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सीमेंट के कार्टेल कारोबारियों पर 6,300 करोड़ का जुर्माना

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भारत में नव्य आर्थिक उदार नीतियों के गंभीर दुष्परिणाम आने लगे हैं। बाजार की चालक शक्तियों के कामकाज में सरकार की हस्तक्षेप न करने की नीति का यह परिणाम निकला है कि अब एक ही क्षेत्र में व्यापार करने वाली बड़ी कंपनियां आपस मिलकर समूह या कार्टेल बनाकर कारोबार कर रही हैं। इस तरह का कारोबार एकाधिकार विरोधी भारतीय कानूनों की नजर में अवैध है। लेकिन बड़े पूंजीपतियों का कार्टेल बनाकर कारोबार करना जारी है। इसके जरिए वे अवैध ढ़ंग से आम उपभोक्ता से मनमाने दाम वसूल रहे हैं। कायदे से कार्टेल बनाकर काम करने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माना ठोंकने के साथ दंड़ स्वरूप उनके कारोबार को बंद कर दिए जाने का कानूनी प्रावधान होना चाहिए।

भारत की यह ठोस वास्तविकता है कि यहां इजारेदारी एवं एकाधिकार विरोधी कानून हैं इन पर निगरानी और दंड देने वाली न्यायिक व्यवस्था भी है इसके बावजूद एकाधिकार के विस्तार को रोकने में सरकार और कानून असफल रहे हैं। हाल ही में सीमेंट कंपनियों का कार्टेल बनाकर व्यापार करने का मामला सामने आया है।जिसके तहत कम्पटीशन कमीशन ऑफ इण्डिया ने 11 सीमेंट कंपनियों के ऊपर 6,300 करोड़ रूपये का जुर्मान…

साहित्य में घिसापिटापन और अशोक वाजपेयी की नकली चिन्ताएं

आलोचक अशोक वाजपेयी को यह इलहाम हुआ है कि हिन्दी की गोष्ठियों में घिसापिटापन होता है। सवाल यह है कि उस घिसेपिटेपन से बचने के लिए हिन्दी के प्रायोजकों और गुटबाज लेखकों ने क्या किया ?पहले अशोक वाजपेयी की महान खोज पर ध्यान दें। उन्होंने लिखा है-

"हम सभी इसके दोषी हैं। हिंदी जगत में हर महीने गोष्ठियां, परिसंवाद आदि होते हैं। हम ही उन्हें आयोजित करते हैं, हम ही उनमें कष्ट उठाकर यात्रा की दिक्कतें झेलते हुए भाग लेते हैं। हम ही उनसे खीझते-ऊबते हैं। हम ही उनकी निरर्थकता या अप्रासंगिकता को हर बार खासे तीखेपन से महसूस करते हैं। इस सबके बावजूद हम ही उनकी प्रतीक्षा करते हैं; उनके लिए सलाह देते हैं; फिर उनमें हिस्सेदारी करते हैं। बहुत सारे शहरों या संस्थाओं में ऐसे सेमिनार वहां होने वाली एकमात्र सार्वजनिक गतिविधियां, साहित्य को लेकर, होती हैं। वे भी न हों तो वहां साहित्यिक माहौल में सन्नाटा छाया रहे। इसलिए उनका कुछ औचित्य, कुछ आधार बनता है।"

साहब ,आप महान हैं ,पहले घिसेपिटे कार्यक्रम में जाते हैं, उनसे ऊबते हैं।उनकी प्रतीक्षा करते हैं और फिर उसका श्राद्ध करते हैं और अंत में औचित्य भी…

ब्रात्य बसु की कल्पनाशीलता के शिक्षा में नए रंग

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रंगकर्मी-अध्यापक ब्रात्य बसु को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक साल पहले उच्चशिक्षामंत्री बनाकर शिक्षा में परिवर्तन का जो सपना देखा था उसके अभीप्सित फल पाने आरंभ हो गए हैं। ब्रात्य बसु की रंगकर्मी के नाते सर्जनात्मक मेधा धीरे धीरे रंग दिखाने लगी है। उच्चशिक्षा के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन करने में ब्रात्य बसु को सफलता मिली है इससे पश्चिम बंगाल के अकादमिक जगत में शांति और स्वायत्तता का माहौल लौटा है। अकादमिक परिवर्तनों के प्रति आम शिक्षक का विश्वास भी लौटा है।

पश्चिम बंगाल का सारे देश में बेहतरीन शिक्षा व्यवस्था के लिए सुनाम रहा है। वाममोर्चा के 34 साल के शासन में इस सुनाम में कुछ कमी आई ,लेकिन शिक्षा का माहौल मोटेतौर पर सारे देश की तुलना में बेहतर रहा है। अकादमिक नियुक्तियों में अनेकबार शिकायतें आईं ,लेकिन वाममोर्चा सरकारों ने उन शिकायतों की बार -बार अनदेखी की। यदि अनदेखी न करके समय रहते हस्तक्षेप किया जाता तो बेहतर परिणाम आने की संभावनाएं थीं। इसके बाबजूद सन् 1977 में वामशासन आने के बाद अकादमिक जगत में व्याप्त अराजकता,मनमानी और राजनीतिक हस्तक्षेप पर पाबंदी लगी। कक्षाए…

फेसबुक सूक्तियां

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कलाकार प्रशिक्षित होता है ।लेकिन फेसबुक यूजर न तो कलाकार है और न प्रशिक्षित है ,वह तो यूजर है।

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कलाओं में कुछ भी रचसकते हैं और उससे मुक्त भी हो सकते हैं। फेसबुक में यह संभव नहीं है। फेसबुक कला नहीं है।

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कलाकार और फेसबुक यूजर में यह साम्य है ,ये दोनों यथार्थ से जुड़े हैं और यथार्थ को व्यक्त करते हैं।कलाकार और फेसबुक यूजर दोनों आज सामाजिक शक्ति नहीं हैं।

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जिस तरह हर व्यक्ति कलाकार होता है, उसी तरह हर व्यक्ति नेट यूजर हो सकता है।

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जिस तरह कलाकार-लेखक और इनकी रचना के बीच में यह समझौता है कि वे एक-दूसरे से यह नहीं पूछते कि कहां जा रहे हो, इसी तरह फेसबुक यूजर और फेसबुक के बीच में यह समझौता है कि वे एक दूसरे से नहीं पूछते कि कहा…

ममता की सामंती दरियादिली में अटके एक हजार राजनीतिक बंदी

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मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की दरियादिली सामंती पापुलिज्म का हिस्सा है। यह सामंती जश्न और दरबारी संस्कृति से जुड़ी है। यह एक अ-राजनीतिक फिनोमिना है। इसका लोकतांत्रिक उदारतावाद से कम सामंती उत्सवधर्मी मानसिकता से ज्यादा संबंध है। इस मानसिकता का आदर्श नमूना है कोलकाता नाइट राइडर का अभिनंदन समारोह और नजरूल अकादमी का फैसला। 
कोलकाता नाइट राइडर के सिर पर आईपीएल चैम्पियनशिप की जीत का सेहरा बंध जाने से देश में खुशी कम ममता बनर्जी और उनके प्रशासन में खुशी ज्यादा दिखाई दी। कोलकाता नाइट राइडर में कोलकाता नाम के अलावा कोलकाता का कुछ भी नहीं है।यहां तक कि इस टीम में कोई बंगाली खिलाड़ी तक नहीं है। इसके बावजूद ममता बनर्जी ने इस निजीटीम का शानदार जन-अभिनंदन किया और लाखों रूपये खर्च करके अपने उल्लास और दरियादिली का प्रदर्शन किया।राजनीतिक हलकों ने इसे अपव्यय माना।

ममता बनर्जी की सामंती दरियादिली का दूसरा उदाहरण है नजरूल अकादमी का फैसला । इसके तहत उन्होंने इंदिराभवन की बजाय राजारहाट में नजरूल अकादमी का शिलान्यास किया। उल्लेखनीय है ममता बनर्जी ने सत्ता में आते ही मनमाने ढ़ंग से यह फैसला लिया कि स…