संदेश

April, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मई दिवसः हे मार्केट के शहीदों का खून बेकार नहीं जायेगा - अरुण माहेश्वरी

चित्र
कार्ल मार्क्‍स और फ्रेडरिख एंगेल्स ने ‘कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणा–पत्र’ का प्रारंभ इन पंक्तियों से किया था – समूचे यूरोप को एक भूत सता रहा है – कम्युनिज्म का भूत। 1848 में लिखे गये इन शब्दों के बाद आज 154 वर्ष बीत गये हैं और सचाई यह है कि आज भी दुनिया के हर कोने में शोषक वर्ग की रातों की नींद को यदि किसी चीज ने हराम कर रखा है तो वह है मजदूर वर्ग के सचेत संगठनों के क्रांतिकारी शक्ति में बदल जाने की आशंका ने, आम लोगों में अपनी आर्थि‍क बदहाली के बारे में बढती हुई चेतना ने। सोवियत संघ में जब सबसे पहले राजसत्ता पर मजदूर वर्ग का अधिकार हुआ उसके पहले तक सारी दुनिया में पूंजीपतियों के भोंपू कम्युनिज्म को यूटोपिया (काल्पनिक खयाल) कह कर उसका मजाक उड़ाया करते थे या उसे आतंकवाद बता कर उसके प्रति खौफ पैदा किया करते थे। 1917 की रूस की समाजवादी क्रांति के बाद पूंजीवादी शासन के तमाम पैरोकार सोवियत व्यवस्था की नुक्ताचीनी करते हुए उसके छोटे से छोटे दोष को बढ़ा–चढ़ा कर पेश करने लगे और यह घोषणा करने लगे कि यह व्यवस्था चल नहीं सकती है। अब सोवियत संघ के पतने के बाद वे फिर उसी पुरानी रट पर लौट आये हैं…

इस्राइली यहूदी फंडामेंटलिज्म के सामने असहाय दुनिया

चित्र
फिलीस्तीन इलाकों में जहां इस्राइली सेनाओं ने अवैध कब्जा जमा लिया है वहां पर फिलीस्तीनी नागरिकों को बेदखल किया जा रहा है और अवैध बस्तियों का निर्माण किया जा रहा है। इस्राइल अधिकृत फिलीस्तीनी इलाकों में बर्बरता का कानून चल रहा है। स्थिति इतनी भयाभय है कि जो स्वयंसेवी संस्थाएं फिलीस्तीनियों के लिए मानवीय सहायता का काम कर रही हैं, उन्हें अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की अवहेलना करके प्रवेश परमिट नहीं दिया जा रहा है। इस्राइली प्रशासन काम करने नहीं दे रहा है। अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्थाओं को 16 दिसम्बर 2009 को अचानक ईमेल के जरिए इस्राइली प्रशासन ने सूचित किया कि स्वयंसेवी संस्थाओं को इस्राइल अधिकृत फिलीस्तीन इलाकों में काम करने का परमिट नहीं दिया जाएगा। पहली बात यह कि फिलीस्तीन इलाकों में परमिट देने का अधिकार फिलीस्तीन प्रशासन को है, यदि इस्राइल ऐसा करता है तो वह फिलीस्तीन प्रशासन को कागजी संगठन मात्र बना रहा है और यह फिलीस्तीन जनता का अपमान है। उल्लेखनीय है फिलीस्तीन प्रशासन में इन दिनों जो लोग बैठे हैं वे जनता के द्वारा चुने गए लोग हैं। फिलीस्तीन में आम चुनाव जितने पारदर्शी और लोकतांत्रिक ढ़ं…

ओबामा का वायदा दो साल में फिलीस्तीन राष्ट्र

चित्र
(फिलीस्तीन राष्ट्रपति महमूद अब्बास और अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा)  अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने फिलीस्तीन के राष्ट्रपतिमहमूद अब्बास से वायदा किया है कि दो साल में संप्रभु सार्वभौम फिलीस्तीन राष्ट्र का निर्माण कर दिया जाएगा। यह खबर मिस्र के सरकारी सूत्रों के हवाले से अरबी भाषा के अखबार अल हयात में छपी है। उल्लेखनीय है ओबामा प्रशासन का इस्राइल पर राजनीतिक दबाब अभी काम नहीं कर रहा है। क्योंकि अमेरिका की यहूदी लॉबी और शस्त्र उद्योग के मालिक इस्राइल के विस्तारवादी-सैन्यवादी बर्बर इरादों का खुला समर्थन कर रही है। इस लॉबी पर ओबामा निर्भर हैं।     आज अमेरिकी प्रशासन की किसी भी सलाह को इस्राइली शासक सुन नहीं रहे हैं। हाल ही में ओबामा के मध्य-पूर्व में विशेष राजदूत जार्ज मिशेल ने इस्राइल को फिलीस्तीन के इलाकों से इस्राइली सेनाओं को तुरंत हटाने के लिए कहा था जिसे इस्राइली प्रशासन ने तुरंत खारिज कर दिया। अमेरिकी दूत ने वैस्टबैंक के उन इलाकों से इस्राइली सेना हटाने के लिए कहा था जहां पर सन् 2000 के सैकिण्ड इंतिफादा के समय उसने अवैध कब्जा जमाया हुआ है। इसके बदले में इस्राइल ने कुछ नाका च…

फिलीस्तीन की आर्थिक तबाही पर चुप क्यों हैं भारतीय बुद्धिजीवी

चित्र
(फिलीस्तीनी फूलों की दुकान)
          एक जमाना था हिन्दी में साहित्यकारों और युवा राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं में युद्ध विरोधी भावनाएं चरमोत्कर्ष पर हुआ करती थीं, हिन्दीभाषी क्षेत्र के विभिन्न इलाकों में युध्द विरोधी गोष्ठियां,प्रदर्शन, काव्य पाठ आदि के आयोजन हुआ करते थे,किंतु अब यह सब परीकथा की तरह लगता है।
      हिन्दी के बुद्धिजीवियों में अंतर्राष्ट्रीय मानवीय सरोकारों को लेकर बेगानापन बढ़ा है। हिन्दी के बुध्दिजीवी खासकर प्रगतिशील बुद्धिजीवी स्थानीय सरोकारों और मुद्दों पर इस कदर व्यस्त हैं कि उन्हें स्थानीयता के अलावा अन्य कुछ भी नजर ही नहीं आता। यह हिन्दी के बुद्धिजीवी की बदली हुई मनोदशा का संकेत है।
       अब प्रगतिशील जितना साम्प्रदायिकता पर हल्ला करते हैं, अमेरिका-इस्राइल के मध्यपूर्व में चलाए जा रहे जनसंहार अभियान पर उतना हल्ला नहीं मचाते। यह अचानक नहीं है कि मध्यपूर्व में चल रहा जनसंहार हिन्दी के बुद्धिजीवियों के चिन्तन के केन्द्र से अचानक गायब हो गया है।
        भूमंडलीकरण के वैचारिक हथौड़े ने बुद्धिजीवियों को व्यापक जनहित के सरोकारों की बजाय स्थानीय सरोकारों में उलझा दिया है। ज…

भारत बंदः विकासदर का सर्जक मनमोहन सिंह या मजदूरवर्ग ?

चित्र
कल मंहगाई के सवाल पर भारतबंद था। यह भारत बंद मंहगाई और अन्य समस्याओं पर जनता के गुस्से का इज़हार है। यह संघर्षशील जनता की हाल के समय में सबसे सार्थक कार्रवाई भी है। जिस समय बंद चल रहा था उसी समय संसद में मंहगाई और दूसरी समस्याओं पर विपक्ष  के बजट कटौती प्रस्तावों पर मतदान हो रहा था और शाम को चैनलों पर बंद और बजट प्रस्तावों पर विपक्ष की हार का चैनल वाले सरकारी भोंपू की तरह प्रचार कर रहे थे। चैनलों की इस निर्लज्ज हरकत की जितनी निंदा की जाए कम है।      असल में संसद में सरकार जीती और जनता में सरकार हार गयी । मंहगाई आदि समस्याओं पर इतना व्यापक जनाक्रोश हाल के वर्षों में नजर नहीं आया। हमें सोचना चाहिए संसद महान है या जनता महान है ? जनता को मंहगाई के अंधकूप में डालने का जनादेश कांग्रेस को नहीं मिला था। जो सरकार जनादेश के बाहर चली जाए उसे शासन करने का राजनीतिक अधिकार नहीं है।     एकबार संसद के बारे में कवि धूमिल ने लिखा था मेरी संसद तेली की वह घानी है जिसमें आधा तेल आधा पानी है।       हमें इस सवाल पर सोचना चाहिए कि कारपोरेट मीडिया को मजदूरवर्ग नापसंद क्यों है ? क्या मजदूरवर्ग और उनके हितैषी सं…

कम्प्यूटर क्रांति का महान विज़नरी वन्नेबर बुश -समापन किश्त -

वन्नेबर बुश की जीवनी 'एण्डलेस फ्रंटियर' में जचेरी ने लिखा है कि ''साधारण करदाताओं को यह समझना चाहिए कि शोधकर्ताओं को करदाताओं के धन की शांति के समय भी दरकार होती है।''जचेरी ने रेखांकित किया है कि बुश का रूजवेल्ट से विशेष संबंध और उसके वैज्ञानिक कार्यकलाप यह तथ्य संप्रेषित करते हैं कि विज्ञान के बारे में लगातार वे विशेषज्ञ निर्णय ले रहे थे जो जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की सत्ता के बाहर थे।विज्ञान के विकास का फैसला नागरिक नहीं ले रहे थे।सैन्य अधिकारी फैसला नहीं ले रहे थे। बल्कि बुश जैसे वैज्ञानिक फैसला ले रहे थे।इनकी किसी के प्रति जबावदेही नहीं थी।     जचेरी ने लिखा है कि ''मुक्त दिमागों पर बढ़ती हुई निर्भरता के फायदे थे किंतु पेशेवर लोगों और जनता के लिए खतरा था।... ये लोग जनता के फंड का लाभ उठाते हुए जनता के जीवनस्तर के प्रति बेखबर थे।'' रूजवेल्ट की मौत के बाद बुश का प्रभामंडल कमजोर हुआ। किंतु शोध को उसने जिस ऊँचाई पर पहुँचा दिया था वहां से नीचे लाना किसी के लिए संभव नहीं था। वह प्रयोगशाला को सूचना युग तक ले गया।
       बुश का वि…

मनमोहन-सोनिया -आडवाणी शर्म करो इस्राइली बर्बरता पर बोलो

चित्र
( फिलीस्तीनी चित्रकार मोहम्मद सावू का गाजा दमन के खिलाफ बनाया चित्र) गाजा की इस्राइल द्वारा नाकेबंदी जारी है। हजारों लोग खुले आकाश के नीचे कड़कड़ाती ठंड में ठिठुर रहे हैं , इन लोगों के पास न तो कम्बल हैं, न टैंट हैं, न खाना है, न पीने का साफ पानी है। यह बातें संयुक्तराष्ट्रसंघ मानवीय सहायता दल के संयोजक मैक्सवेल गेलार्ड ने फिलीस्तीनी इलाकों का ङाल ही में निरीक्षण करने के बाद पत्रकारों से कही हैं।      आश्चर्य की बात है भारत सरकार ने अभी तक गाजा की तबाही और इस्राइली नादिरशाही के खिलाफ एक भी बयान तक जारी नहीं किया है। कांग्रेस के नेतृत्व का फिलिस्तीनियों पर इस्राइली सेना के बर्बर अत्याचारों पर चुप्पी लगाए रहना भारत के लिए शर्मिंदगी की बात है। भारत लगातार फिलीस्तीनी जनता के स्वाधीनता संग्राम का समर्थक रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के जमाने में विगत 6 सालों से इस्राइल के साथ जिस तरह का राजनीतिक व्यवहार किया जा रहा है और फिलीस्तीनी जनता के ऊपर हो रहे बर्बर हमलों पर जिस तरह की चुप्पी विदेश मंत्रालय ने लगाई हुई है वह भारत सरकार की फिलीस्तीन समर्थक विदेश नीति में आए बदलाव की सूचना है, …