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शनिवार, 6 अगस्त 2016

दिल्ली नकली राज्य है !

      लोकतंत्र अपने विकास को संविधान से शुरू तो करता है लेकिन संविधान और जनता के बीच में द्वंद्वात्मक संबंध बनाते हुए ,इस क्रम में जनता की चेतना के साथ संविधान भी बदलता है,संविधान कोई जड़ या शाश्वत चीज नहीं है,वह भी परिवर्तनीय है,इसीलिए संविधान संशोधन करने पड़ते हैं।दिल्ली की जनता की चेतना आज १९५२जैसी नहीं है,दिल्ली की जनता बदली है, राजनीतिकचेतना बदली है,संविधान में उसकी संगति में आचरण करने के लिए संशोधन करो,दिल्ली को उसके हक दो।किसने कहा कि दिल्ली की जनता को कभी अपने सपने पूरे नहीं करने देंगे।घिन आती है ऐसी राजनीति से जो जनता के हकों पर डाका डाले। शोभा के पद और जनता के नेता के पद में अंतर करने की तमीज पैदा करो।

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संविधान में यदि कुछ ऐसा लिखा है जो जनता और मौजूदा समाज के अनुकूल नहीं है तो उसे बदलो, संविधान में वही प्रासंगिक है जो जनता के हकों में इजाफा करे।संविधान का मतलब सिर्फ सत्ता के हक ही नहीं होते। सत्ता और जनता के हकों में दिल्ली के संदर्भ में असंतुलन है,अनेक जनविरोधी संवैधानिक प्रावधान भी हैं,जिनको बदलना जरूरी है।दिल्ली की जनता इस समय संविधान की आड़ में चल रहे जनविरोधी खेल को समझ रही है,कांग्रेस और भाजपानेता इस खेल में नंगे हो चुके हैं।सारे देश को दिल्ली की अधिकारहीन जनता,अधिकारहीन मुख्यमंत्री के पक्ष में बोलना चाहिए।

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यह आयरनी ही नहीं जनता का अपमान है कि दिल्ली का मुख्यमंत्री दैनिक मजूरी तक तय नहीं कर सकता!ऐसे संविधान को बदलो,जो अधिकारहीन बनाए! केन्द्रशासित क्षेत्र के नाम पर , संविधान की आड़ लेकर,अदालत की आड़ लेकर लोकतांत्रिक हकों और चुने गए मुख्यमंत्री पर हमले बंद हों,दिल्ली को स्वायत्तता दो,मुख्यमंत्री का मतलब उपराज्यपाल का गुलाम नहीं है,दिल्ली के विधायक गूंगे बहरे गुलाम नहीं हैं।कुछ तो शर्म करो,संविधान की आड में असंवैधानिक खेल बंद होना चाहिए,हमारे संविधान में अनेक चीजें हैं जो जनता के हकों के खिलाफ हैं,उन सभी को संविधान से विदा करो।संविधान पूजा के लिए नहीं जनता की सेवा के लिए है।

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दिल्ली को नकली दिल्ली कहो!जो जनता ने चुना नहीं,वो जनता पर शासन कर रहा है,जागो दिल्ली की जनता जागो!यह जनता का अपमान है कि जनता के चुने प्रतिनिधि अधिकारहीन हों और हम कहें कि ये दिल्ली के विधायक हैं,यह दिल्ली की विधानसभा है,ये दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं!

विधायक,विधानसभा, मुख्यमंत्री , जनता के हक,वोटर के हकों का अपमान देखना हो तो दिल्ली को देखो!

एक जमाने में ज्योति बसु ने कहा था हमारी विधानसभाओं को नगरपालिका से भी कम अधिकार प्राप्त हैं।दिल्ली सच में उसी अवस्था में है। जनता को अपमानित करना बंद करो।संविधान में दिल्ली को पूरे हक दो,जनता के हकों,विधायक,मुख्यमंत्री के हकों को दिल्ली के संदर्भ में नए सिरे से परिभाषित करो।संविधान की आड़ में जनता पर हमले बंद हों।

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दिल्ली विधानसभा और मुख्यमंत्री का पद अर्थहीन और झूठा पद है,यह जनता को भ्रमित करने के लिए दिये गए खोखले नाम हैं।ये नाम के रीयलसेंस को व्यक्त नहीं करते।मोदी -जंग के संयुक्त हमलों ने इस सत्य को उजागर करके केजरीवाल को रसद दे दी है,दिल्ली विधानसभा या मुख्यमंत्री अधिकारहीन हैं,अधिकार किसी को है तो वो है उपराज्यपाल ।फिर विधानसभा और मुख्यमंत्री नाम खत्म करो।महानगर पालिका घोषित करो दिल्ली को,मुख्यमंत्री को मेयर बनाओ।उपराज्यपाल पद खत्म करो,दिल्ली को सीधे केन्द्र चलाए।


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केजरीवाल ने जब फैसले लिए थे तो वे अनजान नहीं थे,असल में वे दिल्ली के हकों को नए सिरे से परिभाषित करवाने और उस के केजरीवाल ने जब फैसले लिए थे तो वे अनजान नहीं थे,असल में वे दिल्ली के हकों को नए सिरे से परिभाषित करवाने और उसमें इजाफा करने का संवैधानिक खेल में लगे हैं,यह जंग कानून की दृष्टि से जितनी महत्वपूर्ण है,सडकों पर भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।कम से कम वे कांग्रेस और भाजपा के चेहरे को बेनकाब करने में सफल रहे हैं,ये दोनों दल दिल्ली को राज्य का दर्जा दिलाने का वायदा करते रहे हैं।केजरीवाल ने अपने फैसलों को सामने रखकर उपराज्यपाल को मिले अबाध अधिकारों को उजागर किया है,साथ ही यह भी बताया है कि वे यदि अपने वायदे पूरे नहीं कर पा रहे हैं तो इसमें संवैधानिक अडचनें हैं,अत: दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को केजरीवाल के प्रचार उपकरण के रूप में देखें,केजरीवाल अपनी मुश्किलों को बताने के लिए अदालत के मंच का इस्तेमाल कर रहे हैं और इसमें फैसला कुछ भी हो लाभ केजरीवाल को ही मिलेगा।

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केजरीवाल ने जब फैसले लिए थे तो वे अनजान नहीं थे,असल में वे दिल्ली के हकों को नए सिरे से परिभाषित करवाने और उसमें इजाफा करने का संवैधानिक खेल में लगे हैं,यह जंग कानून की दृष्टि से जितनी महत्वपूर्ण है,सडकों पर भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।कम से कम वे कांग्रेस और भाजपा के चेहरे को बेनकाब करने में सफल रहे हैं,ये दोनों दल दिल्ली को राज्य का दर्जा दिलाने का वायदा करते रहे हैं।केजरीवाल ने अपने फैसलों को सामने रखकर उपराज्यपाल को मिले अबाध अधिकारों को उजागर किया है,साथ ही यह भी बताया है कि वे यदि अपने वायदे पूरे नहीं कर पा रहे हैं तो इसमें संवैधानिक अडचनें हैं,अत: दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को केजरीवाल के प्रचार उपकरण के रूप में देखें,केजरीवाल अपनी मुश्किलों को बताने के लिए अदालत के मंच का इस्तेमाल कर रहे हैं और इसमें फैसला कुछ भी हो लाभ केजरीवाल को ही मिलेगा।जरीवाल ने जब फैसले लिए थे तो वे अनजान नहीं थे,असल में वे दिल्ली के हकों को नए सिरे से परिभाषित करवाने और उसमें इजाफा करने का संवैधानिक खेल में लगे हैं,यह जंग कानून की दृष्टि से जितनी महत्वपूर्ण है,सडकों पर भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।कम से कम वे कांग्रेस और भाजपा के चेहरे को बेनकाब करने में सफल रहे हैं,ये दोनों दल दिल्ली को राज्य का दर्जा दिलाने का वायदा करते रहे हैं।केजरीवाल ने अपने फैसलों को सामने रखकर उपराज्यपाल को मिले अबाध अधिकारों को उजागर किया है,साथ ही यह भी बताया है कि वे यदि अपने वायदे पूरे नहीं कर पा रहे हैं तो इसमें संवैधानिक अडचनें हैं,अत: दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को केजरीवाल के प्रचार उपकरण के रूप में देखें,केजरीवाल अपनी मुश्किलों को बताने के लिए अदालत के मंच का इस्तेमाल कर रहे हैं और इसमें फैसला कुछ भी हो लाभ केजरीवाल को ही मिलेगा।में इजाफा करने का संवैधानिक खेल में लगे हैं,यह जंग कानून की दृष्टि से जितनी महत्वपूर्ण है,सडकों पर भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।कम से कम वे कांग्रेस और भाजपा के चेहरे को बेनकाब करने में सफल रहे हैं,ये दोनों दल दिल्ली को राज्य का दर्जा दिलाने का वायदा करते रहे हैं।केजरीवाल ने अपने फैसलों को सामने रखकर उपराज्यपाल को मिले अबाध अधिकारों को उजागर किया है,साथ ही यह भी बताया है कि वे यदि अपने वायदे पूरे नहीं कर पा रहे हैं तो इसमें संवैधानिक अडचनें हैं,अत: दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को केजरीवाल के प्रचार उपकरण के रूप में देखें,केजरीवाल अपनी मुश्किलों को बताने के लिए अदालत के मंच का इस्तेमाल कर रहे हैं और इसमें फैसला कुछ भी हो लाभ केजरीवाल को ही मिलेगा।Like

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बुधवार, 20 जुलाई 2016

केजरीवाल के पंजाबीगेम

केजरीवाल ने पंजाब विधानसभा चुनाव के मीडियागेम और माइंडगेम में भाजपा-अकाली और कांग्रेस तीनों की नींद उडाकर रख दी है,आम आदमी पार्टी जीतेगी या हारेगी यह भविष्य बताएगा लेकिन फिलहाल ´आप´ जैसा छोटा नवोदित दल मैदान में है और इन सभी दलों को अपने नेताओं पर संदेह हो रहा है कहीं वो वहां न चला जाए !

मोदीजी की जमा पूंजी है टीवी और साइबर प्रचार,मजेदार बात यह है केजरीवाल इस मामले में मोदीजी से बहुत आगे है।मोदीजी साइबर के नवोदित नेता हैं जबकि केजरीवाल साइबर हीरो है।यह बात दिल्ली की पराजय के बाद से मोदीजी भूले नहीं हैं।पंजाब में सिद्धू को सामने करके मोदीजी की टीवी इमेज से ज्यादा वजन का टीवी नायक मैदान में लाकर केजरीवाल ने मोदीजी का खर्चा और ब्लडप्रेशर बढ़ा दिया है।मोदीजी की तरह ही तुकबंदी भाषण देने में सिद्धू सिद्दहस्त है,सच में पंजाब विधानसभा चुनाव बेहद रंगीन होने जा रहा है।

पंजाब विधानसभा चुनाव में क्या होगा यह तो भविष्य बताएगा लेकिन भाजपा को छोड़कर जाने वालों का सिलसिला केजरीवाल ने आरंभ करके मोदीजी के आभामंडल के प्रभाव को क्षीण जरूर कर दिया है,केजरीवाल के भाजपा पर पड रहे छापे सीबीआई के आप पर पड़े छापे से ज्यादा कष्टदायक हैं मोदीजी के लिए।

पंजाब महत्वपूर्ण राज्य है आम आदमी पार्टी को वहाँ यदि विधानसभा चुनाव गंभीरता ,स्वच्छता और ईमानदारी से लड़ना है तो नवजात सिंह सिद्धू को अपना नायक नहीं बनाना चाहिए। टीम का नायक किसी निष्ठावान राजनीतिक व्यक्ति को बनाना चाहिए। सिद्धू को नायक बनाने का अर्थ है आम आदमी पार्टी का पत्तागोल !अराजनीतिक व्यक्ति को नायक बनाकर राजनीति नहीं कर सकते केजरीवाल!

कल तक अरुणाचल में जो कांग्रेसी विधायक मोदीजी के साथ थे वे भी उनको छोडकर फिर कांग्रेस में लौट गए। मोदीजी दलदल कराकर कितना मूर्ख बनाओगे जनता को!अरूणाचल से चली हवा पंजाब में पहुँच गयी! मोदीजी यह आपके पतन की शुरूआत है। आपकी उलटी गिनती शुरू हो चुकी हैं।

पंजाब में तो विधानसभा चुनाव के पहले ही भाजपा का रथ पंक्चर ! सिद्धू का जाना अपशकुन है मोदीजी! हवन करेंगे हवन करेंगे!!

शनिवार, 7 मई 2016

डिग्री का मायाजाल और हनुमानभाव


     जब हमने कह दिया तुम भगवान हो तो भगवान हो ! जब हमने कह दिया तुमसे ज्यादा कोई बलिष्ठ नहीं है,तो कोई नहीं है ! हमारे यानी भक्त के कहने का मूल्य है ! तुम तो जानते ही हो भगवान को भगवान खुद भगवान ने नहीं बनाया बल्कि भक्तों ने भगवान को भगवान बनाया है!तुम जान लो श्रीराम –श्रीराम न होते यदि भक्त हनुमान न होते ! हमने देखा है भगवान के पेशाब से चिराग जलता है,हमने महसूस किया भगवान के इशारे पर सारे मीडिया की आवाज बंद हो जाती है ! सारा मीडिया भगवान –भगवान करने लगता है ! यह भगवान का ही खेल है कि आरएसएस जैसा संगठन भेड़ बन गया है! भगवान के जब इतने खेल चल रहे हों तो ऐसी अवस्था में ये क्या डिग्री दिखाओ –डिग्री दिखाओ लगा रखा है !

डिग्री की जरूरत मूर्खों की पड़ती है !देवता और अक्लमंद डिग्री से नहीं पहचाने जाते ! तुम कम अक्ल हो, इसीलिए डिग्री-डिग्री चिल्ला रहे हो!भगवान तो भगवान हैं ,वे महाअक्ल हैं!वे कृपानिधान हैं! सर्वगुण सम्पन्न हैं! उनकी इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता! वैंकेय्या नायडूजी आप उनसे भी महान् हैं! हमारे यहां हिन्दी साहित्य में कहावत है भक्त भगवान से बड़ा होता है ! भगवान और भक्त में भक्त ताकतवर होता है! नायडूजी आपकी भक्ति देखकर मेरा मन भक्त-भक्त हो गया है ! आपसे अंदर से ईर्ष्या भी हो रही है कि मैं आप जैसा भक्त क्यों नहीं बन पाया !

नायडूजी आपने सही कहा पीएम नरेन्द्र मोदी भगवान की देन हैं,स्वयं भगवान हैं!कमाल की खोज की है आपने ! सही कहा है किसी ने ,जो चीज भक्त को नजर आती है वह चीज भगवान में गैर-भक्तों को नजर नहीं आती ! नायडूजी आपकी जय हो!आपने हम सबकी आँखें खोल दीं! आप कितने महान् हैं कि आपने मोदी भगवान् की खोज कर ली !आप इसलिए भी महान् हैं क्योंकि आपने भगवान् को भगवान् बना दिया!

पत्थर की मूर्ति में भगवान् की जो प्राणप्रतिष्ठा करता है उसका लोग परम भक्त के रूप में प्रतिदिन स्मरण करते हैं! नायडूजी आपकी भक्ति देखकर इस समय ईश्वर के रीयल भक्त भी थर-थर काँपने लगे हैं,पश्चाताप की आग में जल रहे हैं कि अरे सामने भगवान खड़े थे,घर –घर में टीवी स्क्रीन में भगवान गीता पढ़ रहे थे,लेकिन हम अभागे उनको देख ही न पाए!नायडूजी रीयल भक्त दुखी हैं और पीड़ित भी हैं कि हमारे जैसे धर्मप्राण भारत में साक्षात भगवान पधारे और वे उनको पहचान नहीं पाए! नायडूजी आपने भारत की भक्तप्राण जनता की आँखें खोल दीं,आप धन्य हैं और हमें धिक्कार है !

नायडूजी आपकी भक्ति और दिव्यदृष्टि देखकर अरविन्द केजरीवाल पर गुस्सा आ रहा है,लगता है यह आदमी ठीक नहीं है,भक्त को नहीं पहचानता ! भगवान को नहीं पहचानता ! पता नहीं यह मोदी भगवान को छोड़कर काहे को रोज जय हनुमान –हनुमान करता रहता है !

जिस तरह हर गली में हनुमान घूमते रहते हैं वैसे ही यह भी घूमता रहता है,जिस तरह गली के छोरे किसी के पीछे पड़ जाते हैं तो झल्लाकर रख देते हैं,इसने भी गली के छोकरों की तरह मूर्खतापूर्ण सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं,कह रहा भगवान की डिग्री फेक है! पागल हो गए हो केजरीवाल ! लेकिन नहीं हमें उसकी बात पर गौर करना चाहिए।असल में केजरीवाल तो हनुमान भाव में रहता है! हनुमान भाव बेहद खतरनाक है यह रावण को मौत के मुँह तक पहुँचा चुका है,वह बहुत सारी डिग्रियों से युक्त पंडित था,लेकिन हनुमान भाव ने रावण की ,सत्ता,डिग्रियों और विद्वता को एक ही झटके में राख करके रख दिया था,सोने की लंका में आग लगा दी ।हनुमान भाव में निडरता और पूंछ बहुत महत्वपूर्ण है,लंका में आग लगाने के लिए हनुमान की निडरता और पूंछ ही महान् हैं!

हनुमान भाव के सामने महाबली ,महापंडित रावण का सारा कौशल बेकार गया! हनुमान भाव से राम भी प्रभावित थे।हनुमान भाव यानी आग लगाने वाला भाव,लंका जलाने वाला भाव!इस भाव के सामने सब कुछ नश्वर है,भगवान भी नश्वर है,विद्वान भी नश्वर है,राम की विजय में हनुमान भाव की कभी किसी ने उस तरह चर्चा नहीं की है,लेकिन आप तो जानते ही हैं हनुमान भाव महान है। हनुमान भाव का लक्ष्य है रावण का वध ! हनुमान भाव के लिए सत्य,तथ्य, तर्क-वितर्क महत्वपूर्ण नहीं है।हमने बार-बार देखा है भक्तभाव के जितने रूप हैं उनमें हनुमान भाव सबसे ताकतवर है।भगवान राम के भक्त काम नहीं आए,हनुमान भाव काम आया! तुम यादकरो हनुमान के पास क्या था ॽ सिर्फ हनुमान भाव था!हनुमान भाव यानी निडरता! केजरीवाल इसलिए सुंदर लगता है क्योंकि वह निडर है!भक्त कमजोर होता है क्योंकि वह निडर नहीं होता!तुम तो जानते हो लोकतंत्र की कुंजी उनके हाथ में है जो निडर हैं ! अब सोचो तुमको भक्त बनना है या निडर बनना है।निडर बनना है तो हनुमान भाव में जाओ,लंका में आग लगाओ !



शुक्रवार, 6 मई 2016

मोदी-ईरानी निराश न हों! डिग्रियां ही डिग्रियां!


         जब देश में प्रधानमंत्री और मानव संसाधन मंत्री की डिग्रियां फेक हों तो सोचो इनके निशाने पर सबसे पहले कौन होगा ॽ जाहिरा तौर पर शिक्षा क्षेत्र होगा।विश्वविद्यालय होंगे,दिल्ली विश्वविद्यालय होगा।हमारे सीपीआईएम के शिक्षकनेता खासतौर पर सुन लें कि उनकी यह पहली जिम्मेदारी बनती थी कि वे नरेन्द्र मोदी और स्मृति ईरानी की फेक डिग्री के मामले को उठाते और इन दोनों नेताओं को बेनकाब करते।लेकिन उन्होंने यह काम नहीं किया।जबकि शिक्षक संघ में उनका नेतृत्व है। हम नहीं मानते कि इस मामले में माकपा के नेताओं ने अनजाने चूक की है,बल्कि यह माकपा के शिक्षक नेताओं में बढ़ रही अ-राजनीतिक मनोदशा का परिणाम है।सोचने वाली बात यह भी है कांग्रेस का दमदार नेतृत्व है डीयू में लेकिन उसने भी यह काम नहीं किया,क्योंकि उनको भी मोदीजी से लेन-देन की राजनीति करनी है।

आम आदमी पार्टी को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उसने पीएम नरेन्द्र मोदी और मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी की फेक डिग्रियों के मसले को राष्ट्रीय प्रश्न बना दिया।ताज्जुब की बात यह है कांग्रेस और माकपा दोनों ने संसद में इन दोनों नेताओं की फेक डिग्री के मसले को आजतक पुरजोर ढ़ंग से नहीं उठाया,एक भी दिन संसद ठप्प नहीं की। इस मसले की इन दोनों दलों द्वारा उपेक्षा अनजाने में नहीं हुई है।बल्कि सुनियोजित समझ का परिणाम है।

संसद में इन दोनों नेताओं पर दबाव डाला जाए कि ये दोनों नेता अपनी वैध डिग्रियां संसद के पटल पर पेश करें,जिससे उनकी वैधता की जांच करायी जा सके।लेकिन सत्ता और विपक्ष में इस मामले में नूरा कुश्ती चल रही है।पूरा विपक्ष मोदीजी और ईरानीजी को घेर सकता था लेकिन घेर नहीं रहा।क्यों नहीं घेर रहा ॽ क्यों अकेले आम आदमी पार्टी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने यह फ्रंट संभाला हुआ है ॽ क्या विपक्ष की इस मामले में कोई जिम्मेदारी है या नहीं ॽ

ईरानीजी और मोदीजी की फेक डिग्रियों के प्रसंग में मुझे 1970 के दशक की दिल्ली की दीवारें याद आ रही हैं,उस समय इन दीवारों पर पोस्टर लगे रहते थे-हाईस्कूल फेल निराश न हों,सीधे बी.ए. करें।इसी तरह-बी.ए.फेल निराश न हों सीधे एम.ए. करें।सचदेवा इंस्टीट्यूट के इस तरह पोस्टरों से दिल्ली भरी रहती थी। इन पोस्टरों का मुख्य शीर्षक हुआ करता था,´निराश न हों´,हमें लगता यही है इन दोनों नेताओं ने इस तरह के पोस्टरों से प्रभावित होकर अपनी डिग्री की अभिलाषा को पूरा किया होगा !!

इस तरह के इंस्टीट्यूट उस जमाने में हजारों निराश युवक-युवतियों के लिए आशा की किरण बनकर सामने आए थे।लाखों निराश युवाओं के इनके जरिए घर बसे,डिग्री पाने की अभिलाषा पूरी हुई। वरना यह कैसे संभव है कि आम आदमी पार्टी चीख-चीखकर कह रही है पीएम की डिग्रियां फेक हैं लेकिन पीएम जबाव नहीं दे रहे,ईरानी जबाव नहीं दे रहीं।

आम आदमी पार्टी ने इन दोनों नेताओं की डिग्रियों के बारे में सही ढ़ंग से खोज की है और सारे तथ्य जुटाए हैं और राजनीतिक पहल करके हमला बोला है।इस समय आम आदमी पार्टी के हाथ में इन दोनों नेताओं की गर्दन है।हम भी देखें सच्चाई कब तक सामने आती है। पीएम मोदी और ईरानीजी ने लगातार विभिन्न स्तरों पर अपनी डिग्रियों को लेकर सफेद झूठ बोला है।यदि उनके दावे में जान होती तो ये दोनों नेता अपनी डिग्री को संसद के पटल पर रख देते और सारी बहस खत्म हो जाती।लेकिन पीएम की एमए डिग्री के बारे में गुजरात वि.वि. के उपकुलपति बोले जो कि स्वयं में समस्या खड़ी करके चले गए,उनके बयान में साफ था कि पीएम मोदी की एम.ए.डिग्री ऊपर के दवाब में आनन-फानन में तैयार की गयी है।वरना सभी सूचनाएं एक साथ सामने रखी जानी चाहिए।



हम मांग करते हैं पीएम मोदी और मानव संसाधन मंत्री ईरानीजी अपनी सारी डिग्रियां संसद के पटल पर रखें जिससे सच्चाई सामने आ सके।यदि इन्होंने झूठ बोला है तो इनको पद छोड़ना चाहिए।मोदी सरकार को इस्तीफा देना चाहिए।मुखिया के नाते राजनीतिक तौरपर वे जिम्मेदार हैं और झूठ बोलने के लिए उन्हें दण्डस्वरूप सरकार से इस्तीफा देना चाहिए।

मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

आम आदमी पार्टी और लोकतंत्र की चुनौतियाँ


         'आप' के आंतरिक कलह को लेकर मीडिया में इनदिनों जमकर लिखा गया है। इसमें निश्चित रुप से आनंदकुमार,प्रशांत भूषण,योगेन्द्र यादव आदि के द्वारा उठाए सवाल वाजिब हैं । कुछ महत्वपूर्ण सवाल केजरीवाल एंड कंपनी ने भी उठाए हैं जो अपनी जगह सही हैं। दोनों ओर से जमकर एक-दूसरे के व्यवहार और राजनीतिक आचरण की समीक्षा भी की गयी है। गंदे और भद्दे किस्म के हमले भी हुए हैं। अंततः स्थिति यह है कि 'आप' एक राजनीतिक दल के रुप में बरकरार है । जब तक वह राजनीतिक दल के रुप में बरकरार है और केजरीवाल जनता के मुद्दे उठाता है आम जनता में उसकी राजनीतिक साख बनी रहेगी ।
     'आप' एक राजनीतिक दल है, वह कोई एनजीओ नहीं है। वह बृहत्तर लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रिया का अंग है। राजनीतिक दल होने के नाते और खासकर दिल्ली में सत्ताधारी दल होने के नाते उसकी साख का फैसला उसके सरकारी और गैर-सरकारी कामकाज पर निर्भर  है। राजनीतिक प्रक्रिया में दलीय लोकतंत्र के सवाल बहुत छोटे सवाल हैं। राजनीतिक प्रक्रिया के लिए नेताविशेष के निजी दलीय आचरण के सवाल भी बहुत बड़े सवाल नहीं होते। उल्लेखनीय है लोकतंत्र में निजी आचार-व्यवहार कभी भी निर्णायक राजनीतिक सवाल नहीं बन पाता।          
      राजनीतिक प्रक्रिया में निजी की हाशिए के सवाल जैसी भूमिका भी नहीं होती। राजनीति में दलीय भूमिका होती है,दलीय सार्वजनिक संघर्ष की भूमिका होती है। राजनीतिक प्रक्रिया बेहद निर्मम होती है। वह निजी को निजी नहीं रहने देती। निजी को राजनीतिक बना देती। निजी जब राजनीतिक बनता है वह मूल्य नहीं रह जाता,वह राजनीति का लोंदा बन जाता है।  यदि किसी नेता की निजी बातों, चीजों, आदतों या निजी नजरिए को आप हमले के लिए चुनते हैं तो उससे नेता पर कोई फर्क नहीं पड़ता।हम जान लें राजनीतिक प्रक्रिया ,नेता या नेताओं के निजी व्यवहारों से निर्देशित नहीं होती। वह तो राजनीतिक प्रक्रिया से निर्देशित होती है।
      व्यक्तित्व विश्लेषण के लिए निजी का महत्व है लेकिन राजनीतिक प्रक्रिया के लिए निजी बातों और निजी नजरिए का कोई महत्व नहीं है, राजनीतिक प्रक्रिया में तो राजनीतिक एक्शन ही प्रमुख है। इसलिए अरविंद केजरीवाल निजी तौर पर कैसा आदमी है, इसका कोई खास असर राजनीतिक प्रक्रिया पर होने वाला नहीं है। राजनीतिक प्रक्रिया में नेता का निजी आचरण और निजी नजरिया ही यदि महत्वपूर्ण होता तो मोदी पीएम न होते, श्रीमती इंदिरा गांधी दोबारा सत्ता में न आतीं, उसके पहले कांग्रेस को तोड़कर वे पीएम न बन पातीं। कहने का आशय यह कि केजरीवाल को देखने के लिए हमें उसके निजी आचार-व्यवहार के दायरे से बाहर निकलकर देखना होगा।
     लोकतंत्र में राजनीतिक प्रक्रिया बहुत ही जटिल और संश्लिष्ट होती है। 'आप' का जन्म ऐतिहासिक कारणों से हुआ है और उसके खाते में कुछ ऐतिहासिक काम भी मुकर्रर हैं, हम चाहें या न चाहें , उसे वे काम करने हैं,वह यदि इसमें चूकती है तो अप्रासंगिक होने को अभिशप्त है। 'आप' ने दिल्ली में ऐतिहासिक जीत दर्ज करके बहुत बड़ी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली है। उसने साम्प्रदायिक ताकतों को बुरी तरह परास्त किया है। उसने कांग्रेस को दिल्ली में कहीं का नहीं छोड़ा। सवाल यह है  क्या वह आने वाले समय में अपने राजनीतिक एक्शन के जरिए आम जनता के ज्वलंत सवालों पर नियमित सक्रियता बनाए रख पाती है ?

     'आप' के सामने पहली चुनौती है दिल्ली सरकार चलाने की और सरकार को पारदर्शी-लोकप्रिय बनाए रखने की। दूसरी बड़ी चुनौती है केन्द्र सरकार की जनविरोधी नीतियों का स्वतंत्र और अन्यदलों के साथ मिलकर विरोध संगठित करने और व्यापक जनांदोलन खड़ा करने की।उल्लेखनीय है व्यापक हित के जनांदोलनों के अभाव के गर्भ से 'आप' का जन्म हुआ है, 'आप' को यह नहीं भूलना है कि जनांदोलन करना उसकी नियति ही नहीं लोकतंत्र की आज ऐतिहासिक अवस्था की जरुरत भी है। तीसरी बड़ी चुनौती है सत्ता के लोकतांत्रिकीकरण की, सत्ता के लोकतांत्रिकीकरण के जिस मॉडल की उसने वकालत की है उसको वह धैर्य के साथ दिल्ली में लागू करे और जन-समस्याओं के त्वरित और जनशिरकत वाले मॉडल को विकसित करे, इससे उसकी राजनीतिक साख तय होगी ।  

बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

"आप" की जीत का सच



   दिल्ली विधानसभा चुनाव हो गए, चौदह फ़रवरी 2015 को नए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण करेंगे । वे रोड शो करते हुए सभा स्थल तक जाएँगे। यह नए क़िस्म का शक्ति प्रदर्शन और मीडिया इवेंट है । यह असल में मोदी के जलसेबाज फिनोमिना का जलसेबाजी से खोजा जा रहा विकल्प है । यह दुनिया के सामने लोकतंत्र को मजमे में तब्दील करने का शो भी है। अन्ना हज़ारे के सुझाव को केजरीवाल ने मान लिया होता तो बेहतर होता।   यह लोकतंत्र के नायक की पहली चूक गिनी जाएगी। सादगी से शपथग्रहण समारोह करने से केजरीवाल का क़द छोटा नहीं होता , जलसेबाजी से क़द बड़ा भी नहीं होता ! केजरीवाल का जलसा प्रेम अंततः मोदी के छंद में बँधने की शुरुआत है । मोदी को बेनक़ाब करने के लिए मोदी का छंद चुनाव तक प्रासंगिक है , सत्तारुढ़ होने के बाद जलसेबाजी करना लोकतंत्र और नेता की ताक़त कम और कमज़ोरी ज्यादा दिखाता है। बेहतर होता शपथग्रहण की जलसेबाजी न होती ! 
         केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को दिल्ली में अभूतपूर्व विजय हासिल हुई है । यह जीत क्यों और कैसे मिली ? किन शक्तियों की इस जीत में भूमिका थी ? कारपोरेट घरानों की प्रतिस्पर्धा की क्या भूमिका थी ? संघ और कांग्रेस की क्या भूमिका थी ? देश की भावी राजनीति का स्वरुप क्या होगा ? इत्यादि सवालों पर आने वाले समय में विस्तार से सूचनाएँ और विश्लेषण आएँगे । लेकिन एक बात तय है कि यह जीत अभूतपूर्व है। 
         ' आप' की जीत के बारे में जनमत सर्वेक्षण दूसरी बार एकसिरे से ग़लत साबित हुए हैं , इससे जनमत सर्वेक्षण की वैज्ञानिकता के सभी दावों पर सवालिया निशान लगा है । जनमत सर्वेक्षण लगातार दो बार ग़लत साबित होना, यहाँ तक तक कि 'आप' का सर्वे भी ग़लत साबित होना दर्शाता है कि आम जनता अॉंकड़ा नहीं है। आम जनता की राय को मीडिया इच्छित दिशा में नहीं मोड़ सकता ! मीडिया प्रचार की सीमाएँ हैं , लेकिन ज़मीनी प्रचार की कोई सीमा नहीं है,वह आज भी सबसे ज्यादा प्रभावशाली है। 
       दूसरा संदेश यह निकलता है कि धर्मनिरपेक्ष संगठन के निकास के आम जनता में व्यापक आसार हैं । धर्मनिरपेक्ष राजनीति को किसी भी तरह हाशिए पर रखकर लोकतंत्र का अपहरण नहीं किया जा सकता।  ' आप' किस वर्ग के विचारों का दल है इसके बारे में वे भी नहीं छिपाते। लेकिन एक तथ्य निर्विवाद है कि ' आप' धर्मनिरपेक्ष - लोकतांत्रिक  दल है और उसके पास लोकतंत्र का वैकल्पिक नजरिया है और संविधान में वर्णित मूल्यों के प्रति उसकी गहरी आस्थाएँ हैं। यही चीज उसे अन्य बुर्जुआदलों ( कांग्रेस-भाजपा-सपा-बसपा आदि) से भिन्न बनाती है । 
                       भारत में स्वस्थ बुर्जुआ राजनीति के लिए पर्याप्त स्थान है और यही चीज " आप" की प्रासंगिकता के साथ बुर्जुआ राजनीति की प्रासंगिकता को भी पुष्ट करती है । 
           केजरीवाल की 2015 की दिल्ली जीत का प्रधान कारण है दैनंदिन जन समस्याओं का समाधान न कर पाने में केन्द्र सरकार की असफलता । केन्द्र सरकार ने यदि जन समस्याओं के समाधान का प्रयास किया होता तो भाजपा को इतनी बुरी हार का सामना न करना पड़ता। कहने को दिल्ली राजधानी है लेकिन अराजक और जनविरोधी विकास के कांग्रेसी मॉडल का आदर्श नमूना है। मोदी सरकार ने विगत आठ महिनों में इस मॉडल में कोई बदलाव नहीं किया। बिजली के बिल, बिजली की सप्लाई , पानी की सप्लाई और क़ानून और व्यवस्था , प्रदूषण आदि समस्याओं के साथ झुग्गी- झोंपड़ियों के अबाधित प्रसार और नागरिक सुविधाविहीन संसार ने आम जनता को भयानक क्रोध से भर दिया है ।
   " आप" ने आमजनता को उपरोक्त सवालों पर परंपरागत कम्युनिकेशन के आधार पर संगठित किया । जन समर्थन जुटाने के परंपरागत तरीक़ों के जरिए ताक़तवर संगठन का निर्माण किया ।साथ ही आम जनता को मतदान पेटियों तक पहुँचाया। इस प्रक्रिया में "आप" का जनाधार क्रमश: बढा और उसका प्रचार भी सबसे ज्यादा प्रभावशाली रहा। 
         यह कहना ग़लत है कि संघ की फूट का या कांग्रेस के मतों की "आप" की जीत में कोई निर्णायक भूमिका है। कांग्रेस और संघ ने यथाशक्ति संघर्ष किया लेकिन आम जनता के व्यापकतम तबक़ों को अपने साथ जोड़ने में ये दोनों ही दल असफल रहे हैं। जो दल चुनाव लड़ते हैं वे हारने के लिए नहीं लड़ते । संघ-भाजपा - कांग्रेस ने चुनाव ताक़त के साथ लड़ा अत: उनके वोट "आप" को नहीं मिले । 
    भाजपा को एक साल पहले विधानसभा चुनाव में जितने मत मिले थे तक़रीबन उतने ही वोट उसे इसबार भी मिले हैं। यह बात दीगर है कि लोकसभा चुनाव की तुलना में उसे कम वोट मिले हैं। लेकिन लोकसभा चुनावों के वोटों के साथ तुलना करना सही नहीं होगा। 
       केजरीवाल की जीत में "आप" की मीडिया और प्रौपेगैण्डा रणनीति बेहद आकर्षक और प्रभावशाली रही है। उसके सभी शीर्ष नेताओं का सोशल मीडिया से लेकर जनसभाओं और रोड शो तक सक्रिय रहना, टीवी से लेकर नुक्कड़ सभाओं तक बोलना बेहद प्रभावशाली रहा है। इस समूची प्रक्रिया में " आप" ने लोकतंत्र का राजनीतिक चरित्र निखारा है और राजनीति के प्रति आम लोगों की आस्था को पुख़्ता बनाया है। 
                  भाजपा आरंभ से मोदी और टीवी उन्माद पर केन्द्रित रही और ये दोनों ही पहलू ज़मीनीस्तर पर आम जनता को प्रभावित करने में असमर्थ रहे। आश्चर्यजनक बात यह रही कि विकास की बातें करने वाले मोदी ने निजी हमले किए, निम्नस्तरीय राजनीतिक जुमलेबाजी और नारेबाज़ी की भाषा का प्रचार में इस्तेमाल किया। वे एक भी सकारात्मक बात आम जनता के सामने नहीं रख पाए । किरनबेदी को भाजपा ने आख़िरी समय में केजरीवाल के दबाव में मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रुप में पेश किया । 
    असल में  किरनबेदी की टीवी इमेज से प्रभावित होकर ही मोदी ने उनको मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाया। सच यह है कि किरन बेदी की टीवी इमेज का संबंध अन्ना के आंदोलन से था , उस इमेज का भाजपा की राजनीति से कोई संबंध नहीं था । अत: भाजपा की राजनीति में किरनबेदी की इमेज एकदम मिसफ़िट लग रही थी और इसने भाजपा की समूची व्यूह रचना को पंगु बनाकर रख दिया । भाजपा की सबसे बड़ी असफलता यह रही कि उसके पास कोई भाजपाई इमेज मैदान में पेश करने लायक नहीं थी। वैसी स्थिति में भाजपा को कम से कम इमेज संकट का सामना नहीं करना पड़ता । लेकिन परिणाम में कोई गुणात्मक अंतर नहीं पड़ता । इमेज की प्रचार में भूमिका होती है, वोट लाने में संगठन की भूमिका होती है। दिल्ली में भाजपा का संगठन लोकसभा विजय के बाद सत्तादास होकर रह गया । 
      कांग्रेस की स्थिति यह है कि वह लोकसभा और दिल्ली विधानसभा की चुनावी हार से अभी तक बाहर नहीं निकल पायी है। यही वो अनुकूल परिवेश था जिसमें केजरीवाल के नेतृत्व में "आप" को 67 सीटों पर जीत मिली और तीन सीटों पर भाजपा विजयी रही।  
            
                

शनिवार, 31 जनवरी 2015

लोकतंत्र के कु-संवादी और पाँच सवाल का झुनझुना

        आज (30जनवरी ) गांधी की हत्या की गयी थी।यह हत्या उस विचार ने की जिसके हिमायती इन दिनों दिल्ली में घर –घर जाकर वोट मांग रहे हैं। गांधी से बड़ा कोई संवादी नहीं था,लेकिन संवाद करने की बजाय हत्यारे ने उनकी ह्त्या कर दी। गांधी की हत्या में जिस संगठन के विचारों की भूमिका थी उसे सारा देश जानता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि गांधी के हत्यारे को नायक बनाकर पेश किया जा रहा है। हत्यारे के पूजकों के खिलाफ मोदी सरकार के किसी भी मंत्री या प्रधानमंत्री ने एक बयान तक जारी नहीं किया। सवाल यह है गांधी के हत्यारे का महिमामंडन करने वालों की संघ प्रमुख और प्रधानमंत्री ने अभी तक निंदा क्यों नहीं की ? यह क्यों नहीं कहा कि देश में हम कहीं पर भी गोडसे की मूर्ति नहीं लगने देंगे।

दिल्ली में गांधी मारे गए और दिल्ली में ही गांधी के हत्यारे का मंदिर बनाने की तैयारियां हो रही हैं। किरनबेदी साफतौर पर जबाव दें कि यदि वे मुख्यमंत्री बनती हैं तो गांधी के हत्यारे का मंदिर बनेगा या नहीं ? मंदिर बनाने वालों की उन्होंने अभी तक निंदा क्यों नहीं की ? क्या इस उत्तर से काम चलेगा कि कानून अपना काम करेगा ! संघ के नेताओं-सांसदों-मंत्रियों और किरनबेदी से दिल्ली की हर गली में गोड़से के मंदिर बनाए जाने पर सवाल किया जाना चाहिए। संघ परिवार दो-टूक ढ़ंग से गोड़से पूजकों की निंदा करने में असफल रहा है,संघ की चुप्पी का अर्थ यह भी हो सकता है कि संघ उनका समर्थन कर रहा हो ? क्या गोड़से समर्थकों को लोकतंत्र की चौखट(दिल्ली सरकार) में प्रवेश करने की अनुमति दी जा सकती है ?

लोकतंत्र संवाद से समृद्ध होता है। नेता-मंत्री-सांसद या पीएम के भाषण से नहीं। नेता के शामिल होने से दलबल समृद्ध होता है,मीडिया समृद्ध होता है। संवाद के लिए लोकतांत्रिक विवेक और लोकतांत्रिक आचरण का होना पहली शर्त्त है। जिस नेता को संवाद करना है उसके पास लोकतांत्रिक विवेक न हो तो संवाद संभव ही नहीं है।यही वह परिप्रेक्ष्य है जहां से लोकतंत्र में संवाद-विवाद और विचारधारात्मक संघर्षों को देखा जाना चाहिए। संवाद की दूसरी शर्त है सहिष्णुता और जिम्मेदारी। संवाद करने वाला या सवाल करने वाला कितनी जिम्मेदारी से अपनी भूमिका निभाता है ? अपने विचारों के प्रति वह कितना गंभीर है। कितना हास्यास्पद है कि मोदी सरकार एक तरह कारपोरेट घरानों की मदद लेकर अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने में लगी है,लेखकों –कलाकारों को संघी बंदे निशाना बना रहे हैं,ऐसे में भाजपा सवाल पूछने का नाटक कर रही है !

भाजपा और संघ का समूचा आचरण कु-संवादी का है। वे संवाद में विश्वास नहीं करते,संसद में विश्वास नहीं करते, संवाद के नाम पर नॉनसेंस या कु-संवाद करते हैं। यह हास्यास्पद है कि वे सत्ता पाने के बाद सवाल कर रहे हैं ! देश की समस्याओं के समाधान और उन पर संवाद का सिलसिला आरंभ करने की बजाय एक ऐसी पार्टी से सवाल कर रहे हैं जिसका जन्म कुछ साल पहले हुआ है।

सवाल यह है मोदी सरकार-भाजपा ने उन सवालों के समाधान क्यों नहीं खोजे या सुझाए जिनसे दिल्ली की जनता परेशान है? दिल्ली की जनता के प्रति भाजपा और मोदी सरकार जिम्मेदार भाव से पेश आती तो दिल्ली की जनता को एक साल बाद तमाम फजीहत के बाद चुनाव की बजाय तत्काल चुनाव कराके सरकार दी जा सकती थी ! मोदी-भाजपा-संघ जानते थे कि उनके पास सरकार बनाने का बहुमंत नहीं था इसके बावजूद वे एक साल तक जोड़तोड़ में लगे रहे।अंत में झकमारकर उनको चुनाव कराना पड़ा। लोकतंत्र में झकमारकर काम करने वाले नेता या दल को जनविरोधी कहा जाता है। मोदी इस अर्थ में जनविरोधी हैं कि वे दिल्ली की जनता के लिए आठ महिने में कोई कदम नहीं उठा पाए।

भाजपा संभवतः देश का पहला बड़ा दल है जो समग्रता में अविवेकवादी या इरेशनल है। इरेशनल से क्या संवाद संभव है ? भाजपा और मोदी के इरेशनल नजरिए का आदर्श उदाहरण है भाजपा का परमाणु संधि पर यू-टर्न। भाजपा और उसके सभी नेता एकसिरे से संसद के मंच पर परमाणु संधि का विरोध करते रहे और हठात सत्ता में आते ही परमाणु संधि के पक्ष में बयान देने लगे,सबसे बड़ा उपहास तो यह है कि वे उसे अपनी उपलब्धि बता रहे हैं ! संभवतः भारत में इससे बड़ा इरेशनल रुप किसी दल का देश ने नहीं देखा। जिस दल के नेता ने संसद में साफ कहा हो कि वे सत्ता में आएंगे तो परमाणु संधि पर पुनर्विचार करेंगे, लेकिन वे तो उसी विचार की गोद में चले गए जिसका वे विरोध कर रहे थे। इस तरह के इरेशनल दल के साथ संवाद कैसे संभव है ? क्या भाजपानेता दिल्ली चुनाव में जो वायदे कर रहे हैं उनको पूरा करेंगे? विगत लोकसभा चुनाव में उन्होंने जो वायदे किए थे उनमें से एक भी वायदा अभी तक पूरा नहीं किया है। संवाद की मांग है कि संवादी असत्यवादी न हो।

नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद तेजी से साम्प्रदायिक हमले हो रहे हैं,संघ के संगठनों के नेताओं के घटिया-जनविरोधी-असामाजिक बयानों की मीडिया में बाढ़ आई हुई है। प्रशासन को साम्प्रदायिक संगठनों के प्रति नरम बर्ताब करने,मित्रवत व्यवहार करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। स्थिति उस कदर खराब है कि अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा सरेआम भारत में धार्मिक स्वतंत्रता पर संघ द्वारा किए जा रहे हमलों के खिलाफ बोलकर गए हैं। वे एक तरह से इन हमलों की निंदा करके गए हैं। लेकिन संघ अपने नजरिए पर अड़ा हुआ है। संघ का इस तरह का रुख देश को विभाजित करने वाला है। देश में और दिल्ली में गिरिजाघरों पर हमले बढ़े हैं लेकिन मोदी सरकार ने इन हमलों की कभी निंदा नहीं की। किरनबेदी ने इन हमलों के खिलाफ कोई बयान तक नहीं दिया। सवाल यह है दिल्ली की जनता क्या ऐसे नेता और दल को वोट देगी जो सरेआम धार्मिक स्थलों पर हो रहे हमलों की निन्दा तक न करे।

मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि तो यह है कि सीबीआई जैसी संस्था का दंगाईयों को बचाने के लिए खुला दुरुपयोग किया जा रहा है। अमितशाह के मामले में सीबीआई दुरपयोग करती नजर आई है। यह लोकतंत्र के लिए बुरा संकेत है। इस दुरुपयोग के खिलाफ किरनबेदी ने कोई राय व्यक्त नहीं की। जबकि वे सीबीआई को निष्पक्ष बनाने की मांग करती रही हैं लेकिन अवसरवादी नजरिए के चलते ऐसे दल में शामिल हो गयी हैं जिसका नाम सीबीआई के दुरुपयोग में शामिल है।



सच्चाई यह है लोकतंत्र में सु-संवाद आने बंद हो गए हैं। लोकतंत्र के लिए यह कु-संवाद है कितने सांसद या मंत्री प्रचार करने आ रहे हैं, पीएम प्रचार करने आ रहे हैं। सांसदों-मंत्रियों और प्रधानमंत्री की भूमिका सु-संवाद की रही होती तो उनको जनता में आने की जरुरत ही नहीं पड़ती।जनता के पास कान हैं,आँखें हैं और बहुत बड़ा दिल है। जनता जिस उदारता के साथ नेताओं के साथ पेश आती है हमारे नेता उस उदारता के साथ पेश नहीं आते। अंतमें, सवाल पूछने का हक उसको है जो सत्य के पक्ष में खड़ा है। कम से कम भाजपा इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती।

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

लोकतंत्र ,कुर्सी संघ और रसमलाई !



        लोकतंत्र में कुर्सीसंघ का जन्म हुआ है। कुर्सीसंघ का नया नारा है डिलीवरी और डिलीवरी ! कुर्सीसंघ ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में 11 केन्द्रीय मंत्री, 70 सांसद, प्रधानमंत्री, 1 सुपरकॉप, डेढ़ लाख संघ के तोते मैदान में उतारे हैं। कमाल का सीन बन रहा है ! दिल्ली में इतनी बड़ी संख्या में तोते और  बिल्लियां कभी मैदान में नहीं उतरी थीं। जहाँ देखो तोता जहाँ देखो बिल्ली ! तोते बोलते कम हैं और बिल्लियों का स्वभाव है डिलीवरी ! तोते कह रहे हैं हम न हिन्दू हैं न मुसलमान हैं ! चमार हैं न कुम्हार हैं! हम तो बस तोते हैं! तोते आठ महिने में ख़ूब मोटे हुए हैं! उडते हैं तो सुंदर लगते हैं! बोलते हैं तो ध्यान खींचते हैं! वे कह रहे हैं कलरव ही जीवन है! 
       कुर्सीसंघ के सर्जक ने कहा है लोकतंत्र  के लिए तोते- बिल्लियाँ सबसे उपयुक्त पात्र हैं! लोकतंत्र लाना है तो तोते और बिल्लियों की मानो और मजे में रहो ! कुर्सी संघ का नारा है  डिलीवरी -डिलीवरी - डिलीवरी! टीवी टॉकशो -टॉक शो ! 
     दिल्ली में तोते - बिल्लियाँ और टीवीवाले समझा रहे हैं लोकतंत्र लाना है तो धरना मत दो, आंदोलन मत करो, नारे मत लगाओ,हडताल मत करो,  इंक़लाब की बातें मत करो, संविधान की बातें मत करो, संविधान में जो लिखा है वो रद्दी है !  दूध पियो और अमरूद खाओ!  महँगाई, ग़रीबी,बेकारी , कुपोषण, अज्ञानता, बलात्कार ,लोकतंत्र और संविधान की चेतना ये सब फ़ालतू चीज़ें हैं, असल चीज है टीवी टॉक शो  और रसमलाई !
          तोते कह रहे हैं बड़ी गद्दी परम सत्य! बड़ा तोता परम सत्य!  कुर्सी ही सत्य है !कुर्सी ही शिव है ! कुर्सी ही सुंदर है! कुर्सी ही सडक है! कुर्सी ही जीवन है! कुर्सी ही जलेबी है! कुर्सी ही रसमलाई है! कुर्सी पर बैठना है तो रसमलाई की चेतना पैदा करो! आंदोलन, धरना,माँगें, हडताल, कामगारों के हक, झुग्गी-झोंपड़ी वालों के हक , छात्रों के हक, औरतों के हक , ये सब बेमानी हैं !रसमलाई खाओ संघ के गुन गाओ!लोकतंत्र को समृद्ध बनाओ! बड़े तोते ने कहा लोकतंत्र में कुर्सी हो, तोते हों और बिल्लियाँ हों और रसमलाई हो! रसमलाई  बनानेवाले हों ! रसमलाई खानेवाले हों! लोकतंत्र में रसमलाई का ही तो कमाल है कि टाटा पैदा हुआ, अम्बानी पैदा हुआ, अदानी पैदा हुआ! रसमलाई की ही महिमा है कि ओबामा अमेरिका से दौडा चला आया और कहने लगा रसमलाई दो रसमलाई दो! सारी दुनिया मुग्ध है कुर्सीसंघ के इस कौशल पर कि उसने रसमलाई को राष्ट्रीय माल बना दिया! कल तक रसमलाई दुकान तक ही सीमित थी अब रसमलाई चुनाव मेनीफेस्टो तक फैल गयी है। रसमलाई का यह विस्तृत कैनवास एक ही माँग पैदा कर रहा है रसमलाई - रसमलाई! 




बुधवार, 28 जनवरी 2015

कैमरा और जनतंत्र


       कैमरे ने नेताओं के होश उडाए हुए हैं। कैमरे की खूबी है आप उसके बिना रह भी नहीं सकते,राजनीतिज्ञ की मुश्किल है वे कैमरे में जी नहीं सकते। कैमरे के प्रबंधन के कौशल में जो माहिर हैं उनको राजनीति प्रबंधन सीखने की जरुरत है। हमारे अधिकांश नेता न तो ठीक से कैमरा प्रबंधन जानते हैं और नहीं राजनीति प्रबंधन कला के उस्ताद हैं। वे कैमरे के सामने खड़ा होना भर जानते हैं। नेताओं के लिए कैमरे के तदर्थ है, जबकि राजनीति के वे होलटाइमर का रवैय्या है। राजनीति में वे पेशेवर नहीं हैं। राजनीति में होलटाइमर बहुत खराब होता है। यह राजनीति का निष्क्रिय तत्व है।राजनीति और कैमरा दोनों ही राजनेताओं से पेशेवर और नाटकीय रवैय्ये की मांग करते हैं।

किरनबेदी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वे कैमरा और राजनीति दोनों में तदर्थभाव से काम कर रही हैं। पहले वे स्वयंसेवी राजनीति करती थीं,फिलहाल भाजपा की होलटाइमर हैं। राजनीति और कैमरे के लिहाज से ये दोनों रुप निरर्थक हैं। अप्रासंगिक हैं। कैमरा तब अपील करता है जब आप नाटकीय हों और जनता में हों। कैमरा तब अपील नहीं करता जब आप कैमरे के फ्रेम में हों। किरनबेदी की सारी मुश्किलें यहीं पर हैं। वे पहले कैमरे के फ्रेम में थी,फ्रेम से फ्रेम में उनरा रुपान्तरण निष्क्रिय इमेज का रुपान्तरण है। किरनहेदी तब अपील कर रही थीं, जब वे लोकपाल बिल के समय नाटक कर रही थीं। नाटकीयता ने उनको जनप्रिय बनाया,आंदोलन ने नहीं। लालू को देखें और सीखें। लालू नाटकीयता और भाषिकखेल में मास्टर है,इसलिए कैमरे में वह सबसे सुंदर लगता है। राहुल गांधी-सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह अपील नहीं करते,क्योंकि ये न तो नाटकीय हैं और न ही भाषिकखेल खेलते हैं। इनकी तुलना में मोदी ने नाटकीयता और भाषिकखेल का जमकर इस्तेमाल किया और कैमरे में जगह बना ली।

नरेन्द्र मोदी ने लंबी राजनीतिक प्रक्रिया से गुजरने के बाद कैमरे के फ्रेम में अपने को फिट किया।मोदी ने इस अवस्था तक पहुँचने के लिए आरएसएस की सालों होलटाइमरी की,झूठ बोलने की कला सीखी,परिवार छोड़ा,पत्नी के बारे में झूठ कहा,फिर पेशवर राजनीति आरंभ की,बादमें पेशेवर राजनेता की तरह राजनीति और कैमरे के प्रबंधन में दक्षता प्राप्त की। पेशेवर होने की पूर्व शर्त्त है वैचारिक ,नाटकीयता,भाषायी कौशल और प्रतिबद्धता।कैमरे को ये चीजें पसंद हैं। जो प्रतिबद्ध है कैमरा उसके साथ खेलने में मजा लेता है खेल ही खेल में खलनायक को नायक और नायक को खलनायक बनाता है।

कैमरे में नायक-खलनायक का खेल थमता नहीं है,बल्कि यह खेल तब ही थमता है जब नेता को कैमरा ,नायक-खलनायक की अवस्था से निकालकर डिजिटल फोटो कब्रिस्तान में ले जाकर महज एक फोटो में रुपान्तरित कर देता है। इस प्रक्रिया में कितना समय लगेगा कोई नहीं कह सकता। यही वह परिप्रेक्ष्य जिसमें केजरीवाल-किरनबेदी के कैमराखेल को देखें।

दिल्ली विधान चुनाव में विगत एक साल में दो चुनाव हुए हैं, एक हो चुका है ,दूसरा होने जा रहा है। कैमरे की मुश्किल यह है कि पुलिस आइकॉन उसमें मृत होते हैं।निष्प्रभावी होते हैं। किरनबेदी कितनी सख्त अफसर रही हैं इससे कैमरा आश्चर्य या रोमांच पैदा नहीं कर सकता। कैमरे के रोमांच के लिए किरनबेदी के पास कोई नौटंकी या नाटकीयता नहीं है। कैमरे का दिल जीतने के लिए नाटकीयता का होना जरुरी है । कैमरे के सामने नए कौशल, नयी भाव-भंगिमा और नए नारे के साथ जब तक आप नहीं जाएंगे कैमरा अपना खेल आरंभ नहीं करता। असल में तो कैमरे के सामने नेता को ही खेलना होता है, मोदी को नायक से महानायक बनाने में नाटकीयता और भाषिकखेल की बड़ी भूमिका रही है। तकरीबन यही पद्धति केजरीवाल की भी है।

केजरीवाल ने अपने फोटो के साथ पहले जगदीशमुखी का फोटो लगाकर प्रचार किया और इमेज युद्ध में जगदीशमुखी को आउट कर दिया। यह स्टायल उसने किरनबेदी के फोटो पर लागू की है। अब दिल्ली में प्रत्येक ऑटो पर केजरीवाल-किरनबेदी का फोटो एक साथ लगा है। आम जनता देख रही है और संदेश ग्रहण कर रही है। इमेज युद्ध की यह कला बेहद आकर्षक और मारक है। इस कला में केजरीवाल ने पहल करके दो काम किए पहला अपना प्रतिद्वंद्वी तय किया दूसरा अपना और विरोधी का वनलाइनर प्रचार आरंभ किया, राजनीति में वनलाइनर जल्दी कम्युनिकेट करता है। सड़क पर चलते वाहन में वनलाइनर नारा यदि फोटो के साथ हो तो वह किसी भी टीवी कवरेज से ज्यादा मारक होता है।

किरन बेदी की दूसरी बड़ी मुश्किल है कि वह टीवी कैमरा देखते ही अपना मुखारबिंद ठीक नहीं रख पाती है। उसकी अति-सजगता उसका विलोम बनाती है। इसके विपरीत केजरीवाल सामान्य बने रहते हैं,व्यंग्यात्मक बने रहते हैं,नाटकीय बने रहते हैं। यही वजह है केजरीवाल का हर फोटो कुछ नया कहता है। राजनेता की नाटकीयता कैमरे को जीवंत बनाती है।

रविवार, 18 जनवरी 2015

दिल्ली विधानसभा चुनावः तीन दिशाएं क्रेजी,लेजी और भोगी

               
      दिल्ली के विधानसभा चुनाव में आम जनता के सामने तीन रास्ते हैं क्रेजी (आम आदमी पार्टी),लेजी(कांग्रेस) और भोगी (भाजपा) । अरविंद केजरीवाल ने आम जनता को क्रेजी बनाया है यही उसका लोकतंत्र में सबसे बड़ा योगदान है। वह इस अर्थ में मूल्यवान है कि उसने ईमानदारी को फिर से मूल्यवान बनाया है। आमलोग ईमानदार की इज्जत करने लगे हैं,जबकि केजरीवाल के राजनीति में आने के पहले ईमानदारी को राजनीति में सबसे बोगस प्रवृत्ति के रुप में देखा जाता था। कांग्रेस की नीतियों का यह सबसे बुरा साइड इफेक्ट था। लोकतंत्र में ईमानदार नेता की आवाज हो,जनता उस पर विश्वास करे और आम जनता में ईमानदारी के प्रति कुर्बानी का जज्बा हो,यह प्रवृत्ति नए सिरे पैदा करने में केजरीवाल ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

केजरीवाल की पहचान अराजकतावादी के रुप में नहीं एक ईमानदार नेता के रुप में होनी चाहिए। उसने ईमानदारी को आम जनता का नए सिरे से मूल्य और आदत बनाने का काम किया, ईमानदारी उसकी सबसे बड़ी ताकत है।केजरीवाल की ईमानदार मुहिम ने लोकतंत्र के सभी रंगत के दलों पर गहरा असर छोड़ा है। सारे दल किसी न किसी रुप में उसकी इस उपलब्धि और जनप्रभाव से ईर्ष्या करते हैं। साथ ही उसके खिलाफ किसी भी दल का साहस नहीं है कि बेईमान नेता पेश करे। इससे केजरीवाल ने जो राजनीतिक परिदृश्य बनाया है वह लोकतंत्र के लिए शुभ कहा जा सकता है। इसकी तुलना में नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी मूल्यहीन नेता नजर आते हैं।

असली बात यह है कि समाज में एक बड़ा तबका है जो ईमानदार है लेकिन इन तबके की राजनीतिक भूमिका खत्म हो गयी थी। राजनीति में ईमानदारी बोगस कब और कैसे हुई इस पर हमें गंभीरता से सोचना चाहिए। यह कैसे हुआ कि समाज में ईमानदार हैं लेकिन ईमानदारी बोगस हो गयी, कौन हैं इसके लिए जिम्मेदार ? इसी अर्थ में केजरीवाल महत्वपूर्ण नेता है कि उसने ईमानदारी के प्रति क्रेजी भाव पैदा किया। केजरीवाल इसलिए भी मूल्यवान है कि उसने नेताओं को कथनी-करनी में साम्य रखने पर जोर दिया और इस चीज को परीक्षण का आधार बना दिया कि नेता बोलता क्या है और करता क्या है ? आज सभी दल परेशान हैं और कथनी-करनी में साम्य खोज रहे हैं।

केजरीवाल का एक अन्य मूल्यवान पक्ष है दैनंदिन जनसमस्याओं को केन्द्रीय मुद्दा बनाना और उनके समाधान की दिशा में अनवरत सक्रिय रहना। बिजली,पानी के सवाल पर वोट मांगना और इन सवालों को सचमुच में विवाद के विषय बनाना,जनता को जागरुक बनाना और गोलबंद करना,यह बड़ी उपबल्धि है। दिल्ली में सभी दलों ने इन दोनों सवालों को लेकर आम जनता को जागरुक बनाने का काम बंद कर दिया था, आम जनता के जेहन में ये दोनों मुद्दे थे ,नेतागण आते थे ,आश्वासन देते थे और चले जाते थे, इसके आगे कोई राजनीतिक गतिविधि नहीं होती थी, केजरीवाल ने इन दोनों मुद्दों को ज्वलंत मुद्दे बनाकर सभी राजनीतिकदलों की नींद हराम कर दी है,वह इससे एकदम आगे गया है उसने आम जनता को गोलबंद करके इस पर जिस तरह की जागरुकता और राजनीतिक सक्रियता पैदा की है वह विरल घटना है। कम से कम दिल्ली में उसने इन दो मसलों को टाइमबम बना दिया है। कोई भी सरकार आए उसे इस टाइमबम को डिफ्यूज करना ही होगा।वरना भविष्य खराब है।

आम जनता से वोट मांगना और चुनाव जीतना अलग बात है और आम जनता को उसकी समस्याओं को लेकर जागरुक बनाना और राजनीतिक तौर पर गोलबंद करना एकदम भिन्न चीज है। इससे लोकतंत्र मजबूत बनता है।

केजरीवाल आज सारे देश में भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का निर्विवाद नायक है। यह नायकत्व उसने संघर्षों के जरिए हासिल किया है। सत्ता से मुठभेड़ें करते हुए हासिल किया है। भ्रष्ट अफसर और नेता उसके नाम से थर्राते हैं। यह खूबी आज न तो मोदी में है न शीला दीक्षित में है और न अजय माकन में है। नाम से ही भ्रष्ट अफसर थर्राएं यह चीज आम जनता के लिए चैन देने वाली है। इसलिए केजरीवाल बेहतर विकल्प है।

यह सच है कांग्रेस ने 15साल में दिल्ली के इंफ्रास्ट्रक्चर का कायाकल्प किया है लेकिन इसकी बहुत बड़ी कीमत दिल्ली को चुकानी पड़ी है। दिल्ली का सामाजिक इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह टूट गया है। दिल्ली में मूल्यहानि,पर्यावरणहानि,धनहानि,अधिकारहानि और सामाजिक असुरक्षा आम बात हो गयी है और कांग्रेस ने आलसियों की तरह यह सब देखा है। उसके अंदर इन सबसे लड़ने की कोई बेचैनी नहीं बची है।



दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी के मैदान में आने के बाद भाजपा बेहूदे तर्कों के आधार पर चुनाव लड़ रही है। दिल्ली में सबसे भ्रष्ट नगरनिगम प्रशासन देने का वे भारतकेसरी खिताब जीत चुके हैं। उनका तर्क है चूंकि मोदी केन्द्र में जीते हैं अतः उनको दिल्ली में भी जिताओ। यह भोगी का राग है। दिल्ली में भाजपा ने विगत 15 सालों में राजनीतिक –सामाजिक क्षय में सक्रिय भूमिका अदा की है। वह कांग्रेस के लूटतंत्र का अंग बनकर काम करती रही है। उसने लोकतंत्र के स्वस्थ मूल्यों को खोखला बनाया है। लोकतंत्र को हर स्तर पर धोखा दिया है और सिर्फ लोकतंत्र के भोगियों के मन में अपील पैदा की है। मोदी का सबसे बड़ा योगदान है कि उसने लोकतंत्र को भोगियों का तंत्र बनाया है। लोकतंत्र के उपभोग की भावना पैदा की है।मोदी के सारे एक्शन भोगी के एक्शन है। लोकतंत्र में भोगी होना वस्तुतः कैंसर है।लोकतंत्र बचता तब है जब इसमें भोग और आलस्य से लड़ने वाले जज्बाती और कुर्बानी के जज्बे वाले मूल्य पैदा किए जाएं, मोदी के मूल्य भोगी के मूल्य हैं। लोकतंत्र का भोगी अकर्मण्य होता है वह संचित पूंजी खाता है। मोदी अकर्मण्य भोगी नेता है ,जिसका लक्ष्य है लोकतंत्र की एफडी (फिक्स डिपोजिट) खाना। इस परिप्रेक्ष्य में आम आदमी पार्टी एकमात्र विकल्प है जिसको कायदे से वोट दिया जाना चाहिए।

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

अरविंद केजरीवाल और नैतिकता के कसाई



अरविंद केजरीवाल से मेरे कोई मुहब्बत नहीं है!मैं उनके ग़लत फ़ैसलों की रीयलटाइम आलोचना भी करता रहा हूँ, लेकिन अरविंद केजरीवाल मेरा बार -बार ध्यान खींचता है! आख़िरकार कोई बात तो है जो मुझे उसके हर एक्शन पर सोचने और लिखने को मजबूर करती है। मेरी तरह लाखों लोग हैं जो उसके एक्शन पर बोलते हैं, सक्रिय होते हैं, यहाँ तक कि उसके प्रतिस्पर्धी दलों की भी नींद ग़ायब रहती है! ख़ासकर उनलोगों के लिए केजरीवाल सिरदर्द है जो अनैतिक हैं , कारपोरेट ग़ुलाम हैं और देशविरोधी हैं। इसलिए केजरीवाल को एक व्यक्ति के रुप में नहीं फिनोमिना के रुप में देखें तो बेहतर होगा। 
     केजरीवाल कोई अजूबा नेता नहीं है। वह सामान्य मध्यवर्गीय परिवार से आया नेता है ,जिसके आदर्श हैं और उन आदर्शों के लिए जीने की जिसमें तमन्ना है, त्याग-भावना है। केजरीवाल इसलिए ताक़तवर फिनोमिना है क्योंकि उसने अपने लोकतांत्रिक विचारों के लिए जोखिम उठाया है। लोकतांत्रिक विचारों के लिए जोखिम उठाना और उनके लिए राजनीतिक संरचनाओं का निर्माण करना, जनता को गोलबंद करना आदि चीज़ें केजरीवाल को ठोस भौतिक शक्ति बना रही हैं। केजरीवाल चुनाव हारें या जीतें यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है उसका लोकतंत्र के प्रति अटूट प्रेम और उस प्रेम को सामाजिक -राजनीतिक सांगठनिक क्षमता में रुपान्तरित करना, यह बड़ा काम है, इस काम के सामने सारी सरकारी कुर्सियाँ बौनी हैं। 
         हमारे यहाँ लोकतंत्र के लिए मर मिटने का जज़्बा तक़रीबन ख़त्म हो चुका है,ऐसे में केजरीवाल जैसे अनेक लोकतांत्रिक नेताओं की ज़रुरत है। केजरीवाल की विशेषता है कि उसका हर क़दम सामाजिक बहस पैदा करता है। विभिन्न कसौटियों पर उसे कसा जाता है,यह काम हमलोग किसी और नेता के लिए नहीं करते ।मसलन् , केजरीवाल हवाईजहाज़ से दुबई गए तो विवाद हो रहा कि वे किस क्लास में गए ? मज़ेदार बात है हर नेता हवाई जहाज़ से चलता है, हर सांसद हवाई यात्रा करता है लेकिन कहीं पर कोई चर्चा नहीं होती ! केजरीवाल कोई अजूबा काम नहीं कर रहा वह सामान्यतौर पर हवाई जहाज़ से गया है और वह भी हो सकता है किसी संगठन या संस्था की टिकट पर गया हो या हो सकता है अपनी टिकट से ही गया हो, व्यक्ति के नाते केजरीवाल को हक़ है कि वह जो मन में आए टिकट ख़रीदे और यात्रा करे , इसमें ग़लत क्या है? अनैतिक क्या ? केजरीवाल का दल टिकट दे या वह निजी तौर पर ख़रीदे इसमें कोई भी चीज अनैतिक नहीं है । केजरीवाल का शानदार रिकॉर्ड रहा है वह भूखा नंगा नागरिक नहीं है। उसकी पत्नी कमाती है, वह चोरी के धन से न तो राजनीति कर रहा है और न हवाईयात्रा कर रहा है फिर परेशान क्यों है मीडिया-भाजपा-फेसबुक उन्मादी लोग ? केजरीवाल की हवाईयात्रा टिकट पर सवाल खड़े करना उस मानसिकता का द्योतक है जिसे फासिस्ट मानसिकता कहते हैं! फासिस्टों को व्यक्ति के नागरिक अधिकारों के इस्तेमाल से सबसे पहले परेशानी होती है। केजरीवाल की पूरी कार्यप्रणाली पारदर्शी है और यही हमारे साइबर फासिस्ट संत-शरीफ़ों के लिए मुसीबत की  जड़ है। 
        केजरीवाल पर बात करने के पहले हमें भारत में संविधान प्रदत्त नागरिक हकों के प्रति दिलो-दिमाग़ साफ़ करके रखना होगा। दिमाग़ में फासिस्ट विचारधारा या अ-लोकतांत्रिक भाव रखकर केजरीवाल समझ में नहीं आएगा । केजरीवाल यदि संविधान विरोधी काम करे उसे नंगा करो,केजरीवाल यदि नागरिक हकों पर हमला करे उसकी मरम्मत करो,केजरीवाल यदि नागरिक हकों और लोकतंत्र के विकास के पक्ष में जब खड़ा हो तो उसकी प्रशंसा करो, हिमायत करो।  

रविवार, 18 मई 2014

पापुलिज्म का प्रेत और लोकतंत्र

सन् 2014 का लोकसभा चुनाव पापुलिज्म के आधार पर लडा जाएगा। पापुलिज्म के आधार पर पहले कांग्रेस वोट जुगाड़ करती रही है। लंबे समय के बाद पहलीबार यह दृश्य नजर आ रहा है कि पापुलिज्म की प्रतिस्पर्धा में कांग्रेस से आम आदमी पार्टी और भाजपा ने बाजी मार ली है ।

सन् 1971 के चुनाव श्रीमती इंदिरा गांधी ने पापुलिज्म के आधार पर लड़ा था। उस समय नारा दिया 'समाजवाद लाओ,गरीबी हटाओ।' इसके बाद आपातकाल आया और 1977 का चुनाव 'लोकतंत्र लाओ देश बचाओ' के नारे पर लड़ा गया ।

पापुलिज्म के रुप क्षेत्रीय स्तर पर विभिन्न रुपों में अभिव्यक्त होते रहे हैं लेकिन परंपरागत पार्टी व्यवस्था को अस्वीकार करते हुए अन्ना आंदोलन का होना और बाद में उस आंदोलन से निकले लोगों के द्वारा आम आदमी पार्टी का गठन करना अपने आप में एक बड़ी परिघटना है। यह परिघटना सन् 1974 के जेपी आंदोलन से पूरी तरह भिन्न है। जेपी आंदोलन के लोगों ने जनता पार्टी का उन्हीं कायदे-कानूनों और सिद्धांतों के आधार पर गठन किया जो पहले से प्रचलन में थे ,इसके कारण उसमें शामिल विभिन्न विचारधाराओं के नेताओं और उनके अनुयायियों में वैचारिक एकीकरण नहीं हो पाया । लेकिन आम आदमी पार्टी ने एकदम भिन्न पैराडाइम से काम आरंभ किया है और अपने साथ आने का उन तमाम लोगों से आह्वान किया है जो उसके नजरिए और एक्शन से सहमत हैं ।

आम आदमी पार्टी भारत के संविधान के पैराडाइम में काम करने के वायदे के साथ मैदान में उतरी है । वे लोग संविधान में कल्पित सपने को साकार करना चाहते हैं और यह इस दल की सबसे महत्वपूर्ण बात है । हमारे देश में सक्रिय अधिकतर राजनीतिकदलों में प्राथमिकताएं बदलती रही हैं और कभी न कभी संविधान के दायरे के परे जाकर काम करते रहे हैं। मसलन् साम्प्रदायिक,आतंकवादी या पृथकतावादी संगठनों की मदद लेना या उनके साथ प्रत्क्ष –अप्रत्यक्ष संबंध बनाए रखने का काम अधिकांश प्रमुख दल करते रहे हैं । इसके अलावा लोकतांत्रिक व्यवस्था की चरमराती व्यवस्था को भी आम आदमी पार्टी ने अपनी राजनीतिक गतिविधियों में निशाने पर रखा है ।

लोकतंत्र की चरमराती स्थितियों ने अन्ना आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन के रुप में विकसित होने का जनप्रिय आधार प्रदान किया और इस आंदोलन के दौरान आंदोलनकारियों ने बार-बार परंपरागत दलों की अप्रासंगिकता और असमर्थताओं की ओर ध्यान खींचकर नए दल की संभावनाओं के लिए आम जनता में भावभूमि निर्मित की । आम आदमी पार्टी के नेताओं ने यह भी रेखांकित किया कि आमलोगों की प्रचलित दलों के नेताओं के प्रति कोई आस्था नहीं है और आम जनता में इन दलों की कोई साख नहीं है।

आम आदमी फिनोमिना के पापुलिज्म को समझने के लिए हमें परंपरागत सोच की प्रक्रिया के बाहर निकलना पड़ेगा। परंपरागत सोच यह है कि पहले दल का बडा नेता या उच्च कमेटी जो कुछ कहती थी वही प्रामाणिक राजनीतिक कम्युनिकेशन माना जाता था।लेकिन इस कम्युनिकेशन से साधारण आदमी अपने को विच्छिन्न महसूस करता था और यहीं पर अन्ना आंदोलन में सड़क पर चलता फिरता आम आदमी बहुत बड़े कम्युनिकेटर के तौर पर दाखिल हो ता है। भ्रष्टाचार के सवाल पर साधारण नागरिकों के बीच में खड़े होकर अन्ना आंदोलन के नेताओं का बोलना। साधारण आदमी का भ्रष्टाचार के सवाल पर मुखर होकर टीवी के सामने बोलना,यह नया फिनोमिना था। इस प्रक्रिया में आम आदमी को राजनीतिक कम्युनिकेटर के रुप में अभिव्यक्ति का अवसर मिला और एक नए किस्म का राजनीतिक कम्युनिकेटर मीडिया और राजनीति में दाखिल होता है जो कल तक हमारे प्रचलित राजनीतिक कम्युनिकेशन के बाहर था। प्रचलित राजनीतिक कम्युनिकेशन में दलविशेष का नेता दाखिल होता था और वह अपने को प्रामाणिक राजनीतिक कम्युनिकेटर के रुप में पेश करता था। अन्ना आंदोलन और आम आदमी पार्टी ने आम आदमी को राजनीतिक अभिव्यंजना में समायोजित करके नए किस्म के राजनीतिक कम्युनिकेशन और लोकतांत्रिक संवाद को जन्म दिया।

पहले राजनीतिक दल बहुत बड़े राजनीतिक लक्ष्यों को केन्द्र में रखकर बातें करते थे, संगठन निर्माण करते थे।लोकतंत्र में कल तक नेता प्रवक्ता होते थे लेकिन आम आदमी पार्टी ने साधारणजन को राजनीतिक प्रवक्ता बनाकर लोकतंत्र की अंतर्वस्तु को ही बदल दिया ।

नेता हमेशा से किसी न किसी रुप में लोकतंत्र में समस्यामूलक रहे हैं लेकिन साधारणजन को लोकतंत्र के लिए कभी खतरा नहीं माना गया । लेकिन यह जनता के प्रति या आम आदमी के प्रति अंधश्रद्धा से पैदा हुई धारणा है।

लोकतंत्र में जनता को गैर-समस्यामूलक मानने के कारण अंधलोकवाद का खतरा हमेशा बना रहता है। जो नेता जनता की अंधी भक्ति करके जन-जागरण के नाम पर जनोन्माद पैदा करते हैं वे अंततः लोकतंत्र विरोधी दिशा में गए हैं ।

आम आदमी कहें या साधारणजन या जनता कहें, हमें जनता को अनालोचनात्मक ढ़ंग से नहीं देखना चाहिए। अनालोचनात्मकता लोकतंत्र की मौत है। लोकतंत्र में शिरकत बढ़ाने के लिए जनता के प्रति आलोचनात्मक नजरिया जरुरी है।

जनशिरकत के नाम पर ,जन समाधान के नाम पर हमेशा पापुलिज्म ने कॉमनसेंस समाधानों की सिफारिश की है। कॉमनसेंस समाधानों की बजाय संस्थानगत ,नियम-कानू बनाकर समाधान खोजे जाने चाहिए।

यह सच है कि भ्रष्टाचार समस्या है,महंगाई समस्या है,लेकिन इसके समाधान कॉमनसेंस के आधार नहीं खोजे जाएं । इसके लिए संरचनात्मक परिवर्तनों पर जोर दिया जाय । संरचनात्मक परिवर्तनों को करते समय पहले से उपलब्ध अधिकारों को कम नहीं किया जाना चाहिए बल्कि उनमें इजाफा करने वाले समाधान सुझाने की जरुरत है। मसलन्, सोवियत संघ और अनेक समाजवादी यूरोपीय देशों में समाजवाद के खिलाफ भायानक जनोन्माद देखने में आया । समाजवाद विरोधी पापुलिज्म को लोकतंत्र की आंधी या तूफान या उभार आदि नामों से पुकारा गया। लेकिन इस समूचे उभार में यह भूल ही गए कि कहीं समाजवाद में जो जन अधिकार और जन सुरक्षा प्राप्त थीं कहीं वे ही कम न हो जाएं। वास्तव में यही हुआ। येरोप का तथाकथित जनउभार समाजवाद को धराशायी करने में सफल रहा । आम जनता खुश थी कि समाजवादी व्यवस्था खत्म हो गयी। लेकिन इस समूची प्रक्रिया में वे भूल ही गए कि समाजवाद के दौरान जो अधिकार और सामाजिक सुरक्षाएं प्राप्त थीं वे भी आम जनता के पास से चली गयीं। इसे कहते हैं अंधलोकवाद।

अंधलोकवाद हमारे सामने अनेकबार जिन समाधानों को लेकर आता है हम उसकी दूरगामी परिणतियों को नहीं देपाते , वह हमारे सामने तात्कालिक समाधान पेश करता है और तात्कालिक समाधानों से हमे एक हद तक राहत भी मिलती है। मसलन्, समाजवाद में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं थी, निजी स्वतंत्रता नहीं थी। समाजवादी व्यवस्था के पतन के साथ ही नागरिकों को निजी अभिव्यक्ति की आजादी मिली, निजी स्वतंत्रताएं भी मिलीं। लेकिन इस प्रक्रिया में पहले से उपलब्ध सुरक्षाएं और अधिकार चले गए । समाजवाद में स्त्रियां सुरक्षित थी,सामाजिक सुरक्षा की गारंटी भी थी, लेकिन समाजवाद के पतन के साथ ही सामाजिक सुरक्षाएं खतरे में पड़ गयीं और औरतों के सामने अनेक किस्म की असुरक्षाएं आ खड़ी हुईं। इसके कारण लाखों औरतें जिस्म की तिजारत करने के लिए मजबूर हुईं। हठात संचित धन मुद्रा के अवमूल्यन के कारण कौडियों में तब्दील हो गया और रातों-रात राज्य की संपदा की लूट करके अरबपतियों का लुटेरा जगत पैदा हो गया ।

जो लोग समाजवाद में मानवाधिकारों के हनन को लेकर परेशान थे और आलोचनाएं कर रहे थे, खासकर कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और कार्यकर्ता ही यह शिकायत कर रहे थे, उनकी इस संदर्भ में शिकायतें जायज थीं , इसके लिए जरुरी था कि समाजवादी संरचनाओं में मानवाधिकार के संरचनात्मक सुधार ईमानदारी से लागू किए जाते। लेकिन यह काम न करके समूचे समाजवाद को ही ध्वस्त करके लोकतंत्र के निर्माण का जो मार्ग चुना गया वह आत्मघाती और जन-उत्पीडक मार्ग था। यह अंधलोकवाद से पैदा हुआ मार्ग था।

लोकतंत्र के लिए संघर्ष करें या समाजवाद के लिए संघर्ष करें या फिर किसी यूनियन की मांगों के लिए संघर्ष करें, बुनियादी तौर पर यह ध्यान रखें कि नई मांग के मानने से कहीं पहले से प्राप्त अधिकार कम तो नहीं जाएंगे। आंदोलन का अर्थ उपलब्ध जनाधिकार और सुविधाएं खोना नहीं बल्कि उनको बचाए रखकर नए अधिकार पाना है। जनांदोलन खोने के लिए नहीं किए जाते । जो जनांदोलन पहले से उपलब्ध हकों को कम कर दे वह आत्मघाती आंदोलन है। वह जनघाती आंदोलन है । समाजवाद के खिलाफ पूर्वी यूरोपीय देशों और समाजवादी देशों में चले सभी जनांदोलन इसी अर्थ आत्मघाती साबित हुए हैं उनसे सोवियत संघ और कमजोर हुआ,सोवियत संघ का विभाजन हो गया। तमाम समाजवादी यूरोपीय देश पहले की तुलना में कमजोर हो गए,विभाजित हो गए । जो आंदोलन देश को तोडे,विभाजित करे, वह आत्मघाती जनांदोलन है। इस विवेचन में जाने का मकसद यह है कि बार-बार जनांदोलनों के नाम पर तमाम अकादमिक और राजनीतिक विमर्श में पापुलिज्म के बारे में जितना लिखा गया है उसमें समाजवादी देशों में चले समाजवाद विरोधी पापुलर आंदोलनों को प्रमुख संदर्भ सूत्र बनाया गया है।

'पापुलिज्म' क्या है ? यह जन-असंतोष है। जब व्यवस्था या नेता समस्या का समाधान जने में असफल होते हैं और आम जनता के पास कोई विकल्प नहीं होता तो हमेशा जन-असंतोष की शक्ल में पापुलिज्म अपने को अभिव्यक्त करता है। जन-असंतोष का अवरुद्ध विकास से गहरा संबंध है । पापुलिज्म की अभिव्यक्ति कईबार सांस्कृति रुपों में होती है ,लेकिन वहां पर वो जनशिरकत,जनता के आनंद और धार्मिक-सांस्कृतिक जलसों के रुपों में व्यक्त होता है ।

भ्रष्टाचार का मौजूदा नियमों के तहत व्यवस्था समाधान नहीं दे पा रही थी तो पापुलर अभिव्यक्ति के रुप में कईबार इसकी अभिव्यक्ति हो चुकी है लेकि हमेशा इसकी अभिव्यक्ति सरकार हटाओ आंदोलन में तब्दील होती रही है। मसलन्, संपूर्ण क्रांति आंदोलन,नवनिर्माण आंदोलन या वीपी सिंह का बोफोर्स भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हो, इन सबकी समस्या थी भ्रष्टाचार लेकिन मांग थी सरकार बदलो। इससे भ्रष्टाचार ज्यों का त्यों बना रहा सरकारें गिर गयीं और बदल गयीं । लेकिन भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन इस अर्थ में भिन्न था कि इसका लक्ष्य सरकार गिराना नहीं था बल्कि भ्रष्टाचार निरोधक संरचनाओं और कानूनों का निर्माण करना था ।

अन्ना आंदोलन इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि उसके दबाव में सरकार थी और संसद थी। सरकार और संसद दोनों ने माना की भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों का निर्माण किया जाय। जनलोकपाल कानून बनाया और उससे जुड़े तमाम कानून बनाए जाएं । इस आंदोलन ने सरकार के खिलाफ गुस्सा पैदा किया लेकिन सरकार को गिराया नहीं,सरकार को मजबूर किया कि वो जनता की सुने और संरचनात्मक समाधान खोजे ।

भारत में 'पापुलिज्म' के कई रुप रहे हैं जैसे मातृभाषा आंदोलन,अंग्रेजी हटाओ आंदोलन,गो रक्षा आंदोलन, राममंदिर आंदोलन, आरक्षण विरोधी आंदोलन,विभिन्न राज्यों में पृथकतावाद और अंध क्षेत्रीयतावाद के आंदोलन,आपातकाल विरोधी आंदोलन,भाषावार राज्य निर्माण आंदोलन,नए राज्य बनाने के आंदोलन और जन समस्याओं पर केन्द्रित युवा आंदोलन जैसे संपूर्ण क्रांति,नवनिर्माण आंदोलन ,अन्ना आंदोलन आदि । कहने का तात्पर्य है कि पापुलर आंदोलन हमेशा सही नहीं होते । पापुलर आंदोलन में जनता की बेशुमार शिरकत देखकर उन्मादित होकर निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए । पापुलर आंदोलन में चूंकि जनता शामिल है इसलिए उसका समर्थन करो इस विचार से बचने की जरुरत है ।

पापुलर आंदोलन को देखने का आधार है उस आंदोलन का नजरिया और कार्यक्रम। नजरिए और कार्यक्रम के आधार ही तय किया जा सकता है कि संबंधित आंदोलन जनहित और समाजहित में है या सामाजिक विभाजनकारी है ।

समस्या विशेष पर जनसमूह की लामबंदी पापुलर जनांदोलन बनाती है लेकिन यह परिभाषा काफी अमूर्त है। समस्या, एकजुट जनसमूह और निरंतर आंदोलन मात्र से पापुलिज्म को परिभाषित करने में दिक्कतें हैं।

'पापुलिज्म' स्वयं में अमूर्त वैचारिक पदबंध है। किसी भी पदबंध की अमूर्तता को तोड़ने के लिए उसकी विचारधारात्मक पड़ताल की जानी चाहिए। इसी तरह पापुलिज्म की पड़ताल के लिए भी प्रत्येक पापुलर आंदोलन का विचारधारात्मक विश्लेषण किया जाना चाहिए। विचारधारा विश्लेषण के दौरान ही पता चलेगा कि संबंधित आंदोलन की मांगें क्या हैं ? जनाधार किन वर्गों में है ? राजनीतिक मंशा क्या है और नजरिया क्या है ? और सामाजिक-राजनीतिक परिणतियां क्या हो सकती हैं ? आदि ।

भारत में 'पापुलिज्म ' के फ्रेमवर्क में जन्मे अधिकांश आंदोलन सरकार बदलने या सरकार पाने के आंदोलन रहे हैं । सिर्फ दो आंदोलन इसके अपवाद हैं, आपातकाल विरोधी आंदोलन और अन्ना का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन। इन दोनों आंदोलनों के कारण संविधान में संशोधन हुए । आपातकाल विरोधी आंदोलन के कारण 42वां संविधान संशोधन नए 43वें संविधान संशोधन के जरिए निरस्त किया गया और नए संविधान संशोधन के जरिए आंतरिक आपातकाल लगाना मुश्किल बना दिया गया । वहीं पर अन्ना आंदोलन के कारण भ्रष्टाचार विरोधी अनेक कानूनी परिवर्तन आए हैं और अनेक भविष्य में आएंगे ।

भारत में 'पापुलिज्म' का एक साइडइफेक्ट यह है कि इसने हमेशा प्राकारान्तर से लोकतांत्रिकचेतना में इजाफा किया है और संवैधानिक सचेतनता बढायी है। मसलन्, पंजाब का खालसा आंदोलन हो या दार्जिलिंग का गोरखालैंड या मिजोरम का पृथकतावादी आंदोलन हो या असम गण संग्राम परिषद और आसू का असम छात्र आंदोलन हो, इन सभी आंदोलनों के जरिए सारे देश में सुधाजनों के बीच में लोकतांत्रिक विमर्श का विस्तार हुआ है और लोकतंत्र के पाठ को संविधान के पावधानों को बार-बार सिरे से व्याख्यायित किया गया है । इस परिप्रेक्ष्य में भारतीय लोकतंत्र में पापुलिज्म प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्षतौर पर लोकतंत्र को समृद्ध करता रहा है ,जहां पर वह यह काम नहीं कर पाया है वहां पर पापुलिज्म पिटा है और हाशिए पर चला गया है। पंजाब,दार्जिलिंग, मिजो आंदोलन,नागा आंदोलन,आसू का आंदोलन इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

भारत का लोकतंत्र बहुत समृद्ध है और इसकी संरचनाएं बेहद सक्रिय हैं। इसमें शासन करने वाले नेताओं के कान भी हैं। इसका सुफल यह है कि भारत में पापुलिज्म कभी पश्चिमी देशों की तरह अंधड़ नहीं बन सकता । पश्चिमी देशों में पापुलिज्म को आंधी के रुप में चलते देखा गया है लेकिन भारत में पापुलिज्म आरंभ कभी आंधी के रुप में नहीं हुआ । पापुलिज्म हमेशा धीमी गति से आया, जरम पर जाकर आंधी बना है और उसके बाद ढलान पर लुढ़कता चला गया है । हमारे संविधान में पापुलिज्म के समाधान हैं और जिन सवालों पर समाधान नहीं मिलते उन पर नेताओं और दलों ने मिलकर समाधान खोजे हैं, जब ये दोनों विफल रहे हैं तो न्यायपालिका ने समाधान पेश किए हैं । अनेक समस्याएं हैं जिनके प्रङावशाली समाधान, कानून में नहीं हैं, संविधान में नहीं है।दलों में एकमत के अभाव के कारण समाधान बन नहीं पा रहा है तो अदालत के हस्तक्षेप से समाधान निकलता रहा है ।हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को ध्यान से देखें जिसमें दो साल या उससे ज्यादा सजा पाए नेता को संसद-विधानसभा का चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया गया। यह मसला राजनीतिकदलों में हल नहीं हो पा रहा था, संसद और चुनाव आयोग भी तय नहीं कर पा रहे थे।लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देकर चुनाव आयोग को व्यवस्था करने का आदेश दे दिया। ऐसे अनेक विवाद हैं जिनका समाधान संसद में नहीं निकलता लेकिन सुप्रीम कोर्ट में निकल आता है। कहने का तात्पर्य है कि भारत में लोकतंत्र को सक्रिय और जीवंत बनाए रखने में न्यायालयों की बड़ी भूमिका रही है। कम से कम पश्चिमी देशों में लोकतंत्र के हित में न्यायालय दखल नहीं देते।

'पापुलिज्म' के हथियार का आमतौर पर दक्षिणपंथी विचारधारा के संगठन इस्तेमाल करते रहे हैं। मसलन्, राम मंदिर आंदोलन आंदोलन के नाम पर पूरे देश में बाबरी मस्जिद को नष्ट करने के लिए पूरी शक्ति के साथ आंदोलन संघ परिवार-भाजपा आदि ने आरंभ किया। लेकिन इन्हीं संगठनों ने सर्वधर्मसमभाव के लिए आंदोलन नहीं किया । बाबरी मस्जिद गिराने के लिए मुहिम चलायी गयी लेकिन देश के सभी मंदिर- मस्जिद-गुरुद्वारों-गिरजाघरों की रक्षा के लिए आंदोलन नहीं चलाया गया। इन दिनों नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में विकास की बातें की जा रही हैं लेकिन विकास के किसी भी ठोस प्रस्ताव के बिना। विकास को अमूर्त बनाकर पेश किया जा रहा है। समानता की बातें की जा रही हैं लेकिन छोटे-बड़े,ऊँच-नीच के भेदो को खत्म करने की बातें नहीं हो रही हैं । ऐसे में सवाल उठता है कि समानता तो होगी लेकिन छोटे-बड़े का भेद बनाए रखकर। विकास तो होगा लेकिन गरीब-अमीर का भेद बनाए रखकर। विकास की बातें करते समय अमीर-गरीब के भेद की अनदेखी करने का अर्थ है एकायामी विकास करना । विकास के मॉडल में अमीर-गरीब का भेद केन्द्र में रखे बिना बातें नहीं हो सकतीं। सत्ता के विकेन्द्रीकरण की बातें तब तक बेमानी है जब तक शक्तिशाली और शक्तिहीन के भेद को सम्बोधित न करें।

इसी तरह पंचायतें होने का अर्थ आम आदमी तक लोकतंत्र का पहुँचना नहीं है आम आदमी तक लोकतंत्र तब पहुँचता है जब फैसला लेते समय पंचायतें लिंग, जाति, सामाजिक हैसियत आदि को सम्बोधित करते हुए फैसले लें ,फैसले में सभी वर्ग के लोगों की शिरकत हो। अभी हमारे यहां लोकतांत्रिक संरचनाएं सामाजिक हैसियत का अंग हैं। यह स्थिति जब तक रहेगी निचले स्तर पर सामाजिक भेद,ऊँच-नीच का भेद, स्त्री-पुरुष का भेद बना रहेगा।

'पापुलिज्म' जब आंदोलन करता है तो राजनीतिकदलों को चुनोती देता है, उनकी विचारधारा को चुनौती देता है। इसके अल्वा वह दैनंदिन जीवन शैली और उपभोग को भी चुनौती देता है। सामाजिक संबंधों और सामाजिक विश्वासों को भी चुनौती देता है । इससे भी बड़ी बात यह है कि वह हमेशा औरतों के अधिकारों अस्तित्व को खतरे में डालता है।

भारत में पृथकतावादी आंदोलनों से से लेकर राममंदिर आंदोलन तक ,सभी पापुलर आंदोलनों का यह साझा अनुभव है कि औरतों के लिए इस तरह के आंदोलन सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आते हैं । हिन्दुत्व के नए उभार ने युवा लड़के-लड़कियों के उदार सामाजिक संबंधों और उदार जीवन शैली पर सबसे पहले हमला किया। अंतर्जातीय ,अंतर्धामिक विवाह करने से बढ़-चढ़कर रोका गया। जगह-जगह प्रेमी युगलों पर वेलेंटाइन डे के मौके पर हमले किए गए, उनके लिए ड्रेसकोड,फोनकोड, आवागमन कोड आदि के नाम पर नित नई संहिताएं और आदेश जारी किए गए। कहने का तात्पर्य है कि 'पापुलिज्म' सिर्फ राजनीतिकदलों को बी प्रभावित नहीं करता बल्कि पूरे समाज को और खासकर औरतों को सबसे ज्यादा पकरता है । हिदुत्व के नए उभार ने शादी-ब्याह में दहेज की मांग, सुंदर-सलोनी दहेज युक्त घरेलू स्त्री की मांग को जनप्रिय बनाया है । वैचारिकतौर पर 'पापुलिज्म' हमेशा पितृसत्ता की विचारधारा को पुख्ता बनाता है। इस अर्थ में वह वैचारिकतौर पर प्रतिक्रियावादी होता है । उल्लेखनीय है अन्ना के इलाके में पितृसत्ता का वर्चस्व है।

'पापुलिज्म' हमेशा वैचारिक शार्टकट मारता है और हमेशा प्रतिस्पर्धी भाव में सक्रिय रहता है। यह दीर्घकालिक फिनोमिना नहीं है। 'पापुलिज्म' के रुप में समाजवाद,धर्मनिरपेक्षता, विकेन्री लकरण या स्वस्थ लोकतांत्रिक जीवन मूल्य आंदोलन के रुप में अभिव्यक्त होते हैं तो इससे लोकतंत्र समृद्ध होता है। क्योंकि ये सब तत्व लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन प्रतिक्रियावादी पापुलिज्म हमेशा लोकतंत्र को क्षतिग्रस्त करता है। कहने के लिए राष्र् वाद,संकीर्णतावाद,क्षेत्रीयतावाद को लोकतंत्र का अंग माना जाता है लेकिन ये लोकतंत्र को पंगु बनाने वाले तत्व हैं ।

आम आदमी पार्टी का फिनोमिना सकारात्मक लोकतांत्रिक फिनोमिना है और लोकतांत्रिक 'पापुलिज्म' का हिस्सा है। उसी तरह यूपीए-2 के द्वारा उटाए गए अनेक संवैधानिक-संरचनात्मक सुधार और पापुलर कार्यक्रम जैसे सूचना प्राप्ति का अधिकार,सबके लिए भोजन, सबके लिए शिक्षा,मनरेगा,जन लोकपाल, आदि 'लोकतांत्रिक पापुलिज्म' का हिस्सा हैं ।

( यह लेख लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया आरंभ होने के पूर्व लिखा गया)















आम आदमी पार्टी और लोकसभा चुनाव के सबक

    लोकतंत्र में लोक गौण है, तंत्र महान है। आमतौर पर यही कहते हैं कि लोक प्रमुख है। लेकिन वस्तुगत सच्चाई यह है कि लोकतंत्र में तंत्र और उसके दांव-पेंच ही प्रमुख हैं। जो दल जितने अच्छे दांव-पेंच जानता है वह उतना ही बेहतर भूमिका अदा करता है। दांव-पेंच का एक भरा पूरा शास्त्र है जिसने लोकतंत्र में लोक को कमजोर और तंत्र को समृद्ध बनाया है।
     दांव-पेंच में जरा सी चूक होते ही बाजी हाथ से निकल जाती है। इसलिए कहा जाता है लोकतंत्र में चूक नहीं होनी चाहिए। लोकतंत्र में जिससे चूक हुई वो चुक जाता है अथवा हाशिए पर चला जाता है। लोकतंत्र में एकबार हाशिए पर जाने के बाद फिर केन्द्र में आना मुश्किल होता है।इस नजरिए से आम आदमी पार्टी की इसबार के लोकसभा चुनाव में भूमिका को देखें तो कुछ नए पक्ष सामने आएंगे।

       आम आदमी पार्टी ने खुलकर अपने नजरिए का इजहार किया और यह भी बताया कि उसका आर्थिक मॉडल क्या है ? वह किस तरह की आर्थिक नीतियों को मानती है। दिल्ली में चुनाव जीतने के पहले आम आदमी पार्टी की आर्थिक नीति को लोग नहीं जानते थे। लेकिन लोकसभा चुनाव के साथ वे जान गए। आम आदमी पार्टी की समग्रता में भूमिका संतोषजनक रही है और उसे आशा के विपरीत बेशुमार वोट मिले हैं।उसके 4सांसद चुने गए हैं। इससे भी बड़ी बात यह कि राजनीति में नैतिक मूल्यों को लेकर जो मुहिम उसने छेड़ी थी वह भी रंग लाई। लेकिन लोकतंत्र में नैतिक मूल्यों पर उतना जोर नहीं रहता जितना राजनीतिक जोर आजमाइश पर रहता है।

आम आदमी पार्टी राजनीतिक जोर आजमाइश में संसाधनों की कमी और सांगठनिक दुर्बलता के कारण मैनस्ट्रीम से खिसक गयी। यह सच है कि केजरीवाल की कम्युनिकेटिव क्षमता बेजोड़ है,यहां तक कि आम आदमी पार्टी के मीडिया प्रवक्ताओं की भूमिका भी विभिन्न टीवी प्रस्तुतियों में शानदार रही।

आम आदमी पार्टी को कायदे से सारे देश में चुनाव लड़ने की बजाय क्षेत्र विशेष-राज्य विशेष में केन्द्रित होकर लड़ना था ,इससे आर्थिक संसाधनों और सांगठऩिक क्षमता का बेहतर ढ़ंग से इस्तेमाल हो पाता। लोकतंत्र में केन्द्रित होकर सोचने,काम करने, चुनाव लड़ने की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

आम आदमी पार्टी की लोकसभा चुनाव में समग्रता में भूमिका बेहतरीन रही है लेकिन मुश्किल यह है कि वह चुनाव की प्रक्रिया के तेजगति पकड़ने के साथ ही फोकस से गायब हो गयी। फोकस में सिर्फ केजरीवाल रह गए,दल गायब हो गया। केजरीवाल का फोकस में रह जाना और दल का फोकस से हट जाना स्वयं में समस्या मूलक है।

दूसरी समस्या यह भी है कि आम आदमी पार्टी अपने साखदार कम्युनिकेशन के लिए केजरीवाल पर अत्यधिक निर्भर है। वहीं दूसरी ओर केजरीवाल अपनी साख को तब ही भुना पाए जब वे मीडिया इवेंट करें। इस तरह मीडिया इवेंट केन्द्रित कम्युनिकेशन ने उनकी राजनीतिक क्षमता को संकुचित किया।

राजनीतिक दल को राजनीतिकेन्द्रित दबाव पैदा करना चाहिए न कि इवेंटकेन्द्रित। इवेंट केन्द्रित कम्युनिकेशन तात्कालिक तौर पर अपील करता है लेकिन उसकी दीर्घकालिक अपील नहीं होती। इसके विपरीत प्रो.आनंदकुमार या योगेन्द्र यादव की इवेंटकेन्द्रित अपील कभी नहीं रही। वे गंभीर दीर्घकालिक अपील बनाकर काम करते रहे हैं। कायदे से इन दोनों को मुख्य संचालक के रुप में सामने रखा जाता तो संभवतः और भी बेहतर परिणाम आ सकते थे।

आम आदमी पार्टी को जितनी बड़ी संख्या में देशभर में वोट मिले हैं उससे यह साफ नजर आ रहा है कि इस दल में लंबे समय तक काम करने की संभावनाएं जनता देख रही है। तकरीबन डेढ़ करोड वोट पाना बहुत बड़ी उपलब्धि है। खासकर युवाओं के वोट इसमें सबसे ज्यादा हैं।




शुक्रवार, 2 मई 2014

अरविन्द केजरीवाल फिनोमिना

अरविन्द केजरीवाल फिनोमिना

25 April 2014 at 21:21
अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने फिर इस्तीफा दिया। फिलहाल वे बनारस से लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। भारतीय राजनीति के संदर्भ में कई मायनों में यह विलक्षण फिनोमिना है । केजरीवाल ने लंबे समय से परंपरागत राजनीति से भिन्न सामाजिक सरोकारों की वैकल्पिक राजनीति की है। 'सूचना प्राप्ति अधिकार' से लेकर 'जन-लोकपाल बिल' तक विभिन्न मसलों पर आम जनता के विभिन्न तबकों में गंभीर राजनीतिक और वैचारिक प्रचार अभियान चलाया है। उन्होंने आम लोगों को जाग्रत ,संगठित और संघर्ष के लिए प्रेरित करने का काम निस्वार्थ भाव से किया है। यही काम उनकी राजनीतिक पूंजी भी है । 
    केजरीवाल फिनोमिना इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने स्वयंसेवी संगठनों की संसदीय राजनीति में भाग न लेने की प्रतिज्ञा को तोड़ा है। इस समय देश में तकरीबन 40हजार के करीब स्वयंसेवी सामाजिक संगठन हैं जो विभिन्न मसलों पर आम जनता में विभिन्न सामाजिक स्तरों पर काम कर रहे हैं। इन संगठनों की यह साझा राजनीतिक प्रतिबद्धता रही है कि संसदीय चुनावी राजनीति से दूर रहो, राजनीतिक दबाब समूह के रुप में काम करो और जनता को जाग्रत करो,शिक्षित करो और उसके बुनियादी मसलों पर संघर्ष करो । इन संगठनों की सांगठनिक क्षमता सीमित है,लेकिन संगठनों की संख्या असंख्य है और इनका राजनीतिक दबाब किसी भी बड़े राजनीतिक दल से ज्यादा रहा है ।
    केजरीवाल फिनोमिना को समझने के लिए एनजीओ राजनीति में विगत 25सालों में आए उभार और  विकास को जानना जरुरी है । केजरीवाल फिनोमिना के निर्माण में एनजीओ राजनीति की बहुत बड़ी भूमिका है। एनजीओ संगठनों की राजनीति मूलतःमानवाधिकारों की रक्षा और नागरिकसमाज के निर्माण की राजनीति है । मानवाधिकारों की चेतना के विकास और स्वीकृति दिलाने में एनजीओ संगठनों की केन्द्रीय भूमिका रही है ।
एनजीओ राजनीति का लक्ष्य संसद-विधानसभा या पंचायतें नहीं रही हैं । अधिकांश सक्रिय एनजीओ संगठनों की सामाजिक सक्रियता के प्रमुख विषय  हैं - आम लोगों की जिंदगी में विकास,नए आर्थिक विकास,खेती,बाँध,नहर,प्रकृति,साम्प्रदायिकता ,शिक्षा, साक्षरता,  सूचना प्राप्ति अधिकार,भ्रष्टाचार आदि मसलों की क्या भूमिका है और उनको क्या करना चाहिए । राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली से भिन्न ये संगठन कमोबेश जनता की शिरकत और उनके द्वारा ही फैसले लेने पर जोर देते रहे हैं ।इसने आम नागरिकों में दलीय राजनीतिक संगठनों से भिन्न किस्म का माहौल पैदा किया है ।
      केजरीवाल का राजनीति में आना या आम आदमी पार्टी का जन्म कोई आकस्मिक घटना नहीं है । यह चंद व्यक्तियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा की भी अभिव्यक्ति नहीं है। यह कारपोरेट षडयंत्र की दुरभिसंधि का परिणाम भी नहीं है।  आम आदमी पार्टी का उदय असल में स्वयंसेवी संगठनों की जनशिरकत की राजनीतिक प्रक्रिया का स्वाभाविक परिणाम है । जन-लोकपाल बिल का आंदोलन नहीं भी हुआ होता तो एकदिन इस प्रक्रिया के गर्भ से आम आदमी पार्टी जैसे किसी राजनीतिक दल का उदय होता । जन लोकपाल बिल के आंदोलन ने स्वयंसेवी संगठनों और जनशिरकत की राजनीतिक प्रक्रिया को सघन और तेज बनाया।
केजरीवाल फिनोमिना और आम आदमी पार्टी विचारधाराहीन नहीं है। यह फिनोमिना परंपरागत अर्थ में विचारधारा को नहीं मानता । यह समस्याकेन्द्रित मानवाधिकार परिप्रेक्ष्यों की अभिव्यक्ति है।  परंपरागत राजनीतिक दलों का आम जनता की समस्याओं के प्रति विचारधारा केन्द्रित नजरिया रहा है। मसलन् वे विचारधारा के आधार पर जनता को गोलबंद करते हैं और फिर उसे समस्या के साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं। जमता उनके यहां दर्शकीय भूमिका अदा करती है। उनके यहां दर्शक और दाता का भाव है। जनता दर्शक है ,और राजनीतिकदल दाता हैं । जनता अनुयायी और वे नेता हैं।
    नेता जैसे बताए जनता वैसे करे। जनता की राय तब ही ली जाएगी जब नेता कहे या दल कहे। जनता की वही बात नेता या दल मानेगा जो अनुकूल हो । वे ही मसले उठाए जाएंगे जो दल या नेता बताए। उसी परिप्रेक्ष्य में लड़ाई लड़ी जाएगी जो दल या नेता ने तय कर दिया है। इसी फ्रेमवर्क में परंपरागत राजनीतिक दल निचले स्तर पर काम करते रहे हैं । इसके कारण जनता और दल या नेता के बीच में असमान संबंध बना है। इकतरफा कम्युनिकेशन हुआ है। बेमेल और स्वार्थी भ्रष्ट रिश्ता बना है। इस रिश्ते में ईमानदारी,जनशिरकत,मानवाधिकारों की चेतना,लोकतांत्रिक मानवीय व्यवहार और आचरण की कोई जगह नहीं रही। इस प्रक्रिया के कारण 20वीं सदी के उत्तरार्ध में निर्मित लोकतंत्र की सभी बुनियादें नष्ट हो गयीं। यह लोकतंत्र का सर्वसत्तावादी मार्ग है।
   लोकतंत्र के सर्वसत्तावादी मार्ग पर चलने के कारण हमारे संविधान में चित्रित सपने का अंत हो गया । संविधान,लोकतंत्र,धर्मनिरपेक्षता,समाजवाद मखौल,हास्य-व्यंग्य की विषयवस्तु में तब्दील हो गया । हमारे यहां  राजनीतिक सर्वसत्तावाद को धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता, राष्ट्रीय एकता बनाम सामाजिक विभाजन, वामपंथी बनाम दक्षिणपंथी,प्रगतिशील बनाम प्रतिक्रियावादी ,धर्मनिरपेक्षता बनाम छद्म धर्म निरपेक्षता, एक परिवार का शासन बनाम कांग्रेसविरोध,संघ बनाम कांग्रेस,लोहिया बनाम नेहरु आदि विभिन्न केटटेगरी में वर्गीकृत किया और पैंसठ सालों से इन्हीं ध्रुवीकरणों में बाँधकर राजनीति का मूल्यांकन करते रहे । राजनीतिक सर्वसत्तावाद को हमने कभी निशाना नहीं बनाया। इस मामले में वामदलों से लेकर दक्षिणपंथी भाजपा तक सभी दल लोकतंत्र के नाम पर सर्वसत्तावाद का ही किसी न किसी रुप में अनुकरण करते रहे हैं ।
लोकतंत्र के आवरण में पल्लवित सर्वसत्तावाद ने लोकतंत्र की अपूरणीय क्षति की है। मसलन् कांग्रेस को यही सर्वसत्तावाद आपातकाल तक ले गया। भाजपा को2002 के गुजरात जनसंहार,अकालीदल को आतंकवाद-पृथकतावाद,शिवसेना को साम्प्रदायिकता,द्रमुकदलों को अंध क्षेत्रीयतावाद,वामदलों को निरुद्योगीकरण और पार्टीतंत्र की सत्ता-महत्ता तक ले गया । आमतौर पर लोकतंत्र पर बातें करते  समय हमने स्वतंत्र और स्वतःस्फूर्त जनशिरकत की सभी संभावनाओं को खत्म करके नियोजित लोकतंत्र में अपने राजनीतिक तंत्र का रुपान्तरण कर दिया । कमोबेश यह प्रक्रिया सभी दलों में घटित हुई ।
   केजरीवाल फिनोमिना राजनीतिक सर्वसत्तावाद को एकसिरे से खारिज करता है । जो लोग आम आदमी पार्टी को विचारधाराहीन होने का लेबिल लगा रहे हैं वे नहीं जानते कि राजनीति के जितने भी प्रचलित दलीय रुप हैं वे स्वयं में समस्याग्रस्त हैं। उनके पास अपनी सीमाओं से निकलने का कोई मार्ग नहीं है। मसलन्, भाजपा हो वामदल हों किसी के पास जनशिरकत को सुनिश्चित करने वाली न तो धारणा है और न सांगठनिक संरचनाएं ही है ।
   केजरीवाल फिनोमिना नियोजित जनता, पैसा देकर,दादागिरी या दबाब के जरिए जुटायी गयी जनता से भिन्न स्वतःस्फूर्त्त शिरकत करने वाली जनता की धारणाओं के आधार पर पैदा हुआ राजनीतिक फिनोमिना है । जिस गति से आम आदमी पार्टी से आमलोग सदस्यता ले रहे हैं वह अपने आप में विलक्षण  फिनोमिना है । किसी भी लोकतांत्रिक देश में किसी दल के साथ इतनी बड़ी तादाद में और इतने कम समय में आम लोगों ने दलीय मेम्बरशिप नहीं ली है । आम आदमी को जोड़ने की रणनीतियों को आम आदमी पार्टी सुगम और सर्वसुलह बनाया है । बिना किसी मध्यस्थ के आप सीधे सदस्यता ले सकते हैं ।अब दल है और जनता है। इन दोनों के बीच नेता नामक तत्व का लोप हो गया है । मसलन् आप फोन करें,एसएमएस करें.ऑनलाइन भरे और सदस्यता मिल जाएगी। सदस्यता लेने का यह तरीका प्रत्यक्षतः नेता की विदाई का आख्यान कह रहा है । पहले किसी भी दल का सदस्य होने के लिए नेता या कार्यकर्ता को पकड़ना पड़ता था और वही मेम्बरशिप दिलाता था लेकिन आम आदमी पार्टी ने इस समूचीप्रक्रिया को पारदर्शी और जनसुलभ बनाकर सर्वसत्तावादी राजनीति की बुनियाद में मट्ठा डाल दिया है ।
     सर्वसत्तावादी राजनीति की नींव सदस्य बनाने के नियम से बुनियादी तौर पर जुड़ी है । परंपरागत दलों में सदस्य बनने के लिए नेता या कार्यकर्ता से मिलना जरुरी था, यही नेता जनता और दल के बीच मध्यस्थ या सेतु होता है। यह राजनीति का सबसे भ्रष्ट तत्व है और यही सर्वसत्तावादी राजनीति की धुरी है । यहीं से दलाल पैदा हुआ है। कोई भी काम कराना हो तो इसी मीडिलमैन को पकड़ना होता है । मंत्री,सांसद,विधायक औदि तब कार्य करते हैं जब कोई मिडिलमैन आपके साथ हो। विगत 65 सालों में इसी मिडिलमैन ने विभिन्न स्तरों पर दलाल की भूमिका अदा की और आज यह हर दल में सबसे ज्यादा ताकतवर है। मसलन् सोनिया गांधी या नरेन्द्र मोदी से ज्यादा ताकतवर इनके मिडिलमैन हैं । आम आदमी पार्टी ने अपनी पार्टी सदस्यता को सरल-सुगम और सर्वसुलभ कराकर नेता की विदाई करके सदस्यता को जनशिरकत के पैराडाइम में ले जाकर खड़ा कर दिया है । यह सर्वसत्तावादी राजनीति के अंत की घोषणा भी है । 
   केजरीवाल फिनोमिना ने आम जनता की उम्मीदों को नए शिखर दिखाए हैं। आम आदमी बहुत उम्मीदें कर रहा है। उम्मीदें जगाना नई बातनहीं है, हर आंदोलन या नए राजनीतिक नारे के साथ जनता में उम्मीदें जगती रही हैं। लेकिन केजरीवाल से उम्मीदें अलग किस्म की आशाएं लेकर आई हैं और नए राजनीतिक संबंध को लेकर आई हैं । परंपरागत राजनीतिकदलों की जीत के साथ यह उम्मीद रहती थी  हमने वोट दे दिया अब तुम काम करो, हम पाच साल बाद देखेंगे। पांच साल बाद मूल्यांकन करेगे। मतदाता यह मानकर चलता है कि हमने वोट दिया और हमारा काम खत्म और अब नेता की जिम्मेदारी है वह अपना वायदा निभाए। इस इकतरफा संबंध को आम आदमी पार्टी ने उलट दिया है ।
    आम आदमी पार्टी बार-बार हर बड़े मसले पर जनता में जाने,जनता की राय लेने, सबकुछ जनता के बीच में साफगोई के साथ पेश करने पर जोर दे रही है । वे जो भी फैसला लेते हैं टीवी लाइव कवरेज के जरिए आम जनता में सीधे सम्प्रेषित करते हैं । इंटरनेट पर सभी फैसलों की जानकारी देते हैं । जनशिरकत को महत्व देते हुए सत्ता में जाने का फैसला दिल्ली के मुहल्लों में सभाएं करके किया। 
       विगत तीन दशकों में देश के विभिन्न हिस्सों में स्वयंसेवी संगठनों का जिस तरह नेटवर्क उभरकर सामने आया है और उसने मीडिया और समाज में विभिन्न समयों पर जो नए किस्म के लोकतांत्रिक राजनीतिकबोध और मानवाधिकारकेन्द्रित राजनीतिक प्रक्रिया को जन्म दिया है उससे स्थानीय स्तर पर मीडिया भी प्रभावित होता रहा है । उल्लेखनीय है कि मीडिया में स्थानीय स्तर पर स्वयंसेवी संगठनों के संघर्षों का कवरेज बराबर आता रहा है। यहां तक कि अनेकबार इस कवरेज ने राष्ट्रीय मीडिया में भी प्रमुखता के साथ स्थान बनाया है ।
      केजरीवाल फिनोमिना पर विचार करते समय हमें भारत के बदलते सार्वजनिक माहौल (पब्लिक स्फेयर) पर गंभीरता से विचार करना चाहिए । विगत30सालों में टेलीविजन और इंटरनेट ने आम आदमी के संपर्क,संबंध और संप्रेषण के तौर-तरीकों ने नए किस्म के जीवन संबंधों और जीवनशैली को जन्म दिया है । टेलीविजन और इंटरनेट जहां पर भी पहुँच रहे हैं वहां पर पुराने नजरिए में बदलाव आना शुरु हुआ है । दुनिया को देखने और समझने का संस्कार बदला है । इससे राजनीतिकदलों और जनता के संबंधों में बदलाव आया है। सार्वजनिक बहस के मुद्दे अब वे हैं जिनको मीडिया (टीवी-इंटरनेट) प्रमुखता से पेश करता है।
     प्रेसयुग से इलैक्ट्रोनिक युग में दाखिल होने के साथ भारत ने तेजी से साइबर युग में प्रवेश किया। टेलीविजन क्रांति के चंद वर्षों बाद ही कम्प्यूटर क्रांति और बाद में साइबरक्रांति में आम जनता दाखिल हो गयी । इसने परंपरागत राजनीति और उसके जनता से जुड़ने, संवाद करने और जनता को गोलबंद करने के पुराने तरीकों को एक ही झटके में बदल दिया ।राजनीति और सामाजिक सत्य के बीच में तनाव को सघन बना दिया ।
    टेलीविजन युग आने के पहले तक राजनीति और सामाजिक सत्य में परंपरागत अनुकरणवादी संबंध होता था ।यह संबंध स्वाभाविक राजनीतिक प्रक्रियाओं से निर्देशित होता था। लेकिन टेलीविजन आने के बाद से राजनीति और सामाजिक सत्य का संबंध गुणात्मक तौर पर बदल गया ।
     पहले राजनीतिक दल सामाजिक  सत्य को अनुभवों और अनुमानों के आधार पर पेश करते थे। टेलीविजन आने के राजनीतिविज्ञान के नियमों का प्रयोग बढ़ा। धीरे धीरे हम चुनावी भविष्यवाणियों के दौर में दाखिल होते हैं। जनमतसंग्रह के दौर में दाखिल होते हैं। चुनाव पूर्व जनमत सर्वेक्षण और चुनाव के बाद जनमत संग्रह की प्रक्रिया में दाखिल होते हैं । इसने राजनीति को अनुमानों से परे ले जाकर राजनीतिविज्ञान के ठोस चिंतन और नए किस्म के सोच-विचार के तंत्र के साथ जोड़ा। वहीं दूसरी ओर स्वयंसेवी संगठनों ने जमीनी स्तर पर तथ्यसंग्रह करके राय बनाने की पद्धति का ईमानदारी से पालन किया और उनको बेहतर सामाजिक-राजनीतिक परिणाम मिले । पहलीबार राजनीतिविज्ञान को लोकतंत्र की सेवा में लगाया गया। परंपरागत दलों ने राजनीति का इस्तेमाल किया है राजनीतितविज्ञान का नहीं । स्वयंसेवी संगठनों और जनमत सर्वेक्षण करने वालों ने राजनीतिविज्ञान और लोकतंत्र के बीच में नए रिश्ते का आरंभ किया। इससे लोकतंत्र और राजनीति दोनों को समझने में बहुत बड़ी मदद मिली है । राजनीति के सत्य को विज्ञान के जरिए जानना और फिर राजनीति में  परिवर्तन की ओर ध्यान गया ।
      परंपरागत तरीके से राजनीति करने वाले दलों का जनता के साथ अन्तर्विरोध बढ़ा। परंपरगत दल समझ ही नहीं पा रहे हैं कि जनता के सत्य को कैसे जानें और उसमें निहित समस्याओं के समाधान कैसे करें । इसका दुष्परिणाम यह निकला कि परंपरागत राजनीतिकदल लगातार अपनी साख खोते चले गए । वे राजनीति तो कर रहे थे लेकिन राजनीतिविज्ञान को जाने और माने बिना । राजनीतिकदल यदि राजनीतिविज्ञान की मदद से देश को समझने की कोशिश करते तो देश और दलों की प्रकृति ही कुछ और होती । मसलन् राजनीतिक दलों ने कभी भी किसी भी समस्या के वैज्ञानिक कारणों को जानने और उसके अनुसार समाधान खोजने का काम नहीं किया। बार-बार समस्या आने के बाद  तदर्थ समाधान खोजे गए और यह मान लिया गया कि अब समस्या को बेहतर ढ़ंग से हल कर लिया जाएगा। लेकिन समस्या इससे और जटिल बनी है। मसलन् बलात्कार के खिलाफ हुए निर्भयाकांड विरोधी आंदोलन को ही लें इस आंदोलन के दबाब में जो कानूनी बदलाव किए गए हैं वे समस्या की विकरालता और व्यापकता को बुनियादी तौर पर देख  ही नहीं पाते। बलात्कार की घटना को रोकने के लिए कानूनी बदलाव एक सीमित कदम है असल में हमें बलात्कार की जडों को नष्ट करने  बारे में सोचने की जरुरत है । बलात्कार की जड़ों को राजनीतिविज्ञान की मदद के बिना समझना मुश्किल है।
      हमारी अब तक की राजनीतिक प्रक्रिया और दलीय राजनीति आम जनता को लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों की सत्ता-महत्ता का बोध पैदा कराने में असफल रही है।राजनीतिकदल आम जीवन का लोकतांत्रिकीकरण करने में असफल रहे हैं । आम जीवन के लोकतांत्रिकीकरण के अभाव के कारण ही हमें तमाम सामाजिक-राजनीतिक समस्याओं से आज मुठभेड़ करनी पड़ रही है । हमारे देश में लोकतंत्र को आए 65साल हो गए लेकिन आज भी हम आम नागरिक को लोकतांत्रिक अधिकार क्या होते हैं ? वे क्यों जरुरी हैं ?लोकतांत्रिक मूल्य क्या हैं और उनको समृद्ध करना क्यों जरुरी है ,यह समझा नहीं पाए हैं ।
    हमारे देश में लोकतंत्र है लेकिन जनता में लोकतांत्रिकबोध,लोकतांत्रिक मूल्य और लोकतांत्रिक व्यवहार एकसिरे से गायब है । यह अजीब आयरनी है कि देश को बचाने के काम को लोकतंत्र बचाने के लक्ष्य से पृथक करके देखने वालों की संख्या बहुत है । देश की एकता और अखंड़ता किसी मनोभाव विशेष या देशज उन्माद पर निर्भर नहीं करती । हमने देश और लोकतंत्र की अन्तर्ग्रथित समझ का कभी प्रचार प्रसार ही नहीं किया । हमेशा यही संदेश दिया है कि देश का मतलब दल विशेष या परिवार विशेष या नेताविशेष या धर्म विशेष का शासन है । भारत का मतलब न तो कांग्रेस है,नहीं हिन्दुओं का देश है और नहीं राजनीतिक दल विशेष का देश है ।
     लोकतंत्र में नागरिक महत्वपूर्ण होता है। नागरिक अधिकार महत्वपूर्ण होते हैं।नागरिक अधिकारों का संरक्षण और पल्लवन करने वाली संस्थाएं महत्वपूर्ण होती हैं । नागरिक मान-मर्यादाएं और नागरिक संस्कार महत्वपूर्ण होते हैं। हमारा समूचा समाज अभी तक जातिगत और धार्मिक संस्कारों के दायरों में बंद है,हमने आम आदमी को कभी इन बंद दरवाजों की कैद से बाहर निकालकर जानने –समझने की कोशिश नहीं की । हमने उसमें कभी नागरिकबोध पैदा नहीं किया। केजरीवाल फिनोमिना का महत्वपूर्ण प्रस्थान बिंदु यही है। वह व्यक्ति को जाति और धर्म की पहचान की कैद से एक ही झटके में मुक्त करके नए पैराडाइम में ले जाने में सफल हुआ है ।
    केजरीवाल फिनोमिना  ने राजनीतिकदलों की अनुमान पर आधारित राजनीति और विभिन्न समस्याओं पर अनुमान आधारित बयानबाजी से आगे निकलकर तथ्यपूर्ण बयानबाजी और शोधपरक बयानबाजी को महत्ता दी, राजनीतिक दलों को राजनीतिविज्ञान के अनुसार प्रत्येक विषय पर अनुसंधान करने,किसी भी समस्या को उठाने के पहले  उस पर रिसर्च करने का तरीका पेश करके राजनीति के व्यवहार को राजनीति के विज्ञान से जोड़ा है । मसलन्, जनता की समस्या विशेष को उठाने के पहले उसकी जड़ों तक तहकीकात करना और उस समस्या पर उठाए गए सभी कदमों को विभिन्न पहलुओं से समझने का काम किया है। यह पद्धति जनलोकपाल बिल पर बहस के दौरान बहुत ही सटीक ढ़ंग से सामने आई है।
      केजरीवाल फिनोमिना ने उन तमाम स्वयंसेवी संगठनों को संसदीय जनतंत्र में शिरकत करने और संसदीय मंचों पर अपनी जगह बनाने की संभावनाओं को खोला है। आज विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों के कार्यकर्त्ता आम आदमी पार्टी में बड़ी संख्या में शामिल हो रहे हैं और वे लोग भी शामिल हो रहे हैं जो पहले किसी न किसी राजनीतिक दल में थे लेकिन अपने को कुंठित और निराश महसूस कर रहे थे और सामाजिक हस्तक्षेप के लिए छटपटा रहे थे । इससे सामाजिक तौर पर राजनीति को लेकर निराशा का वातावरण टूटा है । राजनीति में शिरकत बढ़ी है। वे तमाम ईमानदार लोग जो एक समय राजनीति को लेकर निराश थे,अपने को हस्तक्षेप करने में असमर्थ महसूस कर रहे थे वे तेजी से आम आदमी पार्टी में शामिल हो रहे हैं और यही वे लोग भी हैं जो आम आदमी पार्टी के गठन के पहले जनलोकपाल बिल पर चल रहे अन्ना आंदोलन में शिरकत कर रहे थे ।
   केजरीवाल फिनोमिना इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने 'अ-राजनीति¬' की राजनीति के बहाने उन तमाम लाखों-करोड़ों लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया जो राजनीति को बुरा समझते थे । इसके साथ पापुलिज्म के सभी रुपों और पापुलिज्म के खेल में शामिल सभी रंगत के लोगों के साथ अपने संपर्क-संबंधों को खुला भी रखा । मसलन् , कश्मीर के सवाल पर जनमत संग्रह की मांग करना भी सही है और राष्ट्रीय एकता की बात कहना भी सही है । यह मिला-जुला नजरिया आम आदमी पार्टी के एक वरिष्ठ सहयोगी का है । वे नागरिक अधिकारों की रक्षा के तहत इस नजरिए का प्रचार करते रहे हैं । राष्ट्रीय एकता के नाम पर वे देश के देशभक्तों को भी सम्बोधित कर रहे हैं और जनमत संग्रह के नाम पर कश्मीरी पृथकतावादियो को भी सम्बोधित कर रहे हैं । उसी तरह आम आदमी पार्टी के समर्थक अनेक नेता हैं जो सिंगूर-नंदीग्राम के सवाल पर वामदलों का विरोध करते रहे हैं जिससे वे पश्चिम बंगाल में चल रहे पापुलिज्म को भी भुना रहे हैं  और पश्चिम बंगाल के बाहर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वामदलों के साथ भी संगति बनाए रखते हैं । यही हाल माओवादी संगठनों को लेकर है। मूल बात यह है कि आम आदमी पार्टी में शामिल नेतागण पापुलिज्म को किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। पापुलिज्म के साथ जुड़े रहने का एक नमूना निर्भयाकांड पर दिल्ली में चला बलात्कार विरोधी जनादोलन है। इस आंदोलन को राजनीतिक तौर पर आम आदमी पार्टी के नेताओं ने पूरी तरह भुनाया ।
      दिलचस्प बात यह है कि निर्भयाकांड आंदोलन जब चल रहा था तो उनसे जुड़े लोग लोग जो इंडिया अगेंस्ट करप्शन,जन लोकपाल बिल आंदोलन आदि नामों से विभिन्न संगठनों में काम कर रहे थे। उन लोगों ने निर्भयाकांड के बाद जब आम आदमी पार्टी बनायी तो उसके बाद दिल्ली में विगत सवा साल में बलात्कार की घटनाओं में बेशुमार वृद्धि हुई है लेकिन उन्होंने कोई जुलूस तक नहीं निकाला,कोई आंदोलन नहीं किया,यहां तक कि किसी बलात्कार पीड़ित महिला को जाकर सांत्वना देने या उसके संबंध में बयान तक जारी नहीं किया। दिल्ली और उसके बाहर सभी किस्म के आंदोलनों से जुड़ना और पापुलिज्म की पिच को बनाए रखना यही उनका लक्ष्य रहा है । अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के सवाल पर उन तमाम लोगों ने आपत्ति की थी जो इन दिनों आम आदमी पार्टी में जाने का प्रयास कर रहे हैं । यही हाल हरियाणा की बदनाम खाप पंचायत को लेकर है । 
     समस्या यह है कि आम आदमी पार्टी में ऐसे लोग आ रहे हैं जिनके विभिन्न राष्ट्रीय या क्षेत्रीय सवालों पर अलग-अलग नजरिए रहे हैं और वे तेजी से आम आदमी पार्टी में शामिल हो रहे हैं। ऐसे लोगों के आम आदमी पार्टी में शामिल होने के पहले के नजरिए और शामिल होने के बाद के नजरिए में अंतर करना होगा ,समस्या यह है कि विभिन्न मसलों पर आम आदमी पार्टी का नीतिगत रुख अभी साफ होना बाकी है। होसकता है आम आदमी पार्टी के सुसंगत नजरिए के आने के बाद विभिन्न मतावलम्बी लोग अपने को आम आदमी पार्टी के नजरिए में बांध लें,यदि वे अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण पर कायम रहते हैं तो आम आदमी पार्टी को भविश्य में बिखरने से कोई नहीं बचा सकता । आम आदमी पार्टी को समझना होगा कि स्वयंसेवी संगठन और राजनीतिक दल की कार्यप्रणाली और राजनीतिक जिम्मेदारी में अंतर है।
स्वयंसेवी संगठनों में एक बड़ा हिस्सा है जिसकी भारत के संविधान और संसद में कोई आस्था नहीं है। वे संविधान को नहीं मानते । फलतः वे दलीय राजनीति का विरोध करते हैं । स्वयंसेवी संगठन होने के नाते वे लोकतांत्रिक संरचनाओं में जबावदेही से मुक्त हैं । वे देश की नीतियों के बंधनों से मुक्त हैं,वे प्रशासनिक आदेशों से बंधे नहीं हैं ।
      आम आदमी पार्टी बन जाने के बाद केजरीवाल राजनीतिकदल की भूमिका से बंधने के लिए बाध्य हैं। वे उन नीतियों को मानने को बाध्य हैं जो संसद द्वारा स्वीकृत हैं। वे उन कन्वेंशनों और परंपराओं को मानने को बाध्य हैं जो एक राजनीतिकदल पर लागू होती हैं,वे उन नियमों को मानने को मजबूर हैं जो मुख्यमंत्री पर लागू होते हैं ।
    एनजीओ  स्वयंसेवक के पास अनंत स्वतंत्रता होती है,लोकतांत्रिक संस्थानों के प्रति उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं होती,वे अपने संगठन और अपने विचार के सर्वतंत्र स्वतंत्र नेता होते हैं। लेकिन मुख्यमंत्री और राजनीतिक दलों के लिए स्वतंत्रता की लक्ष्मण रेखा खिंची हुई है और केजरीवाल को उसी लक्ष्मणरेखा में रहकर काम करना होगा ।
    समग्रता में देखें तो हर हालत में पापुलिज्म के साथ जुड़ना और अपने जनाधार का विस्तार करना यही आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं की आम आदमी पार्टी के गठन के पहले रणनीति रही है और यह रणनीति आज उनको मदद कर रही है विभिन्न रंगत के लोग तेजी से आम आदमी पार्टी की सदस्यता ले रहे हैं ।अनेक लोग ऐसे भी हैं जो बिना जाने-बिना सोचे भी सदस्यता ले रहे हैं ।
   केजरीवाल फिनोमिना की सबसे बड़ी खूबी है कि उसने जनता के प्रासंगिक सवालों को केन्द्र में रखा है और एकाग्रभाव से उसको बार-बार मीडिया और इंटरनेट के जरिए प्रचारित किया है । इसके कारण उनके बारे में यह राय भी बनी है कि 'बात तो ठीक कह रहा है केजरीवाल'। 
'बात तो ठीक कह रहा है केजरीवाल' मुहावरा आमलोगों में चल निकला है। कस्बों और देहात में आमलोग कुछ इसी तरह मुहावरे में केजरीवाल फिनोमिना पर चुटकियां लेते नजर आ रहे हैं । केजरीवाल फिनोमिना का आम जनता का मुहावरा बन जाना और 'आम आदमी' नाम पर विगत कई सालों में कांग्रेस के प्रचार अभियान को अपनी प्रचारकला में शामिल करके इस्तेमाल कर लेना,एकदम विरल घटना है। 'आम आदमी का हाथ ,कांग्रेस के साथ' का नारा कांग्रेस की सबसे ताकतवर कैम्पेन का हिस्सा रहा है सन् 2009 के चुनाव के समय और धीरे धीरे कांग्रेस इस नारे को भूल गयी और आम आदमी पार्टी ने इस कैम्पेन पर अप्रत्यक्षतौर पर वैचारिक हमला करके इस नाम (आम आदमी) के साथ जुड़ी जनप्रियता को सीधे अपने पक्ष में करलिया । मीडिया और आम जनता में प्रचार में यदि उन पदबंधों का इस्तेमाल किया जाए जिन पर विज्ञापनबाजी हो चुकी है और मीडिया का पर्याप्त कवरेज आता रहा है तो पदबंध की जनप्रियता का बहुत जल्द लाभ उठाया जा सकता है । केजरीवाल एंड कंपनी ने यही किया है। उन्होंने 'आम आदमी ' की जनप्रियता को देखकर ही अपने दल का नाम आम आदमी पार्टी रखा। 

सन् 2014 के लोकसभा चुनाव के बारे में मीडिया कवरेज के चरित्र की उपेक्षा करके कोई बात नहीं हो सकती। न्यूज टेलीविजन चैनलों ने विगत 5 सालों में खबरें कम राष्ट्रीय उन्माद ज्यादा पैदा किया है । मेनीपुलेशन को महामीडियम और संप्रेषक बनाया है। अब हम देखते हैं और दौडते हैं , सोचते नहीं हैं । टीवी का महा मंत्र है मध्यवर्ग को हाँको। अविवेक को महिमामंडित करो। शार्टकट को मूल्यवान बनाओ। ये सभी डिजिटल स्क्रीन मेनीपुलेशन के आधारसूत्र हैं । इनको हम टीवी और इंटरनेट कवरेज के रुपों जैसे अन्ना का हठ,बाबा रामदेव का योग,मोदी का महामोह और अब आप पार्टी  के ' लोकतंत्र मुक्तियज्ञ' में देख सकते हैं । हाँको का अहर्निश पुरश्चरण और इन सबके पीछे मध्यवर्ग को हाँककर ले जाने की परिणतियों पर गंभीरता सोचने की जरुरत है।
     भारत का लोकतंत्र, मध्यवर्गीय शार्टकट और नीतिहीनता की देन नहीं है। यह लंबे संघर्ष और गंभीर नीति विमर्शों के गर्भ से पैदा हुआ है। जो लोग शार्टकट में समाधान तलाश रहे हैं वे जान लें शार्टकट  में किसी समस्या का समाधान संभव नहीं है। जो कहता है कि मैं एक्शन करुँगा मुझे सत्ता दो,उससे ठहरकर बातें करो, नीतियों के बारे में पूछो और तसल्ली से सोचो फिर राय बनाओ। तसल्ली के साथ सोचे बिना लोकतंत्र समृद्ध नहीं होता । शार्टकट मध्यवर्गीय रुमानी राजनीतिक रास्ता हमेशा सामाजिक-राजनीतिक विभाजन और हिंसा की ओर ले जाता है । इसके अनेक उदाहरण विगत 65 सालों में देखे गए हैं।  
     मध्यवर्ग की अनालोचनात्मक और शार्टकट में सबकुछ पाने की मनोदशा का टीवी चैनलों ने बड़ी बारीकी से दोहन किया है । अन्ना के पीछे मध्यवर्ग क्यों था ? क्योंकि वह शार्टकट में परिणाम चाहता था।मोदी पर बलिहारी क्यों है ?क्योंकि शार्टकट में बिना सोचे समझे एक्शन का नायक लग रहा है। "आप " पार्टी या केजरीवाल क्यों मुग्ध कर रहा है ?क्योंकि जल्दी से भ्रष्टाचार खत्म कर देनेवाली जादुई झाडू उसके पास है !
     टीवी एंकरों से लेकर समाचार संपादकों तक यह विभ्रम फैला हुआ है कि जल्दी-जल्दी सामाजिक परिवर्तन कर रहे हैं । दो मिनट में 100 या 50 या 25 खबरें देने वाले समाचार मूल्य निर्माता कैसे हो सकते हैं ? जिनके पास समाचार के लिए स्पेस नहीं है वे हमें सिखा रहे हैं कि जीवन के हल स्पीड न्यूज की तरह खोजो , नेता की हेडलाइन देखो और उसके पीछे चलो!
      टेलीविजन ने नीतिविहीन शब्दवीर नेताओं को महिमामंडित किया है और यह बेहद खतरनाक पक्ष है। अन्ना,मोदी,बाबा रामदेव,केजरीवाल सबकीशब्दवीरता के नए नए बाइटस दिखाकर मध्यवर्ग की विवेकहीन मनोदशा का जमकर दोहन किया जा रहा है । जो लोग यह मानते हैं कि मध्यवर्ग के अधिकांश लोग पढे-लिखे होते हैं ,अक्लमंद होते हैं। उनसे मैं असहमत हूँ।
     मध्यवर्ग कितना अक्लमंद है यह देखना हो तो इसवर्ग की बिना सोचे-समझे विकास कर रही समूची युवापीढ़ी को देखो,यह देखने के लिए कहीं दूर जाने की जरुरत नहीं है अपने आसपास के किसी भी कॉलेज-विश्वविद्यालय में जाकर देखो कि हमारा युवा किस रुप में निर्मित हो रहा है ।
    युवाओं और मध्यवर्ग के प्रति  रोमैंटिक और अनालोचनात्मक भावबोध छोड़कर हमें गंभीरता से इस मसले पर हस्तक्षेप करने की जरुरत है ।शार्टकट मानसिकता और टेलीविजन उन्माद के बीच बन रहे मध्यवर्गीय सोच के तानेबाने को छिन्न-भिन्न करने की जरुरत है । मध्यवर्ग या टेलीविजन जो कह रहा है उसकी अंतर्वस्तु की गंभीरता के साथ समीक्षा करने की जरुरत है।
   टीवी चैनलों ने नीतिविहीनता को महान बनाया है। शोर या टीवी हंगामे को लोकतांत्रिक राजनीति का नाम दिया है । टीवी के टॉक शो या नेता की आमसभा -प्रेस कॉफ्रेस के   लाइव कवरेज से राजनीतिक दलों या नेताओं की प्रासंगिकता तय होने लगेगी तो हम बहुत गंभीर संकट में फंसने जा रहे हैं । अन्ना,मोदी और अब केजरीवाल के बारे में नीतिविहीन ढ़ंग से जिस तरह महिमामंडन चल रहा है वह लोकतंत्र के लिए शुभलक्षण नहीं है।
        नव्य आर्थिक उदारवाद ने ऐसा मध्यवर्ग निर्मित किया है जो किसी गंभीर आलोचनात्मक नीतिगत मंथन में शामिल नहीं होना चाहता वह तो बस चटपट एक्शन चाहता है । जो एक्शन करे ,वह महान है । लोकतंत्र का नायक बनने लायक है। यह मनोदशा लोकतंत्र का नहीं अविवेक और सर्वसत्तावाद का आधार तैयार कर रही है।
     सर्वसत्तावाद की नई रणनीति है विवेक से दूर रहो, नीतियों पर बहस मत करो।वोट दो,एक्शन देखो। क्या कहा जा रहा है ,उस पर सोचो मत। विश्वास करो।जो डिजिटल स्क्रीन पर दिखे वही सत्य है। जो डिजिटल स्क्रीन पर न दिखे ,वह असत्य है।   यानी अब विवेक ,नीति,कुर्बानी,भाईचारा आदि महत्वपूर्ण नहीं हैं डिजिटल स्क्रीन महत्वपूर्ण है ,इसलिए डिजिटल स्क्रीन पर ज्यादा से ज्यादा दिखने की भेड़चाल आरंभ हो गयी है। जिसनेता को जितना ज्यादा दिखाया जा रहा है ,समझो वही नेता महान है ,वही काम का है, वही लोकतंत्र का नायक है। यानी मध्यवर्ग के विवेक को टीवी या इंटरनेट स्क्रीन ने अपहृत कर लिया है और यही वह बिंदु है जहां पर सतर्क नीतिगत वाद-विवाद-संवाद को लोकतंत्र की विभिन्न दृष्टियों की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

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