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सोमवार, 20 जून 2011

सांस्कृतिक पराधीनता और हिन्दी संस्थान


इन दिनों हिन्दी हम हिन्दी वाले हिन्दी की सेवा नहीं कर रहे ।मालिकों की सेवा कर रहे हैं। विश्वविद्यालय-कॉलेज में पढ़ाने वाले या केन्द्र सरकार के संस्थानों के हिन्दी अधिकारी इस भ्रम में हैं कि वे हिन्दी की सेवा कर रहे हैं, असल में वे मालिकों की सेवा कर रहे हैं और उनकी सेवा के लिए सुंदर सेवक तैयार कर रहे हैं। हिन्दी को मालिकों की भाषा मालिकों ने नहीं हम बुद्धिजीवियों-हिन्दीसेवियों ने बनाया है।  
रघुवीर सहाय ने एक कविता में लिखा है, "वही लड़ेगा अब भाषा का युद्ध/जो सिर्फ अपनी भाषा में बोलेगा/ मालिक की भाषा का एक शब्द भी नहीं/चाहे वह शास्त्रार्थ न करे जीतेगा/बल्कि शास्त्रार्थ वह नहीं करेगा/वह क्या करेगा अपने गूँगे गुस्से को वह /कैसे कहेगा ? तुमको शक है /गुस्सा करना ही/गुस्से की एक अभिव्यक्ति जानते हो तुम/वह और खोज रहा है/ तुम जानते नहीं।"यानी मालिक की भाषा से बचने का कोई शास्त्र है हमारे पास ?हम क्यों और कब से मालिक की भाषा बोल रहे हैं ? हिन्दी को मालिक की दासी कैसे बनाया गया ? अरबो-खरबों रूपये खर्च करने बाबजूद हिन्दी आज भी पिछड़ी क्यों है ? इत्यादि सवालों पर गंभीरता के साथ विचार करने री जरूरत है।
हिन्दी पर केन्द्र सरकार करोड़ों रूपये सालाना खर्च करती है। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान,केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय और वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय से लेकर देश के विभिन्न विश्वविद्यालय और कॉलेजों में चल रहे हिन्दी विभागों के अकादमिक उत्पादन पर नजर डाली जाए तो बहुत ही असंतोषजनक तस्वीर सामने आती है। हिन्दी के समस्त कार्य व्यापार से जुड़े लोग हिन्दी के पठन-पाठन और अनुसंधान को यह मानकर करते हैं कि वे राष्ट्रभाषा का विकास कर रहे हैं और इस नाते हिन्दी तो सबकी है और उसे सबको सीखना चाहिए और हमें सिखाना चाहिए।
     हिन्दी शिक्षक कक्षाओं में हिन्दी को एक नेचुरल भाषा के रूप में पढ़ाते हैं। वे हिन्दी के उद्भव और विकास को गैसपेपर मार्काशैली में पढ़ाते हैं और उसके विकास के पीछे निहित ऐतिहासिकता की हत्या कर देते हैं। वे चाहते हैं हिन्दी भारत की सार्वभौम भाषा बन जाए। इसके विकास और प्रसार के लिए वे शुद्ध व्यवहारमूलक तर्कों का इस्तेमाल करते हैं और उसके पीछे निहित ऐतिहासिकता को छिपाते हैं। वे उसे महाभाषा के रूप में भी प्रचारित करते हैं। सच यह है  मध्यकाल में हिन्दी कभी भी सत्ता और न्याय की भाषा नहीं रही और आज भी नहीं है। आज भी सरकार और अदालत के सभी दस्तावेज हिन्दी में नहीं अंग्रेजी में तैयार किए जाते हैं।
     इसके अलावा मध्यकाल से लेकर आधुनिककाल तक के जितने भी बड़े दार्शनिक विमर्श हैं उनमें में से कोई भी हिन्दी में नहीं हुआ। ऐसी अवस्था में हिन्दी को भारत की स्वाभाविक राष्ट्रभाषा के रूप में प्रचारित-प्रसारित करना पाखंड है। देश की स्वाभाविक भाषा वो है जिसमें न्यायपालिका और सत्ता बातें करते हैं। दर्शन का विमर्श जिसमें तैयार होता है। हमारे भाषाविज्ञानी तरह-तरह से हिन्दी के उत्थान-पतन की गाथाएं बताते हैं लेकिन किसी ने भी इस पहलू को ध्यान में नहीं रखा कि भाषा के राष्ट्रीय भाषा बनने में कौन से पक्ष प्रधान होते हैं। वे मात्र साहित्य जगत के भाषिक प्रयोगों को केन्द्र में रखकर बातें करते हैं।
     वे कभी भाषा पर सत्ता,दर्शन,शास्त्रीय विमर्श और न्यायव्यवस्था की भाषा के संदर्भ में बात नहीं करते। इसके बिना भाषा का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य नहीं बनता। मुश्किल यह है कि विमर्श जिस भाषा में हो रहा है और साहित्य जिस भाषा में लिखा जा रहा है उनमें किसी भी किस्म का आदान-प्रदान है कि नहीं ? विमर्श को सामाजिक-सांस्थानिक मानकर व्यक्ति के हवाले कर दिया गया और साहित्य को समाज के हवाले करके हमने विमर्श और भाषा के बीच में पैदा हुए अन्तर्विरोध की सृष्टि कर दी।
      हाल के वर्षों में हिन्दी के प्रतिष्ठित आलोचकों ने विमर्श पदबंध को उत्तर आधुनिक मानकर जिस तरह की खिल्लियां उड़ायी हैं उससे यही पता चलता है कि हिन्दी में भाषा और विमर्श में वे अतराल मानकर चल रहे थे। हिन्दी में जिसे आलोचना कहते हैं यह आधुनिक विधा है। मध्यकाल में हिन्दी में कोई आलोचना या विमर्श नहीं है। भाषाविज्ञानी और आलोचकों ने हिन्दी भाषा पर पाठकेन्द्रित होकर लिखा। विमर्श केन्द्रित होकर कुछ भी नहीं लिखा। भाषा के वाचिक और साहित्यिक प्रयोगों का विवेचन किया। वे इन रूपों के प्रभाव या रूपान्तरण की चर्चा कम करते हैं।  वे हिन्दी और अन्य भाषाओं के विकास को रेखांकित करते हैं। इस प्रक्रिया में भाषा स्वयं में एक संरचना और सिस्टम बनती चली गयी। उसके नियम बने। नियमों के आधार पर ही फैसले लिए गए। ऐसी अवस्था में भाषा में कोई भी बदलाव लाने के लिए नियमों में बदलाव जरूरी है ,नियमों में बदलाव के जरिए हम भाषा  और सिस्टम के संबंधों में भी बदलाव कर सकते हैं।
   मजेदार बात यह है कि हिन्दी भाषा को आधुनिककाल आते ही सभी रंगत के विचारक-समाज सुधारक और साहित्यकार राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहते थे। इस चक्कर में अन्य भाषाओं और बोलियों के प्रति समानता के भाव को तिलांजलि देदी गयी और हिन्दी को विशेषाधिकार देने पर जोर दिया गया। हिन्दी की महत्ता,सत्ता और परंपरा पर अतिरिक्त बल देने के कारण भाषाविज्ञानियों और आलोचकों ने भाषा और विमर्श के क्षेत्र में जांच के काम को तिलांजलि दे दी। वे वहां सत्य की खोज में जुट गए। जबकि आलोचना का यह काम नहीं है कि वह सत्य खोजे या दावे के साथ बताए। आलोचना का काम हैं जांच करना।
     आधुनिक काल आने के साथ जगदीशचन्द्र बसु,सत्येन्द्र बसु आदि की विज्ञान रचनाएं बांग्लाभाषा में आईं। गिरीन्द्रशेखर बसु ने मनोविज्ञान पर काम किया. ये लोग अपने क्षेत्र के महारथी थे। गिरीन्द्रशेखर बसु की रचनाओं से फ्रॉयड ने बहुत कुछ सीखा और मनोशास्त्र की अनेक धारणाएं बनायीं और गिरीन्द्रशेखर बसु के योगदान को माना, फ्रॉयड का उनसे नियमित पत्र-व्यवहार भी होता था। यही स्थिति अन्य वैज्ञानिकों की थी वे भी अपनी मौलिक खोजों को पहले अपनी भाषा में लेकर आए। इससे बांग्ला भाषा में विमर्श का वातावरण बना।
     लेकिन हिन्दी में ऐसा अभी तक नहीं हो पाया है। दर्शन,विज्ञान,राजनीतिशास्त्र आदि में आज भी हिन्दी कम्युनिकेशन की भाषा नहीं बन पाई है। आज भी इन क्षेत्रों में पढ़ने-पढ़ाने के लिए अंग्रेजी की मदद लेनी होती है लेकिन हम मुगालते में हैं कि हिन्दी राष्ट्रभाषा है ,राष्ट्रीय विमर्श की भाषा है।
      सच यह है हिन्दी में एक भी ऐसा विमर्श नहीं हुआ जिसने भारत या उसके बाहर प्रभाव छोड़ा हो। जबकि संस्कृतभाषा के साथ ऐसा नहीं है। बांग्लाभाषा के साथ ऐसा नहीं है। संस्कृत के साहित्य,न्याय-दर्शन,नीतिशास्त्र,काव्यशास्त्र,नाट्यशास्त्र आदि तमाम क्षेत्रों का आज भी सारी दुनिया में अध्ययन-अध्यापन होता है। क्योंकि संस्कृत सिर्फ साहित्य की भाषा नहीं थी,वह विज्ञान,गणित,दर्शन,न्याय,कामशास्त्र आदि जटिततम विषयों के विमर्श की भाषा भी थी ।
      हिन्दी की स्थिति इसकी तुलना में बेहद खराब है। हिन्दी ने अपने को साहित्य, बातचीत,सरकारी कामकाज की भाषा और मीडिया की भाषा तक सीमित रखा है। इससे हिन्दी का रुका है। हिन्दी अभी तक विचार,विज्ञान,तकनीक आदि की भाषा क्यों नहीं बन पायी है ? हमारे हिन्दी संस्थानों की इसमें बड़ी भूमिका है। हिन्दी के बुद्धिजीवियों की ,खासकर प्रोफेसरों की बड़ी भूमिका है।
    हिन्दी के प्रोफेसरों और हिन्दी ऑफीसरों ने जो संसार रचा है वह भाषा का सीमित संसार है। हिन्दीवाले को हिन्दी के विकास के नाम पर कुछ भी करना होता है तो वे सेमीनार करते हैं और स्वयं मंच पर बैठ जाते हैं। यानी हिन्दी बुनियादी तौर पर सेल्फ -प्रमोशन स्कीम का हिस्सा है। निजी उत्थान और निजी महिमा को वे राष्ट्रीय उत्थान और हिन्दी महिमा समझते हैं। जबकि इसका हिन्दी विकास से कोई संबंध नहीं है।
हिन्दी आलोचकों-प्रोफेसरों और साहित्यकारों को साहित्य और कम्युनिकेशन माध्यमों में हिन्दी की सत्ता का विस्तार खूब आनंदित करता है। जबकि इस विस्तार से भाषा समृद्ध नहीं होती। पता करें कि मासमीडिया और सूचना तंत्र के व्यापक विकास के बाबजूद हिन्दी कितनी समृद्ध हुई है ? सच यह है कि हिन्दी के अनेक बड़े अखबार अभिव्यक्ति के लिए अंग्रेजी पदबंधों के अनिवार्य प्रयोग पर बल दे रहे हैं। हिन्दी की दयनीय अवस्था का अनुमान इससे ही लगाया जा सकता है कि केन्द्र सरकार की कोई भी नीति या पत्र पहले हिन्दी में नहीं लिखा जाता। सारे सरकारी तंत्र के संप्रेषण की भाषा अंग्रेजी है। रघुवीर सहाय की कविता है 'हिन्दी '- ' पुरस्कारों के नाम हिंदी में हैं/ हथियारों के अंग्रेज़ी में /युद्ध की भाषा अंग्रेजी है /विजय की हिन्दी।"एक अन्य कविता में रघुवीर सहाय ने लिखा है, "अँग्रेजों ने अँग्रेजी पढ़ाकर प्रजा बनाई/ अँग्रेजी पढ़ाकर अब हम प्रजा को राजा बना रहे हैं।"
   आधुनिककाल में हिन्दी के विकास का जो रास्ता हमने चुना है वह बाजार , महानगर,विश्वविद्यालय और कम्युनिकेशन मीडियम केन्द्रित है। इन चारों का हमारे देश आर्थिक विकास के मॉडल से गहरा संबंध है। इसमें बुनियादी चीज है हिन्दी की "शर्तयुक्त परिस्थिति"। यह "शर्तयुक्त परिस्थिति" क्या है ? मसलन्, केन्द्र सरकार के ऑफिस में हिन्दी में काम करना होगा इसके लिए हिन्दी अधिकारी,हिन्दी टाइपिस्ट आदि रखो। काम नहीं करना है तो कोई जरूरत नहीं है। चूंकि हिन्दी राजकाज की भाषा या राष्ट्रभाषा है तो हिन्दी के विभाग तो होने चाहिए। ये "शर्तयुक्त परिस्थिति" अपने आपमें पराधीनता की द्योतक हैं। यानी शर्तयुक्त परिस्थिति को सांस्कृतिक पराधीनता कहते हैं। इसमें काम करने वाले के सामने दो ही संभावनाएं बचती हैं ,प्रथम, परिस्थिति के अंतर्गत स्पष्ट विकल्पों में चयन,दूसरा, इस शर्तयुक्त परिस्थितियों को बदलकर कार्य की अन्य संभावनाओं की खोज करना। हिन्दीवालों ने पहली स्थिति में अपने को ढ़ाल लिया है,इसका दुष्परिणाम है कि हिन्दी आज जनता की कम सरकार भाषा के रूप में ज्यादा जानी जाती है। इसी स्थिति को ध्यान में रखकर रघुवीर सहाय ने एक बड़ी ही शानदार कविता लिखी है 'हिन्दी'- लिखा,
"हम लड़ रहे थे/समाज को बदलने के लिए एक भाषा का युद्ध/ पर हिन्दी का प्रश्न अब हिन्दी /का प्रश्न नहीं रह गया/हम हार चुके हैं/अच्छे सैनिक/अपनी हार पहचान/अब वह सवाल जिसे भाषा की लड़ाई हम कहते थे/ इस तरह पूछः/हम सब जिनकी ख़ातिर लड़ते थे/ क्या हम वही थे ?/या उनके विरोधियों के हम दलाल थे/- सहृदय उपकारी शिक्षित दलाल ?/आज़ादी के मालिक जो हैं ग़ुलाम हैं/उनके गुलाम हैं जो वे आज़ाद नहीं/हिन्दी है मालिक की/तब आजादी के लिए लड़ने की भाषा फिर क्या होगी ?/ हिन्दी की माँग/ अब दलालों की अपने दास-मालिकों से/एक माँग है/बेहतर बर्ताव की/अधिकार की नहीं/वे हिन्दी का प्रयोग अंग्रेजी की जगह/करते हैं/जबकि तथ्य यह है कि अंग्रेजी का प्रयोग/उनके मालिक हिन्दी की जगह करते हैं/दोनों में यह रिश्ता तय हो गया है/जो इस पाखण्ड को मिटाएगा/हिन्दी की दासता मिटाएगा
/वह जन वही होगा जो हिन्दी बोलकर/रख देगा हिरदै निरक्षर का खोलकर।"






सोमवार, 6 जून 2011

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कुछ कविताएं




 मैं नहीं चाहता- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
सड़े हुए फलों की पेटियों की तरह
बाजार में एक भीड़ के बीच मरने की अपेक्षा
एकान्त में किसी सूने वृक्ष के नीच
गिरकर सूख जाना बेहतर है।

मैं नहीं चाहता कि मुझे
झाड़-पोंछकर दूकान पर सजाया जाय,
दिन -भर मोल-तोल के बाद
फिर पेटियों में रख दिया जाय,
और फिर एक खरीदार से
दूसरे खरीदार की प्रतीक्षा में
यह जीवन अर्थहीन हो जाये।


जूता-1- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
मेरा जूता
जगह-जगह से फट गया है
धरती चुभ रही है
मैं रूक गया हूँ
जूते से पूछता हूँ-
' आगे क्यों नहीं चलते ?'
जूता पलटकर जबाब देता है-
' मैं अब भी तैयार हूँ
यदि तुम चलो !'
मैं चुप रह जाता हूँ
कैसे कहूँ कि मैं भी
जगह-जगह से फट गया हूँ।

जूता-2- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
जब से मैंने
नया जूता खरीदा है
मेरी चाल बदल गयी है
पर जमाने की चाल वही है।
दोस्त कहते हैं
मैं बायें पैर पर ज्यादा वजन डालने लगा हूँ
बात यह है
कि दाहिने पैर की तकलीफ टालने लगा हूँ;

जूता-3- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
उसने कहा-
मेरे जूते की पालिश में
तुम अपना चेहरा देख सकते हो।
मैंने तिलमिलाकर सोचा
वे लोग खुशनसीब हैं
जिनके चेहरे नहीं हैं।
फिर ख्याल आया
नहीं वे लोग भले आदमी हैं
जो जूते नहीं पहनते।

रसोई -सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
मैं नहीं जानता
भगौने में क्या पक रहा है ?
और उसके दिल में क्या ?
और क्या उनके विचारों में
जो बाहर सिर झुकाए बैठे हैं ?

केवल इतना जानता हूँ
भगौना गर्म है.
और वह आज उदास नहीं है,
और बाहर बैठे लोग कहीं जाने की
                       तैयारी कर रहे हैं।
वह बार -बार
कुछ गुनगुनाती है,
फिर भगौने का ढक्कन उठा
                     झाँकती है
और आग तेज करती है,
बाहर लोगों के जोर-जोर से
बोलने की आवाज आती हैः
'बहुत हो चुका,अब ऐसे नहीं चलेगा ?'

मैं नहीं जानता
इसके बाद क्या होगा ?






सुर्ख़ हथेलियाँ - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

पहली बार
मैंने देखा
भौंरे को कमल में
बदलते हुए,
फिर कमल को बदलते
नीले जल में,
फिर नीले जल को
असंख्य श्वेत पक्षियो में,
फिर श्वेत पक्षियों को बदलते
सुर्ख़ आकाश में,
फिर आकाश को बदलते
तुम्हारी हथेलियों में,
और मेरी आँखें बन्द करते।
इस तरह आँसुओं को
स्वप्न बनते...
पहली बार मैंने देखा।





पोस्टमार्टम की रिपोर्ट- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
गोली खाकर
एक के मुँह से निकला-
'राम' ।

दूसरे मुँह से निकला-
'माओ'।

लेकिन तीसरे के मुँह से निकला-
'आलू' ।

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है
कि पहले दो के पेट
भरे हुए थे।





भूख- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
जब भी
भूख से लड़ने
कोई खड़ा हो जाता है
सुन्दर दीखने लगता है।

झपटता बाज,
फन उठाये साँप,
दो पैरों पर खड़ी
काँटों से नन्हीं पत्तियाँ खाती बकरी,
दबे पाँव झाडियों में चलता चीता,
डाल पर उल्टा लटक
फल कुतरता तोता,
या इन सब की जगह
आदमी होता।

जब भी
भूख से लड़ने
कोई खड़ा हो जाता है
सुन्दर दीखने लगता है।




इन्तज़ार-सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

इंतजार
शत्रु है
उस पर यकीन मत करो।

वह जाने किन झाडि़यों
और पहाडि़यों में
घात लगाए बैठा रहता है
और हम पत्तियों की चरमराहट पर
कान लगाए रहते हैं।

इन्तज़ार
शत्रु है
उस पर यकीन करो।

वह छापामार सैनिक की तरह
खुद अँधेरे में रहता है
और हमें उजाले में खड़ा देखता रहता है,
मौके की तलाश में
और हम अँधेरे में टॉर्च की रोशनी ही
                         फेंकते रहते हैं।
इन्तज़ार
शत्रु है
उस पर यकीन मत करो।

वह हमें नदी बनाकर
हमारे बीच से ही
मछली की तरह अदेखा तैर जाता है
और हम लहरों के असंख्य हाथों से
उसे टटोलते रहते हैं।

इन्तज़ार
शत्रु है
उस पर यकीन करो।

उस से बचो।
जो पाना है फौरन पा लो,
जो करना है फौरन कर लो।

मंगलवार, 3 मई 2011

भ्रष्टाचार,क्रांति और साहित्य

राजनीति में भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है लेकिन साहित्य में यह कभी मुद्दा ही नहीं रहा। यहां तक संपूर्ण क्रांति आंदोलन के समय नागार्जुन ने भ्रष्टाचार पर नहीं संपूर्ण क्रांति पर लिखा,इन्दिरा गांधी पर लिखा। जबकि यह आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ था। क्या वजह है लेखकों को भ्रष्टाचार विषय नहीं लगता। जबकि हास्य-व्यंग्य के मंचीय कवियों ने भ्रष्टाचार पर जमकर लिखा है। साहित्य में भ्रष्टाचार की अनुपस्थिति इस बात का संकेत है कि लेखक इसे मसला नहीं मानते। दूसरा बड़ा कारण साहित्य का मासकल्चर के सामने आत्म समर्पण और उसके साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिश करना है। साहित्य में मूल्य,नैतिकता,परिवार और राजनीतिक भ्रष्टाचार पर खूब लिखा गया है लेकिन आर्थिक भ्रष्टाचार पर नहीं लिखा गया है। आर्थिक भ्रष्टाचार सभी किस्म के भ्रष्टाचरण की धुरी है। यह प्रतिवाद को खत्म करता है। उत्तर आधुनिक अवस्था का यह प्रधान लक्षण है।    इसकी धुरी है व्यवस्थागत भ्रष्टाचार। इसके साथ नेताओं में संपदा संचय की प्रवृत्ति बढ़ी है। अबाधित पूंजीवादी विकास हुआ है। उपभोक्तावाद की लंबी छलांग लगी है और संचार क्रांति हुई है। इन लक्षणों के कारण सोवियत अर्थव्यवस्था धराशायी हो गयी। सोवियत संघ और उसके अनुयायी समाजवादी गुट का पराभव हुआ। फ्रेडरिक जेम्सन के शब्दों में यह ‘आधुनिकीकरण की छलयोजना’ है। अस्सी के दशक से सारी दुनिया में सत्ताधारी वर्गों और उनसे जुड़े शासकों में पूंजी एकत्रित करने,येन-केन प्रकारेण दौलत जमा करने की लालसा देखी गयी। इसे सारी दुनिया में व्यवस्थागत भ्रष्टाचार कहा जाता है और देखते ही देखते सारी दुनिया उसकी चपेट में आ गयी। आज व्यवस्थागत भ्रष्टाचार सारी दुनिया में सबसे बड़ी समस्या है। पश्चिम वाले जिसे रीगनवाद,थैचरवाद आदि के नाम से सुशोभित करते हैं यह मूलतः 'आधुनिकीकरण की छलयोजना' है , इसकी धुरी है व्यवस्थागत भ्रष्टाचार।रीगनवाद-थैचरवाद को हम नव्य आर्थिक उदारतावाद के नाम से जानते हैं । भारत में इसके जनक हैं नरसिंहाराव-मनमोहन । यह मनमोहन अर्थशास्त्र है। भ्रष्टाचार को राजनीतिक मसला बनाने से हमेशा फासीवादी ताकतों को लाभ मिला है। यही वजह है लेखकों ने आर्थिक भ्रष्टाचार को कभी साहित्य में नहीं उठाया। भ्रष्टाचार वस्तुतः नव्य उदार आर्थिक नीतियों से जुड़ा है। आप भ्रष्टाचार को परास्त तब तक नहीं कर सकते जबतक नव्य उदार नीतियों का कोई विकल्प सामने नहीं आता।
    भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन प्रतीकात्मक प्रतिवादी आंदोलन रहे हैं।  इन आंदोलनों को सैलीब्रिटी प्रतीक पुरूष चलाते रहे हैं। ये मूलतःमीडिया इवेंट हैं। ये जनांदोलन नहीं हैं। प्रतीक पुरूष इसमें प्रमुख होता है। जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन से लेकर अन्ना हजारे के जन लोकपाल बिल आंदोलन तक इसे साफ तौर पर देख सकते हैं। मीडिया पुरूष हैं। इवेंट पुरूष हैं। इनकी अपनी वर्गीय सीमाएं हैं और वर्गीय भूमिकाएं हैं। प्रतीक पुरूषों के संघर्ष सत्ता सम्बोधित होते हैं जनता उनमें दर्शक होती है। टेलीविजन क्रांति के बाद पैदा हुई मीडिया आंदोलनकारियों की इस विशाल पीढ़ी का योगदान है कि इसने जन समस्याओं को मीडिया टॉक शो की समस्याएं बनाया है। अब जनता की समस्याएं जनता में कम टीवी टॉक शो में ज्यादा देखी -सुनी जाती हैं। इनमें जनता दर्शक होती है। इन प्रतीक पुरूषों के पीछे कारपोरेट मीडिया का पूरा नैतिक समर्थन है।  
     उल्लेखनीय है भारत को महमूद गजनवी ने जितना लूटा था उससे सैंकड़ों गुना ज्यादा की लूट नेताओं की मिलीभगत से हुई है। नव्य उदार नीतियों का इस लूट से गहरा संबंध है। चीन और रूस में इसका असर हुआ है चीन में अरबपतियों में ज्यादातर वे हैं जो पार्टी मेंम्बर हैं या हमदर्द हैं,इनके रिश्तेदारसत्ता में सर्वोच्च पदों पर बैठे हैं। यही हाल सोवियत संघ का हुआ। 
    भारत में नव्य उदारतावादी नीतियां लागू किए जाने के बाद नेताओं की सकल संपत्ति में तेजी से वृद्धि हुई है। सोवियत संघ में सीधे पार्टी नेताओं ने सरकारी संपत्ति की लूट की और रातों-रात अरबपति बन गए। सरकारी संसाधनों को अपने नाम करा लिया। यही फिनोमिना चीन में भी देखा गया। उत्तर आधुनिकतावाद पर जो फिदा हैं वे नहीं जानते कि वे व्यवस्थागत भ्रष्टाचार और नेताओं के द्वारा मचायी जा रही लूट में वे मददगार बन रहे हैं। मसलन गोर्बाचोव के नाम से जो संस्थान चलता है उसे अरबों-खरबों के फंड देकर गोर्बाचोव को रातों-रात अरबपति बना दिया गया। ये जनाव पैरेस्त्रोइका के कर्णधार थे। रीगन से लेकर क्लिंटन तक और गोर्बाचोब से लेकर चीनी राष्ट्रपति के दामाद तक पैदा हुई अरबपतियों की पीढ़ी की तुलना जरा हमारे देश के सांसदों-विधायकों की संपदा से करें। भारत में सांसदों-विधायकों के पास नव्य आर्थिक उदारतावाद के जमाने में जितनी तेजगति से व्यक्तिगत संपत्ति जमा हुई है वैसी पहले कभी जमा नहीं हुई थी। अरबपतियों-करोड़पतियों का बिहार की विधानसभा से लेकर लोकसभा तक जमघट लगा हुआ है। केन्द्रीयमंत्रियों से लेकर मुख्यमंत्रियों तक सबकी दौलत दिन -दूनी रात चौगुनी बढ़ी है। नेताओं के पास यह दौलत किसी कारोबार के जरिए कमाकर जमा नहीं हुई है बल्कि यह अनुत्पादक संपदा है जो विभिन्न किस्म के व्यवस्थागत भ्रष्टाचार के जरिए जमा हुई है। कॉमनवेल्थ भ्रष्टाचार, 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला आदि तो उसकी सिर्फ झांकियां हैं। अमेरिका मे भयानक आर्थिकमंदी के बाबजूद नेताओं की परिसंपत्तियों में कोई गिरावट नहीं आयी है। कारपोरेट मुनाफों में गिरावट नहीं आयी है। भारत में भी यही हाल है।
 इसी संदर्भ में फ्रेडरिक जेम्सन ने मौजूदा दौर में मार्क्सवाद की चौथी थीसिस में लिखा है इस संरचनात्मक भ्रष्टाचार का नैतिक मूल्यों के संदर्भ में कार्य-कारण संबंध के रूप में व्याख्या करना भ्रामक होगा क्योंकि यह समाज के शीर्ष वर्गों में अनुत्पादक ढंग से धन संग्रह की बिलकुल भौतिक सामाजिक प्रक्रिया में उत्पन्न होती है।    इस बात पर बल देना अनिवार्य है कि कार्य-कुशलता, उत्पादकता और वित्तीय संपन्नता जैसे संवर्ग तुलनात्मक हैं। अभिप्राय यह है कि उनके परिणामों की भूमिका उस क्षेत्र में आती है जिसमें अनेक असमान परिघटनाएं प्रतिस्पर्धा कर रही हों। अधिक कार्यकुशल और उत्पादक तकनीकी पुरानी मशीनरी और पुराने संयंत्र को तभी विस्थापित करती हैं, जब पुरानी मशीनरी और संयंत्र अधिक कार्यकुशल तथा आधुनिक तकनीकी के कार्यक्षेत्र में प्रवेश करते हैं और उनके साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं।
    इसी बात को सोवियत संघ के संदर्भ में आगे बढ़ाते हुए जेम्सन ने लिखा सोवियत संघ अकुशल हो गया और जब इसने अपने को 'विश्व-तंत्र' के साथ एकीकृत करने का प्रयास किया, तो यह विघटित हो गया क्योंकि विश्व-तंत्र आधुनिकता से उत्तरआधुनिकता की ओर अग्रसर था। यह एक ऐसा तंत्र था जो संचालन के नए नियमों के हिसाब से उत्पादकता की अतुलनीय द्रुत गति से दौड़ रहा था। वहीं सोवियत संघ में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिसकी इससे तुलना की जा सके। सांस्कृतिक अभिप्रेरकों (उपभोक्तावाद, नई सूचना प्रौद्योगिकी आदि) द्वारा प्रेरित, सुविचारित सामरिक-तकनीकी प्रतिस्पर्धा में आकृष्ट होकर, ऋण तथा तीव्र होते वाणिज्यिक सह-अस्तित्व के रूपों के प्रलोभन में आकर रूस एक ऐसे तत्व में प्रवेश कर गया जहां इसका अस्तित्व समाप्त हो गया। यह दावा किया जा सकता है कि सोवियत संघ और इसके अनुषंगी देश, जो अब तक अपने ही विशिष्ट दबाव क्षेत्र में अलग-अलग थे मानो किसी विचारधारात्मक सामाजिक, आर्थिक, भूगणितीय उभार (गुंबज) के नीचे दबे हों,इसने अविवेकपूर्ण ढंग से बिना अंतरिक्ष-पोशाक तैयार किए ही वायुबंध खोलना आरंभ कर दिया और इस प्रकार स्वयं को और अपने संस्थानों को बाह्य विश्व के तीव्र और अपरिमेय दबाव के हवाले कर दिया। इसके परिणाम की तुलना हम प्रथम परमाणु बम के विस्फोट से हुई उन तुच्छ ढांचों की हालत से कर सकते हैं जो इस बम विस्फोट के स्थल के सबसे नजदीक थे, या फिर उन असुरक्षित जीवों की हालत से कर सकते हैं जो समुद्र तल पर उपस्थित थे जब जल में उत्पन्न विकृत दबाव का भार उन पर पड़ा होगा, खासकर जब यह दबाव से ऊपर की ओर उठ रहा होगा। यह परिणाम वॉलरस्टीन की दूरदर्शितापूर्ण चेतावनी की पुष्टि करता है। उन्होंने कहा था कि सोवियत ब्लॉक ने अपनी महत्ता के बावजूद पूंजीवादी तंत्र के विकल्प के रूप में किसी तंत्र का निर्माण नहीं किया। बल्कि इसके भीतर एक तंत्र-विरोधी क्षेत्र या स्थान बनाया, जो अब स्पष्टतया समाप्त हो गया है। यदि शेष कुछ बचे हैं तो वे कुछ पॉकेट्स हैं जिनमें आज भी विविध समाजवादी प्रयोग किए जा रहे हैं।
उत्तर आधुनिकतावाद के दौर में क्रांति पर सबसे तेज हमले हुए हैं। इन हमलों के आंतरिक और बाह्य दोनों ही किस्म के रूप हैं। क्योंकि उत्तर आधुनिकता के दौर पर क्रांति की अवधारणा के खिलाफ जितना लिखा गया है उतना अन्य किसी अवधारणा के बारे में नहीं लिखा गया है। क्रांति संबंधी बहस का बृहत्तर रूप में गहरा संबंध सिद्धांत और व्यवहार की एकता के साथ है। इस प्रसंग में पहली बात यह कि क्रांति का वास्तव अर्थ इन दिनों विकृत हुआ है। उसका अवमूल्यन हुआ है। क्रांति का अर्थ परिवर्तन मान लिया गया है और प्रत्येक परिवर्तन को क्रांति कहने का रिवाज चल निकला है। क्रांति के अर्थ का यह विकृतिकरण है। क्रांति का अर्थ है बुनियादी या आमूल-चूल परिवर्तन। क्रांति पर बहस करते हुए आमतौर पर कुछ इमेजों,कुछ आख्यानों, कुछ देशों ,कुछ खास क्षण विशेष आदि का जिक्र किया जाता है। क्रांति पर बात करने के लिए उसे साम्यवादी और साम्यवादविरोधी विचारकों और प्रचार सामग्री के द्वारा निर्मित इमेजों से बाहर आकर देखने की जरूरत है।
      क्रांति अनंत क्षण में नहीं बल्कि समकालिक क्षण में घटित होती है। इसमें प्रत्येक चीज एक-दूसरे जुड़ी होती है। क्रांति का मतलब राजतंत्र या समाजतंत्र का ‘सुधार’ या ‘अल्प सुधार’ नहीं है क्रांति का मतलब किसी काल्पनिक मानसिक जगत में परिवर्तन से नहीं है। बल्कि इसका संबंध आमूल-चूल परिवर्तन से है। ये परिवर्तन एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हैं। क्रांति कोई बनी- बनायी परंपरा का निर्माण नहीं है। बल्कि मूलभूत परिवर्तनों का पुनरान्वेषण है। क्रांति कोई तयशुदा तर्कसंघर्ष नहीं है । इसी प्रसंग में प्रसिद्ध मार्क्सवादी फ्रेडरिक जेम्सन ने तीसरी थीसिस में लिखा है ,सामाजिक क्रांति अनंत समय का एक क्षण मात्र नहीं है। प्रत्युत समकालिक तंत्र में परिवर्तन की आवश्यकता की पुष्टि है, जिसमें हर चीज एक साथ है और एक दूसरे से अंतर्संबधित है। इस प्रकार का तंत्र संपूर्ण तंत्रगत परिवर्तन की मांग करता है, न कि अल्प 'सुधार', जिसे निंदात्मक अर्थ में 'मनोराज्य विषयक' कहा जाता है, जो भ्रामक है, व्यवहार्य नहीं। अभिप्राय यह है कि यह तंत्र वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के स्थान पर एक रैडिकल सामाजिक विकल्प की विचारधारात्मक दृष्टि की मांग करता है, ऐसा कुछ जिसे वर्तमान तर्कमूलक संघर्ष के अंतर्गत दिया हुआ या विरासत में मिला नहीं माना जाए, बल्कि जो पुनरान्वेषण की मांग करे। धार्मिक रूढ़िवाद (चाहे वह इसलामी, ईसाई, या हिंदू रूढ़िवाद हो) जो उपभोक्तावाद या 'अमरीकी जीवन शैली' का रैडिकल विकल्प देने का दावा करता है, तभी महत्वपूर्ण अस्तित्व प्राप्त करता है जब पारंपरिक वाम विकल्प खासकर मार्क्सवाद और साम्यवाद की महान क्रांतिकारी परंपराएं अचानक अनुपलब्ध प्रतीत होने लगती हैं। क्रांति एक प्रक्रिया है और समकालिक परवर्ती पूंजीवादी तंत्र का अवसान भी है। लेकिन इसका प्रस्थान बिंदु राष्ट्रीय सप्रभुता की रक्षा के सवालों से आरंभ होता है। परवर्ती पूंजीवाद के जमाने में राष्ट्रीय संप्रभुता ही दांव पर लगी है। किसी भी देश को स्वतंत्र रूप से अपनी नीतियां बनाने और विकास करने का हक नहीं है। क्रांतिकारी ताकतों का यह विश्व एजेण्डा है।क्रांतिकारी ताकतों का आंतरिक एजेण्डा है हाशिए के लोगों को उनकी जनवादी मांगों के इर्दगिर्द एकजुट करना। समाज में प्रत्येक व्यक्ति को संघर्ष की अवस्था में इस या उसके साथ खड़े होने,प्रतिबद्ध होने के लिए तैयार करना। परवर्ती पूंजीवाद ने गैर प्रतिबद्धता की हवा चला दी है,इस हवा को जनवादी प्रतिबद्धता के आधार पर ही चुनौती दी जा सकती है। आम लोगों को जनवादी विचारों के प्रति प्रतिबद्ध बनाना,हाशिए के लोगों की जनवादी मांगों के आधार पर एकजुट करना, उनके संगठनों और संघर्षों को आयोजित करना वास्तव अर्थों में क्रांति के मार्ग पर ही चलना है।






शनिवार, 30 अप्रैल 2011

रघुवीर सहाय की 12 कविताएं







उसका रहना

रोज़ सुबह उठकर पाते हो उसको तुम घर में

इससे यह मत मान लो वह हरदम मौजूद रहेगी/"



  बेटे से
 
टूट रहा है यह घर जो तेरे वास्ते बनाया था
जहाँ कहीं हो आ जाओ... 
नहीं यह मत लिखो लिखो जहाँ हो वहीं अपने को टूटने से बचाओ
हम एक दिन इस घर से दूर दुनिया के कोने में कहीं
बाहें फैलाकर मिल जाएँगे।


भ्रम निवारण

तुम क्या समझते हो कि
हर लड़की जो मुझे देखकर 
मुस्कुराती है मेरी पहचानी है
नहीं,वह तो सिर्फ 
अपनी दुनिया में मस्त रहती है।


ग़रीबी

 हम गरीबी हटाने चले
और उस समाज में जहाँ आज भी दरिद्र होना दीनता नहीं
भारतीयता की पहचान है,दासता विरोध है दमन का प्रतिकार है
हम ग़रीबी हटाने चले
हम यानी ग़रीबों से नफ़रत हिकारत परहेज़ करनेवाले
 हम गरीबी हटाते हैं तो ग़रीब का आत्म सम्मान लिया करते हैं
इसलिए मैं तो इस तरह ग़रीबी हटाने की नीति के विरूद्ध हूं
क्योंकि वही तो कभी-कभी अपने सम्मान की अकेली 
रचना रह जाती है।


ख़तरा

 एक चिटका हुआ पुल है
एक रिसता हुआ बाँध है
ज़मीन के नीचे बढ़ता हुआ पानी है
ख़तरे में राम ख़तरे में राजधानी है
पहले खुदा के यहाँ देर थी अँधेर न था
अब खुदा के यहाँ अंधेर है और उसमें देर नहीं।



 नहीं छापते 
अपना लिखा बार बार पढ़ मुझे बल बहुत मिलता है
और यह अफ़सोस बिल्कुल नहीं होता कि लिखना बेकार था
मेरे लिखे को कभी कुछ लोग दुबारा छाप भी देते हैं
उद्धृत कर देते हैं उनमें से वे अंश जो आज के समाज में
सत्ता केशीर्ष के नज़दीक निरापत्ति दिखते हैं
किंतु उन निष्कर्षों को नहीं छापते जो मेरे तर्क से 
निःसृत थे ।

हिन्दी 

 पुरस्कारों के नाम हिंदी में हैं
हथियारों के अंग्रेज़ी में 
युद्ध की भाषा अंग्रेजी है 
विजय की हिन्दी



 बिखरना

 कुछ भी रचो सबके विरूद्ध होता है
इस दुनिया में जहाँ सब सहमत हैं
क्या होते हैं मित्र कौन होते हैं मित्र
जो यह ज़रा सी बात नहीं जानते
अकेले लोगों की टोली/देर तक टोली नहीं रहती
वह बिखर जाती है रक्षा की खोज में
रक्षा की खोज में पाता है हर एक
अपनी अपनी मौत


मेरे अनुभव
 - कितने अनुभवों की स्मृतियाँ
ये किशोर मुँह जोहते हैं सुनने को
पर मैं याद कर पाता हूँ तो बताते हुए डरता हूँ
कि कहीं उन्हें पथ से भटका न दूँ
 मुझे बताना चाहिए वह सब
जो मैंने जीवन में देखा समझा
परन्तु बहुत होशियारी के साथ
मैं उन्हें अपने जैसा बनने से बचाना चाहता हूँ।


निंदा
 तुम निंदा के जितने वाक्य निंदा में कहते हो
वे निंदा नहीं रह गए हैं और केवल तुम्हारी
घबराहट बताते हैं।


 अकेला

 लाला दादू दयाल दलेला थे
जेब में उनकी जितनी धेला थे
उनके लिए सब माटी के ढ़ेला थे
ज़िन्दगी में वे बिल्कुल अकेला थे।



डर

 'बढ़िया -अँग्रेज़ी वह आदमी बोलने लगा
जो अभी तक मेरी बोली बोल रहा था
 मैं डर गया ।

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

मनमोहन की 8 कविताएं



                             कविवर मनमोहन
भारतीय संस्कृति- मनमोहन
पहले पहल जब हमने सुना
चमड़े का वॉशर है
तो बरसों बरस नल का पानी नहीं पिया

तब कुओं-बावडि़यों पर हमारा कब्ज़ा था
जो आख़िर तक बना रहा

हमने कुएँ सुखा दिए
पर ऐरों-गैरों को फटकने न दिया
अब भी कायनात में पीने योग्य
जितना पानी बचा है
दलितों की बस्ती की ओर रूख करे इससे पहले
हमीं खींच लेते हैं

हमारे विकास ने जो ज़हर छोड़ा
ज़मीन की तहों में बस गया है

बजबजाते हुए हमारे विशाल पतनाले
हमारी विष्ठा हमारा कूड़ा और हमारा मैल लिए
सभ्यता की बसावट से गुजरते हैं
और नदियों में गिरते हैं
जिन्होने बहना बंद कर दिया है

कितना महान सांस्कृतिक दृश्य है कि
हत्याकांड सम्पन्न करने के बाद हत्यारा भीड़ भरे
घाट पर आता है
और संस्कृत में धारावाहिक स्तोत्र बोलता हुआ
रूकी हुई यमुना के रासायनिक ज़हर में
सौ मन दूध गिराता है



हाय सरदार पटेल ! - मनमोहन
 सरदार पटेल होते तो ये सब न होता
कश्मीर की समस्या का तो सवाल ही नहीं था
ये आतंकवाद वातंकवाद कुछ न होता
अब तक मिसाइल दाद चुके होते
साले सबके सब हरामज़ादे एक ही बार में ध्वस्त हो जाते
सरदार पटेल होते तो हमारे देश में
हमारा इस तरह अपमान न होता !
ये साले हुसैन वुसैन
और ये सूडो सेकुलरिस्ट
और ये कम्युनिस्ट वमुनिस्ट
इतनी हाय तौबा मचाते !
हर कोई ऐरे गैरे साले नत्थू खैरे
हमारे सर पर चठ़कर नाचते !
आबादी इस कदर बढ़ती !
मुट्ठीभर पढ़ी लिखी शहरी औरतें
 इस तरह बक बक करतीं !
सच कहें,सरदार पटेल होते
तो हम दस बरस पहले प्रोफेसर बन चुके होते !



चर्बी महोत्सव- मनमोहन

जिस तरह प्लास्टिक और पॉलीथिन हमारी नई सभ्यता है
जो अजर अमर हो गई है
चर्बी हमारी नई कल्चर है
जो इतनी नई भी नहीं

आप देख सकते
यह हमारी आँखों के आसपास सहज ही जमा हो जाती है
या गालों पर
या गलफड़ों में उतर आती है

दरअसल, हम चर्बी से बेहाल हुए जाते हैं
हमारी हँसी में चर्बी है
हमारे चुटकुलों में भी यह कम नहीं
बातों में बातें कम चर्बी ज्या़दा है
हाँ, बस रोना चाहें तो ढ़ंग से रो नहीं सकते

समझिए कि एक महोत्सव है

ख़ूबसूरत औरतें और क़ामयाब मर्द सब एक जगह
एक झुरमुट में व्यस्त हैं
लुक़मा चबलाते
बार-बार कन्धे उचकाते हैं

हमारा संप्रभु राष्ट्र-राज्य यही है
और इनके दायरे के बाहर सब दुश्मन देश

देखिए हमारे गोलमटोल बच्चे
जो कल को प्रबन्ध हाथ में लेंगे
अभी किस तरह तुतलाकर दिखलाते हैं
किस तरह खेल-खेल में वे कीटाणुओं को खदेड़ कर
भगा देते हैं और उनके दाँत कैसे चमकते हैं !

देववाणी -मनमोहन

अड़ियल चट्टानों को ढहा दिया जाएगा
डाइनामाइट लगा दिया जाएगा
ढेलों पर पाटा चला दिया जाएगा

चौरस बनेगा
चौरस
हमारा या आर्यावर्त

बिना कोनों वाला
बिना नोकों वाला

इसे टिकाएंगे हम

हम आर्यपुत्र
हम अमृतपुत्र
इसे टिकाएँगे इसे टिकाएँगे
तलवार की नोंक पर 


जिन्होंने मरने से इन्कार किया- मनमोहन

जिन्होंने मरने से इन्कार किया
और जिन्हें मार कर गाड़ दिया गया
वे मौका लगते ही चुपके से लौट आते हैं
और ख़ामोशी से हमारे कामों में शरीक हो जाते हैं

कभी-कभी तो हम घंटों बातें करते हैं
या साथ साथ रोते हैं

खा खाकर मर चुके लोगों को यह बात पता चलनी
जरा मुश्किल है
जो बड़ी तल्लीनता से अपने भव्य मकबरे बनाने
और अधमरे लोगों को ललचाने में लगे हैं


फिर भी मेरा क्या भरोसा- मनमोहन

मैं साथ लिया जा चुका हूँ
फ़तह किया जा चुका हूँ


फिर भी मेरा क्या भरोसा !

बहुत मामूली ठहरेंगी मेरी इच्छाएँ

औसत दर्जे़ के विचार
ज्यादातर पिटे हुए

मेरी याददाश्त भी कोई अच्छी नही

लेकिन देखिए ,फिर भी,कुत्ते मुझे सूँघने आते हैं
और मेरी तस्वीरें रखी जाती हैं



ईश वन्दना- मनमोहन

धन्य हो परमपिता ‍!

सबसे ऊँचा अकेला आसन
ललाट पर विधान का लेखा
ओंठ तिरछे
नेत्र निर्विकार अनासक्त
भृकुटि में शाप और वरदान
रात और दिन कन्धों पर
स्वर्ग इधर नरक उधर

वाणी में छिपा है निर्णय

एक हाथ में न्याय की तुला
दूसरे में संस्कृति की चाबुक

दूर -दूर तक फैली है
प्रकृति

साक्षात पाप की तरह।


ग़लती ने राहत की साँस ली
 उन्होंने झटपट कहा
हम अपनी ग़लती मानते हैं
ग़लती मनवाने वाले खुश हुए
कि आख़िर उन्होंने ग़लती मनवा कर ही छोड़ी
उधर ग़लती ने राहत की साँस ली
कि अभी उसे पहचाना नहीं गया















सोमवार, 4 अप्रैल 2011

मनमोहन की कुछ बेहतरीन कविताएं

कार्तिक-स्नान

एक ही दिन

एक ही मुहुर्त में

हत्यारे स्नान करते हैं

हज़ारों-हज़ार हत्यारे

सरयू में,यमुना में

गंगा में

क्षिप्रा ,नर्मदा और साबरमती में

पवित्र सरोवरों में

संस्कृत बुदबुदाते हैं और

सूर्य को दिखा -दिखा

यज्ञोपवीत बदलते हैं

मल-मलकर गूढ संस्कृत में

छपाछप छपाछप

ख़ूब हुआ स्नान

छुरे धोए गए

एक ही मुगूर्त में

सभी तीर्थों पर

नौकरी न मिली हो

लेकिन कई खत्री तरूण क्षत्रिय बने

और क्षत्रिय ब्राह्मण

नए द्विजों का उपनयन संस्कार हुआ

दलितों का उद्धार हुआ

कितने ही अभागे कारीगरों-शिल्पियों

दर्जि़यो,बुकरों,पतंगसाज़ों,

नानबाइयों,कुंजड़ों और हम्मालों का श्राद्ध हो गया

इसी शुभ घड़ी में

(इनमें पुरानी दिल्ली का एक भिश्ती भी था)

पवित्र जल में धुल गए

इन कम्बख़्तों के

पिछले अगले जन्मों के

समस्त पाप

इनके ख़ून के साथ-साथ

और इन्हें मोक्ष मिला

धन्य है

हर तरह सफल और

सम्पन्न हुआ

हत्याकांड


संचार की नई अवस्था

यह लीजिए जनाब लम्बा चक्कर लगा कर

एक बार फिर हम लोग

उसी जगह आते हैं

जो रास्ते पहले छोड़ दिए थे

खाई बन कर हमारे समाने हैं

जितना एक-दूसरे को देखते हैं

उससे कहीं ज्य़ादा बीच की खाई को

बातें भी एक-दूसरे से कम
ख़ाई से ज्य़ादा करते हैं
जैसे अब खाई ही अकेली पुल बची है


सिर्फ़ अपने-अपने शरीर लेकर 

जैसे वे सिर्फ़ अपने-अपने शरीर लेकर

चली आई हों इस दुनिया में

वे जानती हैं

हमारे पास कैमरे हैं

स्वचालित बहुकोणीय दसों दिशाओं में मुँह किए

जो हर पल उनकी तस्वीरें भेजते हैं

जिन्हें कभी भी प्रकाशित कर सकते हैं

कितनी सावधान वे गुज़रती हैं

मुस्कुराती हुई एक-एक हमारी दुनिया से

जैसे खचाखच भरे किसी जगमगाते स्टेडियम से

अकेले गुज़रती हों

 
सहमति का दौर-

टेढ़े रास्ते सीधे हो रहे हैं

टेढ़े लोग सीधे हो रहे हैं

कोई रूकावट नहीं

न कोई मोड़ है

कोई दो ओर नहीं

सब कहीं सुविधा है

इनकार की जरूरत क्या

थोड़ा -सा इसरार काफ़ी

क्योंकि कोई और नहीं

क्योंकि कोई गै़र नहीं

सब अपने हैं

कोई ऐसा इंतज़ार नहीं

जो हमें विकल कर दे

या तोड़ दे

किसी को कहीं से आना नहीं है

किसी को कहीं जाना नहीं है

बस प्रेम से रहना है

देखिए कमाल

एक राह से एक ही राह निकलती है

कोई दो राहें नहीं निकलतीं

एक बात से एक ही बात निकलती है

कोई दो बातें नहीं निकलतीं

अक्सर एक ही बात

अपने दो नमूने बना लेती है

जिससे बात रह जाती है
सच्चाई बस एक है
बाकी उदाहरण हैं

सहमति बुनियादी है

असहमति तो ऐसे ही है

जिससे सहमति घटित होती दिखाई दे

पहले ही जबाब इतना मौजूद है

कि सवाल पैदा ही नहीं होता

कैसी फुर्ती है

कि समस्या बनने के पहले ही

समाधान हाज़िर हो जाता है
जितना विवाद नहीं

उससे कहीं ज़्यादा बिचौलिए हैं

दलीलें,मिसालें,सुबूत

सब एक तरफ हैं

गवाह ,वकील, मुवक्किल,

मुंसिफ़ यहाँ तक कि मुद्दई

सब एक तरफ़



हमारा जातीय गौरव



आधी से ज्य़ादा आबादी

जहाँ ख़ून की कमी की शिकार थी

हमने वहाँ खून के खुले खेल खेले

हर बड़ा रक्तपात

एक रँगारँग राष्ट्रीय महोत्सव हुआ

हमने खूब बस्तियाँ जलाईं

और ख़ूब उजाला किया

और छत पर चढ़कर चिल्लाकर कहा

देखो,दुनिया के लोगो

देखो हमारा जातीय गौरव !


भारतीय संस्कृति

पहले पहल जब हमने सुना

चमड़े का वॉशर है

तो बरसों बरस नल का पानी नहीं पिया

तब कुओं-बावडि़यों पर हमारा कब्ज़ा था

जो आख़िर तक बना रहा

हमने कुएँ सुखा दिए

पर ऐरों-गैरों को फटकने न दिया

अब भी कायनात में पीने योग्य

जितना पानी बचा है

दलितों की बस्ती की ओर रूख करे इससे पहले

हमीं खींच लेते हैं

हमारे विकास ने जो ज़हर छोड़ा

ज़मीन की तहों में बस गया है
बजबजाते हुए हमारे विशाल पतनाले

हमारी विष्ठा हमारा कूड़ा और हमारा मैल लिए

सभ्यता की बसावट से गुजरते हैं

और नदियों में गिरते हैं

जिन्होने बहना बंद कर दिया है

कितना महान सांस्कृतिक दृश्य है कि

हत्याकांड सम्पन्न करने के बाद हत्यारा भीड़ भरे
                                                                                                                    
घाट पर आता है

और संस्कृत में धारावाहिक स्तोत्र बोलता हुआ

रूकी हुई यमुना के रासायनिक ज़हर में

सौ मन दूध गिराता है


हाय सरदार पटेल ! 

सरदार पटेल होते तो ये सब न होता

कश्मीर की समस्या का तो सवाल ही नहीं था

ये आतंकवाद वातंकवाद कुछ न होता

अब तक मिसाइल दाद चुके होते

साले सबके सब हरामज़ादे एक ही बार में ध्वस्त हो जाते

सरदार पटेल होते तो हमारे देश में

हमारा इस तरह अपमान न होता !

ये साले हुसैन वुसैन

और ये सूडो सेकुलरिस्ट

और ये कम्युनिस्ट वमुनिस्ट

इतनी हाय तौबा मचाते !

हर कोई ऐरे गैरे साले नत्थू खैरे

हमारे सर पर चठ़कर नाचते !

आबादी इस कदर बढ़ती !

मुट्ठीभर पढ़ी लिखी शहरी औरतें

इस तरह बक बक करतीं !

सच कहें,सरदार पटेल होते

तो हम दस बरस पहले प्रोफेसर बन चुके होते !



विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...