ने स्वतंत्र चिन्तन का परिचय देते हुए कविता के फॉर्म से जुड़े रुपों को चुनौती दी। यह भी कह सकते हैं कि लोकभाषा के कवियों में संस्कृतकाव्य के फॉर्म से बाहर निकलकर लिखने की जो छटपटाहट है वह असल में उनके अंदर सामाजिक और दार्शनिक बंधनों से बाहर निकलने की स्वतंत्र चिंतन की प्रक्रिया से जुड़ी है। इनमें अनेक लेखक ऐसे भी हैं जो ईश्वर के परंपरागत रुप को सीधे चुनौती देते हैं।

संस्कृत काव्य लेखकों को धर्मशास्त्र प्रभावित कर रहा था जबकि लोकभाषा के लेखकों में धर्मशास्त्र के प्रति बगावत के भाव नजर आते हैं।धार्मिक और सामाजिक रुढ़ियों के प्रति बगावत नजर आती है।वे ईश्वर और राजा की सत्ता बनाए रखते हैं,लेकिन काव्य जगत में परिवर्तन की लहर पैदा कर देते हैं। कहने का अर्थ यह है कि संस्कृत साहित्य के लेखक और लोकभाषा साहित्य के लेखक के नजरिए में बुनियादी अंतर है।इसका अर्थ यह भी है मध्यकाल में साहित्य की कई परंपराएं थीं।इन परंपराओं में गहरे वैचारिक अंतर्विरोध हैं,इन परंपराओं से जुड़े लेखकों के नजरिए,साहित्य प्रयोजन,सामाजिक आधार और सामाजिक सरोकार भिन्न हैं।

संस्कृत लेखक की बौद्धिक-सांस्कृतिक संरचना और लोकभाषा लेखक की बौद्धिक-सांस्कृतिक संरचना की धुरी है उनकी समाजदृष्टि।संस्कृतलेखक हमेशा राजा को इकाई मानकर लिखते रहे।जबकि जनभाषा के लेखकों ने भगवान को आधार बनाकर लिखा। इसलिए राजा बनाम भगवान का द्वंद्व वहां सहज ही देख सकते हैं। संस्कृत लेखकों ने राजा की आड़ में सामाजिक-दार्शनिक अंतर्विरोधों को छिपाने की कोशिश की वहीं जनभाषा के लेखको ने भगवान के बहाने सामाजिक-दार्शनिक अंतर्विरोधों और सामाजिक पीड़ाओं को चित्रित किया। संस्कृत के लेखक के नजरिया रस और काव्यनियमों से संचालित है।

रस और काव्यनियम वस्तुतः धर्मशास्त्रीय मूल्यों और मान्यताओं के आवरण का काम करते हैं। रस के नाम पर वह वस्तुतःमध्यकालीन रूढ़ियों का पल्लवन हुआ।खासकर 5वीं शताब्दी के बाद से यह प्रवृत्ति ज्यादा प्रबल रुप में सामने आती है। इसके कारण संस्कृत लेखकों का साहित्यबोध और साहित्यशिल्प दोनों प्रभावित हुए।साहित्य को शाश्वत मानने की धारणा बलवती हुई।अधिकांश कवियों ने कविता के शिल्प पर इस कदर जोर दिया कि लेखक के विचारों में स्वतंत्र पहलकदमी एकदम खत्म हो गयी, अब लेखक गढ़िया होकर रह गया। यह गढ़िया लेखक भावहीन शिल्प-साधना में निरंतर बढ़ता चला गया।फलतः अभिव्यक्ति के वास्तविक रुपों और विषयों के ऊपर से उसकी पकड़ एकसिरे से खत्म हो गयी।यह ऐसा लेखक है जिस पर जीवन की यथार्थ घटनाओं का कोई असर नजर नहीं आता। वह जीवन की सच्चाई को न तो देखता है और न उससे प्रभावित ही होता है।

संस्कृत के लेखकों ने जिन विषयों पर लिखा है उससे कुछ समय तक पाठक का मनोरंजन तो होता है लेकिन इस तरह के साहित्य का समाज पर कोई असर नहीं पड़ता।इस तरह के साहित्य को ही वे लोग “शाश्वत साहित्य”, “शाश्वत चिंतन” और “शाश्वत मूल्य” कहते हैं। इन लेखकों ने बड़े पैमाने साहित्यिक और कलात्मक रचनाओं के सिद्धांत,नियम और संरचना की विधियों को खोजने का प्रयत्न किया। आंचलिक,व्यक्तिपरक,देशज सांकृस्तिक रुपों का बहिष्कार किया।रचनाओं में “प्रतिनिधि” और “सार्वभौम” की बड़े पैमाने पर सृष्टि की।सामान्य चरित्रों को न्यूनतम स्थान दिया।मसलन्, राजा जिस भाषा में बोलता है वह उसी में बोलेगा,आमजन जिस भाषा में बोलते हैं,वे उसी भाषा में बोलेगा ।राजा को राजा की तरह और रंक को जनभाषा में बोलना चाहिए।यह भी धारणा रही है कि “प्रतिनिधि” और “सार्वभौम” चरित्रों के रुपायन से ही महान साहित्य की सृष्टि होती है।इसी समझ ने शास्त्रीय रचनाओं के अनुकरण करने पर जोर दिया।फलतः सामाजिक यथार्थ से संस्कृत साहित्य का संपर्क संबंध कट गया। यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसमें रस सिद्धांत का जन्म और विकास हुआ।

नामवर सिंह ने ‘रसःजस का तस या बस?’ इस शीर्षक से एक सम्पादकीय ‘आलोचना’ (जनवरी-मार्च1990)में लिखा था,यह उनकी किताब ‘कविता की ज़मीन और ज़मीन की कविता’(2010) में शामिल है। उल्लेखनीय है “कविता के नये प्रतिमान” में नामवरजी ने 1968 में पहलीबार रस पर विचार किया था उसके बाद 1990 में उनकी नजर रस पर पड़ी। देखना यह है कि उनके नजरिए में रस के के प्रसंग में क्या बदलाव आया ? “कविता के नये प्रतिमान” में नामवरजी ने प्रतिमान के रूप में रस की पुनर्व्याख्या या पुनरूद्धार को अप्रासंगिक माना है,महत्वपूर्ण माना है आस्वाद प्रक्रिया और कविता की अर्थमीमांसा को।क्या आस्वाद के सवाल बदले हैं ?क्या आस्वाद की प्रक्रिया में बदलाव आया है ?क्या कविता वही है जो 1968 में थी? कविता के चरित्र में किस तरह का परिवर्तन आया है ? क्या 1968 में नामवरजी के जो विचार थे वे 1990 में बने रहे या बदल गए ? नामवरजी ने अभिनवगुप्त की रस संबंधित समझ का व्यापक उपयोग किया है और भरत वर्णित रसों से भिन्न शांतरस की ओर ध्यान खींचा है, लेकिन लिखा नहीं।

‘रसःजस का तस या बस?’ शीर्षक लेख में नामवरजी ने कई महत्वपूर्ण बातें कही हैं। उनमें पहली बात यह कि ‘चिन्तन के क्षेत्र में पूर्वजों से उऋण होने का एक तरीका यह है कि उनकी मान्यताओं की पुनःप्रस्तुति स्वयं उनकी प्रस्तुति से बेहतर की जाए।’ इस क्रम में नामवरजी ने प्रो.अशोक रामचन्द्र केलकर के ‘प्राचीन भारतीय साहित्य मीमांसा’में प्रस्तुत रस संबंधी विचारों को पेश किया है।नामवरजी के लेख के शीर्षक में प्रश्नवाचक चिह्न अर्थपूर्ण है। यह अनेक रास्ते खोलता है।इस लेख में केलकरजी के विचारों को जस का तस रख दिया गया है ,वहीं दूसरी ओर संभावनाओं के लिए रास्ता खुला छोड़ा गया है। नामवरजी ने लिखा है ‘बेडेकर ने रस-विमर्श की उस प्रचलित प्रवृत्ति पर प्रहार किया था,जिसमें रस की चर्चा एक ‘मनोवैज्ञानिक सिद्धांत’ के रूप में की जा रही थी।इसके विपरीत बेडेकर ने इस प्रस्थान-बिन्दु से अपनी चिन्तन-यात्रा का प्रारम्भ किया कि रस-व्यवस्था ‘कलास्वरूप शास्त्रों’का भारतीय प्रमेय है और विशिष्ट सांस्कृतिक सन्दर्भ में ही उसके सच्चे स्वरूप की पहचान सम्भव है।’(कविता की ज़मीन और ज़मीन की कविता,2010,पृ.11)

नामवरजी ने केलकर के विचारों को अधूरे ढ़ंग से पेश किया है उसके कारण रस पर सुसंगत नजरिया बनाने में मदद कम मिलती है।लेकिन नामवरजी की स्वयं की टिप्पणियां काफी महत्वपूर्ण हैं।नामवरजी ने लिखा ‘कहने की आवश्यकता नहीं कि अन्य कल्पकथाओं की तरह नाट्योत्पत्ति की इस देवासुर-कथा में भी ‘नाट्यवेद’निहित है।नाट्यवेद अर्थात् नाट्य सिद्धांत।इसलिए समस्या एक ‘मिथक’ के ऊपर दूसरा ‘मिथक’ गढ़ने की नहीं,बल्कि उसी ‘मिथक’ को उधेड़ने की है।कल्पसृष्टि एक और पुनर्निर्माण नहीं चाहती,मीमांसा माँगती है।आज की भाषा में कहें तो ‘रिकंस्ट्रक्शन’ नहीं ,’डिकंस्ट्रक्शन’।असंगतियों के बीच सुसंगति लगाने से कहीं ज्यादा जरूरी है सुसंगत प्रतीत होनेवाली रचना में छिपी हुई असंगतियों का उद्घाटन।’(वही,पृ.15)

सवाल यह है नाटक हो या यज्ञ हो,देवासुर संग्राम पर कल्पसृष्टि हो या रसों के सृजन की समस्या हो इसका लक्ष्य क्या है ?यदि हम ‘डिकंस्ट्रक्शन’ करें तो इसके केन्द्र को खोला जा सकता है। रस शास्त्र की समूची चर्चा के केन्द्र में दो बातें सबसे महत्व की हैं। पहली है चीजों को देखने और प्रस्तुत करने की पद्धति और दूसरा है लक्ष्य। दि.के.बेडेकर ने ‘प्राचीन साहित्य मीमांसा’ नामक अपनी लेखमाला में इन दो बातों को रेखांकित किया है इनमें से एक का नामवरजी ने जिक्र किया है,यानी पद्धति का जिक्र किया है लेकिन लक्ष्य को वे छिपा गए।नामवरजी ने लिखा है ‘बहरहाल यह’यज्ञ-नाट्य’देवासुर-कथा ही है और बेडेकर ने विस्तृत विश्लेषण के द्वारा दिखला दिया कि भरत-निर्दिष्ट आठ रसों का अधिष्ठान देवासुर-द्वन्द्व में स्थित है।उन्हीं के शब्दों में, “मनोविज्ञान को एकतरफ रखकर स्थायित्व का अर्थ आठ रसों के स्थिर सम्बन्ध ही लगाना चाहिए।इसी प्रकार इन आठ रसों के पीछे जाकर श्रृंगारादि रस-चतुष्टय पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।श्रृंगारादि चतुष्ट्य का पुनःश्रृंगार-वीर और रौद्र-वीभत्स ऐसा द्वन्द्व ध्यान में रखना चाहिए।यह द्वन्द्व देव और असुर द्वन्द्व का नाट्यमय रसात्मक स्वरूप है।यह निश्चित रूप से जान लेने पर भरत प्रणीत रस-व्यवस्था का सब अर्थ अच्छी तरह से लग जाता है।” ’(16-17)

रस-निष्पत्ति’ के प्रसंग में नामवरजी ने लिखा ‘इसी प्रकार ‘रस-निष्पत्ति’ की प्रक्रिया यज्ञ की प्रक्रिया के अनुसार समझाई गई है।‘रस-निष्पत्ति’ के स्वरूप की चर्चा में अन्य विद्वान जहाँ’षाडव रस’ तथा ‘पानक रस’ में उलझे रहे,बेडेकर की निर्भ्रान्त दृष्टि ‘नाट्यशास्त्र’ की इस पंक्ति पर गई-

‘शरीरं व्याप्यते तेन शुष्कं काष्ठमिवाग्निना।’

लकड़ी में सुप्त अग्नि मन्थन-प्रयोग से व्यक्त होती है और उस लकड़ी को ही व्याप्त कर लेती है।यज्ञ की अग्नि पुराकाल में(और परम्परा-निर्वाह के लिए आज भी)इसी विधि से पैदा की जाती थी।लकड़ी में सुप्त अग्नि को लकड़ी की ओखली में दूसरी लकड़ी की मथानी घुमाने से व्यक्त किया जा सकता है।यज्ञ-क्रिया में ऐसी ही सिद्ध अग्नि ही काम में लाते थे।एक प्रकार से देखें तो देवासुर-कथा का द्वंन्द्व यहाँ भी सक्रिय है।रस-व्यवस्था के मूल में द्वन्द्व है।बेडेकर की क्रांतिकारी खोज यही थी।’(पृ.17) कहने का आशय यह कि नाटक में ‘द्वन्द्व’ के नजरिए के जनक भरत हैं।‘दवन्द्व’ के बिना सृजन नहीं होता। यह हमारी परंपरा का सबसे मूल्यवान नजरिया है और पद्धति भी है।यह आज भी सृजन के लिए प्रासंगिक है। रही बात काठ के घर्षण से अग्नि पैदा करने की तो अग्नि तो लकड़ी में होती है।घर्षण उससे जन्म देता है।इसे तीव्र भावोर्मि कह सकते हैं,रचना के निर्माण में भावोर्मि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।जब कोई विषय लेखक को उद्वेलित करता है तब ही रचना की पहली चिंगारी फूटती है।वहीं से लेखक के भावानुभवों की सृष्टि होती है।यही चीज बाद में रचना के रूप में प्रकाश पाती है।

नामवरजी ने बेडेकर की धारणाओं का विस्तार से विवेचन करने के बाद लिखा ‘सारी युक्ति का सार यह है कि नाट्य प्रयोग न देवों की विजय प्रदर्शित करता है, न असुरों की पराजय;वह तो त्रैलोक्य का भावानुकीर्तन है।अभिनव ने इस भावानुकीर्तन का एक लम्बा-चौड़ा दर्शन पेश कर दिया है,जिसे भारतीय साहित्य मीमांसा का अमरसिद्धांत समझा जाता है।’

आगे लिखा ,‘किन्तु क्या यह काव्य- सिद्धांत ‘जर्जर’का ही दूसरा रूप नहीं है ?जो कार्य बड़े डंडे से न सधे,उसे साधने के लिए सिद्धांत का सहारा लिया जाए तो उस सिद्धांत को क्या नाम दिया जाएगा ?इस सन्दर्भ में अभिनवगुप्त के दो वाक्य उल्लेखनीय हैं।नाट्यशास्त्र के 1/70 पर अभिनवगुप्त अपनी ओर से जोड़ते हैं- एवं राज्ञा सिद्धिविघातका दण्डया इति।अर्थात् इस प्रकार राजा को नाट्य सिद्धि में विघ्न डालनेवालों को दंड देना चाहिए।नाट्यशास्त्र के 1/99श्लोक में ब्रह्मा द्वारा शान्तिपूर्वक समझाने के प्रसंग पर- नाशक्तस्य सामाङ्गीकरोति दुर्जन इति पूर्वरक्षाकरणम्।अर्थात् असक्त के साम को दुर्जन नहीं मानता इसलिए (साम से पहले)रक्षा-विधान दृढ़ कर लिया जाए।तात्पर्य यह कि ब्रह्मा के मुख से कहलाया गया ‘नाट्य दर्शन’ ‘शक्त का साम’अर्थात् ताकतवर का शान्ति-पाठ है।इस प्रकार क्या रस का दर्शन शक्ति का प्रदर्शन नहीं लगता ?आजकल जिसे ‘आइडियोलॉजी’ कहते हैं वह और क्या होती है ?क्या रस-सिद्धान्त ने शुरू से ही एक ‘आइडियोलॉजी’ अथवा ‘दिट्ठ’ की भूमिका नहीं निभाई है ।’

नामवरजी ने बेडेकर का विवेचन करने के साथ ही अंतमें यह भी लिखा , ‘आशंका सिर्फ यही है कि नया आकलन भी कहीं इसी लम्बी श्रृंखला की एक कड़ी न साबित हो ! बेडेकर ने शायद इसीलिए सभी सम्भाव्य संस्करणों को सन्दिग्ध समझा और रस को संग्रहालय में सुरक्षित रखने का प्रस्ताव रखा।इसीलिए आज भी यह प्रश्न है कि रसःजस का तस अथवा बस?’ दिलचस्प बात यह है नामवरजी रस की विचारधारा के पहलू को खोलते ही नहीं हैं और सवाल उठाकर छोड़ देते हैं। रस की विचारधारा का पहलू तब खुलता है जह हम शान्तरस के अंदर प्रवेश करते हैं।बेडेकर ने शान्तरस का जिक्र तक नहीं किया और नामवरजी जिक्र तो करते हैं लेकिन विवेचन से कन्नी काटते हैं। अभिनवगुप्त ने शान्तरस का श्रृंगार के साथ अन्तर्विरोध दिखाकर रस की विचारधारा में निहित जनविरोधी भावों को उद्घाटित किया है।सवाल यह है शान्त रस क्या है और उसे कैसे देखें ?

शांतरस पर जोर देकर अभिनवगुप्त ने असल में रस के समूचे ढ़ांचे और विचारधारा को निशाना बनाया है। अभिनवगुप्त जिस समय लिख रहे थे उस समय समाज में कला,साहित्य,संस्कृति आदि विभिन्न क्षेत्रों में ह्रासशील प्रवृत्तियां चरम पर थीं।रस की सृष्टि और संरचना ने ह्रासशील प्रवृत्तियों को जमकर बढ़ावा दिया,कलाएं सामाजिक उन्नति की बजाय समाज में अवरोध पैदा करने का काम कर रही थीं।रसों की संरचना और विचारधारा पर विचार करें तो पाएंगे कि रसों में गहरा अंतर्विरोध है।मसलन्,रति है तो वैराग्य भी है।रसों में एक-दूसरे के विरोधी भावों का होना यह दरशाता है कि रसों का चरित्र अंतर्विरोधपूर्ण और ह्राशशील है,यह चित्तवृत्तियों का शमन नहीं करता बल्कि उनको तनावयुक्त बनाता है।यह संभव नहीं है कि शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए उत्साहित भी हो और शत्रु से डरे भी।लेकिन इस तरह के अंतर्विरोध रसों में हैं।रसों में अंतर्निहित अंतर्विरोधों की अभिनवगुप्त ने नाटयशास्त्र की अभिनवभारती टीका में विस्तार से चर्चा है।

भरत वर्णित 8रसों के इस समूचे ढ़ांचे से बाहर निकले बिना रस के प्रति नए नजरिए और नई भूमिका का विकास संभव नहीं है। यह आयरनी है कि अभिनवगुप्त की रस संबंधी आलोचना को संस्कृतकवियों और आलोचकों ने गंभीरता से ग्रहण नहीं किया। भरत के यहा रस के अंतर्विरोध से निकलने का उपाय है एक रस से निकलो और दूसरे की शरण लो।इसके लिए ‘ऐकाधिकरण्य’ की पद्धति के प्रयोग पर जोर दिया,ऐकाधिकरण्य का अर्थ है एक आश्रय से सम्बन्ध होना।अभिनवगुप्त ने लिखा है भय और उत्साह का एक आश्रय में सहभाव दूषित होता है।किन्तु उनके आश्रय बदल देने से उनका विरोध जाता रहता है।इसके लिए एकाश्रयत्व में निर्दोष और नैरंतर्य पर जोर दिया गया।इससे रसो में व्याप्त अंतर्विरोधों का समाधान नहीं हुआ।

उल्लेखनीय है अभिनवगुप्त ने नागानन्द का उदाहरण दिया है और उसके संदर्भ में श्रृंगार और शांत रस के अंतर्विरोध का विश्लेषण करते हुए शांतरस की स्थापना की है।अभिनवगुप्त के मूल्यांकन यह वह बिंदु है जहां पर भोगवाद,पुंसवाद और रस के अंतस्संबंध को वे निशाना बनाते हैं।इस अंतस्संबंध को समझाने के लिए उन्होंने सांख्य दर्शन के दो तत्वों ‘चित्तवृत्ति का प्रसार’ और ‘लिङ्गशरीर’ की अवधारणा का इस्तेमाल किया है। वे विस्तार के साथ नागानन्द की कथा का विवेचन करते हैं और इन दोनों धारणाओं का खुलासा करते हैं।

साहित्य में श्रृंगार को रसराज कहा गया और उसका साहित्य में वर्चस्व था।अभिनवगुप्त ने इस वर्चस्व को चुनौती देने के लिए शांतरस की सृष्टि की।श्रृंगार और शांत के अंतर्विरोध पर जोर डाला।श्रृंगार रस का मूलाधार है तृष्णा ,जबकि शांतरस का मूलाधार है तृष्णाक्षय।तृष्णाक्षय में जो आनंद है वह किसी और में नहीं है। रसों की भूमिका रही है तृष्णा पैदा करने की और अभिनवगुप्त ने इसी को आधार बनाकर समूची सामंती व्यवस्था और श्रृंगार रस का विरोध किया। तृष्णाक्षय आज के युग के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण तत्व है।यह सामाजिक विकास का सकारात्मक तत्व है।भरत के 8रसों में तृष्णा जगाकर रसनिष्पति होती है जबकि अभिनवगुप्त के शांतरस में तृष्णाक्षय के जरिए रसनिष्पत्ति और आनंद की सृष्टि की है। श्रृंगारादि रसों के जरिए विषयाभिलाष पैदा किया जाता था उसका अभिनवगुप्त ने विरोध करते हुए विषयाभिलाष के निर्वेद पर जोर दिया है,उस निर्वेद में अभूतपूर्व आनंद होता है।निर्वेद ही शांतरस का स्थायीभाव है। जब उसका परितोष आस्वाद में हो जाता है तभी शान्तरस होता है।ठेस भाषा में इसे वैराग्य यानी नागरिकचेतना कहते हैं।

रसों के विकल्प के रूप में वैराग्य यानी नागरिकचेतना की वकालत वस्तुतःदरबारी सभ्यता-संस्कृति और उनके साथ जुड़े कलारूपों का निषेध है,यह संयासवाद नहीं है।यह लोकचेतना है। तृष्णा और लोकचेतना या नागरिकचेतना में अंतर्विरोध है। उल्लेखनीय है जनभाषा के लेखकों ने श्रृंगारादि रसों और काव्य के नियमों के आधार पर काव्यसृजन का भी विरोध किया था।काव्यसृजन के नियम और रस ये दोनों एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हैं।अभिनवगुप्त ने रसों के मूलाधार पर प्रहार करते हुए जब तृष्णाक्षय की स्थापना की तो उन्होंने वस्तुतःलोक कामना से साहित्य को जोड़ने पर जोर दिया। रसों का आधार तृष्णा होने के कारण भरत वर्णित 8रसों पर आधारित समूचा साहित्य क्रमशःलोक से कटता चला गया । अभिनवगुप्त जब श्रृंगार का विरोध कर रहे थे तो वस्तुतःसाहित्य को नागरिकचेतना से जोड़ने पर जोर दे रहे थे। उन्होंने लिखा है-

यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम्।

तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतःषोडशीं कलाम्।।

यानी लोक में कामना से जो सुख प्राप्त होता है और जो स्वर्गीय महान् सुख होता है,वे दोनों प्रकार के सुख तृष्णाक्षय से उत्पन्न होनेवाले सुख का सोलहवाँ भाग भी नहीं होते। इस प्रसंग में भरत के पक्षधरों का मानना है भरत ने शान्त को कभी अस्वीकार नहीं किया,बल्कि भरत के यहां तो शांन्तरस सभी रसों के मूल में रहता है।सभी रसों की शान्तावस्था ही शान्त रस कहलाती है।असल में मामला इतना सरल नहीं है। अभिनवगुप्त ने रेखांकित किया है कि रसों के पक्षधर और भरत के यहां रस के आने के पहले शांतरस रहता है उसके बाद अन्य रस पैदा होते हैं। यानी तृष्णाभाव के पहले शान्त भाव रहता है और रसों के जरिए उस भाव को नष्ट करके तृष्णाभाव पैदा होता है,इसके विपरीत अभिनवगुप्त के नजरिए से तृष्णाभाव को नष्ट करके शान्तरस पैदा होता है।यानी वीतराग या वैराग्य वह है जहां तृष्णा का विध्वंस हो जाय। सवाल यह है क्या आज के उपभोगतावादी समाज में हमें शांतरस चाहिए या नहीं ? अथवा रस चाहिए ? नामवरजी जब रस की हिमायत करते हैं तो वे शान्तरस में निहित इस समूचे दृष्टिकोण को भूल जाते हैं। “कविता के नए प्रतिमान’ में कहने के लिए वे नगेन्द्र की आलोचना करते हैं लेकिन वस्तुतः वे नगेन्द्र के साथ ही खड़े रहते हैं। नगेन्द्र के नजरिए में रस-सिद्धान्त शाश्वत और सार्वभौम सिद्धान्त है वहीं नामवरजी के लिए भरत की रस संबंधी धारणा में प्रसंगानुकूल प्रतिमान मिल जाते हैं।इस प्रसंग में वे रस के आंतरिक तत्वों की विवेचना करके नगेन्द्र के मत का खंडन करते हैं लेकिन वैचारिकतौर पर दोनों एक ही धरातल पर खड़े रहते हैं।यहां तक कि 1990 में भी उनके बुनियादी विचारों में कोई परिवर्तन नहीं आता।

अभिनवगुप्त ने एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू की ओर ध्यान खींचा है वह है रस का चरम।सवाल है क्या रस का चित्रण करते हुए उसको चरम तक चित्रित करें ? भरत चरम तक चित्रण के पक्षधर हैं लेकिन अभिनवगुप्त ऐसा नहीं मानते.शान्तरस के पक्ष,विपक्ष,स्थायीभाव आदि का अभिनवभारती टीका में विस्तार के साथ विश्लेषण किया है। मसलन् रौद्र रस का चरम तो हत्या है लेकिन उसकी प्रस्तुति से बचा जाना चाहिए,प्रतीत हो कि हत्या हो गयी। इसलिए “प्रतीति” और “प्रतीयमान अर्थ” इनका बड़ा महत्व है।इसी प्रकार भरत ने वीररस के तीन उपभेदों का जिक्र किया है,ये हैं, दानवीर,धर्मवीर और युद्धवीर। इसी प्रसंग में अभिनव ने कहा है कि दयावीर को शान्तरस का प्रभेद तब मान सकते हैं जब उसमें सब प्रकार के अहंकार का अभाव हो। यदि उत्साह के साथ अहंकार आ जाता है तो दयावीर को शान्तरस का प्रभेद नहीं मान सकते।इसी तरह कुछ लोग शान्तरस को वीभत्सरस में समाहित करके देखते हैं लेकिन अभिनवगुप्त ने इसका भी खंडन किया है।क्योंकि शान्तरस का मूलाधार या स्थायीभाव घृणा नहीं है। वह तो व्यभिचारी भाव है। अंत में सबसे बड़ी बात जो शान्तरस से जुड़ी है वह है उसका लक्ष्य।भरत वर्णित 8रसों का लक्ष्य है आनंद और रस की सृष्टि करना,लेकिन शांतरस का लक्ष्य है मोक्ष प्रदान करना। 8रसों के लिए पुरूषार्थ की जरूरत है लेकिन शान्तरस के लिए लोकनिष्ठा और नागरिकचेतना होनी चाहिए।

रस के प्रसंग में बुनियादी सवाल यह है कि रस किसके लिए ?आनंद के लिए या दुख के लिए ?नाटक किसके लिए आनंद के लिए या दुख के लिए ? रस को मानें या न मानें लेकिन कलाओं के प्रसंग में यह सवाल तो हमेशा उठा है कि कलाओं का लक्ष्य क्या है ?रसों की जब सृष्टि हुई तब भी यह प्रश्न केन्द्र में था ,नामवरजी इस सवाल से कन्नी काटकर निकल जाते हैं।इस प्रसंग में आर.बी,पाटणकर की कृति ‘सौंदर्य मीमांसा’ में विस्तार के साथ विचार किया है। पाटणकर मराठी साहित्य के प्रमुख आलोचक हैं और उनकी कृति ‘सौंदर्य मीमांसा’ को साहित्य अकादमी ने 1975 में पुरस्कृत भी किया है।नामवरजी ने बेडेकर के बहाने रस की सृजन प्रक्रिया के सवालों पर विचार किया है लेकिन रस का संबंध तो आस्वाद से है और कला के क्षेत्र में सृजन प्रक्रिया से ज्यादा व्यापक फलक आस्वाद प्रक्रिया का है।आस्वाद प्रक्रिया के सवाल कला-साहित्य के बुनियादी सवाल हैं उनसे हिन्दी के मार्क्सवादी आलोचक भागते रहे हैं।रस हमारे ऐंद्रिय सुख से जुड़ा है।यही विमर्श का प्रमुख बिंदु है जिसके जरिए रचना के विमर्श को अमूर्तन में ले जाने से रोक सकते हैं।

नाटक या कला या साहित्य का लक्ष्य है ‘आनंद’,और रस का भी लक्ष्य है ‘आनंद’। ‘आनंद’ के बिना कला रूप अपना विकास नहीं करते।‘आनंद’ से हमें ‘सुख’ मिलता है यही वजह है कि ‘आनंद’ और ‘सुख’ को पर्यायवाची समझना चाहिए। मराठी साहित्य में भी अनेक बड़े विद्वानों ने ‘आनंद’ और ‘सुख को पर्यायवाची माना है। नाट्यशास्त्र में यह भी माना गया है कि रचना में वैयक्तिक दुख और सुख का अनुभव करने से रसनिष्पत्ति में बाधा पड़ती है।

नाट्यशास्त्र पर विचार विमर्श के दौरान अमूमन अभिनवगुप्त लिखित भाष्य का बार-बार जिक्र होता है। अभिनवगुप्त ने नाट्यशास्त्र के रचे जाने के सात-आठ सौ वर्ष के बाद ‘अभिनव-भारती’ नामक टीका लिखी.इसे सबसे प्रामाणिक टीका माना जाता है।अपनी टीका में अभिनवगुप्त ने अनेक बातें अपनी कही हैं उन बातों का भरत के नाट्यशास्त्र से कोई संबंध नहीं है। इस पहलू को टी.जी.माईणकर ने “दि थियरी ऑफ संधीज ऐंड संध्यंगाज”(1960) नामक कृति में विस्तार के साथ रेखांकित किया है।रा.भा.पाटणकर ने सवाल भी उठाया है कि क्या ‘सुख’ को सौंदर्यानुभव का आवश्यक घटक माना जा सकता है ? दूसरा प्रश्न यह कि ऐसा सुख लौकिक है या अलौकिक है ? क्या रचनाएं भावनाओं पर प्रभाव ड़ालती हैं ? अथवा कलास्वाद का भावना और भावनात्मकता से संबंध है ?क्या रचना पढ़ते समय भाव जागृति होती है ?भावना और भावनात्मकता को क्या भावनात्मक मनोदशाओं या मूड से अलग रखा जा सकता है ?मनोदशाएं कितनी अवधि तक टिकी रहती हैं ?क्या इस सबका भावनात्मक स्वभाव वैशिष्ट्य से संबंध जुड़ता है? पाटणकर के अनुसार ‘भावनात्मक स्वभाव वैशिष्ट्य प्रायःजीवन-भर हमारा साथ देते हैं।वे हमारे व्यक्तित्व का भाग बनते हैं।जब हम किसी व्यक्ति को ,निराशावादी और दूसरे को आशावादी कहते हैं,तब हमारे मन में उन मनुष्यों के स्वभाव वैशिष्ट्य ही होते हैं।लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि निराशावादी मनुष्य सारे समय के लिए म्लान पड़ा रहता है और आशावादी सदैव उछल-कूद करता रहता है।’(सौंदर्य- मीमांसा,पृ.238)

दिलचस्प बात यह है कि अभिनवगुप्त जब रस पर विचार कर रहे थे तो उनके नजरिए के केन्द्र में “सुख” या “आनन्द” नहीं था बल्कि “मोक्ष” था। यही वजह है कि लिखा ‘मोक्षफलत्वेन चायं परमपुरूषार्थनिष्ठत्वात् सर्वरसेभ्यःप्रधानतमः।’ कहने का आशय यह कि शान्तरस का फल मोक्ष होता है जो कि सबसे बड़ा फल है।अतएव इस रस की निष्ठा पुरूषार्थ में भी सबसे अधिक होनी चाहिए।

रस पर विचार करते समय तीन तत्वों की खूब चर्चा होती है।1.स्थायीभाव,2.व्यभिचारी या संचारी भाव और 3.सात्त्विक भाव।कई आलोचकों ने इस विवेचन के लिए मनोविज्ञान का सहारा लिया है। इस समूचे प्रसंग में यही कहना समीचीन होगा कि स्थायी भावों का संबंध रंगमंच से है,दृश्य अभिनय में इनकी भूमिका है।वाच्य में इनकी भूमिका नही होती। रा.भा,पाटणकर ने लिखा है स्थिरभावों के लिए भावनात्मक भाषा की जरूरत होती है जिसे अभिनय में बेहतर ढ़ंग से व्यक्त किया जा सकता है।मसलन्,क्रोध का वर्णन करने से वह व्यक्त होगा ?उसका वर्णन किया जा सकता है।यह सही है।लेकिन जिस अर्थ में दाँत,ओंठ चबाना,मुट्ठियाँ भींचना,आँखें लाल होना आदि के जरिए क्रोध व्यक्त होता है उस अर्थ में किसी कृति के जरिए क्रोध व्यक्त नहीं होगा।भावनात्मक भाषा का स्थान वर्णनात्मक भाषा नहीं ले सकती। नाटक में भावों को वाच्य के स्तर पर नहीं दिखाया जाता बल्कि उसकी अभिव्यंजना करनी होती है। नाटककार भावों की अभिव्यंजना के लिए विभावादि का उपयोग करता है।यहाँ भावों का वर्णन नहीं होता।भावों की अभिव्यंजना साधी जाती है। इसलिए नाटक में भाव व्यंजक भाषा और विभावादि का इतना महत्त्व है।यदि विभावादि का नाटक में महत्व है तो यह तय है ये चीजें दृश्य अभिनय के माध्यमों के प्रसंग में आज भी प्रासंगिक हैं। हमारे साहित्यालोचकों की मुश्किल यह है कि वे नाटक को केन्द्र में रखकर लिखे शास्त्र को काव्य आदि विधाओं पर लागू करके उसकी प्रासंगिकता पर विचार करते रहे हैं ,खासकर नामवरजी ने भी इस कृति पर काव्यादि के संदर्भ में ही विचार किया है जो सही नहीं है। दृश्यमाध्यम की सैद्धांतिकी पर लिखी धारणाओं को मुख्य रूप से दृश्यमाध्यमों के संदर्भ में ही पढ़ा जाना चाहिए।

रस के विवेचन के क्रम में एक सवाल यह भी उठा है कि रस का किस वर्ग के साथ संबंध था ? रस के जो वर्गीकरण 8रसों में भरत ने किए उसके पीछे क्या कोई वर्गीयदृष्टि थी या फिर मनमौजी ढ़ंग से वर्गीकरण कर दिया गया था। वर्गीयदृष्टिकोण के सवाल पर इसलिए भी विचार करना चाहिए क्योंकि रसों के सामाजिक आधार को तय करने में मदद मिलेगी। रस का गहरा संबंध दरबारी सभ्यता के साथ था और रस कभी भी गैर-अभिजनवर्ग के उपभोग की चीज नहीं था.इसलिए जितनी भी बार रस पर बहस हुई है तो वह उसकी प्रशंसा और गुणों पर ही केन्द्रित रही है। उसके वर्गीय चरित्र को लेकर चर्चाएं नहीं हुई हैं। रस के समाज से कटे होने का बड़ा कारण यह था कि यह जन्म से अभिजन का शास्त्र रहा है।अभिजन के वैचारिक वर्चस्व को स्थापित करने का शास्त्र रहा है,यही वजह है आमजन ने कभी भी रसों को अपनी काव्याभिव्यक्ति या नाट्याभिव्यक्ति का आधार नहीं बनाया।

रस को दरबारी लेखकों ने अपनी रचनाओं में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया और अभिजनों की अभिरूचि निर्मित करने के लिए उसके तमाम उपकरण निर्मित किए। इसके कारण रस के अंदर एक खास तरह की अगतिशीलता या अपरिवर्तनीयता भी है। फलतः रस के मूल अवधारणात्मक ढ़ांचे में कोई परिवर्तन सैंकड़ों सालों नहीं हुआ। रस में अभिरूचि के स्तर पर सौंदर्यबोधीय विभाजन भी है जो लंबे समय से अपरिवर्तनीय है.इसका अर्थ है कि रस में ज्ञान का विकास नहीं हुआ।यह सच भी है कि नाट्यशास्त्र में वर्णित रसों के बारे में नई चीज तब आई जब अभिनवगुप्त ने अभिनव भारती नामक टीका लिखी,लेकिन रस की पूर्वधारणाओं को पूरी तरह खारिज करने की उनकी भी हिम्मत नहीं हुई।

रस पर दार्शनिक तौर पर आदर्शवादी दर्शन का असर था जिसके कारण रस की व्याख्याएं तो हुईं लेकिन मूलगामी परिवर्तन नहीं हुआ। अभिनवगुप्त के पहले तक तकरीबन 1000साल तक आठ रस ही प्रचलन में रहे,अभिनवगुप्त ने कहा कि नया रस शान्तरस हो सकता है। लेकिन अभिनवगुप्त के बाद तो फिर से रस जगत में सन्नाटा पसरा हुआ है। इससे पता चलता है कि रसों के उपभोक्ता के रूप में अथवा सर्जक के रूप में या रस के लेखक के रूप में जो लोग काम करते रहे हैं उनमें नई अवधारणाएं निर्मित करने की क्षमता ही नहीं थी,इस दृष्टि से रस एक तरह का बांझ शास्त्र है। उसमें नए को रचने की क्षमता नहीं है। जबकि कायदे से रस के ढ़ांचे से नाभिनालबद्ध वर्ग को नए के खोज की दिशा में प्रयास करना चाहिए लेकिन यह न हो सका।सवाल रस की व्याख्या का नहीं है बल्कि रस को बदलने का है रस जैसा है उसे वैसा ही रखने का अर्थ है कि रस की अपरिवर्तनीयता को मानना।जबकि सच यह है कि रस की उत्पत्ति जब हुई तब से लेकर आज तक तकरीबन दो हजार साल का लंबा सफर गुजर चुका है इसके बावजूद हमने नए की खोज का काम आरंभ नहीं किया है। रस का संरचनात्मक ढांचा इस तरह का है कि उसमें नए की खोज नहीं कर सकते।वह अपरिवर्तनीय उत्पादन संबंधों से बंधा है।

रस में एक खास किस्म का यांत्रिक संरचनात्मक ढ़ांचा है जिसमें रंगमंच काम करता रहा है।इसमें बाह्य हस्तक्षेप की संभावनाओं का अभाव है। रस हमारे पुराने प्राचीनकालीन सामूहिक कलात्मक अनुभवों का हिस्सा है। स्थिर भाव,स्थिर दर्शक और अगतिशील अभिनेता ये तीन इसके संरचनात्मक साथी हैं। फलतःइसकी ह्रासशील सामंती समाज में आकर भूमिका पहले की तुलना में और भी खराब हुई।

सवाल यह है कि रस को आधार बनाकर कोई मुक्तिकामी या परिवर्तनकामी नाटक क्यों नहीं लिखा गया ?रस का चूंकि नाटक के क्षेत्र में इस्तेमाल होता था अतःरस ने सार्वजनिक स्पेस और निजी स्पेस का विकास क्यों नहीं किया ? मध्यकाल में नाटक या रंगमंच हमारे समाज में जनमंच क्यों नहीं बन पाया ?समस्त नाटक उन्हीं वर्गों पर लिखे गए जो दरबारी सभ्यता से जुड़े थे।रस में विभिन्न किस्म के भावों का वस्तुगत वर्गीकरण मिलेगा और मंचन में इनकी वस्तुगत प्रस्तुतियों पर ही जोर रहा।वस्तुगत प्रस्तुतियां समाज के ऊपर आवरण डाले रखने का काम करती हैं,इस तरह की प्रस्तुतियों के कारण समाज की नाटक में यथार्थ प्रस्तुति नजर नहीं आती।समाज पर छदम आवरण पड़ा रहता है.इस तरह की प्रस्तुतियां शोषित और शोषक के बीच के संबंध को छिपाए रखती हैं।दबे-कुचले लोगों और अभिजन के बीच के अंतर्विरोधों को छिपाए रखती हैं।प्रस्तुतियों में मिथकीयचरित्रों के वर्चस्व की वजह से नाटकों के जरिए युगीन समाज को समझना बेहद मुश्किल है।यानी रसों के आधार पर ऐसा साहित्य रचा गया जो सतह पर देखने में सुंदर था लेकिन अंदर से प्राणहीन था।वह रहस्यों के आवरण में बंधा था।

रस को यदि मोक्ष का शास्त्र बनना है तो उसकी पहली सीढ़ी है नाटक में यथार्थ विषयों का प्रवेश हो।रस के नायक के तौर पर कथानक में सामान्यजन की प्रतिष्ठा हो।ऐसे लोगों की प्रतिष्ठा हो जो समाज में हाशिए के लोग कहलाते हैं। यह विलक्षण संयोग है कि रसकेन्द्रित नाटकों का समूचा चरित्र सवर्णवादी है। कथानक के मूल पात्र सवर्ण हैं और वे कथानक की धुरी हैं। असवर्ण पात्र सिर्फ दिल बहलाने के लिए दाखिल होते हैं। वे सारवान गतिविधियों में शामिल नहीं होते।

भरत के ‘नाट्यशास्त्र’ में रस की चर्चा रंगमंच के प्रसंग में है लेकिन कालांतर में काव्यशास्त्रियों और आलोचकों ने इसे साहित्य की विभिन्न विधाओं और खासकर काव्य के मूल्यांकन के संदर्भ में विस्तार दे दिया। इसने रसों के बारे में सबसे ज्यादा विभ्रम खड़े किए।रसों का संबंध यदि नाटक से है और नाटक का संबंध अभिनय से है,अभिनय का भाल-भंगिमाओं से और भाव-भंगिमाओं का सामयिक यथार्थ से संबंध है इस नजरिए से देखें तो नाटक-रस और यथार्थ के अन्तस्संबंध को समझने में मदद मिलेगी।लेकिन हमने पद्धति पुरानी चुनी,हम रसों की धारणाओं की मीमांसा कर रहे हैं और उसके आगे देखने को तैयार नहीं हैं। इसके बाद तो रस और बस ही निकलेगा !

रस,भाव-भंगिमाएं और यथार्थ के रिश्ते में रसमीमांसकों ने रसों पर खूब काम किया लेकिन यथार्थ के साथ उसके अन्तस्संबंध को छोड़ दिया।फलतःरसमीमांसा में भाष्य ही प्रमुख हो गए,व्याख्याएं ही प्रमुख हो गयीं।इस प्रसंग में वाल्टर बेंजामिन याद आते हैं ,वह कहते हैं भाव-भंगिमाएं तो यथार्थ में होती हैं।वे तो आज के यथार्थ में अवस्थित हैं।मसलन्,आपको ऐतिहासिक नाटक लिखना है तो अतीत की घटना का वहीं तक निर्वाह करना है जहां तक उसे आज की भाव-भंगिमाओं के साथ संयोजित करके पेश करने में सफलता मिले।इसका मतलब यह भी है कि ऐतिहासिक नाटक में अनुकरणात्मक भाव-भंगिमाएं तब तक अर्थहीन होती हैं जब तक वे भाव-भंगिमा की साधारण प्रक्रिया का उद्घाटन न करें।ये भंगिमाएं एक्शन की हो सकती हैं या फिर एक्शन का अनुकरण हो सकता है।यदि भाव-भंगिमाओं की पुनरावृत्ति होती है तो वे कृत्रिम रूप ग्रहण कर लेती हैं। वस्तुगत तौर पर देखें तो हमारी भाव-भंगिमाएं अत्यन्त उदार माहौल में बनती-बिगड़ती हैं।अगर कोई व्यक्ति सामाजिक भूमिका के दौरान भाव-भंगिमाओं में हस्तक्षेप करता है या उनका इस्तेमाल करता है तो उसे ज्यादा से ज्यादा सर्जनात्मक ढ़ंग से भाव-भंगिमाओं को सृजित करने की जरूरत पड़ती है।

भरत के नाट्यशास्त्र में रंगमंच और रस के अन्तस्संबंध को जिस तरह विश्लेषित किया उसमें पाठकेन्द्रित रसनिष्पत्ति पर जोर है और उससे रस का सर्जनात्मक विकास नहीं होता। यह दृष्टिकोण ठहरे हुए समाज में तो ग्राह्य है लेकिन जो समाज गतिशील है और ,वहां यह संबंध अप्रासंगिक हो जाता है, यही वजह है रसशास्त्र अगतिशील अवस्था में तो ध्यान खींचता है लेकिन समाज ज्यों ही विकास की अगली दशा में दाखिल हुआ उसकी ओर अधिकांश लेखकों का ध्यान ही नहीं गया अथवा जिन लेखकों ने रसकेन्द्रित होकर लिखा उनको अप्रासंगिकता का सामना करना पड़ा।

रस में आए ठहराव का एक बहुत बड़ा कारण है उसकी समाजनिरपेक्ष परिकल्पना और अवधारणाएं। समाज निरपेक्ष अवधारणाएं उन नाटकों में सही प्रतीत होती हैं जिन नाटकों का कोई सामाजिक लक्ष्य नहीं होता,जो मात्र मनोरंजन या आनंद के लिए लिखे गए हैं। अभिनवगुप्त ने जब भरत वर्णित रसों से भिन्न शान्तरस को स्थापित किया तो उनके जेहन में यही धारणा रही होगी।रस का काम है लोकचेतना से जोड़ना,यानी नाटक में पात्रों की सामाजिक भूमिका में बार-बार व्यवधान पैदा किया जाय,व्यवधान के लिए ही ज्यादा से ज्यादा गानों की जरूरत महसूस की गयी।रस के प्रसंग में भरत जिस रंगमंच की परिकल्पना पेश करते हैं वहां पाठ के विस्तार पर जोर है . उसी पर केन्द्रित अभिनय पर जोर है।लेकिन अभिनेता का काम पाठ को मंच पर हू-ब-हू उतारना नहीं है बल्कि उसका काम है हस्तक्षेप करना,व्यवधान पैदा करना,क्रमभंग करना।कलाकार रससृष्टि करे इसके लिए जरूरी है कि वह भाव-भंगिमा और परिस्थितियों के द्वंद्वात्मक संबंध को उदघाटित करे।इसी क्रम में अभिनेता के एटीट्यूट और पाठ के प्रति उसके रवैय्ये से बहुत कुछ तय होगा।इस प्रसंग में सबसे महत्वपूर्ण है पाठ पर अभिनेता का अधिकार।पाठ को अभिनेता जितनी गहराई में जाकर आत्मसात करेगा उतना ही बेहतर सृजन कर पाएगा।इसके कारण ही वह दर्शक के साथ बेहतर संबंध भी बना पाएगा।

भरत ने नाट्यशास्त्र में नाटक में रस की भूमिका पर ही मूलतः केन्द्रित किया है। उनके लिए रस और उसकी रंगमंचीय प्रक्रिया ही महत्वपूर्ण है। नाट्यशास्त्र की समूची व्याख्या इसी पहलू के इर्दगिर्द घूमती है।इसके जरिए जहां एक ओर नाटक की समीक्षा का पेट भरा गया वहीं काव्यशास्त्र के नाम पर आलोचना की क्षतिपूर्ति करने की कोशिश की गयी।इससे शास्त्र तो निर्मित हुआ लेकिन रंगमंच समृद्ध नहीं हुआ।रंगमंच की समृद्धि के लिए जरूरी है नाटक खेले जाएं,अफसोस है कि नाट्यशास्त्र के प्रभाववश नाटक कम खेले गए,लिखे खूब गए।नाटक खेले गए होते तो रंगमंच का शास्त्र आज अभावग्रस्त न होता। सवाल उठता है जहां नाट्यशास्त्र रचा गया वहां नाटक की आधुनिक समीक्षा का विकास क्यों नहीं हो पाया ? जिस क्षेत्र में नाट्यशास्त्र रचा गया उस क्षेत्र में नाटक कम क्यों खेले गए?

भरत का नाट्यशास्त्र अभिनेता को दर्शक से भिन्न इकाई के रूप में देखता है।दर्शक से अभिनेता को काटकर देखने के कारण हमारे यहां रंगमंच दुर्दशाग्रस्त हुआ।दर्शक से अभिनेता को काटने का अर्थ है शरीर से प्राण निकाल लेना।जींवंत रंगमंच तब ही संभव है जब अभिनेता और दर्शक का संबंध बना रहे।फलतःसंस्कृत साहित्य में विधा रूप में नाटक है लेकिन फॉर्म से ज्यादा उसकी कोई भूमिका नहीं है।विधागत रूप से ज्यादा उसकी कोई भूमिका नहीं है।यह ऐसा नाटक है जो पाठ केन्द्रित है, लेकिन उसमें सामयिक सामाजिक परिस्थितियों की अभिव्यंजना कहीं पर भी नजर नहीं आती।यह ऐसा नाटक है जिसका रचयिता दरबारी है।इस तरह नाटक पूरी तरह दरबारी ताकतों के नियंत्रण में है। इसी संदर्भ में यह सवाल उठता है कि नाटक पर किसका नियंत्रण है ? संयोग की बात है कि संस्कृत नाटकों पर राज्य एपरेटस का नियंत्रण था और उसकी ओर कभी समीक्षकों ने ध्यान ही नहीं दिया। इस प्रसंग में दूसरी समस्या यह पैदा हुई कि आलोचकों ने नाटक को साहित्य की अन्य विधाओं के साथ जोड़ दिया। हम सब जानते हैं नाटक दृश्य माध्यम है जबकि अन्य विधाएं दृश्यमाध्यम नहीं हैं।वे श्रव्यमाध्यम हैं। इसलिए काव्य या साहित्य के साथ नाटक को जोड़कर देखना सही नहीं है,नाटक के शास्त्र को काव्यालोचना बनाना उचित नहीं है।

भरत ने नाट्यशास्त्र की जो परिकल्पना पेश की उसमें पाठ तैयार करना महत्वपूर्ण है,नाटक का सार्वजनिक प्लेटफॉर्म तैयार करना लक्ष्य नहीं है। रंगमंच का सार्वजनिक प्लेटफॉर्म बनाना लक्ष्य होता तो नाट्यशास्त्र की विचारधारात्मक भूमिका भी होती लेकिन नामवरजी नेउसकी व्यापक विचारधारात्मक भूमिका खोज ली।जो कि गलत है। भरत के लिए नाटक रसव्यंजना की विधा है, नाटक उनके लिए विश्व को व्यंजित करने का मंच नहीं है।वे अभिनय की कलात्मक व्याख्या पेश करते हैं लेकिन अभिनय तो कलात्मक व्याख्या नहीं है।अपितु यथार्थ नियंत्रण है।भरत के यहां पाठ ही निर्धारक है लेकिन अभिनय में पाठ निर्धारक नहीं है,वहां से आरंभ जरूर होता लेकिन वहां तो यथार्थ का सृजन करना लक्ष्य होता इस क्रम में ब्याज में पाठ का दायित्व पूरा हो जाता है साथ में अभिनय भी हो जाता है। कहने का अर्थ है अभिनेता कठपुतली नहीं होता।वह पाठ की देन नहीं है, बल्कि सृजन की देन है।

भरत जिस रंगमंच की परिकल्पना करते हैं उसके प्रसंग में सवाल उठता है कि दर्शक जब नाटक देखने जाता है तो क्या उसे नाटक के बारे में पहले से जानकारी होती है ? प्राचीन और मध्यकाल में जिस तरह के महाकाव्यात्मक नाटक लिखे गए उनमें मूल कथानक की दर्शक को पहले से जानकारी हुआ करती थी। इस प्रसंग में बर्तोल्त ब्रेख्त का इस स्मरण करना समीचीन होगा,उनका मानना है कि ऐतिहासिक घटनाओं पर केन्द्रित नाटकों में रंगकर्मी को यह लाईसेंस दिया जाना चाहिए कि वह अपने महान निर्णय कुछ इस तरह पेश करे कि लगे कि वे इतिहास की मुख्यधारा के अनुरूप हैं।साथ ही “ऐसा भी हो सकता था ,वैसे भी हो सकता था”,इस फ्रेमवर्क को न भूले।उसका अपनी रचना से वैसा ही संबंध होना चाहिए जैसा नृत्य शिक्षक का अपने शिष्य से होता है।उसका पहला लक्ष्य होता है उसके बंधनों को जहाँ तक संभव हो ढ़ीला करे।उसे ऐतिहासिक-मनोवैज्ञानिक रूढियों से मुक्त करे।ब्रेख्त का मानना है परिस्थितियों को स्वयं बोलने दो,इसी से वे एक-दूसरे से द्वंद्वात्मक मुठभेड़ करती हैं।नाटक के तत्व तार्किक ढ़ंग से एक-दूसरे के खिलाफ संघर्ष करते हैं।

अभिनवगुप्त ने जब भरत वर्णित 8रसों से भिन्न नौवां शान्त रस पेश किया तो प्रकारान्तर से रसों के लक्ष्य पर ही प्रश्न लगाया।भरत का लक्ष्य था आनंद की सृष्टि करना,इसके विपरीत अभिनवगुप्त का लक्ष्य था वैराग्य यानी लोकचेतना पैदा करना। शान्तरस को पेश करके अभिनवगुप्त ने रसों की प्रामाणिकता पर भी प्रश्नचिह्न लगाया था।साथ ही रसविशेषज्ञ की भूमिका पर को सवालों के दायरे में खड़ा कर दिया।उनके लिए रसविशेषज्ञ या क्रिटिक की आलोचना में चली आ रही वरीयता का भी कोई महत्व नहीं था।रसविशेषज्ञों की राय साहित्य में लगातार अप्रासंगिक बनी रही,इसका प्रधान कारण है रस का समाज से कटा होना।रस के नाम पर या काव्यशास्त्र के ज्ञाता या विशेषज्ञ के नाम पर जो आलोचक सामने आया वह समाज से पूरी तरह कटा हुआ था।यही वजह है कि उसका समाज पर कोई असर नहीं हुआ।

भरत के नाट्यशास्त्र में पारदर्शिता पर जोर है लेकिन इसे सरल प्रस्तुति न समझा जाए।पारदर्शिता वस्तुतःसरलता का विलोम है।पारदर्शिता में निर्माता की वास्तविक कलात्मक क्षमता का उदघाटन होता है।भरत के लिए दर्शक की भूमिका मात्र देखने तक है,वे इसके आगे सोचते ही नहीं है।यह ऐसा दर्शक है जो नाटक देखने पर ही कुछ क्षण के लिए सोचता है। इस तरह के नाटक का लक्ष्य जनता के भावों,विचारों और भावनाओं को अभिव्यक्त करना नहीं है। संस्कृत नाटकों में चिन्तनशील हीरो नहीं मिलेगा।बल्कि विस्मयकारी हीरो मिलेगा।संस्कृत नाटकों में जो कथानक होता है वह परिस्थितियों को खोलने पर जोर नहीं देता।परिस्थितियां वहां सिर्फ संदर्भ के रूप में ऊपर से चिपकायी हुई प्रतीत होती हैं।नाटककार परिस्थितियों को जब तक खोलता नहीं है तब तक वह समाज का उदघाटन नहीं कर पाता। समाज का उदघाटन किए बगैर यह संभव ही नहीं है सामाजिक परिवर्तन हो।











































गुरुवार, 1 सितंबर 2016

पब्लिक इंटिलेक्चुअल नहीं हैं नामवर सिंह-


मैं गरम लिखता हूँ,नरम भी लिखता हूं,मार्क्सवादी भी लिखता हूँ,बुर्जुआ दृष्टिकोण से भी लिखता हूँ,मुझे अनेक बातें बुर्जुआजी की पसंद हैं,अनेक बातें क्रांतिकारियों की पसंद हैं,मुझे नास्तिक प्यारे हैं लेकिन मैंआस्तिकों का भी सम्मान करता हूं।पेशे से शिक्षक हूँ,आमतौर पर मुझे मार्क्सवाद पसंद है,लेकिन मैं क्रांतिकारी नहीं हूं,मैं उस समय भी क्रांतिकारी नहीं था जब जेएनयूएसयू का अध्यक्ष बना था,उन दिनों भी क्रांतिकारी नहीं था जब मैं माकपा का सक्रिय सदस्य था,मेरे अधिकतर दोस्त कम्युनिस्ट हैं।इसके बावजूद मैं क्रांतिकारी नहीं हूँ।मैं सही अर्थ में मार्क्सवादी भी नहीं हूँ।हां सच बोलना,सच देखना,सच के साथ खड़े होना मैंने कम्युनिस्टों से ही सीखा है।इसके बावजूद मैं क्रांतिकारी नहीं हूँ,मैं पेशेवर शिक्षक हूँ,बुद्धिजीवी हूँ ,फर्श पर बैठकर मैंने संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई की है,जाहिर है यह सुख

नामवरजी को भी नसीब नहीं हुआ।वे फर्श पर बैठकर कभी नहीं पढ़े।मैंने साम्यवाद की शिक्षा कैरियर के लिए नहीं लीसाम्यवादी विचार बड़े ही स्वाभाविक ढ़ंग से मथुरा में यमुना की तरंगों की तरह मेरे जीवन में शामिल हुए हैं।निम्न-मध्यवर्गीय परिवार में जन्म हुआ,ऐसे परिवार में पढ़कर मथुरा के परिवेश में यथार्थको देखने,राजनीति करने की शिक्षा मुझे उन तमाम मित्रों से मिली जो मध्यवर्ग से आते थे,जेएनयू जाकर मुझे कुछ पक्के समर्पित क्रांतिकारियों से मिलने का मौका मिला।

उसके पहले मैं निजी तौर पर दो पेशेवरक्रांतिकारियों से परिचय प्राप्त कर चुका था वे हैं का.सुनीत चोपड़ा और का.प्रकाश कारात,इन दोनों से मेरा परिचय मथुरा में ही आपातकाल में हुआ था। मैं ये बातें इसलिए लिख रहा हूं कि मेरे बारे में भ्रम है कि मैं मार्क्सवादी हूँ।मैं कतई मार्क्सवादी नहीं हूँ।मुझे वैष्णव सम्प्रदाय पसंद है,शाक्त सम्प्रदाय में मेरी दीक्षा हुई और अंत में ईश्वरमु्क्त हो गया,लेकिन बीच-बीच में मुझे भगवान की याद वैसे ही सताती है,जिस तरह मनुष्य को अतीत याद आता है।मैं मजदूरों-किसानों की पक्ष में खड़ा होना सामाजिकजिम्मेदारी मानता हूँ।मुझे अन्याय नापसंद है।उसी तरह जालिमाना हरकतें नापसंद हैं।मैं पेशे से क्रांतिकारी नहीं शिक्षक हूँ।चमचागिरी से मुझे सख्त नफरत है।मैं कोई भी बात इसलिएनहीं मान लूँगा कि वह बात किसी मार्क्सवादी ने कही है,मैंने मार्क्सवाद को यथार्थ की कसौटी पर कसने की कला मार्क्स से सीखी है,नामवर सिंह ने यदि कुछ सही लिखा है तो मैंने माना है,लेकिन गलत लिखा है या गलत बोला है तो उसकी तत्काल आलोचना की है।मैं जानता हूं हिन्दी में बहुत बड़ा वर्ग है प्रोफेसरों का,जो नामवरजी का ऋणी है,उनके नाम पर अहर्निश झूठी प्रशंसा करता है,इस तरह के प्रोफेसरों ने नामवर सिंह का नुकसान किया है साथ ही हिन्दी के बौद्धिक परिवेश को क्षतिग्रस्त किया है। हिन्दी विभागों में अनपढों या कमपढों की नियुक्तियां करके नामवरजी ने हिन्दी जगत की जितनी क्षति की है उसके लिए उनको कभी हिन्दी जगत माफ नहीं कर सकता।इतनी व्यापक क्षति होने के बावजूद यदि दिल्ली विश्वविद्यालय का एक प्रोफेसर बेहूदे किस्म के कमेंटस हम लोगों पर लिखने की कोशिश कर रहा है तो हम उससे यही कहना चाहेंगे नामवर सिंह के नोटस या किसी किताब या किसी निबंध पर पहले खुलकर आलोचना लिखकर दिखाओ,पहले वह आलोचकीय विवेक पैदा करो जो नामवरजी से पढ़कर हमने हासिल किया है।हमने नामवरजी का श्रेष्ठग्रहण किया है,घटिया ग्रहण नहीं किया है।नामवरजी की हमने प्रशंसा भी लिखी तो उनके सामाजिक-साहित्यिक लेखन की आलोचना भी लिखी।हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं,नामवरजी विद्वान हैं,बुद्धिजीवी हैं,बेहतरीन शिक्षक हैं,लेकिन पब्लिक इंटेलेक्चुअल नहीं हैं।वे मंच पर बैठे बुद्धिजीवियों में शोभा देते हैं।लेकिन वे पब्लिक इंटिलेक्चुअल नहीं हैं।वे आम जनता के हितों ,नीतियों और कार्यक्रमों से जुड़े सवालों पर निरंतर न तो बोलते रहे हैं और न लिखते रहे हैं।पब्लिक इंटिलेक्चुअल हमेशा जनता में सच के साथ खड़ा रहता है,वह नफा नुकसान देखकर राय व्यक्त नहीं करता।नामवरजी तो इस मामले में पक्के बनिया हैं,वे नफा-नुकसान देखकर रायदेते हैं।पब्लिक इंटिलेक्चुअल सत्य का हिमायती होता है।नामवरजी तो अवसरवादी राजनाति के पक्ष में खड़े रहे हैं। संक्षेप में इतना ही,बाकी प्रोफेसर गोपेश्वर सिंह के उत्तर आने के बाद।

शनिवार, 30 जुलाई 2016

नामवरजी का संघियों से संवाद

        नामवरजी दल बदलें,मंच बदलें,विचारधारा बदलें,हमें इससे कोई परेशानी नहीं है,उनको संवैधानिक हक है,लेकिन संविधान में प्रतिक्रियावाद की गोद में जाने का प्रावधान नहीं है।संविधान धर्मनिरपेक्षता की रक्षा का वायदा करता है,लेकिन नामवरजी आप यह सब भूल गए।इसे कहते हैं रामजी के चरणामृत का असर!

कल से फेसबुक पर मित्रलोग हल्ला कर रहे हैं नामवरजी ने 28जुलाई 2016 को राजनाथ सिंह की मौजूदगी में जो बोला वह कमाल का बोला!हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं,नामवरजी ने वहां जो कुछ सुना और उसकी अनसुनी की,मंत्रियों की संघी विचारधारात्मक धारणाओं के सामने जिस तरह समर्पण किया उसने प्रेमचंद को उलटा कर दिया,उनके आचरण ने गिरीश्वर मिश्र के बयान को उलटा कर दिया। कम से कम गिरीश्वर मिश्र ने तो संतुलित कहा,लेकिन नामवरजी आपने तो हद कर दी !

नामवरजी के भाषण की जो मुख्य बातें हैं उन पर थोड़ा गंभीरता से विचार करें,यह विचार करना इसलिए जरूरी है क्योंकि नामवरजी अपने भाषण से लेखकों के लिए फासिस्ट मोदीमार्ग का निर्माण करके गए हैं। मोदीमार्ग पर चलने का पहले कु-फल यह हुआ कि नामवरजी लिखकर लाए और विचारधाराहीन भाव से उन्होंने अपने विचारों को व्यक्त किया।वे जब बोल रहे थे तो अपनी ´जुबान पर काबू´ रखकर बोल रहे थे, उन्होंने कहा भी ´बोलने में जुबान पर काबू नहीं रहता´,इसलिए लिखकर बोल रहा हूँ।यहाँ मुख्य जोर ´जुबान पर काबू रखने पर था´!यही बात तो मंत्री महेश शर्मा ने कही थी मंच से,यही बात अभिव्यक्ति की आजादी के सिलसिले में अरूण जेटली कह चुके हैं।यही बात कई बार मोदीजी बोल चुके हैं।कमाल की संगतिपूर्ण दूसरी परम्परा है यह !

भक्तों का कहना है नामवरजी ने राजनाथ सिंहजी को नाम से सम्बोधित नहीं किया।कमाल है राजनाथ सिंह से सम्मान लिया,इससे बड़ी बात और क्या होगी!राजनाथ सिंह की हिमायतें सुनीं और मानीं,इतना आज्ञाकारी लेखक तो पहले कभी नहीं देखा! नामवरजी ने अपने जीवन का सबसे छोटा लिखित वक्तव्य पढ़कर सुनाया।इसे ´एसएमएस भाषण´ कहें तो बेहतर होगा।नामवरजी पर यह डिजिटल का सीधा असर है। वे बोले ´मेरी दूसरी परम्परा की खोज,साहित्य के लोकतंत्र में प्रतिपक्ष की तलाश है।´ सवाल यह है इसकी चुनौतियां क्या हैं ॽ अथवा यह भी कोई श्रृंगार साहित्य की तरह है जिसमें सिर्फ आनंद है,भाषायी कुलाचें हैं लेकिन किसी सामाजिक-राजनीतिक चुनौती से इसका कोई लेना-देना नहीं है।ऐसा चुनौतीहीन लोकतंत्र कम से कम आधुनिककाल में संभव नहीं है।लोकतंत्र में पहले ´लोक´ है फिर तंत्र है।´पक्ष´ है और फिर ´प्रतिपक्ष´ है।लेकिन नामवरजी जिस लोकतंज्ञ और प्रतिपक्ष की बात कर रहे थे वो तो राजनीतिविहीन है। यह हम नहीं कह रहे उन्होंने ही अपने भाषण के अंतमें बड़ी ही ईमानदारी के साथ कहा ´उनका जो काम वो एहिले सियायत जाने´,यह है नए किस्म के रीतिवाद का चरमोत्कर्ष !

नामवरजी के लोकतंत्र में राजनीति तो राजनेताओं का खेल है,साहित्यकार का काम है सिर्फ मोहब्बत!मोहब्बत! नामवरजी यही तो श्रृंगारशास्त्रियों ने किया था,आप अंतमें उनके ही मार्ग पर क्यों चले गए ॽक्या लोकतंत्र में राजनीति करते हुए साहित्य और साहित्यकार मोहब्बत का संदेश नहीं दे सकता ॽ क्या साहित्य को राजनीति से अलग करके कोई बहस संभव है ॽयदि नहीं तो फिर अपने लोकतंत्र में यह श्रृंगारवादी रूप क्यों धारण किया ॽ वैसे यह रूप प्रचार के लिहाज से सही है।सारे देश में राजनीतिविहीन साहित्य का,राजनीतिविहीन मोहब्बत का मीडिया ´फ्लो´आपकी मदद कर रहा है,आपने जो कुछ कहा वह मीडिया के ´फ्लो´में ही कहा। आरएसएस के लोगों ने आपके जन्मदिन को इवेंट बनाया,खबर बनाया, जाहिर है खबर तो तब ही फबती है जब मीडिया के ´फ्लो´में आए।

नामवरजी आपने राजनाथ सिंह की उपस्थिति में जो भाषण दिया वह मोदी नीति की संगति में सुंदर भाषण था,इसका प्रतिपक्ष से कोई लेना देना नहीं है,इसका लोकतंत्र से भी कोई लेना-देना नहीं है,यह आपकी दूसरी परम्परा में भी नहीं आता,यह तो आरएसएस की फासिस्ट परंपरा में आता है।दिलचस्प बात यह है पहले आप बोलते थे तो सोचकर बोलते थे,कभी फिसलते थे तो आलोचना के शिकार होते थे,बाद में स्टैंड बदल लेते थे,इसने आपको वैचारिक दल-बदल करने में मदद की,इसे आपके भक्तों ने उदारता नाम दे दिया।लेकिन आप पहले भी उदार नहीं थे,पहले जो थे वही राजनाथ सिंह के सामने नजर आए यानी वैचारिक दल-बदलू!

हम चाहते हैं आप हजारों साल जिएं।हम कलियुग के नजरिए से आपको नहीं देखते,कलियुग के नजरिए से तो प्रतिगामी लोग देखते हैं।उस दिन मंच पर राजनाथ सिंह इसी नजरिए से देख रहे थे।वे आपकी उम्र के पैमाने कलियुग से,ज्योतिष से उधार लेकर आए और कलियुगी कामना कर रहे थे।आप सच मानें मैं आपको बेइंतिहा प्यार करता हूँ।फेसबुक पर आप पर इतना लिख चुका हूँ कि इसकी वजह से आपके सबसे प्रिय छात्रों से आए दिन फेसबुक पर ताने सुनता रहता हूँ।

मैंने वीडियो में आपका भाषण गंभीरता से सुना है और सुनकर बेहद निराशा हाथ लगी।आपकी दूसरी परम्परा में कौन है और कौन नहीं है,इस पर मैं विवाद नहीं करना चाहता लेकिन आप रवीन्द्रनाथ टैगोर का नाम लेना क्यों भूल गए ॽ यह साधारण चूक नहीं है! आपकी दूसरी परम्परा की खोज रवीन्द्रनाथ की परम्परा से प्रेरणा लेकर जन्म लेती है लेकिन आरएसएस नियंत्रित मंच पर आते-आते आप टैगोर को भूल गए।आप मुझसे बेहतर जानते हैं हजारी प्रसाद द्विवेदी के नजरिए के मूल में टैगोर हैं। टैगोर का नाम न लेकर आप क्या बताना चाहते हैं ॽ यह साधाऱण चूक नहीं है,यह सुनियोजित चूक है।इसका सम-सामयिक फासिज्म के राजनीतिक परिदृश्य से गहरा संबंध है।मैं सोच रहा था कम से कम आप जैसा विलक्षण वक्ता,मौलिक वक्ता मंच पर मंत्रियों ने जो बकबास कही उसका उत्तर जरूर देगा।लेकिन आपने किसी भी चीज का उत्तर नहीं दिया,आप कह ही सकते हैं कि मैं साहित्य का सफाई कर्मचारी नहीं हूँ कि हर चीज की सफाई देता फिरूँ! (यह नामवरजी का पुराना जुमला है)

नामवरजी जब राजनाथ सिंह ने मंच पर ´आलोचक´ मानने से इंकार किया ,´आलोचना´ को बैरभाव से लिखी चीज कहा तो आपको नहीं लगा कि यह आपका सरेआम अपमान किया जा रहा है ! आलोचना के शिखरपुरूष के सामने ´आलोचना´की धारणा को विकृत किया जा रहा है ! मैं जानता हूँ आप पढ़ाते समय बार-बार कहते थे अवधारणाओं में सोचो,अवधारणा के विकृतिकरण के खिलाफ संघर्ष करो,अवधारणा को बचाओ।लेकिन राजनाथ सिंह के सामने आप चुप क्यों रहे ॽ आपने प्रतिवाद में इतना ही कह दिया होता राजनाथजी मैं आपसे असहमत हूँ,महेश शर्माजी आपने असहमत हूँ।इसमें आपकी कोई बड़ी क्षति नहीं होती,लेकिन आपने इतना तक नहीं कहा।

आप जानते हैं आपने पढ़ाया है साहित्य में जो बताया जाता है ,उस पर बात करो,लेकिन जो छिपाया जाता है वह ज्यादा गंभीर होता।उसका उद्घाटन करो।यह है दूसरी परम्परा।लेकिन आपको हम मंच पर बहुत कुछ छिपाते हुए देख रहे थे,यह कुल मिलाकर वैसे ही हो रहा था जैसे कोई बच्चा खेल खेल में अपने हाथ में,कपड़े में,पीट के पीछे,बनियान के अंदर,मुँह के अंदर अपनी चीजे छिपा लेता है।आपके इस छिपाने वाले भाव पर मैं तो फिदा हो गया हूँ ! आपसे बताने की,उद्घाटन की कला सीखी, अब इस उम्र में छिपाने की कला भी आपसे से ही सीख रहा हूँ !

आप सच में महान हैं।छिपाना साधारण काम नहीं है,राजनीति छिपाओ, विचारधारा छिपाओ,लिखे को छिपाओ,बोले को छिपाओ!आपके कल छिपाने वाले भाव का लोकतंत्र और साहित्य के प्रतिपक्ष के साथ तीन-तेरह का संबंध है।आपकी छिपाने की कला का साहित्य से कम और फासिज्म की कला से ज्यादा गहरा संबंध है।आप जानते हैं फासिस्ट कला मार्ग कलाओं का अंत है।अभिव्यक्ति की आजादी का अंत है।आप इसके पुरोधा बनकर सामने आए हैं दुख इसी बात का है! हम फिर भी चाहते हैं आप सौ साल जिएं लेकिन अब आप नहीं अन्य लोग आपको दलेंगे।यह त्रासदी आप वैसे ही झेलें जैसे टीएस इलियट ने अपने जीवन में फासिज्म की पराजय के बाद झेली थी।





शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

"नामवरजी मार्क्सवादी थे"- राजनाथ सिंह

       इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के द्वारा "नामवर सिंह की दूसरी परम्परा " के नाम से आयोजित कार्यक्रम ( 28जुलाई 2016)में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संस्कृति को सीधे धर्म से जोड़ा. सवाल यह है क्या नामवरजी भी यही मानते हैं? नामवरजी ने धर्म को संस्कृति से जोड़ने वाले संघी नजरिए का प्रतिपाद न करके,मौन रहकर,उसे सम्मति प्रदान करके हजारी प्रसाद द्विवेदीजी की संस्कृति संबंधी दृष्टि पर अपनी आँखों के सामने राजनाथ सिंह के हमले को नतमस्तक होकर स्वीकार किया।यह है नामवरजी का कायान्तरण!

नामवरजी के सामने राजनाथ सिंह ने कहा धर्म वैज्ञानिक होने का प्रयास नहीं कर रहा,बल्कि धर्म तो वैज्ञानिक है ही।यानी इस तरह उन्होंने गिरीश्वर मिश्र की धारणा का विरोध किया। मजेदार बात यह थी दोनों मंत्री महेश शर्मा-राजनाथ सिंह ने अलिखित भाषण दिया,लेकिन नामवरजी ने लिखित भाषण पढ़ा।राजनाथ सिंह ने सीधे कहा "नामवरजी जब मार्क्सवादी थे।" सवाल यह है क्या नामवरजी अब मार्क्सवादी नहीं रहे ? क्या मोदी सरकार के वरिष्ठमंत्री की इस शानदार घोषणा के लिए इस कार्यक्रम को रखा गया था ?

संस्कृति मंत्री महेश शर्मा का बयान बहुत ही अर्थपूर्ण है वे बार बार कर्तव्य निर्बाह की ओर ध्यान दिलाते रहे,बड़ी निर्लज्जता के साथ उन्होंने कहा लोकतंत्र और आजादी के दो पाटों का अतिक्रमण नहीं होना चाहिए।यह सीधे नामवरजी और संगोष्ठी में बोलने वालों के लिए हिदायत थी।

कमाल उस समय हो गया जब राजनाथ सिंह ने कलियुग के बहाने प्रतीकात्मक ढ़ंग से हिदायती स्वर में कहा नामवरजी "मर्यादा का कभी अतिक्रमण नहीं कर सकते।"

लेकिन इस समारोह का आदर्श लक्ष्य क्या है ? महेश शर्मा ने बताया-

"बूढ़े बैलों के संरक्षण की जिम्मेदारी हमारी है।" अब मोदी की गोदी में बैठने का वैचारिक प्रतिफलन इससे बेहतर नहीं हो सकता था नामवरजी !!



नामवरजी का स्वाभाविक चरित्र लिखकर भाषण देने का नहीं है। इंदिरा गांधी कला केन्द्र में उनका कल जो भाषण लिखित रूप में उनके द्वारा पढ़ा गया हमारा अनुमान है वह मोदी सरकार के द्वारा पास किया भाषण है । मोदीजी की साफ़ धारणा है सरकार के मंचों से सरकार के बारे में एक भी वाक्य आलोचना का नहीं होना चाहिए।मोदीजी की इस नीति का नामवरजी ने पालन किया । जो लोग नामवरजी महान कर रहे हैं वे ज़रा सोचें कि नामवरजी ने कल राजनाथ सिंह और महेश शर्मा के वक्तव्य में व्यक्त विवादास्पद बातों पर एक भी वाक्य क्यों नहीं बोला ? नामवरजी की यह स्वाभाविक प्रकृति नहीं है कि राजनेता कुछ भी उनके सामने बोलकर चले जाएँ और नामवरजी उस पर कुछ न बोलें। मोदी की गोदी में बैठने का यह साइड इफ़ेक्ट है कि नामवरजी की स्वतंत्र अभिव्यक्ति नदारत!

बुधवार, 27 जुलाई 2016

नामवरजी की इतिहास से शत्रुता

       आम्बेडकर की जयन्ती मोदी सरकार मना रही है, मोदी-मोहन भागवतजी आम्बेडकर पर सुंदर बातें कह रहे हैं।लेकिन आचरण एकदम दलितविरोधी कर रहे हैं।राजनीति में आचरण प्रमुख है, विचार गौण होते हैं। 90वें जन्मदिन के नाम पर 28जुलाई 2016 को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में नामवरजी क्या बोलते हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है,महत्वपूर्ण है आरएसएस के लोगों का इस संग्रहालय की आड़ में जन्मदिन मनाना।उसमें नामवरजी का जाना महत्वपूर्ण है।इस आयोजन को नामवरजी द्वारा दी गयी स्वीकृति महत्वपूर्ण है।सवाल यह है आचरण की बातों पर नामवरजी के भक्तगण ध्यान क्यों नहीं दे रहे ? सवाल यह है नामवरजी के निर्माण में किनका खून-पसीना-विचारधारा और पैसा लगा है ?

नामवरजी सार्वजनिक बौद्धिक संपदा का अंग हैं ।वे पूजा की नहीं आलोचना की मूर्ति हैं ! जब उनकी आलोचना हो रही है तो भक्तों को परेशानी क्यों हो रही है ? हम इसलिए परेशान हैं क्योंकि नामवरजी सीधे आरएसएस के साथ गलबहियां देकर घूम रहे हैं।यह जनता और प्रगतिशील साहित्य के खिलाफ सबसे घिनौना कदम है।

यह कोई नामवर पुराण नहीं है।नामवरजी लेखक हैं,वे गल्पपुरूष नहीं हैं,उनके कर्म के मूल्यांकन के मकसद से उनसे फेसबुक के जरिए संवाद है।उनके भक्तों से संवाद है।मौजूदा समय से संवाद है।

हमें कोई आपत्ति नहीं है वे किसे नौकरी देते हैं,किसकी सेमीनार में बोलने जाते हैं,क्या बोलते हैं,वे सरकार से जुड़ें या न जुड़ें,हमें इस सबसे कोई आपत्ति नहीं है, वे यह काम करते रहे हैं,हमने कभी नहीं बोला।हमारी आपत्ति यह है कि नामवरजी ने अपना जन्मदिन मनाने के लिए आरएसएस को अनुमति क्यों दी ॽ नामवरजी उनको अनुमति न देते तो क्या छोटे हो जाते ॽ

मोदीजी के पीएम बनने के पहले से नामवरजी ने संघ की ओर मुँह किया था,हमने तब भी आगाह किया था, फिर कर रहे हैं,यह जनता के साथ गद्दारी है।हम उन लेखकों से भी अपील करते हैं जो अब तक चुप हैं ,नामवरजी के वहां जाने से क्या वे सहमत हैं ॽ यदि हां तो खुलकर कहें कि उनका स्टैंड क्या है ॽयह क्या बात हुई कि नामवरजी का जन्मदिन आरएसएस नियंत्रित संस्था मनाए और आपकी कोई राय ही न हो,क्या हम यह मानें कि आपलोगों का उनको समर्थन है ॽ

कई मित्रों ने कहा काहे को नामवरजी के पीछे पड़े हो? हमने कहा वे हमारे शिक्षक हैं।हमें पूरा हक़ है उनसे सवाल करने, उनके लिखे और बोले पर सवाल करने का। हमने यह भी कहा वे फेसबुक पर हमारे प्रिय व्यक्तित्व हैं,इसीलिए उन पर लिख रहे हैं,दूसरा वे हमारे लिखे का बुरा नहीं मानते!

अफसोस है नामवरजी ने ब्रेख्त की परंपरा छोड़कर एजरा पाउण्ड -हाइडेगर की परंपरा में जगह बना ली है।

मैं जानता हूँ हिन्दी के बूढ़े लेखक मेरी बात नहीं सुनेंगे,वे अपनी सत्ता की आदतों मे मगन हैं,हम तो असल में फेसबुक के जरिए युवा मित्रों से संवाद कर रहे हैं जिससे वे सत्ता की आदतों के शिकार न हों,यही छोटा सा लक्ष्य है,नामवरजी तो बहाना मात्र हैं,नामवरजी की सत्ता की आदतों को मैं छात्रजीवन से जानता हूँ और उनको समय-समय पर बेनकाब करता रहा हूं।

फेसबुक पर नामवरजी के जो भक्त सक्रिय हैं हम उनसे अनुरोध करेंगे कि नामवरजी की हिमायत करते हुए कम से कम जन्मदिन आने तक नामवरजी पर रोज़ एक लेख लिखो ।



नामवरजी पर सब लोग जानें कि भक्तगण कितना नामवरजी को जानते हैं।नामवरजी के नाम पर जाहिलगिरी बंद होनी चाहिए। नामवरजी विद्वान हैं उनका लिखा सहज रूप में उपलब्ध है, आसानी से उसे पढ़कर ही लिखो,कम से कम मोदी के भक्तों की तरह नामवरजी के भक्त न बनो! लेकिन अफसोस है नामवरजी ने भी तो मोदी की तरह भक्त ही पैदा किए हैं!!

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

नामवर का कुँआ

       हम जानते हैं नामवरजी ने क्या लिखा है,हम यह भी जानते हैं उन्होंने जेएनयू में कितने ´महान´ कार्य किए थे। कोर्स बनाना ,पढ़ाना महान् कार्य नहीं है,यह रूटिन काम है, यह नौकरी के काम हैं। मौजूदा समय उनके अतीत को खंगालने का नहीं है।मेरी चिन्ता यह है कि नामवरजी के आरएसएस के साथ जाने को कैसे देखा जाय ॽउनके व्यक्तित्व को कैसे देखा जाय ॽ नामवरजी की खूबी है वे अपने को कभी आंतरिक गुणों की रोशनी में पेश नहीं करते।वे आंतरिक गुणों का प्रदर्शन नहीं करते।दिलचस्प बात यह भी यदि वे आंतरिक गुणों पर जोर देते तो उसकी पुष्टि करना असंभव है।

नामवरजी हमेशा ´लोकप्रियता के भावबोध´में रहते हैं।हर चीज ´लोकप्रियता´ को दिमाग में रखकर तय करते हैं।सरकारों के साथ जुड़े रहने का यही बड़ा कारण है,फलतः मीडिया से लेकर सरकारी संस्थानों तक उनके लिए सहज ही ´महान हो महान हो´की लोकप्रिय ध्वनियां गूंजने लगती हैं। इसका दूसरा आयाम यह है कि नामवरजी के कर्म पर कम उनकी लोकप्रियता पर ज्यादा बातें हैं।उनके कर्म में ´सारवान´तत्व नहीं होते,वे मात्र ´लोकप्रियता´ के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। उनके कर्म में सारवान तत्व के अभाव ने उनको ´कर्म के लिए कर्म´करने वाला, ´भाषण के लिए भाषण´देने वाला बना दिया है।

यदि कोई व्यक्ति बेहतरीन इंसान है तो उसके कर्म,जीवन और विचार में संगति होनी चाहिए।यह कैसे संभव है कि विचार कुछ हैं और एक्शन कुछ और हैं।सोच कहीं रहे हैं और जा कहीं और रहे हैं।यह नामवरजी की विशिष्ट शैली है। यही वजह है नामवरजी अपने नाम के साथ कोई बेहतर जीवन मूल्य विकसित नहीं कर पाए।नामवरजी को हम सब लोकप्रिय हिन्दी विद्वान-शिक्षक के रूप में जानते हैं।लेकिन उसके विचार और कर्म में कभी कोई साम्य नहीं रहा,इसलिए लोग उनको ´अवसरवादी´ तक कहते हैं।



जो लोग नामवरजी को ´महान´बनाने में लगे हैं,वे जरा गंभीरता से सोचें ´महान´क्या पल-पल में विचार बदलता है,मूल्यहीन होता है ॽक्या कभी नामवरजी ने श्रोताओं से भिन्न स्टैंड लिया ॽ वे हमेशा श्रोताओं की प्रकृति देखकर बोलते हैं।जबकि विशिष्ट या महान व्यक्ति कभी भी श्रोताओं की प्रकृति में ढलकर नहीं बोलता।बोलने की यह कला,पुरानी रीतिकालीन कला है।क्या नामवरजी ´श्रोता´और ´जनता´ में अंतर करके बोलते हैं ॽ उनके लिए श्रोता प्रमुख है,जनता गौण है।उनके लिए सत्ता प्रमुख है,जीवन मूल्य गौण हैं।उनके लिए लोकप्रियता प्रमुख है,प्रगतिशील विचारधारा गौण है।

नामवरजी ऐसा न करें-


          नामवरजी ने इधर राजनीति बदली है,वे लेखक बिरादरी के साथ सबसे बड़ा धोखा करने जा रहे हैं।इंदिरा गांधी कला संग्रहालय द्वारा उनका जन्मदिन नहीं मनाया जा रहा,यह संग्रहालय तो पहले से है,कभी उनका जन्मदिन वहां नहीं मनायागया।रामबहादुर राय भी दिल्ली में पहले से हैं उनको कभी नामवरजी के जन्मदिन की याद नहीं आई,आरएसएस भी पहले से है लेकिन आरएसएस वालों ने कभी उनका जन्मदिन नहीं मनाया,लेकिन 90साल में पहलीबार नामवरजी का जन्मदिन आरएसएस मना रहा है , आड़ है इंदिरा गांधी कला संग्रहालय।यह सामान्य घटना नहीं है।

यहां से नामवर सिंह के साम्प्रदायिकता विरोधी लेखन का अंत होता है।फासिस्ट विचारकों के द्वारा जब उनका जन्मदिन उनकी मौजूदगी में ,उनकी स्वीकृति के बाद मनाया जाएगा,तो नामवरजी के साम्प्रदायिकता विरोधी लेखन की प्रासंगिकता खत्म हो जाती है।कोई यदि यह सोचता है कि लेखक आचरण कुछ भी करे लेकिन उसके लिखे शब्दों में शक्ति रहती है तो गलतफहमी है,लेखक के शब्दों में तब तक जान रहती है जब तक लेखक अपने शब्दों के प्रति वफादार रहता है,नामवरजी ने अपने साम्प्रदायिकता विरोधी लेखन को अपने ही हाथों ध्वस्त करके अपने ही हाथों अपना मुँह नोंचा है।यह इस दौर की त्रासद घटना है। यह भी सच है कि नामवरजी जब अपने लिखे पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं,उसे अप्रासंगिक बना रहे हैं,तो उनको कायदे से बताना चाहिए कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं।लेकिन नामवरजी पहले कह चुके हैं मैं सफाई नहीं देता।अब कर लो संवाद,जब वे अपने बदले हुए रूख पर चुप हैं तो हमलोग संवाद किससे करें.यानी आरएसएस की बगल में बैठने का मतलब है संवाद की भी विदाई।

सोमवार, 25 जुलाई 2016

नामवरजी का नायकीय व्यक्तिवाद

       नामवरजी के पढ़ाए और सताए सैंकड़ों छात्र हैं,इससे ज्यादा उनके प्रशंसक और भक्त छात्र हैं।वे जब तक भारतीय भाषा केन्द्र ,भाषा संस्थान,जेएनयू में प्रोफेसर के रूप में पढ़ाते रहे उनके व्यक्तित्व के सामने विभाग के अन्य किसी शिक्षक का व्यक्तित्व निखरकर सामने नहीं आ पाया,वे सभी के व्यक्तित्व पर छाए रहे।वे 90साल के हो गए हैं।स्वस्थ हैं और सक्रिय हैं,हम सबके लिए यह सुखद बात है।हम सब यही चाहेंगे कि और भी अधिक लंबी उम्र तक जिंदा रहें।

नामवरजी के अंदर एक चीज है जिसे ´नायकीय व्यक्तिवाद´ कहते हैं। वे जहां रहे,नायक की तरह रहे,नायक की तरह काम किया,अच्छा या बुरा जो भी काम किया नायक की तरह काम किया।उनके संदर्भ में ´नायकीय व्यक्तिवाद´ का अर्थ क्या है ॽ यदि वे साहित्य पर बोल रहे हैं तो उनके शब्द साहित्य की पहचान और व्याख्या को प्रभावित करते हैं।वे जब बोलते हैं तो लगता है नामवर प्रमुख हैं साहित्य गौण है।श्रोतागण धार्मिक कर्मकांड की तरह उनको सुनते हैं। धार्मिक आस्था के साथ बैठे रहते हैं। वे जब किसी कार्यक्रम में रहते हैं तो अपनी मौजूदगी को वैध ठहराते हैं।लगता है नामवरजी को बुला लिया,कार्यक्रम सफल हो गया ! कोई यह नहीं देखता कि वे क्या बोले ॽ अच्छा बोले या खराब बोले!आयोजक और श्रोता इससे खुश कि नामवरजी आ गए! वे अपनी मौजूदगी के अनुभव से उत्तेजना पैदा करते हैं।नामवरजी को यह गुण मार्क्स से नहीं नीत्शे से मिला है।नामवरजी की खूबी है जो बोलते हैं उसका पालन नहीं करते। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने हजारों भाषण दिए हैं,लेकिन गिनती के भाषण स्वयं लिखे हैं। वे अपने भाषण को लिखने से क्यों कतराते रहे इसका आजतक कोई सटीक उत्तर उन्होंने नहीं दिया।

नामवरजी के लिए भाषण देना धार्मिक कर्मकांड की तरह है। भक्त उनको वाचिक परंपरा का अंतिम आचार्य कहते हैं।प्रश्न यह है उनके भाषण उनके जीवन का अंग हैं या नहीं ॽ यदि जीवन का अंग हैं तो भाषणों की संगति में वे अपने जीवन का विकास क्यों नहीं कर पाए ॽयह कैसे हुआ कि जीवनानुभव और ज्ञानानुभव में भयानक अंतराल आ गया !



नामवरजी अपना समूचा कार्य-व्यापार आस्था के आधार पर चलाते रहे हैं,जो उनके प्रति आस्थावान हैं नामवरजी के वे प्रिय हैं! जो उनके प्रति आस्था नहीं रखते नामवरजी उनको घास नहीं डालते,चाहे वह कितना ही योग्य और सक्षम हो।यही आस्था नामवरजी को आरएसएस के आयोजकों तक ले गयी है।आरएसएस वालों में भी वे सब गुण हैं जो किसी आस्थावाले में होते हैं।यही वजह है नामवरजी ने साहित्य और अकादमिक जगत के सभी फैसले आस्था की कसौटी पर कसकर लिए,जो आस्था में खरा उतरा वह उनका हुआ जो आस्थारहित था उसे उन्होंने तिरस्कृत किया।आस्था का पहलू इतना प्रबल है कि नामवरजी की वैचारिक प्रतिबद्धता को उसने हमेशा के लिए दफ्न कर दिया।अब नामवरजी का नायकीय व्यक्तिवाद था और आस्था थी,ये दोनों चीजें जेएनयू में रहते हुए ही जन्म ले चुकी थीं,इन दोनों को उन्होंने खूब पाला-पोसा बड़ा किया।

आरएसएस वाले नामवरजी का जन्मदिन क्यों मना रहे हैं ॽ

        आप जब नामवरजी से बातें करेंगे,मिलेंगे,तो मन होगा,इस आदमी से बार-बार मिलना चाहिए।बहुत ही सुंदर भाषा,उदात्त भाव और उदात्त जीवन तरंगों के कारण नामवरजी सहज ही आकर्षित करने लगते हैं। यही उदात्तता उनकी जनप्रियता का मूलाधार है।इसके कारम ही वे सबको अच्छे लगते हैं।

सवाल यह है जनप्रिय न होते तो क्या आरएसएस के लोग उनको बुलाते ॽ क्या कोई सत्ताधारी उनको बुलाता ॽ

किसी भी लेखक के अंदर एक आंतरिक मन होता है और दूसरा उसका बाह्य मुखमंडल होता है। इनमें साम्य हो सकता है, वैषम्य भी हो सकता है।यह भी कह सकते हैं लेखक की एक होती है आत्मा और दूसरा होता है मन।सवाल यह है लेखक को कहां खोजें ॽ मन में खोजें या आत्मा में ॽ

प्लेटो ने मन और आत्मा की एकता पर जोर दिया,लेकिन नामवरजी के मन और आत्मा में गहरा द्वंद्व है,अन्तर्विरोध है।जिस तरह हम प्लेटो के किसी मूल्यविशेष को खारिज कर सकते हैं,लेकिन प्लेटो के योगदान को खारिज नहीं कर सकते।यही दशा नामवरजी की है उनके किसी मसले पर नजरिए को खारिज कर सकते हैं,लेकिन उनके हिन्दी साहित्य में योगदान को खारिज नहीं कर सकते।उनकी बेहतरीन मेधा को अस्वीकार नहीं कर सकते,खारिज नहीं कर सकते।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कौन सी चीज है जो मनुष्य को महान बनाती है ॽ मैं चाहूँ या न चाहूं नामवरजी हिन्दी के महान आलोचक हैं।यह महानता उन्होंने कैसे अर्जित की है ॽ वे जनप्रिय क्यों हैं ॽ हर दल,संगठन,व्यक्ति उनको क्यों पसंद करता है ॽक्योंकि उनके पास साहित्यात्मा है।साहित्यात्मा को अर्जित करना सबसे मुश्किल काम है।साहित्यात्मा अर्जित करने के कारण वे इतिहास में शामिल हैं, इतिहास के निर्माण में उनकी बड़ी भूमिका है।वे जब तक जिंदा हैं साहित्य की हर बहस में घूम-फिरकर दाखिल हो जाते हैं,वे साहित्य की मासकल्चर हैं।

सवाल यह नहीं है कि उनका लिखा खराब है या बढ़िया है,सवाल यह है कि उनको छोड़कर हिन्दीवाले बात नहीं कर सकते।वे हिन्दीवाले के अंदर खाली जगह देखते ही मासकल्चर की तरह घुस जाते हैं।मसलन्,कोई विषय न हो तो नामवरजी पर बातें करो। मासकल्चर का यही लक्षण है वह खाली समय में तुरंत दाखिल होती है।आरएसएस वाले भी अपने खालीपन को भरने के लिए नामवरजी का इंदिरा गांधी कला संग्रहालय की आड़ में इस्तेमाल कर रहे हैं,उनका जन्मदिन मना रहे हैं।



यह कहा जाता है अच्छा आदमी जरूरी नहीं है महान हो,और महान आदमी जरूरी नहीं है अच्छा आदमी हो।यह बात नामवरजी पर सटीक बैठती है।यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से नामवरजीके जीवन में शैताननायक प्रवेश करता है।

नामवरजी का शैताननायक प्रेम

   नामवरजी का शैताननायक प्रेम नई बात नहीं है।राजनीति में वे आपातकाल के दौरान आपातकाल का समर्थन करके इस प्रेम का प्रदर्शन कर चुके हैं,इसबार वे नरेन्द्र मोदी के साथ हैं। सवाल यह है लेखक के नाते आपातकाल का समर्थन करना और लेखक के ही नाते नरेन्द्र मोदी का समर्थन करना आखिर किस तरह की राजनीतिक नैतिकता की अभिव्यक्ति है ॽ क्या इस राजनीतिक नैतिकता को लोकतांत्रिक कहेंगे ॽ

हिन्दी में शैतान नायक के प्रति प्रेम की परंपरा को बनाए रखना बड़ा दुर्लभ काम है। लेकिन वे यह काम कर रहे हैं। इस समय देश में लेखकों की अभिव्यक्ति के अधिकारों पर हमले हो रहे हैं,तीन लेखकों को हिन्दुत्ववादी हत्यारों ने मौत के घाट उतार दिया ,लेकिन नामवरजी ने उस पर कोई गंभीर प्रतिवाद नहीं किया, न तो कोई लेख लिखा और न ´आलोचना´पत्रिका में कोई संपादकीय लिखा।ठीक यही स्थिति आपातकाल के समय भी थी,अभी वे बूढ़े हैं ,उस समय वे यौवन से भरे थे,लेकिन आपातकाल के खिलाफ ´आलोचना´ पत्रिका में उन्होंने एक वाक्य नहीं लिखा।वे प्रतिवाद में संपादकीय पन्ना खाली छोड़ सकते थे ,वह भी नहीं किया,उलटे आपातकाल का समर्थन किया।आजकल वे कहते हैं उन्होंने आपातकाल का विरोध किया था।

हाल के वर्षों में आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों के जिस तरह के हमले किए हैं उन पर नामवरजी चुप हैं ! यह चुप्पी बेहद खतरनाक है ! उलटे उन्होंने पुरस्कार वापस करने वाले लेखकों पर ही आलोचना के बाण चलाए हैं।दिलचस्प बात यह है इंदिरा गांधी ने भी संविधान की धज्जियां उडायीं,नामवरजी चुप रहे !मोदीजी भी धज्जियां उडा रहे हैं वे चुप हैं ! सवाल यह है नामवरजी की एक लेखक के नाते राजनीतिक नैतिकता क्या है ॽ मुक्तिबोध की भाषा में पूछें ´पार्टनर तेरी पॉलिटिक्स क्या है ॽ ´

नामवरजी के लिखे को खोजने जाएंगे तो उनका आरएसएस के पक्ष में लिखा कहीं नहीं मिलेगा,बल्कि उनका साम्प्रदायिकता के खिलाफ लिखा मिलेगा। ऐसी अवस्था में आप उनको पकड़ेंगे कैसे ॽ राजनीति का नियम है कि आदमी के विचार ही नहीं व्यवहार भी देखना चाहिए।

नामवरजी का आरएसएस और मोदी के प्रति व्यवहार क्या है ॽ नामवरजी की मोदीभक्ति उनके आचरण में है,लेखन में नहीं है।लिखित रूप में तो उन्होंने आपातकाल के पक्ष में भी कुछ नहीं लिखा लेकिन आपातकाल का समर्थन किया था। उनके लेखन को देखकर नहीं लगेगा कि वे कभी फासिस्ट इंदिरा के साथ थे।नामवरजी लिखकर कभी किसी दल के साथ नहीं रहे,वे हमेशा केन्द्र में सत्तारूढ़ राजनीतिक दल और पीएम के साथ रहे हैं।इसलिए नामवरजी को खोजना है तो उनके आचरण में खोजो।किसी भी लेखक को खोजना है तो उसके लेखन और आचरण दोनों को मिलाकर देखें।

नामवरजी के राजनीतिक मूल्य वे नहीं है जो आरएसएस के हैं,नामवरजी अपने मूल्य स्वयं सृजित करते रहे हैं।सतह पर लगेगा कि उनके और मोदी के मूल्य भिन्न हैं,आरएसएस और उनके मूल्य भिन्न हैं !यह भिन्नता का दर्शन उन्होंने नीत्शे से सीखा है। लिखने की बजाय बोलने और राजनीतिक आचरण की कला उन्होंने नीत्शे से सीखी है। नीत्शे में यही गुण था ।नीत्शे के गुण हिटलर से नहीं मिलते थे,लेकिन वह हिटलर के साथ था।

दिलचस्प बात यह है आरएसएस में इतना स्पेस है कि आप वामपंथी रहकर भी उनके साथ रह सकते हैं,गांधीवादी होकर भी उनके साथ रहकर सकते हैं,आरएसएस के साथ रहने के लिए उसकी विचारधारा को मानना जरूरी नहीं है,आरएसएस का मुख्य जोर साथ रहने पर है,आप निजी तौर पर अपने विचार कुछ रखें लेकिन आएसएस के साथ रहें ।जो लोग कह रहे हैं यह देखना चाहिए कि नामवरजी उनके यहां जाते हैं तो बोलते क्या हैं ॽ हमारा कहना यही है कि वे जो बोलते हैं उसे कृपा करके लिख दें,कहीं छपवा दें,वे बोलने के बहाने वैचारिक घल्लूघारा किए हुए हैं। नामवरजी वैचारिक तौर पर सबसे अविश्वसनीय वक्ता हैं,वे मौसम और माहौल देखकर बोलने में सिद्धहस्त हैं।जबकि उनके भक्तों को लगता है उनका बोलना ही महान है!



रविवार, 24 जुलाई 2016

नामवरजी के आने-जाने की विचारधारा और भोले भक्त

        नामवरजी का आना-जाना कोई सीधा -सरल मामला नहीं है।वह कोई विचारधाराहीन काम नहीं है।वे असाधारण लेखक हैं।वे कहीं जब बुलाए जाते हैं तो इसलिए नहीं बुलाए जाते कि बहुत सरल सीधे, विचारधाराहीन इंसान हैं ! भक्तों का तर्क है वे सबके हैं और सब उनके हैं ! यदि मामला इतना सा ही होता तो नामवरजी को न तो कोई बुलाता और न कोई उनका 90वां जन्मदिन ही मनाता।वे बड़े कद के लेखक-शिक्षक-बुद्धिजीवी हैं। उनकी समाज में व्यापक भूमिका है। वे साधारण लेखक रहे होते तब भी संभवतः हमें कोई आपत्ति न होती। जाने-अनजाने नामवरजी के बारे में जितने तर्क उनकी हिमायत में दिए जा रहे हैं वे अंततःनामवरजी को विचारधाराहीन,दृष्टिहीन मनुष्य के रूप में पेश कर रहे हैं।लेकिन नामवरजी विचारधाराहीन मनुष्य नहीं हैं।वे बेहतरीन इंसान हैं।मैं निजी तौर पर उनका प्रशंसक -आलोचक हूँ,उनके गलती करने पर हर समय टोका है,लेकिन संवाद नहीं छोड़ा।बहिष्कार नहीं किया।

नामवरजी का मोदीप्रेम हाल की घटना नहीं है यह मोदीजी के लोकसभा चुनाव के समय ही सामने आ गया था,उस समय भी हमने फेसबुक पर उनके टीवी पर दिए गए बयान की आलोचना की थी। सवाल यह है क्या मौजूदा मोदीशासन सामान्य रूटिन लोकतांत्रिक सरकार का शासन है ॽक्या मोदी निजी तौर पर सामान्य बुर्जुआनेता हैं ॽ क्या अटल-आडवाणी की तरह के संघी नेता हैं ॽ यदि हमारे मित्र ऐसा सोच रहे हैं तो बहुत बड़ी गलतफहमी में हैं।

देश में पहलीबार ऐसा हुआ है कि एक ऐसा व्यक्ति शासन पर आ बैठा है जिसने अपने राजनीतिक कर्म से लोकतंत्र को बहुत गहरे जाकर क्षत-विक्षत किया है।गुजरात के दंगे साधारण घटना नहीं है। संविधान पर नियमित सोची समझी साजिश के तहत पहले उन्होंने गुजरात में निरंतर हमले किए,यहां तक कि न्यायपालिका को पंगु बना दिया,यही वजह थी कि सुप्रीमकोर्ट को उन दंगों के मुकदमों की सुनवाई की व्यवस्था गुजरात के बाहर करनी पड़ी।यह भारत के इतिहास की असाधारण घटना है।125से ज्यादा लोग दंगों के लिए सजा पा चुके हैं,यहां तक कि मोदीमंत्रीमंडल की एक सदस्या भी सजा भोग रही है।यह सब देखने जानने के बावजूद यदि नामवरजी जैसा सुलझा हुआ व्यक्ति मोदी की गोदी में जा रहा है तो सवाल तो खड़े होंगे !

कुछ लोग कह रहे हैं इंदिरा गांधी कला संग्रहालय राष्ट्रीय संस्थान है,वह संघ का नहीं है,अतः वहां जाने में कोई हर्ज नहीं। इस तरह के तर्क नामवरजी जैसे व्यक्ति को टुईंया लेखक बना देते हैं, उनके जाने-आने को अर्थहीन सामान्य घटनामात्र बना देते हैं।हम जानते हैं नामवरजी बहुत उदार हैं,भले हैं,जो बुलाता है उसके यहां चले जाते हैं।लेकिन क्या मोदी सरकार आने के बाद बुद्धिजीवियों के लिए स्थितियां सामान्य रह गयी हैं ॽ



आज बुद्धिजीवियों के बीच में अघोषित मोदीआतंक फैला हुआ है।केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में स्थिति सबसे बदतर है।स्वयं जेएनयू में भी हालात असामान्य हैं।जेएनयू के आरएसएस से जुड़े शिक्षकों ने जांच रिपोर्ट के नाम पर छात्रसंघ के ऊपर सीधे हमला बोला है,अनेक छात्रनेताओं के खिलाफ कार्रवाई हुई है,नामवरजी चुप रहे।पहलीबार ऐसा हुआ है कि आरएसएस के शिक्षकों ने जेएनयू की छात्राओं को कलं कित, अपमानित करने वाली रिपोर्ट जारी करके सभी छात्राओं के चरित्र पर सवाल खड़े किए हैं,उनको अपमानित किया है।जेएनयू में संघी वीसी ने सभी फैसलेकुन कमेटियों को पंगु कर दिया है।इस तरह की घटनाएं तो आपातकाल में भी नहीं हुई थीं।जेएनयू की एकेडमिक कौंसिल का एजेण्डा वीसी नहीं मानव संसाधनमंत्री तय कर रहा है। यही हाल दिल्ली विश्वविद्यालय और अन्य केन्द्रीय विश्वविद्यालयों का है वहां पर मानव संसाधन मंत्री से स्वीकृति लिए बिना एकेडमिक कौंसिल का एजेण्डा वीसी तय नहीं कर सकता।कम से कम आपातकाल में भी यह स्थिति नहीं थी कि एकेडमिक कौंसिल का एजेंडा मंत्री तय करे! नामवरजी भोले नहीं हैं और अज्ञानी नहीं हैं जो यह न जानते हों! विगत सभी सरकारों के साथ मोदी सरकार के अंतर को सिर्फ इसी एकमात्र उदाहरण से समझा जा सकता है।

मोदी की गोदी में नामवर !

       नामवरजी के व्यक्तित्व से प्रभावित छात्र,शिक्षक और लेखकों का बड़ा समूह है। दिलचस्प बात है कि नामवरजी के गैर-साहित्यिक व्यक्तित्व और कारनामों को लेकर बहुत कम लोग जानते हैं।खासकर उनके जेएनयू में काम करने के दौरान किए गए अकादमिक फैसलों की जिनको पहचान है वे बेहतर ढ़ंग से जानते हैं कि जेएनयू में प्रोफेसर के रूप में काम करते हुए नामवरजी ने कभी भी छात्रों के हितों से जुड़े सवालों पर (मेरे सात साल के जेएनयू छात्रजीवन के दौरान) कभी कोई स्टैंड नहीं लिया, उलटे वे हमेशा जेएनयू प्रशासन के साथ और छात्रों के खिलाफ खड़े नजर आए।
       नामवरजी की रीतिकालीन मनोदशा का आदर्श नमूना है जेएनयू ।मैं उन दिनों छात्र राजनीति में सक्रिय था।मैं वहां पढ़ता था। नामवरजी खुलकर कभी छात्रों के पक्ष में न तो एकेडमिक कौंसिल में बोले और न बोर्ड़ ऑफ स्टैडीज में बोले, उलटे छात्रों को विक्टिमाइज करने में अपने विभाग में अग्रणी भूमिका निभाते रहे ।ये बातें इसलिए जानना जरूरी है क्योंकि नए सिरे से नामवरजी पर रीतिकाव्य लिखा जा रहा है।मुश्किल यह है कि जो लोग देश में खुलकर वाम के नाम से जाने जाते हैं और जेएनयू में प्रोफेसर हुआ करते थे उनमें से अधिकांश की जेएनयू प्रशासन के साथ और छात्रों के विरोध में सक्रिय भूमिका हुआ करती थी।कुछ ही शिक्षक थे जो आमतौर पर छात्रों के पक्ष में जेएनयू प्रशासन के खिलाफ बोलते थे,जो छात्रों के पक्ष में बोलते थे उनमें प्रोफेसर प्रभात पटनायक, उत्सापटनायक,हरवंश मुखिया, जी.पी.देशपांडे, प्रो.विमलकुमार,परिमल कुमार,जीएस भल्ला के नाम प्रमुख हैं।इन चंद शिक्षकों के अलावा कुछ नामी शिक्षक ऐसे भी थे जो छात्रहित के सवालों पर खुलकर स्टैंड लेते थे,अकादमिक जगत में उनका कद बहुत ऊँचा हुआ करता था।बाकी सभी प्रोफेसरों का हाल यह था कि वे खुलकर जेएनयू प्रशासन के अ-लोकतांत्रिक,छात्र विरोधी फैसलों के साथ आँख बंद करके खड़े रहते थे।

नामवरजी के जेएनयू संबंधी कार्य-व्यापार की हर हालत में मीमांसा करने की जरूरत है,क्योंकि उनकी भक्तमंडली बड़ी व्यापक है और नामवरजी अपने जेएनयू कारनामों के लिए झूठ बोलते रहे हैं।यह चीजें नए सिरे से उठाने की इच्छा इसलिए हुई है कि नामवरजी सारे एथिक्स तोड़कर आरएसएस के साथ इन दिनों खुलकर गलबहियां डाले घूम रहे हैं।नामवरजी रीतिकालीन अवगुणों के अलावा अनेक गुण भी हैं।लेकिन उनके गुणों की क्षमता अब चुक गयी है जिसके कारण वे इन दिनों खुलकर देश के सबसे बदनाम शासक नरेन्द्र मोदी के साथ खुलकर खड़े हैं।नामवरसिंह के नरेन्द्र मोदी के साथ चल रहे इस रीतिकालीन भावबोध की खुलकर आलोचना होनी चाहिए,साथ ही इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि एक प्रोफेसर-लेखक-बुद्धिजीवी के कर्म और लेखन में साम्य और वैषम्य के समाज पर किस तरह के प्रभाव पड़ने की संभावनाएं होती हैं।


शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

नामवर सिंह के भावी जन्मदिन पर उठे सवाल

        नामवर सिंह आज जिस जगह हैं उसमें आरएसएस-भाजपा और मोदी सरकार की कोई भूमिका नहीं है।वे अच्ची तरह जानते हैं उनके व्यक्तित्व और ऊँचे कद के निर्माण में मजदूरों-किसानों की विचारधारा, मार्क्सवाद,प्रगतिशील आंदोलन और देश की उदारतावादी परंपराओं की निर्णायक भूमिका रही है।जैसा कि मीडिया में खबर है कि 28जुलाई2016को नामवरजी के लिए एक कार्यक्रम इन्दिरा गांधी कला संग्रहालय करने जा रहा है।सवाल यह है इस समय केन्द्र सरकार के नियंत्रण वाले सभी संस्थानों में आरएसएस के लोग खुलकर हमले कर रहे हैं,जेएनयू भी उनमें शामिल है।लेकिन आश्चर्य की बात है नामवरजी जैसा प्रखर आलोचक चुप है और उलटे आरएसएस की मुहिम का हिस्सा बन रहा है।हम जानना चाहते हैं प्रगतिशील आंदोलन और देश की उदारतावादी बुर्जुआ राजनीति ने नामवरजी को क्या नहीं दिया,किस चीज का अभाव उनको दिखा जिसके कारण वे मोदी के खेमे में चले गए ॽ नामवरजी को कम से कम यह तो बताना ही होगा कि उनको सी कौन सी चीज पीएम मोदी और आरएसएस में नजर आई जिसके कारण वे उनके खेमे में चले गए ॽ

नामवरजी अच्छी तरह जानते हैं कि उनकी साम्प्रदायिकता और आरएसएस के खिलाफ घोषित नीतिगत समझ रही है,क्या वे अपनी पुरानी समझ को अस्वीकार कर रहे हैं ॽ यदि हां तो उनको खुलकर कहना चाहिए,लिखकर कहना चाहिए कि वे अंततःआरएसएस की शरण में क्यों जा रहे हैं ॽ यदि सत्ता संरक्षण का ही मोह है,तिरंगे झेंडे में लिपटकर मरने का ही मोह है तो वही कहें और बताएं कि उनके जैसे नास्तिक व्यक्ति को यह मोह क्यों है ॽ हम नामवरजी के 90वें जन्मदिन पर कुछ सवालों पर उनकी राय जानना चाहते हैं।सवाल इस प्रकार हैं-

1. मोदी सरकार की किस नीति को वे जनहित में सही मानते हैं ॽ

2. मोदी सरकार ने जेएनयू पर नियोजित ढ़ंग से हमला किया है,सभी अकादमिक नियमों और जेएनय़ू की परंपराओं को तिलांजलि देते हुए जिस तरह छात्रसंघ पर हमला किया,जेएनयूछात्रसंघ के नेताओं पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाया,क्या उन सब पर क्या राय है।

3. विगत दो सालों में आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों ने केन्द्र सरकार की मदद से देश के विभिन्न इलाकों में मुसलमान विरोधी मुहिम चलायी हुई है उस पर क्या कहना है ॽ

4. यूजीसी के बजट में बड़ी मात्रा में कटौती की गयी है ,क्या उसे सही मानते हैंॽ

5. मोदी सरकार ने नई शिक्षा नीति का मसौदा जारी किया है उससे कहां तक सहमत हैं ॽ

6. यदि इस समय कांग्रेस की सरकार होती तो क्या वैसी अवस्था में आप आरएसएस की गोदी में बैठना पसंद करते ॽआरएसएस का संरक्षण लेना पसंद करते ॽ





सोमवार, 4 जुलाई 2016

क्लोन नामवर और रीयल नामवर!



हिन्दी में इनदिनों नामवर सिंह का स्थान लेने की जंग चल रही है। लंबे समय से लोग कोशिश कर रहे हैं कि उनको साहित्य में वह स्थान मिले जो नामवर को मिला है। मुश्किल यह है कि वह जगह कोई ले नहीं सकता।लेकिन इस चक्कर में इलाके -दर -इलाके नामवरसिंह के क्लोनरूप में लोकल क्लोन नामवरों की बाढ़ आ गयी है। गुरूवर नामवरजी इन क्लोन नामवरों से बेहद परेशान हैं। लोक प्रचलन में क्लोन नामवरों के नाम देखें-टॉलीगंज के नामवर,जेएनयू के नामवर,बॉलीवुड के नामवर,सागरवाले नामवर,जोधपुरवाले नामवर,डीयू के नामवर आदि। मजेदार बात है इन सभी क्लोनरूपों को नामवर सिंह हंसकर विनोदी नामवर कहते हैं।


क्लोन नामवर ने गुरूवर नामवरजी से पूछा कि आप किसके लिए लिखते हैं ,बोले मैं अदृश्य पाठक के लिए लिखता हूँ,फिर पूछा आप किसके लिए बोलते हैं,कहा दृश्य जनता के लिए।
क्लोन नामवरों में से एक ने कहा हम तो छात्रों के लिए लिखते हैं,नामवरजी ने कहा कि यह लेखन नहीं गैसपेपर राईटिंग हुई। दूसरे क्लोन ने नामवरजी से कहा मैंतो सर, जब बोलता हूँ पाठ्यक्रम केन्द्रित होकर ही बोलता हूँ,नामवरजी ने कहा मूर्ख यह क्लास नोट्स तैयार कराने की स्कूल मास्टरी है।
तीसरा क्लोननामवर बोला हमने तो सारा जीवन इसी तरह पढ़ाया है ,इस पर नामवरजी बोले इसीलिए तो क्लोन हो, नामवर नहीं हो।

नामवर सिंह हमेशा हंसकर और अनौपचारिक ढ़ंग से बात करते हैं,बार बार व्यंग्य भी करते हैं। लेकिन क्लोननामवर हमेशा गंभीर रहते हैं। इस पर नामवरजी ने चुटकी ली और कहा कि बुरा हो परवर्ती पूंजीवाद का जिसने क्लोन सभ्यता को जन्मदिया है,मैंने कहा इसमें बुरा क्या है क्लोननामवर तो ज्ञान गंभीर हैं,नामवरजी ने कहा ये ज्ञानराक्षस हैं.

नामवर सिंह और क्लोन नामवरों की 4साल पहले एकबार दिल्ली में मुलाकात हुई ,क्लोन नामवरों के कहा हम आप पर कुछ करना चाहते हैं। नामवरजी बोले आपलोग मेरे ऊपर कुछ न करें तो अच्छा है।
संयोग से ये बंदा भी वहां था, मैंने कहा ये लोग कुछ करना चाहते हैं तो कुछ करने दीजिए,बोले ,मैं इन क्लोनों के नकलीपन से आजि़ज़ आ चुका हूँ। तपाक से उनमें से एक क्लोन बोला मैं तो आपके आशीर्वाद से ही पैरों पर खड़ा हूँ। नामवरजी ने कहा नहीं भाई ,आप अपने दम पर पैरों पर खड़े हैं। दूसरा क्लोन बोला हम ही तो दूसरी परंपरा बनाते हैं। नामवरजी ने कहा अरे भाई, दूसरी परंपरा क्लोन परंपरा नहीं है। इसके बाद सब ठहाकर मारकर हंस पड़े।

नामवरसिंह और क्लोन नामवरों के बीच कलकत्ते में एकबार मुलाकात हुई थी,संभवतःराहुल सांकृत्यायन शताब्दी समारोह का मौका था। भारतीय भाषा परिषद में लोग टिके थे ,उनका ही कार्यक्रम था। वहां पर क्लोन नामवर भी मौजूद थे। मैंने मजाक में कहा आपका जैसा बनने की बड़ी इच्छा है इन क्लोन नामवरों में। वे बोले-मेरी जैसी मेधा कहां से लाएंगे ?मैं मुस्करा रहा था,लेकिन पटनावाले क्लोननामवर झेल नहीं पाए, बोले हमने आपसे कम काम नहीं किया है। गुरूवर बोले क्लोन अहर्निश काम करते हैं। वे आदमी थोड़े ही हैं।भीष्मसाहनी ठहाकर मारकर हंसे ।



क्लोन नामवरों की अनुभूतियां देखें- टालीगंज नामवर कहते हैं गोष्ठी में जाएंगे तो अध्यक्षता कराओगे तब ही जाएंगे, एक भक्त ने पूछा ऐसा क्यों तो बोले देखते नहीं हो नामवरजी को वो कहीं जाते हैं बिना अध्यक्षता के ?
डीयू नामवर के नक्शे ही कुछ और हैं जमीन पर पैर नहीं पड़ते ,उनके एक भक्त ने पूछा, सर, आपके जमीन पर पैर क्यों पड़ रहे ? बोले देखो ,नामवरजी को देखो, उनसे सीखो, हमने तो उनसे ही सीखा है।दिल्ली के पंडारा रोड वाले नामवर तो सब समय नामवरमय ही रहते हैं,हर बात के बीच में कोई न कोई नामवर स्मृति कहजाते हैं।
भोपालवाले नामवर मिले थे मैंने पूछा कैसे हैं बोले मैं नामवरजी की तरह ही ठीकठाक हूँ।
हे भगवान यह क्या हो रहा है !!

शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

नामवरजी का वहाँ न जाना !


      नामवर सिंह के स्वभाव को जो लोग जानते हैं उनको पता है कि वे बात के पक्के हैं, यदि किसी कार्यक्रम के लिए हाँ कर दी है तो जरुर जाते हैं लेकिन इसबार पुरुषोत्तम अग्रवाल की षष्ठिपूर्ति के कार्यक्रम में वे नहीं गए, असल कारण तो नामवरजी जानें, हम इतना जानते हैं कि जिस समय पुरुषोत्तम अग्रवाल जेएनयू से रिटायर हुए तो उस समय उनके विदाई समारोह में भी नामवरजी शामिल नहीं हुए वे उस समय शिलांग में थे। उनका सचेत फ़ैसला था कि वे पुरुषोत्तम के विदाई समारोह शामिल नहीं होंगे, संयोग की बात थी उस समय मैं उनके पास था और उन्होंने अपने मन की अनेक कड़वी मीठी यादें बतायीं उस समय उनका जो रुप मैंने देखा वह काबिलेतारीफ  था। नामवरजी का पुरुषोत्तम की षष्ठिपूर्ति में न जाना उनके शिलांग में व्यक्त किए गए नीतिगत रुख़ की संगति में उठाया गया क़दम है। उनके फ़ैसले से उनके आलोचनात्मक रुख़ के प्रति विश्वास और पुख़्ता हुआ है। 
     पुरुषोत्तम अग्रवाल साठ के हुए , हम चाहेंगे वे सौ साल जिएँ , उनको हम सामाजिक जीवन में हमेशा सक्रिय देखकर ख़ुश होते हैं। लेकिन सामाजिक भूमिका, सरकारी भूमिका और साहित्यिक भूमिकाओं के बीच घल्लुघारे से बचना चाहिए।
      एक व्यक्ति के नाते नामवरजी को लोकतांत्रिक हक़ है कि वे कहाँ जाएँ या कहाँ न जाएँ यह वे तय करें। नामवरजी के किसी के जन्मदिन कार्यक्रम में जाने से कार्यक्रम की शोभा बढ़ सकती है लेकिन नामवरजी के किसी को महान कहने से वह व्यक्ति महान नहीं बन सकता। नामवरजी की प्रशंसा अमूमन बोगस होती या फिर मन रखने के लिए या मौक़े की नज़ाकत को ध्यान में रखकर होती है। इसलिए उनके जाने या न जाने से किसी भी कार्यक्रम में चार चाँद नहीं लग सकते, यदि कोई नामवरजी के सहारे साहित्य की वैतरणी पार करना चाहता हो तो यह भी संभव नहीं है। इसका प्रधान कारण है स्वयं नामवरजी का आलोचनात्मक आचरण और व्यक्तित्व। वे अपने आचरण और वक्तव्य से अपने बनाए मिथों को बार -बार तोड़ते रहे हैं। 
               नामवरजी के अनेक छात्र उनसे  जल्दी जल्दी मिलते हैं, मुझे वह सौभाग्य नहीं मिला। एक तो दूर रहता हूँ, दूसरा मेरे पास कोई ऐसा गुण नहीं जो उनको पसंद हो। एक बार कलकत्ता में राहुल सांकृत्यायन के समारोह के दौरान उन्होंने कहा था कि तुम एक बात जान लो शिष्य मेरे ही कहलाओगे, यही सबसे बड़ा उपहार था , मेरे लिए ।
    नामवरजी मेरे लिए बहुत बड़े लेखक - बुद्धिजीवी और शिक्षक हैं। मैं हमेशा उनके प्रति क्रिटिकल रहकर ही सोचता हूँ और यह चीज मुझे उनसे ही सीखने को मिली है।अफ़सोस यह है कि जो नामवरजी के शिष्य हैं या उनकी तथाकथित विरासत के वारिस बनना चाहते हैं वे नामवरजी से आलोचना और आत्मालोचना नहीं सीख पाए हैं।  
                  नामवरजी के लिए यह सबसे खराब ख़बर होगी कि उनका कोई बेहतर शिष्य अध्यापन का काम त्यागकर और किसी धंधे मे चला जाय। मैंने निजी तौर पर उनसे पूछा था कि अध्यापन छोड़कर कुछ और काम कर लेता हूँ, कलकत्ता में असुविधा हो रही है, बोले अध्यापन मत छोड़ना , यह हमारी शक्ति और सामाजिक भूमिका का बेहतरीन आधार  है।  
               मैंने यह महसूस किया कि मैं जब भी कक्षा में जाता हूँ तो अपने शिक्षकों को बार बार महसूस करता हूँ। मुझे रह रहकर अपने प्रिय शिक्षक याद आते हैं उनका लिखा याद आता है, उनसे ज्ञान मुठभेड़ करना याद आता है। जब किताब लिखता हूँ तो यह मानकर लिखता हूँ कि उन विषयों पर लिखो जिन पर मेरे शिक्षक नहीं लिख पाए। वह अधूरा काम है उसे आगे बढ़ाओ । 
                 एक अन्य बात जो बेहद जरुरी है, कोई शिक्षक टीवी या मीडिया में उपस्थिति दर्ज करके बड़ा शिक्षक या बुद्धिजीवी नहीं बन सकता। मीडिया में रहकर पब्लिक इंटेलेक्चुअल भी नहीं बन सकता। यदि ऐसा होता तो रोमिला थापर,इरफ़ान हबीब आदि का तो समाज में कोई नाम ही नहीं होता, ये लोग कभी टीवी टॉक शो में नज़र नहीं आते ,दैनिक अख़बारों में कॉलम नहीं लिखते। एक शिक्षक की जगह कक्षा है ,रिसर्च है , वहाँ वह जितना समर्पित होगा , अकादमिक योगदान करेगा वहीं से वह अपना क़द ऊँचा बनाएगा। 
      बुद्धिजीवी का क़द सरकारी पद से ऊँचा नहीं बनता । सरकारी नेताओं की चमचागिरी से क़द ऊँचा नहीं बनता.हां नेताओं की चमचागिरी से सरकारी पद जरुर मिल जाते हैं। केन्द्र से लेकर राज्य स्तर तक चलने वाले सभी लोकसेवा आयोगों में जितने सदस्य रखे जाते हैं वे राजनीतिक सिफ़ारिश पर रखे जाते हैं। यही वजह है कि इन आयोगों में कभी स्वतंत्रचेता लोग नहीं रखे गए। 
             हिन्दी की सचाई है कि यहाँ कोई पब्लिक इंटेलेक्चुअल नहीं है। यहाँ किसी में नॉम चोम्स्की या एडवर्ड सईद जैसे गुण नहीं हैं। इन दोनों बुद्धिजीवियों की अमेरिकी मीडिया पूरी तरह उपेक्षा करता रहा है, सईद गुज़र गए हैं। चोम्स्की ज़िंदा हैं, वे अपने सामाजिक - राजनीतिक -अकादमिक सरोकारों के प्रति गंभीर लगाव के कारण जाने जाते हैं। 
   उनको कभी किसी बड़े अमेरिकी चैनल ने टॉक शो के लिये नहीं बुलाया, किसी बड़े अख़बार ने उनको नहीं छापा।इसके बावजूद वे अमेरिका की जंगजू जनता के ही नहीं सारी दुनिया के प्रिय बुद्धिजीवी हैं। हमारे यहाँ तो उलटा मामला है टीवी टॉक शो से बुलावे बंद हो जाएँ , अख़बारों में नाम न दिखे तो हिन्दी के स्वनाम धन्य लोगों को नींद नहीं आती। यह मासकल्चर का मीडियापीलिया है , यह पब्लिक इंटेलेक्चुअल का गुण नहीं है। 
                      
                          

शनिवार, 2 मई 2015

नामवर सिंह सिर्फ 'देह' हैं

        साहित्य इन दिनों भेडों से घिर चुका है। आप भेड़ नहीं हैं तो साहित्यकार नहीं हैं। सत्ता ने साहित्यकार को सम्मान दिया,पुरस्कार दिए लेकिन भेड़ का दर्जा भी दिया। हम खुश हैं कि हम भेड़ हैं। भेड़ की तरह रहते हैं,जीते हैं, लिखते हैं,भेड़ होना बुरी बात नहीं है लेकिन साहित्यकार का भेड़ होना बुरी बात है। साहित्यकार जब भेड़ बन जाता है तो यह साहित्य के लिए अशुभ-संकेत है। हम असमर्थ हैं कि साहित्यकार को भेड़ बनने से रोक नहीं रोक पा रहे,साहित्य में भेडों का उत्पादन जितनी तेजी से बड़ा है उतनी तेजी से साहित्य का उत्पादन नहीं बढ़ा।
        एक जमाना था साहित्यकार का दृष्टिकोण महत्वपूर्ण होता था लेकिन इन दिनों 'दृष्टिकोण' की जगह 'कोण' ने लेली है। 'दृष्टि' बेमानी हो गयी है। साहित्यकार का 'कोण' उसकी पहचान का आधार बन गया है । साहित्यकार के दृष्टिलोप की सटीक जन्मतिथि हम नहीं जानते,लेकिन एक बात जरुर जानते हैं कि विवेक जब मर जाता है तब 'कोण' पैदा है। विवेक जब तक जिंदा रहता है दृष्टिकोण बना रहता है लेकिन जब विवेक मर जाता है तो सिर्फ 'कोण' रह जाता है।
       विवेक  मर जाने पर साहित्यकार मात्र सिर्फ देह रह जाता है। यानी वह मंच पर ,सभा में, गोष्ठी में ,लोकार्पण में,समीक्षा में बैठा हुआ शरीर मात्र रह जाता है। साहित्यकार का 'देह' में रुपान्तरण स्वयं में लेखक के लिए चिन्ता की बात नहीं है, यह इन दिनों साहित्यिक जगत में भी चिन्ता की बात नहीं है,क्योंकि साहित्यिक जगत तो 'देह' से काम चलाता रहा है, उसके लिए तो 'देह' ही प्रधान है । साहित्यकार का 'देह' में रुपान्तरण एकदम नई समस्या है और इस समस्या पर हमें गंभीरता से सोचना चाहिए। सवाल यह है कि साहित्यकार क्या मात्र 'देह' है ? खासकर नामवर सिंह के प्रसंग में यह सवाल मेरे दिमाग में कौंधा है।
     नामवर सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व के अनेक आयाम हैं। उनमें से एक आयाम यह भी है कि उनके यहां साहित्यकार का 'शरीर' में रुपान्तरण हो चुका है। वे सशरीर किसी भी कार्यक्रम में चले जाते हैं, लेकिन वे दसियों वर्ष पहले अपने को साहित्यकार के नजरिए से मुक्त कर चुके हैं। मेरे लिए यह इसलिए भी त्रासद है क्योंकि वे मेरे शिक्षक रहे हैं, हमने उनसे पढ़ा है। अपना शिक्षक जब विवेक को त्याग दे तो बड़ी पीड़ा होती है। मैं नहीं जानता नामवर सिंह को विवेक त्यागने पर कोई पीड़ा होती है या नहीं ? पर मुझे होती है।
     नामवर सिंह के व्यक्तित्व मूल्यांकन में यह प्रश्न विचारणीय है कि साहित्यकार का नजरिया महत्वपूर्ण है या शरीर महत्वपूर्ण है ? साहित्यकार का लिखा महत्वपूर्ण है या उसके लिंक ,सत्ताधारियों के प्रति भक्ति महत्वपूर्ण है ? क्या साहित्यकार प्रतीकात्मक तौर पर कहीं पर कुछ भी विवेकहीन बोल सकता है ? कर सकता है ? क्या लेखक के लिए विवेकवाद का कोई मूल्य नहीं रह गया  ?
    नामवर सिंह के चाहने वाले असंख्य हैं , ये चाहने वाले वैसे ही हैं जैसे माधुरी दीक्षित के होते हैं। माधुरी दीक्षित के चाहने वाले उसके 'देह' और उससे जुड़े कलाप्रदर्शन पर मुग्ध हैं, इस समूची प्रक्रिया में माधुरी दीक्षित वही सब करती है जो उसे फिल्म निर्देशक करने के लिए कहता है। वह महज 'देह' के तौर पर उपलब्ध रहती है, निर्देशक जैसे नचाता है वह नाचती है, जैसे कहता है वैसे ही अभिनय करती है। इस अभिनय में  सब कुछ निर्देशित है, सब कुछ निर्मित है,  कुछ भी स्वाभाविक नहीं है, सामान्य नहीं है,यहां तक कि उसके व्यक्तित्व की मार्केटिंग भी निर्देशक और संस्कृति उद्योग करता है। यही वह बिंदु है जहां से नामवर सिंह को देखना चाहिए। वे साहित्य में साहित्यकार की देह हैं। संभवतः यही बात दिमाग में रखकर उन्होंने ज्ञानपीठ के एक कार्यक्रम में साफ कहा मैं फरमाइशी लेखक हूँ।  

         

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