बुधवार, 14 अप्रैल 2010

मीडियावाली नकली औरत के फिदाईन- सुधा सिंह




       स्त्री के मीडिया में रूपायन का एक बड़ा जरिया विज्ञापन हैं। विज्ञापनों में स्त्री के रूपायन का प्रच्छन्न तरीके से दर्शक के स्त्री संबंध रवैयये,संस्कार,एटीट्यूट,मूल्यआदि पर असर होता है। विज्ञापनों में स्त्री और पुरूष दोनों के ही बारे में चीजें संप्रेषित की जाती हैं उनमें बताया जाता है कि औरतें कैसे रहें,किस तरह का व्यवहार करें,कैसा लुक रखें,किस तरह देखें वगैरह वगैरह। असल में आधुनिक समाज में विज्ञापन समाजीकरण का सबसे प्रभावी एजेंट है। वहां स्टीरियोटाईप का बोलवाला है। स्टीरियोटाईप से प्रभावित लोगों में स्त्री के प्रति नकारात्मक रूख होता है। स्त्री के प्रति नकारात्मक विचार होते हैं।

विज्ञापनों में सामाजिक कार्यों में सक्रिय महिला को दिखाने का यह परिणाम देखा गया है कि स्टीरियोटाईप औरत की मांग बढ़ी है,उसके प्रति आक्रामक व्यवहार में इजाफा हुआ है। यह भी पाया गया है कि प्रत्यक्ष कामुक सामग्री को स्त्री और पुरूष दोनों के द्वारा देखे जाने के बाद स्टीरियोटाईप भूमिका की तरह रूझान बढ़ा है।बलात्कार के मिथ की स्वीकृति बढ़ी है।स्त्री के प्रति आक्रामक व्यवहार की स्वीकृति बढ़ी है। फैशन या महिला पत्रिकाओं में स्त्री की इमेज देखकर औरतों में अपने वजन को लेकर चिन्ताएं बढी हैं। वे वजन को लेकर नकारात्मक ढ़ंग से सोचने लगी हैं। एक-दूसरे के शरीर की तुलनाएं करने लगती हैं। वे अपनी सांस्कृतिक स्थिति को भूलकर मॉडल को देखकर सक्रिय हो जाती हैं। नकारात्मक इमेज के प्रभाववश वे ईटिंग डिसऑर्डर का शिकार हो जाती हैं।

सन् 1979 तक विज्ञापनों में मूलत: अंतर्वस्तु पर जोर रहता था। किन्तु सन् 1979 में गुफमैन ने विज्ञापन में कोडिंग की एक नयी पध्दति निकाली जिसे उसने ''जेण्डर एडवरटाइजमेंट '' (1979) नामक कृति में विस्तार से रेखांकित। इस पुस्तक के आने के पहले तक विज्ञापन में औरत परंपरागत काम करती ,हमेशा घर में दिखाई देती है, मुश्किल से घर के बाहर नजर आती है, पुरूष के संरक्षण में नजर आती है, घर के बाहर पेशेवर कार्यों में मुश्किल से दिखाई देती है। औरत को सेक्स की वस्तु के रूप में पेश किया जाता है। अथवा घर के काम करते हुए दिखाया जाता है। इसके अलावा औरत को बर्तन माजते,ड्रग ,कपड़ा, घरेलू वस्तुओं के साथ दिखाया जाता था। वहीं दूसरी ओर मर्द को कार,पर्यटन,शराब,सिगरेट बैंक आदि के विज्ञापनों में दिखाया जाता था। इसके विपरीत गुफमैन ने जो तकनीक निकाली उसके कारण मूल्यांकन की नयी विधि 'फ्रेम एनालिसिस' का जन्म हुआ। इस पद्धति में बताया गया कि विज्ञापन में प्रच्छन्न संदेश रहता है। खासकर स्त्री के साथ पुरूष के संबंध को लेकर।

गुफमैन ने नयी कोडिंग व्यवस्था का निर्माण किया। जिसमें स्त्री के हावभाव, हाथ, आंख,कंधा, चेहरे के हावभाव, सिर की अवस्था, तुलनात्मक आकार, अवस्था और स्थिति, आंख और सिर के संचालन,अंगुलियों के संचालन आदि को कोडिंग का आधार बनाया।गुफमैन ने पाया कि स्त्री का रूढबद्ध रूप निम्नलिखित केटेगरी के जरिए व्यक्त होता है।

जैसे- तुलनात्मक आकार, फंक्शन या भूमिका,स्त्री का स्पर्श,मातहत रूप का संस्कार के रूप में आना,वापसी का हक,लाइसेंस विड्रॉल आदि ।ये केटेगरी लिंगभेद की 'सामाजिक ताकत' को व्यक्त करते हैं। इनमें सामाजिक प्रभाव,शक्ति और ऑथरिटी की अभिव्यक्ति होती है। तुलनात्मक आकार के तहत विज्ञापन में मर्द तुलनात्मक तौर पर ज्यादा जगह लेता है,बोलने वाला होता है। इससे यह संदेश जाता है कि स्त्री से पुरूष सुपीरियर है। विज्ञापन में फंक्शन रेंकिंग या भूमिका की केटेगरी का अर्थ है स्त्री को मर्द की तुलना में कम महत्व के काम करते दिखाया जाएगा,जबकि मर्द अन्य की भूमिकाओं को नियंत्रित करता नजर आएगा।जब दोनों को एक साथ दिखाया जाता है तो मर्द पूरी परिस्थिति के कर्त्ता और नियंत्रक की भूमिका में होता है।

स्त्री स्पर्श का अर्थ है स्त्री अपने शरीर का ही असामान्य तरीके से स्पर्श करे ,अन्य वस्तुओं का स्पर्श करे। चीजों को मेनीपुलेट करने के लिए हाथ का इस्तेमाल करे। स्त्री को ऐसे संदर्भ में दिखाया जाता है जिससे उसका मातहत रूप सामने आए। इसका अर्थ है कि औरत ऐसे हावभाव पेश करे जिससे वह अन्य के प्रति समर्पित और नियंत्रित नजर आए। शारीरिक तौर पर झुका ले। गलत समय पर जमीन पर झुक जाए। अथवा मर्द से सरमा जाए।इस सबकी प्रतिक्रिया में पुरूष अपने सिर को ऊँचा उठा ले, उसका सिर ऊँचा उठाना श्रेष्ठता और पावर का प्रतीक है।

लाइसेंस विड्रॉल का अर्थ है स्त्री का सामाजिक परिस्थितियों से मनोवैज्ञानिक तौर पर गायब हो जाना। वह अपना ध्यान कहीं और लगा लेती है। वह कहीं दूर ऐसी जगह को देखने लगती है जो उसके दृश्य का हिस्सा नहीं है और डिसऑरिएण्टेड लगती है। ऐसी औरत अन्य के संरक्षण पर निर्भर होती है। जबकि मर्द सतर्क या जागरूक नजर आता है। परिस्थितियों के द्वारा पैदा होने वाले किसी भी किस्म के खतरे के प्रति सावधान और नियंत्रक के रूप में दिखाई देता है।

गुफमैन ने अपनी पुस्तक में पत्र-पत्रिकाओं से अनेक उदाहरण देकर अपनी बात सिद्ध की है।किन्तु उसकी सेंपिल लेने के तरीके की आलोचना हुई है।बाद में गुफमैन की कोडिंग में शरीर प्रदर्शन की सीमा, शरीर से कपड़े उतारना,एसरटिवनेस की केटेगरी को मीडिया आलोचक एम.इ.कंग ने जोड़ा। इसका अर्थ है स्त्री का अपनी इमेज के प्रति समग्र आत्म-आश्वासन और स्वतंत्रता।

कोडिंग पध्दति -

विज्ञापन की कोडिंग करने के लिए जरूरी है कि पद्धतिगत तौर पर कोडिंग के उन रूपों को जाना जाए जिन्हें विज्ञापन के मूल्यांकन में इस्तेमाल किया जा सकता है।

1.तुलनात्मक आकार (रिलेटिव साइज) - विज्ञापन में जब स्त्री और पुरूष दोनों मौजूद हों,तब फोटो में औरत की तुलना में मर्द लंबा-चौड़ा हो, ज्यादा जगह घेरे।

2.फंक्शन रेंकिंग - स्त्री और मर्द दोनों खड़े हों और मर्द कर्ता की भूमिका अदा करता नजर आए।

3.फेमिनिन टच- स्त्री स्वयं के अंगों का स्पर्श करे। मसलन् अपने बाल,होंठ,चेहरा आदि का स्पर्श करे।अथवा उसके कपड़े अस्वाभाविक दिखते हों अथवा अपनी अंगुलियों का किसी वस्तु का स्पर्श करने के लिए इस्तेमाल करे,कोई वस्तु तोड़ दे। असल में यह स्पर्श उपयोगितावादी स्पर्श से भिन्न है,इसमें किसी वस्तु को पकड लेना,दुरूपयोग करना, हथियाना भी शामिल है।

4.रिचुअलाइजेशन ऑफ सब-ऑर्डिनेशन- स्त्री इस तरह के भाव या मुद्रा में नजर आए जिसमें वह मातहत भाव को स्वीकारती हुई लगे। इसमें जमीन,सोफा और बिस्तर पर बैठना शामिल है। यह कार्य वह अन्य पुरूष के सामने करे या सिर या शरीर एक ओर झुका हो या टेढ़ा हो,इसमें यह भी शामिल है कि स्त्री मर्द को देखकर शर्माए,मर्द उसके मूवमेंट को प्रभावित करे।अथवा औरत का सिर मर्द के कंधों पर झुका हो अथवा मर्द का हाथ सहयोग,निर्भरता एवं मातहत रूप में पकड़े हो।

5.लाइसेंस्ड विड्रॉल- स्त्री अपने को दर्शायी गयी परिस्थितियों से एकदम वापस कर ले,अन्यमनस्क हो जाए। अन्य पर निर्भर और अन्य से संरक्षित नजर आए। इसे हंसी के ठहाके या मुस्कान के जरिए व्यक्त करे। जिसमें चेहरा और मँह शामिल रहे। अथवा वह परिदृश्य से अपने को एकदम अलग कर ले।इसमें उसका फोन से बातें करना भी शामिल है।

6.बॉडी डिस-प्ले- स्त्री के शरीर पर मुश्किल से कोई वस्त्र हो, अथवा शरीर दिखाई दे ,इस तरह की प्रस्तुति को अमूमन स्त्री की कामुक इमेज के साथ जोड़कर पेश किया जाता है।

7.मूवमेंट- औरत अपने मूवमेंट या चाल से पहचानी जाती है।यदि वह किसी कम्बल या चादर से ढंकी है तो उसके मूवमेंट की सीमाएं नजर आती हैं।

8.लोकेशन- औरत को जब घरेलू वातारण में दिखाया जाता है, जैसे रसोईघर,शयनकक्ष,बाथरूम आदि में दिखाया जाता है। इसमें ही स्त्री का विसंदर्भीकृत रूप भी शामिल है।मसलन् ऐसी किसी चीज का संदर्भ जिसकी पहचान संभव न हो।ऐसा परिवेश जो औरत को किसी सोद्देश्य गतिविधि में सक्रिय न दिखाए।

9. ऑब्जेक्टिफिकेशन-स्त्री को विज्ञापन में ऐसे पेश किया जाए जिससे यह लगे कि उसकी विज्ञापन में प्रधान भूमिका है ।

प्रत्येक विज्ञापन हाँ या ना की केटेगरी के आधार संहिताबद्ध किया जाता है।इसमें स्त्री का स्टीरियोटाईप रूपायन या उससे भिन्न रूपायन हो सकता है। यह भी संभव है कि विज्ञापन में एक औरत हो,एकाधिक औरत हों,एक मर्द हो एकाधिक मर्द हों।उन्हें संहिताबद्ध करने लिए उपरोक्त सभी केटेगरी का इस्तेमाल किया जा सकता है।यदि विज्ञापन में सिर्फ औरतें ही हों तो उसमें रिलेटिव साइज और फंक्शन रेंकिंग की केटेगरी का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

2 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...