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मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

बंदूक सबके पास है-

               राज्य और केन्द्र में सत्ता भाजपा के पास पूर्ण बहुमत है।छत्तीसगढ़ में सालों से पुलिस कार्रवाई हो रही है।नोट स्ट्राइक से सर्जीकल स्ट्राइक तक सब कुछ कर चुके हो,यह भी कह चुके हो,छत्तीसगढ़ और दूसरे इलाकों में नक्सलवाद की कमर तोड़ दी,नक्सल बर्बाद कर दिए,फिर यह अचानक 300 नक्सलों ने सीआरपीएफ पर हमला कैसे कर दिया मोदीजी ?
सीआरपीएफ के अनेक जवान नक्सली हमले में मारे गए हैं,हम सब दुखी हैं ,इस हमले की निंदा करते हैं,लेकिन जब सीआरपीएफ के हमले से नक्सली मारे जाते हैं या फिर उन पर बेइंतिहा पुलिस जुल्म होते हैं,झूठे केस लगाकर उनको फंसाया जाता है तब भी हमें तकलीफ होती है।
देश के लिए पुलिस-सेना के जवान जितने महत्वपूर्ण हैं आदिवासी नक्सली भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं,आदिवासियों की हजारों एकड़ जमीन बंदूक की नोंक पर छीनी जाएगी तो वे बंदूक का जवाब फूलों की माला पहनाकर नहीं देंगे।बंदूकें सबके पास हैं।
आदिवासियों की बंदूक की नोक पर बेदखली बंद करो,आदिवासियों को न्याय और सुरक्षा दो,हम भी देखते हैं नक्सल कैसे हमले करते हैं !
नक्सलों को आदिवासियों में हीरो तो भाजपा की गलत नीतियों ने बनाया है,पहले यही काम कांग्रेस कर रही थी।
आदिवासी हों या नक्सल हों या माओवादी हों ,वे सब वैसे ही भारत के नागरिक हैं जैसे सेना-सीआरपीएफ -कारपोरेट घराने आदि।लेकिन भाजपा सरकार के नजरिए में सेना-कारपोरेट घराने-सीआरपीएफ आदि तो प्रिय हैं लेकिन अन्य अप्रिय हैं,शत्रु हैं,उनको न्याय पाने का हक नहीं है।इस तरह एक आंख से यदि सरकार देखेगी और अन्याय करेगी तो आदिवासियों और नक्सलों का प्रतिवाद थमने वाला नहीं है।
नक्सली प्रतिवाद को टीवी पर विजय का डंका बजाकर,फेसबुक पर बटुकसंघ के साइबरसैनिकों से हमला कराके परास्त नहीं किया जा सकता।कम से कम मोदीजी इतना तो जान लो आपसे या रमनजी की सरकार से छत्तीसगढ़ के आदिवासी खुश नहीं हैं,आदिवासियों की संकट की घड़ी में राज्य सरकार को मदद करनी चाहिए लेकिन हो उलटा रहा है,फलतःआदिवासियों की मदद करने का नक्सलों को मौका मिला है।आदिवासियों में नक्सलों का सांगठनिक विस्तार हुआ है,मोदीजी आपकी और रमन सरकार की नक्सलवादियों के बारे में की गयी सभी घोषणाएं झूठी साबित हुई हैं।आपके और रमन सरकार का आदिवासियों पर कोई असर नहीं है,कोई आदिवासी आप पर विश्वास नहीं करता।आदिवासियों का घर उजाड़कर भाजपा-आरएसएस-कारपोर्ट घरानों का घर बसाया नहीं जा सकता।

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

कोलकाता में गाली,हिंसा और बम


     कल मैं बंगला टीवी चैनल पर टीएमसी सांसद और अभिनेता तापस पाल को हिंसक भाषा में भाषण देते हुए देख रहा था तो मन में सोच रहा था कि बंगाली जाति के कितने बुरे दिन आ गए हैं कि उनके आइकॉन आम जनता में  हिंसक भाषा में बोल रहे हैं और दर्शक तालियां बजा रहे हैं।
     बंगाली जाति मधुरभाषी,सांस्कृतिकतौर पर सभ्यजाति है। इसमें हिंसकभाषा कहां से आई ? बंगाली जाति के नेता भारत में सभ्यता और राजनीति के सिरमौर रहे हैं और देश उनको बड़े ही सम्मान की नजर से देखता रहा है। लेकिन अब ऐसा नहीं है।
   सांसद तापस पाल की भाषा इतनी खराब और दबंगई से भरी थी कि ममता सरकार में शिक्षामंत्री पार्थ चटर्जी तक ने इस तरह की भाषा के इस्तेमाल पर आपत्ति प्रकट की। नेता हो या नागरिक , गाली और हिंसा की भाषा में बोलना तो अपराध है, असभ्यकर्म है।
      प.बंगाल में गाली,हिंसा और बम की राजनीति में गहरा संबंध है ।  हिंसा हमेशा गाली की भाषा के दरवाजे से ही दाखिल होती है। राजनीति में गाली की भाषा कब आती है और कब वह हिंसा में तब्दील हो जाती है इसका ठीक से अध्ययन तो हमारे समाज में नहीं हुआ लेकिन यह सच है कि गाली और हिंसा जुड़वां बहनें हैं। ये दोनों बहनें तब जन्म लेती हैं जब समाज में कर्मसंस्कृति का क्षय होता है।परजीवी और पराजित मनोदशा में गाली और हिंसा जन्म लेती है।
     पश्चिम बंगाल में जिसे नक्सलबाडी आंदोलन कहते हैं वह इस राज्य के सांस्कृतिक-राजनीतिक पतन का प्रस्थान बिंदु है। पश्चिम बंगाल में हिंसाचार का श्रीगणेश यहीं से होता है। धमकी,गाली,बम,क्रांति की गजब खिचडी इस बीच पकी है। इसमें बौद्धिकों ने सुविधानुसार क्रांति और वाम राजनीति को पॉजिटिव तत्व के रुप में छांट लिया लेकिन अन्य चीजों को छोड़ दिया।
     क्रांति या वामराजनीति में गाली,घृणा (पूंजीपति और सामंती तत्त्वों के प्रति घृणा) को इस हद तक विकसित किया गया कि उसने सामाजिक-राजनीतिक संतुलन में बदलाव की प्रक्रिया को तेज कर दिया। हमारे अनेक वामपंथी मित्र यह पढ़कर नाराज भी हो सकते हैं लेकिन सच तो यही है कि लोकतंत्र में घृणा का कोई स्थान नहीं है। आप अपने वर्गशत्रु से भी नफरत नहीं कर सकते। लोकतंत्र में सबके लिए स्थान है।अमीर के लिए भी और गरीब के लिए भी। पूंजीपति और बड़े जमींदारों के खिलाफ घृणा का सिलसिला अंततःगाली के मार्ग से गुजरते हुए हिंसा और बम के मार्ग तक गया। इसके कारण पहले निजी हिंसा को वैध बनाया गया,बाद राजनीतिक हिंसा भी वैध हो गयी,फिर पुलिस हिंसा भी वैध मान ली गयी।
    हमलोग अपनी सुविधा से हिंसा में अंतर करने लगे, तेरी हिंसा और मेरी हिंसा में पाप-पुण्य खोजने लगे। अपने दल की हिंसा को हिंसा न मानकर आत्मरक्षा में उठाया कदम मानने लगे।
    जबकि हिंसा तो हिंसा है और वह लोकतंत्र का विलोम है। इसी तरह घृणा तो घृणा है वह सभ्यता और लोकतंत्र का विलोम है। वर्गीय घृणा पैदा करके वोट जुटाए जा सकते हैं, सीटें जीती जा सकती हैं। सत्ता पा सकते हो लेकिन सभ्यता के क्षय को नहीं रोक सकते।
   वाममोर्चा निरंतर अपार बहुमत हासिल करके भी हिंसा को नहीं रोक पाया। इसका प्रधान कारण वही है जिसका मैंने जिक्र किया है। लोकतंत्र में हिंसा,गाली और घृणा की कोई जगह नहीं है। यदि लोकतंत्र के सारथी  हिंसा,गाली और घृणा के रथ पर सवार होकर आएंगे तो लोकतंत्र में सभ्यता के क्षय और हिंसा के विस्तार को रोक नहीं सकते। पश्चिम बंगाल में वस्तुतः यही हुआ है।
    हिंसा को हर दल ने वैध बनाया,हिंसा की मदद ली और राजनीतिक वैभव का विस्तार किया। यह विलक्षण संयोग है कि नक्सली हिंसा के दमन के नाम पर कांग्रेस ने कुछ साल शासन किया लेकिन हिंसा का कांग्रेस को जो चस्का लगा वह उसे आपातकाल तक ले गया और कांग्रेस में धीरे धीरे अपराधीकरण एक स्वाभाविक फिनोमिना बन गया।
    नक्सलबाड़ी आंदोलन के पहले कांग्रेस के शासकों को हिंसा की राजनीति करते नहीं देखा गया। तेलंगाना आंदोलन अपवाद है। यह भी कह सकते हैं राजनीतिक हिंसाचार की जो परंपरा कांग्रेस ने तेलंगाना आंदोलन (1946-48) ने डाली, वह नक्सलबाडी आंदोलन के दौर में तरुणाई में पहुँची और आपातकाल में पूर्ण यौवन को प्राप्त हुई। इस समूची प्रक्रिया में पश्चिम बंगाल के भद्रसमाज में हिंसा और असभ्यता की दीमक प्रवेश कर गयी और आज उससे पूरा राज्य प्रभावित है।
    दुखद बात यह है कि वामदलों ने सभ्यता के क्षय की प्रक्रियाओं की हमेशा अनदेखी की। हिंसा को हिंसा से खत्म करने की रणनीति अपनायी, गाली का जबाव गाली से देने की पद्धति इजाद की,जो साथ नहीं वह वर्गशत्रु। जो साथ छोड़ गया वह वर्गशत्रु। इस रणनीति के परिणाम सामने हैं। इसका सबसे बड़ा परिणाम है सामाजिक अलगाव।  
  वामराजनीति के विकास के दौर में हिंसा कम नहीं हुई बल्कि बढी । बंगाली समाज और ज्यादा असभ्य बना।  वाम,नक्सल,कांग्रेस, टीएमसी आदि सब भूल गए हैं कि कीचड़ से कीचड़ साफ नहीं होती। कीचड़ को साफ करने के लिए साफ-स्वच्छ जल चाहिए। हिंसा से हिंसा खत्म नहीं होती, गाली से सभ्यता विकसित नहीं होती। हिंसा को शांति से खत्म किया जा सकता है। गाली को गाली से खत्म नहीं कर सकते,बल्कि सभ्य आचरण से खत्म किया जा सकता है।
  लोकतंत्र में सभ्यता के विकास के लिए लोकतांत्रिक सभ्य पैमानों को अपनाने की जरुरत है। गाली ,हिंसा और बम तो वर्चस्व और हताशा के पैमाने हैं। ये पैमाने लोकतंत्र में अपनाए जाएंगे तो असभ्यता का विकास होगा,समाज और भी जंगलीपन की ओर भागेगा। हम तय करें कि लोकतंत्र में कैसे जीना चाहते हैं ? सभ्यता के पैमानों के आधार जीना चाहते हैं या असभ्यता के पैमानों के आधार पर जीना चाहते हैं?        


शनिवार, 15 मई 2010

बलिहारी माओवाद की



         सच मानिए मैं माओवादियों की हिंसा को लेकर जितना नाराज था आज वैसे नाराज नहीं हूँ। माओवाद के लिए अनेक लोग तरह-तरह की बातें करते हैं, निंदा करते हैं ,लेकिन आज मैं माओवादियों पर खुश हूँ और उनके पौरूष पर बलिहारी हूँ कि उनकी वजह से सैंकड़ों-हजारों घरों में कम से कम चूल्हे तो जल रहे हैं।
     मंत्री से लेकर कॉस्टेबिल तक ,गांव के गरीब से लेकर हथियार सप्लाई देने वालों तक सभी को उनके कारण धंधा मिला है। सबको माओवादियों के नाम पर खाने कमाने का मौका मिला है। कल तक बुर्जुआ राज्य का पैसा वे हराम मानते थे। अब उनके पास बुर्जुआ पंचायतों के कई हजार करोड़ रुपये विकास के नाम पर पहुँच रहे हैं। अकेले झारखण्ड में दो हजार करोड़ रुपये सीधे माओवादियों के क्रांतिकारी कोष में पहुँच रहे हैं। इससे यह भी सीखने को मिला है कि बुर्जुआ कोष और माओवादी क्रांतिकारी तिजोरी में ज्यादा दूरी नहीं होती है।   
       माओवाद का सबसे बड़ा लाभ तो विकास उद्योग को हुआ है। विकास उद्योग से जुड़ा समूचा पूंजीवादी खेमा सीआईआई के बैनर तले उन इलाकों की ओर जाने वाला है जहां पर माओवादी सक्रिय हैं।
     यानी सुदूर आदिवासी अंचलों में भारत के कारपोरेट घराने स्कूल बगैरह खोलने जा रहे हैं। विकास का धंधा करने जा रहे हैं।  केन्द्र सरकार ने भी माओवाद प्रभावित इलाकों में विकासकार्यों पर खर्चा करने लिए अरबों-खरबों की योजनाएं बनायी है। ये माओवादी न होते तो ये योजनाएं और बड़े पूंजीपति आदिवासियों के विकास की बातें ही नहीं करते और परवर्ती पूंजीवादी विकास उद्योग माओवाद प्रभावित अंचलों की ओर जाने के बारे में सोचता तक नहीं।  
       मनमोहन सरकार को नींद से जगाने और सुरक्षा उपकरणों की खरीद पर व्यापक ध्यान देने की जरुरत ही तब महसूस हुई जब माओवाद ने 136 जिलों में पैर फैला लिए। इससे सुरक्षाबलों को नए और अत्याधुनिक हथियार मिले हैं। माओवादी न आए होते तो अत्याधुनिक हथियारों की जरुरत भी महसूस नहीं होती। इस चक्कर में हजारों युवाओं को आतंक विरोधी दस्तों में कम से कम नौकरी तो मिली, ये नौजवान शिक्षक तो नहीं बन पाए लेकिन पुलिसवाले तो बन गए।
    माओवाद प्रभावित इलाकों में स्कूल,कॉलेज, चिकित्सा आदि की सामान्य व्यवस्था से शांति बनाए रख सकते थे, वहां 50 हजार अर्द्धसैन्यबलों को धंधे पर लगा दिया गया है। यदि इतने ही शिक्षक,डाक्टर,सरकारी कर्मचारियों को माओवाद प्रभावित इलाकों में विकास कार्यों पर नौकरी पर लगा दिया गया होता तो माओवाद का विस्तार ही नहीं होता।
      मैं माओवादियों से इस कारण बेहद खुश हूँ कि उन्होंने सभी किस्म की नैतिकता को नष्ट करके हिंसा को वैध ,‘क्रांतिकारी’ और ‘पवित्र’ बनाया है। हिंसा के मामले में माओवादी अपराधी गिरोहों के दादागुरु हैं। इलाका दखल में दाऊद इब्राहीम के बड़े भाई हैं। 136 जिलों में समानान्तर व्यवस्था स्थापित करके उन्होंने समानान्तर अर्थव्यवस्था चलाने वालों को अचम्भित कर दिया है।
    वे इस मायने में उत्तम हैं कि उन्होंने दलाली और जबरिया धन वसूली को क्रांतिकारी कार्यक्रम का हिस्सा बनाया है। माओवादियों की चौथ वसूली ने माफिया और अपराधी गिरोहों को ‘क्रांतिकारी’ बनने का मार्ग दिखाया है।
     बुर्जुआजी के नकली आंसुओं को देख देखकर हम बोर हो गए थे। माओवादी हिंसाचार ने अब नकली आंसू तो बंद करा ही दिए साथ ही अब माओवादियों से पीडि़त किसी भी व्यक्ति के असली आंसू भी नजर नहीं आते।
    पहले माओवादियों की कोई भी मीडिया सामान्य प्रेस रिलीज तक नहीं छापता था ,अब खोज खोजकर माओवादियों की खबरें छापते हैं। माओवादी नेताओं के टीवी से लाइव साक्षात्कार दिखाए जा रहे हैं। यह मीडिया का माओ प्रेम उत्तम है।
     मैं खुश हूँ कि माओवादी क्रांतिकारियों और कारपोरेट मीडिया में भाईचारा बढ़ा है। कारपोरेट मीडिया के लिए माओवाद अस्पृश्य नहीं रह गया है। माओवादियों के लिए भी कारपोरेट मीडिया अस्पृश्य नहीं है। धन्य है कारपोरेट मीडिया और माओवाद का भाईचारा।
     पहले पूंजीपति से पैसा लेना और प्रतिष्ठानी मीडिया में छपना माओवादी बुरा मानते थे।  कारपोरेट मीडिया में छपने वाले की निंदा करते थे । बड़ी पूंजी को हिकारत की नजर से देखते थे आज किंतु ऐसा नहीं है पूंजीपतियों से नियमित चौथ वसूली माओवादी क्रांतिकारियों की आदर्श गतिविधि है।
    पुलिस ऑपरेशन से पहले अकेले लालगढ़ में प्रतिमाह 90 लाख की चौथ वसूली माओवादी करते थे। झारखण्ड की खानों से प्रति खान 15-25 प्रतिशत की क्रांतिकारी चौथ वसूली के दस्तावेज मधुकोड़ा के यहां छापों में मिले हैं।
    माओवादियों के पास पहले धन का अभाव था आज इतना पैसा है कि खर्च नहीं कर पा रहे हैं। आज माओवादियों की मंथली पगार पर क्रांतिकारी सैनिकों से लेकर बुद्धिजीवियों की पूरी फौज काम कर रही है। मैं खुश हूँ कि कम से कम पूँजी की गुलामी को माओवादियों ने अपने क्रांतिकारी क्रार्यक्रम का हिस्सा तो बनाया। 
      माओवादी पहले पूंजीवादी उपकरणों का विरोध करते थे लेकिन अब अत्याधुनिक बुर्जुआ संचार उपकरणों से लेकर मशीनगन तक का इस्तेमाल करने में उन्हें परेशानी नहीं होती।
     पहले वे पेटी-बुर्जुआ और बुर्जुआ लेखकों से परहेज करते थे लेकिन इन दिनों उन्हें अरुंधती राय से लेकर मेधा पाटकर तक सभी बुर्जुआ पैसे से जीने वाले लेखकों ,स्वयसेवकों और बुद्धिजीवियों में क्रांतिकारी संभावनाएं नजर आ रही हैं। वे उन्हें पहले डि-क्लास करने की सोचते थे अब स्वयं माओवादियों ने अपना स्तर क्रांतिकारी से बुर्जुआ की ओर मोड़ दिया है।
     यह अच्छी बात है कि माओवादियों से प्रभावित बुद्धिजीवियों,लेखकों और मीडियाकर्मियों के द्वारा बुर्जुआ संस्थानों में काम करना और माओवाद का जप करना पुण्य का काम समझा जाता है। बुर्जुआ के वेश में माओवादी प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी वैसे ही सुंदर लगते है जैसे बूरे की मिठाई पर पिस्ता लपेट दिया गया हो।
    माओवाद का मानना है कि क्रांति का लक्ष्य है सत्ता पर कब्जा जमाना। लेकिन ये बंदे सत्ता की ओर नहीं आदिवासी जंगलों की ओर भाग रहे हैं। माओवाद का ऐसा सटीक पाठ पढ़ाने के लिए हम माओवादियों के कृतज्ञ हैं ,काश माओ यहां आकर देख पाते।
                          

















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