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मंगलवार, 13 मार्च 2012

दलितसाहित्य का नया पैराडाइम और नये सवाल


  ( साहित्य का इतिहासदर्शन विषय पर कोलकाता स्थित प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय में "दलित साहित्य का इतिहास दर्शन" विषय पर दिए गए व्याख्यान का एक अंश।यह अंश वागर्थ पत्रिका ने  जनवरी 2012 के अंक में प्रकाशित किया है)         
             दलित साहित्य पर विचार करते समय हमें दलित विमर्श के रूढ़िबद्ध दायरों को तोड़ने की जरूरत है। जाति के दायरे में चलने वाला विमर्श अनेक किस्म की समस्याओं को पैदा करता है। जातिप्रथा के दायरे के बाहर रखकर यदि दलित लेखक सोचता है तो मुक्तलेखन और नई खोजों की ओर जा सकता है। जातिप्रथा से जोड़कर देखता है तो घूम-फिरकर पुराने जातिदंश और उसकी सर्जना में ऊर्जा खपाएगा और इससे दलित साहित्य में रूढ़िबद्धता का खतरा पैदा हो सकता है।
   सवाल उठता है दलित लेखक किस चीज को आधार बनाकर लिखता है। वे जातिप्रथा से जब जोड़कर लिखते हैं तो जाति की विचारधारा के दायरे में अपनी चेतना को बांध लेते हैं लेकिन ज्योंही जीवन के आख्यान को आगे बढ़ाते हैं तो जाति के बाहर चले जाते हैं। मसलन् एक अनपढ़ दलित का शिक्षित बनना स्वयं में रूपान्तरण है। गांव से शहर आना,नौकरी मिलते ही मध्यवर्ग में दाखिल होना,सरकारी पद पर आसीन होना रूपान्तरण है। कायदे से आधुनिक रूपान्तरण की प्रक्रियाओं को मूल्यांकन के केन्द्र में लाना चाहिए। इसमें दलित अपने अतीत की यात्रा कर सकता है और यह भी संभव है कि वह अपने मौजूदा जाति संकटों से भी फौरी तौर पर मुक्त हो जाए।
     जातिप्रथा को आधार बनाकर लिखी गई रचनाएं अंततः जाति प्रथा के शॉर्टकट की तलाश करती हैं और अंत में स्टीरियोटाइप समाधान की शरण में चली जाती हैं।कायदे से दलित लेखन को आत्माभिव्यंजना और अस्मिता की अभिव्यक्ति के लिए जातिप्रथा से भिन्न रास्ते की तलाश करनी चाहिए। जातिप्रथा के दायरे में ऱखकर देखने के कारण भेदभाव, ऊँच-नीच और जातिभेद बने रहते हैं। इनके दायरे के बाहर का सामाजिक संसार सामने नहीं आ पाता।
     इस तरह के सोच के आधार पर लिखने में एक और दिक्कत है कि लेखक के निशाने पर वर्तमान नहीं अतीत होता है। दलित साहित्य लेखक के वर्तमान या सामयिक परिवेश से जुड़े ,सामयिक परिवेश की जटिलताओं का उदघाटन करे और सामयिक परिवेश की लोकतांत्रिक संरचनाओं और पूंजीवादी एथिक्स किस तरह उसके व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं ,यह उसका कंसर्न बने तब नए सवालों पर उसका ध्यान जाएगा। आज दलित की पहचान दलित के रूप में न करके नागरिक के रूप में की जानी चाहिए। विमर्श का आधार नागरिक की अस्मिता को बनाया जाना चाहिए। नागरिक की पहचान संविधान प्रदत्त आधुनिक पहचान है। इसके आधार पर ही हम नागरिकचेतना और नागरिक समाज बना सकते हैं।
     हिन्दी में अनेक दलित लेखक हैं जिनकी आत्मकथाएं आ चुकी हैं। दलित आत्मकथाओं की संरचनाएं जातिप्रथा से जुडी हैं लेकिन जातिप्रथा को पुष्ट करना इनका लक्ष्य नहीं है, बल्कि इनसे लेखक के निजी जीवन के वृतान्तों के द्वारा सामाजिकचेतना और सामाजिक ध्रुवीकरण का उदघाटन हुआ है।
   दलित आत्मकथाओं का लक्ष्य है दलितपीड़ा के बहाने सामाजिक प्रतिवाद की चेतना पैदा करना। दलित लेखक जातिचेतना पैदा करने के लिए नहीं लिखते बल्कि प्रतिवादी चेतना पैदा करने के लिए लिखते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में दलित आत्मकथा मूलतः प्रतिवादी आख्यान का नया विधा रूप है। यह परंपरागत आख्यान से बुनियादी तौर पर भिन्न है। परंपरागत आख्यान का बुनियादी लक्ष्य था आनंद। नए दलित आख्यान का लक्ष्य है बेचैनी और असहमति। दलित आख्यान मूलत प्रतिवादी आख्यान है और इस तरह के आख्यान को वे पाठक हजम नहीं कर सकते जो मनोरंजन या समय काटने के लिए कहानी-उपन्यास पढ़ते हैं। परंपरागत आख्यान निजी मन को सम्बोधित है वहीं दलित आख्यान निजी मन को नहीं समाज को सम्बोधित है। सामाजिक विवाद और बहसों को जन्म देता है। मानवाधिकारों और नागरिक के अधिकारों की ओर ध्यान खींचता है।
    दलित आत्मकथाओं के आगमन के बाद गांवों में फैले जातिभेद की ओर आम लोगों का ध्यान गया है। दलित अस्मिता के बहुस्तरीय रूपों का उदघाटन हुआ है। आमतौर पर दलित आलोचक दलित के आत्म और दलित के सामुदायिक इन दो किस्म की अस्मिताओं को खोजते हैं और इन दो को ही आधार बनाकर समीक्षाएं भी लिखी जा रही हैं। मुश्किल यह है कि दलित में इन दोनों अस्मिताओं के अलावा और भी कई अस्मिताएं हैं।
    मसलन ओमप्रकाश बाल्मीकि की दलित और दलित समुदाय की अस्मिता के अलावा जेण्डर की अस्मिता है, पिता,भाई,पुरूष की अस्मिता है। भाषायी अस्मिता है ,पेशेवर अस्मिता है। एक ही आत्मकथा में एकाधिक अस्मिताएं गुथी होती हैं और ये परिवर्तनीय हैं। आरंभ हुआ था दलित से और अंत में रूपान्तरण हुआ है दलित लेखक की अस्मिता में। कहने का अर्थ यह है कि दलितलेखक की अस्मिता परिवर्तनीय है ,स्थिर या जड़ नहीं है। अस्मिताओं में मात्र दलित अस्मिता को देखना और अन्य अस्मिताओं की अनदेखी करने से साहित्यिक असंतुलन पैदा होता है।
   आत्मकथा का आरंभ जरूर दलित अस्मिता और दलित समुदाय से होता है लेकिन इसे लिखते समय लेखक का संदर्भ क्या है ? अस्मिता हमेशा संदर्भ से परिभाषित होती है। संदर्भ का वर्तमान से संबंध होता है। ओमप्रकाश बाल्मीकि की आत्मकथा जब लिखी गयी तो उसका संदर्भ किससे तय होगा ? अतीत के संदर्भ से या वर्तमान के संदर्भ से ? अस्मिता का सामाजिक नियम वर्तमान से जुड़ा है अतीत से नहीं।
   दलित समीक्षकों की मुश्किल यह है कि वे दलित आत्मकथा के सामाजिक रूपान्तरण के पहलुओं पर कम ध्यान दे रहे हैं। अतीत के शोषणकारी रूपों के चित्रण पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। सवाल उठता है क्या दलित साहित्य की सामाजिक रूपान्तरणकारी भूमिका है? दलित साहित्य की सामाजिक रूपान्तरणकारी भूमिका है तो फिर प्रतिवाद की प्रक्रिया के साथ सामाजिक रूपान्तरण पर ध्यान क्यों नहीं जाता ?
     समाज में संस्थानों की जातिबंधन में बांधे रखने और जातिबंधनों से मुक्त करने की द्विस्तरीय भूमिका होती है। उसी तरह पावर स्ट्रगल में भी सामाजिक शक्ति संतुलन बदल सकता है। शहर में जाति संतुलन और गांव में जाति संतुलन एक जैसा नहीं होता। शहर में रहकर जातिभेद ढ़ीले पड़ते हैं। शहरीकरण से जातिप्रथा की पुरानी दीवारें गिरती हैं। ऐसी स्थिति में लेखक का शहर में रहकर आत्मकथा के जातिबंधन और जाति उत्पीड़न की ओर जाना और फिर वहीं जाकर थम जाना एक निर्मित साहित्य संरचना और एक खास किस्म के रीतिवादी रूझान की ओर ध्यान खींचता है। अनेक आत्मकथाओं में दलित की स्थिति पर जोर ज्यादा है दलित के रूपान्तरण की प्रक्रिया के उदघाटन पर जोर कम है।
    वस्तुतः दलित आत्मकथाओं को समीक्षकों ने सामयिक दौर में एक दलित की सामाजिक स्थितियों के राजनीतिक बयान के रूप में विश्लेषित किया है। इस तरह के लेखन ने दलित साहित्य को प्रतिष्ठित करने और स्वीकृति दिलाने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की है। साहित्य विमर्श के सवालों को बदला है।
    दलित आत्मकथाओं के उभार का गहरा संबंध दलित राजनीतिक उभार के साथ है। ये दोनों अपने तरीके से दलित को प्रधान एजेण्डा बनाते हैं। उसके साथ हो रहे भेदभाव, अन्याय,अपमान और पीड़ा को अभिव्यक्ति देते हैं।
   दलित लेखक का निजी मूलतः सामाजिक और राजनीतिक होता है। दलित लेखक का आख्यान निज से आरंभ जरूर होता है लेकिन निजी के दायरे में रहता नहीं है।वह हमेशा सामाजिक-राजनीतिक दायरे में विचरण करता है।  उसमें निजता का वैसा कोई तत्व नहीं होता जो आमतौर पर सवर्ण आत्मकथाओं में होता है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो वह व्यक्ति के बहाने समुदाय के प्रतिवाद का साहित्य है। यह साहित्य में व्यक्ति की प्रतिष्ठा की बजाय समुदाय की प्रतिष्ठा का द्योतक है।
    समुदाय के आने के साथ मध्ययुगीनता की वापसी का भी खतरा है। समुदाय के बहाने जाति-वर्ण के रूप अपने साथ मध्ययुगीनता को वापस ला सकते हैं। आधुनिक समाज में आधुनिक किस्म के समुदाय हों जैसे राजनीतिक दल, विचारधारात्मक गुट,क्लब,सभा-सोसायटी आदि। नए सामुदायिक मोर्चे ही सामाजिक रूपान्तरण को सामने लाते हैं। दलित लेखकों की आत्मकथाओं में इन आधुनिक समुदायों के दर्शन भी होते हैं। इस अर्थ में ये लेखक समुदाय के साथ जुड़ी मध्ययुगीनता के दायरे का अतिक्रमण कर  जाते हैं।  
       आधुनिककाल के आगमन के साथ साहित्य में ईश्वर की जगह मनुष्य आया,कालांतर में क्रमशः राष्ट्र,राष्ट्रीयता ,वर्ग  और लिंग आया और अब दलित साहित्य के साथ समुदाय की प्रतिष्ठा हुई है। अब व्यक्ति पर नहीं समुदाय और लिंग के सवालों पर बहसें हो रही हैं।  हम यह मानकर चल रहे थे कि समुदाय चला गया और साहित्य में व्यक्ति और उसकी निजता का दौर आ गया लेकिन दलित साहित्य के साथ समुदाय की वापसी हुई है। साहित्य और समुदाय के नए अन्तस्संबंधों पर हमने अभी विचार नहीं किया है। अभी तक साहित्य और समाज के अन्तस्संबंधों पर विचार किया है। लेकिन नई परिस्थितियां समुदाय और साहित्य के अन्तस्संबंधों पर टिकी हैं। अब हमें साहित्य और समाज के अन्तस्संबंध पर नहीं समुदाय और साहित्य के अन्तस्संबंध पर विचार करना चाहिए।
      मध्यकाल में धर्म और साहित्य,भारतेन्दु युग में मनुष्य और समाज,राष्ट्र और साहित्य,जातीयता और साहित्य,महावीरप्रसाद द्विवेदी युग में साहित्य और समाज,प्रगतिशील आंदोलन के युग (1936-1953) में वर्ग और साहित्य के अन्तस्संबंध पर खूब बहसें हुई हैं। 1960 के बाद लोकतंत्र और साहित्य के अन्तस्संबंध के सवाल केन्द्र में हैं।
     सन् 1977 से समुदाय और साहित्य का अन्तस्संबंध केन्द्र में आया है। इस संबंध पर विचार करते हुए यह तथ्य रेखांकित किया गया है कि औरतें और दलित पेशिव नहीं हैं। बल्कि वे सामाजिक संरचनाओं के परिवर्तन के साथ बदलते रहे हैं। इस विमर्श में दलित और स्त्री का एक अर्थ नहीं है। बल्कि वे अनेकार्थी होकर सामने आते हैं। समुदाय के रूप में चरित्रों की भूमिका पर विचार करते समय यह ध्यान रहे कि समुदाय के चरित्र बहुस्तरीय भावों और संवेदनाओं को प्रभावित करते हैं। समाज की एकाधिक संरचनाओं पर सीधे असर छोड़ते हैं। विभिन्न संदर्भ में उनका अर्थ बदल जाता है।
      दलित पात्रों पर केन्द्रित रचनाओं में कहानी सवर्ण वर्चस्व और दलित मातहत के अन्तर्विरोध के साथ आरंभ होती है।लेकिन समाहार हमेशा मातहत अवस्था के अंत में होता है। इस तरह की प्रस्तुतियों की सारी बहस पाठ की व्याख्या पर टिकी है। इसमें सवर्णों और दलितों के संपर्क और व्यवहार की जटिलताओं को लेखकगण पेश करते हैं। इस तरह की रचनाओं में दलितों-सवर्णों के सामाजिक रीति-रिवाज ,नियमों और व्यवहारों को खासतौर पर उभारा गया है। यह भी दर्शाया गया है कि दलित समुदाय किस तरह सवर्णों से भिन्न ढ़ंग से जी रहा है। इसमें दो चीजें साफ उभर कर आई हैं दलित सत्य और चिर-परिचित दलित यथार्थ। यह काम दलित लेखकों ने पूर्वाग्रहरहित होकर किया है। इस तरह की प्रस्तुतियों में दलितों और सवर्णों की स्टीरियोटाइप इमेज और स्टीरियोटाइप सोच सामने आया है।
      यह भी एक सच है कि दलित जब भी लिख रहे हैं तो वे सवर्ण के वातावरण का चित्रण करते हुए सवर्ण परिवेश में ही लिख रहे हैं। उसी वातावरण में वे दलित जीवन में आ रहे परिवर्तनों को पेश कर रहे हैं। सवर्ण वातावरण में दलित कैसे सोचता है.उसकी मंशाएं क्या है,वह अपने भावों,विचारों और इमेज का प्रचार-प्रसार कैसे करता है और किसतरह सुचिंतित ढ़ंग से पाठक को सम्बोधित करता है। इन चीजों को देखना चाहिए। वे ऐसी भाषा का भी इस्तेमाल करते हैं जिसमें छूत-अछूत,छोटे-बड़े,शूद्र और सवर्ण आदि का बोध होता है। वे जब दलित को शूद्र के फ्रेमवर्क में रखकर पेश करते हैं तो फिर शूद्र के अधिकारों के सवाल उठ खड़े होते हैं। इस क्रम में दलित की जाति संरचना,परिवार का रूप, आंतरिक द्वंद्व,इतिहास ,शहर-गांव ,परिवार आदि के अन्तर्विरोध चले आते हैं। दलित लेखकों का तर्क है कि वे इस फॉरमेट में इसलिए लिख रहे हैं जिससे लोग दलित यथार्थ को जानें। दलित पीड़ा के अनुभवों को जानें। लेकिन उनके लेखन का यह तरीका प्राच्यवादी है।
      दलितलेखक यह भी कहते हैं कि सवर्णों ने हमारे समाज और उसके यथार्थ पर कभी नहीं लिखा। वे खाली नाममात्र को प्रतीकात्मक रूप में दलित का उल्लेख करते रहे हैं। इसके विपरीत दलित आत्मकथाओं में दलित जीवन के बारें में अनेक सूचनाएं होती हैं। भूगोल रहता है।सामाजिक संरचनाओं के रूप रहते हैं। आचार-व्यवहार के रूप आदतें, आचरण और मनोदशाओं का चित्रण रहता है। इस समूचे आख्यान रूप को दलित लेखकों ने दलित सूचना संसार के रूप में पेश किया है। वे इसे दलित यथार्थ की वस्तुगत प्रस्तुति भी कहते हैं।
     दलित लेखकों ने जिन तथ्यों को पेश किया है उसके खिलाफ बहस की बहुत कम गुंजाइश है। लेखन की प्रक्रिया में सूचनाओं को देने की प्रक्रिया जब आरंभ हो जाती है या यों कहें कि आत्मकथा में यथार्थ सृजन की प्रक्रिया जब आरंभ हो जाती है तो कौन सी सूचना सच है और कौन सी काल्पनिक यह कहना कठिन है। दलित चूंकि अमानवीय परिवेश में रहता है अतः उसकी चेतना पर सवर्ण संरचनाओं का गहरा दबाव होता है वह जो पाठ लिखता है उस पर सवर्ण वातावरण का दबाव हावी रहता है।   
     दलित लेखक आत्मकथा में व्यक्ति रूप में अपनी बातें रखते हुए सामने आता है। दलितसमूह के रूप में नहीं। यह ऐसा व्यक्ति है जिसका दलितसमूह से भेद करना मुश्किल है। लेकिन यह अंततः व्यक्ति है ,साथ ही समुदाय का प्रतिनिधि भी है। दलित व्यक्ति के विवरण, कष्ट ,पीड़ा और परिवर्तन को हम ओमप्रकाश बाल्मीकि की कृति 'जूठन' (1997) में देख सकते हैं। यह किताब 1994 के आसपास लिखनी आरंभ हुई। यह हिन्दी की सबसे चर्चित आत्मकथा है। इस किताब को देखकर यह भी लगता है कि लेखक आत्मकथा के बहाने अपने जीवन और दलित समाज की अनेक सूचनाओं को दलित यथार्थ के साथ मिलाकर शामिल करता चला जा रहा है। वह उन सूचनाओं को क्रमशःपेश करता है।
      ओमप्रकाश बाल्मीकि ने दलित जीवन के दमघोंटू अमानवीय वातावरण का चित्रण किया है। अपने निजी जीवन के चित्रण के जरिए उन्होंने दलित समाज के सामाजिक यथार्थ और सांस्कृतिक अवस्था को पेश किया है। इसमें अनेक जगह सरलीकरण भी चले आए हैं। दलित व्यक्ति से आरंभ हुई आत्मकथा दलित समूह को एक सुसंगत इकाई के रूप में देखती है। इस प्रक्रिया में दलितों के जीवन में व्याप्त उत्पीड़न,भेदभाव,उपेक्षा आदि का व्यापक चित्रण हुआ है। दलितों के जीवन में व्याप्त मानवीय सकारात्मक पहलुओं की चर्चा कम हुई है।
      दलितों की आत्मकथाएं एक तथ्य की ओर संकेत करती हैं कि सामाजिक परिवर्तन के साथ दलितों का जीवन भी बदलता रहा है। यह बदला हुआ जीवन सामान्य और आशानुरूप है । पूंजीवादी परिवर्तनों से दलित समाज भी बदल रहा है।
    दलितों के नारकीय जीवन के दृश्यों की आत्मकथाओं में भरमार है। लेकिन हमें यह भी देखना चाहिए कि पूंजीवादी संस्कृति के आचार-व्यवहार,मूल्य,खान-पान,सभा-सोसायटी आदि किस तरह दलितों को प्रभावित कर रहे हैं? यह ठीक है कि इन आत्मकथाओं में नारकीय यथार्थ पहलीबार सामने आता है लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है जिसे नोटिस लिया जाना चाहिए। नए किस्म के पूंजीवादी संपर्क,संबंध और संचार रूपों के कारण क्या बदलाव आ रहे हैं उनके बारे में मूल्यांकन कर्ताओं का ध्यान जाना चाहिए। 
   दलित समाज सामंती,पूंजीवादी और पितृसत्तात्मक इन तीन व्यवस्थाओं के दबाव में घिरा हुआ है। इसके कारण इस समाज के सामने इन तीनों से ही लड़ने की समस्या है। सवाल यह है कि दमघोंटू अमानवीय जीवन स्थितियों का चित्रण करने के बाद क्या दलित लेखक इन स्थितियों से मुक्त हो रहे हैं ? आधुनिक दलित परिवार कैसे थे और आज कैसी अवस्था में हैं ? आधुनिक दलित परिवार में आधुनिकता के रूपों के प्रवेश के बाद किस तरह के मूल्य,संस्कार,आदतें आदि पैदा हो रहे हैं ? क्या नए आधुनिक परिवर्तनों के प्रति दलितों में उतनी गहरी समझ है जितनी गहरी समझ उनमें पुराने दलित समाज को लेकर है।
     दलित समाज में आज दो तरह के समाज हैं। आधुनिक शिक्षित दलित और पुराना दमघोंटू अमानवीय माहौल में रहने वाला दलित । हमें इन दोनों के नए सवालों की दलित नजरिए से पड़ताल करनी चाहिए।
    आज दलित लेखक के नए सवाल सामने है ,मसलन् ,नए उभरते पूंजीवादी दलित परिवार की संरचनाएं किस तरह की हैं ?इसके प्रधान अंतर्विरोध क्या हैं ? दलित परिवारों का आंतरिक चित्रण दलित लेखन में अभिव्यंजित क्यों नहीं हो रहा ?   महानगरीय और नगरीय जिंदगी के पूंजीवादी वातावरण,नौकरी,शिक्षा,आधुनिक बस्तियों आदि में रहने वाले दलितों के जीवन को कैसे देखें ? क्या आधुनिक पूंजीवादी दलित परिवार और पुराने दमघोंटू वातावरण वाले दलित परिवारों में बुनियादी बदलाव आया है ? आधुनिक दलित की चेतना और विचारधारा और पुराने दलित की चेतना और विचारधारा में क्या अंतर है? पूंजीवादी मूल्यों और समानतावादी आम्बेडकर के विचारों में से किस तरह के विचारों को दलित लेखक ज्यादा जी रहे हैं ? दलित लेखकों का पूंजीवाद,अमेरिकी साम्राज्यवाद,बहुराष्ट्रीय निगमों, उपभोक्तावाद, नव्य-आर्थिक उदारीकरण के प्रति क्या नजरिया है ?
    दलित साहित्य में और खासकर आत्मकथाओं में जो चीज सबसे महत्पूर्ण है वह है दलित लेखकों का सामाजिक रूपान्तरण। साहित्य में 'रूपान्तरण' वाले पहलू पर कम ध्यान दिया गया है। जिस तरह दलित लेखकों के दलित समाज के सामाजिक यथार्थ का महत्व है ,वैसे ही इस रूपान्तरित दलित लेखक की अवस्था का भी महत्व है और यह इस बात का संकेत है कि दलितों में तेजी से मध्यवर्ग पैदा हो रहा है।
    दलित मध्यवर्ग की चिंताएं ,समस्याएं और अभिरूचियां एकदम वही हैं जो आम मध्यवर्ग की हैं। आम मध्यवर्ग के पास अपनी पहचान के अनेक मुखौटे हैं , क्या दलित मध्यवर्ग के पास में भी कई मुखौटे हैं ? पूंजीवादी आचार-व्यवहार और शहरीकरण के कारण किस तरह के बदलाव दलित लेखक की जिंदगी में आ रहे हैं? क्या उन बदलावों के आधार पर कोई सामान्यीकरण दलित मध्यवर्ग के बारे में बनाया जा सकता है ? क्या दलित मध्यवर्ग में जातिभेद की समस्या है ? क्या विभिन्न दलित जाति के मध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवारों में जातिभेद हैं ? जिन दलित परिवारों का आधुनिकीकरण नहीं हुआ है वे मध्यवर्ग में आने के बाबजूद,महानगरों में रहने के बावजूद विभिन्न दलित जातियों के साथ भेदभाव से पेश आते हैं। इसका अर्थ यह है कि पूंजीवाद ने दलितों को मध्यवर्ग में तो पहुँचा दिया है लेकिन दलित जातियों में प्रचलित आंतरिक जाति-भेदभाव अभी भी बना हुआ है। इस काम में आधुनिक शिक्षा व्यवस्था कोई मदद नहीं करती। लिबरल शिक्षा व्यवस्था में पुरानी जातिगत अस्मिता को खत्म करने की क्षमता ही नहीं है।वह उसे नौकरी लायक बना देती है, लेकिन आधुनिक नहीं बनाती।नागरिक नहीं बनाती।पुरानी अस्मिता से मुक्त नहीं करती।   
     दलित अनुभूति बेहद जटिल और संश्लिष्ट होती है। इसमें मानवीय अनुभूति के सामान्य और जाति के विशिष्ट परिवेशगत लक्षण होते हैं। इसमें जातीय और लोकल जाति अनुभूति के सम्मिक्षण लक्षण भी हैं।
     एक जमाना था दलित अनुभूति सत्ता के प्रतिवाद का हिस्सा थी,कालान्तर में सत्ता और प्रतिष्ठानों का प्रतिवाद करते हुए स्वयं सांस्थानिक अनुभूति बन गयी। दलितों में पुराने संस्थानों के प्रति प्रतिवाद और उनको अस्वीकार करने का प्रबल भाव था। आज उसे पाने का प्रबल भाव है। इसके कारण दलित विमर्श जाने-अनजाने सत्ता विमर्श के पैकेज का हिस्सा बन गया है। आरक्षण वस्तुतः सत्ता विमर्श और सामंजस्य,सहयोग और समानता की सत्तापंथी समझ की अभिव्यक्ति है।
     आरंभ में दलितों के पास अपनी धारणाएं नहीं थीं ,इसके कारण वे अवधारणाओं का यह कहकर निषेध करते थे कि अवधारणाएं सवर्ण व्यवस्था की देन हैं। लेकिन आज दलित साहित्य है,अनुभूति है,अवधारणाएं हैं। अकादमिक जगत में दलित विमर्श,दलित साहित्य,दलित अध्ययन आदि पर केन्द्रित कोर्स हैं,विभाग हैं,अध्ययन केन्द्र हैं। कलतक दलित संस्थानविहीन था आज संस्थान है। इससे दलित की संस्थानों में शिरकत बढ़ी है।
    अवधारणाओं में अनुभूति को बांधने का पहले दलित निषेध करते थे, लेकिन बाद में अवधारणाएं बनाने का काम करने लगे, पहले साहित्य सिद्धांतों का निषेध करते थे और कहते थे कि साहित्यशास्त्र तो वर्णवादी है,पुंसवादी है। सिद्धांत ,आलोचना, अकादमिक जगत आदि के बारे में वे घृणा से बातें करते थे। आज वे दलित सौन्दर्यशास्त्र, सिद्धांत, अवधारणाएं आदि बना रहे हैं। पहले आत्मवैधता को बड़ा मानते थे अब सामूहिक अकादमिक वैधता को सुंदर मान रहे हैं।
     दलित साहित्य स्वयं में एक राजनीतिक अर्थ से भरी केटेगरी है। दलित को लेकर होने वाला कोई भी विमर्श,विवाद,आलोचना राजनीति की उपेक्षा करके संभव नहीं है। खासकर दलित राजनीति के 1977 के बाद आए उभार की अनदेखी किए बिना संभव नहीं है। जिस तरह प्रगतिशील साहित्य का विमर्श कम्युनिस्ट राजनीति और मार्क्सवाद के बिना तैयार नहीं होता वैसे ही दलित विमर्श सामयिक दलित राजनीतिक एजेण्डे ,ज्योबा फुले-आम्बेडकर के बिना नहीं बनता। असल में इन दोनों ने यह चीज रोमैंटिक आंदोलन से ली है। जिस तरह रोमैंटिक आंदोलन का फ्रांस की राज्य क्रांति की राजनीति से संबंध जुड़ा है, वैसे ही प्रगतिशील आंदोलन और दलित साहित्य भी सामयिक राजनीति से जुड़ा है।
       रोमैंटिक साहित्य में लेखक केन्द्रित लेखन है वैसे ही दलित साहित्य में भी है। साहित्य में सामाजिक शक्ति संतुलन के पहलू को सबसे पहले रोमैंटिक कवियों ने महत्व दिया वहीं से दलित लेखकों ने सामाजिक शक्ति संतुलन अपने पक्ष में करने की कला सीखी। वे जो कुछ लिखते हैं उसमें सामाजिक शक्ति संतुलन का चित्रण जरूर रहता है। आत्मकथा से लेकर कहानियों तक सब में दलित अपनी सामाजिक अवस्था का वर्णन करने के लिए सबसे ज्यादा स्पेस खर्च कर रहे हैं। सत्ता,दलित समाज,व्यक्ति और दलित समाज,दलित समुदाय और सवर्ण समुदाय,सवर्ण और सत्ता आदि के अन्तस्संबंधों पर खूब लिखा जा रहा है।
      दलित लेखक अपनी रचनाओं में दलित के शोषण मात्र का चित्रण नहीं कर रहे बल्कि दैनंदिन शोषण में सत्ता किस तरह भूमिका निभाती है उसकी ओर भी ध्यान खींच रहे हैं।
दलित लेखन के माध्यम से सहज ही विमर्श के नए ग्लोबल पैटर्न को भी समझ सकते हैं। जिस तरह अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर दलित और नस्ल के सवाल एकसाथ उठाए जा रहे हैं और अमेरिकी सीनेट से लेकर यूएनओ के मंचों तक भारत के दलितों की समस्याओं पर बहस हो रही है उससे दलित विमर्श और दलित सृजन के ग्लोबल फलक और लिंक को समझने में मदद मिल सकती है। दलित लोकल है लेकिन विचारों और अभिव्यक्ति की शैली में ग्लोबल है।
   दलित का व्यक्तिगत और सामाजिक भिन्न होता है। दलित का जो व्यक्तिगत है वही उसका सामाजिक भी है। मसलन् साहित्य में दलित जीवन के अनेक पहलू कभी किसी भी बड़े लेखक ने चित्रित नहीं किए। प्रेमचंद ने कृषिशोषण का पहलू उजागर किया लेकिन दलितों के जीवन की व्यक्तिगत बातें अज्ञानता के कारण लिखने में असमर्थ रहे। मसलन् दलित क्या खाते हैं,कैसे रहते हैं, कैसे मरे हुए पशुओं के चमड़े का प्रयोग करते हैं,मरे पशुओं के बीच किस तरह रहते हैं, किस तरह स्कूल में परेशानियां झेलते हैं,जाति सूचक नाम किस तरह परेशानी पैदा करते हैं,शारीरिक शोषण,यौन शोषण,जीने का हक,पैदा करने का हक,घरेलू हिंसा आदि के रूप क्या हैं। इन सबके बारे में दलित लेखकों ने सबसे पहले रोशनी डाली। अपने निजी को सार्वजनिक किया। यहां तक कि मध्यकालीन दलित लेखक भी इस निज को सार्वजनिक नहीं कर पाए थे, लेकिन आधुनिक दलित लेखक ने यह काम किया है। दलित लेखकों ने जितने निजी प्रसंग उठाए हैं वे सबके सब व्यवस्था से जुड़े हैं और व्यवस्था से जुड़े होने के कारण ये राजनीतिक हैं। इसी अर्थ में दलित लेखन राजनीतिक है।
    दलित लेखन में जिन सामाजिक कष्टों का वर्णन मिलता है उनमें लेखकों ने कष्टों के लिए वर्णव्यवस्था और उसके साथ जुड़ी सामाजिक-राजनीतिक संरचनाओं को दोषी ठहराया है। इस क्रम में जहां एक ओर लेखक ने अपने निजी भावों और कष्टों को अभिव्यक्ति दी है वहीं दूसरी ओर अपनी दुरवस्था के लिए मानव निर्मित परिस्थितियों और सामाजिक समूहों के व्यवहार को दोषी ठहराया है।
   दलित लेखन या विमर्श कुछ भी नाम दें इसमें लेखक का रचा पाठ जहां एक ओर उसके निज की अभिव्यक्ति है वहीं दूसरी ओर वह प्रत्यक्षतःअन्य सामाजिक-राजनीतिक विमर्शों से भी जुड़ा है। अतः उनके लेखन में उठी किसी समस्या का समाधान व्यक्तिगत नहीं हो सकता। जो भी समाधान होगा वो सामाजिक-राजनीतिक और सामुदायिक संरचनाओं से जुड़ा होगा।
     विभिन्न दलित लेखकों की रचनाएं ऊपर से एक-दूसरे से अलग हैं लेकिन वे एक समग्र विमर्श तैयार करती हैं। सतह पर देखने पर लगेगा कि यह तो ओमप्रकाश बाल्मीकि की रचना है,यह शरणकुमार लिम्बाले की रचना है और यह किसी अन्य दलित लेखक की रचना है लेकिन ये सभी रचनाएं मिलकर दलित विमर्श निर्मित कर रही हैं और एक-दूसरे के साथ संवाद भी कर रही हैं। ये रचनाएं अलग-अलग लेखक की लिखी होने के बाबजूद ऐसा लगता है कि इनमें एक यूनिटी है, एकता है। इन रचनाओं को पढ़कर तत्काल ही व्याख्या की जरूरत महसूस होती है। असल में ये रचनाएं दलित जीवन के उस पहलू को सामने लाती हैं जिसे साहित्यकार नहीं जानता था।आलोचना ने कभी जिन पर विचार नहीं किया था।पाठक ने कभी जिसके बारे में विस्तार से पढ़ा और जाना ही नहीं था। यह मूलतः दलित का अदृश्य यथार्थ है।  
     दलित लेखन में निहित विभिन्न किस्म के विमर्शों के बीच जटिल संबंध है। मसलन दलित परिवार,दलित संस्कृति,दलितों में स्त्री-पुरूष संबंध,अभिभावक-संतान के संबंध,मातृसत्ता और दलित,पितृसत्ता और दलित आदि के सवालों पर दलित और गैर दलित समाज में विचारों का किस तरह आदान-प्रदान होता रहा है और किस तरह दलितों ने अपने लोकल और सार्वभौम चरित्रों को रचा है। कहने का तात्पर्य यह है कि दलित पात्र ,संस्थान और दलित यथार्थ के बीच में किस तरह की अंतर्क्रियाएं हो रही हैं,इत्यादि सवालों पर विचार करने की जरूरत है।
    दलित लेखन की विशेषता है कि वह दो स्तरों पर सक्रिय होता है पहला, वह दलित जीवन के उस यथार्थ को सामने लाता है जिसे आम लोग नहीं जानते,दूसरा वह पहले से प्रचलित जाति और वर्ण के संस्कारों,मान्यताओं और मूल्यों को चुनौती देता है। जाति और वर्ण के बारे में जो पहले कहा गया है उसे निशाना बनाता है। इन दो कार्यों के जरिए दलित लेखक एक नए किस्म के साहित्य और विचारधारा को जन्म देता है। वह विमर्श और चित्रण में उन चीजों को लेआता है जिन्हें पहले कभी नहीं कहा और रचा गया था।
      कुछ लोग हैं जो प्रेमचंद की रचनाओं में व्यक्त दलित चित्रण को पेश करते हुए कहते हैं कि देखो प्रेमचंद ने दलित यथार्थ रचा है। इसके आधार पर वे चाहते हैं कि यह मान लिया जाय कि गैर दलित लेखकों ने बेहतर दलित यथार्थ की सृष्टि की है। यह सच है कि प्रेमचंद के यहां दलित यथार्थ के चित्र हैं लेकिन  इससे दलित लेखन की महत्ता कम नहीं होती।
     दलित लेखक बड़े कौशल से दो काम करते हैं वे दलितयथार्थ के साथ दलित विचारों से पाठक का परिचय कराते हैं। प्रेमचन्द के यहां दलित यथार्थ है लेकिन दलित विचारधारा नहीं है। दलित साहित्य के लिए दलित यथार्थ और विचारधारा दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। इनके बिना दलित साहित्य का समग्र ढ़ांचा नहीं बनता।  
    दलित लेखक जब दलित सवालों को उठाते हैं तो वे उस बिंदु से नहीं बोलते जो पहले ही कहा जा चुका है बल्कि उस बिंदु से आरंभ करते हैं जो नहीं बोला गया है। साहित्य में दलित तो है लेकिन दलित की आवाज कहीं सुनाई नहीं देती। दलित के चित्र तो हैं लेकिन आवाज नहीं है।
    आमतौर पर विमर्श में जो पहले कहा गया है उसे लिपिबद्ध कर दिया जाता है लेकिन दलित विमर्श में ज्यादातर वे चीजें सामने आई हैं जो पहले नहीं उठायी गयीं। इनमें दलित की चुप्पियों को सुना जा सकता है।
     अनेकबार दलित विमर्श पढ़ते हुए दमनात्मक अनुभूतियों का भी सामना करना पड़ता है। यह लगता है दलित लेखक चाहता है कि उसकी बात को ध्यान से सुना जाए औऱ उस पर विचार किया जाए। दलित रचनाओं की एक और खूबी है कि उनमें हठात यथार्थ का ऐसा अंश सामने आता है जिसके बारे में पहले से कोई अनुमान नहीं था। कभी किसी ने ऐसी बात लिखी नहीं थी। यह हठात् पैदा हुआ यथार्थ वस्तुतः ऐसा सच है जिसकी पुनरावृत्ति संभव नहीं है। इसे आप जान नहीं सकते थे।भूल नहीं सकते हैं। रूपान्तरित नहीं कर सकते। सीधे खारिज नहीं कर सकते। इसे छिपा भी नहीं सकते। इस तरह की यथार्थ प्रस्तुति के सामने आते ही आपको स्टैंड लेना होगा, अपने स्टैंड को आप स्थगित नहीं कर सकते। यह ऐसा यथार्थ है जो परेशान करता है,पक्ष लेने के लिए मजबूर करता है।
दलित लेखकों ने आत्मकथा के बहाने जिस नारकीय जीवन का चित्रण किया है उसकी विशेषता है कि किस तरह एक दलित अपनी जीजिविषा और संघर्ष क्षमता के बल पर अपनी जिदगी बदलता है और पशुवत जीवन से कैसे मानवीय जीवन की ओर रूपान्तरित करता है। किस तरह मानवीय जीवन और नारकीय जीवन में अंतर होता है। दया पवार की कृति 'अछूत' में चित्रित  एक यथार्थ चित्र देखें,लिखा है-
  " ढोर मरने के बाद महारबाड़ा में एक चेतना दौड़ जाती। उसमें भी बैल यदि कगार से फिसलकर मर गया तो आनंद दुगुना। ऐसा बैल अधिक ताजा समझा जाता। जंगल में कहाँ ढोर मरा है,इसकी ख़बर महारबाड़ा पहुँचने में देर न लगती। आज के टेलेक्स से भी तेज गति से ख़बरें पहुँचतीं। आकाश में चील-गिद्ध विमान -जैसे एक ही दिशा में मँडराने लगते तो महारों को मालूम हो जाता कि खाना कहाँ पड़ा  है। गिद्धों द्वारा खाने की बरबादी न हो,इसके लिए भाग-दौड़ मचती।गिद्ध भी कितने ! आसानी सेपाँच-पचास का झुण्ड षपंख फड़फड़ाते। मुँह से मचाक्-मचाक् की आवाजें निकालते।अण्णाभाऊ साठे ने एक कथा में इन गिद्धों से मखमली जैकेट पहने साहूकार-पुत्र की उपमा दी है। पत्थर मारने पर थोड़ी दूर उड़ जाते परन्तु बेशर्मों-से फिर खाने की दिशा में सरकते। शायद उन्हें महार लोगों पर बड़ा क्रोध भी आता होगा। उनके मुँह से महार लोग कौर छीन लेते थे ! गिद्धों की हिंस्र आँखें,उनकी धारदार चोंच ! मुझे लगता है,वे सब मेरा ही पीछा कर रहे हैं।"
" कई दिनों से महारबाड़ा में इस तरह का खाना ही नहीं मिला। मुँह का स्वाद ही चला गया" -ऐसा कहते हुए बूढ़े लोग काफ़ी खुश दिखायी देते। घर में जो भी बर्तन होता- घमेला,परातें- वह लेकर लोग भागते। चमड़ी छिलने तक भी सब्र न करते। उसमें महिलाओं की धूम अलग। हमारी उम्र के लड़के दूसरे कारणों से ही खुश हो जाते।मोटी चमड़ी के साथ ही पतली चमड़ी की एक परत होती। उससे डफली,ढोल बना सकते थे। पतीली का ऊपरी घेरा या खाली डिब्बा इसके लिए पर्याप्त था। खाली डिब्बे को तानकर बैठाया जाता और धूप में सुखा देते। एक-दो दिन के बाद चर्वाद्य-सी आवाज निकलने लगती।" ( अछूत, पृ.64-65)
     उपरोक्त विवरण बताता है कि अछूतों का जीवन किस तरह पशुओं के जीवन से घुला-मिला रहा है।इसमें अभिव्यक्त अमानवीय स्थितियों का चित्रण दलितों को समाज के बाकी लोगों से अलग करता है। यह पूरा वर्णन नजारे की तरह लगता है। इससे यह भी लगता है दलित अर्द्ध मनुष्य के समूहों में जीते रहे हैं। यह पूरा वर्णन पढ़ने वाले को वाणीरहित कर देता है। इस तरह के वर्णन से यह भी पता चलता है हम दलितों के बारे में कितना कम जानते हैं।
  चूंकि हमें दलितों की वास्तविक जिंदगी की समझ नहीं है इसलिए उसे लेकर समाज और साहित्य में कोई संवाद भी नहीं है। यह वर्णन हमारे समाज में सक्रिय संस्थानों की भी स्थिति की ओर ध्यान खींचता है। किस तरह सामाजिक संस्थानों ने दलितों को अमानवीय,हीन और घृणित अवस्था में कैद किया हुआ है। यह मूलतःगुलाम अवस्था है।
     दलितों को गुलामप्रथा के अलावा और किसी परिप्रेक्ष्य में नहीं देखा जा सकता। अनेक गैर दलित लेखकों के यहाँ दलितों के शोषण ,कृषिदासता, भूमिहीन कृषक आदि के चित्र मिलते हैं लेकिन दलितों की अमानवीय और अर्द्ध -मनुष्य जीवन स्थितियों का जो वर्णन दलित लेखकों के यहां मिलता है वह गैर दलित लेखकों यहां नहीं मिलता। इसका कारण क्या है ? असल में गैर दलित लेखकों ने दलित को कभी अंदर से जानने की कोशिश ही नहीं की। वे हमेशा उसे दर्शक की नजर से देखते रहे हैं। दलित के जीवन का उनके लिए नजारे या एक सीन से ज्यादा महत्व नहीं है। जब चीजों को दर्शक की नजर से देखकर लिखते हैं तो यह देखने वाले पर निर्भर करता है कि वह क्या देखे और क्या लिखे। वह सीन में शामिल नहीं होता।
दया पवार और अन्य दलित लेखकों ने जिस अमानवीय दलित जीवन को चित्रित किया है वह यथार्थवाद के पैमानों से समझ में नहीं आएगा। हमारे अनेक प्रगतिशील आलोचक प्रेमचंद आदि गैर दलित लेखकों के बारे में यथार्थवाद के मानकों और साहित्य सिद्धांतों के आधार पर लिखते रहे हैं। दलित का यथार्थ बुनियादी तौर पर भिन्न है और यह भिन्न समय में अवस्थित है। इसे समझने के लिए दलित दृष्टिकोण और मानविज्ञानी (एथनोग्राफिक) परिप्रेक्ष्य की सही समझ का होना जरूरी है।
    यथार्थवाद के मानकों का आधार है 'मनुष्य' और 'वर्ग' ,जबकि दलित इन दोनों के बाहर एथनोग्राफिक वर्तमान में निवास करता है। दलित के लेखन में 'वर्तमान समय' महत्वपूर्ण है, यथार्थवाद में ' समय' महत्वपूर्ण है। यथार्थवाद का विमर्श ऐतिहासिक काल में चलता है।
    दलितसाहित्य विमर्श वर्तमानकाल में चलता है। दलित लेखकों ने जिस अमानवीय अवस्था का वर्णन किया है वह उनका भोगा हुआ यथार्थ है जबकि गैरदलित लेखक का यह दूर से देखा-सुना यथार्थ है। दलितलेखक यथार्थ का हिस्सा है,गैर -दलितलेखक दलितयथार्थ के बाहर है। दलितलेखक दलितयथार्थ का सर्जक है,कर्ता है। गैर दलित लेखक दर्शक है,गवाह है,साक्षी है।
     दलित लेखकों ने दलित पर विचार करते हुए भारतीय संस्कृति,सभ्यता, जातिप्रथा, धर्म आदि के समस्त सुंदर तानेबाने को उधेड़ा है। वे बार बार यह बताना चाहते हैं कि उन्हें अधिकारों से वंचित करके रखा गया। अमानवीय परिस्थितियों में रखा गया। दलितलेखक ज्योंही दलितयथार्थ को वर्तमानकाल में ले आता है तो समाज को नजारे की कैद से मुक्त कर देता है। नजारे की कैद के कारण दलित के बारे में गैर दलित लेखकों में दलित यथार्थ की खूब पुनरावृत्ति हुई है। पुरानी समाज व्यवस्था की संकीर्णताओं,शोषण आदि की स्टीरियोटाइप प्रस्तुतियां खूब हुई हैं। इस तरह की प्रस्तुतियों को प्रेमचंद,निराला,जगदीश चन्द्र आदि का रचनाओं में साफतौर पर देखा जा सकता है।
        दलित लेखक जब दलित जीवन पर लिखते हैं तो वे अपने को औपनिवेशिकता के फ्रेम के बाहर ले जाते हैं। वे दलितों के नकारात्मक लक्षणों पर खूब जोर देते हैं। दलितों के जीवन की नकारात्मक स्थितियों का बार बार आना ,अमानवीय स्थितियों का बार बार आना उनकी दोयमदर्जे के नागरिक की अवस्था को बनाए रखने की साजिशों और सोच को नंगा करता है। इससे दलित के खिलाफ बने हुए वर्चस्व चक्र को चुनौती मिलती है।  जातिप्रथा कमजोर होती है। दलितों के प्रति गुलाम मानसिकता नष्ट होती है। मूल बात यह कि दलित लेखन में वर्चस्व और अमानवीय जीवन स्थितियों  का संदर्भ प्रमुख है।
   दलित के बारे में स्वाधीनता संग्राम में महात्मा गांधी,भीमराव आम्बेडकर आदि के जितने भी प्रयास,संघर्ष और विचारधारात्मक बहसें हुई हैं उन सबके केन्द्र में स्वाधीनता संग्राम है। स्वाधीनता संग्राम के प्रभाव के कारण ही दलितों की मुक्ति के सवाल सामने आते हैं। स्वाधीनता संग्राम के कारण ही दलितयथार्थ केन्द्र में आता है। वर्चस्व से मुक्त होने की दलित आकांक्षा अभिव्यक्त होती है। औपनिवेशिकता विरोधी संघर्ष दलित को वर्चस्व से मुक्ति का स्वप्न पैदा करता है। दलित जितना अंदर से औपनिवेशिक विचारधारा के प्रभाव से मुक्त होता गया उतना ही ज्यादा दलितयथार्थ सामने लाता गया। दलितयथार्थ के सामयिक विस्फोट का प्रधान कारण है दलित लेखकों का औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी विचारधारा से मुक्त होना।
    दलित विमर्श पर विचार करते समय यह तथ्य भी ध्यान में रहे कि विभिन्न भारतीय भाषाओं में दलित साहित्य के उदय और लेखन की परिस्थितियां भिन्न होने के बावजूद अनेक साझा समस्याएं हैं ,इनमें जाति उत्पीड़न साझा समस्या है।
    दलित लेखन की साझा विरासत है इसका प्रतिवादी स्वर। दलित लेखन ने उन तमाम संस्कारों,आदतों और मूल्यों को अपने लेखन में निशाना बनाया है जो वे सैंकड़ों सालों से झेल रहे हैं। फलतःइन रचनाओं में दमन का इतिहास चला आया है। दलित लेखकों की प्रस्तुतियों में सामयिक दबाबों से मुक्त टिकाऊ प्रस्तुतियां सामने आई हैं। लेखक के नजरिए में सामयिक दबाव हैं लेकिन प्रस्तुतियों या चित्रण में सामयिक चंचलता गायब है। सामयिक टेंशन गायब है।
     दलित पाठ मूलतः वर्चस्व विरोधी और सामाजिक शक्ति संबंधों की अभिव्यक्ति है। इस पाठ में अनेक उप-पाठ हैं और उप-तनाव हैं। मसलन् जाति उत्पीड़न प्रधान पाठ है, लेकिन दलित परिवार,दलित कामुकता,दलित शरीर ,शिक्षा,दलित की नौकरी,कार्यस्थल पर दलित,मेला,महानगर और मध्यवर्ग में दलित आदि को लेकर अनेक उप-पाठ भी मिलते हैं।
मसलन्, कामुकता का प्रसंग देखें, 'अछूत' का एक दृश्य पढ़ें- " चौथी कक्षा की बात है। मराठे की एक हट्टी-कट्टी लड़की मेरी कक्षा में पढ़ती थी। उसे पहला मासिक-धर्म आया और उसका पहला लहँगा खून से सन गया। तब मैंने खोज की -यह लड़की अब औरत बन गयी है।" ( पृ.45) यह दृश्य किताब में अचानक आ टपकता है। इसके बाद कामुकता का एक और उप-पाठ दाखिल होता है- " बंबई में कावाखाने में रहते समय लड़कों के बहलाने में आकर दरवाजों की दरारों से कई बार छिप-छिपकर छोटी आयु में ही संभोग के कई दृश्य मैंने देखे हैं।" इसके बाद एक घटना का लेखक जिक्र करता है।
'' एक घटना तो अच्छी तरह याद है। मेरे मौसेरे चाचा थे। उनका नाम था शिवा। शादी हुई और बीबी मर गयी। विधुरता के दिन काट रहे थे। सड़कों पर कसरत के खेल दिखाने वाली एक काली हुड़दंगी औरत उन्होंने घर में रख रखी थी ।वैसे यह औरत बड़ी अजीब थी। पुरूषों की तरह पैंट-शर्ट पहनती थी। लंबे बालों को जूड़े में बाँधती थी चाचा को कावाखाने में मिलने आती,वह भी साइकिल पर बैठकर।...  जब कावाखाने के स्त्री-पुरूष काम पर चले जाते ,तब शिवा चाचा उसे कमरे में ले आता। ... यह औरत चाचा के सामने गाय के समान कैसे शांत-लीन हो जाती है !वे नंगे हो जाते।पसीने से लथपथ। दीवाल का आईना ज़मीन पर कोण बनाकर रखते। औरतों की जांघ के बीच बाल होते हैं, इस बात का मुझे कई दिनों तक आश्चर्य होता रहा...! "(पृ.45)
   दया पवार ने एक अन्य प्रसंग का जिक्र किया है ,एक बिठाभाई नामक महिला के बारे में लिखा है," मुझ पर जान देती थी।अच्छी-अच्छी चीजें खाने को देती।सिनेमा-नाटक दिखाती।मुझे बहुत मजा आता।मैंने उसके साथ रॉक्सी में 'खजांची' पिक्चर देखी थी,आज भी मुझे यह याद है। घर में कोई न रहने वह मुझे अपने ऊपर बैठाती। पलंग पर चित सोती। मुझे जाँघे दबाने को कहती। ऐसे समय वह साड़ी ऊपर सरका लेती। उसके केले के पेड़ के गूदे सी जाघें दबाते समय मेरे मन में एक अजीब-सी बैचैनी उठती।वैसे मेकी उम्र बहुत छोटी थी।परन्तु यह सब देखकर भीतर बड़ी उथल-पुथल मचती।" ( 47)
एक अन्य जगह समलैंगिक कामुकता का प्रसंग आता है,लिखा है ,"तालुके के स्कूल में सोते वक्त एक घटना घटी। आज भी ऐसा लगता है,ज्यों मेरे शरीर पर छिपकली रेंग रही है। गाँव का गोरा-चिट्टा मराठे का लड़का मेरे पास ही सोता था। एक रात अचानक मैं नींद से जागा। वह लड़का मेरे लिंग से कुछ हरकत कर रहा था। अलबत्ता उस दिन मेरी चड्डी गीली हो गयी।मुझे भी मजा आया। पर बाद में मुझे झिझक होती। कुछ गलत,गन्दा काम मेरे हाथों हो रहा है-यह सोचकर बैचैन हो उठता। इसके बाद मैंने अपने सोने की जगह बदल दी।"(76)
इस तरह के प्रसंगों को कैसे पढ़ा जाए ? इसे अवचेतन के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। असल में दलित और स्त्री रचनाओं में कामुकता और जातिभेद के बीच में साझा संदर्भ तत्व है शरीर। शरीर के बहाने कामुकता और शरीर के बहाने ही दलित दाखिल होता है। दलित का शरीर विमर्श मूलतः दलित के सामाजिक इतिहास को खोलने में मदद करता है। शरीर मर्द का हो या स्त्री का उसका बार-बार आना और नए विमर्श की ओर लेजाना,अपने आपमें नयी बात है।
    दलित के सभी विमर्श शरीर की विभिन्न प्रस्तुतियों और विभिन्न सामाजिक अवस्थाओं की प्रस्तुतियों को सामने लाते हैं। दलित शरीर के बिना उसकी सामाजिक हकीकत सामने नहीं आती। उपरोक्त प्रसंग कामुकता के हैं लेकिन इन सभी प्रसंगों में कामुकता के बारे में औरतें कम और मर्द ज्यादा बोल रहा है। यही स्थिति शरणकुमार लिंबाले की कृति ' देवता आदमी' (1994)कहानी संकलन में शामिल कहानियों में भी देखी जा सकती है। इस संकलन में एक कहानी है 'भीतर-बाहर बलात्कार' ,इसमें पीड़िता का नाम है बायडी,उसके साथ बलात्कार की घटना होती और पूरी कहानी में अन्य लोग उस घटना के बारे में बताते हैं,बायडी ने काफी मुश्किल से अपनी बात रखते हुए कहा, '' जी,हाँ, मेंबर ने मुझपर बलात्कार किया। मैं बहुत रोई ,पैंरों पड़ी,लेकिन उसने मुझे नहीं छोड़ा। ' मैंने तुम्हें काम पर लगाया है।मुंसिपैलिटी की जगह पर झोपड़ी बनाने की इजाजत दी है। इसका कुछ अहसान मानती है कि नहीं ?'  कहते हुए उसने मुझे डाँटा ,तब मंचुप बैठ गई।" (137)
    इस तरह के विवरण और ब्यौरे इस बात की सूचना देते हैं कि भारतीय समाज में जातिभेद और उत्पीड़न को छिपाने की चतुर कोशिशें होती रही हैं। इन संदर्भों से यह बात भी निकलती है कि दलित उत्पीड़न के मामलों में ,खासकर शारीरिक शोषण के मामलों में औरतें कम और मर्द ज्यादा बोलते रहे हैं। मध्यकाल और कालांतर में आधुनिककाल में भी दलित औरतों के शारीरिक शोषण को छिपाने की तमाम कोशिशें हुई हैं। इधर की रचनाओं में शारीरिक शोषण का खुलासा होने से दलित और कामुकता का अन्तर्ग्रथित संबंध सामने आया है। इस तरह की प्रस्तुतियों में अवचेतन में स्थित हीनताबोध उभरकर सामने आया है। यह दलित मूल्यांकन के लिए सबसे कठिन चुनौती भी है।    

















शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

अठारह सौ सत्तावन का विद्रोह और तवाइफें-लता सिंह


इतिहास, मुकाबले का एक खास मैदान बनकर सामने आता है। यह उन तबकों के लिए खास तौर पर सच है जो समाज के हाशिए पर रहे हैं। इस तरह, इसकी कोशिशें की जाती रही हैं कि लंबे अर्से से अदृश्य बनाकर रख दिए गए आम लोगों की आवाज को, इतिहास में उभारकर सामने लाया जाए। शायद, महिलाओं की आवाजें सुनने के लिए तो अतीत का बाकायदा उत्खनन ही करना पड़ेगा। इस तरह का श्रम तब तो खास तौर पर जरूरी हो जाता है, जब उन नाचने-गाने वाली तवाइफों की भूमिका का सवाल आता है, जो 1857 के विद्रोह के साथ जुड़ी रही थीं।
समाज और इतिहास से निर्वासित
याद रहे कि किस्सा उन महिलाओं का है जिन्हें 'भोंडा', 'अश्लील', 'जरूरत से ज्यादा मुखर', 'नैतिक रूप से पतित', 'कामुक' आदि-आदि बताया जाता था। ये ऐसी महिलाएं थीं, जिन्हें सार्वजनिक दायरे तक कहीं ज्यादा पहुंच हासिल थी और जो अपेक्षाकृत स्वतंत्र थीं। इस तरह वे अचल सामाजिक संरचनाओं के बाहर थीं और जाति, वर्ग और लिंग की सुस्थापित संबंध व्यवस्थाओं या एक तयशुदा दायरे के साथ बंधी हुई नहीं थीं।
इसी का नतीजा था कि उन्हें 'भीतरघाती' माना जाता था और समझा जाता था कि उनसे स्थापित व्यवस्था के लिए खतरा है। सच तो यह है कि इतिहास के विषय में रूप में इन महिलाओं को देखने भर से, मध्यवर्ग की 'सम्मानित' व्यवस्था 'अस्थिर' हो जाती है। शायद इसीलिए 1857 के विद्रोह के विवरणों में तवाइफें प्राय: अदृश्य ही हो गई हैं। राष्ट्रवादी इतिहास लेखन में एक सम्मानित 'राष्ट्र' के अपने ढांचे से उन्हें पूरी तरह से बाहर ही रखकर, उनकी इस रचनात्मक भूमिका को या तो नकार ही दिया है या फिर मिटा दिया है।
आखिरकार, महिलाओं का सार्वजनिक मनोरंजनकर्ताओं और पुरुषों की लालसा के केंद्र के रूप में सामने आना, अंगरेजी में शिक्षित अभिजात वर्ग के हित में नहीं पड़ता था। उन्हें तो इन तवाइफों के प्रति-आदर्श के तौर पर, सुगृहिणी की छवि ही ज्यादा प्रिय थी। इसीलिए, तवाइफों को 'वेश्या' के रूप में कलंकित स्टीरियोटाइप किया जाता था।
इस टिप्पणी में हम कला का प्रदर्शन करने वाली महिलाओं के समुदायों में से एक, तवाइफों की भूमिका का जिक्र करेंगे। यह ऐसा समुदाय है जो नाचने-गाने के पेशे में लगा हुआ था। तवाइफ शब्द ने बेशक वक्त गुजरने के साथ जन-मानस में एक नैतिकवादी अर्थध्वनि प्राप्त कर ली है। सच तो यह है कि 'वेश्या' के साथ खड़े किए जाने की वजह से इन महिला कलाकारों को खामोश हो जाने पर मजबूर कर दिया गया। जब भी उन्होंने अपनी आवाज उठाई, उन्हें उदार मिथकों के सहारे अपना पुराविष्कार करना पड़ा, ताकि अपने स्वाभिमान को पुख्ता कर सकें, जिसे उनके 'पतित' और 'खतरनाक' औरत होने का बार-बार जिक्र किए जाने ने कमजोर किया था। दुर्भाग्य से इन महिलाओं के लेखन में से शायद ही कुछ बच पाया होगा, जबकि उन्हें अपने समय की सबसे शिक्षित महिलाएं माना जाता था। जाहिर है कि इनके मामले में विद्वानों और इतिहासकारों की चुप्पी ने, इन महिलाओं की चुप्पी को और गहरा किया है। इस तरह, एक पूरे के पूरे पेशे को ही ऐतिहासिक स्मृति से मिटा दिया गया है, जिसके साथ अनेक सार्वजनिक दायरे में सक्रिय महिलाएं जुड़ी हुई थीं। विडंबना यह है कि नारीवादी विद्वानों तक के लेखन में भी ये महिलाएं अदृश्य ही बनी रही हैं।
उपनिवेशविरोधी संघर्ष में भूमिका
1857 के विद्रोह में तवाइफों की भूमिका की पड़ताल करते हुए इस टिप्पणी में औपनिवेशिक इतिहास के इन 'निर्बंध' तत्वों की जगह फिर से खोजने और साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में उनकी जगह और भूमिका को फिर से स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। इसमें शक नहीं कि इससे विद्रोह के इतिहास लेखन में एक महत्वपूर्ण पहलू जुड़ेगा। यह इतिहास लेखन इन महिलाओं को अदृश्य बनाए जाने की कोशिशों का शिकार है। इस विद्रोह के 'साधारण विद्रोहियों' का अध्ययन, विद्रोह में पुरुषों की हिस्सेदारी पर ही केंद्रित बना रहा है। रानी लक्ष्मीबाई जैसे अपवादों को छोड़कर विद्रोह के संबंध में पूरी की पूरी चर्चा में, उसमें साधारण महिलाओं की भागीदारी पर शायद ही कोई रोशनी पड़ती होगी। इसके चलते, तवाइफों की भूमिका का अध्ययन ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है। ऐसा इसलिए और भी ज्यादा है कि ऐसे ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद हैं जो दिखाते हैं इन तवाइफों में से कुछ ने राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी, हालांकि इतिहास लेखन की मुख्यधारा में इनकी राजनीतिक आवाज को अदृश्य ही कर दिया गया है।
इस टिप्पणी में हम 1857 के दौरान, कानपुर में ऐसी ही एक तवाइफ, अजीजुन की भूमिका की चर्चा करेंगे। कानपुर इस विद्रोही धावे के मुख्य केंद्रों में से एक था। विद्रोहियों ने कानपुर की छावनी पर धावा बोला था और आगे चलकर उस पर कब्जा कर लिया था। 27 जून 1857 को विद्रोहियों ने सतीचौरा घाट पर सार्वजनिक रूप से 300 से ऊपर अंगरेज औरतों, मर्द और बच्चों को मौत के घाट उतारा था। इसके बाद 15 जुलाई को बीबीघर में सुरक्षित औरतों और बच्चों के एक ग्रुप को मौत के घाट उतारा गया था।
कानपुर में विद्रोह की कथा की पुनर्रचना करने में एक बड़ी कठिनाई सामग्री के स्रोतों की कमी रही है। वास्तव में यहां विद्रोह के संबंध में प्राथमिक स्रोत के रूप में मुख्यत: औपनिवेशिक विवरण ही बचे हैं। इन प्राथमिक स्रोतों में विद्रोह के बीच से बच रहे अंगरेजों द्वारा लिखे गए समकालीन विवरण, अंगरेजों के वफादारों की डायरियां और सरकारी रिपोर्टों के तौर पर ब्रिटिश अधिकारियों के वक्तव्य आदि मुख्य हैं। सामान्य अपेक्षा के विपरीत, इन औपनिवेशिक विवरणों को ही हमें पढ़ना होगा।
अजीजुन की कहानी
बहरहाल, इस प्राथमिक स्रोत सामग्री से गुजरते हुए एक बात जो खास तौर पर हैरानी की लगती है, वह यह है कि मुख्यधारा के इतिहास लेखन में इस तरह की औरतों को अदृश्य करने के तमाम प्रयासों के बावजूद, विद्रोह के अधिकांश औपनिवेशिक विवरणों में अजीजुन का नाम देखने को मिलता है। यहां तक कि उसका जिक्र वीडी सावरकर के तथाकथित राष्ट्रवादी लेखन में और एस.बी. चौधुरी जैसे राष्ट्रवादी इतिहासकारों की कृतियों तक में देखने को मिलता है। इस तमाम लेखन में उसकी भूमिका के लिए और खास तौर पर 'राष्ट्र की स्वतंत्रता' के लिए उसके संघर्ष के लिए, अजीजुन को सराहा गया है।
विद्रोह के अधिकांश विवरणों में विद्रोहियों के साथ अजीजुन के लड़ने का जिक्र आता है। उसके संबंध में बताया जाता है कि वह पुरुष वेश में घोड़े पर सवार होकर और तमगों से सजकर और पिस्तौलों से लैस होकर निकलती थी। ऐसा लगता है कि कानपुर में जिस रोज नाना साहेब की शुरुआती जीत की खुशी में झंडा फहराया गया था, वह उसी दिन जुलूस में शामिल हुई थी। कानपुर में अजीजुन का नाम लोगों की स्मृति में आज भी जिंदा है। अभी पिछले ही दिनों एक अखबार की रिपोर्ट में बताया गया था कि किस प्रकार कानपुर के लोगों ने एक सड़क का नाम अजीजुन के नाम पर रखने की मांग की है।
अजीजुन कानपुर में लुरकी माहिल में, ओमारू बेगम की कोठी में रहती थी। उसकी मां एक तवाइफ थी, जो लखनऊ में रहती थी। ऐसा माना जाता है कि 1832 में जन्मी अजीजुन के सिर से मां का साया काफी कम उम्र में ही उठ गया था और लखनऊ के शतरंजी महल में एक तवाइफ के घर पर ही उसका पालन-पोषण हुआ था। ऐसा माना जाता है कि अजीजुन, उस जमाने में संस्कृति के प्रमुख केंद्र माने जाने वाले लखनऊ शहर को छोड़कर, जहां तवाइफों की कद्र करने वाले बहुत थे, कानपुर में आ बसी थी। यह स्पष्ट नहीं है कि वह लखनऊ को छोड़कर कानपुर क्यों गई थी, जो बुनियादी तौर पर बाजारों का और फौजी छावनी का शहर था।
प्राथमिक स्रोत सामग्री के अभाव में हम अन्य साहित्यिक कृतियों के सहारे कुछ अनुमान ही लगा सकते हैं। ऐसी ही एक रचना, रुसवा की कृति उमराव जान है। उमराव जान भी एक तवाइफ है, जो लखनऊ से कानपुर आने के बाद, अपने अनुभव सुनाती है। उमराव इसका जिक्र करती है कि किस तरह कानपुर में वह नाच-गाने के अपने प्रदर्शन में व्यस्त थी और अच्छा पैसा कमा रही थी। बेशक, वह इसका भी जिक्र करती है कि किस तरह उसे कानपुर के लोगों का बोलचाल का तरीका पसंद नहीं था और लखनऊ की यादें उसका पीछा नहीं छोड़ती थीं। फिर भी वह इससे खुश थी कि कानपुर में आकर वह खुद मुख्तार हो गई थी, जबकि लखनऊ में ऐसा संभव नहीं था और उसे किसी खानम के नीचे पेशा करना पड़ता, जो तवाइफों के श्रेणी विभाजन में उससे ऊपर होती। इससे ऐसा लगता है कि अजीजुन के कानपुर आने का एक संभावित कारण यह रहा हो सकता है कि उसके मन में स्वतंत्रता की जबरदस्त इच्छा थी। ऐसा लगता है कि वह किसी के संरक्षण में नहीं रहना चाहती थी, जिसका पता उसके व्यक्तित्व से चलता था, जिसकी अभिव्यक्ति 1857 के विद्रोह में उसकी भूमिका में हुई थी।
लड़ाइयों में सिपाहियों के साथ
अजीजुन का सैकेंड कैवेलरी के सिपाहियों से बहुत नजदीकी रिश्ता था, जो अकसर उसके घर आया-जाया करते थे। सैकेंड कैवेलरी के सिपाही शम्सुद्दीन खान के साथ खास तौर पर उसके घनिष्ठ संबंध थे, जिसने विद्रोह में एक सक्रिय भूमिका अदा की थी। विद्रोहियों की बैठकें उसके घर पर हुआ करती थीं। शम्सुद्दीन अकसर अजीजुन के घर आया-जाया करता था। कानपुर में विद्रोह से संबंधित ज्यादातर विवरणों में इसका जिक्र आता है कि वहां विद्रोह शुरू होने से दो दिन पहले, शम्सुद्दीन खुद अजीजुन के घर गया था और उसने अजीजुन को बताया था कि एक-दो दिन में नाना साहब शासन संभाल लेंगे और उसके बाद उसका घर सोने की मोहरों से भर जाएगा। अजीजुन का घर सिपाहियों का मिलन स्थान भी था। अजीजुन ने औरतों का एक दल भी बनाया था जो हिम्मत के साथ हथियारबंद सिपाहियों को बढ़ावा देता हुआ घूमता था, उनके घावों की मरहम-पट्टी करता था और उनके बीच हथियार और गोला-बारूद बांटता था। अजीजुन ने एक तोपखाने को अपने दल का मुख्यालय बनाया था। यह तोपखाना, व्हीलर जिस जगह जमा हुआ था उसके उत्तर की ओर, रैकट कोर्ट और चैपल ऑफ ईंज के बीच में स्थित था। घेरे के पहले दिन से ही इस तोपखाने की तरफ से व्हीलर के फौजी जमावड़े पर गोलियां और गोले दागे जाते रहे थे। व्हीलर की फौजों के घेरे के करीब-करीब पूरे दौर में अजीजुन सिपाहियों के बीच ही बनी रही थी। एक प्रत्यक्षदर्शी द्वारा दिए गए विवरण के अनुसार वह भारी गोलाबारी के बावजूद, पिस्तौलों से लैस बराबर अपने संगियों के साथ बनी रही थी। सैकेंड रेजीमेंट के कैवेलरी के सिपाही ही उसके संगी थी।
ऐसा लगता है नाना साहब और अजीमुल्ला खान, दोनों ही अजीजुन को पहचानते थे। ऐन मुमकिन है कि उसे विद्रोह की योजना की जानकारी रही हो और वह कानपुर में विद्रोह के प्रमुख षडयंत्रकारियों में से रही हो। इस तरह की भी अटकलें लगाई जाती रही हैं कि बीबीघर में ब्रिटिश औरतों और बच्चों को मौत के घाट उतारने के 'षडयंत्र' में भी उसकी भूमिका रही थी। लेकिन, विद्रोह के अधिकांश विवरणों में बीबीघर की घटना के सिलसिले में हुसैनी नाम की एक और तवाइफ का नाम ज्यादा प्रमुखता से आता है। हुसैनी पर ही इसका संदेह किया जाता रहा है कि उसी ने बीबीघर में औरतों और बच्चों की हत्या किए जाने के आदेश दिए थे।
विद्रोह में अजीजुन जैसी औरतों की भूमिका की सैकड़ों कहानियां मिलेंगी। लेकिन, इनमें से ज्यादातर कहानियां दर्ज हुए बिना ही रह गई हैं। मिसाल के तौर पर लखनऊ में विद्रोह के 'गुप्त' और 'उदार आर्थिक मददगारों' के रूप में उनकी भूमिका दर्ज की गई थी। ब्रिटिश अधिकारियों को मालूम था कि उसके कोठे विद्रोहियों के मिलन-स्थल बने हुए थे, जहां विद्रोह के मंसूबे बनाए जाते थे। इसी का नतीजा था कि कोठों को राजनीतिक षडयंत्र के ठिकानों के तौर पर संदेह की नजरों से देखा जाने लगा था। वास्तव में 1857 के विद्रोह में तवाइफों की भूमिका का अंदाजा, इनमें से कुछ महिलाओं के खिलाफ ब्रिटिश अधिकारियों की दंडात्मक कार्रवाई की भीषणता से लगाया जा सकता है। इन कार्रवाइयों में बड़े पैमाने पर उनकी संपत्तियों की जब्ती भी शामिल थी। लखनऊ में, जो कि तवाइफों का एक प्रमुख केंद्र था, 1857 के विद्रोह में प्रमाणित हिस्सेदारी के लिए, जिन लोगों की संपत्तियां जब्त की जा रही थीं, उनकी सूचियों में अनेक तवाइफों के नाम भी शामिल थे। रुस्वा की कथा उमराव जान में भी इसका जिक्र है कि किस तरह विद्रोह के बाद उमराव को लखनऊ छोड़कर जाना पड़ा था और किस तरह उसकी कोठी को लुटवाया गया था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अठारह सौ सत्तावन के विद्रोह में तवाइफों की भूमिका को हम किस तरह समझ सकते हैं? इसमें एक महत्वपूर्ण कारक नवाबों के साथ उनका घनिष्ठ रूप से जुड़ा होना हो सकता है। नवाब ही तवाइफों के सबसे बड़े संरक्षक हुआ करते थे। नवाब अकसर अंगरेजों के
खिलाफ थे, क्योंकि औपनिवेशिक शासन ने उनकी सत्ता को कमजोर कर दिया था। फिर भी, विद्रोह में तवाइफों की हिस्सेदारी को सिर्फ नवाबों के साथ उनके घनिष्ठ रिश्तों के आधार पर व्याख्यायित नहीं किया जा सकता है। कहने की जरूरत नहीं है कि इस तरह का तर्क इन औरतों की किसी भी प्रकार की स्वतंत्र भूमिका या राजनीतिक आवाज को ही वंचित करने वाला तर्क है। यह समझना मुश्किल नहीं है कि चाहे नवाबों के संरक्षण में ही क्यों न रही हों, तवाइफों के लिए विद्रोह में हिस्सा लेने की कोई मजबूरी नहीं थी। मिसाल के तौर पर अजीजुन चाहती तो विद्रोह से दूर ही बनी रह सकती थी, क्योंकि विद्रोह में हिस्सेदारी वैसे भी काफी जोखिम भरी कार्रवाई थी। इतना ही नहीं, विद्रोह में हिस्सेदारी के लिए उसे किसी तरह से मजबूर किए जाने या उस पर किसी तरह का दबाव होने के, कोई लक्षण तो नहीं नजर आते हैं। वास्तव में अजीजुन तो उस दौर में किसी के भी संरक्षण में थी ही नहीं। वह तो कानपुर में रहती थी और स्वतंत्र रूप से अपना कोठा चलाती थी। इसलिए, 1857 के विद्रोह में तवाइफों की हिस्सेदारी के कारण समझने के लिए, हमें उसके ऐतिहासिक संदर्भ की पड़ताल करनी होगी।
अंगरेजों ने जब भारतीय उप-महाद्वीप में स्थानीय शासकों को हटाकर उनकी जगह लेनी शुरू की, उससे पहले तक यहां मौजूद हिंदू और मुसलिम, दोनों ही तरह के शासकों के दरबारों में तवाइफों की प्रभावशाली (महिला) अभिजन के रूप में पहुंच थी। उन्हें 'उन्नत' दरबारी संस्कृति के संरक्षकों और उसकी अदायगी करने वालों के रूप में देखा जाता था, जिनकी हिंदुस्तानी संगीत और कत्थक नृत्य शैली के विकास में सक्रिय भूमिका थी। उन्हें कवियों, विद्वानों, धर्मज्ञों और सबसे बढ़कर प्रतिभाशाली संगीतकारों और नर्तकियों के संरक्षकों के रूप में देखा जाता था। उन्हें दरबार में और समाज में भी, भारी सम्मान हासिल था और उनके साथ जुड़ाव से उन लोगों की प्रतिष्ठा ही बढ़ती थी, जिन्हें उनके सांस्कृतिक प्रदर्शनों में आमंत्रित किया जाता था।
बहरहाल, ब्रिटिश सत्ता के आने के साथ, तवाइफों की सांस्कृतिक सत्ता घट गई थी। अंगरेजी राज का नतीजा यह हुआ था कि उन्हें शाही दरबारों से हासिल संरक्षण में भारी कमी आ गई थी, जबकि यही उनकी सत्ता का मुख्य आधार था। ब्रिटिश शासन उनके कलात्मक और रचनात्मक पहलू की अनदेखी करता था और उसने तवाइफों के कोठों और चकलाघरों को एक करके देखना शुरू कर दिया था। इतना ही नहीं, औपनिवेशिक दौर में तवाइफों की सांस्कृतिक पहचान पर प्रतिकूल असर पड़ रहा था। यूरोपीय सैनिक जिन यौन रोगों से पीड़ित थे, उनके फैलाव पर नियंत्रण हासिल करने के लिए ब्रिटेन ने 1864 में संचारी रोग कानून जैसे जो चिकित्सकीय कानून बनाए थे, उनमें तवाइफों को वेश्याओं के खाने में ही डाल दिया गया था। इसका अर्थ यह था कि वेश्याओं के लिए जो नियमन, नियंत्रण और जांच की व्यवस्थाएं कायम की गई थीं, तवाइफों को भी उनके दायरे में घसीट लिया गया।
असंतोष और राजनीतिक भूमिका
दरबारी संरक्षण छिन जाने, इस तरह के नियमनों और आगे चलकर 1857 के विद्रोह में भूमिका के लिए उनसे वसूल किए गए जुर्मानों आदि से, तवाइफों की हैसियत को भारी धक्का लगा था। यह एक भव्य सांस्कृतिक संस्था के धीरे-धीरे पतित होने का संकेतक बन गया और यह संस्था एक साधारण वेश्यावृत्ति में घटकर रह गई। औपनिवेशिक सरकार ने तवाइफों को नवाबों द्वारा दी गई ज्यादातर जागीरों को अपने हाथों में ले लिया। इतना ही नहीं, उसने तवाइफों से जोड़कर, परंपरागत रईसों को 'दुराचारी' और 'अनैतिक' के रूप में प्रचारित करने की कोशिश की थी। यह दूसरी बात है कि जब इन्हीं औरतों को यूरोपीय छावनियों में वेश्याओं के रूप में इस्तेमाल करने का सवाल आया या उनसे आयकर बटोरने का सवाल आया, तो पूरी तरह से व्यवहारवादी बनकर अंगरेजों ने सारे नैतिक आवरण उतारकर रख दिए और इन स्वार्थों को पूरा करने के लिए जरूरी कानून बनाने में कोई कोताही नहीं की। वास्तव में यह तो एक तरह से सरकारी नीति का हिस्सा ही बन गया था कि कोठे की औरतों में से जो 'स्वस्थ' और 'सुंदर' हों, उन्हें छांटकर अलग किया जाए और मनमर्जी से, यूरोपीय सैनिकों की सहूलियत के हिसाब से, छावनियों में उन्हें लाया जाए। इसने उनके पेशे को अमानुषिक बनाया और उनकी सांस्कृतिक भूमिका उनसे छीन ली। इससे भी बढ़कर उन्हें पुरुषों को सहज उपलब्ध बना दिया और इन औरतों के लिए सिपाहियों से संचारी यौन रोग लगने का खतरा और बढ़ गया। सारे विशेषाधिकारों से वंचित कर दी गई तवाइफें अपने शरीर पर, अपनी संपत्ति पर और अपनी 'नैतिकता' पर हमले के खिलाफ लड़ रही थीं। दूसरे शब्दों में, तब से लेकर आज तक अपनी वैधता के लिए और एक पेशेवर समूह के रूप में कुछ ठोस लाभ हासिल करने के लिए, उनकी लड़ाई चल ही रही है।
फिर भी, 1857 के विद्रोह में तवाइफों की भूमिका की व्याख्या करते हुए, ब्रिटिश शासन के प्रति उनके आक्रोश को बहुत ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर भी नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि ऐसा करना उनकी राजनीतिक भूमिका को ही अनदेखा करना होगा। इसकी जगह पर, रेखांकित करने वाली बात यह है कि अंगरेजी हुकूमत के प्रति तवाइफों के वही मनोभाव थे, जो मनोभाव 1857 के विद्रोह में शामिल हुए दूसरे बहुत से लोगों के थे। वास्तव में, उस समय के समाज में प्रतिभाशाली और शिक्षित महिलाओं की अपनी-अपनी हैसियत के चलते तवाइफें समसामयिक राजनीति, कानून आदि से भली भांति परिचित थीं और स्थानीय सत्ताधारी अभिजन के साथ उनके संपर्क थे। इसके अलावा, वे जहां रहती थीं उन शहरी ठिकानों के इतिहास का भी उन्हें अच्छा ज्ञान था। इसने तवाइफों को राजनीतिक रूप से जागरूक बनाया था। मिसाला के तौर पर तवाइफें अच्छी तरह यह समझती थीं कि ब्रिटिश हुकूमत ने जानबूझ कर उनके कोठों की सचाइयों को तोड़ा-मरोड़ा था ताकि

नवाबी संस्कृति को बदनाम किया जा सके, और इसके पीछे मंशा यह थी कि 1856 में अवध के हड़पे जाने को सही ठहराया जाए।
इस टिप्पणी में हमने तवाइफ की सार्वजनिकराजनीतिक भूमिका की पड़ताल करने की कोशिश की है। इसके लिए हमने तवाइफ के व्यक्तित्व को, केंद्रीय रूप से राजनीतिक मंच पर रखकर देखने का प्रयास किया है, जिससे उसे अब तक वंचित करके रखा जाता रहा है। 'सम्माननीय' की अपनी तलाश में राष्ट्रवादी लेखन उसे आंखों से ओझल करके चलता आया है। वास्तव में अजीजुन जैसी औरतों की जिंदगी, जो राष्ट्रवादी इतिहासकारों के लिए सारभूत प्रेरणादायी दो नारी छवियों'सम्मानित मां' और 'सम्मानित पत्नी'में किसी भी खाने में फिट नहीं बैठती है, 1857 के विद्रोह पर प्रभुत्वशाली पूंजीवादी राष्ट्रवादी रुख को ही संकट में डालने पर आमादा नजर आती है। अजीजुन का यह बागी किस्सा 'भारत माता' के उस रूपक को छिन्न-भिन्न कर देता है, जो उपनिवेशविरोधी (मध्यवर्गीय) राष्ट्रवादी सोच पर हावी रहा है।


गुरुवार, 18 नवंबर 2010

18 नवम्बर 2010 दर्शन दिवस पर विशेष- इतिहास का अंत

                          
       (यूनेस्को के द्वारा प्रतिवर्ष नवम्बर के पहले तीसरे गुरूवार को दर्शन दिवस मनाया जाता है। इस दिन यह मौका 18 नवम्बर को पड़ रहा है। इस मौके पर दर्शन के गंभीर और महत्वपूर्ण सवालों पर सारी दुनिया में और खासकर यूनेस्को के पेरिस स्थित मुख्यालय में विचार विमर्श होने जा रहा है। इस अवसर पर हम उत्तर आधुनिकतावाद से जुड़े कुछ प्रमुख सवालों पर पुनर्विचार करेंगे ,यहां 'इतिहास का अंत'  सवाल पर रोशनी ड़ाली गयी है)  
     उत्तर आधुनिकतावाद के अवसान की बेला में उसकी ओर एकबार देख लेना,उसका पुनर्पाठ कर लेना समीचीन होगा। वे कौन से मुद्दे थे जो विवाद के केन्द्र में रहे और अंत में हम उन पर विवाद करते हुए कहां पहुँचे ? उत्तर आधुनिकतावाद में कुछ बातें साझा हैं जिन पर सहमति है,वे हैं- उत्तर आधुनिकतावाद का संचार क्रांति से गहरा संबंध है। कम्प्यूटर केन्द्रित संचार क्रांति सामाजिक-आर्थिक और डिजिटल असमानता पैदा करती है। उत्तर आधुनिकतावाद ने संशय,अविश्वास और बेगानेपन को बुलंदियों पर पहुँचाया है। राजनीति से लेकर संस्कृति और मासकल्चर से लेकर लोकसंस्कृति को ग्लोबल-लोकल (ग्लोकल) बनाया है।
     उत्तर आधुनिकतावाद एक्शन में लोकल है नीति में ग्लोबल है।  साहित्य की भाषा, शैली आदि के मामले में लोकल है अंतर्वस्तु और विवाद के विषयों में ग्लोबल है। फिसलन, विपर्यय और मूल्यगत प्रतिगामिता इसके प्रमुख फिनोमिना हैं।  
   उत्तर आधुनिकतावाद किसी भी देश में स्वाभाविक रूप में विकसित नहीं हुआ। यह निर्मिति है। इसकी भाषा,विषयवस्तु,मुहावरे,नारे,विचार,विमर्श आदि सब कुछ संस्कृति और संचार उद्योग की निर्मिति हैं। इसका अमेरिकी विदेशनीति से गहरा संबंध है। उत्तर आधुनिकतावाद को अमेरिकी विदेश नीति से काटकर नहीं पढ़ा जा सकता। यही वजह है कि उत्तर आधुनिकतावाद राजनीतिक है।  
इतिहास का अंत-
         उत्तर आधुनिकों ने बार-बार ‘इतिहास के अंत’ का नारा दिया है। इसके पक्ष-विपक्ष में बहुत कुछ लिखा गया है। पहली बात यह कि इतिहास का किसी भी रूप में अंत संभव नहीं है। हम इतिहास को न मानें इससे इतिहास का अंत नहीं होता। इतिहास के नियम व्यक्तियों और संस्थानों की शक्ति के बाहर सक्रिय रहते हैं।
     इतिहास हमारे बीच में प्रतीक रूप में बना रहता है। वह कभी दिखता है कभी नहीं दिखता। लेकिन प्रतीक के रूप में इतिहास रहता है। प्रतीक जिस तरह अपना अर्थ नहीं खोते इतिहास भी अपना अर्थ नहीं खोता। इतिहास के अंत की जो घोषणा कर रहे हैं वे असल में ‘इतिहास’ की एक विषय के  रूप में अंत की बात नहीं कह रहे हैं ,बल्कि प्रतीक रूप में इतिहास के अंत की बात कह रहे हैं।
    इतिहास का एक संदर्भ मूल्य है और वह किन्हीं खास ऐतिहासिक परिस्थितियों में ही अवस्थित होता है। बौद्रिलार्द के अनुसार परिस्थितियां ऐसी बन गयी हैं जिनमें ऐतिहासिक परिस्थितियों खत्म हो गयी हैं। ऐतिहासिक परिस्थितियों के अभाव में इतिहास अनुपस्थित रहेगा। प्रतीक नहीं होगा। सिर्फ प्रतिकृति या नकल होगा।
    ऐतिहासिक परिस्थितियों के अवसान को देखने वाले उत्तर आधुनिकतावादी यह भूल गए कि ऐतिहासिक परिस्थितियों के गायब हो जाने की धारणा के प्रचार से वे गायब नहीं हो जातीं,सिर्फ उत्तर आधुनिक विचारकों ने ऐतिहासिक परिस्थितियों को देखना बंद कर दिया था।
      कोई भी चीज रूपान्तरणकारी तब ही होती है जब वह ऐतिहासिक परिस्थितियों से गुजरती है। ऐतिहासिकता के बिना प्रत्येक चीज,वस्तु,घटना,फिनोमिना आदि खोखले होते हैं। इतिहास को प्रतीकों में एक प्रतीक के रूप में नहीं देखना चाहिए।  वह सिर्फ प्रतीक मात्र नहीं है उसके पास अंतर्वस्तु भी होती है। जो किसी भी प्रतीक को संदर्भ और निश्चित सांस्कृतिक अर्थ प्रदान करती है। ऐतिहासिक परिस्थितियां सांस्कृतिक मूल्य और संस्थान को अर्थ प्रदान करती है।
     जैसे प्रेम और शादी, ये सिर्फ औपचारिकता मात्र नहीं हैं। बल्कि इसके विभिन्न समाजों में भिन्न अर्थ हैं। प्रेम और शादी का एक सांस्कृतिक अर्थ है यह विभिन्न समाजों में अलग किस्म के संस्कारों ,सांस्कृतिक अभ्यास और आचार-व्यवहार पर आधारित है। इसके आधार ही ये दोनों चीजें सांस्कृतिक अर्थ प्राप्त करती हैं।
     यदि ‘इतिहास का अंत’ हो गया है तो कबीर की कविता महज कविता की संरचना मात्र रह जाएगी। उसमें निहित मूल्य और भावबोध का लोप हो जाएगा ,लेकिन ऐसा संभव नहीं है। प्रत्येक रचना का मूल्य उसमें निहित रहता है। रचना उस मूल्य से ऐतिहासिक तौर पर अलग नहीं कर सकती। कबीर की कविता से उसका मूल्य निकाल देंगे तो कविता खत्म हो जाएगी।  
   मनुष्य है तो उसका इतिहास और मूल्य भी उससे जुड़े हैं। रचना का रूप उसके अस्तित्व के कारकों से अभिन्न रूप से जुड़ा है। आप कबीर की नयी व्याख्या कर सकते हैं ,उसकी कविता पर फिल्म बना सकते हैं,नृत्य तैयार कर सकते हैं,संगीत तैयार कर सकते हैं,वर्चुअल फिल्म बना सकते हैं। लेकिन कबीर को मूल्यहीन नहीं बना सकते। कबीर का लोप नहीं कर सकते। उसे नयी चीजों के उदय के साथ जोड़कर सजा सकते हैं लेकिन यह नहीं कह सकते कि कबीर मूल्यहीन हो गए हैं। कबीर के नए किस्म के पाठ को बना सकते हैं ,उसकी नए किस्म की रीडिंग के तरीके इजाद कर सकते हैं। इससे कबीर का सौंदर्यबोध बढ़ेगा।
      प्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक टेरी इगिलटन के अनुसार ‘‘उत्तरआधुनिकतावाद के कई स्रोत हैं वास्तविक आधुनिकतावाद, तथाकथित उत्तर-उद्योगीकरण, नई शक्तिशाली राजनीतिक शक्तियां, सांस्कृतिक अवांगार्द का पुन: प्रभाव बढ़ना, वस्तु रूप द्वारा सांस्कृतिक जीवन में पैठ, कला के लिए घटता हुआ 'स्वायत्त' स्थान, कतिपय पुराशास्त्रीय बुर्जुआ सिद्धांतों की समाप्ति आदि। लेकिन यह और जो कुछ भी हो, निश्चित ही राजनीतिक पराजय की उत्पत्ति है।’’
   इगिलटन के अनुसार ‘‘उत्तरआधुनिकतावादी संस्कृति ने कलाओं के संपूर्ण क्षेत्र में एक समृद्ध, साहसी और उल्लसित कलाकृति का निर्माण किया है तथा उत्सर्जन-योग्य भावुकता और परिहासपूर्ण कला या साहित्य की एक अच्छी खासी मात्रा का भी सृजन किया है। इसने कई आत्मसंतुष्ट निश्चितताओं के नीचे से आधार हटा दिए हैं, कुछ विक्षिप्त समग्रताओं को कौतूहलपूर्ण ढंग से खोल दिया है, जोशपूर्ण ढंग से बचाकर सुरक्षित रखी कुछ शुद्धताओं को दागदार कर दिया है; कुछ दमनकारी प्रतिमानों को मोड़ा है, और कुछ अपेक्षाकृत मजबूत दिखने वाली बुनियादों को हिला दिया है। इसमें राजनीतिक रूप से अशक्तकारी संदेहवाद, एक भड़कीला जनवाद, ओजपूर्ण नैतिक सापेक्षवाद तथा एक किस्म के वितंडावाद के आगे समर्पण की भी प्रवृत्ति है। इसके लिए हम भी स्वतंत्र दुनिया के उन मूल्यों की पुष्टि कर सकते हैं चूंकि सभी परंपराएं स्वैच्छिक हैं। अपने राजनीतिक विरोधियों की निश्चितताओं के नीचे से आधार हटाने के क्रम में इस उत्तरआधुनिक संस्कृति ने प्राय: अपने ही आधार को हटा दिया है और इसके पास कोई तर्क नहीं रहा है कि हमें फासीवाद का विरोध क्यों करना चाहिए, सिवाय इस कमजोर व्यावहारिक तर्क के कि फासीवाद वह तरीका नहीं जिसके जरिए हम ससेक्स या सैक्रेमेंटो में काम करते हैं। अपने विनोदपूर्ण, पैरोडी भाव से इसने उच्च संस्कृति के भयावह आत्मसंयम को निम्न बना दिया है और इस प्रकार वस्तु रूप के अनुकरण में बाजार स्थल के व्यर्थकारी संयमों को पुन: बहाल करने में सफल रहा है।’’
  टेरी इगिलटन ने आगे लिखा है ‘‘इसने स्थानीय, प्रादेशिक, क्षेत्रीय शक्ति को निर्मुक्त किया है साथ ही साथ विश्व को और अधिक शुष्क समान स्थल बनाने में योगदान दिया है। 'सत्यता' जैसी अवधारणाओं के सम्मुख इसकी घबराहट ने बिशपों (धर्मगुरुओं) को चौकन्ना कर दिया है और व्यावसायिक कार्यकारियों को मोह लिया है। विश्व की यथातथ्य व्याख्या की संभावना से यह लगातार इनकार करता है और उतनी ही निरंतरता से यह अपने आपको ऐसा करते पाता है। यह सार्वभौम नैतिक निर्देशों से परिपूर्ण है, जैसे बहुलता से व्यक्तिपरकता श्रेष्ठ है, समानता से विविधता, एकरूपता से विषमता श्रेयस्कर है और यह इस प्रकार के सभी सार्वभौमवाद को दमनकारी मानकर निंदा करता है। यह एक ऐसे मनुष्य का स्वप्न देखता है जो कानून और बंधन से मुक्त हो, जो एक 'विषय-स्थिति' से दूसरी स्थिति में अस्पष्ट रूप से सरल रहा हो और उस मनुष्य को सांस्कृतिक शक्तियों के एक निश्चित परिणाम से अधिक नहीं मानता है। यह शैली और आनंद में विश्वास करता है और आम तौर पर वैसे पाठ का सृजन करता है जिसका संयोजन कंप्यूटर द्वारा तथा इस पर किया गया हो।’’
    उत्तर आधुनिकों ने मार्क्सवाद पर जमकर हमले किए हैं,समाजवादी व्यवस्था के पराभव को उत्तर आधुनिकता की विचारधारात्मक विजय कहा है। मार्क्सवाद की अप्रासंगिकता को इतनी बार प्रचारित किया है कि इस क्रम में वे स्वयं अपनी प्रासंगिकता से हाथ धो बैठे हैं।
      मार्क्सवादी विचारकों की विशेषता है कि वे उदार पूंजीवाद के बिना मार्क्सवाद की कल्पना तक नहीं कर सकते। इसी प्रसंग में टेरी इगिलटन ने लिखा है कि मार्क्सवादी मानते हैं कि  ‘‘प्रबुद्ध बुर्जुआ उदारवाद की समृद्ध विरासत के बिना कोई प्रामाणिक समाजवाद नहीं हो सकता। उत्तरआधुनिकतावादी बहुलतावाद, परिवर्तन, निष्प्रयोजनता के आत्मघोषित समर्थक हैं फिर भी हमेशा मानववाद, उदारवाद, प्रबोधन केंद्रित विषय तथा शेष की निंदा करते हुए देखे जाते हैं। लेकिन बुर्जुआ प्रबोधन सामाजिक वर्ग के समान है : इससे मुक्ति के लिए पहले आपको इससे होकर मार्ग निकालना होगा। शायद इसी बिंदु पर मार्क्सवाद और उत्तरआधुनिकतावाद के बीच सबसे अधिक अनबन है।’’
       उत्तर आधुनिकों ने बिडंबना पर ज्यादा जोर दिया है लेकिन इस चक्कर में बिडंबना को ही भूल गए। इगिलटन ने उत्तर आधुनिकों की इसी वैचारिक फिसलन पर लिखा है  ‘‘उत्तरआधुनिकतावाद की आंखें विडंबना के प्रति बहुत सजग हैं लेकिन लगता है विडंबना ऐसी है जो इसकी आंखों से भी बच निकली है। ठीक उसी समय जब यह क्रांति के प्रत्यय को 'पराभौतिक' मानकर इसकी निंदा कर रहा था, 'सामूहिक विषय' की धारणा का तिरस्कार कर रहा था और समग्रता के खतरों पर जोर दे रहा था, उन जगहों पर क्रांति आरंभ हो गई जहां इसकी सबसे कम संभावना थी। किसी प्रकार के 'सामूहिक विषय' ने उत्तरपूंजीवादी नौकरशाहों के 'संपूर्ण तंत्र' पर आघात किया था। जाहिर है उस परिवर्तन के वर्तमान परिणाम वे नहीं हैं जिन पर समाजवादी धैर्यपूर्वक विचार कर सकें; लेकिन पूर्वी यूरोप के नाटकीय उथल-पुथल उत्तरआधुनिक पश्चिम की कई नई चलन की पूर्वकल्पनाओं को झुठलाते हैं। जबर्दस्त रूप से अजनबियाने के अंदाज में वे उत्तरआधुनिकतावाद का उदार-पूंजीवादी बुध्दिजीवी वर्ग के विचित्र रूप से थके हुए पराजयवादी समूह की विचारधारा के रूप में पर्दाफाश करते हैं, जिसने गलती से अपनी स्थानीय कठिनाइयों को ठीक सार्वभौमवादी विचारधाराओं, जिनकी यह निंदा करता है, के समान ही सार्वभौम मानवीय स्थिति समझ लिया है। लेकिन यद्यपि इसके पूरब में जो भी हुआ है उससे उत्तरआधुनिकवाद को उपयोगी रूप से 'विमुख' किया गया हो, लेकिन यह निश्चित ही उस पतन से उत्पन्न नहीं हुआ है। उत्तरआधुनिकतावाद साम्यवाद के पराजय (जो कि हर हाल में इससे पहले हुआ) की प्रतिक्रिया कम है। बनिस्बत इसके यह, कम से कम अपने प्रतिक्रियावादी संस्करणों में, पूंजीवाद की 'सफलता' का प्रत्युत्तर है। इसलिए यहां एक और विडंबना है। संकटग्रस्त 1990 के दशक में पूंजीवादी सफलता को प्रकृति का सामान्य और अपरिवर्तनीय नियम मानना कुछ ज्यादा ही अजीब लगता है। यदि यह ठीक उसी प्रकार की गैर ऐतिहासिक निरपेक्षतावाद नहीं, जिसे उत्तरआधुनिकतावादी उग्रता से अस्वीकार करते हैं, तो यह समझना कठिन है कि यह आखिर क्या है।’’
      




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