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सोमवार, 9 अगस्त 2010

सांस्कृतिक जाम और उपभोग का संसार



     '' सांस्कृतिक जाम'' का परिणाम है कि सारी दुनिया के बाजार अमेरिकी सांस्कृतिक मालों से पटे पड़े हैं। यही हाल मीडिया उत्पादों का भी है। टीवी कार्यक्रमों का भी है। एकतरफा ढ़ंग से अमेरिका के सांस्कृतिक माल, मीडिया उत्पादों का निर्यात किया जा रहा है। स्थानीय सांस्कृतिक मालों अथवा गैर पश्चिमी जगत के सांस्कृतिक मालों का उतनी मात्रा में पश्चिमी देशों के लिए निर्यात नहीं हो रहा है जिस अनुपात में पश्चिमी देशों के सांस्कृतिक मालों का गैर पश्चिमी देशों की ओर निर्यात हो रहा है। सांस्कृतिक मालों के विनिमय के क्षेत्र में इस तरह की असमाता का प्रधान कारण है ''सांस्कृतिक जाम।' इसे कुछ लोग ''इलैक्ट्रोनिक नव्य उपनिवेशवाद'' भी कहते हैं। किसी के लिए ''सांस्कृतिक साम्राज्यवाद'' है। ''सांस्कृतिक जाम'' का प्रधान लक्ष्य है अमेरिकी मूल्यों ,विश्वासों,जीवन शैली आदि का प्रचार करना। इस कार्य में सबसे प्रभावी मीडियम के रूप में टीवी उभरकर सामने आया है। 

             ''सांस्कृतिक जाम'' का सबसे पहला मंत्र है स्थानीय संस्कृति को अपदस्थ करो। स्थानीय आख्यान को अपदस्थ करो, उसकी जगह पश्चिमी आख्यान को पेश करो। स्थानीय आधुनिकता को अपदस्थ करो ,उसके बदले पश्चिमी आधुनिकता को स्थापित करो। '' सांस्कृतिक जाम'' का अर्थ '' उपभोग के स्वर्ग'' का प्रचार करना। ''उपभोग के स्वर्ग '' में वही दाखिल हो सकता है जो पश्चिमी संस्कृति में रचा-बसा है। ''सांस्कृतिक जाम'' जब चीजों को माल बनाता है तो हम सिर्फ माल ही नहीं खाते, बल्कि समूची प्रकृति, जमीन, संस्कृति, दृश्य प्रस्तुतियां, यहां तक कि मानवीय शरीर का भी उपभोग करते हैं। यह एक तरह का प्रतीकात्मक उपभोग भी है। जब हम सांस्कृतिक उपभोग कर रहे होते हैं तो आत्मसात कर रहे होते हैं, सांस्कृतिक हमला कर रहे होते हैं, सांस्कृतिक उत्पीडन कर रहे होते हैं। सांस्कृतिक कुर्बानी कर रहे होते हैं। इसी क्रम में सांस्कृतिक अधिकार खो रहे होते हैं। 

''सांस्कृतिक जाम'' हमें ''उपभोग के स्वर्ग'' की यात्रा कराता हुआ एक ऐसी दुनिया में ले जाता है जहां से हम निकल नहीं पाते, अपनी संस्कृति को खो देते हैं, अपने सांस्कृतिक अधिकारों को खो देते हैं। ''सांस्कृतिक जाम'' जब ''अपदस्थ'' करता है तो पश्चिमी आधिुनिकता को विसंदर्भीकृत करते हुए पेश करता है। जिसके बाद उसका नया संदर्भ बनाता है। यह नया संदर्भ अन्य या 'अदर' के साथ बनाया जाता है। जब हम ''सांस्कृतिक जाम'' में फंस जाते हैं तो हमें यह सवाल करना चाहिए कि कौन किसको हजम कर रहा है ? हमारे मीडिया के पर्दे पर पर्यटन के जितने भी विज्ञापन आ रहे हैं अथवा पर्यटन संबंधी कार्यक्रम आ रहे हैं अथवा धार्मिक प्रसारण आ रहे हैं , इनमें जो पाठ रचा जा रहा है, उपभोग के स्वर्ग का जो नया आख्यान रचा जा रहा है उसकी धुरी है ''पश्चिम का पाठ और संस्कृति।'' 

'' सांस्कृतिक जाम'' का सबसे आदर्श उदाहरण है थ्योरी का ग्लोबल स्तर पर वितरण। पश्चिमी सैध्दान्तिकियों का जिस तरह प्रसार और इस्तेमाल हो रहा है उसने देशज सैध्दान्तिकी के विकास की ओर से हमारा ध्यान ही हटा दिया है। खासकर ग्लोबल कल्चर के बारे में हम जितना पढ़ ,सुन या देख रहे हैं। यह सब पश्चिमी सैध्दान्तिकी की चोरी की हुई सामग्री है। 
       भारत में पर्यटन, धर्म और स्थानीय संस्कृतियों को नवीकृत किया जा रहा है और विसंदर्भीकृत रूप में पश्चिमी संस्कृति को हमारे गले में उतारा जा रहा है और पश्चिमी उपभोग के स्वर्ग को हमारे पर्यटन,धर्म और देशज संस्कृति से जोड़ा जा रहा है उसने गंभीर सांस्कृतिक संकट पैदा कर दिया है। अब पर्यटन में घूमना प्रमुख है,जानना और जुड़ना प्रमुख नहीं है। 

धर्म हमारे जीवन में उपभोग की सामग्री कभी नहीं रहा। धर्म की शरण में व्यक्ति जाता था उपभोग से बचने के लिए। किंतु नया धर्म उपभोग का महिमामंडन करता है। आज वह प्रदर्शनप्रियता,उत्सवधर्मिता और उपभोक्तावाद का हिस्सा बन गया है। यही हाल प्रकृति का है, प्रकृति को भी हमने उपभोग के हवाले कर दिया है, प्रकृति का संरक्षण और पल्लवन हमारा लक्ष्य था, प्रकृति का उपभोग हम वहीं तक करते थे जहां तक प्रकृति का क्षय न हो, किंतु प्रकृति के प्रति नया नजरिया उपभोग को महत्व देता है। 
       उपभोग से न तो धर्म बचता है, न पर्यटन या तीथार्टन और न प्रकृति। उपभोग का रास्ता अंतत: पश्चिमी मार्ग है, सांस्कृतिक जाम का मार्ग है। यह सांस्कृतिक क्षय का मार्ग है। हमें इस सवाल पर भी सोचना चाहिए कि क्या उपभोग का कोई देशी रास्ता हो सकता है ? संस्कृति,पर्यटन,धर्म मीडिया के क्षेत्र में '' सांस्कृतिक जाम'' इस बिंदु से प्रारंभ होता है कि आखिरकार आने वाले की इच्छाएं क्या हैं ?उन इच्छाओं की संतुष्टि को प्रमुख स्थान दिया गया है। 
      '' सांस्कृतिक जाम'' का एक अन्य फिनोमिना है जिसे '' नैतिक भय'' कहते हैं। ''सांस्कृतिक जाम'' सबसे ज्यादा '' नैतिक भय'' के सवाल उठाता है, ये सवाल जितने जल्दी उठते हैं उतनी ही जल्दी गायब भी हो जाते हैं। ''नैतिक भय'' उस समय ज्यादा सताता है जब लोग नयी तकनीक के संपर्क में आते हैं। नयी तकनीक के संपर्क में आते ही पहला परिणाम यह निकलता है कि लोगों का स्थापित संस्थानों के प्रति विश्वास डगमगाता है। ऐसे में '' नैतिक भय'' के सवाल अतिरंजित रूप में मीडया के पर्दे को घेर लेते हैं। ''नैतिक भय'' के सवालों को हाल के वर्षों में जिस तरह कवरेज मिला है उससे हमने कुछ भी सीखा नहीं है। 
    '' नैतिक भय'' के प्रश्नों में इंटरनेट पोर्नोग्राफी, बच्चों का खासकर पोर्नोग्राफी में शोषण, मोबाइल फोन के जरिए एमएमएस के सवाल, क्लोनिंग के सवाल ज्यादा उछाले गए हैं, इसके अलावा नैतिक-अनैतिक, श्लील-अश्लील के सवाल भी केन्द्र में आ गए हैं। इस संदर्भ में अचानक नैतिकता के स्वयंभू संरक्षक मैदान में आ डटे हैं। इनमें ज्यादातर वे लोग हैं जो न तो नैतिकता के बारे में जानते हैं और न जिनका कानून के बारे में ज्ञान है और न जो अधिकारी विद्वान् ही हैं। इस प्रसंग में हम बुनियादी बात भूल ही गए कि तकनीक समाज के प्रति तटस्थ नहीं होती है। 












सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

सभ्यता की तबाही है सांस्कृतिक चक्काजाम -2-

''सांस्कृतिक चक्काजाम'' ने प्रतिक्रियावादी भाषा के प्रयोगों को केन्द्रीय महत्व दिया है। व्यावसायिकता-कामुकता और अनुदारवाद को आदर्श अनुभव के रूप में पेश किया जा रहा है।
 '' सांस्कृतिक चक्काजाम'' का प्रमुख वैचारिक रूप है '' इज्म'' अथवा ''वाद'' ,नई परिस्थितियों में प्रतिदिन नए-नए ''वाद'' जन्म ले रहे हैं। इगोइज्म, ट्राइवलिज्म, सेक्टेरियनिज्म और इम्पीरियलिज्म आदि। इन सभी 'वाद' में एक चीज साझा है, इनमें स्वयं के नजरिए के प्रति आब्शेसन है।आग्रह है। आज हमें '' मी'', ''वी'', ''अस'', और ''अदर्स'' के पदबंधों में सोचने के लिए बांध दिया गया है। 
    
'' सांस्कृतिक चक्काजाम'' का ही परिणाम है सारी दुनिया के बाजार अमेरिकी सांस्कृतिक मालों से पटे पड़े हैं। यही हाल मीडिया उत्पादों और टीवी कार्यक्रमों का है। एकतरफा ढ़ंग से अमेरिका के सांस्कृतिक मालों और मीडिया उत्पादों का निर्यात किया जा रहा है। स्थानीय सांस्कृतिक मालों अथवा गैर पश्चिमी जगत के सांस्कृतिक मालों का  उतनी मात्रा में पश्चिमी देशों के लिए निर्यात नहीं हो रहा है जिस अनुपात में पश्चिमी देशों के सांस्कृतिक मालों का गैर पश्चिमी देशों की ओर निर्यात हो रहा है। सांस्कृतिक मालों के विनिमय के क्षेत्र में इस तरह की असमाता का प्रधान कारण है ''सांस्कृतिक चक्काजाम।' इसे कुछ लोग ''इलैक्ट्रोनिक नव्य उपनिवेशवाद'' भी कहते हैं। किसी के लिए ''सांस्कृतिक साम्राज्यवाद'' है।

''सांस्कृतिक चक्काजाम'' का प्रधान लक्ष्य है अमेरिकी मूल्यों ,विश्वासों,जीवन शैली आदि का प्रचार करना। इस कार्य में सबसे प्रभावी मीडियम के रूप में टीवी उभरकर सामने आया है।
    
 ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' का सबसे पहला मंत्र है स्थानीय संस्कृति को अपदस्थ करो। स्थानीय आख्यान को अपदस्थ करो, उसकी जगह पश्चिमी आख्यान को पेश करो। स्थानीय आधुनिकता को अपदस्थ करो ,उसके बदले पश्चिमी आधुनिकता को स्थापित करो।

'' सांस्कृतिक चक्काजाम'' का अर्थ '' उपभोग के स्वर्ग'' का प्रचार करना। ''उपभोग के स्वर्ग '' में वही दाखिल हो सकता है जो पश्चिमी संस्कृति में रचा-बसा है। ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' जब चीजों को माल बनाता है तो हम सिर्फ माल ही नहीं खाते, बल्कि समूची प्रकृति, जमीन, संस्कृति, दृश्य प्रस्तुतियां, यहां तक कि मानवीय शरीर का भी उपभोग करते हैं। यह एक तरह का प्रतीकात्मक उपभोग भी है। जब हम सांस्कृतिक उपभोग कर रहे होते हैं तो आत्मसात कर रहे होते हैं, सांस्कृतिक हमला कर रहे होते हैं, सांस्कृतिक उत्पीडन कर रहे होते हैं। सांस्कृतिक कुर्बानी कर रहे होते हैं। इसी क्रम में सांस्कृतिक अधिकार खो रहे होते हैं।
      
''सांस्कृतिक चक्काजाम'' हमें ''उपभोग के स्वर्ग'' की यात्रा कराता हुआ एक ऐसी दुनिया में ले जाता है जहां से हम निकल नहीं पाते, अपनी संस्कृति को खो देते हैं, अपने सांस्कृतिक अधिकारों को खो देते हैं। ''सांस्कृतिक जाम'' जब ''अपदस्थ'' करता है तो पश्चिमी आधुनिकता को विसंदर्भीकृत करते हुए पेश करता है। जिसके बाद उसका नया संदर्भ बनाता है। यह नया संदर्भ अन्य या 'अदर' के साथ बनाया जाता है।

 जब हम ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' में फंस जाते हैं तो हमें यह सवाल करना चाहिए कि कौन किसको हजम कर रहा है ? हमारे मीडिया के पर्दे पर पर्यटन के जितने भी विज्ञापन आ रहे हैं अथवा पर्यटन संबंधी कार्यक्रम आ रहे हैं अथवा धार्मिक प्रसारण आ रहे हैं , इनमें जो पाठ रचा जा रहा है, उपभोग के स्वर्ग का जो नया आख्यान रचा जा रहा है उसकी धुरी है ''पश्चिम का पाठ और संस्कृति।''

'' सांस्कृतिक चक्काजाम'' का सबसे आदर्श उदाहरण है थ्योरी का ग्लोबल स्तर पर वितरण। पश्चिमी सैध्दान्तिकियों का जिस तरह प्रसार और इस्तेमाल हो रहा है उसने देशज सैध्दान्तिकी के विकास की ओर से हमारा ध्यान ही हटा दिया है। खासकर ग्लोबल कल्चर के बारे में हम जितना पढ़ ,सुन या देख रहे हैं। यह सब पश्चिमी सैध्दान्तिकी की चोरी की हुई सामग्री है।

     भारत के संदर्भ में पर्यटन, धर्म और स्थानीय संस्कृतियों को जिस तरह नवीकृत किया जा रहा है और विसंदर्भीकृत रूप में जिस तरह पश्चिमी संस्कृति को हमारे गले में उतारा जा चुका है और पश्चिमी उपभोग के स्वर्ग को हमारे पर्यटन,धर्म और देशज संस्कृति से जोड़ा गया है उसने गंभीर संकट पैदा कर दिया है। अब पर्यटन में घूमना प्रमुख है,जानना और जुड़ना प्रमुख नहीं है। 

धर्म हमारे जीवन में उपभोग की सामग्री कभी नहीं रहा। धर्म की शरण में व्यक्ति जाता था उपभोग से बचने के लिए। किंतु नया धर्म उपभोग का महिमामंडन करता है। प्रदर्शनप्रियता,उत्सवधर्मिता और उपभोक्तावाद का हिस्सा बन गया है। 

यही हाल प्रकृति  का है, प्रकृति को भी हमने उपभोग के हवाले कर दिया है, प्रकृति का संरक्षण और पल्लवन हमारा लक्ष्य था, प्रकृति का उपभोग हम वहीं तक करते थे जहां तक प्रकृति का क्षय न हो, किंतु प्रकृति के प्रति नया नजरिया उपभोग को महत्व देता है। उपभोग से न तो धर्म बचता है, न पर्यटन या तीथार्टन और न प्रकृति। 

उपभोग का रास्ता अंतत: पश्चिमी मार्ग है, सांस्कृतिक जाम का मार्ग है। यह सांस्कृतिक क्षय का मार्ग है। हमें इस सवाल पर भी सोचना चाहिए कि क्या उपभोग का कोई देशी रास्ता हो सकता है ? संस्कृति,पर्यटन,धर्म मीडिया के क्षेत्र में '' सांस्कृतिक जाम'' इस बिंदु से प्रारंभ होता है कि आखिरकार आने वाले की इच्छाएं क्या हैं ?उन इच्छाओं की संतुष्टि को प्रमुख स्थान दिया गया है।

'' सांस्कृतिक चक्काजाम'' का एक अन्य फिनोमिना है जिसे '' नैतिक भय'' कहते हैं। ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' सबसे ज्यादा '' नैतिक भय'' के सवाल उठाता है, ये सवाल जितने जल्दी उठते हैं उतनी ही जल्दी गायब भी हो जाते हैं। ''नैतिक भय'' उस समय ज्यादा सताता है जब लोग नयी तकनीक के संपर्क में आते हैं। नयी तकनीक के संपर्क में आते ही पहला परिणाम यह निकलता है कि लोगों का स्थापित संस्थानों के प्रति विश्वास डगमगाता है। ऐसे में '' नैतिक भय'' के सवाल अतिरंजित रूप में मीडिया के पर्दे को घेर लेते हैं।

 ''नैतिक भय'' के सवालों को हाल के वर्षों में जिस तरह कवरेज मिला है उससे हमने कुछ भी सीखा नहीं है। '' नैतिक भय'' के प्रश्नों में इंटरनेट पोर्नोग्राफी, बच्चों का खासकर पोर्नोग्राफी में शोषण, मोबाइल फोन के जरिए एमएमएस के सवाल, क्लोनिंग के सवाल ज्यादा उछाले गए हैं, इसके अलावा नैतिक-अनैतिक, श्लील-अश्लील के सवाल भी केन्द्र में आ गए हैं। इस संदर्भ में अचानक नैतिकता के स्वयंभू संरक्षक मैदान में आ डटे हैं। इनमें ज्यादातर वे लोग हैं जो न तो नैतिकता के बारे में जानते हैं और न जिनका कानून के बारे में ज्ञान है और न जो अधिकारी विद्वान् ही हैं। इस प्रसंग में हम बुनियादी बात भूल ही गए कि तकनीक समाज के प्रति तटस्थ नहीं होती है।




सभ्यता की तबाही है सांस्कृतिक चक्काजाम -1-


मीडियाजनित जरूरतें प्रत्येक प्रचार अभियान के साथ बदल जाती हैं। इसी तरह मजूदरों को भी  बांट दिया जाता है। स्थायी मजदूर का अस्थायी मजदूर से भेद किया जाता है। बेकार से दूर रहने को कहा जाता है। ''सांस्कृतिक चक्काजाम''  फिनोमिना के तहत मजदूरों को हायरार्की से जोड़कर पेश किया जाता है। बिजनेस एग्जीक्यूटिव अपने को मालिक समझता है। उसका हायरार्की में सिर्फ जीवनशैली, नस्ल और लिंगभेद के अंतर को कम करके पेश किया जाता है। ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' का प्रधान लक्ष्य है युवाओं का आर्थिक,राजनीतिक और वैचारिक शोषण करना।
        साम्राज्यवादी मनोरंजन और विज्ञापन के निशाने पर युवावर्ग है। इस प्रचार अभियान में सामान्य सांस्कृतिक संदेश दिया जाता है कि आधुनिकता अमेरिकी उत्पादों के उपभोग से जुड़ी है। युवाओं को लक्ष्य बनाने के दो लाभ हैं पहला आर्थिक लाभ है,दूसरा है, युवाओं के विद्रोही भाव को नियंत्रित करना, उसे नष्ट करना। यही वजह है कि युवाओं में सत्ताविरोधी भावबोध का क्षय हुआ है। अराजनीतिक भावबोध बढ़ा है।

अमेरिकी मीडियाजनित ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' तीसरी दुनिया के देशों में दोहरे भ्रम की सृष्टि कर रहा है। पहला ' अंतर्राष्ट्रीय' का भ्रम, दूसरा 'वर्गातिक्रमण' का भ्रम। इसी तरह टेलीविजन की छद्म इमेजों के जरिए झूठी आत्मीयता और काल्पनिक संपर्क बनाया जा रहा है। इन संपर्कों के जरिए ही निजी समस्याओं के समाधान सुझाए जा रहे हैं। इस तरह की प्रस्तुतियों का संदेश साफ है ,जो पीड़ित है उसे ही अपनी गरीबी के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। सफलता को व्यक्तिगत प्रयास से जोड़कर पेश किया जा रहा है।
  
   '' सांस्कृतिक चक्काजाम'' का लक्ष्य है वाम को अलग-थलग करना,वर्चस्व को स्थापित करना। इसके लिए वाम को काटने के लिए भ्रष्ट राजनीतिक भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है। जिससे पश्चिमी दुनिया के बड़े पूंजीवादी राष्ट्रों के द्वारा किए जा रहे हमलों, हिंसाचार आदि से ध्यान हटाया जा सके। वाम की भाषा में प्रतिक्रियावादी अंतर्वस्तु को बड़े पैमाने पर अस्सी के दशक में प्रक्षेपित किया गया। पूंजीवाद के पक्षधरों को 'रिफार्मर' ,'रिवोल्यूशनरी' आदि कहा गया। जबकि इनके विरोधियों को 'कंजरवेटिव' कहा गया।

'' सांस्कृतिक चक्काजाम '' वैचारिक भ्रम निर्मित करता है। राजनीतिक भाषा के जरिए राजनीतिक 'डिसओरिएंटेशन' पैदा करता है। राजनीति का अर्थ बदल देता है। इस राजनीतिक मेनीपुलेशन से बहुत सारे प्रगतिशील व्यक्तियों का भी नजरिया प्रदूषित कर देता है। परिणामत: वे सबसे ज्यादा असहाय होते हैं।

''सांस्कृतिक चक्काजाम'' ने 'दक्षिणपंथी' और 'वामपंथी' का अर्थ ही नष्ट कर दिया है। यह अर्थ अनेक तरीकों से नष्ट किया जा रहा है। फलत: इस अंतर का विचारधारा के लिहाज से कोई अर्थ ही नहीं रह गया है। वाम की भाषा को भ्रष्ट करके वे वाम और दक्षिण की साम्राज्यवाद विरोधी राजनीतिक अपील और व्यवहार को भी भ्रष्ट बना देता है।

'' सांस्कृतिक चक्काजाम'' की एक अन्य रणनीति है जनता को संवेदनहीन बनाना। पश्चिमी देशों की सेनाओं के द्वारा किए जा रहे हिंसाचार और हत्याओं को उसने रूटिन और सर्वस्वीकृत गतिविधि बना दिया है। इराक पर भीषण बमबारी को वीडियोगेम का रूप दे दिया है। मानवता के विरूद्ध किए जा रहे अपराधों को नाटकीय-मनोरंजक बना दिया है। आम जनता के पुराने विश्वास को नष्ट कर दिया है जिसके आधार पर वह सोचती थी कि मानवीय दुख बड़ी चीज है। आज मानवीय दुख बड़ी चीज नहीं रह गया है। मानवीय पीड़ा को अब हम गलत नहीं मानते। युध्द की नई तकनीक के आधार पर आधुनिकता को परिभाषित किया जा रहा है।
      
मासमीडिया में अभिजनों और पश्चिम के युद्धास्त्रों का महिमामंडन चल रहा है। ''सांस्कृतिक चक्काजाम'' की विचारधारा ने खबरों में जनसंहारक अस्त्रों को मानवीय निर्मिति के रूप में पेश किया है। इसके विपरीत तीसरी दुनिया के पीड़ितों का कहीं पर भी चेहरा नजर नहीं आता, उन्हें '' आक्रामक-आतंकवादी'' के रूप में पेश किया जा रहा है। ग्लोबल स्तर पर मेनीपुलेशन को बरकरार रखने के लिए राजनीति की भाषा को भ्रष्ट बना दिया गया है। अनुमान,सट्टेबाजी, माफिया गिरोहों द्वारा जमीन हथियाने की मुहिम, व्यापार और संपदा को हथियाने वालों को '' सुधारक '' के रूप में पेश किया जा रहा है।

'' लेबर फ्लैग्जिविलटी' के नाम पर मजदूरों के अधिकारों पर हमले तेज हो गए हैं। वे सबसे ज्यादा असुरक्षित और असहाय हो गए  हैं। इजारेदारी तोड़ने के नाम पर सार्वजनिक क्षेत्र के कारखानों को बहुराष्ट्रीय निगमों को सौंपा जा रहा है। '' रिकनवर्जन'' के नाम पर 19वीं शताब्दी में मजदूरों ने जो सामाजिक अधिकार हासिल किए थे उन्हें छीना जा रहा है। 'रिस्ट्रक्चरिंग' के नाम पर स्पेशलाइजेशन ,उत्पादन की आमदनी का सट्टा बाजार में निवेश किया जा रहा है। ' डिरेगूलेशन' के नाम पर राष्ट्रीय कल्याण के लक्ष्य को नियमित करने के लक्ष्य को तिलांजलि दे दी गयी है और उसकी जगह अंतर्राष्ट्रीय बैंकिंग,बहुराष्ट्रीय सत्ता से जुड़े अभिजन के हाथों सत्ता सौंप दी गयी है।

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