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मंगलवार, 28 जून 2011

बाबा नागार्जुन के जन्म शताब्दी वर्ष के समापन पर विशेष- मोर होगा ...उल्लू होंगे ! -







(बाबा ने यह कविता आपातकाल के प्रतिवाद में लिखी थी।) 


खूब तनी हो,खूब अड़ी हो,खूब लड़ी हो

प्रजातंत्र को कौन पूछता,तुम्हीं बड़ी हो

डर के मारे न्यायपालिका काँप गई है

वो बेचारी अगली गति-विधि भाँप गई है

देश बड़ा है,लोकतंत्र है सिक्का खोटा

तुम्हीं बड़ी हो,संविधान है तुम से छोटा

तुम से छोटा राष्ट्र हिन्द का ,तुम्हीं बड़ी हो

खूब तनी हो,खूब अड़ी हो,खूब लड़ी हो


गांधी -नेहरू तुम से दोनों हुए उजागर

तुम्हें चाहते सारी दुनिया के नटनागर

रूस तुम्हें ताकत देगा,अमरीका पैसा

तुम्हें पता है ,किससे सौदा होगा कैसा

ब्रेजनेव के सिवा तुम्हारा नहीं सहारा

कौन सहेगा धौंस तुम्हारी ,मान तुम्हारा

हल्दी.धनिया, मिर्च,प्याज सब तो लेती हो

याद करो औरों को तुम क्या-क्या देती हो

मौज,मजा,तिकड़म,खुदगर्जी,डाह,शरारत

बेईमानी,दगा,झूठ की चली तिजारत

मलका हो तुम ठगों-उचक्कों के गिरोह में

जिद्दी हो,बस ,डूबी हो आकंठ मोह में

यह कमजोरी ही तुमको अब ले डूबेगी

आज नहीं तो कल सारी जनता ऊबेगी

लाभ-लोभ की पुतली हो,छलिया माई हो

मस्तानों की माँ हो,गुंडों की धाई हो

सुदृढ़ प्रशासन का मतलब है प्रबल पिटाई

सुदृढ़ प्रशासन का मतलब है 'इन्द्रा' माई

बन्दूकें ही हुईं आज माध्यम शासन का

गोली ही पर्याय बन गई है राशन का

शिक्षा केन्द्र बनेंगे अब तो फौजी अड्डे

हुकुम चलाएँगे ताशों के तीन तिगड्डे

बेगम होगी,इर्द गिर्द बस गूल्लू होंगे

मोर न होगा ,हंस न होगा,उल्लू होंगे

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

नागार्जुन की जन्मशती पर विशेष- कविता के नए लोकतंत्र की तलाश में


    हिन्दी में बाबा नागार्जुन को पूज्यनीय बनाने और शब्दों की जुगाली करके ठिकाने लगाने की मित्र क्रियाएं आरंभ हो गयी हैं। बाबा पर इन दिनों जितनी चर्चाएं हो रही हैं उनमें बुर्जुआ लोकतंत्र और प्रतिवादी लोकतंत्र के बीच के अंतर पर बातें कम हो रही हैं। बाबा की कविता में बुर्जुआ लोकतंत्र की गंभीर आलोचना व्यक्त हुई है। बाबा पर बातें करते समय आमतौर पर अवधारणाओं को अमूर्त्त बनाकर देखने और चित्रित करने का रिवाज रहा है।
   मसलन नागार्जुन की कविता की रोशनी में हिन्दी समीक्षक उन्हें लोकतंत्र विरोधी के रूप में चित्रित करते रहे हैं और समाजवादी बना रहे हैं। उनकी कविता की खूबी है कि वह राजनीतिक और लोकतांत्रिक है। यह बुर्जुआ लोकतंत्र के समीक्षा की कविता है। यह ऐसी कविता है जो बुर्जुआ लोकतंत्र के दमनात्मक रूप का उदघाटन करती है। उसके रेशनल को ध्वस्त करती है।  इस कविता ने परंपरागत कविता के फॉर्म को तोड़ा है। उसकी जगह कविता के लोकतांत्रिक ढ़ांचे को बनाया है।अभी हम जिस लोकतंत्र में रह रहे हैं उसमें हेज़ेमनी है और व्यक्ति के द्वारा व्यक्ति का शोषण चरम पर है। इस वातावरण में रूपकथाओं,रूपकों,मिथकों और राजनीतिक मुहावरों में सोचने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। जीवन की कठोर वास्तविकताओं की बजाय सॉफ्ट यथार्थ और निर्मित यथार्थ केन्द्र में आ गया है। हिन्दी में इन दोनों इस तरह के यथार्थ पर खूब लिखा जा रहा है। इसका महिमामंडन भी हो रहा है। इस क्रम में ठोस यथार्थ क्या होता है और उसके प्रमुख सवाल क्या हैं , उन पर बातें बंद हैं। बाबा के बहाने हम सोचें कि कविता के सामने आज क्या संकट है या चुनौतियां हैं।
    कविता के सामने सबसे बड़ी चुनौती है सामयिक यथार्थ के मर्म को पकड़ने की। पहले एक नयी स्थिति पर ध्यान दें। एक जमाना था साहित्य में दुनिया के सवाल उठाए जाते थे,लेकिन नए दौर में साहित्य के बारे में ही ,कविता के बारे में सवाल खड़े किए जा रहे हैं। साहित्य और कविता की प्रासंगिकता पर ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
    एक जमाना था कविता में कल्पना का बोलवाला था। लेकिन बाबा ने कल्पना को गौण और सच को प्रधान बनाया और यह काम बड़े ही कौशल के साथ किया है। वे कविता की अधिरचना को सतही यथार्थ के जरिए आरंभ करते हैं और फिर उसके वास्तव मर्म के अंदर चले जाते हैं। यहां उनका यथार्थ के प्रति आग्रह प्रबल हो उठता है। इस प्रसंग में उनकी कविता ‘कौन हाँफ रहा है’ (1990) को देख सकते हैं। यह समाजवाद के पतन पर लिखी शानदार कविता है। लिखा है- ‘‘कौन हाँफ रहा है ? / किसका दम घुट रहा है ? / अरे ,अरे, मैं पहचानता हूँ/दूर से ही सही/मैंने बार-बार/उसके पैंरों की आहट सुनी है/जी,मैं पहचानता हूँ/ वो सोशलिज्म है/ वो कम्युनिज्म की तरफ /तेजी से बढ़ा जा रहा था/ हाय,बीच रास्ते में ही/ इसका दम क्यों फूलने लगा ?/ क्या वे कोलखोज यक्-ब-यक् / ऊसर हो गए ? / सामूहिक कृषि-फार्म के / गेंहूँ तो हम तक भी पहुँचे थे/ दूर ग्रामांचल में,‘तरौनी’गांव तक / सोव्रवोज वाली सुनहली फसलों की खुशबू/मेरे ग्रामांचल की आबोहवा में भी /जाने कितनी बार फैली है.../ यह सब कुछ तुम्हें बतलाएँगे /कामरेड चतुरानन -झा!! / साथी श्यामलकिशोर / आप बतलाओ/वे कोलखोज क्या अब /बालू ही बालू रह गए/ क्या सचमुच रूस के लोग भूखे-प्यासे/ दिन पर दिन गुजारते हैं अब ? / ‘पेरेस्त्रोइका’ क्या हुआ ! / ‘ग्लासनोस्त’शंख-नाद का क्या हुआ !/ कामरेड गोर्बाचोब सच-सच बतलाओ- / सोवियत -भूमि में इन दिनों/ क्या कुछ कर रहे हैं लोग ?’’  
     इस कविता में फिक्शन और गैर फिक्शन दोनों घुले मिले हैं। कल्पना और सच दोनों घुलमिल गए हैं। विचारधारा और कविता दोनों घुल मिल गए हैं। यह कविता एक तरह से गैर-काल्पनिक फॉर्म है। यह कविता नहीं है बल्कि एक तरह का लेखन है। पत्रकारिता है। कविता को लेखन में तब्दील करने की कोशिश है।
     बाबा की कविता में एक और प्रयास नजर आता है वह है राजनीतिक कविता की साख बनाने का। वे हिन्दी में कलावादियों के द्वारा बनाए अराजनीतिक कविता के वातावरण को तोड़ते हैं। राजनीतिक कविता की साख बनाते हैं। निश्चित रूप से इसमें प्रगतिशील काव्यधारा की भी बड़ी भूमिका रही है लेकिन बाबा की अन्यतम भूमिका रही है। राजनीतिक कविता में सामाजिक सच्चाई को प्रभावी ढ़ंग से व्यक्त किया जा सकता है, इस बात की स्वीकृति बाबा ने ही करायी है। वैविध्यपूर्ण राजनीतिक कविता लिखकर कविता को जहां विचारधारा के दायरे के परे ले गए वहीं दूसरी ओर लोकतंत्र के भी परे ले गए। राजनीतिक कविता को साहित्यिक स्वीकृति दिलाकर बाबा ने शीतयुद्ध का जबाव दिया है। वे किसी भी तरह शीतयुद्ध के इस या उस खेमे के साथ बंधते नहीं हैं। वे जिस समय राजनीतिक कविता की साख बना रहे थे उसी समय हिन्दी की भी साख बना रहे थे। हिन्दी भाषा को प्रतिवाद की भाषा बना रहे थे। वे कविता में नए-नए राजनीतिक विमर्शों को रच रहे थे। कविता में विमर्श के वे सबसे बड़े कवि हैं। जो लोग इन दिनों साहित्य में विमर्श को देखकर नाक-भौं सिकोड़ते हैं उनके लिए बाबा सटीक जबाव हैं। वे कविता में विमर्श के कवि हैं। जिस तरह शमशेर कवियों के कवि हैं। बाबा विमर्शों के कवि हैं। जो लोग यह कहते हैं विमर्श की संस्कृति उत्तर आधुनिक संस्कृति है,आयातित संस्कृति है,परायी संस्कृति हैं उनको बाबा की कविता को देखना चाहिए। वे बड़े पैमाने पर विमर्शों को कविता में ले आते हैं।
   बाबा हिन्दी में पैराडाइम शिफ्ट के कवि हैं। पैराडाइम शिफ्ट का कवि वह होता है जो अपनी कविता के जरिए अन्य संस्कृति की ओर ले जाए। बाबा ने अपनी राजनीतिक कविताओं ,खासकर हिन्दी,बांग्ला और मैथिली कविताओं के माध्यम से यह संभावनाएं पैदा की हैं।  उनकी कविता एक ही साथ कई संस्कृतियों में विचरण करती है। वे कविता को खासकर प्रगतिशील कविता को एक नए पैराडाइम में लेजाते हैं। वे उन चंद कवियों में हैं जो हिन्दी कविता को दैनन्दिन राजनीति के करीब ले जाते हैं। दैनन्दिन राजनीति के पास कविता के जाने का असर यह हुआ है कि कालांतर में हिन्दी कवियों ने दैनन्दिन जीवन पर केन्द्रित होकर कविताएं लिखीं। दैनन्दिन जीवन कविता के केन्द्र में आया। दैनन्दिन राजनीतिक कविताएं सामयिक आंदोलनों के प्रत्युत्तर और जरूरतों के लिहाज से लिखी गयी थीं,इन कवियाओं को बाद में साहित्य की राजनीतिक प्रतिक्रिया भी मान लिया गया।
      प्रगतिशील कविता का साम्यवादी आंदोलन के बाहर भी भविष्य है इसकी ओर भी बाबा ने ध्यान खींचा है। वे कविता में पहलीबार व्यापक रूप में मानवाधिकारों के सवालों को ले आते हैं। बाबा के पहले मानवाधिकारों को कविता के केन्द्र में कोई नहीं लाया । कविता को मजदूर-किसान के स्टीरिटाईप से निकालकर मानवाधिकारों के बृहत्तर कैनवास में लाकर बाबा ने पैराडाइम शिफ्ट का काम किया है। बाबा की 1970-71 से मानवाधिकारों पर केन्द्रित कविताएं आनी शुरू होती हैं और यह सिलसिला थमता नहीं है। वे अब कविता में उन विषयों की ओर मुड़ते हैं जो मानवाधिकारों से संबंधित हैं। इस प्रसंग में उनकी पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में हुई बूथ केप्चरिंग और अर्द्धफासी आतंक पर लिखी कविताएं प्रस्थान बिंदु के रूप में देखी जानी चाहिए। ये कविताएं बाबा को प्रगतिशील कवि की प्रचलित कोटि के बाहर ले जाती हैं और वे हठात मानवाधिकारों के रक्षक कवि के रूप में सामने आते हैं। वे दल और विचारधारा की सीमाओं का भी इसी आधार पर अतिक्रमण करते हैं और इसी आधार पर लोकतंत्र के खोखलेपन की आलोचना भी करते हैं। हमें 1970-71 के बाद की बाबा की कविताओं को मानवाधिकार साहित्य परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। वे पहलीबार प्रगतिशील कविता की सहमति को तोड़ते हैं। प्रगतिशील कवियों में अनेक सवाल हैं जिन पर आम सहमति नहीं है इनमें बाबा की कविताएं ज्यादा हैं जो आम सहमति को तोड़ती हैं। वे चीन-भारत युद्ध का सवाल हो या,नक्सलों के चित्रण का सवाल हो,संपूर्ण क्रांति आंदोलन के प्रश्न हों या आपात्काल के प्रश्न हों, आपातकाल के बाद तो यह सिलसिला और भी तेज गति से आगे बढ़ता है। मानवाधिकार के पैराडाइम में आने के साथ प्रगतिशील कविता में बनी आम सहमति टूट जाती है। प्रगतिशील कविता के पैराडाइम में अधिकांश कवि साम्यवादी विचारधारा से बंधे थे। लेकिन बाबा ने जबसे मानवाधिकारों की दुनिया में शिफ्ट किया सारा मामला बदल गया। वे साम्यवादी विचारधारा के बाहर चले गए। यह शिफ्ट आया तो भारत-चीन युद्ध के समय से है,लेकिन उसने आधार बनाया पश्चिम बंगाल के 1972-77 के अर्द्ध -फासी आतंक के समय को। उसके बाद से बाबा ने कविता में मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य को छोड़ा नहीं। इसी अर्थ में बाबा को पैराडाइम शिफ्ट का बड़ा कवि कह सकते हैं। मुक्तिबोध,केदारनाथ अग्रवाल,शमशेर,त्रिलोचन,शीलजी आदि की एक ही मुश्किल है कि वे पैराडाइम शिफ्ट के कवि नहीं हैं। यही हाल बाद के कवियों रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, ,केदारनाथ सिंह आदि का है। ये एक की पैराडाइम में बंधे हैं।
   बाबा लोकतंत्र की आलोचना करते हुए आरंभ में कविता में समय को दर्ज करते हैं लेकिन बाद में उसे समयरहित अवस्था की ओर ले जाते हैं। उनकी कविता में आलोचक सामयिक राजनीतिक सत्य के साथ सामान्य सत्य की भी खोज करते रहे हैं। कविता में सत्य की खोज को वे मूल्यांकन का हिस्सा बना देते हैं। बाबा अपनी राजनीतिक कविताओं में राजनीति के शिकार लोगों के आख्यान को सामने लाते हैं। राजनीति की आलोचना को सामने लाते हैं और यह काम कविता की सर्जनात्मकता को बनाए रखकर करते हैं। वे आलोचना को मानकों के परे ले जाकर पेश करते हैं। मसलन समाजवाद की आलोचना में लिखी उपरोक्त कविता की पंक्तियों को देखें-  ‘‘कौन हाँफ रहा है ? / किसका दम घुट रहा है ? / अरे ,अरे, मैं पहचानता हूँ/दूर से ही सही/मैंने बार-बार/ उसके पैंरों की आहट सुनी है/जी,मैं पहचानता हूँ/ वो सोशलिज्म है/’’ समाजवाद के पराभव को इतने सुंदर ढ़ंग से व्यक्त किया है कि कोई सोच ही नहीं सकता है कि समाजवाद ‘ हाँफ रहा है’, यह एक वाक्य ही काफी है पराभव को रेखांकित करने के लिए। इसी अर्थ में बाबा अपनी कविताओं के माध्यम से एक नया भाषाय़ीखेल खेलते हैं।  उनकी कविता में भाषा में बहुत ही गहरे अर्थों,बहुस्तरीय अर्थों की अभिव्यंजना हुई है। वे अपने भाषागेम में किसी न किसी विचार को केन्द्र में रखते हैं। वे उस विचार की ऐतिहासिकता में नहीं जाते उसे मूल्यहीन नहीं बनाते बल्कि नए मूल्य से लैस करते हैं। वे भाषाखेल को साहित्य की परिवर्तित अवधारणा की संगति में विकसित करते हैं। रूपायित करते हैं। वे अनुभव और अभिव्यक्ति में अंतराल पैदा करते हुए,उनके बीच के अंतर को गौण बना देते हैं।
    बाबा की कविता की धुरी है ‘घृणा करो या प्यार करो’, वे इस नारे के आधार पर कविता लिखते हैं। वे समाजवाद से प्यार करते हैं या फिर घृणा करते हैं। वे लोकतंत्र से प्यार करते हैं या घृणा करते हैं। वे लोकतंत्र के विभिन्न रूपों के प्रति अपनी घृणा व्यक्त करते हैं जो उन्हें परेशान करते हैं।
     बाबा के काव्य संकलनों की प्रकृति देखें तो पाएंगे कि ज्यादातर कविताएं विभिन्न समयों पर लिखी गयी और प्रकशित हुई हैं। उन्होंने किसी विषय विशेष को ध्यान में रखकर संकलन नहीं लिखा था। बाद में उनकी बिखरी हुई कविताओं को एकत्रित करके संकलन बनाए गए हैं। ये संकलन एक तरह से भिन्न किस्म की ‘पुस्तक’ की परिभाषा के अंदर आते हैं। अगर गौर से देखें तो बाबा की कविताओं में एक खास किस्म का बिखरा-बिखरा भाव है, एक अराजकता मिलेगी। असल में उनके इस तरह के काव्य संकलन को ‘रेडीकल बुक’ की देलुत्ज-गुअतारी की ‘ ए थाउजेंडस प्लेटोज’ में वर्णित अवधारणा के दायरे में ऱख सकते हैं।
     इन संकलनों के निशाने पर कुछ खास किस्म के संकेत या साइन हैं। इन संकलनों में प्रकाशित कविताओं में ऐतिहासिक समय संदर्भ है लेकिन काव्य संकलन का कोई ऐतिहासिक समय संदर्भ नहीं है। इन कविताओं में एक कविता के बाद ‘और’फिर ‘और’ इसके बाद फिर ‘और’ की पद्धति से कविताएं संकलित की गई हैं। इस तरह की पुस्तक संरचना में यह सवाल अर्थहीन हो जाता है कि आप कहां से चले थे,कहां जाना है । मैं यहां कुछ संकलनों के सहारे इस ‘रेडीकल बुक’ की अवधारणा पर रोशनी डालना चाहता हूँ। मसलन ‘भूल जाओ पुराने सपने’(1994) को ही लें इसमें 51 कविताएं हैं और ये विभिन्न समय में देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपी हैं। 1979से 1993 के बीच में प्रकाशित कविताएं इसमें हैं। इसी तरह ‘सतरंगे पंखों वाली’ (1984) संकलन में 1956-58 के बीच लिखी कविताएं शामिल की गई हैं। यही हाल ‘रत्नगर्भ ’ (1984) संकलन का इसमें 8 लंबी कविताएँ हैं जो अलग-अलग पत्रिकाओं में विभिन्न समयों में छपी हैं। यही हाल अधिकांश काव्य संकलनों का है। हिन्दी में अभी तक इस सवाल पर सोचा ही नहीं गया कि किसी कवि का जो संकलन आ रहा है वह किस तरह की ‘किताब’ की अवधारणा में बंधकर आ रहा है। हिन्दी आलोचक के लिए सिर्फ काव्य संकलन आ गया यही काफी है। यहां तक कि बाबा के नाम पर हिन्दी में जो विशेषज्ञ आलोचक हैं वे भी अभी तक समझ नहीं पाए हैं कि बाबा के ‘किताब’ के फॉर्म की व्याख्या कैसे करें। बाबा के काव्य संकलन को आप कहीं से भी और किसी भी कविता से आरंभ कर सकते हैं। चाहें तो एक कविता पढ़ें या दो या तीन या पूरी किताब उलट-पलटकर पढ़ें,आपको किसी क्रम को मानने की जरूरत नहीं है। कहां से आरंभ कर रहे हैं,कहां बंद कर रहे हैं और कहां जा रहे हैं,ये सारे सवाल बाबा की कविता की किताब पढ़ते समय अप्रासंगिक हैं। इस तरह के संकलन में कहने के लिए प्रत्येक कविता स्वतंत्र है लेकिन मजेदार बात है कि एक कविता का पाठ दूसरी कविता के पाठ से जुड़ता प्रतीत होता है। यह भी कह सकते हैं कि बाबा के काव्य संकलन में एकाधिक स्तर पर कविताएं सक्रिय हैं। उनके एक नहीं बल्कि बहुस्तरीय अर्थ भी हैं। एक कविता दूसरी कविता के पूरक की भूमिका में नजर आती है। कविता के अर्थ की बहुस्तरीयता कविताओं को एक ही आयाम की ओर ले जाती प्रतीत होती है। वे अनेक कविताओं से आधुनिक कविता का नया फॉर्म इजाद करते हैं। कविता का नया फॉर्म है कविता की बहुस्तरीयता और एक दिशा।
    इन संकलनों में विषय के वैविध्य के अलावा एक चीज साझा है वह है राजनीतिक कविता। बाबा ने राजनीतिक कविता के फॉर्म को बनाने के लिए विभिन्न समयों में लिखी कविताओं को एक ही ढ़ांचे में बांधा है। कविताओं के लेखन का समय अलग-अलग है,प्रकाशन समय अलग है लेकिन दिशा एक है। इन संकलनों की विशेषता है कविता के अर्थ की बहुस्तरीयता। और एक दिशा है लोकतंत्र के परे चलो। कविता के प्रचलित ढ़ांचे के परे चलो।
    बाबा के लेखे लोकतंत्र में अराजकता है,कोई ऐसी चीज नहीं है जिस पर भरोसा किया जाए। यह ऐसा युग है जिसमें विषय और व्यक्ति के बीच में एकता स्थापित करना संभव नहीं है। स्वाभाविक यथार्थ और बौद्धिक यथार्थ के बीच में एकता स्थापित करना संभव नहीं है। यह ऐसा जगत है जो अपनी धुरी खो चुका है। बार-बार लोकतंत्र की कमजोरियों,अन्याय आदि का कविताओं में उदघाटन करते हुए बताते हैं की देश में लोकतंत्र नहीं है। लोकतंत्र अपनी धुरी से उतर चुका है। अतः कविता में समाज और व्यक्ति के बीच की एकता के चिर-परिचित दायरे से भी ऊपर लेजाने की जरूरत है। वे समाजवाद के भी परे कविता को ले जाते हैं। बाबा के लिए मौजूदा जगत अपनी धुरी खो चुका है। उनकी कविता इस धुरी से उतरे जगत के रूपायन पर केन्द्रित है। समाज में अराजकता है इसलिए काव्य संकलनों में भी बिखरापन है।
    बाबा की कविताओं को संकलन में पढ़ते हुए एक किस्म के सत्य के दर्शन नहीं होते बल्कि अनेक किस्म के सत्य के दर्शन होते हैं। सत्य की बहुस्तरीयता ही उनकी कविता की धुरी है। इसे आप किसी भी किस्म की आलोचना की भाषिक चालाकी से ढंक नहीं सकते।                       



रविवार, 27 फ़रवरी 2011

नागार्जुन के जन्म शताब्दी वर्ष पर विशेष- कविता के उपनिवेश का अंत और नागार्जुन


                (आलोचक नामवर सिंह और बाबा नागार्जुन)     
       साइबरयुग में कविता और साहित्य को लेकर अनेक किस्म की आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं। कुछ लोग यह सोच रहे हैं लोकतंत्र में कविता या साहित्य को कैद करके रखा जा सकता है ? यह सोचते रहे हैं कि साहित्य हाशिए पर पहुँच गया है।लेकिन ऐसा हो नहीं पाया है। इसके विपरीत साहित्य और कविता का विस्तार हुआ है। इसके अलावा आधुनिककाल में नवजागरण के साथ तर्क की महत्ता और तर्क के दायरे में सब कुछ रखकर सोचने की जो प्रक्रिया आरंभ हुई उसने तर्क,अतर्क,विवेक आदि को लेकर लंबी बहस खड़ी की है। आलोचकों ने साहित्य में रेशनल और लोकतंत्र का मायाजाल भी खड़ा किया है। ये आलोचक विद्वान यह भूल गए कि इस संसार को रेशनल में कैद नहीं रखा जा सकता है। नागार्जुन की कविता इसी परंपरा में आती है जो रेशनल के उपनिवेश में नहीं सोचते। रेशनल के उपनिवेश में सोचने वालों का हिन्दी की पहली परंपरा से लेकर दूसरी परंपरा और बाद में पैदा हुईं तीसरी और चौथी परंपरा में भी बोलवाला है।
    साहित्य को परंपरा की कोटि में बांधना एक तरह रेशनल की केटेगरी में ही बांधना है। नागार्जुन हिन्दी के अन्तर्विरोधी कवि हैं इन्हें आप रेशनल के दायरे में कैद नहीं कर सकते। बाबा की कविता का समाजवादी रूप किसी को अपील करता है तो किसी को बुर्जुआ लोकतंत्र को नंगा करने वाला रूप आकर्षित करता है। किसी को संपूर्ण क्रांति वाला तो किसी को आपात्काल विरोधी,किसी को बाबा में बुर्जुआ लोकतंत्र के प्रति आकर्षण दिखाई देता है। मजेदार बात यह है कि बाबा के यहां ये सारी प्रवृत्तियां हैं।
     बाबा की कविता में एक खास किस्म का उन्माद है। वे जिस पर भी लिखते हैं उन्मादित भाव में लिखते हैं। वे कविता में उन्मादी भाव पैदा करके कविता के बहाने आम आदमी के साथ संवाद करते हैं। साहित्य और उन्माद के अंतस्संबंध की एक झलक देखें- उनकी एक कविता है ‘‘भूल जाओ पुराने सपने’’(1979), इसमें कहते हैं- ‘ सियासत में/ न अड़ाओ / अपनी ये काँपती टाँगें/ हाँ,महाराज/ राजनीतिक फतवेबाजी से / अलग ही रक्खो अपने को / माला तो है ही तुम्हारे पास / नाम-वाम जपने को / भूल जाओ पुराने सपने को।’
    इसी तरह ‘‘जपाकर ’’ ( 1982) शीर्षक कविता में लिखा- ‘ जपाकर दिन-रात/ जै जै जै संविधान/ मूँद ले आँख-कान/ उनका ही दर ध्यान/  मान ले अध्यादेश/ मूँद ले आँख-कान/ सफल होगी मेधा/ खिचेंगे अनुदान/ उनके माथे पर / छींटा कर दूब-धान/ करता जा पूजा-पाठ/ उनका ही धर ध्यान/ जै जै जै छिन्मस्ता/ जै जै जै कृपाण/ सध गया शवासन/ मिलेगा सिंहासन।’
    यहां पर बाबा ने कविता में एक नयी भाषा का प्रयोग किया है यह लोकतंत्र के आत्मविध्वंस की भाषा है। इसके बहाने बाबा ने लोकतंत्र,संविधान आदि के खोखलेपन को व्यक्त किया है। इसी क्रम में ‘‘ अपना देश महाऽऽन’’ (1979) शीर्षक कविता लिखी,इसकी बानगी देखें-
‘ अपना यह देश है महाऽऽन!                                               
 जभी तो यहाँ चल रहा भेड़िया धसाऽऽन!
 शब्दों के तीर हैं जीभ है कमाऽऽन!
 सीधे हैं मजदूर और बुद्धू हैं किसाऽऽन!
 लीडरों की नीयत कौन पाएगा जाऽऽन
 अपना यह देश है महाऽऽन।’
  यहां लोकतंत्र के तर्क के परे ले जाकर भाषा के रूपान्तरणकारी प्रयोग के जरिए बाबा ने अपनी बात को रखा है। यह कविता ऐसे समय में लिखी गयी जब चारों ओर लोकतंत्र की जय जय हो रही थी। लोकतंत्र से भिन्न किसी अन्य आधार पर लेखक-आलोचक सोचने को तैयार नहीं थे। वह आपातकाल के बाद का दौर था । यहां कविता,समाज, राजनीति और लोकतंत्र के अन्तस्संबंध की ऐतिहासिकता को बनाए रखकर बाबा ने अपनी बात की है। वे लोकतंत्र के खोखलेपन को गंभीरता के साथ महसूस करते हैं और लोकतंत्र के लिए उनके अंदर गहरी तड़प भी थी,लेकिन वे लोकतंत्र के दायरे में कैद रहकर सोचने और लिखने के लिए तैयार नहीं थे। उन्हें लोकतंत्र में आजादी नहीं उपनिवेश की गंध आती थी। लोकतंत्र में वे गुलामी का भाव महसूस करते थे।वे जब भी लोकतंत्र पर लिखने जाते थे तो उन्हें लोकतंत्र के खोखलेपन का अहसास होता था। आदमी,समाज, राजनीति,मूल्य आदि सभी क्षेत्रों में लोकतंत्र  का खोखलापन महसूस होता था। लोकतंत्र की भाषा खोखली नजर आती थी। बाबा जब भी अपनी काव्यभाषा चुनते हैं तो उसमें देज चलताऊ भाषा का ज्यादा प्रयोग करते हैं। लोकतंत्र के पदबंधों,संकेतों,प्रतीकों आदि का ज्यादा प्रयोग करते हैं।  लेकिन वे लोकतंत्र की समृद्धि की बजाय खोखलेपन की ओर ध्यान खींचते हैं। वे जब भी लोकतंत्र के संकेतों को उठाते हैं उसके साथ में उसकी परिस्थितियों को भी व्यक्त करते हैं। वे लोकतंत्र को व्यक्ति की तरह देखते हैं,जिस तरह व्यक्ति के अस्तित्व को देखते हैं,बाबा वैसे ही लोकतंत्र के अस्तित्व के ऊपर विचार करते हैं। वे कविता को भी व्यक्ति की तरह देखते हैं। उसे ऐतिहासिक सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य के बाहर ले जाते हैं। वे कविता को ऐतिहासिक परिस्थितियों से बांधकर नहीं देखते बल्कि उसके परे ले जाते हैं।  मसलन ‘‘ शताब्दी-समारोह’’ (1980) कविता देखें-
     ‘दिन है-/शताब्दी -समारोह के समापन का/दिन है-/पंडों की धूमधाम का ,विज्ञापन का/दिन है-/प्रतिबद्धता के व्रत-उद्यापन का/ दिन है-/ धान रोपने का,सावन का/दिन है-/स्मृतियों की सरिता में प्लावन का।’
      बाबा की कविता को आमतौर पर आलोचकों ने ऐतिहासिक राजनैतिक-सामाजिक परिस्थितियों से बांधकर देखा है,जबकि बाबा का नजरिया कविता को ऐतिहासिक सामाजिक परिस्थितियों से बांधकर देखने का नहीं है। वे ऐतिहासिक परिस्थितियों के परे ले जाते हैं। इसके लिए वे भाषा का इस्तेमाल करते हैं। भाषा उन्हें ऐतिहासिक परिधि के बाहर ले जाती है। फलतः कविता के अर्थ को भी ऐतिहासिक परिस्थितियों के परे ले जाते हैं। वे लोकतंत्र के प्रतीकों का विलक्षण ढ़ंग से इस्तेमाल करते हैं। वे लोकतंत्र पर लिखी कविताओं में उसकी स्ट्रेंजनेस पर ध्यान खींचते हैं। वे लोकतंत्र के अर्थ को अन्य जगह स्थानान्तरित कर देते हैं। लोकतंत्र के अर्थ का अन्यत्र स्थानान्तरण अंततः उन्हें लोकतंत्र की कैद से बाहर ले जाता है। बाबा ने लोकतांत्रिक कविता की नयी संरचना को निर्मित किया है। इस संरचना में कविता का आंतरिक और बाहरी तंत्र एकदम खुला रहता है। इसमें सत्यता ,गांभीर्य ,नैतिकता, पारदर्शिता और स्वाभाविकता पर जोर है।  इससे ही लेखक की प्रामाणिक इमेज बनी है। इसके आधार पर ही वे कविता को लोकतंत्र के दायरे के परे ले जाते हैं। वे अपनी कविता में आमफहम बातचीत के शब्दों का ज्यादा प्रयोग करते हैं। वे कविता को शब्द के लिखित अर्थ के परे ले जाते हैं। वे लोकतंत्र पर लिखी कविताओं के जरिए लोकतंत्र की समस्त वैध परिभाषाओं की धज्जियां उड़ाते हैं। वे लोकतंत्र के मसलों पर चुप नहीं रहते । लोकतंत्र में लेखक यदि चुप रहता है तो उसके बारे में गॉसिप का बाजार गर्म होने की संभावनाएं रहती हैं।
     बाबा ने लोकतंत्र के प्रत्येक बड़े प्रसंग पर लिखा है। उनकी लोकतंत्र संबंधी कविताओं के दो स्तर हैं ,पहले वर्ग में उन कवियाओं को रखा जा सकता है जिनमें उन विषयों को उठाया गया है जो लोकतंत्र की वैधता को चुनौती देते हैं। लोकतंत्र की प्रामाणिकता पर संदेह बढ़ाते हैं। इस वर्ग में वे कविताएं आती हैं जो दर्शक के भाव से लिखी गयी हैं। दूसरे वर्ग में वे लोकतंत्र के बारे में जजमेंट करते हैं। उसके बारे में फैसले सुनाते हैं। इस क्रम में वे लोकतंत्र को कविता में दर्ज करते चले जाते हैं। लोकतंत्र में उत्पीड़न, हिंसा आदि पर लिखी उनकी कविताएं इसी कोटि में आती हैं। इनमें वे व्यक्ति के निजी कष्टों, निजी उत्पीडन को सामाजिक बनाते हैं। इस बहाने वे लोकतंत्र को बेपर्दा करते हैं। लोकतंत्र के उत्पीड़न पर लिखी उनकी कविताएं बेहद महत्वपूर्ण हैं। उनकी रीडिंग भिन्न ढ़ंग से की जानी चाहिए। वे उत्पीड़न पर लिखी कविताओं के बहाने पीड़ित के दर्द को उभारने के साथ-साथ लोकतंत्र के दर्द को उभारते हैं। निजी दर्द को लोकतंत्र के दर्द में तब्दील कर देते हैं। इस तरह की कविताओं के जरिए बताते हैं कि हमारा देश अभी पूर्व आधुनिक युग में है। उत्पीड़न का दर्द उन्हें आधुनिक लोकतंत्र के अंदर सक्रिय पूर्व आधुनिकता की अवस्था की ओर ले जाता है। बाबा के लिए लोकतंत्र एक संकेत या साइन है। वे एक प्रतीक की तरह उसका रूपायन करते हैं। लोकतंत्र की संकेत की तरह नजरदारी करते हैं। उनके यहां लोकतंत्र एक सिस्टम की तरह नहीं आता बल्कि संकेतों के बहाने अनुभूति के रूप में आता है. वे लोकतंत्र के बारे में अपनी अनुभूतियों को शेयर करते हैं और फिर उनके बहाने लोकतंत्र पर नजरदारी करते हैं। वे जब अपनी लोकतंत्र संबंधी अनुभूतियों को पेश करते हैं तो जाने-अनजाने कई जगह आत्म-स्वीकृतियां व्यक्त हुई हैं। कविता में व्यक्त आत्म-स्वीकृतियों में उनकी लोकतंत्र के प्रति असहमतियां रूपायित हुई हैं।
        बाबा के लिए लोकतंत्र कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है जिसमें सब कुछ पवित्र है,सुंदर है, सहज प्राप्य है। मसलन लोकतंत्र के प्रतीकों को ही लें। लोकतंत्र में वोट डालना परम पवित्र है। वोट मांगना और उसके लिए प्रचार करना,जनता की तारीफ करना,लोकतंत्र की महानता के गीत गाना और नेता की उपलब्धियों का प्रचार करना एक आम रिवाज है। आम तौर पर मतदाता की महानता पर चुनाव के समय बहुत कुछ कहा जाता है। इस प्रौपेगैण्डा के तिलिस्म के परे जाकर बाबा ने ‘‘ इतना भी क्या कम है प्यारे’’ (1979) शीर्षक कविता लिखी है। यह कविता कई मायनों में महत्वपूर्ण है पहलीबार इस कविता के जरिए वोट की राजनीति में आए नए परिवर्तनों को कलमबंद किया गया है। यह कविता 1979 की है। वोटरों की तुलना इस कविता में बाबा ने ‘लाश’ से की है । लिखा है- ‘ लाशों को झकझोर रहे हैं/ मुर्दों की मालिश करते हैं/ ...ये भी उन्हें वोट डालेंगी ! / ’’ जीत पर बाबा ने लिखा- ‘ लाशें भी खुश-खुश दीखेंगी/मुर्दे भी खुश-खुश दीखेंगे/ उनकी ही सरकार बनेगी/’’ लोकतंत्र में आलोचना और प्रतिवाद की महत्ता होती है उसके प्रति उपेक्षाभाव नहीं रखना चाहिए। बाबा ने लोकतंत्र के मतपत्र को बेसन की उपमा दी है। यह बड़ी ही अर्थपूर्ण उपमा है। लिखा है- ‘‘ मत-पत्रों की लीला देखो/ भाषण के बेसन घुलते हैं/ प्यारे इसका पापड़ देखो/प्यारे इसका चीला देखो/ चक्खो,चक्खो पापड़ चक्खो/गाली-गुफ्ता झापड़ चक्खो/मनपत्रों की लीला चक्खो/भाषण के बेसन का ,प्यारे ,चीला चक्खो.../’’बाबा की लोकतंत्र पर लिखी कविताओं की विशेषता है वे लोकतंत्र को अनुभव के आधार पर व्याख्यायित करते हैं। उसके मर्म के डिक्शनरी के आधार पर नहीं रचते बल्कि अनुभव के आधार पर रचते हैं। बाबा के लिए लोकतंत्र कोई परम पवित्र गंगा नहीं है। जिसमें नहाने के बाद सारे सामाजिक-राजनीतिक पाप धुल जाते हों!
    बाबा ने लोकतंत्र को सामाजिक यथार्थ की कसौटी पर बार बार परखा है और जीवन में व्यक्त यथार्थ को तरजीह दी है। इस क्रम में बाबा ने उस स्टीरियोटाईप को तोड़ा है जिसे मीडिया ने बनाया है और उसे ही हम लोकतंत्र का सच मान लेते हैं। मीडिया निर्मित लोकतंत्र पर विचारधारा की चादर ढकी रहती है जिसके कारण हम यथार्थ के साथ लोकतंत्र को सही मायने में जोड़कर देख ही नहीं पाते। हम लोकतंत्र के बारे में उन्हीं तर्कों का इस्तेमाल करते हैं जो हमें मीडिया ने सप्लाई किए हैं। मीडिया प्रौपेगैण्डा ने समझाया है लोकतंत्र माने चुनी हुई सरकार,स्वतंत्र मतदान, निष्पक्ष चुनाव,स्वच्छ राजनीति,सांसदों और विधायकों की ईमानदारी आदि। बाबा को ये सारे स्टीरियोटाईप अपील नहीं करते। वे उसकी अलोकतांत्रिक परतें उघाड़ते हैं तो उसमें वे प्रच्छन्नतः एक बात की ओर ध्यान खींचते हैं कि हमारे यहां लोकतंत्र तो है लेकिन लोकतांत्रिक मनुष्य नहीं है। डेमोक्रेसी है लेकिन डेमोक्रेट नहीं हैं।  लोकतांत्रिक मनुष्य के बिना लोकतंत्र अर्थहीन है । लोकतंत्र तब ही सार्थक है जब लोकतांत्रिक मनुष्य भी हों। भारत में लोकतंत्र के महान जयघोष में लोकतांत्रिक मनुष्य का लोप हुआ है। लोकतांत्रिक मनुष्य के बिना लोकतंत्र बेजान है। 

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

नागार्जुन जन्मशती पर विशेष- बारूदी छर्रे की खुशबू

   इन दिनों लालगढ़ से लेकर छत्तीसगढ़ तक माओवादियों का भूत मंडरा रहा है। केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों तक सभी परेशान हैं कि हम क्या करें ? प्रशासन में बैठे अधिकारियों से लेकर नेताओं तक किसी को समझ में नहीं आ रहा कि आखिर माओवादी भूत को कैसे वश में करें ?
       माओवादी भूत हमारे समाज के अलगाव के गर्भ से पैदा हुआ है। विगत 60 सालों में आदिवासी जीवन से मुख्यधारा के महानगरों और शहरों में रहने वालों का अलगाव बढ़ा है.अपरिचय बढ़ा है। अपरिचय और अलगाव ही है जो हमें आज इस अवस्था तक ले आया है कि जिन पुलिस वालों को इलाके का ज्ञान होना चाहिए वे आदिवासी इलाकों,उनकी संस्कृति,खान-पान,जीवनशैली आदि के बारे में एकदम अनभिज्ञ हैं। यहां तक कि जिले के कलेक्टर को नहीं पता है कि आदिवासी कैसे रहते हैं। उनके जेहन में स्टीरियोटाइप समझ रही है आदिवास्यों की। आप सर्वे करके देख लें कि शहर के पढ़े-लिखे कितने बुद्धिजीवी हैं जो विरसा मुण्डा के बारे में जानते हैं। हम उन किस्सों और किंवदंतियों से वाकिफ नहीं हैं जो आदिवासी जीवन में प्रचलित हैं। मुझे संदेह है कि नया आदिवासी युवा अपनी संस्कृति और परंपरा को भी ठीक ढ़ंग से जानता होगा ! बाबा ने आदिवासियों पर कई कविताएं लिखी हैं और अनेक आदिवासी नेताओं पर भी लिखा है। ऐसी ही उनकी एक कविता है ‘हवन-काष्ठ...’,इसमें आदिवासी जीवन के साथ अपरिचय की स्थिति का रूपायन किया गया है। लिखा है-‘‘ क्या उससे भी कभी मिलोगे ? / मुण्डा -जन-जाति के उस पुरूषोत्तम से ? / सौ-सौ किवदंतियों का नायक था वो /गिरिजन उसे कहते हैं ‘विरसा भगवान!’’
माओवादी आज जिस तरह की हिंसा कर रहे हैं। इस तरह की परिस्थितियों और हिंसा के पुजारियों पर व्यंग्य कसते हुए बाबा ने लिखा- ‘‘ यही धुँआ मैं खोज रहा था/ यही आग में खोज रहा था/यही गन्ध थी मुझे चाहिए/बारूदी छर्रे की खुशबू!.../ठहरो-ठहरो इन नथनों में इसको भर लूँ.../बारूदी छर्रे की खुशबू !’’ आगे लिखा ‘‘ यहाँ अहिंसा की समाधि है/ यहाँ कब्र है पार्लमेंट की।’’
    माओवादी जिस तरह का हिंसाचार रहे हैं ,वैसी ही अवस्था को ध्यान में रखकर ‘‘प्रतिहिंसा का महारूद्र’’ शीर्षक कविता लिखी। लिखा-‘‘फिलहाल,/तुम्हारा यह मारक खेल/ अभी कुछ और चलेगा/लेकिन याद रखो -हम तुम्हारी बिरादरी के एक-एक सदस्य का वध करेंगे।’’   







शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

नागार्जुन जन्मशती पर विशेष- मुस्लिम आर्थिक नाकेबंदी और हम

    भगवान से भी भयावह है साम्प्रदायिकता। साम्प्रदायिकता के सामने भगवान बौना है। साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे दहशत का संदेश देते हैं। ऐसी दहशत जिससे भगवान भी भयभीत हो जाए। जैसाकि लोग मानते हैं कि भगवान के हाथों (यानी स्वाभाविक मौत) आदमी मरता है तो इतना भयभीत नहीं होता जितना उसे साम्प्रदायिक हिंसाचार से होता है।
   बाबा नागार्जुन ने दंगों के बाद पैदा हुए साम्प्रदायिक वातावरण पर एक बहुत ही सुंदर कविता लिखी है जिसका शीर्षक है ‘तेरी खोपड़ी के अन्दर ’ । दंगों के बाद किस तरह मुसलमानों की मनोदशा बनती है । वे हमेशा आतंकित रहते हैं। उनके सामने अस्तित्व रक्षा का सवाल उठ खड़ा होता है ,इत्यादि बातों का सुंदर रूपायन नागार्जुन ने किया है।
      यह एक लंबी कविता है एक मुस्लिम रिक्शावाले के ऊपर लिखी गयी है।लेकिन इसमें जो मनोदशा है वह हम सब के अंदर बैठी हुई है। मुसलमानों के प्रति भेदभाव का देश में सामान्य वातावरण हिन्दू साम्प्रदायिक ताकतों ने बना दिया है। प्रचार किया जाता रहा है कि किसी मुसलमान की दुकान से कोई हिन्दू सामान न खरीदे,कोई भी हिन्दू मुसलमान को घर भाड़े पर न दे, कोई भी हिन्दू मुसलमान के रिक्शे पर न चढ़े। साम्प्रदायिक हिंसा ने धीरे-धीरे मुसलमानों के खिलाफ आर्थिक नाकेबंदी और आर्थिक हिंसाचार की शक्ल ले ली है। मुसलमानों के खिलाफ बड़े ही सहजभाव से हमारे अंदर से भाव और विचार उठते रहते हैं।
    हमारे चारों ओर साम्प्रदायिक ताकतों और कारपोरेट मीडिया ने मुसलमान की शैतान के रूप में इमेज विकसित की है। एक अच्छे मुसलमान,एक नागरिक मुसलमान,एक भले पड़ोसी मुसलमान, एक सभ्य मुसलमान, एक धार्मिक मुसलमान,एक देशभक्त मुसलमान की इमेज की बजाय पराए मुसलमान, आतंकी मुसलमान,गऊ मांस खानेवाला मुसलमान,हिंसक मुसलमान, बर्बर मुसलमान,स्त्री विरोधी मुसलमान ,परायी संस्कृति वाला मुसलमान आदि इमेजों के जरिए मुस्लिम विरोधी फि़जा तैयार की गयी है। नागार्जुन की कविता में मुसलमान के खिलाफ बनाए गए मुस्लिम विरोधी वातावरण का बड़ा ही सुंदर चित्र खींचा गया है।
कुछ अंश देखें- ‘‘ यों तो वो/ कल्लू था-/ कल्लू रिक्शावाला/यानी कलीमुद्दीन.../मगर अब वो/ ‘परेम परकास’/ कहलाना पसन्द करेगा.../कलीमुद्दीन तो भूख की भट्ठी में / खाक हो गया था /’’ आगे पढ़ें- ‘‘जियो बेटा प्रेम प्रकाश / हाँ-हाँ ,चोटी जरूर रख लो/ और हाँ ,पूरनमासी के दिन /गढ़ की गंगा में डूब लगा आना/ हाँ-हाँ तेरा यही लिबास/ तेरे को रोजी-रोटी देगा/ सच,बेटा प्रेम प्रकाश, तूने मेरा दिल जीत लिया/ लेकिन तू अब /इतना जरूर करना/मुझे उस नाले के करीब/ ले चलना कभी/ उस नाले के करीब/जहाँ कल्लू का कुनबा रहता है/ मैं उसकी बूढ़ी दादी के पास/बीमार अब्बाजान के पास/बैठकर चाय पी आऊँगा कभी/ कल्लू के नन्हे -मुन्ने/ मेरी दाढ़ी के बाल/ सहलाएंगे... और/ और ? / ‘‘ और तेरा सिर.../ ’’ मेरे अंदर से/ एक गुस्सैल आवाज आयी.../-बुडढ़े,अपना इलाज करवा/तेरी खोपड़ी के अंदर/ गू भर गयी है/खूसट कहीं का/कल्लू तेरा नाना लगता है न ? /खबरदार साले/ तुझे किसने कहा था/मेरठ आने के लिए ?.../ लगता है/वो गुस्सैल आवाज /आज भी कभी-कभी/सुनाई देती रहेगी.../
एक जमाने में भाजपा को जनसंघ के नाम से जानते थे। जनसंघ पर बाबा ने लिखा ‘‘तम ही तम उगला करते हैं अभी घरों में दीप/वो जनसंघी ,वो स्वतंत्र हैं जिनके परम समीप/ उनकी लेंड़ी घोल-घोल कर लो यह आँगन लीप/उनके लिए ढले थे मोती,हमें मुबारक सीप/तम ही तम उगला करते हैं अभी घरों में दीप।    

                








गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

नागार्जुन की जन्मशती पर विशेष- प्रतिवादी लोकतंत्र के जनकवि नागार्जुन

                     ( मध्य में टोपा लगाए बाबा नागार्जुन)
             हिन्दी में बाबा नागार्जुन को पूज्यनीय बनाने और शब्दों की जुगाली करके ठिकाने लगाने की मित्र क्रियाएं आरंभ हो गयी हैं। बाबा पर इन दिनों जितनी चर्चाएं हो रही हैं उनमें बुर्जुआ लोकतंत्र और प्रतिवादी लोकतंत्र के बीच के अंतर पर बातें कम हो रही हैं। बाबा की कविता में बुर्जुआ लोकतंत्र की गंभीर आलोचना व्यक्त हुई है। बाबा पर बातें करते समय आमतौर पर अवधारणाओं को अमूर्त्त बनाकर देखने और चित्रित करने का रिवाज रहा है।
    मसलन नागार्जुन की कविता की रोशनी में हिन्दी समीक्षक उन्हें लोकतंत्र विरोधी के रूप में चित्रित करते रहे हैं और समाजवादी बनाते रहे हैं। नागार्जुन की कविता की खूबी है कि वह राजनीतिक और लोकतांक्षिक कविता है। यह बुर्जुआ लोकतंत्र की समीक्षा की कविता है। यह ऐसी कविता है जो बुर्जुआ लोकतंत्र की दमनात्मकता का उदघाटन करती है। इस कविता ने परंपरागत कविता के फॉर्म को तोड़ा है। उसकी जगह कविता के लोकतांत्रिक ढ़ांचे को बनाया है। कविता में लोकतांत्रिक संरचनाओं के निर्माण की प्रक्रिया का लोकतंत्र की समीक्षा के साथ गहरा संबंध है।
    अभी हम जिस लोकतंत्र में रह रहे हैं उसमें हेज़ेमनी है और व्यक्ति के द्वारा व्यक्ति का शोषण चरम पर है। इस वातावरण में रूपकों-मिथकों और राजनीतिक मुहावरों में सोचने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। जीवन की कठोर वास्तविकताओं की बजाय सॉफ्ट यथार्थ और निर्मित यथार्थ केन्द्र में आ जाता है। हिन्दी में इन दोनों ही किस्म के यथार्थ पर खूब लिखा जा रहा है। इसका महिमामंडन भी हो रहा है। इस क्रम में ठोस यथार्थ क्या होता है और उसके प्रमुख सवाल क्या हैं ,उन पर बातें बंद हैं। आज वोट से लेकर साहित्य तक जो चल रहा है उस पर नागार्जुन की दो पंक्तियां देखें-
 " सच-सच बतलाना
  तुमको केत्ता रुपया मिला है? "
( नागार्जुन की कविता- तुमको केत्ता मिला है , का अंश)







बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

नागार्जुन जन्मशती पर विशेष- बूढ़े हैं ,बीमार हैं

शासक दल से साँठ-गाँठ है,बूढ़े हैं बीमार हैं
इनसे क्या उम्मीद,यहाँ तो सभी साठ के पार हैं
अजी आपने बुला लिया है,यों ते हम बेकार हैं
बकने की लत छूट चुकी है,बूढ़े हैं बीमार हैं
आपस में कुछ कह-सुन लेंगे,सभी साठ के पार हैं
हाकिम ही तो गुणी जनों के दिलवर हैं,आधार हैं।
    -नागार्जुन 

नागार्जुन की जन्मशती पर विशेष- यह क्या हो रहा है जी ?

                      (जनकवि स्व.बाबा नागार्जुन)
यह क्या हो रहा है जी ?
आप मुँह नहीं खोलिएगा !
कुच्छो नहीं बोलिएगा !
कैसे रहा जाएगा आपसे ?
आप तो डरे नहीं कभी अपने बाप से
तो बतलाइए,यह क्या हो रहा है ?
कौन पा रहा है, कौन खो रहा है ?
प्लीज बताएँ तो सही...
अपनी तो बे-कली बढ़ती जा रही
यह क्या हो रहा है जी
प्लीज बताएं तो सही....
नागार्जुन-

नागार्जुन की जन्मशती पर विशेष- निभृत निर्जन में

लूटिए चिन्तन-सुख निभृत निर्जन में
आने न दीजिए वृथा विकल्प मन में
अति अधिक अभिरुचि रखिए न धन में
कभी कुफल भी चखिए जीवन में
लूटिए चिन्तन सुख निभृत निर्जन में।
-नागार्जुन

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...