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शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

जलीकट्टु बर्बरता का महिमामंडन है-

     दुनिया में अनेक देश हैं जहां आज भी बर्बरता का महिमामंडन होता है,इस तरह के देशों में भारत अग्रणी है। जलीकट्टु हमारे देश की बर्बर प्रथाओं में से एक है।इस तरह की प्रथाओं का हमारे समाज में बचे रहना इस बात का प्रतीक है कि बर्बरता को हमारे समाज की स्वीकृति और वैधता हासिल है, हम बर्बरता देखकर दुखी नहीं होते ,गुस्सा नहीं करते, इसके विपरीत हमें बर्बरता के नजारे में मजा आता है,हमारे समाज की तमाशेखोरी की जड़ में इस बर्बरता की भी भूमिका है।
जलीकट्टु की प्रथा का तमिल पहचान से कोई संबंध नहीं है।तमिल पहचान का मतलब यदि बैल और आदमी का युद्ध है तो निश्चित तौर पर इस प्रथा को बहुत पहले ही बंद हो जाना चाहिए।
संयोग की बात है हमारे देश में देवता पूजा है,पशु पूजा है,लेकिन संवेदनाओं की पूजा अर्चना नहीं होती,संवेदनाओं की अनुभूति के मामले में आज भी प्राचीनकाल में पड़े हुए हैं,हमारी संवेदनाएं आज भी आधुनिक नहीं हो पायी हैं,कहने के लिए तमिलनाडु भारत का सबसे विकसित राज्य है लेकिन उसमें नागरिकों में आज भी एक बड़ा वर्ग है जिसके पास आधुनिक संवेदनाएं नहीं हैं।
जल्लीकट्टु पर जो लोग हंगामा कर रहे हैं वे असल में आदिम संवेदनाओं की हिमायत में हंगामा कर रहे हैं।आदिम संवेदनाओं का बचे रहना और मौका पाते ही आदिम वातावरण में जीने की लालसा रखना अपने आपमें समस्यामूलक है।
कायदे से आधुनिककाल में हमें आदिम संवेदनाओं में जीना चाहिए ।लेकिन जलीकट्टु की हिमायत में खड़े युवा और शिक्षित समूह आदिम संवेदनाओं की हिमायत में खड़े हैं। आधुनिक संवेदना की धुरी है न्यायबोध,न कि परंपरा।
भारत में प्रकृति,पशु,मनुष्य आदि के बारे में आज भी आधुनिक संवेदनाएं, न्यायबोध आदि का शिक्षितों में अभाव है,वे आए दिन अपने अतीतप्रेम को विभिन्न रूपों में व्यक्त करते हैं।हमारे समाज में अतीत के रूपों और संवेदनाओं को बचाए रखने में परंपराएं सबसे बड़े रक्षाकवच का काम करती रही हैं।परंपराओं की जरूरत उसी व्यक्ति को होती है जिसके पास वर्तमान का सही ज्ञान नहीं होता और जो न्यायबोध से पलायन करना चाहता है।
असल में जलीकट्टु के नाम पर न्यायबोध से पलायन का चरमोत्कर्ष ही सामने आया है।हमने एक ऐसा मध्यवर्ग तैयार किया है जिसके पास सब कुछ है लेकिन न्यायबोध नहीं है।बिना न्यायबोध के आधुनिकता मूलतःबर्बर होती है,इसे हम खुलेआम अपने जीवन में महसूस करते हैं।
जली कट्टु की प्रथा का विरोध2004 से हो रहा है और इस पर भारत सरकार के पशु कल्याण बोर्ड ने सही कदम उठाते हुए इस प्रथा पर पाबंदी लगाने की मांग करते हुए जो पहल की थी वह एक सही कदम था,कई उतार-चढाव के बाद भी सुप्रीमकोर्ट ने इस प्रथा पर प्रतिबंध जारी रखकर सही काम किया है।यह प्रथा हर हालत में बंद होनी चाहिए।जो लोग इस प्रथा की मांग कर रहे हैं वे अपने लिए वर्चुअल जलीकट्टु खेल बना सकते हैं और घर में बैठकर खेल सकते हैं।
भारत की आयरनी यह है कि यहां पर कोई भी समाजसुधार कानूनी दवाब के बिना लागू नहीं हुआ है,जलीकट्टु पर पाबंदी मूलतः समाजसुधार है।
उल्लेखनीय है समाजसुधार जब भी लागू करने गए हैं तब ही आम जनता के बृहत्तर हिस्सों ने प्रतिवाद किया है,हमारे देश की जनता समाज सुधारों से डरती है,जड़ता में अमरता का आनंद लेती है। जड़ता,परंपरा ये सब आधुनिक विकास के रोड़े हैं इनको हटाना हम सबकी जिम्मेदारी है।

बुधवार, 13 जुलाई 2016

मथुरा के मायने-

     आपकी दशा मैं नहीं जानता,लेकिन अपनी तकलीफ का एहसास मुझे है और यह एहसास ही मुझे बार-बार मथुरा की ओर खींचता है।आमतौर पर शिक्षा के बाद आदत है कि जहां पैदा हुए,पले-बड़े हुए वहां पर नौकरी करना नहीं चाहते,बाहर जाना चाहते हैं।लेकिन मेरा मन हमेशा इस बात से परेशान रहा कि मुझे मथुरा में उपयुक्त काम ही नहीं मिला वरना मैं जेएनयू से पढ़कर मथुरा लौट आता। मुझसे पूछें तो यही कहूँगा कि नौकरी दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी है।नौकरी की तलाश में जब शहर छूटता है तो आपसे बहुत कुछ छूट जाता है।अपने लोग, परिवेश, भाषा,चिर-परिचित संस्कृति आदि आपके हाथ से एक ही झटके में निकल जाते हैं।अधिकतर नौकरीपेशा लोग अपने काम-धंधे में इस कदर मशगूल हो जाते हैं कि इस सांस्कृतिक जमा पूँजी के हाथ से निकल जाने से होने वाली सांस्कृतिक क्षति से अनभिज्ञ रहते हैं।लेकिन आजीविका की तलाश में इस सांस्कृतिक क्षति को हम सबको उठाना पड़ता है।हमारे पास कोई शॉर्टकट नहीं है कि इस क्षति से बच सकें।जन्मस्थान से पलायन एक स्थायी नियति है जिससे आधुनिककाल में पूरा समाज गुजरता है।

मैं मथुरा से जेएनयू पढ़ने के लिए 1979 में निकला तो जानता ही नहीं था कि कभी वापस नहीं लौट पाऊंगा।पढ़ते हुए मन में यही आशा थी कि कहीं मथुरा के आसपास ही नौकरी लग जाएगी और मथुरा से संपर्क-संबंध बना रहेगा।लेकिन बिडम्बना यह कि जैसा चाहा वैसा नहीं घटा।नौकरी की तलाश में ढाई साल तक इधर-उधर दसियों विश्वविद्यालयों में इंटरव्यू दिए।जेएनयू से पढाई खत्म करके निकलने के बाद दि.वि.वि. के दो कॉलेजों में इंटरव्यू देने के बाद तय किया कि कॉलेज में इंटरव्यू नहीं दूँगा और न नौकरी करूँगा।यही वजह थी कि विश्वविद्यालय में ही नौकरी के आवेदन करता रहा,परिचितों से खारिज होता रहा और अंत में कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में नौकरी मिल गयी।

कोलकाता अप्रैल1989 में आया और तबसे यहीं पर हूँ।यहां आने के पहले दिल्ली में था तो मथुरा जल्दी-जल्दी जाता था लेकिन कोलकाता आने के बाद मथुरा आने-जाने का सिलसिला टूट गया।अब साल-छह महिने में आना जाना होता है।इसके कारण मथुरा में नए दोस्त नहीं बने।पुराने दोस्त लगातार उम्रदराज होते गए और उनमें से अनेक थक भी गए हैं।मथुरा से दूर हुआ तो सबसे बड़ा अभाव मुझे का. सव्यसाची का महसूस हुआ।सव्यसाची सही मायने में मथुरा में रचे-बसे थे,वहां के लोगों से घुले-मिले थे,उनसे मिलकर हमेशा मजा आता था,उनकी अनौपचारिक बोलने की शैली और तीखी भाषा हमेशा अपील करती थी,वे मुझे कभी कॉमरेड नहीं कहते ”पंडितजी´´ कहकर बुलाते थे।पता नहीं क्यों उन्होंने मेरे लिए पंडितजी सम्बोधन चुन लिया,मैं नहीं जानता,जबकि मुझे कोई और पंडितजी नहीं कहता था।सव्यसाची के पंडितजी कहने का असर अन्य लोगों पर भी हुआ,इसके कारण और भी कई मित्र पंडितजी कहने लगे। लेकिन इन चंद मित्रों को अलावा सब नाम से ही बुलाते रहे हैं।मेरे मित्रों का सीधे नाम से पुकारना और सव्यसाची जी का पंडितजी कहकर पुकारना अपने आपमें मेरे व्यक्तित्व के उन पहलुओं को अभिव्यंजित करता है जो मुझे सामाजिक विकास के क्रम में मिले हैं,मेरे व्यक्तित्व में दो किस्म के व्यक्ति हैं।एक वह व्यक्ति है जो पिता और संस्कृत पाठशाला ने बनाया,दूसरा वह व्यक्ति जिसे मथुरा –जेएनयू के मित्रों और जेएनयू की शिक्षा ने बनाया।मजेदार बात है कि मैं इन दोनों को आज भी जीता हूँ।मुझे अपने बचपन के संस्कृत के सहपाठी और अग्रज जितने अच्छे लगते हैं उतने ही जेएनयू के मित्र और कॉमरेड भी अच्छे लगते हैं।



मुझे मथुरा का अतीत बार-बार अपनी ओर खींचता है,लेकिन जेएनयू नहीं खींच पाता।जेएनयू से पढ़कर निकलने के बाद 1989 से लेकर आज तक में मात्र 4बार ही जेएनयू गया हूँ।लेकिन इस बीच मथुरा बार-बार गया,उन पुराने स्थानों पर बार- बार जाता हूँ जो मेरी बचपन की स्मृति का अंग हैं,या मेरी फैंटेसी का अंग हैं।अपने जीवन के तजुर्बे से यही सीखा है कि जन्मस्थान का मतलब कुछ और ही होता है,जन्मस्थान आपके रगों में,इच्छाओं और आस्थाओं में रचा-बसा होता है,वह आपके व्यक्तित्व के निर्माण में बुनियादी रूप से भूमिका निभाता है।वह कभी पीछा नहीं छोड़ता।

रविवार, 8 मार्च 2015

नागरिक की तलाश में

    सामान्य तौर पर हर प्रोफेसर अपने को विद्वान कहलाना पसंद करता है, लेखक कहलाना पसंद करता है। लेकिन मैं शुरु से विद्वान और लेखक के भावबोध से चिढ़ता रहा हूँ।मेरे अंदर न तो लेखक के गुण हैं और न विद्वान के लक्षण हैं। मुझे अधिकतर लेखक -प्रोफेसर लेखक अहंकारी, खोखले , गैर-ज़िम्मेदार और धूर्त प्रतीत होते हैं। मैं अपने जीवन में कभी न तो विद्वान बन पाया और न मेरी विद्वान बनने की आकांक्षा रही, यही हालत लेखक मन की भी रही है। मैंने अधिकतर प्रोफ़ेसरों को विद्वत्ता के आडंबर में लिपटे देखा है और उनके जीवन पर चालाकियों और धूर्तताओं का जो रंग चढ़ा देखा है उसने मुझे यह महसूस करने के लिए मजबूर किया है कि मैं कम से कम न तो विद्वान हूँ और न लेखक हूँ। मुझे यह देखकर दुख होता है कि हमने प्रोफेसर विद्वानों की ऐसी पीढ़ी तैयार की जो झूठ और अनपढता के मामले में अव्वल है। इनकी विशेषता है कम से कम पढ़ना और बड़ी बड़ी हाँकना, अवैज्ञानिक और अलोकतांत्रिक बातें और आचरण करना । 

मेरे परिचित अधिकांश हिन्दी प्रोफेसर न तो कभी समय पर कक्षा में जाते हैं और न पूरा समय कक्षा में रहते हैं, यहाँ तक कि ये लोग सारी ज़िंदगी न्यूनतम किताबें तक नहीं पढ़ते ।
ये लोग जश्न, मंच,उत्सव, संगोष्ठी में जीना पसंद करते हैं लेकिन कभी कुछ भी न तो नया बोलते हैं और नहीं कभी नए विचार पर सुसंगत लिखते हैं, लेकिन विद्वत्ता की हेकड़ी में रहते हैं। वे नागरिक की तरह आचरण नहीं करते । उनमें न तो नागरिक जैसी सभ्यता है और ना ही नागरिकबोध ही है। ऐसी अवस्था में उनकी सारी भाव-भंगिमाएँ घिन पैदा करती हैं। मैं सोचता हूँ कि जो प्रोफेसर -लेखक आए दिन कबीरदास-तुलसीदास -प्रेमचंद के उद्धरण सुनाते रहते हैं वे कभी सामान्य तौर पर भारत के संविधान की बातें और उद्धरण क्यों नहीं सुनाते ? जिस लेखक में संविधानचेतना और नागरिकचेतना पैदा नहीं हुई है मैं उसे शिक्षित मानने को तैयार नहीं हूँ। लोकतंत्र में मुझे लोकतांत्रिक नागरिक चाहिए , विद्वान-प्रोफेसर-लेखक नहीं।

'स्त्री असभ्यता' हमारी चिंता में क्यों नहीं है !

       औरत सभ्य होती है,लेकिन औरत के अंदर अनेक ऐसी आदतें,परंपराएं और मूल्य हैं जो उसे असभ्यता के दायरे में धकेलते हैं। औरत को संयम और सही नजरिए से स्त्री के असभ्य रुपों को निशाना बनाना चाहिए। असभ्य आयाम का एक पहलू है देवीभाव ।  औरत को देवीभाव में रखकर देखने की बजाय मनुष्य के रुप में,स्त्री के रुप में देखें तो बेहतर होगा । औरत में असभ्यता कब जाग जाए यह कहना मुश्किल है लेकिन असभ्यता के अनेक रुप दर्ज किए गए हैं। खासकर औरत के असभ्य रुपों की स्त्रीवादी विचारकों ने खुलकर चर्चा की है। हमें भारतीय समाज के संदर्भ में और खासकर हिन्दू औरतों के संदर्भ में उन  क्षेत्रों में दाखिल होना चाहिए जहां पर औरत के असभ्य रुप नजर आते हैं।
       औरत की असभ्य संस्कृति के निर्माण में पुंसवाद की निर्णायक भूमिका है। इसके अलावा स्वयं औरत की अचेतनता भी इसका बहुत बड़ा कारक है। मसलन्, जब कोई लड़की शिक्षित होकर भी दहेज के साथ शादी करती है , दहेज के खिलाफ प्रतिवाद नहीं करती तो वह असभ्यता को बढ़ावा देती है।हमने सभ्यता के विकास को शिक्षा,नौकरी आदि से जोड़कर इस तरह का स्टीरियोटाइप विकसित किया है कि उससे औरत के सभ्यता के मार्ग का संकुचन हुआ है।  
    हमारी शिक्षा लड़कियों को सभ्य कम और अनुगामी ज्यादा बनाती है। औरत सभ्य तब बनती है जब वह सचेतन भाव से सामाजिक बुराईयों के खिलाफ जंग करती है। औरत की जंग तब तक सार्थक नहीं हो सकती जब तक हम उसे आम औरत के निजी जीवन तक नहीं ले जाते। हमारे सभ्य समाज की आयरनी यह है कि वह सभ्य औरत तो चाहता है लेकिन उसे सभ्य बनाने के लिए आत्मसंघर्ष करने की प्रेरणा नहीं देता। मसलन्,औरतों में दहेज प्रथा के खिलाफ जिस तरह की नफरत होनी चाहिए वह कहीं पर भी नजर नहीं आती।
    औरत सभ्य है या असभ्य है यह इस बात से तय होगा कि वह अपने जीवन से जुड़े बुनियादी सवालों और समस्याओं पर विवेकवादी नजरिए से क्या फैसला लेती है ? समाज ने स्त्री के लिए अनुकरण और निषेधों की श्रृंखला तैयार की है और उसे वैध बनाने के तर्कशास्त्र, मान्यताएं और संस्कारों को निर्मित किया है। इसके विपरीत यदि कोई औरत अनुकरण और निषेधों का निषेध करे तो सबसे पहले औरतें ही दवाब पैदा करती हैं कि तुम यह मत करो,ऐसा मत करो, परिवार की इज्जत को बट्टा लग जाएगा। औरत को बार-बार परिवार की इज्जत का वास्ता देकर असभ्य कर्मों को करने के लिए कहा जाता है। खासकर युवा लड़कियों के अंदर दहेज प्रथा के खिलाफ जब तक घृणा पैदा नहीं होगी, औरत को सभ्य बनाना संभव नहीं है। औरत सभ्य बने इसके लिए जरुरी है कि वह उन तमाम चीजों से नफरत करना सीखे जो उसको सभ्य बनने से रोकती हैं। दहेज प्रथा उनमें से एक है।
    औरत के अंदर असभ्यता का आधार है अनुगामी भावबोध ,जब तक औरतें अनुगामी भावबोध को विवेक के जरिए अपदस्थ नहीं करतीं वे सभ्यता को अर्जित नहीं कर पाएंगी। समाज में अनुगामी औरत को आदर्श मानने की मानसिकता को बदलना होगा।
   औरत को असभ्य बनाने में दूसरा बड़ा तत्व है, औरतों और खासकर लड़कियों का सचेतभाव से मूर्खतापूर्ण हरकतें करना, मूर्खता को वे क्रमशः अपने जीवन का आभूषण बना लेतीं हैं। तमाम किस्म के स्त्रीनाटक इस मूर्खतापूर्ण आचरण के गर्भ से निकलते हैं।स्त्री की  मूर्खतापूर्ण हरकतें अधिकांश पुरुषों को अच्छी लगती हैं। फलतः लड़कियां सचेत रुप से मूर्खता को अपने जीवन का स्वाभाविक अंग बना लेती हैं। इससे स्त्री की छद्म इमेज बनती है। स्त्री सभ्य बने इसके लिए जरुरी है कि वह छद्म इमेज और छद्म मान्यताओं में जीना बंद करे।
    छद्म इमेज का आदर्श है लड़कियों में फिल्मी नायिकाओं को आदर्श मानने का छद्मभाव। मसलन्, माधुरी दीक्षित ,रेखा,ऐश्वर्या राय में कौन सी चीज है जिससे लड़कियां प्रेरणा लेती हैं ?  क्या सौंदर्य-हाव-भाव आदि आदर्श हैं ? यदि ये आदर्श हैं तो इनसे सभ्यता का विकास नहीं होगा। सौंदर्य के बाजार और प्रसाधन उद्योग का विकास होगा। यदि इन नायिकाओं के कैरियर और उसके लिए इन नायिकाओं द्वारा की गयी कठिन साधना और संघर्ष को लड़कियां अपना लक्ष्य बनाती हैं तो वे सभ्यता का विकास करेंगी और पहले से ज्यादा सुंदर दिखने लगेंगी। ये वे नायिकाएं हैं जिन्होंने अपने कलात्मक जीवन को सफलता की ऊँचाईयों तक पहुँचाने के लिए कठिन रास्ता चुना और समाज में सबसे ऊँचा दर्जा हासिल किया। अपने अभिनय के जरिए लोगों का दिल जीता।

    कहने का अर्थ है कि फिल्मी नायिका से सौंदर्य टिप्स लेने की बजाय,उसके सौंदर्य का अनुकरण करने की बजाय, कलात्मक संघर्ष की भावनाएं और मूल्य यदि ग्रहण किए जाते तो देश में हजारों माधुरी दीक्षित होतीं! दुर्भाग्य की बात है कि हम यह अभी तक समझ नहीं पाए हैं कि औरत का सौंदर्य उसके शरीर में नहीं उसकी सभ्यता में होता है ! औरत जितनी सभ्य होगी वह उतनी ही सुंदर होगी। सभ्यता के निर्माण के लिए जरुरी है कि औरतें स्वावलंबी बनें। अनुगामी भाव से बचें। 

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

नामवर सिंह और अस्मिता विमर्श


        अस्मिता का सवाल तदर्थ सवाल नहीं है। इसे चलताऊ ढ़ंग से नहीं देखना चाहिए । अस्मिता की पेचीदगियों और वैचारिक सरणियों पर हिन्दी में संवाद कम हो रहा है। खासकर मार्क्सवादी आलोचना ने अस्मिता से जुड़े साहित्यिक सवालों को कभी गंभीरता से नहीं लिया। अस्मिता पर चलताऊ नजरिए को देखने के लिहाज से नामवरजी के अस्मिता सम्बन्धी विचारों को विश्लेषित करना समीचीन होगा। नामवर सिंह ने लिखा है ,' भारतीय नवजागरण की मूल समस्या है भारतेन्दु के शब्दों में 'स्वत्व निज भारत गहै।' यह 'स्वत्व' वही है जिसे आजकल 'अस्मिता' कहते हैं। राजनीतिक स्वाधीनता इस स्वत्व-प्राप्ति की पहली शर्त है। नवजागरण के उन्नायक इस आवश्यकता का अनुभव न करते रहे होंगे, यह सोचना कठिन है, फिर भी तथ्य यही है कि नवजागरणकालीन प्रकाशित साहित्य में राजनीतिक स्वाधीनता का स्पष्ट स्वर कम ही सुनाई पड़ता है।' ( हिन्दी का गद्यपर्व, 2010, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.87) यह ‘स्वत्व’ भाषायी अस्मिता के संदर्भ में आया है। इसका अस्मिता के विराट फलक के साथ घालमेल नहीं कर सकते। 'स्वत्व' का अर्थ अस्मिता है तो इसका अर्थ यह भी है कि आधुनिककाल के इतिहास का आरंभ 'अस्मिता की राजनीति' से होता है। इतिहासलेखन का यह नया आयाम है। उल्लेखनीय है 'अस्मिता की राजनीति' का पूंजीवाद से माँ-बेटी का रिश्ता है। अस्मिता को पूंजीवाद से अलग करके नहीं देखा जा सकता। 'अस्मिता की राजनीति' और पूंजीवाद अन्तर्ग्रथित हैं। साहित्येतिहास में इसके आयाम अलग होंगे। अस्मिता को इतिहास का हिस्सा बनाने से वे सारे वर्गीकरण समस्यामूलक बन जाते हैं जो अब तक प्रचलन में हैं। अस्मिता के आधार पर देखने का अर्थ है कि हमें इतिहास के लिए नए किस्म के वर्गीकरण बनाने होंगे। नए वर्गीकरण क्या होंगे? इस पर नामवर सिंह चुप हैं । 'अस्मिता' को आधार बनाने से नवजागरण भी समस्यामूलक बन जाता है। 'अस्मिता की राजनीति' के परिप्रेक्ष्य के लिए नवजागरण अप्रासंगिक है। मसलन् स्त्री-साहित्य और दलित-साहित्य के आलोचक नवजागरण की परंपरा से इन साहित्य रुपों को जोड़कर नहीं देखते। भारतेन्दु ने 'स्वत्व' के बहाने जिस अस्मिता की बात कही है वह 'सामुदायिक अस्मिता' है। वह निजी अस्मिता नहीं है। भाषायी अस्मिता का सवाल 'सामुदायिक अस्मिता' से जुडा है। 'सामुदायिक अस्मिता' को आधार बनाकर हमने कभी साहित्य-चर्चा नहीं की है। 

हिंदी नवजागरण में सामाजिक-सांस्कृतिक और भाषायी विविधताओं के लिए कोई स्थान नहीं है । निजभाषा के नाम पर सिर्फ खड़ीबोली हिंदी पर जोर दिया गया। हिंदीभाषीक्षेत्र में बोली जाने वाली अन्य भाषाओं और बोलियों के साहित्य को इस विमर्श का अंग नहीं बनाया गया । साथ ही अन्य भाषाओं की उपेक्षा हुई । साथ ही दलितों और अल्पसंख्यकों के लेखन और जीवन की उपेक्षा हुई । इस नजरिए से देखें तो हिंदी नवजागरण पर बंगला नवजागरण का असर नजर आता है। बंगला नवजागरण ने दलितों और अल्पसंख्यकों को सम्बोधित नहीं किया उसके केन्द्र में सवर्ण थे। बंगला नवजागरण में दलितलेखन गायब है ,हिन्दी नवजागरण में भी दलित और अल्पसंख्यकों का लेखन नदारत है। उर्दू के प्रति बेगानापन है। अलीगढ़ आंदोलन के बारे में बेरूखी है। हिन्दीभाषी क्षेत्र की खड़ीबोली हिन्दी के अलावा अन्य बोलियों और भाषाओं के विकास की चिन्ता नदारत है।

नामवर सिंह की 'स्वत्व' की धारणा अमूर्त है। अमूर्तता का दुरूपयोग हो सकता है। 'स्वत्व' को सब पर लागू किया जा सकता है। लेकिन मामला सबका नहीं है। 'स्वत्व' का संबंध खड़ीबोली हिन्दी के विकास से है। मजेदार बात यह है कि जातीयभाषा और जातीयसाहित्य की अवधारणा के बहाने भी खड़ीबोली हिन्दी के साहित्य को लेकर ही लिखा गया है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि हिन्दीभाषी क्षेत्र में पूंजीवाद का असमान विकास हुआ है। इसके कारण अस्मिता की राजनीति और अस्मिताओं का भी असमान विकास हुआ है। भाषायी अस्मिता एक अवस्था के बाद बिखरनी आरंभ हो जाती है। उसे सत्तातंत्र, बाजार, विज्ञापन, प्रलोभन, प्रमोशन आदि के आधार पर टिकाऊ नहीं बनाया जा सकता।

भाषायी अस्मिता का मॉडल वर्चस्ववादी मॉडल है। इसके आधार पर राष्ट्र-राज्य का निर्माण संभव है लेकिन यह मॉडल टिकाऊ नहीं है। इस मॉडल में भाषायी समानता का अभाव है । पूंजीवाद अपने स्वाभाविक विकास क्रम में भाषायी वैषम्य को हवा देता है और यह काम मीडिया, विज्ञापन, संपर्क भाषा, राजभाषा आदि के जरिए करता है । हिन्दीभाषी क्षेत्र में खड़ीबोली हिन्दी को लेकर जो प्रतिवादी स्वर सुनाई दे रहे हैं वे इस धारणा की पुष्टि करते हैं।

'स्वत्व' तो हिन्दी जातीयता है। यह सांस्कृतिक वर्चस्व का नया रुप है । यह सांस्कृतिक असमानता को वैधता प्रदान करता है । जातीयता में वर्चस्व बना रहता है। वर्चस्व खत्म हो इसके लिए जरूरी है कि सभी भाषाओं और बोलियों के समान विकास की बात की जाय । एक नहीं अनेक भाषाओं के इतिहास की बात की जाय। हिन्दी में खड़ीबोली हिन्दी का साहित्य ही इतिहास का अंग है। इस क्षेत्र की अन्य भाषाओं और बोलियों का साहित्य इसमें शामिल नहीं है । फलत: इस क्षेत्र की अन्य भाषाओं और बोलियों के विकास की आधुनिक संरचनाओं का विकास नहीं हो पाया। भाषायी समानता के लिए यह ज़रुरी है कि प्रत्येक भाषा और साहित्य अपना स्वतंत्र इतिहास हो, उनके विकास की स्वतंत्र और स्वायत्त संरचनाएं निर्मित की जाएं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि जातीयता के आधार पर प्रशासनिक संरचनाएं न बनायी जाएं। मसलन् जातीयता के आधार पर राज्यों का गठन अब स्वयं में दिक्कतें खड़ी कर रहा है। जातीयता के आधार की बजाय उदार-व्यावहारिक -प्रशासनिक राज्य संरचनाएं विकसित की जाएं।

नामवर सिंह का सबसे बड़ा अंतर्विरोध है कि वे घोषित करते हैं कि 'स्वत्व' का अर्थ है-अस्मिता और परिभाषा देते हैं नवजागरण की। सवाल यह है अस्मिता की परिभाषा देने में परेशानी क्या थी ? क्यों नामवर सिंह ने नवजागरण की परिभाषा पर ही केन्द्रित किया ? नवजागरण की परिभाषा के साथ अस्मिता की परिभाषा भी यदि दे दी जाती तो अंततः नवजागरण का सारा विचारतंत्र धराशायी हो जाता। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब भारतेन्दु ने अस्मिता के सवाल से अपने साहित्य और आधुनिककाल के साहित्य का आरंभ किया है तो अस्मिता की अवधारणा पर बहस होनी चाहिए थी लेकिन जैसाकि हिन्दी की परंपरा है मुद्दा कुछ होता है और बहस किसी और मुद्दे पर होती है।

नामवर सिंह जानते हैं नवजागरण की धारणा पर बहस होगी तो परिणाम कुछ और निकलेंगे और अस्मिता की धारणा पर बहस होगी तो परिणाम एकदम भिन्न आएंगे। यहां तक कि आधुनिक आलोचना के समूचे पैराडाइम को ही बदलना पड़ेगा। लेकिन नामवर सिंह ने नवजागरण का मार्ग चुना। अस्मिता का जिक्रभर करके छोड़ दिया। नामवर सिंह की यह शैली है 'ज़िक्र करो और छोड़ दो', जबकि एक आलोचक के नाते उनको अस्मिता के सवाल को गंभीरता के साथ विस्तार में जाकर विश्लेषित करना चाहिए।

नवजागरण की प्रथम शर्त्त है पुराने सामाजिक भेदों और रूढ़ियों का खात्मा और उनकी जगह नए पूंजीवादी भेदों और रूढ़ियों का जन्म। सवाल यह है अस्मिता पुराने किस रूप, रुढ़ि या सामाजिक संबंध का विकल्प है? भारत में पुराने सामाजिक-सांस्कृतिक भेद बने रहते हैं और नए भेदों और रूढ़ियों का पूंजीवादी असमान विकास के साथ असमान विकास होता है। यहां अनेक क्षेत्रों में नया मूल्य पुराने मूल्य को नष्ट करके जन्म नहीं लेता, बल्कि पुराने के साथ सामंजस्य पैदा करके विकास करता है। इसके कारण विद्रूप सामाजिक जीवनमूल्यों का विकास होता है। यही वजह है हिन्दी में एक ओर नवजागरण है तो दूसरी ओर साहित्यिक भेदभाव भी है। साहित्यिक भेदभाव का आदर्श उदाहरण है स्त्री-साहित्य और दलित-साहित्य की आधुनिककाल के इतिहास लेखन में उपेक्षा। सन् 1980 के पहले साहित्य समीक्षा के मुख्यधारा विमर्श से ये दोनों साहित्य रूप गायब हैं। इस नजरिए का दूसरा आदर्श नमूना है प्रधान और गौण प्रवृत्ति के आधार पर साहित्यिक प्रवृत्तियों का साहित्य के इतिहास और आलोचना में वर्गीकरण । 'स्वत्व' के पर्याय के रूप में खड़ीबोली हिन्दी के साहित्य को समूचे हिन्दीभाषी क्षेत्र की अभिव्यंजना के रूप में व्याख्यायित किया गया। लेकिन खड़ीबोली हिन्दी समूचे हिन्दीक्षेत्र की भाषाओं और बोलियों को प्रतिबिम्बित नहीं करती। खड़ीबोली हिन्दी कॉमन कम्युनिकेशन की भाषा है लेकिन यह हिन्दीभाषी क्षेत्र के वैविध्य को प्रतिबिम्बित नहीं करती। अपने सामाजिक आधार के विकास के लिए इस भाषा के पक्षधरों ने हिन्दीभाषी क्षेत्र की अन्य भाषाओं और बोलियों की घनघोर उपेक्षा की है। इसके कारण भीतर ही भीतर भाषायी विद्वेष पैदा हुआ है। इसके दर्शन हमें झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखण्ड में साफ देखने को मिल रहे हैं वहां पर राज्य प्रशासन ने राज्य की प्रथमभाषा के रूप में खड़ीबोली हिन्दी को मानने से साफ इंकार कर दिया है।

भाषायी विकास की समान समझ के आधार पर हिन्दीभाषी क्षेत्र की बोलियों और भाषाओं के विकास की ओर राज्य और केन्द्र सरकार ने ध्यान ही नहीं दिया। यहां तक कि लेखक संगठनों और निजी तौर पर लेखकों ने भी ध्यान नहीं दिया। अस्मिता के आधार पर भोजपुरी, अवधी, मैथिली, ब्रजभाषा आदि को हमने कभी नहीं देखा। हिंदी-उर्दू के लेखकों के लिए 'प्रलेसं' और 'जलेसं' बनाए गए। लेकिन अवधी, भोजपुरी आदि के लेखकों और उनके साहित्य के सवालों को लेखक संगठनों के घोषणापत्रों में कभी नहीं उठाया गया । इससे पता चलता है कि लेखकों के मन में राजनीतिक आग्रहों के कारण हिन्दी- उर्दू के सवाल बहसतलब रहे । साथ ही यह भी संदेश निकलता है कि लेखक संगठन भाषायी समानता के आधार पर नहीं सोच रहे हैं।

यदि नवजागरण के पैमाने से भाषा और उसके साहित्य को देखेंगे तो एक भाषा प्रमुख होगी, बाकी हाशिए पर रहेंगी। सवाल यह भी है कि नवजागरण के जिन पैमानों को खड़ीबोली हिन्दी में लागू किया जाता है वे पैमाने हिन्दीभाषी क्षेत्र की अन्यभाषाओं पर लागू क्यों नहीं किए गए? जबकि अस्मिता के पैमाने समान रूप से सभी भाषाओं और बोलियों पर लागू किए जा सकते हैं। मसलन् अस्मिता में सभी भाषायी अस्मिताएं समान हैं, चाहे उनके बोलने वालों की संख्या कम हो या ज्यादा। सभी भाषाओं और बोलियों का साहित्य समान है। इसमें प्राथमिक और गौण, केन्द्र और हाशिए की धारणा लागू नहीं की जा सकती। किसी भाषा विशेष को खास सुविधाएं नहीं दी जा सकतीं। लेकिन व्यवहार में यही हुआ ।

अस्मिता के आधार पर सभी भाषाओं को समान मानकर मूल्यांकन करेंगे तो एक ही क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषाओं के बीच के भेद, विकास की प्रक्रिया में भेद, भाषायी संरचनाओं में भेद और आम नागरिकों के संस्कार और आदतों में भेद सामने आएंगे। यह धारणा टूटेगी कि हिन्दीभाषी एक जैसे होते हैं। जिस तरह भाषा अस्मिता का अंग है, वैसे ही धर्म और जाति भी अस्मिता का अंग हैं। साम्प्रदायिकता, उपभोक्तावाद, फंडामेंटलिज्म, पुनरूत्थानवाद, युद्ध और पृथकतावाद भी अस्मिता का अंग है। इनमें कौन सी अस्मिता कब प्रमुखता अर्जित कर लेगी कहना मुश्किल है।

पूंजीवादी आर्थिक विकास की प्रक्रिया अस्मिता को व्यापक अभिव्यक्ति देती है। अस्मिताएं एक-दूसरे में अन्तर्ग्रथित रहती हैं। भाषायी अस्मिता कब धार्मिक पहचान में रुपान्तरित हो जाए कहना मुश्किल है, इसी तरह धार्मिक अस्मिता कब साम्प्रदायिक या पुनर्रुत्थानवादी पहचान में रुपान्तरित हो जाय यह तय करना संभव नहीं है। हिंदी के साथ यह घटा है। हिंदी और उर्दू को धार्मिक पहचान के साथ नत्थी करने में अंग्रेजों को सफलता मिली । हिंदी को हिंदुओं और उर्दू को मुसलमानों की अस्मिता के साथ जोड़ा दिया गया । भाषा को यदि धर्म से जोड़ा जाएगा तो इससे सामाजिक विभाजन का खतरा पैदा हो सकता है ।

सामाजिक विभाजन के कई राजनीतिक रुप हैं जैसे साम्प्रदायिकता, अंध क्षेत्रीयतावाद, स्थानीयतावाद आदि । कहने का तात्पर्य है कि भाषाभेद के सामाजिक-धार्मिक-राजनीतिकभेद में रुपान्तरित होने की संभावनाएं रहती हैं । मूल बात यह कि अस्मिता रपटन है। इस पर स्थिर होकर खड़े नहीं हो सकते। यह अल्पकालिक है इस पर दीर्घकालिक समझ नहीं बनायी जा सकती। भाषा के आधार पर सामाजिक एकीकरण टिकाऊ कम और समस्यामूलक ज़्यादा है । नामवर सिंह जब भारतेन्दु के कथन के आधार पर अस्मिता की बात कहते हैं तो वे सरलीकरणों का सहारा लेते हैं और अस्मिता में निहित अंतर्विरोधों और वर्चस्व की अनदेखी करते हैं ।

अस्मिता का बुनियादी तौर पर बुर्जुआ विचारधारा से अन्तर्विरोध नहीं है बल्कि वह तो उसका अंग है । जो अंतर्विरोध नजर आता है वह सत्ताधारी विचारधारा के पैराडाइम में ही अपना विकास करता है। नामवर सिंह और रामविलास शर्मा में अस्मिता को लेकर मतभेद नहीं है। मतभेद है अस्मिता की प्राथमिकता को लेकर। नामवरसिंह के लिए निजभाषा की अस्मिता प्रमुख है तो रामविलास शर्मा के लिए 1857 का संग्राम प्रमुख है। लेकिन भाषा और युद्ध तो दोनों ही अस्मिता के अंग हैं और दोनों का परिणाम है बुर्जुआ वर्ग और विचारधारा के वर्चस्व का निर्माण करना ।

किसी भी अवधारणा या फिनोमिना पर विचार करते समय उसके सामाजिक-राजनीति-आर्थिक विचारधारात्मक परिणामों को देखा जाना चाहिए । 'स्वत्व' या भाषायी अस्मिता की परिणति या 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की परिणति किसमें होती है, यह देखें। या यों कह सकते हैं कि अस्मिता पर विचार करते हुए हम जाना कहां चाहते हैं और पहुँच कहां रहे हैं, इन दोनों पहलुओं पर विचार करना चाहिए। नवजागरण बंगाल का हो या हिन्दी का वह बुर्जुआ विचारधारा के पैराडाइम का अतिक्रमण नहीं करता। साथ ही अस्मिता के दायरे के बाहर नहीं निकल पाता। अस्मिता के बाहर साहित्य, कला, राजनीति को लाने के प्रयास 20वीं शताब्दी में ही सामने आते हैं।

सन् 1857 का संग्राम जो अंग्रेजों के खिलाफ पहला युद्ध था, उस युद्ध की साहित्यिक अभिव्यक्तियों पर खूब चर्चा हुई है लेकिन युद्ध की तबाही और युद्धजनित सामाजिक अवस्था पर नामवर सिंह एकदम चुप हैं। 1857 से लेखक प्रभावित थे या नहीं, इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है युद्ध का व्यापक दीर्घकालिक प्रभाव हमारे साहित्यकारों की नजरों से ओझल क्यों रहा और समीक्षकों ने इस ओर ध्यान क्यों नहीं दिया? सन् सत्तावन के युद्ध में हम अंग्रेजों से हारे थे। इस युद्ध ने भारतीय सामंती राजतंत्र की कमर तोडकर रख दी थी। इसके अलावा महत्वपूर्ण बात यह भी है कि उस समय की हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में या कालान्तर में आए भारतेन्दुमंडल के लेखन में इस युद्ध के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों पर कोई खास सामग्री नहीं मिलती। भारतेन्दुयुगीन या उसके पहले का हिंदी मीडिया, इस ओर ध्यान क्यों नहीं दे पाया ? इस युद्ध में भारत की पराजय के बाद भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ गया। इस युद्ध से उनलोगों को लाभ हुआ जो अंग्रेजों के साथ थे बल्कि आम हिन्दुस्तान के लिए यह गुलामी लेकर आया। नए वर्ग के रूप में पैदा हुए मध्यवर्ग और रैनेसांपंथियों या धार्मिक-समाजसुधारकों के बीच में इस युद्ध में भारत की पराजय को लेकर अंग्रेजों के प्रति घृणा कम नजर आती है। बल्कि यह देखने में आता है कि मध्यवर्ग के अधिकांश बुद्धिजीवी आंखें बंद करके अंग्रेजों की प्रशंसा में लगे थे और युद्ध के बाद जो भारत उभरकर सामने आ रहा था उसकी ओर इनका कम ध्यान था। युद्ध के बाद जो भारत सामने आया उसमें बड़े पैमाने पर गरीबी नजर आती है। अकाल और महामारियां नजर आती हैं। 19वीं सदी में कोलकाता में बड़े पैमाने पर वेश्याओं के कोठे पैदा होते हैं।

अकाल और वेश्यावृत्ति इस दौर के दो बड़े फिनोमिना हैं। जिन पर लेखकों-आलोचकों का ध्यान नहीं गया । वेश्याओं और अकाल पीडितों के सवाल नवजागरण विमर्श से गायब क्यों हैं ? 19वीं सदी में भारतेन्दुमंडल के लेखक किस तरह की स्त्री इमेज पेश कर रहे थे ? क्या वह सामंती या बुर्जुआ स्त्री के रुपों से भिन्न स्त्री इमेज है ?

सन् 1857 का संग्राम सामान्य संग्राम नहीं था इसने व्यापक तौर पर समाज को प्रभावित किया था। मनुष्य और प्रकृति और ईश्वर के बीच में इसने विशाल खाई पैदा कर दी। कायदे से युद्ध और मनुष्य के संबंध पर बहस होनी चाहिए थी, लेकिन बहस हुई समाजसुधारों पर, ईश्वर और धर्म के सुधारवादी रूपों पर। इसके कारण बृहत्तर जनता के जीवनयथार्थ में जो घट रहा था वह साहित्य के केन्द्र में कम है । मध्यवर्ग के जीवन का चित्रण ज्यादा है। उल्लेखनीय है यह वर्ग उस समय जनसंख्या के लिहाज से बहुत छोटा सामाजिक वर्ग है। इसका भारत के किसानों के साथ संबंध कम और अंग्रेजियत से संबंध ज्यादा है ।

अंग्रेजों की सामाजिक नीति का सबसे भयानक परिणाम था नवोदित मध्यवर्ग और किसानों में अलगाव। यह अलगाव आज भी खत्म नहीं हुआ है। किसान के जीवन में ब्रिटिश शासन के आने साथ जो तबाही आई उस पर कम ध्यान गया । साहित्य रुपों और हिंदी भाषा पर ज्यादा ध्यान गया। इतिहास और भाषा की दुनिया एक ऐसी दुनिया थी जिसमें नए सवालों की चुनौतियों से सीधे खतरा कम महसूस हो रहा था। उन प्रकाशनों से ज्यादा खतरा था जो सामाजिक यथार्थ को उदघाटित कर रहे थे। नए मनुष्य की खोज के लिए नई व्याख्याओं का उदय हुआ, पुराने पाठ की नई व्याख्याएं लिखी गयीं। यहां तक कि धार्मिक और सामाजिक सुधार के आंदोलनों में पुराने पाठ के नए भाष्यों को जन्म दिया। असल में ‘क्षमता’ और ‘संभावना’ इन दो की खोज पर समूचा नवजागरण जुट गया। हर क्षेत्र में व्यक्ति की ‘क्षमता’ और ‘संभावनाओं’ की खोज होने लगी। इसके आधार पर लिखी गयी व्याख्याओं के कारण नवोदित आधुनिक संसार अर्थपूर्ण और प्रासंगिक नजर आने लगा। व्याख्याओं को लेकर भी विचारों की टकराहट होने लगी जिसने सरसता और सजीवता पैदा कर दी। व्याख्याओं के नए संसार ने जो विचार पैदा किए वे विचार आज भी हमें प्रासंगिक लगते हैं। यही वजह है कि नवजागरण के विचार हमेशा प्रासंगिक लगते हैं। किसी को जातीय भाषा, किसी को जातीय साहित्य और किसी को नवजागरण और किसी को 1857 की व्याख्याएं आज भी प्रासंगिक लगती हैं। इस क्रम में हम भूल गए कि युद्ध हमेशा व्याख्या की संभावनाएं पैदा करते हैं। नामवरसिंह जब 1857 की भूमिका को स्वीकार नहीं करते तो उनके ज़ेहन में रामविलास शर्मा हैं, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि युद्ध नए भाष्यऔर नए वर्गों के उदय या विकास की संभावनाओं को पैदा करते हैं।

सन् 1857 के संग्राम को हमने प्रथम स्वाधीनता संग्राम के रूप में देखा है। इसके कारण उसकी व्याख्या और दिशा अलग रही है। हमने उसे कभी युद्ध के रूप में देखा ही नहीं। 1857 का संग्राम अंततः युद्ध है। युद्ध के बाद हमेशा अस्मिता के सवाल उठे हैं, भारतेन्दु हों या अन्य कोई लेखक हों वे सभी पहचान के सवाल उठाते हैं। यह भी देखा गया है कि हर युद्ध के बाद अस्मिता की नए सिरे से परिभाषा तय करने का काम आरंभ हो जाता है। यह अचानक नहीं है कि प्रथम विश्वयुद्ध के बाद भी अस्मिता के सवाल नए रूप में सामने आते हैं। काव्यभाषा के तौर पर ब्रजभाषा का अंत होता है और खड़ीबोली हिन्दी का एकछत्र राज्य स्थापित होता है।

युद्ध के प्रसंग में राममनोहर लोहिया का उल्लेख करना समीचीन होगा। उन्होंने लिखा है, ‘ युद्ध राजनीति का सबसे खराब और अवांछनीय उपकरण होता है किंतु जब राज्य पर लादा जाता है तो इसका एकमात्र प्रयोजन राजनैतिक होता है।’ भारत में 1857 के युद्ध का मकसद था समस्त भारत पर ब्रिटिश शासन की स्थापना करना। नवजागरण पर नामवर सिंह ने जिस तरह लिखा है उससे नवजागरण की चेतना पैदा करने वाली एजेंसियों का अता-पता नहीं चलता। नवजागरणचेतना पैदा करने वाली एजेंसियों की भूमिका को विश्लेषित किए बिना नवजागरण विमर्श वस्तुतः सारतत्ववादी रणनीतियों में फंसकर रह गया है। सारतत्ववादी होने का अर्थ है अंतर्वस्तुवादी होना, इससे चीजें सही परिप्रेक्ष्य में नजर नहीं आतीं। यह नवजागरण को देखने का सीमित नजरिया है।

नामवर सिंह जब नवजागरण की बात करते हैं तो नवजागरण के निर्माण में तत्कालीन एजेंसियों की भूमिका को खोलते नहीं हैं। उन संस्थानों की भूमिका पर रोशनी नहीं डालते जिनकी नवजागरण के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका थी। नवजागरण के निर्माण में तत्कालीन संस्थानों की मंशा क्या थी और परिणाम क्या निकले, इसकी मीमांसा नहीं करते। वे सामान्यीकरणों और सरलीकरणों का इस्तेमाल करते हैं। नवजागरण की चेतना क्यों आई? उसकी प्रक्रिया क्या थी? संस्थानों की भूमिका क्या थी? बाद में नवजागरणचेतना क्यों खत्म हो गई? और इसमें संस्थानों ने क्या भूमिका अदा की? ये सब सवाल नामवर सिंह की आंखों से ओझल रहते हैं। नवजागरण के कारण किस तरह की नीतियों का जन्म हुआ और किस तरह के सामाजिक-आर्थिक संबंध पैदा हुए, किस तरह का परिवार पैदा हुआ और किस तरह की राजसत्ता का उदय हुआ, किस तरह का नागरिक बना आदि महत्वपूर्ण सवाल हैं। न्यायपालिका, राजसत्ता, प्रेस आदि की क्या भूमिका थी इत्यादि सवालों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर खोले बिना संभव ही नहीं है कि आप नवजागरण को विश्लेषित कर पाएं। इसके अलावा नवजागरण के साथ ज्ञान, शिक्षा, साहित्य और स्त्री के लोकतांत्रिकीकरण की प्रक्रिया भी जुड़ी है।

नवजागरण ने जिस प्रक्रिया को जन्म दिया वह है लोकतांत्रिकीकरण। जिस मनुष्य को जन्म दिया है वह है लोकतांत्रिक मनुष्य । विभिन्न क्षेत्रों में लोकतांत्रिकीकरण किस रूप में रूप में हुआ, क्या सारे देश में या हिन्दीभाषी राज्यों में शिक्षा, स्त्री और ज्ञान के लोकतांत्रिकीकरण की प्रक्रिया इकसार ढ़ंग से चली है? यदि इस प्रक्रिया में अंतर हैं तो क्यों और किस रूप में? नामवरसिंह ने इन सभी सवालों की एकसिरे से अनदेखी की है। नवजागरण विमर्श की बहस 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के इर्द-गिर्द घूमती है जबकि उसी दौर के कई संग्रामों का हमारे समीक्षकों ने नोटिस ही नहीं लिया। इस प्रसंग में राज्यवार विद्रोह (1857-58) उल्लेखनीय है।

उल्लेखनीय है कि अस्मिता संबंधी झगड़ों में हिन्दीभाषी क्षेत्र ही नहीं समूचा भारत आजादी के बाद अपनी बहुत ज्यादा ऊर्जा बर्बाद कर चुका है। पहले लोग यह सोचते थे भारत आजाद हो जाएगा तो शांति लौट आएगी, लेकिन भाषायी आधार पर राज्यों का गठन, अंग्रेजी हटाओ हिन्दी लाओ, तमिलनाडु का हिन्दी विरोधी आंदोलन, विभिन्न इलाकों में पैदा हुए पृथकतावादी आंदोलन, राममंदिर आंदोलन, पिछडों के आरक्षण का आंदोलन आदि सभी आंदोलन अस्मिता से ही जुड़े आंदोलन हैं। इसके अलावा 1962, 1965 और 1971 का युद्ध भी इसी कोटि में आता है। यही वो अस्मिता विमर्श का वातावरण है जिसमें हिन्दी साहित्य समीक्षा में हिन्दीजाति, हिन्दी जातीयता की बहस जन्म लेती है। हिन्दी में हिन्दीजाति की बहस सबसे पहले विस्तार के साथ सिर्फ रामविलास शर्मा उठाते हैं और यह बहस उनके साथ ही खत्म हो जाती है। एक अवधि के बाद वे भी इस बहस को आगे नहीं ले जा पाते। अन्य हिन्दीभाषी बुद्धिजीवी उनकी इस बहस में हिस्सा तक नहीं लेते। तकरीबन यही स्थिति नवजागरण संबंधी विमर्श की है।

विगत 40सालों में नवजागरण संबंधी विमर्श लगातार कम होता चला गया है। सन् 1977 के बाद तकरीबन नवजागरण संबंधी बहस समाप्त हो गयी है। किसी भी भारतीय भाषा में नवजागरण को लेकर बहस नहीं हो रही। नवजागरण विमर्श के अवसान का बड़ा कारण है नवजागरण पर नए परिप्रेक्ष्य में सोचने का अभाव और नवजागरण संबंधी नई सामग्री का अभाव। ऐसी अवस्था में हिन्दी में चंद आलोचकों में नवजागरण और हिन्दीजाति पर बहस होती रही है। इन चंद आलोचकों में नामवर सिंह प्रमुख हैं।

अस्मिता विवादों में राजनीतिक आयाम प्रमुख रहा है। ऊपर हमने जो सूची दी है उसे देखकर सहज ही समझा जा सकता है कि अस्मिता का सवाल हमारे यहां सांस्कृतिक की तुलना में राजनीतिक ज्यादा है। अस्मिता की जब भी बातें होती हैं तो उसके पक्ष और विपक्ष में राजनीतिक तर्क ज्यादा दिए जाते हैं, सांस्कृतिक उत्कर्ष या उपलब्धियों के बिंदुओं की चर्चा कम होती है। उल्लेखनीय है भारत में ऊपर बताए सभी अस्मिता आंदोलन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद शीतयुद्धीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में जन्म लेते हैं। सारी दुनिया में शीतयुद्ध के दौरान अस्मिता के आंदोलन बड़े आंदोलन रहे हैं और इनका किसी न किसी रूप में एक अंतर्राष्ट्रीय सिरा भी है। हर जाति या समूह अपनी अस्मिता को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है और बार बार ‘मैं’ हूँ, का बोध पैदा किया जा रहा है। इधर के 30 सालों में स्थानीय अस्मिता ने विकास और पिछड़ेपन के सवालों के साथ एकीकृत करके समस्याएं खड़ी की हैं। अस्मिता को पिछड़ेपन से जोड़कर व्याख्यायित करने के कारण हिन्दीभाषी प्रान्तों -यूपी, बिहार और मध्यप्रदेश- का विभाजन हो गया।

अस्मिता के साथ जातीय विद्वेष भी पृथकतावादी आंदोलनों के साथ उभरा है। खासकर उत्तर-पूर्वी राज्यों में यह स्थिति आज भी बनी हुई है। अस्मिता के साथ जातीय विद्वेष की भावना का परिप्रेक्ष्य हमारे समाज में 1936 के बाद पैदा होता है। मुस्लिम अस्मिता का सवाल पाकिस्तान बनाने की मांग के साथ सामने आता है। अस्मिता के साथ मुस्लिम विद्वेष के आने साथ जितने भी पृथकतावादी आंदोलन पैदा हुए हैं उनमें एक ही इलाके में रहने वाली अन्य जाति, धर्म और भाषा के मानने वालों के ऊपर हिंसक हमले हुए और सामूहिक हिंसाचार हुआ। अस्मिता का एक रूप जातीय, धार्मिक और लैंगिक हिंसा के रूप में सामने आया है। अस्मिता और हिंसा की यह जुगलबंदी अपने आपमें चिन्ता की बात है। स्थिति यह है कि स्त्रीअस्मिता के साथ भी हिंसाचार जुड़ा है। पुरूषों के हिंसाचार ने स्त्री अस्मिता के सवाल को तेजी से उभारने में मदद की। स्त्री अस्मिता की कोई भी बात आज पुंसहिंसा के बिना संभव नहीं है। अस्मिता और हिंसा का यह सहमेल शीतयुद्ध में चरमोत्कर्ष पर पहुँचा। इसमें खास किस्म की धारावाहिकता है। समाजवाद के पराभव के बाद भी अस्मिताजनित हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही।

एक और आयाम है जिसे ध्यान में रखें, वह है 1857 का संग्राम या युद्ध। इस संग्राम के साथ अस्मिता के सवालों का जन्म होता है लेकिन इसके साथ जुड़ी हिंसा को हमने कभी गंभीरता से नहीं देखा। कहने का आशय यह कि भारत में अस्मिता और हिंसा में चोली-दामन का साथ है। अस्मिता के साथ संस्कृति का विकास कम होता है हिंसा का विकास ज्यादा होता है। यह संयोग की बात है कि सतीप्रथा के विरोध के साथ भारत में स्त्री अस्मिता का सवाल सबसे पहले उठता है लेकिन इस सवाल के साथ जो हिंसाचार जुड़ा था उसकी हमने कभी पड़ताल ही नहीं की। सतीप्रथा में स्त्री के प्रति जो हिंसा निहित है, वह हमारे लिए चिंता नहीं बनी। अस्मिता के सवाल उठेंगे तो हिंसा होगी। यह हिंसा पहले हो या बाद में लेकिन हिंसा होगी।

अस्मिता के बारे में बहस करते समय हिंसा के आयाम को हमारे आलोचकों ने कभी गंभीरता से नहीं लिया। यही दशा जातिप्रथा और दलितसाहित्य की है। जातिप्रथा, दलितसाहित्य और अस्मिता के अन्तस्संबंध में जो भी बहस चल रही है उसमें जाति हिंसाचार को लेकर गंभीर भाव नहीं है। अस्मिता के साथ हिंसा की जुगलबंदी देखनी हो तो श्रीलंका को देखें जहां महात्मा बुद्ध के अनुयायी सिंघलियों ने अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए जातीयहिंसा के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए। हजारों तमिलों की हत्या कर दी। इसी तरह इस्लाम मानने वाले पाक में बंगालियों पर जमकर हमले किए और अंत में बंगलादेश का जन्म हुआ। आज धर्मप्रधान देशों में हिंसाचार कॉमन फिनोमिना है। एक बात और देखने की है अस्मिता की हिंसा में मरनेवालों की संख्या क्रमशः बढ़ी है। अस्मिता को हिंसा से पृथक करने के लिए जरूरी है कि अस्मिताओं का लोकतांत्रिकीकरण किया जाय और उनकी एक-दूसरे पर निर्भरता को बढ़ाया जाय। स्वायत्तता और परनिर्भरता में संतुलन पैदा किया जाय।

मजेदार बात यह है कि भारत में लोकतंत्र है और अस्मिता में अ-लोकतंत्र है। फलतः अस्मिता जब भी लोकतंत्र में आवाज उठाती है तो इन दोनों का संघर्ष लोकतंत्र बनाम अ-लोकतंत्र की जंग में तब्दील हो जाता है। लोकतंत्र बनाम अ-लोकतंत्र की जंग से बचने का सबसे सही मार्ग यह है कि अस्मिताएं आत्मनिर्भर बनें। अस्मिताएं आत्मनिर्भर तब ही बन सकती हैं जब वे अन्य की कीमत पर जिंदा रहने का ख्याल त्याग दें। मसलन् हिन्दी आत्मनिर्भर बने लेकिन अंग्रेजी के खिलाफ संघर्ष करके नहीं। अन्य रहेगा, अन्य को खत्म करके अस्मिता को मजबूत नहीं बनाया जा सकता। इसी तरह स्त्री आत्मनिर्भर बने लेकिन अपनी कीमत और शक्ति के आधार पर। पुरूष की शक्ति और कीमत के आधार पर नहीं। अस्मिता बनाम अन्य के संघर्ष और तनावों से बचा जाना चाहिए। इस क्रम में हमें अस्मिता के लिए शांति की भावना से जुड़े नए विचारों को निर्मित करना होगा। उन विचारों को त्यागना होगा जो अशांति पैदा करते हैं। इस क्रम में अस्मिता के सकारात्मक पहलुओं को उभारना होगा, उन पक्षों की चर्चा ज्यादा करनी होगी जो अस्मिताबोध में इजाफा करें। इस क्रम में अस्मिता में निहित प्रतिस्पर्धी भाव को खत्म करना होगा। अस्मिता का प्रतिस्पर्धीभाव अंततः तनाव और संघर्ष पैदा करता है। उन क्षेत्रों की पहचान की जानी चाहिए जहां पर तनाव है या हो सकता है। फिर उन उपायों के बारे में सोचना चाहिए जिनसे तनाव कम किए जा सकें।

अस्मिता में एक नहीं अनेक किस्म के तनाव एक ही साथ रहते हैं। अस्मिता को उन्मादी भाषा से सबसे पहले बचाने की जरूरत है। उन्मादी भाषा और विज्ञापन की भाषा अंततः हंगामे से आगे चीजों को विकसित होने नहीं देती। दूसरा, अस्मिता को अन्य की नैतिकता के सवालों से बचाने की जरूरत है। अस्मिता पर जब भी बातें होती हैं नैतिक प्रश्न सामने आकर खड़े हो जाते हैं। अस्मिता के सवाल नैतिकता के सवाल नहीं है। इसे न्यायपूर्ण सामाजिक विकास के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।

अस्मिता में हिंसाचार तब दाखिल होता है जब हम न्यायपूर्ण तरीकों और विवेकवादी नज़रिए को मानना बंद कर देते हैं या फिर रेशनल सांस्थानिक फैसलों को नहीं मानते। मसलन् युद्ध से लेकर स्त्री-अस्मिता तक सभी सवालों पर हमें अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय न्यायपूर्ण उपायों और संस्थानों के फैसलों को शांतिपूर्ण ढ़ंग से मान लेना चाहिए। न्यायपूर्ण सांस्थानिक फैसलों के उल्लंघन से भी अस्मिता में तनाव पैदा होता है। इसके अलावा अस्मिताधारियों में शांतिपूर्ण समाधान की ललक हो। शांतिपूर्ण समाधान समय खाते हैं। इस पद्धति से काम करने में समय ज्यादा खर्च होता है।

अस्मिता के सवालों को शार्टकट के जरिए हल नहीं करना चाहिए। इस क्रम में हमें ‘स्व’ की चिन्ताओं के साथ ‘अन्य’ की समस्याओं के प्रति भी हमदर्दी होनी चाहिए। ‘स्व’ की शांति तब ही संभव है जब ‘अन्य’ भी शांति से रहे। ‘अन्य’ को अशांत करके ‘स्व’ को शांति नहीं मिल सकती। मसलन् नामवरसिंह ने ‘स्वत्व’ के बहाने खड़ीबोली हिंदी की समस्याओं को तो सामने रखा और उन पर विचार किया, लेकिन अवधी, भोजपुरी आदि भाषाओं की समस्याओं की उपेक्षा की, इससे समस्या का समाधान कम हुआ। हिन्दी भाषी क्षेत्र की भाषाओं और बोलियों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ ही खड़ीबोली हिन्दी आत्मनिर्भर बन सकती है। यह संभव नहीं है हिन्दीभाषी क्षेत्र की अन्यभाषाएं पिछड़ी रह जाएं और खड़ीबोली हिन्दी तरक्की कर जाय। वही अस्मिता अपना विकास करती है जो अन्य की उपेक्षा न करे। अन्य के प्रति समानता और संतुलन के नजरिए से पेश आए।

हिंसा के बिना अस्मिता का विमर्श लिखा नहीं गया है। हालत इस कदर बदतर रहे हैं कि अस्मिता के नाम पर जनसंहार से लेकर साम्प्रदायिक हिंसा तक होती रही हैं। अस्मिता में जो लोग आनंद की खोज कर रहे हैं ,विकल्प खोज रहे हैं। वे असल में अस्मिता में निहित संभावित खतरों की अनदेखी करते हैं और अंत में खतरों में फंसते हैं। अस्मिता का प्रत्येक विवाद संदर्भ विशेष से जुड़ा है। लेकिन उसकी परिस्थितियां हमेशा बहुआयामी ख़तरों से भरी होती हैं। ये परिस्थितियां राजनीतिक-आर्थिक सांस्कृतिक और व्यक्तिगत कारणों से जुड़ी हुई हैं। अस्मिता के सवाल जब भी उठते हैं उनसे व्यक्तिगत और सामाजिक हिंसा किसी न किसी रूप में जुड़ी नजर आती है। स्त्री, दलित, हिन्दू, प्रान्तीयता, साम्प्रदायिकता और पृथकतावाद आदि के प्रसंग में यह बात एकदम खरी साबित हुई है।

एक अन्य पहलू है जिसे ध्यान में रखना होगा वह है- अस्मिता की अंतर्राष्ट्रीयता। अस्मिता के स्त्री, दलित, भाषा, जातीयता, नवजागरण आदि के जितने भी विवाद हैं वे स्थानीय के साथ अंतर्राष्ट्रीय हैं। मसलन् नवजागरण और जाति (नेशनेलिटी) का विवाद अंतर्राष्ट्रीय है। यही हाल बाकी विवादों का भी है। इस विवाद में अस्मिता को समुदाय के रूप में देखना और समुदाय को सुपर पावर के रूप में पेश करने का प्रबल भाव है। हिन्दीजाति को समुदाय के रूप में रामविलास शर्मा ने पेश किया और फिर उसकी शक्तियों का विस्तार के साथ खुलासा किया है। साथ ही हिन्दीजाति को अंतर्राष्ट्रीयस्तर पर घट रहे परिवर्तनों से जोड़ा। फलतः वे हिन्दीसमुदाय की रूपान्तरण की क्षमता को रेखांकित करने में सफल रहे। यही हाल नवजागरण का है। इसे भी स्थानीय रूप में खोलते हुए अंतर्राष्ट्रीय प्रक्रियाओं के साथ जोड़ने की पद्धति का नामवरसिंह-रामविलास शर्मा ने विकास किया है। स्त्रियों पर लिखते समय तो यह काम इन दिनों धडल्ले से हो रहा है।

अस्मिता का सवाल मानवाधिकारों के दायरे में आता है। यह अस्मिता की स्वतंत्रता और स्वायत्तता का सवाल भी है। इस क्रम में हमें मूलभूत संवैधानिक स्वतंत्रताओं को सुनिश्चित बनाना होगा। न्याय और समानता के आधार पर मसलों के शांतिपूर्ण ढ़ंग से समाधान खोजने होंगे। सहअस्तित्व, सद्भावना और सहमेल को बढ़ावा देना होगा। सन्1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में सैनिकों में अभूतपूर्व एकता नजर आई। इस एकता की तरह तरह से व्याख्या की गयी लेकिन उल्लेखनीय बात यह है कि 57 के संग्राम में जो एकता है वह हमेशा युद्ध के समय ट्राइवल यूनिटी के रूप में व्यक्त होती है। इसी तरह की एकता सन्1914 के प्रथम विश्वयुद्ध के समय भी देखने को मिली थी।

युद्ध के समय राष्ट्रीयएकता की तुलना में सामुदायिक एकता ज्यादा नजर आती है। हिन्दीभाषी क्षेत्र की जनता इस संग्राम पर एकजुट थी, इसके विपरीत बंगाल के बुद्धिजीवी एकदम भिन्न ढ़ंग से सोच रहे थे। युद्ध के दौरान अस्मिता की राजनीति का यह विशिष्ट लक्षण है कि वहां सामुदायिकचेतना ज्यादा मुखर रूप में व्यक्त होती है। इस तरह के युद्ध में सामुदायिक एकता और सामुदायिक कुर्बानी को रेखांकित करने की जरूरत है। यहां पर राष्ट्र अपने को समुदाय के रूप में व्यक्त करता है। सिपाही विद्रोह की खासियत यह थी कि यह आरंभ हुआ सिपाही विद्रोह से लेकिन इसने जल्द ही हिन्दू-मुस्लिम एकता की शक्ल अर्जित कर ली और कालान्तर में इस सीमा का भी अतिक्रमण कर गया। यह सामान्य मानवीय इच्छा होती है कि वह सीमाओं का अतिक्रमण करे और सन्1857 का संग्राम भी यही करता है। यह महज सिपाही विद्रोह नहीं रहता और प्रथम स्वाधीनता संग्राम में तब्दील हो जाता है। यह चंद सैनिकों की समस्या की अभिव्यक्ति न रहकर प्रथम मुक्ति संग्राम बन जाता है। यह सैनिकों का व्यक्तिगत मसला नहीं रह जाता। जबकि यह आरंभ हुआ था सैनिकों की व्यक्तिगत समस्या से। इस प्रक्रिया में कालांतर में प्रत्येक सैनिक एक बड़ी राष्ट्रीय इकाई का अंग नजर आने लगा। उनमें यह सचेतनता स्वतःस्फूर्त ढ़ंग से पैदा हुई। आरंभ में यह सैनिक समस्या के रूप में सामने आया, बाद में यह समस्या समुदाय और राष्ट्र की समस्या बन गयी।

आरंभ में गाय के चमड़े के कारतूस के इस्तेमाल के खिलाफ सैनिकों ने प्रतिवाद किया। इस प्रथम मुक्ति संग्राम के आरंभ और एकता की अभिव्यक्ति के केन्द्र में पशु (गाय) आया। समाजशास्त्री दुर्खीम ने इस पक्ष की ओर ध्यान खींचा है कि सामुदायिक (ट्राइवल यूनिटी) एकता पशु, पेड़-पौधे, पृथ्वी, स्वर्ग आदि के रूप में व्यक्त होती है। वहीं दूसरी ओर सैनिकों में एक खास किस्म का बागी भाव नजर आता है। वे अपने आत्मविश्वास को खोते नहीं हैं। बल्कि पूरे जोशो-खरोश के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त करते हैं और अन्य बटालियनों से भी मदद लेते हैं। अपनी छावनी के संघर्ष को बाहर की छावनियों तक फैला देते हैं। एक तरफ ये सैनिक बाहर के सैनिकों से जोड़कर अपना अलगाव कम करते हैं, वहीं दूसरी ओर भगवान से भी अपना संबंध-संपर्क जोड़ते हैं। इस तरह वे आधुनिकता के साथ आए अलगाव का एक समाधान निकाल लेते हैं और व्यापक एकता निर्मित करने में सफल हो जाते हैं। सीमित समस्या से आरंभ हुए विद्रोह को व्यापक अनंत संग्राम से जोड़ देते हैं। कालान्तर में इस संग्राम को लेकर तरह-तरह के नाम रखे गए लेकिन उनकी मंशा एकदम साफ थी।

सन् 57 के संग्राम ने सामाजिक एकता पैदा करने, विचारधारा के आधार पर एकजुट होने का संदेश दिया। इस क्रम ने व्यक्ति और समाज के बीच में नए किस्म की एकता को जन्म दिया। साथ ही इसकी प्रामाणिकता असंदिग्ध थी। प्रथम स्वाधीनता संग्राम ने सामाजिक लगाव और हिन्दीभाषी बौद्धिकों में आवयविक एकता पैदा की। समाज में सामंती चेतना के खिलाफ पूंजीवादी सचेतनता पैदा की। पहली बार धर्म और ईश्वर के विकल्प के तौर पर राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रवाद का जन्म हुआ। संस्कृति के क्षेत्र में विकल्प की संस्कृति के साथ, बुर्जुआ संस्कृति ने जन्म लिया।



उल्लेखनीय है प्रत्येक युद्ध अंततः सांस्कृतिक परिवर्तनों को जन्म देता है। सांस्कृतिक परिवर्तन के जरिए सत्ताधारी वर्ग अपना वर्चस्व बनाए रखने की कोशिश करते हैं। शिक्षा में खासकर नए परिवर्तन जन्मलेते हैं। प्रेस में नई संस्कृति व्यापक तौर पर अभिव्यक्ति पाती है और नए विधारूप के तौर पर उपन्यास का जन्म होता है। हिन्दी का 'परीक्षागुरू' अंग्रेजी के नॉवेल के पैटर्न का उपन्यास है यह बात आचार्य शुक्ल की तरह नामवर सिंह ने भी रेखांकित की है। ब्रिटिश शासकों की ओर से सचेतढंग से संस्कृति, परंपरा, भाषा और साहित्य की नई बुर्जुआ व्याख्याओं का जन्म होता है, प्राच्यवाद का स्कूल पैदा होता है जिसका प्रधान लक्ष्य था प्राचीन-मध्यकालीन संस्कृति की व्याख्या करना। इस समूची प्रक्रिया में नए किस्म की ब्रिटिशपरस्त अनुभूति और संवेदनशीलता पैदा होती है।

सन् 57 को लेकर हिन्दी में उत्सवधर्मी भाव है ,इसके बहाने बार बार जनता की साझा विरासत, साझा कुर्बानी और साझा समस्याओं पर खूब लिखा गया है। अधिकांश लेखकों और आलोचकों का इस घटना की ओर लौटना इस बात का संकेत है कि इस घटना से कम से कम सामुदायिक एकता और साम्प्रदायिक सद्भाव का संदेश जरूर मिलता है। इसी प्रसंग में उल्लेखनीय है कि युद्ध को जब भी याद करते हैं तो सामुदायिकता की भावना, राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रवाद की बातें खूब करते हैं। युद्ध की निंदा करते हैं। इस अर्थ में युद्ध हमेशा प्रेरक ऊर्जा का काम भी करता है। कुछ आलोचकों का मानना है शांति की तुलना में युद्ध ने हमेशा सर्जनात्मक प्रेरक की भूमिका अदा की है। सृजन के जरिए युद्ध की पीड़ा से मुक्ति पाते हैं। युद्ध के बाद हमेशा समाज को नए सिरे से ऊर्जस्वित करने में मदद मिलती है। इस संदर्भ को ध्यान में रखकर यदि सन् 57 के युद्ध को देखा जाय तो युद्धजनित परिस्थितियां ज्यादा सर्जनात्मक नजर आएंगी।

पूंजीवाद ने जब से अपने को साम्राज्यवाद के रूप में स्थापित किया और महाशक्ति बनाया उसका एक असर यह हुआ कि महाशक्ति कहलाने वाले देशों में जो भी कुछ घटता था उसका सीधा असर गुलाम दुनिया पर पड़ता था। यह बात 19वीं सदी में जितनी सच थी, आज 21वीं सदी में भी उतनी ही सच है। इसके अलावा धर्म और धार्मिक तत्ववाद का इस्तेमाल करने की परंपरा भी सबसे पहले महाशक्ति कहे जाने वाले देशों में ही दिखाई देती है। खासकर ईसाई फंडामेंटलिज्म का जमकर प्रचार –प्रसार हुआ। ब्रिटेन में उस जमाने में ईसाई कठमुल्लों को विभिन्न तरीकों से सत्ता का संरक्षण प्राप्त था। बाद में यह संरक्षण अन्य धार्मिक संकीर्णतावादियों को भी दिया गया। धर्म के आधार पर राजनीति करने वालों को ब्रिटिश शासकों ने खुला संरक्षण दिया। इसके गर्भ से ही 19वीं सदी में पुनरूत्थानवाद और कालान्तर में साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले संगठनों का जन्म होता है। यह समूची प्रक्रिया हिन्दू-मुस्लिम विभाजन और भारत-पाक विभाजन तक ले जाती है। ताकतवर पश्चिमी देशों का स्वाभाविक रूझान मुस्लिम फंडामेंटलिस्टों की ओर रहा है। ब्रिटेन ने सन् 57 के संग्राम के बाद सचेत रूप से सामाजिक सुधारों की प्रक्रिया को भारत में तिलांजलि दे दी। नवजागरण पर विचार करते समय उसके पुनरूत्थानवादी आयाम को समग्रता में समझने की जरूरत है।

इसी तरह नामवर सिंह ने भारतेन्दु साहित्य के बहाने जिस अस्मिता की बात कही है वह व्यक्तिगत अस्मिता नहीं है बल्कि सामुदायिक अस्मिता है। इसे व्यक्तिगत अस्मिता के सवालों के साथ गड्डमड्ड नहीं करना चाहिए। रामविलास शर्मा ने जिस तरह हिन्दीजाति को पहचान के परम या अंतिम रुप में पेश किया है। पहचान का यह रुप स्वीकार्य नहीं है। अस्मिता में परम या अंतिम पहचान जैसी चीज नहीं होती । हिन्दीजाति को या भाषा को आधार बनाकर अस्मिता की बात जब भी की जाएगी तो उसके गर्भ में से क्या निकलता है यह देखने की जरूरत है। अस्मिता पर बहस करते हुए यदि अस्मिता पर ही पहुँचते हैं तो अस्मिता की यह चक्राकार परिक्रमा अंततः हमें कहीं नहीं ले जाएगी। इसमें एक ही वृत्त में घूमते रहने की संभावनाएं ज्यादा हैं। जैसाकि रामविलास शर्मा ने किया है और नामवर सिंह भी ‘स्वत्व’ के नाम पर जिस अस्मिता की बात करते हैं वह चक्राकार है। वह भाषायी अस्मिता से आरंभ होती है और उसी पर खत्म होती है । यह भी कह सकते हैं कि वह एक ही संदर्भ में एक स्थिर रूप में भाषायी अस्मिता को देखते हैं। जबकि अस्मिता कभी स्थिर नहीं रहती, वह संदर्भ के साथ बदलती रहती है। वह धुरी पर नहीं घूमती। वह एक ही विषय या लक्ष्य पर केन्द्रित नहीं रहती। अस्मिता में एक अवधि के बाद अन्य की अस्मिता में घुलमिल जाने की प्रवृत्ति होती है। अस्मिता हमेशा कनवर्जन करती है। हिन्दीजाति की अस्मिता 19वीं सदी से लेकर आज तक एक ही स्थिर अवस्था में बरकरार नहीं रही है।

सवाल यह है कि हिन्दीजाति की अस्मिता का किन अस्मिताओं में रूपान्तरण हुआ है ? इसे तुलनात्मक तौर पर हमेशा अन्य अस्मिता रूपों के संदर्भ में देखना चाहिए। मसलन् 19वीं सदी के संदर्भ में स्त्री अस्मिता को भारतेन्दु महत्वपूर्ण नहीं मानते, वे भाषा की अस्मिता को महत्वपूर्ण मानते हैं। लेकिन आज भाषायी अस्मिता महत्वपूर्ण नहीं है। स्त्री अस्मिता महत्वपूर्ण है। आधुनिक पूंजीवादी विकास और जनमाध्यमों के विकास के कारण भाषायी अस्मिता धीरे धीरे गौण बन जाती है और अन्य अस्मिताएं उभरकर केन्द्र में आ जाती हैं। यहां तक कि प्रगतिशील आंदोलन के दौरान भाषायी अस्मिता की बजाय वर्गीय अस्मिता को प्रधान माना गया। इसका अर्थ यह भी है कि अस्मिताओं में समानता स्थापित नहीं की जा सकती। एक अस्मिता से दूसरी अस्मिता में भेद है, इनके दायरे अलग हैं, प्रभावक्षेत्र अलग हैं। मसलन् स्त्री के सवालों पर बंगाल के संदर्भ में जो तर्क दिए गए और संघर्ष हुए वैसे संघर्ष हिन्दीभाषी क्षेत्र में नहीं हुए। यही हाल महाराष्ट्र के रैनेसां का है। उसके तर्क और संघर्षों के साथ हिन्दीभाषी क्षेत्र की तुलना नहीं की जा सकती।

हिन्दी की आलोचना में सबसे बड़ी कमी यह है कि यहां विचारों से विचारों की तुलना की जाती है। मसलन्, यह संभव है एक समान विचार हों लेकिन समाज एक जैसा न हो। यह बात बंगाल और हिंदीभाषी क्षेत्र को देखकर आसानी से समझ सकते हैं । नवजागरण मात्र विचार नहीं है बल्कि नया समाज है । एक क्षेत्र में रैनेसां के विचार जो हैं. वे हो सकता है अन्य जातीयक्षेत्र में भी मिल जाएं लेकिन वहां रैनेसां न हो। रैनेसां कोई विचारों का खेलभर नहीं है। रैनेसां एक खास भौतिक परिस्थितियों में सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक संघर्ष के साथ नए वर्गों की सामाजिक भूमिका की भी मांग करता है।

नामवर सिंह ने अपने नवजागरण के खेल में विचारों के साम्य के आधार पर नवजागरण की परिभाषा और स्थितियों को देखा है। विचार के आधार पर स्थितियों को देखना भाववादी तरीका है इससे मार्क्सवादी नजरिए का कोई संबंध नहीं है। हिन्दीभाषी क्षेत्र की 19वीं सदी की परिस्थितियां बंगाल और महाराष्ट्र से एकदम भिन्न थीं। यहां न तो फुले जैसा आंदोलन था और न राजाराममोहन राय के नेतृत्व जैसा सतीप्रथा विरोधी आंदोलन था। अतःयहां के बुद्धिजीवियों में वैसी चेतना और उस चेतना के सामाजिक संप्रसार की भी संभावनाएं नहीं थीं। इसके अलावा हिन्दी में पूंजीवाद और मध्यवर्ग का उस तरह विकास नहीं हुआ जिस तरह बंगाल में हुआ था। हिन्दी जातीय क्षेत्र की बौद्धिक और भौतिक परिस्थितियां बंगाल और महाराष्ट्र से एकदम भिन्न थीं। महज विचारों की तुलना के आधार पर नवजागरण का आधार नहीं बनता। एक जैसे विचार यह संकेत देते हैं कि बहुत सीमित दायरे में बंगाल-महाराष्ट्र के नवजागरण के विचारों का असर था। यह असर व्यक्तिगत ज्यादा है, सामाजिक तो एकदम नहीं है। इस नजरिए से देखें तो भारतेन्दुमंडल के लेखकों के यहां जो भी नवजागरण संबंधी विचार मिलते हैं वे लेखकों के व्यक्तिगत विचार हैं और उनका हिन्दीक्षेत्र की परिस्थितियों के साथ बहुत कम संबंध है।

इसी प्रसंग में निजभाषा की उन्नति और ‘स्वत्व’ या अस्मिता के सवाल को ही गंभीरता से लें और देखें कि निजभाषा को लेकर हिन्दीभाषी बुद्धिजीवी और समाज का रवैय्या क्या बंगाल के बुद्धिजीवी और समाज की तरह ही है? बंगाल,महाराष्ट्र और तमिलनाडु में जातीय भाषाई अस्मिता को लेकर जो सामाजिक संघर्ष चला है वैसा कोई भी आंदोलन हिन्दीभाषी क्षेत्र में न तो 19वीं सदी में चला और नहीं 20वीं सदी में चला। 20वीं सदी में हिन्दीभाषी क्षेत्र के बुद्धिजीवी वर्ग ने सचेत रूप से हिन्दी से अपने को अलगाया है और अंग्रेजी भाषा के साथ जोड़ा है। जबकि बंगाल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बंगाल में मध्यवर्ग ने सचेत रूप से बंगलाभाषा का सामाजिक आधार बनाया। इस तरह का आधार हिन्दीक्षेत्र में नहीं बन पाया। बंगाली मध्यवर्ग ने सचेत रूप से बंगाली भद्रजन की भाषा को आम जनता की भाषा में रूपान्तरित किया लेकिन हिन्दीक्षेत्र में अभिजन की भाषा को हम जनभाषा में रूपान्तरित नहीं कर पाए हैं। आज भी हिन्दीभाषी क्षेत्र में स्थानीय बोलियों का बोलबाला है। खड़ीबोली हिन्दी और उससे जुड़ी शिक्षित वर्ग की संस्कृति और सभ्यता को आमजन की संपदा में रूपान्तरित नहीं कर पाए हैं।

मसलन् दिल्ली से 60किलोमीटर दूर हरियाणा में हिन्दी की अभिजन संस्कृति का कोई असर दूर-दूर तक नजर नहीं आएगा, इसके विपरीत बंगाल में एक अभिजन जिस भाषा को बोलता है वही भाषा एक झोंपडपट्टी में रहने वाला गरीब बंगाली भी बोलता नजर आएगा।

आम अभिजन जिस तरह भाषा में गालियां अथवा असभ्य शब्दों के प्रयोग से नफरत करता है वैसी ही ऩफरत आपको आम गरीब बंगाली के यहां भी देखने को मिलेगी। लेकिन हिन्दी में ऐसा आज तक नहीं हो पाया है। भाषा में ‘स्वत्व’ हासिल करें इसके लिए जरूरी है कि अभिजन की भाषा को आमजन की भाषा में तब्दील किया जाय। अभिजन की भाषा के संस्कार, मूल्य और आदतें आमजन में पैदा किए जाएं। लेकिन हिन्दी में ऐसा अभी तक नहीं हो पाया है। उसका सामाजिक वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। भाषायी अस्मिता की लडाई यहां के इलाकों में कभी लड़ी ही नहीं गयी। इसके कारण यहां के मध्यवर्ग में अंग्रेजी के प्रति स्वाभाविक आकर्षण नजर आता है। वह अपनी भाषा, उसके मूल्य, साहित्य आदि को लेकर वैसा दीवानापन नहीं है जैसा दीवानापन बंगाली या मराठी या तमिल में है।

यह कहना ज्यादा सही होगा कि हिन्दी में नवजागरण नहीं हुआ। नवजागरण हुआ होता तो बहस के मुद्दे कुछ और होते। मसलन् नवजागरण के साथ पूंजीवादी मूल्यों और आर्थिक विकास के सवाल इन इलाकों में बहस के केन्द्र में होते। बंगाली और मराठी बुद्धिजीवियों ने नवजागरण के दौरान पूंजीवादी विकास को लेकर जिस तरह की गंभीर बहसें चलायी हैं और अर्थव्यवस्था पर लिखा है वैसा लेखन 19वीं सदी में हिन्दी में दूर-दूर तक नजर नहीं आता। नवजागरण कोई साहित्य-कला मूल्य नहीं है, उसका अर्थशास्त्र और विज्ञान भी है। हिन्दी में कभी पूंजीवादी अर्थशास्त्र को खोलकर विश्लेषित करने की व्यापक कोशिश नजर नहीं आती। यही हाल विज्ञान के क्षेत्र में नजर आता है। इसके अलावा सबसे बड़ी कमी नजर आती है वह है शिक्षित भाषायी मध्यवर्ग का विकसित न हो पाना। हिन्दीभाषीक्षेत्र में शिक्षित मध्यवर्ग का विकास एकदम भिन्न ढ़ंग से होता है।

हिन्दी आलोचना के नवजागरण संबंधी विमर्श को गंभीरता से देखें तो पाएंगे कि यहां पर आलोचक पहले एक हाइपोथीसिस बनाता है और फिर उसके आधार पर तर्कों का पहाड़ खड़ा करता है और अनुकूल विचारों और मूल्यों को क्रमशः रखता चला जाता है। वह यह परखने की कोशिश ही नहीं करता कि क्या उसके बताए विचार सामाजिक वास्तविकता से मेल खाते हैं ? इस तरह वह आलोचना को विचारों के अनुमान के आधार पर विकसित करने लगता है। इस क्रम में हम भूल ही गए हैं कि आलोचना कोई हाइपोथीसिस नहीं है। हाइपोथीसिस से बात आरंभ हो सकती है लेकिन अंततः तो सामाजिक यथार्थ की कसौटी पर हाइपोथीसिस की परीक्षा की जानी चाहिए। भाषा के ‘स्वत्व’ का सवाल बड़ा सवाल है लेकिन देखना होगा कि इसकी वास्तव जमीन किस तरह की है। मजेदार बात यह है कि हिन्दी आलोचकों ने नवजागरण के समय के साहित्य के आधार पर भाषासंबंधी निष्कर्ष निकाले हैं लेकिन समाचारपत्र और पत्रिकाओं में छप रही हिन्दीभाषा को विचार के केन्द्र में नहीं रखा। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि प्रेस (मीडिया) को एक संस्थान के रूप में कभी विश्लेषित करने की कोशिश नहीं की। इसके विपरीत यह देखा गया कि लोकप्रिय प्रेस को हिकारत की नजर से देखा गया। मुश्किल यह है कि लोकप्रिय प्रेस को खोले बगैर नवजागरण समझ में नहीं आएगा।

नवजागरण विमर्श मात्र साहित्यविमर्श नहीं है बल्कि उसमें मीडिया और दूरसंचार की भी बड़ी भूमिका है। हिन्दी आलोचक न तो शिक्षा की स्थिति का आकलन करता है और न पूंजीवाद का आकलन करता है, न प्रेस और दूरसंचार का आकलन करता है ऐसी स्थिति में वह बहुत कम सामग्री के साथ नवजागरण के प्रसंग में सिर्फ साहित्य के एक दायरे को खोलता है। यहां पर भी बाजारू साहित्य और श्रेष्ठ साहित्य का भेद साफ नजर आता है। श्रेष्ठ साहित्य में भी उसका दायरा भारतेन्दुमंडल के लेखकों तक ही सीमित है। वे भारतेन्दु के पहले के हिन्दीप्रेस में प्रकाशित साहित्य और गद्य पर बातें नहीं करते। ‘परीक्षागुरु’ उपन्यास पर बातें करते हैं लेकिन देवकीनंदन खत्री के उपन्यासों पर बात नहीं करते। कहने का अर्थ यह है कि लोकप्रिय उपन्यास, लोकप्रिय कम्युनिकेशन, लोकप्रिय प्रेस के बिना नवजागरण की प्रकृति समझ में नहीं आ सकती। नामवर सिंह के नवजागरण विमर्श में ये सब क्षेत्र कहीं पर भी उल्लेख योग्य स्थान नहीं पाते। सवाल यह है कि अस्मिता का निर्माण क्या पॉपुलर की उपेक्षा करके संभव है ?

कल्चर और पॉपुलरकल्चर के बिना नवजागरण की परतें नहीं खुल सकतीं। हिन्दी समीक्षक को कल्चर पसंद है, पॉपुलरकल्चर नहीं। साहित्य आज भी हिन्दी में कल्चर का हिस्सा है, पॉपुलरकल्चर का हिस्सा नहीं है। पॉपुलर कल्चर से आज भी हिन्दी समीक्षक दूरी बनाए हुए है और पॉपुलर कल्चर को हेय दृष्टि से देखता है। जबकि सच यह है कि वह दैनंदिन जिंदगी तो पॉपुलरकल्चर में जीता है। यह संस्कृति उसके दिलो-दिमाग पर गहरा असर डालती है। नवजागरण के लेखकों की अधिकतर आदतें पॉपुलरकल्चर से जुड़ी हैं और उन आदतों का उनके व्यक्तित्व से गहरा संबंध है। नामवर सिंह से सवाल किया जाना चाहिए क्या लेखक की आदतें उसके भाषा और साहित्य संबंधी संस्कार बनाती हैं या नहीं ? भारतेन्दुमंडल के लेखकों की आदतें पूंजीवादी थीं या सामंती ? या उनके व्यक्तित्व में उन दोनों का मिला-जुला रूप था? क्या इसका उनके साहित्य और समाज पर कोई असर था ?
       

नवजागरण बुर्जुआ खेल है। बुर्जुआ विचारों और मूल्यों के सृजन में इसकी केन्द्रीय भूमिका रही है। हिन्दी में जो आलोचक नवजागरण के दीवाने हैं और इसे परम पुण्य-साहित्य-सलिला के रूप में देखते हैं, उनके यहां नवजागरण परम सत्य है। हिन्दी आलोचकों में जिनलोगों ने नवजागरण पर विचार किया है उनमें मार्क्सवादी समीक्षकों की बड़ी भूमिका है। सवाल यह है कि नवजागरण की परंपरा बुर्जुआ साहित्य परंपरा है तो फिर उसमें समाजवादी या अन्य रेडीकल साहित्यलेखकों को रखने की कोशिश क्यों की जाती है? नवजागरण का प्रकल्प समाजवादी प्रकल्प नहीं है। वे लेखक जो समाजवाद की परंपरा में आते हैं उनको नवजागरण की परंपरा में रखना सही नहीं है। नवजागरण यदि बुर्जुआ प्रकल्प है तो भारतेन्दुमंडल के लेखकों का लेखन भी बुर्जुआलेखन की कोटि में आता है। भारतेन्दु उदार पूंजीवादी विचारों और मूल्यों के सर्जक के रूप में हिन्दी साहित्य में अवतरित होते हैं। फलतः भारतेन्दु की परंपरा में उन लेखकों को नहीं रखा जा सकता जिन लेखकों ने बुर्जुआ मूल्यों से भिन्न विकल्प का रास्ता चुना है। मसलन् भारतेन्दु की परंपरा में प्रेमचन्द, निराला, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल आदि को नहीं रखा जा सकता।

इसी तरह हिन्दी आलोचना में रामचन्द्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना परंपरा बुर्जुआ आलोचना परंपरा है। उसमें रामविलास शर्मा और नामवर सिंह को नहीं रखा जा सकता। हमें बुर्जुआ आलोचना और मार्क्सवादी आलोचना परंपरा में अंतर करना होगा। पहली परंपरा और दूसरी परंपरा के नाम पर जो विभाजन किया गया है वह अवैज्ञानिक है। सवाल यह है कि परंपरा का नामकरण विचारधारा के आधार पर होना चाहिए या अवधारणा या प्रवृत्ति के आधार पर? आलोचकों से सवाल किया जाना चाहिए कि क्या रामविलास शर्मा सच में रामचन्द्र शुक्ल की परंपरा में आते हैं? क्या नामवर सिंह को हजारीप्रसाद द्विवेदी की परंपरा में रख सकते हैं?

हिन्दी आलोचना में इकहरे ढ़ंग से सोचने की आदत है। भारतेन्दुयुग, महावीरप्रसाद द्विवेदी युग आदि के नामकरण के पीछे सब कुछ को एक ही परंपरा या एक ही नजरिए की श्रृंखला में पिरोकर देखने की आदत रही है। सच है कि हिन्दी में एक नहीं कई साहित्य परंपराएं हैं। एक नहीं अनेक दृष्टिकोण हैं। मसलन् भारतेन्दु की परंपरा में दलितसाहित्य या स्त्रीसाहित्य की परंपरा को नहीं रखा जा सकता। साथ ही ये दोनों परंपराएं नवजागरण के प्रति मार्क्सवादी और गैर-मार्क्सवादी आलोचकों के नजरिए से अपने को अलगाती हैं। इन दोनों साहित्य परंपराओं का सामाजिक आधार भी भारतेन्दुमंडल के लेखकों से भिन्न है।

हिन्दी आलोचना में नवजागरण की खोज और विमर्श में नवजागरण की खोज पर जितना जोर दिया गया उससे ज्यादा नवजागरण की परंपरा के साथ जुड़ने और नवजागरण के असली वारिस बनने पर जोर दिया गया। इसके कारण मार्क्सवादी आलोचना अपने को बुर्जुआ आलोचनादृष्टि से अलगाने की बजाय बुर्जुआजी के वैचारिक खेल में फंसकर रह गयी। आलोचना के बुर्जुआ खेल में फंसने के कारण मार्क्सवादी आलोचना अपना स्वतंत्र वैचारिक अवधारणात्मक आधार निर्मित नहीं कर पायी।

मार्क्सवादी आलोचना में बुर्जुआ खेल किस तरह चलता रहा है उसका आदर्श नमूना है नामवरसिंह का आलोचना लेखन। नामवरसिंह ने आलोचना में नवजागरण के बारे में अपने विचार ऐसे समय व्यक्त किए जब हिन्दी आलोचना में नवजागरण की चर्चा तकरीबन बंद हो गई थी। इस चर्चा को नए सिरे से उठाते हुए उन्होंने नवजागरण के प्रसंग में अस्मिता की अवधारणा पर जोर दिया, भारतेन्दु के प्रसंग में निजभाषा के सवाल को ‘स्वत्व’ और अस्मिता का सवाल बनाया। अस्मिता का सवाल बुर्जुआ विचारधारा का शीतयुद्धीय राजनीति का सबसे प्रिय सवाल है। अस्मिता के सवाल को उठाते हुए वे परंपरागत आलोचना के दायरे से बाहर नहीं निकल पाते। अस्मिता को राजनीतिक स्वाधीनता या स्वाधीनता से जोड़ते हैं।

उल्लेखनीय है अस्मिता का सवाल आज जिस रूप में उठ रहा है नवजागरण के दौरान उसी रूप में नहीं उठा था। नवजागरण के समय अस्मिता को सामाजिक पहचान के रूप में उठाया गया था। वहां व्यक्ति की निजता, स्वायत्तता और स्वतंत्रता को प्रमुखता नहीं मिल पायी थी। व्यक्ति की स्वायत्तता को नवजागरण के दौर में बहसतलब ही नहीं समझा गया। व्यक्ति की निजता और स्वायत्तता को परिवार के ढांचे के साथ बांधकर रखा गया था। इसी तरह भाषा की स्वायत्तता और विकास को समानता के नजरिए से नहीं देखा गया। निजभाषा के विकास की बातें अमूर्त रूप में ही सामने आती हैं। निजभाषा के विकास का कोई राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य उस समय स्पष्ट रुप में सामने नहीं था। अस्मिता की अवधारणा को व्याख्यायित करते हुए सबसे प्रमुख हिन्दी समीक्षकों ने अंतर्वस्तु समीक्षा को आधार बनाया है। साथ ही पूंजीवाद की प्रकृति की भी समीक्षा की है। इस क्रम में कई जगह तुलना से काम लिया है। तुलना करके इकसार अंतर्वस्तु को स्थापित करना और उसके आधार पर अवधारणा बनाना सही पैमाना नहीं कहा जा सकता। मसलन् इटली के रैनेसां के साथ आए बुद्धिवाद और भारत के बुद्धिवाद के बीच तुलना करना सही नहीं होगा। इसी तरह यूरोप के नवजागरण के साथ भारत की तुलना करना भी सही नहीं है। अवधारणा तय करते समय तुलना की अवधारणा का इस्तेमाल करना सही नहीं होगा। इसी प्रकार जातीयभाषाओं के बीच में तुलना के आधार पर निष्कर्ष निकालना भी सही नहीं है। प्रत्येक भाषा के विकास की प्रक्रिया अलग है और उसकी समस्याएं भी एक जैसी नहीं हैं। भाषा की अस्मिता के आधार पर तुलनात्मकतौर पर अस्मिता को स्थिर करने का काम हिन्दी में ज्यादा हुआ है और उसमें जातीयता और जातीयभाषा की अवधारणा का इस्तेमाल तुलनात्मक तौर पर किया गया है।

जातीयभाषा को आधार बनाकर दिए गए तर्क अपने आपमें मुश्किलें खड़ी करते हैं। इसमें पहली मुश्किल है भाषा को परम तत्व मान लेने की। कोई भी भाषा परम नहीं है। निष्पन्न नहीं है। प्रत्येकभाषा की विकास परंपरा और सामाजिक आधार या बोलने वाली जनता के साथ उसका रिश्ता भिन्न रुप में निर्मित होता है। यह बोलने वाले की चेतना, सामाजिक संबंधों की स्थिति, कम्युनिकेशन के स्तर और कम्युनिकेशन संस्थानों की अवस्था आदि पर निर्भर होती है जो प्रत्येक समाज में एक जैसी नहीं होती। मसलन् तमिल और बंगला भाषा की तरह खड़ीबोली हिन्दी का विकास नहीं हुआ है। इनके बोलने वाले और संस्थान भिन्न रहे हैं फलतः तमिल या बंगला जातिभाषा की तरह खड़ीबोली हिन्दी के विकास को देखना सही नहीं होगा। उसी तरह यूरोप या सोवियत संघ की जातीयभाषा और जातीयता की अंतर्वस्तु के साथ जोड़कर देखना भी सही नहीं होगा। हमारे यहां सामाजिक समूहों की संरचना जातिप्रथा पर आधारित है और इसके कारण भाषा और उसका विकास भी प्रभावित हुआ है। यहां के जातिसमूहों को यूरोप के सामाजिक समूहों की तरह परिभाषित नहीं किया जा सकता। भारत में शूद्रों को परिभाषित करते समय ब्राह्मणों को परिभाषित करना जरूरी है। सवर्ण के बिना असवर्ण की पहचान तय नहीं कर सकते। इसी तरह इन दोनों की शैक्षणिक स्थिति को भी ध्यान में रखना होगा।

जिनलोगों की अभिव्यक्ति का माध्यम जनभाषा है वे लोग और जिनकी अभिव्यक्ति की भाषा स्टैंडर्ड या सत्ताधारियों की भाषा है, उनके बीच में भाषिक तुलनाएं करना सही नहीं होगा। यह एक सच्चाई है खड़ीबोली हिन्दी शिक्षितों की भाषा थी और व्यापारियों (खत्री व्यापारियों) के यहां इसका उपयोग होता था। इसके विपरीत मैथिली, अवधी, भोजपुरी, ब्रजभाषा आदि की स्थिति एकदम भिन्न थी, ये जनभाषाएं थीं। इसी तरह हिन्दीक्षेत्र में अभिजन और आम आदमी के भाषिक संसाधन अलग-अलग थे। इसके कारण भाषा के स्तर पर सत्य को समझना और व्याख्यायित करने का रूप भिन्न था। एक ही सत्य को खड़ीबोली हिन्दी बोलने वाला जिस रूप में देख रहा था जरूरी नहीं है जनभाषा बोलने वाला व्यक्ति भी वैसे ही देखे ? क्योंकि सत्य के वाक्य-विन्यास की स्थितियां एक जैसी नहीं रहेंगी। यह भी संभव है जो सत्य खड़ीबोली हिन्दी लेखक को नजर आ रहा हो वह जनभाषी को नजर ही न आए।

दो भाषाओं में तुलना करते समय यदि सत्य को व्यक्त करने की भाषा एक जैसी है तो इसका यह अर्थ नहीं है कि उसकी ज्ञानमीमांसात्मक चेतना भी एक जैसी होगी। मसलन् स्त्री के आधुनिकरूप की बात भारतेन्दुमंडल के यहां भी है और बंगला लेखकों और विचारकों के यहां भी है लेकिन क्या सामाजिक स्तर एक जैसा है? आज भी बंगलाभाषी स्त्री और हिन्दीभाषी स्त्री का यथार्थ एक जैसा नहीं है। चेतना का स्तर एक जैसा नहीं है। 19वीं सदी के बंगाली बुद्धिजीवी और हिन्दी बुद्धिजीवी के विचार अनेक मामलों में मिलते हैं लेकिन सामाजिक धरातल पर, सत्य के धरातल पर विराट अंतराल है। बंगला बुद्धिजीवी के लिए सतीप्रथा एक समस्या है लेकिन हिन्दीप्रान्तों में यह समस्या नहीं है। इस समस्या को लेकर कोई सामाजिक हलचल नहीं है। यह संभव है दो जातीयभाषाओं में किसी विषय पर एक जैसे विचार व्यक्त किए गए हों लेकिन सामाजिकस्तर पर चेतना और सत्य को लेकर व्यापक अंतर हो। कुछ लोगों के लिए जातिसूचक नामों का प्रयोग करना जातिवाद प्रतीत हो सकता है लेकिन किसी अन्य जाति में यह भावना ही न हो। मसलन् हिन्दीभाषी क्षेत्र में जातिसूचक नाम के प्रयोग जातिभेद को व्यक्त करते हैं लेकिन बंगला में यह भेद नवजागरण के दौरान ही खत्म हो गया ।

अंतर्वस्तु समान होने से अवधारणा नहीं बनती। इसके समानान्तर अर्थ के आधार पर भी अर्थ सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। सवाल यह है कि नवजागरण के संदर्भ में जिन अवधारणाओं की बात की जाती रही है वे क्या सामाजिक यथार्थ से मेल खाती हैं ? हिन्दी में सामाजिक यथार्थ (शिक्षित-अशिक्षित दोनों का) के साथ अवधारणा का व्यापक अंतराल है। कोई भी अवधारणा वैज्ञानिक रूप में तब ही स्थापित होती है जब उसका सामाजिक ऑब्जेक्ट के साथ साम्य हो।

नवजागरण में विवेकवाद और बुद्धिवाद है लेकिन क्या वास्तव में हिन्दी के शिक्षितवर्ग की उस दौर की चेतना और व्यवहार के साथ ये तत्व मेल खाते हैं ? अवधारणा तब तक नहीं बनती जब तक विचार विशेष और ऑब्जेक्ट के बीच में साम्य स्थापित न हो जाय ।

अस्मिता में समत्व के विचार के आधार पर जब भी अस्मिता बनायी जाएगी उसमें समस्याएं रहेंगी। समत्व के आधार पर बनायी गयी अधिकांश धारणाएं ऑब्जेक्ट के साथ मेल नहीं खातीं। फलतः अवधारणा और ​यथार्थ में मेल नजर नहीं आता। सामाजिक चेतना और सामाजिक विकास के बीच में फांक नजर आती है। भाषा और उसके सामाजिक आधार के बीच में अंतराल नजर आता है। भाषा के बारे में सचेतनता जितनी बढती जाती है उसी अनुपात में वैचारिक समझ भी बढ़ती जाती है। हमारे अनुमान करने की क्षमता में भी इजाफा होता जाता है। साथ ही भाषा की ज्ञानमीमांसा और व्याख्या में भी बदलाव आता है। इसके अलावा भाषा की व्याख्या बार बार बदलती है। कल तक जिसे जातीयभाषा कहते थे जरूरी नही है वह आज जातीय भाषा के रूप में न जानी जाती हो। हिन्दी आज कॉमन कम्युनिकेशन की राष्ट्रीय –ग्लोबल भाषा है। मूल बात यह है कि भाषा में व्याख्या के स्तर पर फ्रैगमेंटेशन स्वाभाविक चीज है। भाषा में सम्मिश्रण स्वाभाविक चीज है। यदि अस्मिता की अवधारणा का सामाजिक यथार्थ से मेल नहीं हो पाता है तो वैसी स्थिति में अवधारणा के असफल हो जाने या अप्रासंगिक हो जाने का खतरा रहता है। हिन्दी में नवजागरण की अवधारणा की तकरीबन यही स्थिति है।

हिन्दी नवजागरण की सबसे बड़ी मुश्किल है कि हमने हिन्दीभाषी क्षेत्र के अन्य हिस्सों को विस्तार के साथ कभी खोलने की कोशिश ही नहीं की। नवजागरण हो तो इसके लिए जरूरी है कि उसके समूचे क्षेत्र को विस्तार से खोला जाय। हिन्दी नवजागरण तब ही संभव है जब हम हिन्दी अस्मिता को मानें और हिन्दी अस्मिता पूरी तरह निर्मित तब ही होती है जब हिन्दीक्षेत्र के बृहत्तर हिस्सों को खोला जाए। हिन्दी जाति और अन्यजातियों के बीच के संबंध को भी रेखांकित किया जाय। अस्मिता जहां एक ओर अपने को विवेचित करती है वहीं दूसरी ओर अन्य को जन्म भी देती है। अतः पहले हमें यह देखना चाहिए कि हिन्दीजाति अपना वर्णन कैसे करती है और किस तरह अन्य सामाजिक इकाइयों के प्रति रिएक्ट करती है।

अस्मिता विमर्श को जिन लोगों ने निर्मित या प्रचारित किया है उनकी अन्य अस्मिताओं के विमर्श में कोई खास दिलचस्पी नहीं देखी गयी। मसलन् भाषा की अस्मिता पर नामवर सिंह ने जोर दिया लेकिन स्त्री और दलित अस्मिता के सवाल उनके लिए हाशिए के सवाल भी नहीं रहे हैं। यही हाल रामविलास शर्मा का है। उनके लिए अस्मिता के रुप में हिन्दीजाति का सवाल प्रमुख है लेकिन उन्होंने कभी अन्य अस्मिताओं के सवालों पर विचार ही नहीं किया। रामविलास शर्मा ने समूचे लेखन से यह आभास मिलता है कि हिन्दीजाति का सवाल मार्क्सवादी चिंतन का हिस्सा है और स्त्री या दलित अस्मिता के सवाल उसका हिस्सा नहीं हैं। सच यह है कि अस्मिता विमर्श अंततः परंपरागत मार्क्सवादी पैराडाइम का अंग नहीं है। यह कम्युनिस्ट पार्टियों के विमर्श का हिस्सा भी नहीं है। अस्मिता के रुप में हिन्दीभाषा को आधार बनाकर आज हम जब बहस करते हैं और 19वीं सदी को याद करते हैं और उसकी स्मृतियों में डूबकर गोते लगाते हैं तो यह भूल ही जाते हैं कि हिन्दीभाषी जनता में अस्मिता के रूप में भाषा को आधार बनाएंगे तो इसमें अनेक उलझनों में फंस सकते हैं। मसलन् जो खड़ीबोली हिन्दी को अपनी अस्मिता मान रहे हैं उनकी भाषायी अस्मिता किसी अन्य भाषा से जुड़ी हो सकती है। हिन्दीभाषी क्षेत्र में एक व्यापक मध्यवर्ग पैदा हुआ है वो अपनी भाषायी अस्मिता को हिन्दी से नहीं अंग्रेजी से जोड़ता है। अन्य ऐसे भी लोग हैं जो अन्य भाषायी अस्मिताओं से अपने को जोड़ते हैं।

अस्मिता पर बात करते समय एक ही अस्मिता को एक समय में निर्धारक बनाया जा सकता है। अन्य अस्मिताएं गौण हो जाती हैं।लेकिन समय और परिस्थितियां बदलने के साथ अस्मिता भी बदलती है। यह संभव है जो अस्मिता पहले गौण नजर आ रही हो वह आज सक्रिय और प्रधान अस्मिता बन जाए। हिन्दीजाति की बहस में असल समस्या यह है कि हिन्दीजाति अमूर्त नजर आती है। हिन्दीजाति की अमूर्तता का प्रधान रूप तब सामने आता है जब हिन्दीजाति की अन्य जातियों के साथ तुलना की जाती है। जब आप एक जाति के साथ दूसरी जाति की तुलना करते हैं तो अमूर्त अस्मिता बनाते हैं। लक्षणों के आधार पर साम्य स्थापित जब भी करेंगे तो अमूर्तता पैदा होगी। मसलन्, रामलाल की रामलाल वर्मा के साथ तुलना करके एक जैसा अर्थ व्यंजित करने या एक जैसा अर्थ खोजने की जब भी कोशिश की जाएगी अस्मिता अमूर्त शक्ल ग्रहण कर लेगी। एक प्रोफेसर की दूसरे प्रोफेसर के साथ पद के आधार पर तुलना की जाएगी तो अमूर्त अस्मिता जन्म लेगी। इसी तरह एक भाषा की दूसरी भाषा के साथ एक जाति की दूसरी जाति के साथ लक्षणों के आधार पर तुलना मुश्किलें खड़ी करती है और इससे अमूर्त अस्मिता का जन्म होता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि भाषा के आधार पर जब भी अस्मिता बनेगी वह अमूर्त ही होगी। अमूर्त अस्मिता का खतरा अन्य अस्मिता-रूपों के साथ भी हो सकता है। मसलन् ज्योंही हिन्दीभाषी औरत और बंगाली औरत की तुलना करते हुए लक्षण साम्य खोजने की कोशिश की जाएगी तो अमूर्तन पैदा होगा।

नामवरसिंह ने ‘स्वत्व’ के बहाने जिस अस्मिता की बात की है उसे वे मानवाधिकारों से जोड़कर नहीं देखते। भाषायी अस्मिता का सवाल हो या निजी या सामाजिक अस्मिता के सवाल हों-- ये सभी सवाल मानवाधिकार के दायरे में आते हैं। सवाल यह है कि नामवरसिंह मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में रखकर क्यों नहीं सोचते ? वे जानते हैं कि अस्मिता को मानवाधिकार के दायरे में रखकर देखा जाना चाहिए। लेकिन वे मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में रखकर नहीं सोचते फलतः वे जिस अस्मिता की बात करते हैं उसकी राजनीति और विचारधारा दोनों के अतर्विरोधों को छिपाते हैं। अस्मिता का सवाल मानवाधिकार का सवाल है। यह महज साहित्य-प्रपंच नहीं है। भारतेन्दु के दौर में मानवाधिकार की समझ नहीं थी लेकिन आज तो है। भारतेन्दु नहीं जानते थे, लेकिन नामवर सिंह जानते हैं। आलोचना में मानवाधिकारों की प्रतिष्ठा के बिना आलोचना का लोकतांत्रिकीकरण संभव नहीं है। आलोचना की आंतरिक प्रक्रिया पारदर्शी नहीं बनती।

नामवर सिंह को आलोचना में फतवे देने में मजा आता है। आलोचना में फतवेबाजी वस्तुतः आलोचना का अंत है। आलोचना में सरलीकरण करना भी आलोचना का अंत है। दुर्भाग्य से नामवर सिंह ने अपने नवजागरण लेखन में यही किया है। वे फतवे देते हैं। निष्कर्ष देते हैं। वे कभी किसी मुद्दे को गंभीरता के साथ विश्लेषित नहीं करते। ‘स्वत्व’ को यदि वे अस्मिता से जोड़ते हैं तो यह भी देखें कि क्या खड़ीबोली हिन्दी का हिन्दीभाषी क्षेत्र की बोलियों और भाषाओं के साथ भाईचारा और आंतरिकता बढ़ी है या घटी है? क्योंकि अस्मिता की राजनीति भावनात्मक बंधनों को मजबूत करती है। लेकिन विगत 65सालों का अनुभव बताता है कि हिन्दीभाषी क्षेत्र की भाषाओं और बोलियों के साथ खड़ीबोली की दूरी बढ़ी है। हिन्दीभाषी क्षेत्र में खड़ीबोली के अलावा अन्य भाषाओं और बोलियों के पठन-पाठन और प्रकाशन में ह्रास आया है। खासकर अकादमिक स्तर पर यह खाई व्यापक रूप में नजर आती है। यह अचानक नहीं है कि नामवरसिंह ने हिन्दी भाषीक्षेत्र की खड़ीबोली से इतरभाषाओं और बोलियों के साहित्य पर कुछ भी नहीं लिखा।

अस्मिता की पहचान हमेशा अपने सामाजिक समूह से भावनात्मक तौर पर जुड़ी रहती है। उसके दमित, वंचित सामाजिक समूहों को अभिव्यक्ति देती है। हिन्दी में यह देखना मजेदार होगा कि किसानों और मजदूरों पर कितना कथासाहित्य या काव्य लिखा गया? ये वे वर्ग हैं जो बृहत्तर सामाजिक समुदाय और भाषाओं के दायरे को समेटते हैं। हिन्दी का अधिकांश साहित्य मध्यवर्गकेन्द्रित रहा है। यह वर्ग हिन्दी का बड़ा भोक्ता भी है। यहां तक कि दलितों और स्त्रियों का भी अधिकांश लेखन मध्यवर्ग केन्द्रित है। इस वर्ग के चित्रण में एक खास फिनोमिना नजर आता है कि वहां पर बार बार यह दरशाने की कोशिश की जा रही है मध्यवर्ग बदल रहा है, वह पहले जैसा था अब वैसा नहीं है। यानी मध्यवर्ग के रूपान्तरित रूपों की चर्चा खूब हो रही है। यह भी चर्चा खूब हो रही है कि एक अस्मिता का दूसरी अस्मिता किस तरह शोषण कर रही है। किस तरह का सांस्कृतिक वर्चस्व एक-दूसरे पर स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। दलित और स्त्रीसाहित्य के संदर्भ में खूब लिखा जा रहा है। इस क्रम में अस्मिता पर हो रहे हिंसाचार, शारीरिक शोषण, उत्पीडन, अलगाव, शक्तिहीनता आदि के सवालों पर जमकर बहस हो रही है। यह भी कहा जा रहा है कि अस्मिता के सवाल इसलिए उठाए जा रहे हैं जिससे संबंधित अस्मिता की चेतना को ऊँचा उठाया जाय, उसे अभिव्यक्ति मिले।

नामवरसिंह के ‘स्वत्व’मॉडल की एक अन्य मुश्किल यह है कि उसमें लोकतंत्र के लिए कोई स्थान नहीं है। वे स्वाधीनता के भावबोध के अभाव की भारतेन्दुयुग में चर्चा करते हैं। लेकिन लोकतंत्र की नहीं। लोकतंत्र के बिना अस्मिता नहीं बनती और स्वाधीनता की भावना भी पैदा नहीं होती। अस्मिता और लोकतंत्र अन्योन्याश्रित हैं। लोकतंत्र जितना समृद्ध होगा अस्मिताचेतना भी उतनी ही समृद्ध होती जाएगी। लोकतंत्र का जिन क्षेत्रों में विस्तार होगा उन क्षेत्रों में अस्मिता के सवाल तेजी से सामने आएंगे। लोकतांत्रिकचेतना के कारण अस्मिताचेतना और अस्मिता की राजनीति का विकास होता है। लोकतंत्र के विकास के कारण साझा भावबोध की धारणा फैलती है। शिरकत की भावना का विकास होता है। अस्मिता के प्रसार के लिए ये दोनों चीजें बेहद जरूरी हैं। अस्मिता के विकास के कारण विभिन्न जातियों, समुदायों, हाशिए के समूहों के आत्मनिर्भर होकर विकास करने की संभावनाओं के द्वार खुलते हैं। अस्मिता के आधार पर जब देखना आरंभ करते हैं तो साहित्य के आधार के रूप में मनुष्य पदबंध अपदस्थ हो जाता है। पहले मनुष्य के रूप में देखते थे।

भारतेन्दुयुग में मनुष्य की प्रतिष्ठा हुई है, अस्मिता की नहीं। अस्मिता की धारणा कालांतर में जन्म लेती है और बहस के केन्द्र में आती है। पहले ‘मनुष्य’ की मांगें थीं अब अस्मिता के आधार पर मांगे पेश की जा रही हैं। पहले सार्वभौम मनुष्य के आधार पर सोचने और चित्रित करने का रिवाज था नया अस्मितायुग लिंग, जाति, धर्म, भाषा, सम्प्रदाय, नस्ल, जातीयता आदि अस्मिता रूपों के आधार पर चित्रण और मांगें पेश कर रहा है। भारतेन्दुयुग में खड़ीबोली हिन्दी के विकास के साथ भाषा के ‘स्वत्व’ की बात उठी जरूर है लेकिन वे ‘स्वत्व’ को मनुष्य के पैराडाइम पर रखकर देखते हैं, अस्मिता के पैराडाइम पर रखकर नहीं देखते ।


















रविवार, 29 जून 2014

अस्मिता,आम्बेडकर और रामविलास शर्मा


        रामविलास शर्मा के लेखन में अस्मिता विमर्श को मार्क्सवादी नजरिए से देखा गया है। वे वर्गीय नजरिए से जातिप्रथा पर विचार करते हैं। आमतौर पर अस्मिता साहित्य पर जब भी बात होती है तो उस पर हमें बार-बार बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर के विचारों का स्मरण आता है। दलित लेखक अपने तरीके से दलित अस्मिता की रक्षा के नाम पर बाबा साहेब के विचारों का प्रयोग करते हैं। दलित लेखकों ने जिन सवालों को उठाया है उन पर बड़ी ही शिद्दत के साथ विचार करने की आवश्यकता है। आम्बेडकर-ज्योतिबा फुले का महान योगदान है कि उन्होंने दलित को सामाजिक विमर्श और सामाजिक मुक्ति का प्रधान विषय बनाया।
अस्मिता विमर्श का एक छोर महाराष्ट्र के दलित आंदोलन और उसकी सांस्कृतिक प्रक्रियाओं से जुड़ा है ,दूसरा छोर यू.पी-बिहार की दलित राजनीति और सांस्कृतिक प्रक्रिया से जुड़ा है। अस्मिता विमर्श का तीसरा आयाम मासमीडिया और मासकल्चर के राष्ट्रव्यापी उभार से जुड़ा है। इन तीनों आयामों को मद्देनजर रखते हुए अस्मिता की राजनीति और अस्मिता साहित्य पर बहस करने की जरूरत है।
अस्मिता के सवाल आधुनिकयुग की देन हैं। आधुनिक युग के पहले अस्मिता की धारणा का जन्म नहीं होता। आधुनिककाल आने के साथ व्यक्तिगत को सामाजिक करने और अपने अतीत को जानने-खोजने का जो सिलसिला आरंभ हुआ उसने अस्मिता विमर्श को संभव बनाया।
अस्मिता राजनीति में विगत 150 सालों में व्यापक परिवर्तन हुए हैं।खासकर नव्य आर्थिक उदारीकरण और उपग्रह मीडिया प्रसारण के आने के बाद परिवर्तनों का सिलसिला तेज हुआ है। खासकर उत्तर आधुनिकतावाद आने के साथ सारी दुनिया में उत्तर आधुनिक अस्मिता की धारणा का तो बबंडर ही चल निकला।मसलन् अस्मिता निर्माण के उपकरणों के रूप में मोबाइल,आई पोड,मर्दानगी आदि पर जमकर चर्चाएं हुई हैं।
उत्तर आधुनिकता के साथ आई अस्मिता ने सेल्फ (निज ) के तरल, विखंडित, विश्रृंखलित,अ-केन्द्रित,अवसादमय, वर्णशंकर, रूपों को जन्म दिया। उत्तर आधुनिक अस्मिता का अर्थ है तर्क,सत्य,प्रगति और सार्वभौम स्वतंत्रता वाले आधुनिक आख्यान का अंत। इन दिनों अस्मिता के छोटे छोटे आख्यान केन्द्र में आ गए हैं। स्त्री से लेकर दलित तक,भाषा से लेकर संस्कृति तक, साम्प्रदायिकता, पृथकतावाद, राष्ट्रवाद आदि तक अस्मिता की राजनीति का विमर्श फैला हुआ है।
आखिरकार आधुनिक युग में अछूत कैसे जीएंगे हम नहीं जानते थे। हम कबीर को जानते थे,रैदास को जानते थे। ये हमारे लिए कवि थे। साहित्यकार थे। संत थे। किंतु ये अछूत थे और इसके कारण इनका संसार भिन्न किस्म का था यह सब हम नहीं जानते थे। अछूत की खोज आधुनिकयुग की महानतम सामाजिक उपलब्धि है।
अछूत के उद्धाटन के बाद पहलीबार देश के विचारकों को पता चला वे भारत को कितना कम जानते हैं। भारत एक खोज को अछूत की खोज ने ढंक दिया। आज भारत एक खोज सिर्फ किताब है, सीरियल है,एक प्रधानमंत्री के द्वारा लिखी मूल्यवान किताब है। इस किताब में भी अछूत गायब है। उसका इतिहास और अस्तित्व गायब है। आंबेडकर ने भारत को सभ्यता की मीनारों पर चढ़कर नहीं देखा बल्कि शूद्र के आधार पर देखा। शूद्र के नजरिए से भारत के इतिहास को देखा, शूद्र की संस्कृतिहीन अवस्था के आधार पर खड़े होकर देखा। इसी अर्थ में आंबेडकर की अछूत की खोज आधुनिक भारत की सबसे मूल्यवान खोज है।
भारत की खोज से सभ्यता विमर्श सामने आया,अछूत खोज ने परंपरा और इतिहास की असभ्य और बर्बरता की परतों को खोला। आंबेडकर इस अर्थ में सचमुच में बाबासाहेब हैं कि उन्होंने भारत के आधुनिक एजेण्डे के रूप में अछूत को प्रतिष्ठित किया। आधुनिक युग की सबसे जटिल समस्या के रूप में अछूत समस्या को पेश किया।
आधुनिकाल में किसी के लिए स्वाधीनता,किसी के लिए समाजसुधार, किसी के लिए औद्योगिक विकास , किसी के लिए क्रांति और साम्यवादी समाज से जुड़ी समस्याएं प्रधान समस्या थीं किंतु आंबेडकर ने इन सबसे अलग अछूत समस्या को प्रधान समस्या बनाया।
अछूत समस्या पर बातें करने ,पोजीशन लेने का अर्थ था अपने बंद विचारधारात्मक कैदघरों से बाहर आना। जो कुछ सोचा और समझा था उसे त्यागना। अछूत और उसकी समस्याओं पर संघर्ष का अर्थ है पहले के तयशुदा विचारधारात्मक आधार को त्यागना और अपने को नए रूप में तैयार करना। अछूत समस्या से संघर्ष किसी क्रांति के लिए किए गए संघर्ष से भी ज्यादा दुष्कर है। आधुनिककाल में क्रांति संभव है,आधुनिकता संभव है,औद्योगिक क्रांति संभव है किंतु आधुनिक काल में अछूत समस्या का समाधान तब ही संभव है जब मानवाधिकार के प्रकल्प को आधार बनाया जाय।
बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर के बारे में रामविलास शर्मा ने जिस नजरिए से विचार किया है उसके आधार पर अस्मिता की राजनीति को समझने में हमें मदद मिल सकती है। इस प्रसंग में रामविलास शर्मा की'गाँधी,आम्बेडकर ,लोहिया और इतिहास की समस्याएँ' (2000) किताब बेहद महत्वपूर्ण है।
सामंतवाद,साम्राज्यवाद ,क्रांति,आधुनिकता,औद्योगिक क्रांति इन सबका आधार मानवाधिकार नहीं हैं। बल्कि किसी न किसी रूप में इनमें मानवाधिकारों का हनन होता है। अछूत समस्या मानवीय समस्या है इसके खिलाफ संघर्ष करने का अर्थ है स्वयं के खिलाफ संघर्ष करना और इससे हमारा बौध्दिकवर्ग, राजनीतिज्ञ और मध्यवर्ग भागता रहा है। ये वर्ग किसी भी चीज के लिए संघर्ष कर सकते हैं किंतु अछूत समस्या के लिए संघर्ष नहीं कर सकते। अछूत समस्या अभी भी मध्यवर्ग और पूंजीपतिवर्ग के चिन्तन को स्पर्श नहीं करती। अछूत समस्या को वे महज घटना के रूप में दर्शकीय भाव से देखते हैं। अछूत समस्या न तो घटना है और न परिघटना और न संवृत्ति ही है। बल्कि मानवीय समस्या है मानवाधिकार की समस्या है। मानवाधिकारों के विकास की समस्या है। हमारे समाज में मानवाधिकारों के विकास को लेकर जितनी जागृति पैदा होगी अछूत समस्या उतनी ही कम होती जाएगी। जिस समाज में मानवाधिकारों का अभाव होगा वहां पर अछूत समस्या,बहिष्कार की समस्या उतनी प्रबल रूप में नजर आएगी।
रामविलास शर्मा ने लिखा है '' भारत में वर्ग हैं, जाति बिरादरी हैं।दोनों यथार्थ हैं। परंतु वर्ग ऐसा य़थार्थ है जो जीवंत है,जो आगे बढ़ रहा है और जाति बिरादरी ऐसा यथार्थ है जो मर रहा है और पिछड़ रहा है। आम्बेडकर ने कहा थाः जब परिवर्तन आरंभ होता है,तब सदा पुराने पुराने और नए के बीच संघर्ष होता है। नए का समर्थन न किया जाए तो यह खतरा बना रहता है कि वह इस संघर्ष में निरस्त कर दिया जाएगा।"
रामविलास शर्मा ने आम्बेडकर की विश्वदृष्टि की खोज करते हुए रेखांकित किया कि उनके दृष्टिकोण का आधार वर्ग हैं।मजदूरवर्ग है। न कि जाति। उन्होंने लिखा है, " यदि इस समय अभ्युदयशील वर्गों का समर्थन न किया गया, जाति-बिरादरी का समर्थन किया गया, तो यह संभव है,जाति-बिरादरी बनी रहे और वर्गों की भूमिका पीछे छूट जाए। जाति-बिरादरी के भेद वर्गों के संगठन और वर्ग संघर्ष द्वारा ही संभव किए जा सकते हैं।आम्बेडकर ने कहा था,मजदूरवर्ग को मार्गदर्शक की भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा थाःमजदूरों को केवल अपने संघ कायम करने से संतोष नहीं करना चाहिए उन्हें घोषित करना चाहिए कि उनका उद्देश्य शासन-तंत्र पर अधिकार करना है।" दुखद बात यह है कि आम्बेडकर की वर्गीय दृष्टि की बजाय अस्मिता की राजनीति करने वालों ने जाति और वर्ण के बारे में लिखी बातों को अपना लिया है और बाकी सारी बातों को त्याग दिया है।
भारतीय समाज में शूद्र सिर्फ अछूत नहीं है। बल्कि गुमशुदा भी है। हम उसे कम से कम जानते हैं। हम उसे देखकर भी अनदेखा करते हैं। उसका कम से कम वर्णन करते हैं। अछूतों के जीवन के व्यापक ब्यौरे तब ही आए जब हमें आधुनिककाल में ज्योतिबा फुले और आंबेडकर जैसे प्रतिभाशाली विचारक मिले। यह सोचने वाली चीज है कि आंबेडकर ने जाति व्यवस्था के मर्म का उद्धाटन करते हुए जितने विस्तार के साथ अछूतों की पीड़ा को सामने रखा और उससे मुक्त होने के लिए सामाजिक-राजनीतिक प्रयास आरंभ किए वैसे प्रयास पहले कभी नहीं हुए।
आधुनिककाल के पहले शूद्र हैं किंतु अनुपस्थित और अदृश्य हैं। जातिव्यवस्था है किंतु जातिव्यवस्था के अनुभव गायब हैं। जाति सिर्फ मनोवैज्ञानिक चीज नहीं है। उसका ठोस आर्थिक आधार है। जाति के ठोस आर्थिक आधार को बदले बगैर जाति की संरचनाओं को बदलना संभव नहीं है। संत और भक्त कवियों के यहां जाति एक मनोदशा के रूप में दाखिल होती है। मनोदशा के धरातल पर ही ईश्वर सबका था और सब ईश्वर के थे। भक्ति में भेदभाव नहीं था। भक्ति का सर्वोच्च रूप वह था जो मनसा भक्ति से जुड़ा था। वास्तविकता इसके एकदम विपरीत थी। ईश्वर और धर्म की सत्ता के वर्चस्व के कारण भेद और वैषम्य के सभी समाधान मनोदशा के धरातल पर ही तलाशे गए। मन में ही सामाजिक समस्याओं के समाधान तलाशे गए। सामाजिक यथार्थ से भक्त कवियों का लगाव एकदम नहीं था। यही वजह है कि वे जातिभेद के सामाजिक रूपों को देखने में असमर्थ रहे। इस कमजोरी के बावजूद भक्तकवियों ने जातिभेद के खिलाफ मनोदशा के स्तर पर संघर्ष करके कम से कम सामंजस्य का वातावरण तो बनाया। यह दीगर बात है कि सामंजस्य के पीछे वर्चस्वशाली वर्गों की हजम कर जाने की मंशा काम कर रही थी। उल्लेखनीय है सामंजस्य की बात तब उठती है जब अन्तर्विरोध हों, टकराव हो,तनाव हो। वरना सामंजस्य पर इतना जोर क्यों ?
अनेक विचारक वर्णभेद को नस्लभेद के रूप में चित्रित करते हैं। इस चित्रण को बड़े ही चलताऊ ढ़ंग से साहित्य में इस्तेंमाल किया जा रहा है। आम्बेडकर के नजरिए की पहली विशेषता है कि वे वर्णव्यवस्था को नस्लभेद के पैमाने से नहीं देखते।दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि आम्बेडकर की चिंतन-प्रक्रिया स्थिर या जड़ नहीं थी ,वे लगातार अपने विचारों का विकास करते हैं। विचारों की विकासशाल प्रक्रिया के दौरान ही हमें उस विकासशील सत्य के भी दर्शन होंगे जो वे बताना चाहते थे। आम्बेडकर के विचारों को निरंतरता या गतिशीलता के आधार पर पढ़ना चाहिए। आमतौर पर हम यह मानते हैं कि आर्य एक जाति थी,नस्ल थी। आमेहेडकर ने इस धारणा का खंडन किया है। आर्य एक समुदाय था। "आम्बेडकर ने लिखाः आर्य एक जन समुदाय का नाम है। जो चीज उन्हें आपस में बैंधे हुए थी,वह एक विशेष संस्कृति,जो आर्य संस्कृति कहलाती थी,को सुरक्षित रखने में उनकी दिलचस्पी थी। जो भी आर्य संस्कृति स्वीकार करता था,वह आर्य था।आर्य नाम की कोई नस्ल नहीं थी।" आम्बेडकर ने यह भी लिखा है कि " आर्यों में रंग संबंधी द्वेषभाव था जिससे उनकी समाज व्यवस्था निर्धारित हुई,यह बात निहायत बेसिर-पैर की है।यदि कोई ऐसा जन-समुदाय था जिसमें रंग सम्बन्धी द्वेषभाव का अभाव था तो वह आर्यों का समुदाय था और ऐसा इसलिए कि उनमें कोई ऐसा रंग प्रधान नहीं था जिससे वे अलग पहचाने जाते।"
भीमराव आम्बेडकर ने इस धारणा का भी खंडन किया है कि दस्यु लोग अनार्य थे।वे यह भी नहीं मानते कि आर्य भारत के बाहर से आए थे। वे यह भी मानते हैं कि शूद्र भी आर्य हुआ करते थे।
भीमराव आम्बेडकर ने सन् 1946 में 'शूद्र कौन थे ?' ( हू वेयर द शूद्राज ) नामक किताब लिखी। इस किताब में पश्चिमी विद्वानों की तमाम धारणाओं का उन्होंने खंडन किया। " आम्बेडकर ने इन विद्वानों की 7 मुख्य स्थापनाएँ प्रसुत की हैः 1. जिन लोगों ने वैदिक साहित्य रचा था, वे आर्य नस्ल के थे। 2. यह आर्य नस्ल बाहर से आई थी और उसने भारत पर आक्रमण किया था ।3. भारत के निवासी दास और दस्यु के रूप में जाने जाते थे और ये आर्यों से नस्ल के विचार से भिन्न थे।4. आर्य श्वेत नस्ल के थे, दास और दस्यु काली नस्ल के थे।5. आर्यों ने दासों और दस्युओं पर विजय प्राप्त की।6.दास और दस्यु विजित होने के बाद दास बना लिए गए और शूद्र कहलाए।7. आर्यों में रंगभेद की भावना थी और इसलिए उन्होंने चातुर्वर्ण्य का निर्माण किया। इसके द्वारा उन्होंने श्वेत नस्ल को काली नस्ल से, यथा दासों और दस्युओं से अलग किया। आगे आम्बेडकर ने इन सातों स्थापनाओं का खंडन किया।" इन सभी मतों का इन दिनों प्राच्यवादी पश्चिमी विचारक खूब प्रचार कर रहे हैं।इन विचारों से हिंदी लेखकों का एक तबका भी प्रभावित है।
रामविलास शर्मा ने सवाल उठाया है कि शूद्र अनार्य नहीं थे तो वे कौन थे ? इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने आम्बेडकर के विचारों का निचोड़ पेश करते हुए लिखा है, " इस प्रश्न के उत्तर में आम्बेडकर की तीन स्थापनाएँ हैः (1) शूद्र आर्य थे।(2) शूद्र क्षत्रिय थे। (3) क्षत्रियों में शूद्र ऐसे महत्वपूर्ण वर्ग के थे कि प्राचीन आर्य समुदायों के कुछ सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली राजा शूद्र हुए थे।"
रामविलास शर्मा ने आम्बेडकर का मूल्यांकन करते हुए अनेक महत्वपूर्ण धारणाएं दी हैं। ये अवधारणाएं अनेक मामलों में आम्बेडकर के चिंतन से भिन्न मार्क्सवादी नजरिए को व्यक्त करती हैं। रामविलास शर्मा ने लिखा है, "आम्बेडकर के विचार से हिंदुओं का जो साहित्य पवित्र या धार्मक कहलाता है,वह प्रायःसबका सब ब्राह्मणों का रचा हुआ है।ब्राह्मण विद्वान् उसका आदर करें, यह स्वाभाविक है।उसी तरह अब्राह्मण विद्वान उसके प्रति आदर प्रकट न करें, यह भी स्वाभाविक है। यहाँ ब्राह्मण और अब्राह्मण का भेद करने के बदले पुरोहित और अपुरोहित का भेद करना उचित होगा। बहुत से ब्राह्मणों ने पुरोहित वर्ग के विरुद्ध साहित्य रचा है।इसके सिवा प्राचीन साहित्य का कुछ अंश क्षत्रियों का रचा हुआ भी है।और जो सबसे पवित्र ग्रंथ ऋग्वेद है,उसे रचने वाले सामंती व्यवस्था के ब्राह्मण थे,इसका कोई प्रमाण नहीं है। ब्राह्मण और क्षत्रिय जब अवकाशभोगी वर्ग बनते हैं,तब उत्पादन से उनका संबंध टूट जाता है। अपने से भिन्न श्रमिक वर्ग के बिना वे अवकाश में जीवन बिता नहीं सकते। ऋग्वेद में शूद्र शब्द केवल एक बार पुरूष सूक्त में आया है और वह सूक्त बाद में जोडा गया है,यह बहुत से लोगों की मान्यता है।यदि ऋग्वेद में शूद्र नहीं हैं, तो उस में ब्राह्मण और क्षत्रिय भी नहीं हैं।"
रामविलास शर्मा इस धारणा का भी खंडन किया है कि साहित्य का उदभव किसी धार्मिक पाठ से हुआ है। वे मानते हैं कि साहित्य का उदभव लौकिक या सेक्युलर होता है। इस मिथ का भी खंडन किया है कि प्राचीनकाल में ब्राह्णणों की प्रधानता थी। उनका मानना है कि " भारयीय समाज में पहले क्षत्रियों की प्रधानता थी,ब्राह्मणों की नहीं,यह उस साहित्य से प्रमाणित होता है जिसे ब्राह्मणों का रचा हुआ माना जाता है।"
रामविलास शर्मा ने यह भी लिखा है कि रामायण,महाभारत के नायक क्षत्रिय माने गए हैं।किसी भी प्राचीन महाकाव्य का नायक ब्राह्मण नहीं है। यही नहीं, महाभारत में धर्म और ज्ञान का उपदेश देने वाले अब्राह्मण ही हैं। युधिष्ठिर को धर्म और राजनीति की बातें भीष्म समझाते हैं और अर्जुन को दर्शन और धर्म का ज्ञान कृष्ण देते हैं। महाभारत में एक प्रसिद्ध ब्राह्मण है द्रोणाचार्य। वह राजकुमारों को धनुर्विद्या सिखाते हैं और युद्ध में सेनापति का कार्य करते हैं।इन कथाओं में शस्त्रयुक्त क्षत्रिय और शस्त्रविहीन ब्राह्मण वर्गों का अस्तित्व नहीं है।"
बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर ने शूद्रों के बारे में प्रचलित मतों का खंडन करते हुए लिखा "शूद्रों के लिए कहा जाता है कि वे अनार्य थे,आर्यों के शत्रु थे।आर्यों ने उन्हें जीता था और दास बना लिया। ऐसा था तो यजुर्वेद और अथर्ववेद के ऋषि शूद्रों के लिए गौरव की कामना क्यों करते हैं ? शूद्रों का अनुग्रह पाने की इच्छा प्रकट क्यों करते हैं ?शूद्रों के लिए कहा जाता है कि उन्हें वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं है। ऐसा था तो शूद्र सुदास् ऋग्वेद के मंत्रों के रचनाकार कैसे हुए ? शूद्रों के लिए कहा जाता है, उन्हें यज्ञ करने का अधिकार नहीं है। ऐसा था तो सुदास् ने अश्वमेध कैसे किया ?शतपथ ब्राह्मण शूद्र को यज्ञकर्ता के रूप में कैसे प्रस्तुत करता है ? और उसे कैसे सम्बोधन करना चाहिए,इसके लिए शब्द भी बताता है।शूद्रों के लिए कहा जाता है कि उन्हें उपनयन संस्कार का अधिकार नहीं है।यदि आरंभ में ऐसा था तो इस बारे में विवाद क्यों उठा ? बदरि और संस्कार गणपति क्यों कहते हैं कि उसे उपनयन का अधिकार है? शूद्र के लिए कहा जाता है कि वह संपत्ति संग्रह नहीं कर सकता।ऐसा था तो मैत्रायणी और कठक संहिताओं में धनी और समृद्ध शूद्रों उल्लेख कैसे है ? शूद्र के लिए कहा जाता है कि वह राज्य का पदाधिकारी नहीं हो सकता। ऐसा था तो महाभारत के राजाओं के मंत्री शूद्र थे,ऐसा क्यों कहा गया ? शूद्र के लिए कहा जाता है कि सेवक के रूप में तीनों वर्णों की सेवा करना उसका काम है। यदि ऐसा था तो शूद्र राजा कैसे हुए जैसा कि सुदास् के उदाहरण से,तथा सायण द्वारा दिए गए अन्य उदाहरणों से मालूम होता है।"
आधुनिकाल आने के बाद पहलीबार ईश्वर की विदाई होती है। धर्म के वैचारिक आवरण के बाहर पहलीबार मनुष्य झांकता है। उसे सारी दुनिया और अपनी परंपराएं, सामाजिक यथार्थ वास्तव रूप में दिखाई देता है और उसकी वास्तव रूप में ही अभिव्यक्ति भी करता है। आधुनिककाल में दुख पहले गद्य में अभिव्यक्त होता है। मध्यकाल में दुख पद्य में अभिव्यक्त होता है। दुख और अन्तर्विरोध की अभिव्यक्ति गद्य में हुई या पद्य में इससे भी दुख के संप्रेषण की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। मध्यकाल में मनुष्य अपने दुख और पिछडेपन के लिए भाग्य को दोष देता था,पुनर्जन्म के कर्मों को दोष देता था,ईश्वर की कृपा को दोषी ठहराता था। किंतु आधुनिक युग में मनुष्य को पहलीबार अपने दुख और कष्ट के कारण के तौर पर शिक्षा का अभाव सबसे बड़ी चीज नजर आती है। यही वजह है कि शूद्रों में सामाजिक समानता,उन्नति के मंत्र के तौर पर शिक्षा को प्राथमिक महत्व पहलीबार ज्योतिबा फुले ने दिया। सन् 1948 में पुणे में फुले ने एक पाठशाला खोली, यह शूद्रों की पहली पाठशाला थी। भारत के ढाई हजार साल के इतिहास में शूद्रों की यह पहली पाठशाला थी। असल में पाठशाला तो प्रतीकमात्र है उस आने वाले तूफान का जो ज्योतिबा फुले महसूस कर रहे थे।

सन् 1848 में शूद्रों की शिक्षा का आरंभ करके कितना बड़ा क्रांतिकारी कार्य किया था यह बात आज कोई नहीं समझ सकता। उस समय शूद्रों को पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं मिलते थे अत: ज्योतिबा फुले ने अपनी अशिक्षित पत्नी को सुशिक्षित कर अध्यापिका बना दिया। इस उदाहरण में अनेक अर्थ छिपे हैं। पहला अर्थ यह कि शूद्रों के साथ अतीत में सबकुछ अच्छा नहीं होता रहा है। भारत का अतीत जाति सामंजस्य की बजाय जातीय घृणा के आधार पर टिका हुआ था। जातीय घृणा के कारण शूद्रों के लिए स्वतंत्र शिक्षा की व्यवस्था करनी पड़ी। दूसरा अर्थ यह संप्रेषित होता है कि शूद्र सामाजिक तौर पर अति पिछडे थे। तीसरा अर्थ यह कि भारत में शूद्रों के पठन-पाठन की परंपरा ही नहीं थी। सामंजस्य और भक्ति के नाम पर सामाजिकभेदों से जुड़ी सभी चीजों को छिपाया हुआ था। यही वजह है कि शूद्रों के लिए शिक्षा की व्यवस्था की शुरूआत की गई तो चारों ओर जबर्दस्त हंगामा हुआ।

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

10 अक्टूबर रामविलास शर्मा के जन्मदिन पर विशेष - अस्मिता,आत्मकथा , हिन्दी जाति और रामविलास शर्मा (3 ) समापन किश्त



जीवनी –“ निराला की साहित्य साधना” तीन खण्डों में है। पहले खंड़ में व्यक्तित्व विवेचन है। दूसरे में उनकी विचारधारा और कला का विवेचन है और तीसरे खंड में उनके जीवन और साहित्य से संबंधित सामग्री और पत्र हैं। प्रकाशन वर्ष है सन् 1969। रामविलास शर्मा ने पहले खंड में लिखा है, “ यह पुस्तक मुख्यतः उनके साहित्य की आलोचना नहीं है। निराला के पारिवारिक,सामाजिक परिवेश से ,उस युग की सांस्कृतिक परिस्थितियों से, उनके जीवन के बाह्य रूपों के साथ उनके अन्तर्जगत् से पाठकों को परिचित कराना मेरा उद्देश्य है।”

समूची जीवनी धारावाहिक रूप में विकसित होती है और रामविलास शर्मा ने बड़े ही कौशल के साथ व्यक्तिगत को सामाजिक और सामाजिक को व्यक्तिगत में रूपान्तरित होते हुए दिखाया है। लेखक के अंतर्मन और सामाजिक अभिव्यक्ति के रूपों में सामंजस्य बिठाने की कोशिश की है। इस क्रम वे निराला को निज जगत से बाहर निकालते हैं। देसी ठाट, अनुभूतियां, गुण-अवगुण, मनोदशा,वातावरण,जनसमुदाय के बीच में रखकर निराला के व्यक्तित्व का वर्णन करते हैं।



निराला की जीवनी को पाठक आराम से नहीं पढ़ सकता। यह जीवनी विचलित, उद्वेलित और उत्तेजित करती है। इसमें समाज,राजनीति,आचरण और मूल्य आदि के क्षेत्र में चल रहे संघर्षों और अन्तर्विरोधों का चित्रण है। इससे निराला का भी अन्तर्विरोधी व्यक्तित्व उभरकर सामने आया है। साथ ही स्वयं रामविलास शर्मा का व्यक्तित्व और नजरिया भी इसमें घुलमिलकर सामने आया है। इसमें “मंशा” की अवधारणा का इस्तेमाल किया गया है और “ईमानदार मंशा” पर ध्यान दिया है। इसके अलावा निराला के “प्रेरक” तत्वों को भी रेखांकित किया है।

रामविलास शर्मा ने जीवनी के प्रधान चारों तत्वों स्वायत्तता,आत्मानुभूति,प्रामाणिकता और व्यक्तित्वान्तरण का इस्तेमाल किया है। यह किताब आख्यान शैली में लिखी है। इस क्रम में निराला के बारे में प्रचलित किस्से, कहानियों और वृत्तान्तों का व्यापक रूप में इस्तेमाल किया है। इससे उनके जीवन में पाठक की दिलचस्पी बनी रहती है। असल में किसी के बहाने व्यक्तित्व को प्रस्तुत करने की कला रोमैंटिक आत्म उदघाटन की कला है। फलतःनिराला के इर्द-गिर्द का वैविध्य भी जीवनी में चला आया है।

जीवनीकार जब किसी व्यक्ति का उदघाटन किसी घटना अथवा अन्य के बहाने करता है तो जीवनीकार स्वयं को घटना से दूर कर लेता है,साथ ही लेखक की वस्तुगत भूमिका को भी सामने लाता है। इस क्रम में लेखक के व्यक्तित्व निर्माण में ‘चंद’ लोगों की भूमिका और उसके चारों ओर के वैविध्यमय संसार को पेश करते हुए विभिन्न साहित्य संबंधी अवधारणाओं,सामाजिक व्यवस्था और आंदोलनों की सटीक व्याख्या पेश करता है इससे अनेक धारणाएं बनतीं हैं। जब व्यक्तित्व विवेचन के बहाने अवधारणाओं का निर्माण किया जाता है तो जाने-अनजाने परिस्थितियों और अवधारणाओं की सीमाएं भी व्यक्त हो जाती हैं। यह भी तय हो जाता है कि आप सच बोल रहे हैं। फलतःआप कल्पना से सत्य को अलगाने में सफल हो जाते हैं।

रामविलास शर्मा ने निराला पर लिखते समय व्यक्तिवाद और मानवतावाद को कॉमनसेंस के आधार पर उभारा है। इसके कारण वे निराला की जीवनी को अन्तहीन विस्तार देते हैं। कॉमनसेंस के आधार पर जीवनी लिखी जाएगी तो उसे अंतहीन विस्तार दिया जा सकता है।

“निराला की साहित्य साधना” का आरंभ 1857 के जिक्र के साथ होता है। उस समय बैसवाड़ा के लोग कैसे थे, उस इलाके के लोगों का स्वभाव कैसा था,निराला के पूर्वज कैसे थे,कैसे ये लोग माइग्रेट करके पश्चिम बंगाल आए,निराला का जन्म कैसे हुआ और किस तरह उनके बहाने बंगाल,भारत,बैसवाड़ा,हिन्द साहित्य,समाजवादीचेतना, किसान आंदोलन, स्वाधीनता आंदोलन,गांधी, नेहरू,निराला के आसपास के लोग,रिश्तेदार-नातेदार, छायावाद, निराला के समकालीन छायावादी कवि,प्रगतिवाद,कविता का शिल्प,सौंदर्य, स्थापत्य, कहानीकला, वेदान्त,अवचेतन आदि अनेक विषयों को विस्तार के साथ व्याख्यायित किया है।

व्यक्तित्व विवेचन का यह अंतहीन रूप है। जो व्यक्तित्व विवेचन को असहज बनाता है। इस क्रम में निराला का व्यक्तित्व विवेचन कम और अन्यचीजों का विवेचन ज्यादा हुआ है। इससे यह भी पता चलता है कि जीवनीकार की निराला के व्यक्तित्व से ज्यादा अन्य चीजों के बारे में ज्यादा दिलचस्पी है। रामविलास शर्मा ने यह भी बताने की कोशिश की है वे संबंधित विषयों के प्रामाणिक जानकार हैं। उन्हें निराला के बारे में प्रामाणिक और वस्तुगत जानकारी है। इस समूची प्रक्रिया में निराला की जीवनी के अंशों पर कम और उनके वातावरण संबंधित विवादों और साहित्य संबंधी नजरिए पर ज्यादा ध्यान गया है। निराला के युग विवेचन को ज्यादा स्थान मिला है। निराला के जीवन के निजी ब्यौरे कम स्थान घेरते हैं और अन्य के ब्यौरे और विवरण ज्यादा स्थान घेरते हैं।अनेक स्थानों पर रामविलास शर्मा स्वयं की समझ को सही और निराला की समझ को गलत ठहराते हैं।

निराला पर लिखते समय वे घटनाओं का वर्णन करते जाते हैं,घटनाओं के वर्णन के दौरान उनके द्वारा जो विवरण और ब्यौरे दिए गए हैं वह लेखक के ऐतिहासिक क्षण,उससे जुड़े व्यक्तियों,विवाद,किंवदन्तियों आदि के सहारे निराला का आख्यान निर्मित करते हैं। इस क्रम में अनेक स्थानों पर रामविलास शर्मा अपने नजरिए का इजहार करने लगते हैं।वे स्वयं समस्या को किस तरह देखते हैं उसको प्रस्तुत करते हैं।

“निराला की साहित्य साधना” के बहाने रामविलास शर्मा ने निराला की खोज के साथ अपने नजरिए की खोज की है। वह जो पद्धति अपनाते हैं वह दो रूपों में सामने आती है , इसमें एक ओर निराला है और वे हैं ,तो दूसरी ओर अन्य लोग हैं। अनेक स्थानों पर निराला और अन्य एक साथ हैं और निराला दूसरी ओर हैं। आमतौर पर यह सारी प्रक्रिया किसी न किसी मसले पर विवाद के दौरान घटित होती है।

रामविलास शर्मा ने निराला के व्यक्तित्व विवेचन के दौरान उन्हें हमेशा ऐतिहासिकता के पैमाने से बांधकर रखा है। वह निराला का ऐतिहासिक पैराडाइम से विचलन नहीं होने देते। निराला के आत्म को ऐतिहासिकता के खूंटे से बांधकर रखते हैं। इसके कारण कई जगहों पर चीजों की पुनरावृत्ति हुई है।

निराला की बातों को रामविलास शर्मा जब उद्धृत करते हैं तो निराला के पक्ष को मजबूत करने के इरादे से ऐसा करते हैं साथ ही जो लोग निराला पर हमला कर रहे थे उनकी काट पेश करते हैं।इस प्रक्रिया में पुरानी घटनाओं और साहित्यिक-राजनीतिक प्रवृत्तियों की नई व्याख्याओं को जन्म देते हैं।

हिंदी संस्कृति और जाति -

रामविलास शर्मा ने रैनेसां का जो महाख्यान निर्मित किया है उसमें दो चीजें प्रमुख हैं पहला है 'अनुमानाधारित ज्ञान 'और दूसरा है 'तर्क की एकता'। अनुमानाधारित तर्कशास्त्र के आधार पर निर्मित हिन्दी जाति का सारा तर्कशास्त्र रचा है।यह उत्तर आधुनिक तर्कप्रणाली है। उत्तर आधुनिक तर्कप्रणाली अनुमानाधारित ज्ञान पर आधारित है। वे अपने अनुमानों को स्थापित करने के लिए हिंदी जाति के महाख्यान को निर्मित करते हैं। इस चक्कर में वे उसे 'सत्य' बनाकर पेश करते हैं। हिंदी जाति का स्वायत्त विमर्श निर्मित करते हैं। इसमें 1960 के आसपास पैदा हुई भाषावार राज्यों के गठन की राजनीतिक तात्कालिकता अभिव्यंजित होती है। इसमें हिन्दी जाति की वैधता सिद्ध करने का भावबोध भी काम कर रहा है जो अनेक नए विवादास्पद संदर्भों को खोलता है। इस क्रम में रामविलास शर्मा भाषा और समाज,हिन्दीभाषा-भाषीक्षेत्र की बोलियों और भाषाओं के बारे में एक सुंदर काल्पनिक भाषायीखेल तैयार करते हैं और इस भाषाखेल के जरिए हिंदी जाति की धारणा को वैध ठहराने की कोशिश करते हैं। वे भाषा के साथ वस्तुओं,संस्कृति आदि को जोड़कर पेश करते हैं। भाषा के साथ ऑब्जेक्ट को पेश करने का यह उत्तर आधुनिक तरीका है, इसे बहुत सारे लोग मार्क्सवादी तरीका समझने की भूल करते हैं।

रामविलास शर्मा इसके बहाने राज्यों के गठन के बारे में अनेक ऐसी बातें भी उठाते हैं जो अव्यावहारिक हैं। उनके हिंदी विमर्श ने असल में हिंदी में 'स्पेकुलेटिव' आदर्शवाद की नींव रखी जिस पर खड़े होकर हिंदी के अधिकांश आलोचकों ने जो कुछ भी लिखा वो अंततः उत्तर आधुनिक विमर्श की कोटि में आता है।

मजेदार बात है कि रामविलास शर्मा और उनके अनुयायी यह मानने को तैयार नहीं है कि वे उत्तर आधुनिक हो गए हैं या हिंदी जाति का विमर्श उत्तर आधुनिक विमर्श है। उलटे रामविलास शर्मा और उनके अनुयायियों ने उत्तर आधुनिकता पर अतार्किक हमले किए हैं। असल में आलोचकों का एक समूह हिंदी जाति के विमर्श के नाम पर आलोचना में अपनी जगह बनाने का प्रयास करता रहा है। इस क्रम में रामविलास शर्मा यांत्रिक ढ़ंग से स्टालिन के भाषा पर आधारित जाति और जातीयता की अवधारणा का अनुकरण करते हैं और हिंदी जाति के प्रकल्प को एक मार्क्सवादी प्रकल्प के रूप में पेश करते हैं जो कम से कम और कुछ हो मार्क्सवादी प्रकल्प नहीं है। यह विशुद्ध भाववादी प्रकल्प है। इस क्रम में रामविलास शर्मा ने जो पद्धति अपनायी है वह बेहद खतरनाक और आकर्षक है। वे भाषा और विचार के अन्तस्संबंध को तो मानते हैं लेकिन विचार और उसके तर्कशास्त्र के विकास की ऐतिहासिकता को नहीं देखते। मसलन् जाति का विचार या चेतना बंगाल में जैसी है वैसी ही हिंदीभाषीक्षेत्र में नहीं है। अथवा यों भी कह सकते हैं कि विचार के सामाजिक आधार के साथ उसे जोड़कर ही नहीं देखते। समाजवाद का अर्थ सारे देश के लिए एक ही नहीं सारे विश्व के लिए किताबी तौर पर एक है ,लेकिन वास्तव अर्थों में विचार और यथार्थ के बीच के अन्तस्संबंध को देखना चाहिए।

मसलन कोई विचार कब आता है, किस प्रक्रिया में आता है,किन सामाजिक वर्गों और किस संदर्भ में अपना विकास करता है। एक ही विचार विभिन्न संदर्भ में अपनी सत्ता और महत्ता एक जैसी नहीं बनाए रख सकता। वे विचार के साथ जुड़े ऐतिहासिक-सांस्कृतिक भेद पैदा करने वाले कारकों को नोटिस ही नहीं लेते। वे हेगेल की तरह महज 'तर्क'(रीजन) का सहारा लेते हैं और हिंदी जाति को सिद्ध करते हैं। यहां तक कि भाषाभेद में भी ऐतिहासिक- सांस्कृतिक कारणों के कारण भेद या अंतर आता है उसे भी नहीं देखते और हर चीज 'तर्क ' से सिद्ध करते हैं। इस चक्कर में हिंदी जाति के विचार को महाविचार,महाख्यान और साहित्य की महाप्रस्तुति बना देते हैं। उसे एबसोल्युट की हद तक विकसित करते हैं और बाकी काम उनके भक्तों ने कर दिया है। यानी हिंदी जाति का विचार परमविचार बन जाता है। इसमें सभी किस्म के कल्पनाजीवी हिंदीसाधक शामिल हो सकते हैं।

हिन्दी में वाम से लेकर दक्षिण तक 'संस्कृति' एक विषय के रूप में बड़ा परिदृश्य घेरे हुए है। व्यक्ति को समग्र संस्कृति के आवयविक अंग के रूप में देखा गया है।इसी क्रम में हिन्दी संस्कृति के विशिष्ट रूपों और अधिकारों की ओर भी ध्यान खींचने की कोशिश की गयी है। फलतः वाम से लेकर हिन्दुत्व तक संस्कृति एक राजनीतिक विचारधारा की शक्ल अख्तियार कर लेती है। हिन्दुत्ववादी हिन्दू संस्कृति के श्रेष्ठत्व पर जोर दे रहे हैं तो वाम विचारक जातीय संस्कृति पर जोर दे रहे हैं और उदारवादी लेखक, सांस्कृतिक बहुलतावाद पर जोर दे रहे हैं।

सांस्कृतिक बहुलतावाद को वाम से लेकर दक्षिण तक सभी रंगत के लेखक मानते हैं और अपनी अपनी संस्कृति का जयगान करते हैं। बहुलतावादी संस्कृति के नजरिए से एकमत लोग यह भी कह रहे हैं कि जहां तक कोई भी संस्कृति अपने क्षेत्र में सक्रिय रहती है उसकी स्वायत्तता की रक्षा की जानी चाहिए। इस प्रक्रिया में जो इमिग्रेंट हैं उनसे कहा जा रहा है कि वे इलाके की संस्कृति में घुलमिल जाएं। अपनी संस्कृति को भूल जाएं। अथवा लौटकर अपनी जन्मभूमि की ओर चले जाएं। मूलबात यह है संस्कृति की इस राजनीति में किसी न किसी रूप में राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता शामिल रहती है । मजेदार बात यह है कि देशज या जातीयसंस्कृति पर जोर देने के कारण जाने-अनजाने हम संस्कृतिवाद की कैद में चले गए हैं।

संस्कृति के राजनीति के केन्द्र में आने के कारण हिन्दू संस्कृति बनाम बहुलतावादी संस्कृति, बहुलतावाद बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, इस्लामिक संस्कृति बनाम बोलने-लिखने की आजादी,मराठी बनाम हिन्दीभाषी आदि के सवाल विवाद में आते रहे हैं। मकबूल फिदा हुसैन और सलमान रूशदी के संदर्भ में चली बहसों में यह भी कहा गया है कि अभिव्यक्ति की आजादी से ज्यादा महत्वपूर्ण है हिन्दू संस्कृति और इस्लामिक संस्कृति । इस क्रम में संस्कृति और धर्म को स्थानीय और अभिव्यक्ति की आजादी को विजातीय अवधारणा कहा गया।इस तरह की धारणाओं को सत्ता का भी सहयोग मिला है। यहां तक कि उन लोगों को कानूनी संरक्षण तक दिया गया है। इसके समानान्तर वामदलों ने स्थानीयतावादी संस्कृति के पल्लवन के नाम पर सबसे पिछड़ी मान्यताओं और मूल्यों को स्थापित करने या स्वीकृत करने की मांग की है। हिन्दी संस्कृति और हिन्दी जातीयता इसी अर्थ में एक खतरनाक प्रस्थान बिंदु है।

वाम के सांस्कृतिक दबाब का आलम यह है कि कलकत्ता का नाम बदलकर कोलकाता कर दिया गया। यह मूलतः संस्कृतिवाद है इसका ही एक अन्य रूप है जिसके तहत तस्लीमा नसरीन को पश्चिम बंगाल से तत्कालीन राज्य सरकार ने निकाल दिया बाद में कांग्रेस ने उसे दिल्ली से भगा दिया।दुख की बात यह है कि सलमान रूशदी के सैटेनिक वर्शेज से लेकर तस्लीमा के निष्कासन तक मौटे तौर पर वाम और उदार दोनों ही किस्म के राजनीतिकदलों की नीति को संस्कृति हांक रही है। यह मूलतः संस्कृतिवाद है और संस्कृतिवाद सामाजिक विभाजन को और भी बढ़ाता है।

इसी तरह जब आप हिन्दी जाति की बात करते हैं और उसकी पहचान को स्थापित करने की कोशिश करते हैं तो इससे मूलतः राज्यविभाजन की वैचारिक प्रक्रियाओं को मदद मिलती है। हिन्दी में हिन्दीजाति,हिन्दी संस्कृति और हिन्दी जातीयता की बहस जितनी ज्यादा हुई उसने हिन्दीभाषी राज्यों में विभाजन को वैचारिक मदद प्रदान की है। विभाजन का आधार बनाया है। यह भी कह सकते हैं इस बहस का बाई-प्रोडक्ट है सामाजिक विभाजन और हिन्दी राज्यों का विभाजन।

हिंदीजाति की धारणा मूलतःएक प्रतिक्रियावादी अवधारणा है। हिंदी समीक्षकों का बड़ा हिस्सा इसकी प्रगतिशील व्याख्याएं करता रहा है। हिंदी में इस धारणा का सांस्कृतिक श्रेष्ठत्व को स्थापित करने के भावबोध के साथ इस्तेमाल होता रहा है। संस्कृति का आधार जब राष्ट्रीयता,राष्ट्रवाद और धर्म को बनाएंगे तो इससे विभाजन बढ़ेगा और ये तीनों एक-दूसरे के साथ अंतर्क्रियाएं करते हैं। मसलन् जो हिंदी जाति के पक्षधर हैं वे जाति(नेशनेलिटी) के श्रेष्ठत्व पर जोर देते हैं।

जातीयता का श्रेष्ठत्व सबसे खतरनाक राजनीतिक तत्व है। हिंदीजाति के विचार को रामविलास शर्मा साहित्य के सुपीरियर विचार के रूप में प्रचारित करते हैं। सतह पर हिन्दीजाति का विचार बड़ा ही हार्मलेस लगता है लेकिन बुनियादी तौर पर बेहद खतरनाक और विभाजनकारी विचार है। नेशनेलटी को आधार बनाकर जब भी बात की जाएगी उसकी वैचारिक परिणति संस्कृतिवाद और सामाजिक विभाजन की ओर ले जाएगी। यह एक खास भाषा(खड़ी बोली हिन्दी) की उन्नति, क्षमता,सामाजिक दायरे और श्रेष्ठत्व के दर्प में डूबा विचार है। यह आधुनिक राजनीति की एंटीथीसिस है। साहित्य में इस विचार में सभी को अपने अंदर समाहित कर लेने और खड़ीबोली हिंदी के मातहत कर लेने का विचार काम करता रहा है। हिंदीजाति के विचार के तहत हमारी समीक्षा के एक बड़े हिस्से ने रैनेसां से लेकर सार्वभौमवाद तक के सभी विषयों को समाहित करके आधुनिक विमर्श में एक विलक्षण अवरोध पैदा किया है जिसमें से तब ही निकल सकते हैं जब हिंदी जाति और हिंदी संस्कृति को मानें। इनको माने बिना कोई आलोचना नहीं लिखी जा रही। इससे आलोचना में लोकतंत्र खत्म हो गया है। आलोचना में हिंदीजाति और हिंदी संस्कृति की बात करने वाले श्रेष्ठ और इससे बाहर के लोग निकृष्ट मान लिए गए हैं।

हिंदीजाति और हिंदी संस्कृति की अवधारणा का मूलतः स्त्री,दलित और भाषायी वैविध्य और समानता का विरोध है। इसमें वर्चस्व का भाव है। हाशिए के लोगों और विषयों के लिए इसमें कोई जगह नहीं है। यह अचानक नहीं है कि हिंदीजाति की अवधारणा पर जिनलोगों ने सबसे ज्यादा काम किया है उन्होंने स्त्रीसाहित्य और दलित साहित्य की अवधारणाओं के प्रति दोयमदर्जे का व्यवहार किया है या उसकी उपेक्षा की है। हिन्दीजाति के पक्षधरों के द्वारा बार बार हिन्दीजाति की मुक्ति में ही सामाजिक मुक्ति को खोजने की कोशिश की गयी है। सभी सांस्कृतिक समस्याओं के समाधान उसमें खोजने की कोशिश की गई है। इस प्रक्रिया में खड़ीबोली हिंदी के साथ हिन्दीभाषी क्षेत्र की अन्य भाषाओं और बोलियों का साहित्य र इन भाषाओं के साथ समान व्यवहार के सवाल हाशिए पर भी नजर नहीं आते। हिन्दीभाषीक्षेत्र की बोलियों भाषाओं का खड़ीबोली हिंदी के साथ अन्तर्विरोध तेज हुआ है। हिन्दीभाषी प्रान्तों का विभाजन हुआ है और इसके कारण नए प्रांतों में खड़ीबोली हिंदी की जगह स्थानीय भाषा और बोलियों को प्राथमिकता दी जा रही है।नए बने राज्यों उत्तराखंड,झारखंड और छत्तीससगढ़ में प्रधान सरकारी भाषा के रूप में खड़ीबोली की जगह लोकल भाषाओं को वरीयता मिली है।

दूसरी ओर हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति के नाम पर संस्कृति के पुराने और पिछड़े रूपों को बनाए रखने की कोशिशें भी हुई हैं। इसके लिए परंपरा और पुरानी संस्कृति की प्रामाणिकता को खासतौर पर उभारा गया है। यह अजीब संयोग है वाम समीक्षकों के एक समूह ने विगत 40-45 सालों में हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति को उभारा, वहीं दूसरी ओर समाज की सबसे प्रतिक्रियावादी विचारधारा के रूप में हिन्दुत्ववादी और जातिवादी राजनीति और संस्कृति का उभार पैदा हुआ। वामपंथी हिंदीजातिधर्मी आलोचकों ने हिंदीजाति की अवधारणा से हिन्दुत्व और जातिवाद को धोने की काफी कोशिश की लेकिन वे असफल रहे। इसका प्रधान कारण है कि वे समझने में असमर्थ रहे कि हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति जिस विचारधारा के आधार पर खड़ी है वह आधार हिन्दुत्व और जातिवादी राजनीति का भी है। वे एकही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों ने अपने अपने तरीके से संस्कृति के अंधलोकवाद की हिमायत की है। दोनों ही अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता का दावा करते हैं।दोनों में लोकतंत्र और समानता के लिए कोई जगह नहीं है। दोनों ही भाषायी और सांस्कृतिक समानता के विरोधी हैं। दोनों ही अपने राजनतिक वैचारिक बंधनों में बंधे हैं और दोनों में विकास की कोई संभावना नहीं है। दोनों ने जिस तरह की राजनीति,संस्कृति,धर्म,विचारधारा आदि की हिमायत की है उसके कारण इनकी कोई प्रसंगिकता नहीं है। ये चीजें वोट की राजनीति के कारण उठती रही हैं।

हिंदीजाति और हिदी संस्कृति के सवालों को आलोचना में जिन लोगों ने प्रतिष्ठित किया है वे आलोचना में राजनीतिक विचारधारात्मक वैविध्य या यों कहें वैविध्यपूर्ण समीक्षा के विषय पेश करने में असमर्थ रहे हैं। मसलन् रैनेसां पर जितना लिखा गया है उतना अन्य किसी विषय पर नहीं लिखा गया। नवजागरण,हिन्दीजाति,हिंदी संस्कृति,हिंदी जातीयता,साम्प्रदायिकता,क्षेत्रवाद आदि एक ही विषयक्षेत्र है जिस पर अधिकांश आलोचना लिखी गयी है। इस समूची प्रक्रिया में विभिन्न किस्म की राजनीतिक अवधारणाओं और यूटोपियाओं की ओर कभी ध्यान ही नहीं गया।

हिंदीजाति और हिंदी संस्कृतिपंथी आलोचकों की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वे अन्य साहित्यरूपों और साहित्यांदोलनों के बारे में आज तक कोई नया विवेचन पेश नहीं कर पाए हैं। कुंजी और नोट्स मार्का विवेचनों के जरिए हमने अन्य प्रवृत्तियों को सिलटाने की कोशिश की है। मसलन् प्रयोगवाद से लेकर स्त्रीसाहित्य,दलित साहित्य से लेकर दलित राजनीति तक का सारा क्षेत्र अछूता पड़ा है। इन सभी क्षेत्रों के बारे में वामपंथी आलोचना चुप है।

हम अगर गंभीरता से सोचें तो आज हमारे सामने संस्कृति और साहित्य के गंभीर सवाल आ खड़े हुए हैं लेकिन हमारे पास उनका कोई संतोषजनक विश्लेषण तक नहीं है। साहित्यिक-राजनीतिक समस्याओं का समाधान हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति के फ्रेमवर्क में खोजने की कोशिशें की जा रही हैं। हिंदीजाति की अवधारणा हमारी सामयिक राजनीतिक,सांस्कृतिक समस्याओं का समाधान पेश नहीं करती बल्कि यह तो आलोचना की पलायनवादी प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति है।

हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति वस्तुतः फेक या कृत्रिम धारणा है। इसका वास्तव जगत से कोई संबंध नहीं है। यह एक ऐसे यूटोपिया पर आधारित है जिसका भौतिक आधार नहीं है। यह एक ऐसी आइडेंटिटी की हिमायत करती है जो विभाजनकारी है। यह संस्कृति को क्षेत्रविशेष से जोड़कर देखती है।

संस्कृति को राजनीतिकक्षेत्र के साथ बांधकर नहीं देखा जा सकता।इसके आधार पर हिंदीजाति और हिंदीभाषाभाषी राज्यों के बीच के अन्तस्संबंध पर अतिरिक्त जोर दिया गया। उन्हें हिंदीसंस्कृति की वायवीय अवधारणा से बांधने की असफल कोशिश की गयी है। हिंदी को एक सांस्कृतिक अस्मिता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। इस क्रम में देश के विभिन्न इलाकों में जातिवाद ,क्षेत्रवाद और धर्म के नाम सामाजिक समूहों को संगठित करने के प्रयासों की अनदेखी की गयी। संस्कृति के नाम पर संगठित हो रहे समूहों की अनदेखी की गयी।

वाम आलोचना ने बहुलतावादी संस्कृतिवाद को खूब हवा दी है और रामविलास शर्मा भी हवा देने वालों में प्रमुख हैं। ब्रिटिश दार्शनिक ब्रायन बेरी ने लिखा है कि बहुलतावादी संस्कृतिवाद ने खास सामाजिक हितों के प्रसार को हवा दी है। यह एक तरह से सामाजिक विभाजन की फूट डालो और राज करो की यथास्थितिवादी राजनीति है। यह वंचितों को और भी वंचित बनाने वाली राजनीति है। यह वंचितों की साझा समस्याओं जैसे बेकारी, गरीब,निम्नस्तरीय जीवनशैली,रोटी,कपड़ा,मकान,शिक्षा,स्वास्थ्य,चिकित्सा आदि से ध्यान हटाती है।

हम गंभीरता से विचार करें और सोचें कि राज्यों के विभाजन या पुनर्गठन की मांग क्या सचमुच में यथार्थवादी मांग है ? क्या इस तरह की मांगें समाज की बुनियादी साझा समस्याओं के समाधान की ओर ले जाती हैं ? आखिरकार इनदिनों ही राज्यों के विभाजन या पुनर्गठन की मांगों पर ध्यान क्यों दिया जा रहा है ? इसी तरह इनदिनों जातियों की दशा सुधारने या दलितों और अल्पसंख्यकों की दशा सुधारने के कार्यक्रमों पर ढिंढोरची तरह हल्ला क्यों बोला जा रहा है। यह सारा खेल बहुलतावादी संस्कृतिवाद के फ्रेमवर्क में चल रहा है। वोटरों को भी इन्हीं आधारों पर वाम से लेकर दक्षिणपंथी दलों तक भरमाने की कोशिश कर रहे हैं।

देश में इनदिनों वंचितों और अभावग्रस्तों को धर्म,संस्कृति और अस्मिता के सवालों के आधार पर संगठित किया जा रहा है। जाहिरा तौर पर इससे सामाजिक विभाजन और बढ़ेगा और ठोस राजनीतिक सवालों की अनदेखी भी बढ़ेगी।

हिंदी में संस्कृतिवाद का रूप है हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति । इसके प्रचारक खासकिस्म के सरलीकरण से काम लेते रहे हैं। पहलीबात इन दो धारणाओं के संदर्भ में यह कि ये दोनों धारणाएं सार्वभौम मानवाधिकारों को नहीं मानतीं। सार्वभौम मानवाधिकार की धारणा मानने का अर्थ है संस्कृति विशेष की हिमायत को छोड़ना होगा। क्योंकि सार्वभौम मानवाधिकार की धारणा वस्तुतःसंस्कृतिविशेष के आधार से परे ले जाती है। हिंदीवाला किंतु हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति को त्यागने के लिए तैयार नहीं है। यह अचानक नहीं है कि रामविलासशर्मा ने हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति पर खूब लिखा है कि लेकिन सार्वभौम मानवाधिकारों की धारणा को वे नहीं उठाते और यह सारी दुनिया में वामपंथी बुद्धिजीवियों की समस्या है।

हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति की अवधारणा के नाम पर प्रचलित संस्कृतिवाद और मार्क्सवाद में एक चीज साझा हैं। दोनों का मानना है वंचित-पीड़ित हमेशा सही होते हैं। इस आधार पर वे कहते हैं कि वंचित-पीड़ित को अपने दमन-उत्पीड़न से मुक्त होने का अधिकार है। अतः इनकी सांस्कृतिक मान्यताएं भी सही हैं। वे कभी ठंड़े दिमाग से यह सोचने की कोशिश नहीं करते कि वे जिन सांस्कृतिक मान्यताओं को उठा रहे हैं वे सही और न्यायपूर्ण हैं ? वे जिन सांस्कृतिक रूपों को मानते हैं वे क्या सही हैं ? इस तरह वे ‘मजदूरवर्ग’ को ‘वंचित’ , ‘उत्पीडित’ या ‘दलित’ के नाम से अपदस्थ करना चाहते हैं। मुक्ति या मूलगामी सामाजिक परिवर्तन को संस्कृतिवाद,हिंदजाति और हिंद संस्कृति के जरिए अपदस्थ करना चाहते हैं। यह असलमें मार्क्सवाद का एकदम विलोम है, यह वाम राजनीति का भी विलोम है।

हिंदीजाति और हिंदीसंस्कृति के प्रचारक एक ओर अधिनायकवादी राजनीति का विरोध करते हैं वहीं दूसरी ओर साम्राज्यवाद विरोध और वि-उपनिवेशीकरण की तेजी से वकालत करते हैं। यह फिनोमिना रामविलास शर्मा के लेखन में भी है। लंबे समय से इस थ्योरी के आधार पर लिखा जा रहा है। संकट उसके बाद आरंभ होता है जब फंडामेंटलिस्ट हिन्दुत्ववादी और इस्लामिस्ट भी इसी एजेण्डे पर सक्रिय होते हैं। वे भी साम्राज्यवादविरोधी वि-उपनिवेशीकरण को अपना लक्ष्य बनाते हैं। दोनों में साझा तत्व है संस्कृति। दोनों संस्कृति के आधार पर ही विरोध करते हैं। रोचक बात यह है वाम ने बहुलतावादी संस्कृतिवाद को तरजीह दी और फंडामेंटलिस्टों ने संस्कृति विशेष को तरजीह दी।

इन दोनों के नजरिए में वाम के यहां संस्कृति ज्यादा है ,जबकि फंडामेंटलिस्टों के यहां संस्कृति कम है। ये दोनों ही व्यक्ति को इस आधार पर अस्मिता प्रदान करते हैं। इसके आधार पर व्यक्ति के अधिकारों को परिभाषित करते हैं और उन अधिकारों के संरक्षण के बारे में बात करते हैं। मजेदार पहलू यह है कि फंडामेंटलिस्टों के लिए संस्कृति निर्धारक तत्व है ,जबकि वाम के लिए संस्कृति निर्धारक नहीं आर्थिक-सामाजिक कारण निर्धारक तत्व हैं। वाम के लिए संस्कृति फालतू चीज है। वाम के लिए सांस्कृतिक संगठन गौण और वर्गीय संगठन प्रधान हैं।








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