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May, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

आरएसएस संगठन नहीं दुकान है

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आरएसएस के नायक और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अध्यक्षता में बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर की 125वीं जयन्ती को बड़े धूमधाम से मनाने का फैसला लिया गया है। मोटे तौर पर यह फैसला स्वागत योग्य है। हमारे स्वाधीनता सेनानियों के ऊपर सरकार कुछ भी करे हमें स्वागत तो कम से कम करना चाहिए। इस बहाने कुछ चर्चाएं होंगी, गोष्ठियां होंगी, प्रकाशन निकलेंगे,जलसे होंगे ,बाजार में सरकारी खजाने से पैसा निकलकर आएगा। कुछ बाबू,बुद्धिजीवी,राजनेता और स्वयंसेवी संस्थाएं खाएंगी-कमाएंगी,इस लिहाज से मुझे सरकारी जलसे हमेशा अच्छे लगते हैं। यह एक तरह का सरकार की ओर से सांस्कतिक पूंजी निवेश है।

समस्या जलसे की नहीं है, समस्या अम्बेडकर पर माला चढ़ाने और जलसे को लेकर नहीं है, यह तो कोई भी दल कर सकता है, सवाल यह है कि क्या अम्बेडकर के विचारों का आरएसएस और भाजपा पर कोई असर है ? क्या अम्बेडकर के विचारों से संघ के विचार से मेल खाते हैं या फिर अम्बेडकर पर जलसे करना एक खाना पूर्ति है, वोटबैंक राजनीति का अंग है ? हमें यही लगता है कि मोदी सरकार,संघ और भाजपा के लिए अम्बेडकर वोट बैंक राजनीति के प्रचार का अंग है। यह असल में दु…

मथुरा के चार हजार चौबे

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जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने मथुरा के चौबों के बारे में लिखकर बहस का मुद्दा खड़ा कर दिया। काटजू ने क्या कहा यह तो मैं नहीं पढ़ पाया लेकिन हमारे पुराने मित्र गंगानाथ चतुर्वेदी के सुपुत्र माधव चतुर्वेदी ने आज फोन करके जब चौबों के बारे में बात की तो मैंने सोचा कि क्यों न इस पहलू को लिख ही देते हैं। उल्लेखनीय है माधव जब बात कर रहा था तो मैंने परिचय पूछा तो उसने पिता का नाम बताया तो मैंने कहा वे तो हमारे यजमान हैं और तुम भी,मुझे बेहद खुशी हुई कि मैं गंगानाथजी के बारे में तकरीबन 4दशक बाद बातें कर रहा था. वे मथुरा में आकाशवाणी पर अधिकारी थे, हमारे घर नियमित आना जाना था, सतीघाट पर नियमित गप्पें होती थीं।बाद में दिल्ली ट्रांसफर होकर चले गए, वे जिंदा हैं और स्वस्थ हैं,यह मेरे लिए बहुत बड़ी खुशी की बात है। खैर गंगानाथ जी पर फिर कभी मौका लगा तो जरुर लिखूँगा।

मथुरा के चौबे देश में अन्यत्र रह रहे ब्राह्मणों जैसे नहीं हैं। उनके भिन्न होने के ऐतिहासिक और ऐतिहासिक परिस्थितियां रही हैं । मथुरा में चौबे कैसे और कब से हैं यह हम कभी बाद में विस्तार से विचार करेंगे। लेकिन कुछ सामान्य किंतु महत्वपूर्ण तथ…

संघ की खुराफाती हरकतें और राजनीतिक दुष्कर्म

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आरएसएस के संगठन निरंतर आक्रामक होते जा रहे हैं और खुलेआम राजसत्ता का अपने लक्ष्यों के विस्तार के लिए दुरुपयोग कर रहे हैं। संघ का लक्ष्य है अ-लोकतंत्र की स्थापना करना और कारपोरेट लूट का माहौल बनाना। वह समाज सेवा के नाम पर खुराफाती राजनीति करने वाला संगठन है। सवाल यह है  आम जनता की आंखों में,खासकर मध्यवर्ग की आंखों में धूल झोंकने में यह संगठन कैसे सफल हो जाता है ? आंखों में धूल झोंकना इनकी पुरानी आदत है। इसके लिए वे हर किस्म का हथकंड़ा अपनाते हैं। धूल झोंकने की कला का लक्षण  है  कहो कुछ, करो कुछ,बोलो कुछ और करो कुछ।       मसलन्, पीएम नरेन्द्र मोदी कहें मैं तो व्यक्ति,धर्म आदि की आजादी का पक्षधर हूँ ,लेकिन जमीनी स्तर पर उनसे जुड़ा संगठन व्यक्ति और धर्म की आजादी पर हमले करे,दंगों में भाग ले,हत्याकांडों में भाग ले, संवैधानिक हकों पर खुलेआम हमले करे तो सच कौन सा मानें ? भाषण वाला या एकेशन वाला ? समाज किससे चलता है भाषण से या एक्शन से ? जाहिर है जीवन में पहचान एक्शन से होती है भाषण और भाषा से नहीं।  मोदी और संघ को एक्शन के आधार पर देखो ,बयानों के आधार पर नहीं। सच भाषा में नहीं, बयान में नहीं.…

मथुरा के शानदार युवामित्र

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बचपन को याद रखना बहुत मुश्किल काम है, मैं धीरे धीरे बचपन की ढ़ेरों बातें भूलता जा रहा हूँ। बचपन में जिन मित्रों को मैं आज भी मूल्यवान मानता हूँ उनमें मेरे आरंभिक मित्र हैं वामनजी चतुर्वेदी,दिनेश चतुर्वेदी,राजेश चतुर्वेदी,बाँके बिहारी चतुर्वेदी और शिवदत्त चतुर्वेदी। हम पांचों की मित्रता बेहद रोचक,उत्तेजक और साम्यवादी ओज से भरी हुई थी। दिलचस्प बात थी कि मैं इन पांचों के पिता से भी परिचित था और खूब घुला मिला हुआ था। वे हमारे मंदिर पर नियमित आते भी थे। मसलन् ,शिवदत्त के पिता गौरीदत्त चतुर्वेदीजी से आए दिन खूब बातें होतीं, वे पक्के कांग्रेसी,स्वाधीनता सेनानी और ईमानदार सामाजिकनेता थे। उनके दोनों बेटे पक्के वामपंथी थे।राजेश के पिता राधेश्याम चतुर्वेदी सोशलिस्ट थे और पेशे से वकील थे,दिनेश और बाँके के पिता सामान्यजन थे और उनकी ज्ञान-विज्ञान में कम रुचि थी,जबकि वामनजी के पिता शाक्त सम्प्रदाय के गुरुओं में गिने जाते थे,उनको समाज गुरुजी की तरह मानता था, वे भी नियमित हमारे मंदिर आते थे और मैं उनके घर नियमित जाता था और अनेक किस्म की शास्त्रचर्चा होती थी, मजेदार पहलू यह था कि हम सबके पिता साम्यवादी…

अफसरसाहित्यकार के प्रतिवाद में

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आजकल अफसरलेखक को हिन्दी साहित्यवाले सम्मान देते हैं। अफसरलेखक की भूमिका को वे गंभीरता से विश्लेषित नहीं करते,जन सरोकारों के संदर्भ में उसकी भूमिका को खोलकर नहीं देखते। इसने साहित्य के जन सरोकारों को प्रदूषित किया है, संघर्षशील कतारों को कमजोर किया है। 
एक जमाना था हिन्दी में जन सरोकारों से जुड़े साहित्यकार महत्वपूर्ण माने गए, बाद में ऐसा दौर आया कि अफसरसाहित्यकार ही साहित्य के सितारे बन गए। अशोक बाजपेयी को इस परंपरा को स्थापित करने का श्रेय जाता है।
आज साहित्यकारों में अफसरसाहित्यकारों के इर्दगिर्द जमघट लगा रहता है, ये अफसरसाहित्यकार साहित्य को कुछ नहीं दे पाए हैं,हां, एक काम जरुर हुआ है कि साहित्य में अफसरों की आदतें आ गयी हैं।
साहित्यकारों में वे सारी तिकड़में आ गयी हैं जो अफसर में होती हैं,तिकड़मी और ऊपर के कनेक्शनवाला मजेदार साहित्यकार पैदा हुआ है जो साहित्य में मजे ले रहा है और साहित्य को मजमे की तरह इस्तेमाल करके विनिमय कर रहा है।
अफसरसाहित्यकारों के पास एक अच्छी खासी जमात सरकारी तंत्र और राजनेताओं की है इसने साहित्य को सत्ता के तंत्र का पुर्जा बनाकर रख दिया है।
सवाल यह है कि साहित्य…

मूल्यहीन मोदी की बम बम बम

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासन को एक साल हो गया।इस एक साल में मोदी की बहुत सारी खूबियां और खामियां सामने आई हैं। मोदी की सबसे बड़ी खामी यह है कि उसने कारपोरेट मीडिया में स्व-सेंसरशिप लागू कराकर अभिव्यक्ति के दायरे को ही सीमित कर दिया है। कायदे से प्रधानमंत्री बनने के बाद मीडिया कवरेज में कमी आनी चाहिए।     कवरेज तब अच्छा लगता है जब पीएम या उनके मंत्री कोई नया काम कर रहे हों, नीतियां लागू कर रहे हों, खबर बना रहे हों। लेकिन अफसोस की बात यह है कि मोदी ने चुनाव अभियान में जो पद्धति अपनायी उसे पीएम बनने के बाद भी जारी रखा। चुनाव के पहले वे सत्ता के प्रत्याशी थे लेकिन पीएम बनने के बाद वे देश के प्रधानमंत्री हैं, देश का प्रधानमंत्री यदि बंधुआ मीडिया की परिकल्पना को साकार करने लगे तो यह तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी कु-सेवा है।        पीएम मोदी को मीडिया को भांड़ और भोंपू बनाने के लिए कभी क्षमा नहीं किया जा सकता। कम से कम कांग्रेस पर विगत दस सालों में यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि मीडिया को पीएम ने बंधुआ बनाने की कोशिश की थी। इन दिनों मीडिया के मालिकों पर पीएम दफ्तर का दबाव इस कदर हावी …

राजीव गांधी के बहाने

फ़ेसबुक पर जस्टिस मार्कण्डेय काटजू की राजीव गांधी पर पोस्ट पढ़कर लगा कि हमारे मध्यवर्ग में एक तबक़ा ऐसा पैदा हुआ है जो मानवीय संवेदनाओं और लोकतांत्रिक संवेदनाओं के मामलों में एकसिरे से अमानवीय हो चुका है या जैसी करनी-वैसी भरनी की मनोदशा का शिकार है।        राजीव गांधी की स्वाभाविक मौत नहीं हुई थी, वे लंकाई तमिल आतंकी संगठन लिट्टे के हाथों मारे गए , उनकी लिट्टे मरजीवडों ने हत्या की थी। इस हत्या की किसीभी रुप में हिमायत सही नहीं है। राजीव गांधी की मृत्यु सामान्य मृत्यु नहीं है। वह राजनीतिक हत्या है । हत्यारों ने ख़ास मंशा और उद्देश्य को ध्यान में रखकर हत्या की थी। यह भारत के प्रधानमंत्री की हत्या है। यह हत्या ऐसे समय में की गयी जब भारत लिट्टे की आतंकी मुहिम से श्रीलंका में जूझ रहा था। आतंकी गिरोह के हाथों हमारे प्रधानमंत्री का मारा ज़ाना मार्कण्डेय साहब को क्यों नहीं दिखा ? लिट्टे के ख़िलाफ़ भारत ने यदि श्रीलंका में अभियान न चलाया होता तो आज वह समूचे एशिया में वह सबसे ताक़तवर आतंकी संगठन होता । लिट्टे को नेस्तनाबूद करने बाद ही हम श्रीलंका में शांति स्थापित करने में मदद कर पाए।       हमारे…

माँ की सामाजिक ताकत

माँ के बारे में लिखना बेहद मुश्किल काम है।सामने वो प्रशंसा सुनती नहीं थी, इस समय वो मौजूद नहीं है। जब तक रही अपार ऊर्जाका स्रोत बनी रही। हम सब भाई-बहन बेहद खुश रहते थे। कभी किसी चीज के बारे मेंमैंने निजी तौर पर कमी महसूस नहीं  की। वह हम सबकी सामाजिक ताकत थी। माँ का जन्म जिसपरिवार में हुआ वह  मथुरा के पढ़े-लिखे परिवारों में से एक बेहतरीन परिवारथा। उस परिवार के पास   बेहतरीनसांस्कृतिक और बौद्धिक परंपराएं थीं,नानाजी सोहनलाल चतुर्वेदी  संगीत के विद्वान थे, दोनों मामा पक्के खांटीमार्क्सवादी बुद्धिजीवी थे। मथुरा के चौबों की पंडिताई-प्रोहिताई की परंपरा सेमुक्त इस परिवार में तमाम किस्म के आधुनिक संस्कार थे।  माँ बचपन में टाइफायडके कारण गूंगी-बहरी हो गई, इसके अलावा उसकी छोटी उम्र में ही शादी भी हो गयी,शादी तकरीबन 6-7साल की उम्र में हुई,सात साल बाद द्विरागमन हुआ, वह मुश्किल से15-16साल की रही होगी जब मेरा जन्म हुआ। वह जब तक जिंदा रही मैं अधिकांश समय छायाकी तरह उसके साथ रहा। वह पढ़ी लिखी नहीं थी, लेकिन शिक्षा की ताकत जानती थी, नएविचारों और खासकर प्रगतिशील विचारों को व्यवहार से पहचानती और मानती …

न्याय का अन्यायमुख

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कानून के खिलाफ बोलना या न्याय का विरोध करना अपने आपमें जोखिम का काम है,आमतौर पर भारत में जो कानून के जानकार या विशेषज्ञ हैं वे कानून के दार्शनिक-वैचारिक पहलुओं पर कम बोलते हैं । सामान्य तौर पर पूंजीवादी समाज में कानून के पास फरियाद लेकर जाओ तब कानून हस्तक्षेप करता है, अपनी पहल पर वह कभी हस्तक्षेप नहीं करता। इससे यह भी पता चलता है कि कानून में निजी पहलकदमी का अभाव है। कानून की धुरी न्याय नहीं है, बल्कि युक्तियां और फैसले हैं,न्याय की परंपरा है, फैसलों की परंपरा है।फलतःकानून किताबों और दलीलों का विशाल जंजाल है।       न्यायालयों में वही नियम लागू होता है जो समाज में लागू होता है। समाज  जिस तरह बल प्रयोग के आधार पर चलता है, वैसे ही बल के आधार पर लोकतंत्र भी चलता है,उसी तरह न्यायालयों में भी बल के आधार पर ही फैसले होते हैं।  अदालत के अंदर बली होने के लिए जरुरी है कि आप जमकर पैसा फेंकें और अदालत में बल का प्रदर्शन करें। बड़े से बड़े वकील को खड़ा करें। बड़े वकील का मतलब ज्यादा फीस और मुकदमा लड़ने वाले की ताकत । इसीलिए यह कहते हैं कि कानून का समूचा दारोमदार न्यायिक बल -संतुलन पर टिका है। जिस त…

सलमान,मध्यवर्गीय लंपटता और समाज सेवा

सलमान के कवरेज ने एकबार फिर से हमें मध्यवर्ग के अपराधी मनोभावों पर सोचने के लिए विवश किया है। भारत का महान मध्यवर्ग का व्यापक अंश मूल्यों की दृष्टि से महान मूल्यों की ओर नहीं जा रहा,बल्कि अ-सामाजिक मूल्यों की ओर इसका स्वाभाविक रुझान देखने में आ रहा है। मध्यवर्ग के इस बड़े समूह की सामान्य विशेषता हैअ-सामाजिक मूल्यों को वैधता प्रदान करना,उनका महिमा मंडन करना और उनके लिए सामाजिक समूहों और दवाब ग्रुपों का निर्माण करना ।इसे हम लंपट मध्यवर्ग कहें तो बेहतर होगा।      स्वभाव से लंपट मध्यवर्ग अविवेकवादी और कानूनभंजक है।  यह हाशिए के लोगों से नफरत करता है,उनको कीड़े-मकोड़े से ज्यादा नहीं समझता, गायक अभिजीत का कल सलमान प्रसंग में आया बयान इस वर्ग में हाशिए के लोगों के प्रति व्याप्त घृणा का आदर्श नमूना है।     मीडिया में बार-बार सलमान समर्थक लोग सलमान के सुधार कार्यों का उल्लेख करके मानवीय आबोहवा पैदा कर रहे थे, लेकिन सामाजिक जीवन में ऐसे समाजसुधार और मानवीय कार्यों का कोई स्वस्थ लक्ष्य नहीं है जो निहित स्वार्थ और सामाजिक जन समर्थन जुटाने के लिए किया जाय।        लंपट मध्यवर्ग-उच्चमध्यवर्ग के …

पंडित जवाहरलाल नेहरु और धर्मनिरपेक्षता की चुनौतियाँ

भारत जब आजाद हुआ तो उसकी नींव साम्प्रदायिक देश- विभाजन पर रखी गयी।फलतः साम्प्रदायिकता हमारे लोकतंत्र में अंतर्गृथित तत्व है। लोकतंत्र बचाना है तो इसके खिलाफ समझौताहीन रवैय्या रखना होगा। साम्प्रदायिकता के औजार हैं आक्रामकता और मेनीपुलेशन । इसने सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक संरचनाओं को गंभीरता से प्रभावित किया है। त्रासद पक्ष यह है कि हाल के वर्षों में साम्प्रदायिकताविरोधी चेतना का ह्रास हुआ है।खासकर आपातकाल के बाद पैदा हुए नागरिकों में यह फिनोमिना व्यापक रुप में नजर आता है। साम्प्रदायिकता को हम तदर्थवादी और वोटवादी धर्मनिरपेक्ष कॉमनसेंस नजरिए से देखते हैं।फलतः यह भी कहने लगे हैं सभी राजनीतिक दल एक जैसे होते हैं। इस धारणा ने साम्प्रदायिक और गैर-साम्प्रदायिकदल के बीच के भेद को खत्म करने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की है। जबकि सच यह है साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता एक ही चीज नहीं है। साम्प्रदायिकदल और धर्मनिरपेक्षदल एक ही जैसे नहीं होते। हम इनमें समानताएं दरशाने के लिए राजनीतिक एक्शन के बीच समानताएं बताने लगते हैं। राजनीतिक एक्शनों में समानताओं के आधार पर कोई भी निर्णय सही नहीं हो …

नामवर सिंह सिर्फ 'देह' हैं

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साहित्य इन दिनों भेडों से घिर चुका है। आप भेड़ नहीं हैं तो साहित्यकार नहीं हैं। सत्ता ने साहित्यकार को सम्मान दिया,पुरस्कार दिए लेकिन भेड़ का दर्जा भी दिया। हम खुश हैं कि हम भेड़ हैं। भेड़ की तरह रहते हैं,जीते हैं, लिखते हैं,भेड़ होना बुरी बात नहीं है लेकिन साहित्यकार का भेड़ होना बुरी बात है। साहित्यकार जब भेड़ बन जाता है तो यह साहित्य के लिए अशुभ-संकेत है। हम असमर्थ हैं कि साहित्यकार को भेड़ बनने से रोक नहीं रोक पा रहे,साहित्य में भेडों का उत्पादन जितनी तेजी से बड़ा है उतनी तेजी से साहित्य का उत्पादन नहीं बढ़ा।         एक जमाना था साहित्यकार का दृष्टिकोण महत्वपूर्ण होता था लेकिन इन दिनों 'दृष्टिकोण' की जगह 'कोण' ने लेली है। 'दृष्टि' बेमानी हो गयी है। साहित्यकार का 'कोण' उसकी पहचान का आधार बन गया है । साहित्यकार के दृष्टिलोप की सटीक जन्मतिथि हम नहीं जानते,लेकिन एक बात जरुर जानते हैं कि विवेक जब मर जाता है तब 'कोण' पैदा है। विवेक जब तक जिंदा रहता है दृष्टिकोण बना रहता है लेकिन जब विवेक मर जाता है तो सिर्फ 'कोण' रह जाता है।        …