बचपन को याद रखना बहुत मुश्किल काम है, मैं
धीरे धीरे बचपन की ढ़ेरों बातें भूलता जा रहा हूँ। बचपन में जिन मित्रों को मैं आज
भी मूल्यवान मानता हूँ उनमें मेरे आरंभिक मित्र हैं वामनजी चतुर्वेदी,दिनेश
चतुर्वेदी,राजेश चतुर्वेदी,बाँके बिहारी चतुर्वेदी और शिवदत्त
चतुर्वेदी। हम पांचों की मित्रता बेहद रोचक,उत्तेजक
और साम्यवादी ओज से भरी हुई थी। दिलचस्प बात थी कि मैं इन पांचों के पिता से भी
परिचित था और खूब घुला मिला हुआ था। वे हमारे मंदिर पर नियमित आते भी थे। मसलन् ,शिवदत्त
के पिता गौरीदत्त चतुर्वेदीजी से आए दिन खूब बातें होतीं, वे पक्के
कांग्रेसी,स्वाधीनता सेनानी और ईमानदार सामाजिकनेता थे। उनके दोनों बेटे पक्के
वामपंथी थे।राजेश के पिता राधेश्याम चतुर्वेदी सोशलिस्ट थे और पेशे से वकील
थे,दिनेश और बाँके के पिता सामान्यजन थे और उनकी ज्ञान-विज्ञान में कम रुचि
थी,जबकि वामनजी के पिता शाक्त सम्प्रदाय के गुरुओं में गिने जाते थे,उनको समाज
गुरुजी की तरह मानता था, वे भी नियमित हमारे मंदिर आते थे और मैं उनके घर नियमित
जाता था और अनेक किस्म की शास्त्रचर्चा होती थी, मजेदार पहलू यह था कि हम सबके
पिता साम्यवादी नहीं थे , हां, गौरीदत्त जी और राधेश्यामजी साम्यवाद को जरुर मानते
थे।
मेरे
घर में पिता की ओर से साम्यवादियों से मित्रता करने और मार्क्सवादी साहित्य पढ़ने
को लेकर तकरीबन पाबंदी थी,अनेक बार इसके कारण मेरी कसकर पिटाई भी हुई,अनेक
मार्क्सवाद की किताबें पिता ने फाड़कर फेंक दीं, साम्यवादियों से दूर रहने की
बार-बार हिदायत भी दी,लेकिन मैं आदत से लाचार था, दिल था कि मानता ही नहीं था। आधा
समय पंडितों और संस्कृतशास्त्रियों में गुजरता और आधा समय साम्यवादी युवामित्रों
में। मेरे दोस्त मेरे मंदिर पर दर्शन करने के बहाने आते और मीटिंग -गोष्ठी की
सूचना मुझे देकर चले जाते। अजीब सी स्थिति हुआ करती थी। मेरे मित्रों को मेरे पिता
से आए दिन साम्यवादियों को लेकर खरी-खोटी सुननी पड़ती। मेरे पिता का मानना था साम्यवादी बच्चों को बिगाड़ देते हैं। जबकि
सच्चाई यह थी कि साम्यवादियों की संगत में मुझे बहुत कुछ सीखने और जानने को मिला।
शिवदत्त चतुर्वेदी पर खासतौर पर भारतीय
कम्युनिस्ट पार्टी का गहरा असर था। वह भाकपा का सदस्य था। उसका बंगाली घाट स्थित
घर तो भाकपा का ऑफिस ही था। हम चारों की कैसे मुलाकात हुई याद नहीं पड़ता ,लेकिन
हल्की सी याद है शिवदत्त ने पहल करके मुझसे पहले घर आकर परिचय किया। उन दिनों मैं
अपने कॉलेज माथुर चतुर्वेद संस्कृत
महाविद्यालय के छात्रसंघ का महासचिव था, वियतनाम के
मुक्ति दिवस पर संभवतःमिलने आया था और मुझे पहलीबार किसी आधुनिक कार्यक्रम में
शामिल होने का सौभाग्य उसके जरिए ही मिला। वहीं पर मेरी मथुरा के कम्युनिस्टों से मुलाकात हुई, दिनेश से
मुलाकात हुई,बाद में वामनजी और राजेश से मित्रता हो गयी।
दिलचस्प बात यह थी कि दिनेश और शिवदत्त के विचार
एक जैसे हुआ करते थे,जबकि वामनजी,मैं और बांके के विचार एक जैसे हुआ करते,इस तरह
आपस में दो गुट बन गए बादमें मैं,वामनजी,बाँके और राजेश ने एसएफआई की सदस्यता ले
ली,खुलकर माकपा के लिए काम करने लगे,दिनेश और शिवदत्त ने भाकपा में सक्रिय रुप से
भाग लेना आरंभ कर दिया। लेकिन हम पांचों पक्के मित्र थे। तकरीबन रोज मिलना-बहस
करना,नए मित्रों की तलाश करना,उनको साम्यवादी विचारों के करीब लाना,हम लोगों का
साझा काम था, आरंभ में एसएफआई से जुड़ते समय चौधरी वीरेन्द्र सिंह और अन्य
कॉमरेडों से मित्रता हो गयी,उस पर फिर कभी बातें करूँगा।
दिलचस्प बात यह थी कि हम पाँचों ऐसे माहौल में
रहते थे जिसमें साम्यवाद के लिए कोई जगह नहीं थी, साम्यवादी विचारों को सुनकर लोग
भड़कते थे। मेरे लिए तो खास करके बहुत दिक्कत होती थी क्योंकि मुझे मंदिर पर बैठना
पड़ता,ज्योतिष का काम भी करना पड़ता था और मेरे मंदिर पर आने वाले अधिकतर लोग
कांग्रेसी या आरएसएस से प्रभावित लोग हुआ करते थे। सुखद बात यह है कि मेरे पांचों
मित्र आज भी किसी न किसी रुप में लोकतांत्रिक और साम्यवादी विचारों से जुड़े हैं।
वामनजी बैंक कर्मचारियों के नेता हैं,फेसबुक मित्र हैं.,शिवदत्त आज भी जुझारु भाव
से मथुरा में जनांदोलनों से जुड़े हैं, दिनेश और राजेश वकालत कर रहे हैं और
लोकतांत्रिक आंदोलन के साथ हैं, मैं काफी लंबे समय से इन दोनों(दिनेश और राजेश) से
नहीं मिला हूँ, हम पांचों का उस दौर में एक ही लक्ष्य होता था कि नए मित्र
बनाओ,उनमें राजनीतिक अभिरुचि पैदा करो और मथुरा जैसे धर्मप्राण शहर में आधुनिक
चेतना जगाओ।
हम
पांचों की अन्य विचारधारा के युवाओं से भी मित्रता थी और वे लोग यदि अपने
कार्यक्रम में बुलाते थे तो हमलोग जाते थे और उनके भाषण भी सुनते थे। मित्रता रखना
और उसे निभाना हमने बचपन में सीखा। मित्रता का आधार विचारधारा नहीं होती थी।
मित्रता तो बस मित्रता थी बस एकबार मिल तो लो । जिससे एकबार परिचय हो जाता उसे
छोड़ते नहीं थे । मुझे याद है एक बार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के छात्र संगठन
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के स्थापना दिवस के कार्यक्रम में मैं,वामनजी और
बाँके चले गए, उस समय अरुण मिश्रा संघ के छात्रनेता हुआ करते थे ,हमारे मित्र
थे,उन्होंने कहा कभी हमारे यहां भी आओ। हम चले गए। दिलचस्प घटना यह हुई कि हमारे
जाने के बाद सभी संघी वक्ताओं ने पानी-पी पीकर खूब साम्यवादियों और खासकर चीन के
साम्यवादियों को जमकर खरी-खोटी सुनाई और हमारी उपस्थिति मात्र से उनका समूचा
कार्यक्रम चीनविरोधी गोष्ठी में रुपान्तरित हो गया। हमने एकाग्र भाव से दो घंटे
जमकर चीन की निंदा सुनी और बाद में जमकर ठहाका मारकर संघियों की मूर्खता पर हँसे
कि मूर्खों ने हमें गाली देने के चक्कर में अपनी विचारधारा पर एक वाक्य भी न बोलकर
सारा कार्यक्रम साम्यवाद की निंदा पर खर्च कर दिया, उस घटना के बाद संघियों के
निमंत्रण पत्र आने बंद हो गए ।
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