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रविवार, 28 मार्च 2010

चीन और अमेरिका संबंधों का नया पैराडाइम-अरुण माहेश्वरी

     सरसरी तौर पर यह साफ दिखाई देता है कि चीन और अमेरिका की अर्थव्यवस्थाएं आपस में पूरी तरह से गुथ गयी है। चीन का विकास उसके निर्यात पर निर्भर है और उसके निर्यात का काफी बड़ा हिस्सा अमेरिका जाता है। 2001 में चीन का निर्यात उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 20 प्रतिशत था, जो 2007 तक बढ़ कर 36 प्रतिशत होगया। देशों के समूह के तौर पर निश्चित तौर पर यूरोपियन यूनियन उसके मालों का सबसे बड़ा ग्राहक है, लेकिन अकेले एक ग्राहक के रूप में अमेरिका का ही स्थान अव्वल है। इसके अलावा, अमेरिका को आपूर्ति करने वाले देशों में कुछ अर्से पहले तक कनाडा सबसे आगे था, लेकिन अब उसका स्थान चीन ले चुका है। चीन ही आज अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों का सबसे बड़ा खरीदार और मालिक है। पहले यह स्थान जापान को प्राप्त था। 2008 के बाद से चीन अब उससे आगे चला गया है। हाल के अमेरिकी संकट में अगर किसी देश ने अमेरिका के लिये सबसे बड़े त्राणदाता की भूमिका अदा की तो वह चीन ही था। अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद के जरिये चीन अमेरिका को ऋण देने वाला आज सबसे बड़ा देश बन चुका है।
चीन और अमेरिका के संबंधों को लेकर अभी जिसप्रकार का चित्र बनता है, उसमें लगता है जैसे अमेरिका चीन में बने सामानों को खरीद रहा है और चीन अमेरिका की सरकारी प्रतिभूतियों को। एक विकासशील देश चीन एक धनी देश अमेरिका को खर्च करने के लिये उधार दे रहा है। इसके एवज में अमेरिका चीन में बने सामानों को खरीद कर उधार में आए डालर को फिर से चीन को सौंप देता है और यही डालर फिर कर्ज के तौर पर अमेरिका के पास आ जाता है। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदार देश है और चीन सबसे बड़ा कर्जदाता। सवाल उठता है कि क्या ऐसी कोई चीज लंबे समय तक चल सकती है? साधारण बुद्धि से सोचने पर यह सारा मामला कुछ अजीब सा, उटपटांग जान पड़ता है। ओबामा के आर्थिक सलाहकार लारेंस समर्स ने किसी समय अमेरिका और उसके विदेशी कर्जदाताओं के संबंधों को वित्तीय आतंक का संतुलनकह कर परिभाषित किया था। चीन का प्रमुख अंग्रेजी सरकारी दैनिक पिपुल्स डेलीलिखता है कि चीन के हाथ में भारी मात्रा में अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों के होने का अर्थ यह है कि वह कभी भी डालर की एक आरक्षित मुद्रा की हैसियत को खत्म कर सकता है। लेकिन साथ ही वह यह कहने से भी नहीं चूकता कि यह स्थिति वस्तुत: निश्चित परस्पर विनाश पर आधारित शीत युद्धकालीन गतिरोध का विदेशी मुद्रा संस्करण है। अर्थात, दोनों ही यह मान कर चल रहे हैं कि जो आज चल रहा है, उसके अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है। दूसरा विकल्प सिफ‍र् परस्पर विनाश है।
चीन अमेरिका संबंधों के इस जटिल और अबूझ से रूप को देखकर ही अब कुछ भविष्यद्रष्टाइन दोनों अर्थव्यवस्थाओं की परस्परनिर्भरशीलता के बजाय इनकी अनिवार्य जुदाई की बात भी कहने लग गये हैं। हार्वर्ड के प्रसिद्ध इतिहासकार नियाल फगु‍र्सन एक समय में जिस चीज को चिमेरिका कह कर प्रचारित कर रहे थे, वे ही अब इसे एक ऐसा विवाह बंधन बताने लगे हैं जिसका अंत विछोह के अलावा और कुछ नहीं हो सकता।

इसी सिलसिले में चीन और अमेरिका के बीच चीनी मुद्रा युआन के विनिमय मूल्य को लेकर इधर जो थोड़ी नोकझोंक चल रही है, उसकी तह में जाना काफी उपयोगी होगा। यह बात जग जाहिर है कि चीन और अमेरिका के बीच व्यापार संतुलन काफी अधिक बिगड़ा हुआ है। चीन के साथ अमेरिका के व्यापार घाटे में पिछले दिसंबर महीने में 18.14 बिलियन अमेरिकी डालर की वृद्धि हुई, जबकि इस जनवरी महीने में यह वृद्धि 18.3 बिलियन डालर हुई। अमेरिका इसके लिये अक्सर चीन को कोसता है कि उसने अपनी मुद्रा युआन की विनिमय दर को कृत्रिम ढंग से काफी कम कर रखा है, जिसकी वजह से अमेरिकी बाजार में चीनी सामानों को अनुचित लाभ मिल रहा है और अमेरिका का चीन के साथ व्यापारिक घाटा बढ़ता जा रहा है।
12 मार्च को राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अमेरिकी निर्यातआयात बैंक के वार्षिक सम्मेलन में अमेरिका के बढ़ते हुए व्यापार घाटे के संदर्भ में जोर देकर कहा कि फिर से व्यापार संतुलन को कायम करने में चीनी मुद्रा युआन की विनिमय दर को बाजार पर आधारित किया जाना एक महत्वपूर्ण कदम होगा। ओबामा के इस वक्तव्य के दूसरे दिन ही चीन के केंद्रीय बैंक, पिपुल्स बैंक आफ चायना के उपराज्यपाल सू निंग ने उन्हें तुर्की दर तुर्की जवाब देते हुए  कहा कि युआन के मूल्य के प्रश्न का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। युआन की विनिमय दर को बढ़ाना चीन और अमेरिका के बीच व्यापार संतुलन की समस्या का समाधान नहीं है। सू निंग की दलील थी कि सन् 2005 के जून महीने में डालर के दामों को अस्थिर कर दिये जाने के बाद से युआन की दर 20 प्रतिशत से अधिक बढ़ गयी है। 2002 से लेकर 2008 के बीच अमेरिकी डालर की कीमत सालाना तीन प्रतिशत की दर से कम हुई थी। लेकिन इसी दौरान अमेरिकी व्यापार घाटा 500 बिलियन डालर से बढ़ कर 900 बिलियन डालर होगया। अर्थात, डालर के कमजोर होने से अमेरिकी घाटे में कोई कमी नहीं आयी है।


इसी सिलसिले में निंग ने अमेरिका के इस व्यापार घाटे के दूसरे रहस्यों पर से पर्दा उठाते हुए जिन तथ्यों का उल्लेख किया, वे चीन और अमेरिका के बीच के व्यापार की वास्तविकता और इन दोनों अर्थव्यवस्थाओं के संबंधों को जानने की दृष्टि से महत्वपूर्ण कहे जा सकते हैं। उन्होंने बताया कि चीन के पक्ष में व्यापार संतुलन का अर्थ सिफ‍र् चीन की अर्थव्यवस्था को लाभ नहीं समझा जाना चाहिए। सचाई यह है कि चीन के अधिकांश निर्यातकों में विदेशी पूंजी लगी हुई है। चीन के वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार पिछले वर्ष चीन के विदेश व्यापार में निवेश का 55.2 प्रतिशत विदेशी है और 56 प्रतिशत निर्यात चीन में स्थित विदेशी कंपनियों ने किया है। चीन को इस व्यापार से जो मामूली मुनाफा होता है उसका अधिकांश विनिर्माण की श्रंखला के अंतिम चरण से आता है। जबकि, अमेरिका खुद उत्पाद की डिजाइन और उसके वितरण से अच्छा खासा मुनाफा ले लेता है। इस बात को ठोस उदाहरण से समझने के लिये कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता की इस रिपोर्ट पर गौर किया जा सकता है, जिसके अनुसार एक 30 गिगाबाईट के विडियो आईपॉड पर 299 अमेरिकी डालर की लागत में से 163 डालर अमेरिकी कंपनियों और मजदूरों को मिलते हैं, तथा 132 डालर दूसरे एशियाई देशों के कलपुर्जे निर्माताओं को, जबकि चीन में, जहां उसे अंतिम रूप से तैयार किया जाता है, इसका सिफ‍र् 4 डालर भुगतान किया जाता है। चीन के मजदूरों द्वारा आईपॉड के निर्माण में सिफ‍र् एक प्रतिशत का योगदान किये जाने पर भी चीन से अमेरिका को होने वाले निर्यात में इसके चलते 150 डालर का योगदान होता है, अर्थात चीनअमेरिका के बीच व्यापार संतुलन में एक आईपॉड 150 डालर का योगदान करता है।
इसीलिये आज भी चीन और अमेरिका की अर्थव्यवस्था को बराबरी के दर्जे पर रखना एक बड़ा भ्रम है। बाजार विनिमय दरों के आधार पर चीन की अर्थव्यवस्था अभी भी अमेरिका से एक तिहाई है। उसका प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पादन अमेरिका के प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद का चौदहवां हिस्सा भर है। अमेरिका का प्रतिरक्षा बजट चीन से छ: गुना है। जहां तक सरकारी प्रतिभूतियों का सवाल है, चीन के लिये यह संभव नहीं है कि वह उसे बाजार में छोड़ सके। डालर की कीमत के गिरने से सबसे अधिक नुकसान चीन को ही होगा। इसीलिये जो लोग आज दोनों को बराबर के वजन वाला बताकर जी 2 की बात करते हैं, वह सच से कोसों दूर, कुछ खास गरज से एक राजनीतिक भ्रम फैलाने की बात के अलावा और कुछ नहीं है। और यही वह बिंदु है जिसकी ओर इशारा करना यहां हमारा अभीष्ट है। 

उपरोक्त विश्लेषण से एक बात साफ है कि चीन की अर्थव्यवस्था के लिये निर्यात में अभिवृद्धि महत्वपूर्ण होने पर भी उतनी अधिक महत्वपूर्ण नहीं है जितनी आम तौर पर समझा जाता है। निर्यात की राशि में चीन के द्वारा जोड़े गये मूल्य का अंश उसके जीडीपी का बहुत छोटा सा हिस्सा है। अमेरिका में खपने वाले अधिकांश मालों का ज्यादातर हिस्सा अन्य स्थानों पर निर्मित होता है। युआन के विनिमय मूल्य पर नियंत्रण और डालर से अमेरिकी प्रतिभूतियों की खरीद के जरिये वह  अपने निर्यातकों की मदद करता है। बदले में अमेरिका में ब्याज की दर नियंत्रित रहती है और अमेरिकी उपभोक्ता की खर्च की आदत बनी रहती है। लेकिन, मूल सचाई यह है कि चीन के विकास की असली चालक शक्ति वहां होने वाला निवेश ही है।
इस समूचे उपक्रम में जिस बात पर नजर रखने की जरूरत है वह है चीन और अमेरिका के बीच विकसित की जा रही एक प्रकार की रणनीतिक समझ और साझेदारी। चीन आज की दुनिया में पूंजीवाद के बरक्स सोवियत संघ की तरह कोई समाजवादी विकल्प नहीं पेश कर रहा है। दुनिया के गरीब और विकासशील देश उससे कोई विशेष उम्मीद नहीं रख पारहे हैं। चीनी विशिष्टता वाला समाजवाद अमेरिकी विशिष्टता वाला पूंजीवाद जैसा प्रतीत हो रहा हैइस बात को कहने वालों की कमी नहीं है। अमेरिकी सरकार की हरचंद कोशिश इस बात की है कि कैसे चीन को अपनी समग्र विश्व रणनीति का अंशीदार बनाया जाए। अमेरिकी पत्रपत्रिकाओं में चीन की सारी लानतमलामत के बाद भी पूरा जोर इस बात पर रहता है कि जलवायु परिवर्तन से लेकर आर्थिक पुनर्बहाली तक, सभी मामलों में दुनिया के इन दोनों देशों के बीच एक प्रकार का सामंजस्य कायम हों। चीन और अमेरिका की बराबरी की बात कहने वालों के बारे में अमेरिका के पूर्व ट्रेजरी अधिकारी अलबर्ट कीडेल कहते हैं कि दोनों अर्थव्यवस्थाओं में बराबरी करने का कोई तुक नहीं है, फिर भी चीन को यह जताने के लिये कि वह हमारा भागीदार है और इसीलिये उसकी कुछ जिम्मेदारियां है, और हम जिस चीज को महत्वपूर्ण समझते हैं, उसे उस बात को सुनना चाहिए, इस बात में कुछ सार है।

ओबामा ने इसी बीच चीन के साथ हाथ मिलाने के लिये रणनीतिगत और आर्थिक संवाद का एक सालाना मंच बनाया है, जिसकी पहली बैठक वाशिंगटन में पिछले जुलाई महीने में हुई थी। इस मंच का मूल उद्देश्य यह है कि दोनों देशों के प्रमुख नीति निर्धारक आपस में मिले और उनके सामने जो समस्याएं है उनपर बात करें। ओबामा के शब्दों में, इसप्रकार के प्रयोग को निरर्थक नहीं समझा जाना चाहिए।
भ्रम को बनाये रखने के लिये अमेरिकी पत्रिकाएं यह जरूर कहती है कि चीन और अमेरिका हमबिस्तर होकर भी अलगअलग सपने देखते हैं। शासन की किसकी प्रणाली ज्यादा सही और कारगर है, इसकी प्रतिद्वंद्विता में वे लगे हुए है। लगभग तीन दशक से भी ज्यादा समय पहले जब देंग ज्याओ पिंग ने चार आधुनिकीकरण के नारे के साथ चीन के तीव्र विकास की एक समग्र नीति अपनायी थी, तभी उन्होंने यह भी कहा था कि चीन को विकसित देश बनाने की प्रक्रिया में चीन समाजवादी रहेगा या पूंजीवादी, यह बात आने वाले पचास वर्षों बाद ही तय होगी। विश्व रणनीति की सही समझ को विकसित करने के लिये चीन और अमेरिका के बीच इस निरंतर विकासमान घटनाचक्र पर नजर रखने की जरूरत है।



रविवार, 14 मार्च 2010

भविष्य अमेरिका का है यह झूठा दावा है- अरुण माहेश्वरी



    एरिक हाब्सवाम का एक साक्षात्कार पिछले पांच दशकों से लंदन से निकल रही मार्क्सवादी विमर्श की बहुचर्चित पत्रिका न्यू लेफ्ट रिव्यूके जनवरीफरवरी 2010 के ताजा अंक में प्रकाशित हुआ है। 1991 में हाब्सवाम की प्रसिद्ध पुस्तक आत्यांतिकताओं का युग’ (एज आफ एक्सट्रीम्स) प्रकाशित हुई थी। उसके दो दशक बाद की दुनिया की परिस्थिति का बयान करते हुए अपने इस साक्षात्कार में हाब्सवाम ने शुरू में आज की दुनिया में उनके द्वारा लक्षित पांच परिवर्तनों को गिनाया है।
    उसके बाद ही जब उनसे पूछा गया कि इनके अलावा इस दौरान और किन चीजों ने उन्हें अचम्भित किया तो उन्होंने तीन बातों का उल्लेख करते हुए कहा कि मैं आज तक उस नवअनुदार प्रकल्प के शुद्ध पागलपन पर अचंभित हूँ जिसने सिर्फ‍ इस बात का झूठा दावा ही नहीं किया था कि भविष्य अमेरिका है, बल्कि उसने यह भी सोचा था कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिये उसने एक पूरी रणनीति और कार्यनीति तैयार कर ली है। जहां तक मुझे नजर आता है, तर्कसंगत अर्थ में, उनके पास कोई युक्तिपूर्ण रणनीति नहीं थी।  
    उन्होंने दूसरा, काफी मामूली लेकिन उल्लेखनीय आश्चर्य, जलदस्युओं की वापसी को बताया, जिसे हम काफी हद तक भूल चुके थे, यह नयी बात है। और इसी सिलसिले में उन्होंने और भी ज्यादा स्थानीयजिस तीसरे आश्चर्य का जिक्र किया वह था, पश्चिम बंगाल में सीपीआई(एम) का पतन, जिसकी मैंने सचमुच उम्मीद नहीं की थी।
    इसके साथ ही हाब्सवाम ने वे बातें कही जिन्हें टेलीग्राफने खबर बनाया है कि सीपीआई (एम) के महासचिव प्रकाश करात ने मुझसे हाल में कहा कि पश्चिम बंगाल में वे खुद को संकट में तथा घिरा हुआ पाते हैं। स्थानीय चुनावों में नयी कांग्रेस के हाथों वे करारी शिकस्त देख पा रहे हैं। यह हाल तीस वर्षों तक एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में शासन करने के बाद है। किसानों से जमीन लेकर चलायी गयी औद्योगीकरण की नीति का काफी बुरा प्रभाव पड़ा है, और यह साफ तौर पर एक भूल थी।
      अन्य सभी बची हुई वामपंथी सरकारों की तरह ही उन्हें भी आर्थिक विकास, जिसमें निजी विकास भी शामिल है, को मानना पड़ा और इसीलिये उन्हें एक मजबूत औद्योगिक आधार तैयार करना स्वाभाविक जान पड़ा, मैं इसे समझ सकता हूं। लेकिन मुझे यह किंचित आश्चर्यजनक लगता है कि इसका इतना नाटकीय परिणाम हो सकता है।

हाब्सवाम के 18 पृष्ठों के इस लंबे साक्षात्कार में पश्चिम बंगाल के सिलसिले में सिर्फ‍ ये चंद लाइनें हैं, जहां की हाल के घटनाओं को अपने लिये आश्चर्यजनक मानते हुए भी उन्हें वे एक बहुत स्थानीय घटनाक्रम समझते हैं। हाब्सवाम के साक्षात्कार की इस छोटी सी स्थानीयबात का एक स्थानीय अखबार में सुर्खी बन कर प्रकाशित होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इसीबीच, प्रकाश करात ने एक बयान के जरिये हाब्सवाम के उक्त कुल कथन से अपनी असहमति व्यक्त कर दी है।

बहरहाल, यह एक भिन्न मसला है। हमारे लिये इस 92 वर्षीय इतिहासकार का साक्षात्कार दूसरे कई कारणों से काफी महत्वपूर्ण है, जिनकी हम यहां चर्चा करना चाहेंगे।

हाब्सवाम ने अपनी पुस्तक आत्यांतिकताओं का युग : बीसवीं सदी 1914 से 1991’ में पहले विश्वयुद्ध से शुरू करके रूस की समाजवादी क्रांति, 1929 की महामंदी, उदारतावाद के अंत और तानाशाहियों के उदय, द्वितीय विश्वयुद्ध, उपनिवेशों का अंत, युद्धोत्तर तीव्र आर्थिक विकास का स्वर्णिम युग, फिर आर्थिक संकट, तीसरी दुनिया का उदय, युद्ध और क्रांतियां तथा समाजवाद का पराभव तक के पूरे घटनाक्रम को उसके आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक तथा तकनीकी आयामों के साथ समेटा था। न्यू लेफ्ट रिव्यूको दिये गये साक्षात्कार में वे इस पुस्तक में समेटे गये काल के बाद के दो दशकों पर बात कर रहे थे, जो गौर करने लायक महत्वपूर्ण बात है।

विगत बीस सालों में दुनिया के इतिहास में उन्हें कौन सी प्रमुख नयी बातें दिखाई देती हैं, इस सवाल के जवाब में हाब्सवाम ने पांच प्रमुख परिवर्तनों को गिनाया है। पहला, दुनिया का आर्थिक केंद्र उत्तर अतलांटिक से हट कर दक्षिण और पूर्व एशिया में आ गया है। इसकी शुरूआत सत्तर और अस्सी के दशक में जापान से हुई थी, लेकिन 90 के दशक में चीन के उदय से एक वास्तविक फर्क आया है।
    दूसरा बड़ा परिवर्तन वे पूंजीवाद के विश्वव्यापी संकट को मानते है जिसकी वे भविष्यवाणी कर रहे थे लेकिन उसके बावजूद इसे सामने आने में लंबा समय लगा।
    तीसरी बात यह कि 2001 के बाद अमेरिका ने दुनिया पर अपना जो एकछत्र प्रभुत्व कायम करने की कोशिश की थी, वह पूरे ढोलधमाकों के साथ ध्वस्त होगयी है उसकी विफलता साफ देखी जा सकती है।
    चौथा, ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन) के रूप में विकासशील देशों के एक नये राजनीतिक गुट का उदय, जो उनकी किताब के लिखे जाने तक अस्तित्व में नहीं आया था।
     और पांचवां परिवर्तन, दुनिया के बड़े हिस्से में सुव्यवस्थित ढंग से राज्य की सत्ता का क्षय और उसका कमजोर होना है। हाब्सवाम का कहना है कि इसे पहले देखा जा सकता था, लेकिन इधर यह जिस तेजी से हो रहा है, इसकी उन्होंने उम्मीद नहीं की थी।

इसीमें आगे इस सवाल पर कि वे आज के संकट की 1929 की महामंदी से कैसे तुलना करते हैं, हाब्सवाम ने जो मार्के की बातें कही उनकी ओर ध्यान दिलाना भी यहां हमारा अभीष्ट है। वे कहते हैं, 1929 बैंकों से शुरू नहीं हुआ था बैंकों का उसके दो वर्ष बाद तक पतन नहीं हुआ था। बनिस्बत्, शेयर बाजार ने उत्पादन में गिरावट का श्रीगणेश किया। 1929 की तुलना में अभी की मंदी की कहीं ज्यादा तैयारियां की गयी थी। नवउदार तत्ववाद ने पूंजीवाद की क्रियाशीलता में जो भारी अस्थिरता पैदा कर दी है, उसे काफी पहले ही देख लिया जाना चाहिए था। 2008 तक इसने सिर्फ‍ हाशिये के क्षेत्रों – 90 के दशक में लातिन अमेरिका तथा 21वीं सदी के शुरू में दक्षिण पूर्व एशिया, रूस को प्रभावित किया था। प्रमुख देशों के लिये इसका मायने सिर्फ‍ समयसमय पर शेयर बाजारों का गिरना था जिससे वे जल्द ही उबर जाते थे। हाब्सवाम के अनुसार 1998 में जब दीर्घमियादी पूंजी प्रबंधन की व्यवस्था का पतन हुआ तभी यह समझ लेना चाहिए था कि विकास का यह समूचा मॉडल ही कितना गलत है।

इसी सिलसिले में वे आगे कहते हैं कि आज की तुलना में 1929 की विश्व अर्थव्यवस्था कम वैश्विक थी। सोवियत संघ के अस्तित्व का मंदी पर कोई व्यवहारिक प्रभाव नहीं था, लेकिन एक गहरा विचारधारात्मक प्रभाव था एक विकल्प था। 90 के दशक के बाद से हमने चीन और अन्य उदीयमान अर्थव्यवस्थाओं के उभार को देखा है जिनका दरअसल आज की मंदी पर व्यवहारिक प्रभाव है।... सचाई यह है कि उस समय भी जब नवउदारवाद अपनी समृद्धि का दावा कर रहा था, वास्तविक अभिवृद्धि मुख्य रूप से इन नव विकसित अर्थव्यवस्थाओं मेंखास तौर पर चीन में हो रही थी। मेरा पक्का मानना है कि यदि चीन न होता तो 2008 की गिरावट कहीं ज्यादा गंभीर होती।

आप इधर की प्रमुख पश्चिमी पत्रिकाओं, ‘द इकोनोमिस्ट’, ‘टाईमतथा न्यूजवीकके अंकों को देखिये, चीन के साथ पश्चिम के नफरत और प्यार की पूरी कहानी साफ समझ में आजायेगी। चीन को अपनी बढ़ी हुई आर्थिक हैसियत का अनुमान है, अब वह पहले के किसी भी समय की तुलना में कहीं ज्यादा गहरे आत्मविश्वास के साथ राजनीतिक मामलों में भी दखल देता है, यह बात पश्चिम के रणनीतिकारों और उनकी प्रवक्ता पत्रिकाओं को नागवार गुजर रही है। वे चीन पर अंकुश चाहते हैं। साथ ही अंतिम निष्कर्षों के तौर पर यह भी मानते हैं कि अमेरिका और चीन वैश्विक प्रभाव के मामले में सिफ‍र् प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं, वे परस्पर निर्भरशील अर्थव्यवस्थाएं भी है जिन्हें आपस में सहयोग से हर चीज का लाभ है। मतभेद यदि टकराहटों में बदल जाए तो किसी को भी फायदा नहीं है।


चीनी और अमेरिकी अर्थव्यवस्थाओं की यह कथित परस्परनिर्भरशीलता दुनिया की परिस्थिति के बारे में अपने किस्म का एक अभिनव दृश्यपट प्रस्तुत करती है, जिसके सिर्फ‍ आर्थिक नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक आयामों की थाह पाना किसी भी प्रकार की विश्वरणनीति के लिये जरूरी है। 1929 के वक्त का जिक्र करते हुए हाब्सवाम कहते हैं कि उस समय सोवियत संघ की उपस्थिति एक विचारधारात्मक प्रभावतथा विकल्पके तौर पर थी, जबकि आज का चीन विश्व अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख कारक तत्व है। सचाई यह है कि हाल के अमेरिकी संकट में अगर किसी देश ने अमेरिका के लिये सबसे बड़े त्राणदाता की भूमिका अदा की तो वह चीन ही था। अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद के जरिये चीन अमेरिका को ऋण देने वाला आज सबसे बड़ा देश बन चुका है। चीन के प्रमुख अंग्रेजी सरकारी दैनिक पीपुल्स डेलीने लिखा था कि चीन के हाथ में भारी मात्रा में अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों के होने का अर्थ यह है कि वह कभी भी डालर की एक आरक्षित मुद्रा की हैसियत को खत्म कर सकता है। ऐसा कहने के बाद ही उसमें आगें यह भी कहा गया कि यह स्थिति वस्तुत: निश्चित परस्पर विनाश पर आधारित शीत युद्धकालीन गतिरोध का विदेशी मुद्रा संस्करण है। ओबामा के आर्थिक सलाहकार लारेंस समर्स ने किसी समय अमेरिका और उसके विदेशी कर्जदाताओं के संबंधों को वित्तीय आतंक का संतुलनकह कर परिभाषित किया था। पीपुल्स डेलीकी निश्चित परस्पर विनाश पर आधारित शीत युद्धकालीन गतिरोध के विदेशी मुद्रा संस्करण की बात लारेंस समर्स के वित्तीय आतंक का संतुलनकी पदावली को ही प्रतिध्वनित करती है।

मजे की बात यह भी है कि परस्पर निर्भरशीलता के इस गहरे अहसास के बावजूद सभ्यताओं के संघर्ष की नस्लवादी मानसिकता से पश्चिमी रणनीतिकार कभी मुक्त नहीं हो पाते हैं। चीन के इस नये उदय में उन्हें जो खतरे की घंटी सुनाई देती है, उसे द इकोनोमिस्टने इस प्रकार लिखा हैं : ब्रिटिश साम्राज्य के स्थान पर दुनिया में अमेरिकी साम्राज्य का प्रभुत्व बिना किसी खून खराबे के कायम होगया क्योंकि दोनों की सांस्कृतिक और राजनीतिक विरासत एक थी। लेकिन जब जापान और जर्मनी ने सर उठाने की कोशिश की तब कैसा विनाशकारी विश्व युद्ध हुआ, इसे सभी जानते हैं। इसी प्रकार चीन की बढ़ती हुई समृद्धि और ताकत और भी ज्यादा उत्तेजनापूर्ण होंगे।
कुल मिला कर, हाब्सवाम ने मौजूदा विश्व के रूझानों के बारे में जो तमाम बातें कही है, उन सब पर ध्यान देने की जरूरत के बावजूद, वित्तीय संकट के समाधान में चीन और अमेरिका के प्रकट साझा हितों से जुड़े दुनिया के इस नये यथार्थ के तमाम प्रसंग काफी सजग और आलोचनात्मक दृष्टि की अपेक्षा रखते हैं। 





बुधवार, 3 मार्च 2010

‘यादों से रची यात्रा’ से उठे सवाल -अरुण माहेश्वरी

                                                                 
           पूरन चंद जोशी की नयी किताब यादों से रची यात्राकिसी उपन्यास की तरह एक सांस में पढ़ गया। सभ्यता के भविष्य को लेकर गहरे सात्विक आवेग से भरी यह एक बेहद विचारोत्तेजक किताब है। मनुष्यता का भविष्य समाजवाद में है, इसमें उन्हें कोई शक नहीं है। पूंजीवाद उन्हें कत्तई काम्य नहीं है। समाजवाद या बर्बरताके सत्य को वे पूरे मन से स्वीकारते हैं। वे समाज में समता चाहते हैं और साथ ही मूलभूत मानवतावादी मूल्यों की भी प्राणपण से रक्षा करना चाहते हैं। 

समाजवाद और मानवअधिकारों में कोई अन्तर्विरोध नहीं, बनिश्बत एक दूसरे के पूरक है, इसीलिये दोनों के एक साथ निर्वाह को ही स्वाभाविक भी मानते हैं। सभ्यता का रास्ता समाजवाद की ओर जाता है, इसमें उनका पूरा विश्वास है। इतिहास का अंतिम पड़ावहोने के दावे के साथ अमेरिका की धरती से जो उदार जनतंत्र के झंडाबरदार निकलें, उनका तो दो कदम चलते ही दम फूलने लगा है। यह उदार जनतंत्र कुछ जरूरी प्रश्नों को उठाने के बावजूद पूंजीवाद के क्षितिज के बाहर सोचने में असमर्थ है और इसीलिये सभ्यता की मूलभूत समस्याओं का समाधान नहीं दे सकता, इसे वे भलीभांति समझते हैं।

त्रासदी यह है कि समाजवाद भी अपने प्रयोग की पहली भूमि पर विफल हो गया। रूस की कम्युनिस्ट पार्टी (बोल्शेविक पार्टी) के नेतृत्व में वैज्ञानिक समाजवाद की विचारधारा के आधार पर रूस में जिस समाजवाद की स्थापना हुई, वह अर्थनीतिशास्त्रऔर मानवतावाद की कई कसौटियों पर खरा न उतर पाने के कारण टिक नहीं पाया, नाना प्रकार की विकृतियों का शिकार हुआ। और, इसमें सबसे बड़ी परेशानी का सबब यह है कि सोवियत संघ में पनपने वाली विकृतियों को समय रहते पहचानने में बुद्धिजीवियों का एक खास, मार्क्सवाद की वैज्ञानिक विचारधारा से लैस कम्युनिस्ट तबका क्यों बुरी तरह चूक गया? मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों की इस कमी का कारण क्या था और इससे उबरने का उपाय क्या हो सकता है, श्री जोशी की पुस्तक की बेचैनी का सबसे प्रमुख विषय यही है। अपनी इसी तलाश को वे विकल्प की तलाशकहते हैं। जोशीजी ने इस सिलसिले में खास तौर पर हिंदी के मार्क्सवादी लेखकों और बुद्धिजीवियों को, जिन्हें सोवियत जमाने में रूस जाने और वहां रहने तक के अवसर मिले, अनेक प्रश्नों से बींधा है और साथ ही जिन चंद लोगों ने अपनी अंतर्दृष्टि का परिचय देते हुए सोवियत समाज में पनप रही विद्रूपताओं को देखा, अपने परिचय के ऐसे कम्युनिस्ट और गैरकम्युनिस्ट लोगों के अनुभवों का जीवंत चित्र खींचते हुए उनकी भरपूर सराहना भी की है।

तथापि, यह भी साफ जाहिर है कि समाजवाद पर आस्था के बावजूद श्री जोशी कम्युनिस्ट नहीं है। वे मूलत: एक मानवतावादी है। कम्युनिस्ट वर्ग संघर्ष को इतिहास की चालिका शक्ति मानते हैं। कम्युनिस्टों के लिये वर्ग संघर्ष इतिहास का एक अन्तर्निहित नियम होने के बावजूद सर्वहारा के वर्ग संघर्ष का अर्थ इस सत्य के आगे की चीज है। वह कोई ऐतिहासिक परिघटना अथवा इतिहास का ब्यौरा भर नहीं है। यह ऐसा वर्ग संघर्ष है जिसका लक्ष्य वर्ग संघर्ष का ही अंत और एक ऐसी समाजव्यवस्था का उदय है जो किसी भी प्रकार के शोषण को नहीं जानती। वे सर्वहारा क्रांति से निर्मित उत्पीड़कों और उत्पीडि़तों से रहित समाजव्यवस्था में ही मनुष्य की गरिमा देखते है। आर्थिक परनिर्भरता मानव गरिमा के विरुद्ध है और इसीलिये माक्र्स की शब्दावली में आर्थिक ताकतों की अंधशक्तिको तोड़ कर वे ऐसी उच्चतर शक्ति को समाज का नियामक बनाना चाहते हैं जो मानव गरिमा के अनुरूप हो। जबकि मानवतावादी जोशीजी के लिये वर्ग संघर्ष नहीं, मनुष्य की मुक्ति और गरिमा का रास्ता सभ्यता द्वारा अर्जित कुछ सार्वदेशिक मानव मूल्यों के संचय का, भारत में गांधी और नेहरू का समन्वयवाद का रास्ता है। 

समाजवाद की स्थापना के मामले में कम्युनिस्ट किसी ऐतिहासिक नियतिवाद पर विश्वास नहीं करते। वे यह मानते हैं कि समाजवाद सभ्यता के इतिहास की एक अनिवार्यता होने पर भी अपने आप अवतरित होने वाली सच्चाई नहीं है। इसे लाने के लिये मजदूर वर्ग के नेतृत्व में समाजवादी क्रांति जरूरी है। कम्युनिस्ट पार्टी इसी मजदूर वर्ग के सबसे सचेत हिस्से, इसके हरावल दस्ते का प्रतिनिधित्व करती है, क्रांति के लिये जरूरी सम्यक रणनीति और कार्यनीति को निर्धारित करती है। इसीलिये पार्टी की अधीनता, उसका अनुशासन किसी भी कम्युनिस्ट की मजबूरी नहीं, उसका आत्मचयन है।

कम्युनिस्ट पार्टी, उसका समूचा ढांचा, उसका अनुशासन और खास तौर पर बुद्धिजीवियोंद्वारा स्वीकार ली जाने वाली उसकी अधीनता यही वे बिंदु है, जो जोशी जी की इस पुस्तक की सारी परेशानियों के मूल में है।

पाठकों को अपनी इन्हीं परेशानियों के घेरे में लेते हुए जोशी जी उन्हें अपने निजी अनुभवों और विचारों की एक लंबी चित्ताकर्षकयात्रा पर ले चलते हैं। सोवियत संघ की यात्राओं के समृद्ध अनुभवों, सभ्यता के संकट के बरक्स समाजवादी विकल्प के पहले प्रयोग की भूमि के प्रति रवीन्द्रनाथ, बर्टेंड रसेल, जवाहरलाल नेहरू आदि की तरह के कई मनीषियों के आंतरिक आग्रह, विस्मय और संशय की रोशनी में सोवियत संघ के बारे में  अपने जमाने में सामने आये ख्रुश्चेवउद्घाटनों, बे्रजनेव काल के गतिरोध संबंधी तथ्यों का ब्यौरा देते हुए जोशी जी कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों पर अनेक सवालों की बौछार करते हैं कि आखिर किस गरज से उन्होंने समाजवाद के इस पहले प्रयोग के अंदर की कमजोरियों और विकृतियों को देख कर भी नहीं देखा; क्यों समाजवाद की विकृतियों की निर्मम आलोचना करने का अपना बौद्धिक धर्मनिभाने के बजाय उन विकृतियों के लिये ही लगभग बचकाने प्रकार के तर्कों को जुटाते रहे?

उनका निष्कर्ष यह है कि बुद्धिजीवियों की ऐसी दुर्दशा और किसी वजह से नहीं, कम्युनिस्ट पार्टी की अधीनता को स्वीकारने की वजह से हुई। धूर्जटि प्रसाद मुखर्जी के हवाले से कहते हैं : क्या बुद्धिजीवी के राजनीति में प्रवेश और हस्तक्षेप की यह जरूरी शर्त है कि वह किसी राजनैतिक पार्टी का सदस्य बने और उसका अनुशासन स्वीकार करे। ऐसा भी तो संभव है कि वह सदस्य न बने या उसके अनुशासन में न बंध कर भी उसके बुनियादी सिद्धांतों को ही नहीं उसके कार्यक्रम और नीतियों को स्वीकार करे।

अनुभव बताता है कि पार्टीबद्ध, अनुशासनबद्ध बुद्धिजीवी अंत में एक स्वतंत्र बुद्धिजीवी नहीं पार्टी का प्रवचनकार और व्याख्याता बन कर बुद्धिजीवी के रूप में समाप्त हो जाता है। कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन और उसका अनुशसान तो और भी कठोर है, जो बुद्धिजीवी को स्वतंत्र चिंतन की दिशा में नहीं, कम्प्लायेंस और कन्फॉर्मिटी और अंत में सबमिशनके रास्ते पर धकेलता है।

आज की तमाम परिस्थितियों में जोशी जी के इस कथन ने कितने स्वतंत्रजनोंको गदगद किया होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है। कोलकाता से निकलने वाली पत्रिका वागर्थने तो अपने ताजा अंक के द्वितीय मुखपृष्ठ पर इस उद्धरण को किसी आप्तकथन की तरह प्रकाशित किया है।
इस बारे में जोशी जी से हमारा एक छोटा सा अनुरोध है कि वे सिर्फ‍ यह बतायें कि एक शोषणविहीन समाज की स्थापना के लिये कम्युनिस्ट पार्टी की जरूरत भी है या नहीं? इसी एक प्रश्न के जवाब से स्वत: बाकी सारे सवालों का जवाब मिल जायेगा। ध्यान देने की बात है कि अपनी इसी पुस्तक में उन्होंने ऐतिहासिक नियतिवाद की तरह के किसी भी विचार से खुद को सचेत रूप में अलग किया है।
जहां तक कम्युनिस्ट पार्टी के सांगठनिक ढांचे, समयसमय पर तय होने वाली उसकी कार्यनीतियों का सवाल है, वे किसी ईश्वरीय विधान से तय नहीं हुए हैं; यह एक लगातार विकासमान प्रक्रिया है; और इसीलिये बहस और विवादों से परे नहीं है।
और जहां तक इतिहास की गति को पकड़ने में बुद्धिजीवियों की असमर्थता का सवाल है, इसका ठेका अकेले कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों ने ही नहीं ले रखा है। बौद्धिक कर्म का पूरा इतिहास ऐसी तमाम कमजोरियों, भूलों और असंख्य मूर्खताओं से ही तो पटा हुआ है! इतिहास और वर्तमान, दोनों में ही किसे ग्रहण करे और किसे त्यागे, इसकी स्वतंत्रता सबके पास है और सभी अपनीअपनी जरूरतों और प्राथमिकताओं (सही कहे तो अपने स्वार्थों) के अनुरूप यह काम करते रहते हैं। देखने की बात यह है कि किसका स्वार्थ किस बात से जुड़ा है?
इस संदर्भ में पूंजीके पहले खंड की भूमिका में माक्र्स की यह बेहद सारगर्भित टिप्पणी देखने लायक है, जिसमें जर्मन अर्थशास्त्रियों की विडंबनां का चित्र खींचते हुए वे कहते हैं:
जिस समय ये लोग राजनीतिक अर्थशास्त्र का वस्तुगत अध्ययन कर सकते थे, उस समय जर्मनी में आधुनिक आर्थिक परिस्थितियां वास्तव में मौजूद नहीं थीं। और जब ये परिस्थितियां वहां पैदा हुईं, तो हालत ऐसी थी कि पूंजीवादी क्षितिज की सीमाओं में रहते हुए उनकी वास्तविक ओर निष्पक्ष छानबीन करना असंभव होगया। जिस हद तक राजनीतिक अर्थशास्त्र इस क्षितिज की सीमाओं के भीतर रहता है, अर्थात् जिस हद तक पूंजीवादी व्यवस्था को सामाजिक उत्पादन के विकास की एक अस्थायी ऐतिहासिक मंजिल नहीं, बल्कि उसका एकदम अंतिम रूप समझा जाता है, उस हद तक राजनीतिक अर्थशास्त्र केवल उसी समय तक विज्ञान बना रह सकता है, जब तक कि वर्गसंघर्ष सुषुप्तावस्था में है या जब तक कि वह केवल इक्कीदुक्की और अलगअलग परिघटनाओं के रूप में प्रकट होता है।
फ्रांस और इंग्लैंड में बुर्जु‍आ वर्ग ने राजनीतिक सत्ता पर अधिकार कर लिया था। उस समय से ही वर्गसंघर्ष व्यावहारिक तथा सैद्धांतिक दोनों दृष्टियों से अधिकाधिक बेलाग और डरावना रूप धारण करता गया। इसने वैज्ञानिक बुर्जु‍आ अर्थशास्त्र की मौत की घंटी बजा दी। उस वक्त से ही सवाल यह नहीं रह गया कि अमुक प्रमेय सही है या नहीं, बल्कि सवाल यह हो गया कि वह पूंजी के लिए हितकर है या हानिकारक, उपयोगी है या अनुपयोगी, राजनीतिक दृष्टि से खतरनाक है या नहीं। निष्पक्ष छानबीन करने वालों की जगह किराये के पहलवानों ने ले ली; सच्ची वैज्ञानिक खोज का स्थान दुर्भावना तथा पक्षमंडन के कुत्सित इरादे ने ग्रहण कर लिया।
...जर्मनी में उत्पादन की पूंजीवादी प्रणाली उस वक्त सामने आयी, जब उसका विरोधी स्वरूप इंगलैंड और ांस में वर्गों के भीषण संघर्ष में अपने को पहले ही प्रकट कर चुका था। इसके अलावा इसी बीच जर्मन सर्वहारा वर्ग ने जर्मन बुर्जु‍आ वर्ग की अपेक्षा कहीं अधिक स्पष्ट वर्गचेतना प्राप्त कर ली थी। इस प्रकार, जब आखिर वह घड़ी आयी कि जर्मनी में राजनीतिक अर्थशास्त्र का बुर्जु‍आ विज्ञान संभव प्रतीत हुआ, ठीक उसी समय वह वास्तव में फिर असंभव होगया।

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

कोपेनहेगन में मनुष्य का भविष्य दांव पर लगा था - अरुण माहेश्वरी

धरती की जलवायु पर कोपेनहेगन सम्मेलन (7–18 दिसंबर ’09) खत्म होगया। सम्मेलन के अंदर और बाहर, सभी जगह बेहिसाब उत्तेजना रही। उत्तेजना के मूल में यह चिंता थी कि इस पृथ्वी ग्रह को बचाने का आखिरी मौका है। अब न चेता गया तो पृथ्वी और उसपर मनुष्य मात्र के अस्तित्व पर खतरा है।

इसके बावजूद, अमेरिका, चीन, भारत, ब्राजील, जर्मनी, फ्रांस आदि आज की दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले देशों के राष्ट्राध्यक्ष घंटों सर खपाते रह गये, लेकिन जिसे सख्ती के साथ सारी दुनिया पर लागू किया जा सके, ऐसी वैद्यानिक बाध्यता वाला कोई नतीजा सामने नही आया। 

निष्कर्ष के तौर पर जिस समझौते की घोषणा की गयी, वह पर्यावरण को बचाने के बारे में एक सामान्य प्रकार की प्रतिबद्धता के अलावा और कुछ नहीं था। धरती के तापमान को और 2 डिग्री सेंटीग्रेट से ज्यादा नहीं बढ़ने दिया जाना चाहिए, धनी देश अपने ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन में कटौती करेंगे, विकासशील देश अपने उत्सर्जन पर नियंत्रण करेंगे और गरीब देशों को मौसम में परिवर्तन से निपटने के लिये आर्थिक सहायता दी जायेगी इस तरह की कुछ सामान्य प्रतिश्रुतियों के अलावा वनसंरक्षण और ग्रीन तकनीक के महत्व की बातें इस समझौते में कही गयी है।

 जो लोग इस सम्मेलन को पूरी तरह से विफल बताते हैं, उनके मंतव्य पर टाईमपत्रिका का कहना है कि यह कोरा सरलीकरणहै। उसके टिप्पणीकार के अनुसार विवादों का होना ही इस सम्मेलन का होना है। कोपेनहेगन में समझौते पर पहुंचने के लिये किया गया संघर्ष ही यह बताता है कि मौसम संबंधी नीति अब जाकर परिपक्व हुई है। 

कोपेनहेगन में चली वार्ता इतने विवादों से भरी हुई इसलिये थी क्योंकि इसके प्रस्तावों का वास्तविक असर सिफ‍र् पर्यावरण पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अर्थ– व्यवस्थाओं पर पड़ेगा। चीन और अमेरिका ने वार्ता के लिये अपने राष्ट्राध्यक्षों को भेजा और सिफ‍र् इसलिये काफी फूंक फूंक कर कदम रखे क्योंकि इसमें उन्हें कुछ खोना था।
संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में पर्यावरण सम्मेलनों का सिलसिला 1972 से शुरू होगया था। कोपेनहेगन सम्मेलन 15वां सम्मेलन था। 1997 में जापान के क्योटो में तो ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर अंकुश लगाये जाने के बारे में दुनिया के देशों के बीच बाकायदा एक समझौता हुआ था, जिसे 2005 के फरवरी से कानूनन लागू कर दिये जाने की बात थी। उस समझौते पर दुनिया के 141 देशों ने हस्ताक्षर किये थे तथा सबने अपनी राष्ट्रीय सभाओं से उन पर मोहर भी लगवा ली थी। लेकिन अकेले अमेरिका की सीनेट ने उसे स्वीकार नहीं किया और वह पूरा समझौता अधर में लटक कर रह गया। 

क्योटो संधि के अनुसार सात वर्ष के अंदर दुनिया के विकसित देशों को ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 1990 के स्तर से 5 प्रतिशत कटौती करनी थी। अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने उस पर हस्ताक्षर किये थे। लेकिन 2001 में अमेरिका के नये राष्ट्रपति जार्ज बुश ने इस संधि को यह कह कर ठुकरा दिया कि यह एक बेहद महंगा मामला है। परवर्ती दिनों में व्हाइट हाउस ने ग्लोबल वार्मिंग के बारे मे वैज्ञानिकों के आकलन पर ही सवाल उठाना शुरू कर दिया और कहा जाने लगा  कि यदि अमेरिका इस संधि को मान लेता है तो उससे सारी दुनिया में करोड़ों लोगों के रोजगार छिन जायेंगे।

प्रश्न जहां इस पृथ्वी और उसपर मनुष्यमात्र के अस्तित्व से जुड़ा हुआ हो, वहां भी राष्ट्रों के खोनेपाने का स्वार्थी हिसाब किया जा रहा है, इसे देख कर बहुतों को आश्चर्य हो सकता है। लेकिन वैश्विकचिंताओं वाले इस युग की सबसे बड़ी सचाई यही है। इससे साफ है कि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण का सवाल सिफ‍र् प्राकृतिक विज्ञान की किसी एक शाखा और उसके विशेषज्ञों का सवाल नहीं है, जैसा कि इस बीच तैयार होगयी पेशेवर पर्यावरण विशेषज्ञों की एक बड़ी सी फौज बताना चाहती है, बल्कि उससे बहुत आगे पूरे सभ्यता विमर्श से जुड़ा हुआ एक व्यापक सामाजिकआर्थिक सवाल है।

कोपेनहेगन में भी इस सच के अहसास की झलक दिखाई दी थी। इसका प्रमाण अखबारों की रिपोर्टों से पता चलता है कि वहां इका हुए गैरसरकारी प्रतिनिधियों के बीच गांधीजी के प्रति बड़ा आग्रह था और सम्मेलन स्थल के बाहर ही गांधीजी की एक बड़ी सी तस्वीर भी लगी हुई थी। आज के काल में पर्यावरण के संदर्भ में गांधीजी का स्मरण अनायास नहीं है। 

यह साल गांधीजी की पुस्तक हिंद स्वराजकी शताब्दी का साल है और हिंद स्वराजको आधुनिक सभ्यता के खिलाफ तीव्र घृणा से भरा एक जोरदार अभियोग पत्र कहा जा सकता है। इसमें मौजूदा पूंजीवादी आधुनिक सभ्यता को अधर्म’, ‘शैतानी राज्य’, ‘कलियुग’, ‘नाशकारीऔर नाशवानक्याक्या नहीं कहा गया है। यह ऐसी सभ्यता है कि इसकी लपेट में पड़े हुए लोग अपनी ही सुलगाई आग में जल मरेंगे। इस सभ्यता के प्रतीक रेलगाड़ी, वकील और डाक्टर पर गांधीजी का आरोप था कि भारत को रेलगाडि़यों, वकीलों और डाक्टरों ने कंगाल बना दिया है।

गांधीजी ने इस सभ्यता को बुरी तरह कोसा था, 1909 के बाद से लेकर आजादी के पहले तक वे अपने उन विचारों में किसी परिवर्तन के पक्ष में नहीं थे, लेकिन इतिहास इस बात का भी गवाह है कि खुद अपनी देखरेख में उन्होंने कांग्रेस के मंच से भारत के भावी विकास की जिन तमाम योजनाओं को अनुमोदित किया, वे रेल की पटरियों को उखाड़ फेंकने या अदालतों को खत्म कर देने और आधुनिक चिकित्सा को ठुकराने की योजनाएं नहीं थी। 

अगर गहराई से देखे तो पता चलेगा कि गांधीजी की आधुनिक वर्तमान की त्रासदियों की पहचान और उसे अधर्म बताना उनके असहयोगकी तरह ही उनका नकारथा, विकल्प नहीं। किसी भी बात को अस्वीकार करना भी उतना ही बड़ा आदर्श हो सकता है जितना किसी बात को स्वीकार करना...उपनिषदों के रचयिताओं ने ब्रा का सबसे अच्छा वर्णन नेतिनेतिकहकर ही किया है।  
असहयोग के बारे में रवीन्द्रनाथ की आपत्तियों पर बहस करते हुए गांधीजी का यही मूल जवाब था। 

उनके विपरीत रवीन्द्रनाथ का सारा बल इस बात पर था कि मनुष्य के अंत:करण का धर्म यही है कि वह परिश्रम से केवल सफलता ही नहीं बल्कि आनंद भी प्राप्त करता है। ...यदि कुछ लोग कहें, यह पत्थर का फलक हमारे दादापरदादाओं का हथियार है, इसको यदि हम छोड़ दें तो हमारी जाति नष्ट हो जायेगी तो जिसको वे जातिरक्षाकहते हैं वह संभव हो भी सकती है लेकिन वे मानवता की महान परंपरा को आघात पहंुचाते हैं जो उनकी भी है। जो लोग आज भी पत्थर के फलक से संतुष्ट हैं उनको मनुष्य ने जाति से बाहर कर दिया है वे जंगलों में छिपकर जीवन व्यतीत करते हैं।
इसीलिये मसला गांधीजी के इस नकारको सत्य मानने का नहीं है, उसकी अन्तरदृष्टि को समझने और आत्मसात करने का है। गांधीजी ने वर्तमान की त्रासदी की लाक्षणिक पहचान की और उसकी बुराइयों की निंदा में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। लेकिन इस त्रासदी की बुनियाद में पूंजीवादी उत्पादन संबंधों के जरिये सक्रिय जो लोभलालच काम कर रहा है, जो रवीन्द्रनाथ के संधानशील मानवीय अंत:करण को, विज्ञान भी जिसकी एक अभिव्यक्ति है, नगदकौड़ी की सेवा में नियुक्त किये हुए है, गांधीजी उसके प्रति कभी उतने निर्मम और कठोर नहीं हो पाये।

प्रकृति के साथ मनुष्य के व्यवहार को मनुष्य के साथ मनुष्य के व्यवहार से अलग करके नहीं समझा जा सकता। जिस समाज में उत्पादन के साधनों से विच्छिन्न मनुष्य की श्रम शक्ति एक बिकाऊ माल होती है, प्रकृति को अपना दास मानना और उसका अधिक से अधिक पण्यीकरण भी उसी समाज की मूल प्रवृत्ति है। 

श्रम की तरह ही प्रकृति संपदा का एक प्रमुख स्रोत है। पूंजीवादी अर्थनीतिशास्त्र उसे मुफ्त की चीज नहीं मानता। और, कहना न होगा, पूरी समाज व्यवस्था प्रकृति तथा श्रम, इन दोनों की ही अबाध लूट को बदस्तूर कायम रखने के समूचे तामझाम के अलावा और कुछ नहीं है। श्रम ही सारी संपदा का श्रोत हैक्लासिकल अर्थशास्त्र के इस कथन को मार्क्‍स एक दुरभिसंधिमूलक कथन मानते थे। उनके शब्दों में पूंजीपति अगर झूठे ही श्रम पर अलौकिक सृजन शक्ति का आरोप करते हैं तो वे ऐसा सकारण करते हैं, क्योंकि ठीक इसी बात से कि श्रम प्रकृति पर निर्भर करता है, यह बात पैदा होती है कि जिस मनुष्य के पास अपनी श्रमशक्ति के अलावा और कोई संपत्ति नहीं है, उसे समाज और संस्कृति की सभी अवस्थाओं में उन दूसरे मनुष्यों का दास होना पड़ेगा, जिन्होंने अपने को श्रम की भौतिक परिस्थितियों का मालिक बना लिया है।

मार्क्‍स के साम्यवादी समाज का श्रमजीवी मनुष्य एक सहचर मजदूरहै। वह प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका साझीदार है। समाजवादी समाज का योजनाबद्ध विकास मुनाफे की किसी अंधी दौड़ पर नहीं, प्रकृति और मनुष्य के साहचर्य पर टिका होता है।

 मजदूर वर्ग की मुक्ति का आह्वान करने वाले मार्क्‍स को थामस मुंजर का यह कथन बहुत प्रिय था कि सभी प्राणियों को संपत्ति में तब्दील कर दिया गया है, जल में मछली को, हवा में पक्षी को, धरती पर पौधों को सभी जीवित चीजों को मुक्त किया जाए।

जलवायु और पर्यावरण की तरह के प्रश्नों के टिकाऊ समाधान के लिये मानव समाज और प्रकृति के संबंधों की एक ऐसी अविभाज्य दृष्टि के विस्तार की जरूरत है। पर्यावरण की लड़ाई पूंजीवाद के खात्मे की लड़ाई से जुड़ी हुई है।

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...