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August, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अपराध और अपराधी मध्यवर्ग-

अपराध और अपराधी का कोई वर्ग नहीं होता,इसके बावजूद यह जानना समीचीन होगा कि आखिरकार इस दौर में अपराधी किस वर्ग में सबसे ज्यादा पैदा हो रहे हैं और कानून का वे किस तरह दुरुपयोग कर रहे हैं। नए आंकड़ों और मीडियायथार्थ की रोशनी में हमें अपराधी के वर्गचरित्र को भी चिह्नित करना चाहिए। मसलन्,मध्यवर्ग में सबसे ज्यादा टैक्सचोर हैं,मध्यवर्ग में सबसे ज्यादा ह्वाइटकॉलर अपराधी हैं,दहेज उत्पीड़न,स्त्री-उत्पीड़न और साइबर अपराधी सबसे ज्यादा मध्यवर्ग में है,स्थिति यह है कि आईपीएल से लेकर बीपीएलकार्ड स्कैंडल तक,मनरेगा से लेकर खनन माफिया तक, ड्रग माफिया से लेकर बर्बर क्राइम के क्षेत्रों तक मध्यवर्ग का जाल फैला हुआ है।आतंकवाद-साम्प्रदायिकता और पृथकतावादी हिंसाचार में भी मध्यवर्गीय युवाओं का एक बड़ा अंश लिप्त है। मध्यवर्ग के इस व्यापक बर्बर-अपराधी चरित्र की अनदेखी करके भारत के बुर्जुआजी और उसके द्वारा निर्मित शिक्षा व्यवस्था की भूमिका को सही परिप्रेक्ष्य में समझना मुश्किल है।      मध्यवर्ग के आपराधिक चरित्र का चरमोत्कर्ष है यूपीएससी निर्मित अफसरों की एक अच्छी-खासी तादाद का विभिन्न किस्म के क्राइम में लिप्त पा…

राखी और आनंद का नागरिकखेल

आज राखी है, यह आनंद है । लेकिन हमने इसे प्रथा बनाकर जाने कब रक्षाबंधन बना दिया!  यह हिन्दू बहिनों और भाईयों का सुंदर पर्व है। यह आनंद का पर्व है। प्रतीकात्मक रुप में राखी बहुत बड़ा पर्व है। सवाल यह है राखी पर्व था ,रक्षाबंधन कब से हो गया ? राखी पर्व में जो व्यंजना है वह रक्षाबंधन में नहीं है, पर्व सकारात्मक है , बंधन नकारात्मक है।      बंधन संकेत है कि बहिनें तकलीफ़ में हैं।  बंधन मानने वाले ठंडे दिमाग़ से सोचें कि वे बहिनों का बीमा कराना चाहते हैं या नागरिक बनाना चाहते हैं? बीमा बंधन है , नागरिकचेतना आज़ादी है, हक़ है। हमारे पीएम को यही लगता है कि बहनों का बीमा हो जाए तो अपने दायित्व से मुक्त हो जाएँ।     बहन दायित्व नहीं है, बहन नागरिक है, आत्मनिर्भर स्त्री है, बहन के प्रति दायित्वबोध की आज ज़रूरत नहीं है, बहन को नागरिकबोध और नागरिक अधिकारों से लैस करके समान धरातल पर लाने की ज़रूरत है। राखी को पर्व मानोगे तो समान नज़रिए से देख पाओगे। आनंद भाव से देख पाओगे। रक्षाबंधन के रुप में देखोगे तो हमेशा दायित्व निभाने वाले असमानतावादी नज़रिए से देखोगे। राखी पर आनंद की ज़रूरत है, ख़ुशी की ज़रूरत …

नामवरजी का वहाँ न जाना !

नामवर सिंह के स्वभाव को जो लोग जानते हैं उनको पता है कि वे बात के पक्के हैं, यदि किसी कार्यक्रम के लिए हाँ कर दी है तो जरुर जाते हैं लेकिन इसबार पुरुषोत्तम अग्रवाल की षष्ठिपूर्ति के कार्यक्रम में वे नहीं गए, असल कारण तो नामवरजी जानें, हम इतना जानते हैं कि जिस समय पुरुषोत्तम अग्रवाल जेएनयू से रिटायर हुए तो उस समय उनके विदाई समारोह में भी नामवरजी शामिल नहीं हुए वे उस समय शिलांग में थे। उनका सचेत फ़ैसला था कि वे पुरुषोत्तम के विदाई समारोह शामिल नहीं होंगे, संयोग की बात थी उस समय मैं उनके पास था और उन्होंने अपने मन की अनेक कड़वी मीठी यादें बतायीं उस समय उनका जो रुप मैंने देखा वह काबिलेतारीफ  था। नामवरजी का पुरुषोत्तम की षष्ठिपूर्ति में न जाना उनके शिलांग में व्यक्त किए गए नीतिगत रुख़ की संगति में उठाया गया क़दम है। उनके फ़ैसले से उनके आलोचनात्मक रुख़ के प्रति विश्वास और पुख़्ता हुआ है।       पुरुषोत्तम अग्रवाल साठ के हुए , हम चाहेंगे वे सौ साल जिएँ , उनको हम सामाजिक जीवन में हमेशा सक्रिय देखकर ख़ुश होते हैं। लेकिन सामाजिक भूमिका, सरकारी भूमिका और साहित्यिक भूमिकाओं के बीच घल्लुघारे स…

नीतीश -मोदी और विभ्रम -

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लोकतंत्र में विभ्रम निर्णायक हैं,जनता के वोट से लेकर दिमाग तक विभ्रम का खेल तूफान की तरह चलता है। मोदी से लेकर नीतीश तक सबके पास विभ्रम हैं। हम में से कोई भी रियलिटी देखना नहीं चाहता और रियलिटी पर बातें करना नहीं चाहता।
विभ्रम का सबसे ज्यादा असर हम मध्यवर्ग के लोगों पर होता है। हमें विभ्रम बड़े प्यारे हैं, हम विभ्रम में अहर्निश विचरण करना पसंद करते हैं।पहले मनमोहन सिंह के विभ्रम से घिरे थे अब मोदी के विभ्रमों में फंसे हैं।हम भूल जाते हैं कि समाज को विभ्रमों से ऊर्जा नहीं मिलती,बल्कि विभ्रमों का जितना दवाब होता है संकट उतना ही गहराता चला जाता है। विभ्रम का खेल देखें कि मनमोहन से नफरत करते थे लेकिन मोदी से प्यार करने लगे जबकि नीतियां वही हैं। बेकारी चरम पर है महंगाई रोज बढ़ रही है,सामाजिक असुरक्षा बढ़ी है,पाक से तनाव बरकरार है,घूसखोरी चरम पर है,सीबीआई के पास मनमोहन सिंह के जमाने की तुलना में मोदीशासन में ज्यादा करप्शन केस दर्ज हुए हैं, अदालतें चरमरा गयी हैं। लेकिन हम हैं कि विभ्रम में आनंदित हैं,मोदी-मोदी के नशे में मस्त हैं।
लोकतंत्र में विभ्रम संकट को नजरों से कुछ समय के लिए ओझल रखते …

सम्राट अकबर के मायने

अकबर के शासन में भारत की जो इमेज बनी वह हम सबके लिए गौरव की बात है। एक शक्तिशाली राष्ट्र के रुप में भारत को निर्मित करने में अकबर का अतुलनीय योगदान था। भारत को शक्तिशाली राष्ट्र बनाकर अकबर ने भारतीय जनता की जो सेवा की है उसके सामने सभी मुस्लिमविरोधी आलोचनाएं धराशायी हैं। भारत के मुसलमान कैसे हैं और कैसे होंगे अथवा भारत नागरिक कैसे होंगे, यह तय करने में अकबर की बड़ी भूमिका थी । राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है अकबर के जमाने में हिन्दू जितने रुढ़िवादी और कूपमंडूक थे,उसकी तुलना में मुसलमान उदार हुआ करते थे। मसलन्,हिन्दुओं में इक्का-दुक्का लोग ही विदेश जाते थे जबकि मुसलमानों में बहुत बड़ा हिस्सा हज करने के बहाने  मक्का यानी विदेश जाता था। अकबर के जमाने में भारत में यूरोपीय लोग गुलाम की तरह बिकते थे,यह रिवाज अकबर को नापसंद था। उसने अनेक यूरोपीय गुलामों को मुक्ति दिलाई और उनको पोर्तुगीज पादरियों के हवाले कर दिया,इनमें अनेक रुसी थे। दुखद पहलू यह है अकबर के बाद जो शासक सत्ता में आए उनमें वैसी अक्ल और विवेक नहीं था,फलतः अकबर के जमाने में पैदा हुई अनेक परंपराएं आगे विकसित नहीं हो पायीं।    …

राहुल गांधी की नई इमेज और नई राजनीति

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राहुल गांधी की नई इमेज परिवर्तनकामी है,खुली है, यह कांग्रेस के मूल स्वभाव से भिन्न है। कांग्रेस का मूल स्वभाव सत्ता अनुगामी और छिपानेवाला रहा है,जबकि राहुलगांधी सत्ता से मुठभेड़ कर रहे हैं,पार्टी को खेल रहे हैं। वे इस क्रम में दो काम कर रहे हैं,पहला यह कि वे कांग्रेस की नीतियों में परिवर्तन कर रहे हैं, पुरानी नीतियों से अपने को अलगा रहे हैं, उन पर क्रिटिकली बोल रहे हैं। इससे नई राजनीतिक अनुभूति अभिव्यंजित हो रही है।
कांग्रेस के शिखर नेतृत्व में यह प्रवृत्ति रही है कि वह नीतियों पर हमले कम करता रहा है लेकिन राहुल इस मामले में अपवाद हैं वे मनमोहन सिंह के जमाने में भी नीतिगत मसलों पर निर्णायक हस्तक्षेप करते थे और इन दिनों तो वे भिन्न तेवर में नजर आ रहे हैं। इस क्रम में समूची कांग्रेस की मनोदशा में परिवर्तन घटित हो रहा है। आज राहुल गांधी पहल करके जनता के मसलों को उठा रहे हैं,जनांदोलनों के बीच में जा रहे हैं। हाल ही में पूना फिल्म एवं टीवी संस्थान और पूर्व सैनिकों के आंदोलन स्थल पर राहुल गांधी का जाना शुभलक्षण है। राहुल गांधी पूना संस्थान के छात्रों के जुलूस के साथ राष्ट्रपत…

इस्लाम के उदारचेता मनस्वी सैयद महम्मद जौनपुरी

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यह एक मिथ है कि भारत के मुसलमान फंडामेंटलिस्ट हैं,यहां मुसलमानों में कोई धर्मनिरपेक्ष परंपरा नहीं है। सब कुछ शरीयत के हिसाब से होता रहा है। मुसलमानों के बारे में ये सभी बातें एकसिरे से बेबुनियाद हैं। मुगल सल्तनत के जमाने में भारत में मुस्लिम बुद्धिजीवियों की निडर धर्मनिरपेक्ष परंपरा रही है और उसकी मध्यकाल में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ये वे लोग हैं जो न तो शरीयत से खौफ़ खाते थे ,न खुदा के नाम से डरते थे, इनका हिन्दुस्तान की जनता से गहरा लगाव था। मजेदार बात यह है कबीर आदि भक्ति आंदोलन के कवि जिस समय सामाजिक न्याय की काल्पनिक बयार बहा रहे थे उस समय मुसलमानों में तीन बहुत बड़े कद के महापुरुष हुए हैं,ये हैं, सैयद महम्मद जौनपुरी,मियाँ अब्दुल्ला नियाजी और शेख अल्लाई । हिन्दी के  महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने इन तीनों को मुस्लिम साम्यवादी कहा है।      राहुल सांकृत्यायन ने “अकबर”(1957) में  लिखा है “ यह आश्चर्य की बात नहीं है कि यदि हिन्दू नहीं ,बल्कि ये मुस्लिम सल्तनतें हमारे प्रादेशिक साहित्य के निर्माण में सबसे पहले आगे आईं। इस्लाम –प्रभावित हिन्दी अर्थात् उर्दू का साहित्य बहमनियों…

संविधान पर हमला है हर हर महादेव का नारा

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हिन्दुत्व का नायक कल गया में हर-हर महादेव का नारा लगा रहा था। चुनाव में हर- हर महादेव का नारा नया फिनोमिना है। यह साम्प्रदायिक राजनीति के आनेवाले मंसूबों की खतरनाक सूचना भी है।

जो व्यक्ति चुनावी मंच से संविधान की रक्षा की शपथ तोड़े,चुनाव आरंभ होने के पहले ही साम्प्रदायिक नारेबाजी करे,संविधान की प्रचलित परंपराओं को सीधे विसर्जित कर दे और साथ में राज्यवासियों के बारे में ‘बीमारु राज्य’ कहकर घृणा का प्रचार करे ऐसे व्यक्ति की यदि बिहार में सरकार आ जाए तो बिहार का समूचा धर्मनिरपेक्ष तानाबाना टूटने में ज्यादा देर नहीं लगेगी। हिन्दुत्ववादियों की चुनावी सभा में हर-हर महादेव का नारा स्वतःस्फूर्त्त नारा नहीं है। यह पहलीबार हुआ है कि एक राष्ट्रीयदल ने वोटों के स्वार्थ के चलते खुल्लम-खुल्ला साम्प्रदायिक कार्ड चला है। राजनीति में हर- हर महादेव का नारा घिनौना और विभाजनकारी नारा है। यह राजनीति और धर्म को मिलाने की घटिया कोशिश है। इसकी हर स्तर पर निंदा होनी चाहिए।

गया में हिन्दुत्व के फिल्मी हीरो ने जब मंच से यह नारा दिया गया तो हिन्दुस्तान के बारे में देश के बाहर यही संदेश गया कि भारत हिन्दुत्व…

संसद के रक्षक टीवी भांड

टाइम्स नाउ टीवी चैनल पर वक्ताओं और एंकर अर्णव गोस्वामी की अ-लोकतांत्रिक चाल देखकर यही नज़र आ रहा है कि जनहितों के लिए संघर्ष करने वालों को एकओर मोदी सरकार से लड़ना होगा वहीं दूसरी ओर कारपोरेट न्यूज़ टीवी चैनलों के प्रायोजित टॉक शो और न्यूज़ प्रसारण से भी लड़ना होगा। आज अर्णव गोस्वामी जिस तरह सरकारीभोंपू की तरह बोल रहा था उसने डीडी न्यूज़ को भी लज्जित कर दिया, मज़ेदार बात यह है डीडी न्यूज़ पर मोदीभक्ती कम दिख रही है इसके विपरीत टाइम्स नाउ आदि निजी चैनलों पर सरकारभक्ति का नशा छाया हुआ है ।    अर्णव गोस्वामी की बातों को सुनकर लग रहा था कि मोदी सरकार ढेर सारे विकासमूलक और भ्रष्टाचारविरोधी काम करना चाहती है लेकिन विपक्ष करने नहीं दे रहा ! यह अपने आप में बेबुनियाद तर्क है । संसद चले या न चले , इसे लेकर मोदी सरकार गंभीर नहीं रहे ।संसदीय गरिमा और संसद के प्रति मोदी सरकार न तो गंभीर है और न ज़िम्मेदार है। महंगाई, ग़रीबी, मिड डे मिल , ग़रीबों के लिए घर बनाने आदि कार्यों को लेकर गंभीर है तो उसे किसने काम करने से रोका है। यह सरकार अध्यादेश के ज़रिए काम करना चाहती है। सरकार नहीं चाहती कि लोकतांत…

स्वाधीन बच्चे और प्रेमचंद

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बच्चों को लेकर बहुत कुछ लिखा गया है लेकिन बच्चों को जिस नज़रिए से प्रेमचंद देखते हैं वह अपने आपमें मूल्यवान है । सामान्य तौर पर प्रेमचंद के बच्चों से संबंधित नज़रिए पर कभी किसी ने ध्यान ही नहीं दिया ।प्रेमचंद ने जो बातें बच्चों के लिए कही हैं उनका बहुत गहरा संबंध युवाओं से भी है । बच्चों के बारे में बातें करते ही एक ही चीज ज़ेहन में आती है कि बच्चों को आज्ञाकारी होना चाहिए। बच्चों को आज्ञापालन सिखाओ , बड़ों का सम्मान करना सिखाओ , संयम से जीना सिखाओ। तक़रीबन सभी के मन में यह धारणा है , प्रेमचंद ने व्यंग्य करते लिखा , "बच्चों को स्वाधीन बनाना तो ऐसा ही है जैसे आग पर तेल छिड़कना।"
एक वर्ग यह भी मानता है कि बच्चे आज पूरी तरह स्वतंत्र हैं उनको कुछ भी सिखाने की ज़रूरत नहीं है, वे सब कुछ मीडिया से सीख रहे हैं। टीवी, इंटरनेट,सोशलमीडिया और विज्ञापनों से सीख रहे हैं। इस प्रसंग में यही कहना चाहते हैं कि मीडिया से बच्चे वस्तु ख़रीदना सीख रहे हैं, उपभोक्ता बनने के गुर सीख रहे हैं, वस्तुओं के उपभोग को सीखना स्वाधीन होना नहीं है। यदि कोई बच्चा गायक बनना चाहता है तो उसे गायन सीखना पड…