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गुरुवार, 29 सितंबर 2016

वे 27साल और कलकत्ते का हिन्दी छंद


आज से 27 साल पहले कलकत्ते में मेरी शिक्षक के रूप में पहली और आखिरी पक्की नौकरी लगी। कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में 22अप्रैल 1989 को प्रवक्ता के रूप में मैंने नौकरी आरंभ की।बाद में सन् 1993 में रीडर और 2001 में प्रोफेसर बना। जिस समय नौकरी आरंभ की थी तो मेरे पास 2शोध डिग्रियां थीं,उनके शोध –प्रबंध थे,वे अप्रकाशित थे।जेएनयू में पढ़ने और छात्र राजनीति में सक्रिय रहने के कारण सारे देश में कमोबेश प्रगतिशील खेमे से जुड़े लोग मुझे जानते थे।मैं शुरू से ही रिजर्व प्रकृति का रहा हूँ।कोई बोलता है तो बोलता हूं,हलो करता है तो हलो करता हूँ,अधिकतम समय घर पर रहना और पढ़ना-लिखना,यही मेरी दिनचर्या रही।इस चक्कर में कलकत्ते में 27साल तक रहने के बाद भी मैं न तो बहुत सारे लोगों को नहीं जानता और न मेरी मित्रता है।

मैं जब दिल्ली में जेएनयू में पढ़ता था तो 1979 से 1987 के बीच में मेरा अधिकतर समय जेएनयू कैम्पस में ही गुजरा,दिल्ली के लेखकों में बहुत कम आना जाना होता था,जब कभी जनवादी लेखक संघ के ऑफिस जाता तो वहां लेखकों से मुलाकात हो जाती थी,बातें हो जाती थीं।उससे ज्यादा लेखकों से मिलने का मौका मुझे नहीं मिला।कलकत्ता आया तो मेरे मन में दो लोगों से मिलने की इच्छा थी वे हैं सत्यजित राय और उत्पल दत्त।इन दोनों से मैं इनके घर जाकर मिला और बातें कीं।इनमें उत्पल दत्त से दो बार मिला।बाकी बंगला बुद्धिजीवियों से गणतांत्रिक लेखक-शिल्पी संघ के दो-तीन कार्यक्रमों में सामान्य शिष्टाचार के नाते मुलाकात जरूर हुई। चूंकि मैं माकपा का सक्रिय सदस्य था,इस नाते लोकसभा-विधानसभा चुनावों के समय 1989 से 2005 तक मैंने वाममोर्चे और माकपा की चुनावी सभाओं में जमकर हिस्सा लिया और उसी के बहाने पश्चिम बंगाल को करीब से गैर-कम्युनिस्ट की नजर से देखा।माकपा की चुनाव सभाओं में अधिकतर दलितों-मुसलमानों और हिन्दीभाषी बस्तियों में सभाएं करने जाता था।इसके कारण इन समुदायों के जीवन को बहुत करीब से देखने का मौका मिला। इसके अलावा जनवादी लेखक संघ और पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी की गतिविधियों में भी हिस्सा लेता रहा,क्योंकि इन दोनो में एक दौर में जिम्मेदार पदों पर काम कर रहा था। यही ले-देकर अपना 27 साल का राजनीतिक-सामाजिक लेखा-जोखा है।मेरी इस दौरान किसी भी नेता ,मंत्री आदि से कोई मित्रता नहीं हो पायी।जबकि मैं बहुत सारे मंत्रियों-नेताओं आदि को जानता था।

कलकत्ता विश्वविद्यालय में मैंने जब पढ़ाना आरंभ किया तो उस समय मेरे दो लक्ष्य थे,पहला था मीडिया को एकदम नए नजरिए से देखा और लिखा जाए जिससे हिन्दी में मासमीडिया के पठन-पाठन को बदला जाए,उस समय यह लग रहा था कि यह बड़ा क्षेत्र है जो आने वाले दौर में अकादमिक और सामाजिक तौर पर बहुत गर्म रहेगा।इसी चीज को मद्देनजर रखते हुए मीडिया पर नियोजित ढ़ंग से काम आरंभ किया।खासकर मीडिया के राजनीतिक अर्थशास्त्र,संरचना और विचारधारा के सवालों को 1960 के बाद सारी दुनिया में पैदा हुए वामपंथी विचारकों के विचारों की रोशनी में विश्लेषित करने की कोशिश की,संभवतः पहलीबार हिन्दी को मीडिया में वाम विचारकों का परिचय मेरी किताबों के माध्यम से हुआ।किताबें कब और कैसे लिखी गयीं इन पर बाद में कभी विस्तार से लिखूँगा।

यह एक विलक्षण संयोग है कि मैंने मीडिया पर जितना भी लिखा निरूद्देश्य लिखा,किसी पाठ्यक्रम के लिए नहीं लिखा,मैंने जिन विषयों पर लिखा वे विषय पाठ्यक्रम में कहीं पर भी पढ़ाए नहीं जाते थे, लेकिन बाद में किताब बाजार में आने के बाद अनेक विश्वविद्यालयों के मीडिया पाठ्यक्रम बदले गए और आज स्थिति तुलनात्मक तौर पर बहुत बेहतर है।संतोष की बात है मेरी सभी किताबें बिना किसी प्रचार के बिकी हैं,एक किताब को छोड़कर कोई किताब सरकारी खरीद में नहीं ली गयी,सारी किताबें छात्रों-शिक्षकों और पाठकों ने खरीदीं और मुझे संतोष दिया।

मैंने रॉयल्टी के लिए लेखन आरंभ नहीं किया।बल्कि यह कहना सही होगा कि किताब लिखने में मेरे पैसे ज्यादा खर्च हुए,संतोष यह था कोई किताब मैंने अपने पैसे नहीं छपवाई,प्रकाशक को जैसे उचित लगा उसने किताबें बेचीं,मैंने कभी हिसाब नहीं मांगा,उसने मन मर्जी से जो दे दिया वह मैंने ले लिया।क्योंकि मुझे बाजार की हकीकत का अंदाजा है। बाजार का सत्य यह है कि किताब की रायल्टी से मेरा एक महिने का खर्चा नहीं उठ सकता।मैंने फिर भी किताबें लिखीं ,क्योंकि यह मेरी सामाजिक जिम्मेदारी का अंग है।लेखन को मैं लाइफ लाइन मानता हूँ। जो लिखता नहीं है वह मर जाता है।सन् 1989 में कोई किताब नहीं थी,आज तकरीबन 50 किताबें हैं।यही ले-देकर मेरा सबसे बड़ा सुख है।यही मेरा संतति-सुख भी है।यह पिछले 27साल की सामान्य गतिविधि का लेखा-जोखा है।

मेरा दूसरा लक्ष्य था विभाग के सहकर्मियों के साथ न्यूनतम मतभेद रखकर काम किया जाय।मैं जब कोलकाता आया था तो मेरा बाहरी व्यक्ति के रूप में,पार्टी कैडर के रूप में जमकर प्रचार किया गया, बहुत ही विपरीत माहौल था।आज भी है। संभवतःबंगाल में हिन्दी में मैं पहला पार्टी मेम्बर था जिसकी नियुक्ति हुई थी।उस समय माकपा के सारे देश के विश्वविद्यालयों में चंद शिक्षक थे जो पार्टी मेम्बर थे।मेरे नौकरी जॉयन के करने के साथ ही स्थानीय अखबारों में खूब उलटा-पुलटा छपवाया गया,इसकी कहानियां बाद में फिर कभी लिखूँगा।लेकिन यह सच है कि मैंने 27 साल एकदम विपरीत माहौल में काम किया ।मैंने कभी सहकर्मियों के साथ संवाद बंद नहीं किया । साथ में काम करना है तो इतना स्पेस छोड़ना होगा कि सहकर्मी अपने मन की कर सकें।कुल मिलाकर विभाग में दो बार विभाग की अध्यक्षता पूरे समय रही ,इसके अलावा कार्यवाहक अध्यक्ष का काम मुझे लेक्चरर के रूप में ही मिल गया जो कि वि.वि. में थोड़ा विरल है।मैं अपने 27 साल के कार्यकाल में कभी किसी भी काम से वीसी से नहीं मिला।मेरी प्रकृति है मैं अधिकारियों से दूर रहता हूँ। मुझे अपना काम पसंद है अधिकारियों से मिलना-जुलना,उनकी गुडबुक में रहना,चमचागिरी करना यह मेरी प्रकृति में नहीं है। मैंने इसकी कीमत भी दी,लेकिन कीमत बहुत कम है।मेरा मानना है एक शिक्षक को अपना स्वाभिमान और निजता की हर हाल में रक्षा करनी चाहिए।

मैंने अपनी 27 साल की नौकरी में एक नियमित शिक्षक के रूप में काम किया,इसका मुझे फल मिला,छात्रों और शिक्षकों का भरपूर सहयोग मिला।मैंने जब नौकरी आरंभ की उस समय विष्णुकांत शास्त्री,पीएन सिंह,शंभुनाथ पढा रहे थे,चन्द्रा पाडेय ने मेरे साथ ही नौकरी आरंभ की इस विभाग में।बाद में अमरनाथजी आए, उसके बाद सोमा बंध्योपाध्याय,राजश्री शुक्ला,राम आह्लाद चौधरी ने विभाग में सहकर्मी के रूप में काम करना शुरू किया।इस समय अमरनाथ ,सोमा बंध्योपाध्याय,राजश्री शुक्ला,राम आह्लाद चौधरी साथ काम कर रहे हैं।इन सभी को बहुत शुक्रिया।यही 27 साल की कहानी है।





शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

मथुरा का आदिविद्रोही मार्ग

       अजीब बात है मथुरा जैसे धार्मिक शहर में हम मध्यवर्ग और निम्न-मध्यवर्ग से आने वाले युवाओं के पास उस समय मंदिर,पंडे,पुजारी,जनसंघ,कांग्रेस,बगीची,अखाड़े,यमुना नदी का किनारा और घाट के किस्से हुआ करते थे। अचानक 1974 का बिहार आंदोलन शुरू हुआ,मैं निजी तौर पर राजनीति नहीं जानता था लेकिन बाबू जयप्रकाश नारायण के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित था, समाजवाद के विचार से उस समय तक मेरा कोई परिचय नहीं था।

मुझे सबसे पहले समाजवादी सोवियत संघ का साहित्य पढ़ने को अपने संस्कृत कॉलेज माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय में पढ़ने को मिला और यह साहित्य पढ़ने को दिया मथुरानाथ चतुर्वेदी ने,जो उस समय मथुरा जनसंघ के अध्यक्ष थे, बाद में नगरपालिका अध्यक्ष भी रहे,आरएसएस के मथुरा में सबसे बड़े समय नेता हुआ करते थे।मेरे कॉलेज में सोवियत साहित्य और पत्रिकाएं मुफ्त में आती थीं,वे ही उनको संभालकर रखते थे,उनसे ही 1972-73 में सोवियत साहित्य पहलीबार पढ़ने को मिला,वे हमारे कॉलेज की लाइब्रेरी के भी इंचार्ज थे,अतः पुस्तकालय से आसानी से किताबें भी मिल जाया करती थी।वहीं से पहलीबार सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला का लिखा महाभारत पढ़ा,जो बच्चों के लिए लिखा गया था। सोवियत भूमि,सोवियत नारी और संभवतः सोवियत दर्पण पत्रिका नियमित मथुरानाथजी ही देते थे।इस तरह अनजाने ही सही लेकिन समाजवादी साहित्य पहलीबार हमारे शिक्षक के हाथों मेरे पास पहुँचा।यह बेहद दिलचस्प बात है कि मथुरानाथजी ने कभी मुझे पांचजन्य पढ़ने को नहीं दिया,जबकि वह अखबार वे नियमित पढ़ते थे।यहीं से मुझे नियमित दैनिक अखबार पढ़ने की आदत पड़ी।सबसे दिलचस्प बात यह कि मेरे गुरूजी और ज्योतिष के शिक्षक संकटाप्रसाद उपाध्याय की राजनीतिक विषयों में गहरी दिलचस्पी थी, उनके बनारस के घर के आसपास के इलाके में उन दिनों भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गहरा असर था,अतः उनके विचारों का झुकाव वाम की ओर था। मथुरानाथजी तो जनसंघ के नेता ही थे,लेकिन इन दोनों के राजनीतिक विचार नहीं मिलते थे,इन दोनों शिक्षकों से समय-समय पर राजनीतिक विषयों पर जमकर बातें होती थीं,इसके कारण मेरी राजनीतिक विषयों में दिलचस्पी पैदा हो गयी।



एक दिन अचानक वियतनाम के आजाद होने की खुशी में कोई एक कार्यक्रम शिवदत्त चतुर्वेदी ने भाकपा के कार्यालय पर आपातकाल में रखा और मुझे उसने पहल करके अपना मित्र बनाया और उस कार्यक्रम में बुलाया उसमें मेरी अनेक कॉमरेडों से पहलीबार मुलाकात हुई।यह मेरे जीवन का पहला सेमीनार,गोष्ठी भी था। इसमें का.सव्यसाची भी थे।वे उस समय माकपा के जिलामंत्री थे। इसी कार्यक्रम में चौधरी वीरेन्द्र सिंह से मुलाकात हुई जो एसएफआई के सचिव थे।आपातकाल में इतने कॉमरेडों का मिलना सुखद आश्चर्य था ,इस मुलाकात ने मेरी राजनीतिक शिक्षा की विधिवत शुरूआत की।सव्यसाची ने उस कार्यक्रम में बहुत अच्छा भाषण दिया,मैं उनसे बहुत प्रभावित हुआ,बाद में उनसे मिला, तो बोले कुछ किताबें जरूर पढो।मैंने पूछा क्या पढूँ,बोले हावर्ड फास्ट का ´आदिविद्रोही´ उपन्यास पढ़ो।संभवतःयह मेरे जीवन की पहली क्रांतिकारी किताब है जिसे मुझे सव्यसाची ने पढ़ने को दिया उसके बाद,हावर्ड फास्ट का ही ´समरगाथा´ उपन्यास दिया,इसके बाद ´सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास´ दिया,बाद में रोदेरिजो रोखास के लिखे चिली के फासिस्टों के अत्याचार की कहानी की किताब ´चिली के सरफरोश´दी। मैंने करीब से देखा कि सव्यसाची ने तकरीबन सभी युवाओं को ´आदिविद्रोही´ उपन्यास पढ़ने को दिया। हम जितने युवालोग सव्यसाची के साथ काम करते थे सभी ने ´आदिविद्रोही´ पढ़ा था, इसके अलावा गोर्की का ´माँ ´ उपन्यास भी पढ़ा था।संभवतः ´आदिविद्रोही´ ने हम सबको वैकल्पिक संस्कार दिए, प्रतिवाद की भाषा दी,जनता के साथ लगाव रखने और जनता से प्रेम करने का संस्कार दिया।

मंगलवार, 21 जून 2016

माकपावालो बंगाल लाइन भ्रष्ट लाइन

       माकपा का संकट कम होने का नाम नहीं ले रहा।समूची पोलिट ब्यूरो और केन्द्रीय कमेटी भ्रष्ट बंगाल माकपा यूनिट को बचाने में लगी है।जिस बंगाल लाइन को लेकर हंगामा मचा है उसके लिए मेनीपुलेशन और इस्तेमाल का आधार तो विगत सीसी और पीबी ने ही तैयार किया था।संध्याभाषा में बंगाल में मोर्चा बनाने का जो आह्वान किया गया उसके ही गर्भ से बंगाल लाइन निकली है।मीडिया की मानें तो इसके निर्माता हैं बुद्धदेव भट्टाचार्य,सूर्यकांत मिश्रा,गौतमदेव,मोहम्मद सलीम।इन चार नेताओं ने गंभीरता के साथ बंगाल लाइन को लागू किया,इसके अलावा इसे लागू करने में पश्चिम बंगाल के सभी पोलिट ब्यूरो और केन्द्रीय समिति सदस्य अग्रणी भूमिका निभाते रहे हैं। कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास में यह विरल घटना है कि पार्टी ने किसी दल के साथ समझौता किया या मोर्चा बनाया या सीटों पर समझौता किया लेकिन उसके बारे में पोलिट ब्यूरो,केन्द्रीय कमेटी और राज्य कमेटी किसी ने भी आधिकारिक तौर पर कोई लिखित बयान जारी नहीं किया,हमने इस संदर्भ में फेसबुक पर लिखा भी था। लिखिततौर पर बयान जारी न करके दलीय समझौता करके चुनाव लड़ना स्वयं में अनैतिक ,नीतिहीन और भ्रष्ट आचरण है।

सवाल यह है बंगाल लाइन आई कहां से और क्यों आई ॽ बंगाल लाइन का स्रोत है पार्टी का भ्रष्टतंत्र।मैंने करीब से इस भ्रष्टतंत्र को देखा है ।माकपा में भ्रष्ट दलतंत्र का जन्म ज्योति बाबू के शासनकाल में ही हुआ।इसकी उस जमाने में विनयकृष्ण चौधुरी और नृपेन चक्रवर्ती जैसे धाकड़ नेताओं ने जमकर आलोचना की,अफसोस की बात है कि उनकी आलोचना की ओर किसी ने द्यान नहीं दिया और पार्टी ने सामूहिकतौर पर अनुशासनभंग करने के नाम पर इन दोनों नेताओं को आम जनता में अपमानित किया और अनुशासनात्मक कार्रवाई की गयी।

34साल तक शासन के बाद माकपा में यह भावना और आदत गहरे जड़ जमा चुकी है कि वे तो सरकार के लिए बने हैं और उनको हर हालत में सरकार में ही होना चाहिए। यहां तक कि पार्टी मेम्बरों में भी यही भावना बनी कि वे सरकार के लिए बने हैं।यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से माकपा मेम्बरों का चरित्र गठन हुआ।संयोग से ममता ने 2011 में वाम मोर्चे को हराकर विधानसभा कब्जे में कर ली,यह स्थिति माकपा के सदस्य झेलने को तैयार नहीं थे,देखते ही देखते रातों-रात बगैर किसी विवाद के हजारों माकपा सदस्यों और हमदर्दों ने ममता का दामन धाम लिया,ममता का दामन थामने का यह सिलसिला अभी भी जारी है।इसका प्रधान कारण है माकपा का विचारधाराहीन पार्टी में रूपान्तरण,34साल के शासन के दौरान माकपा ने सचेत रूप से कम्युनिस्ट विचारधारा का त्याग किया और सत्ता की विचारधारा को अपने सदस्यों में प्रचारित किया,इसके कारण माकपा एक कम्युनिस्ट दल की बजाय सत्ताधारी दल के रूप में परिवर्तित हो गयी,यह स्थिति लगातार बद-बदतर अवस्था की ओर ले गयी।माकपा यह भूल गयी कि वह कम्युनिस्ट दल है,संघर्ष के लिए बनी पार्टी है,उसने सचेत रूप से सत्ता के संस्थान के रूप में यहां पर अपना विकास किया और यही वह बृहत्तर प्रक्रिया है जिसने माकपा को नीतिहीन दल के रूप में परिणत करके रख दिया।नंदीग्राम आंदोलन के समय और उसके पहले भी मैंने निजी तौर पर इस पहलू पर बहुत लिखा था जिसके कारण मेरी तीखी आलोचना हुई और माकपाईयों ने मेरा बड़े पैमाने पर अपमान किया,सामाजिक बहिष्कार किया और सारी प्रशासनिक मशीनरी का दुरूपयोग मेरे खिलाफ किया।



मैं निजी तौर पर मार्क्सवाद को पसंद करता हूं जिसके कारण मुझे वाम अच्छा लगता है लेकिन इसका कतई मतलब नहीं है कि मैं माकपा के बारे में अपनी दो-टूक राय व्यक्त न करूँ,मैंने जबभी उचित समझा जमकर माकपा की खुली आलोचना की और उसकी कीमत भी दी,दुखद बात यह है कि माकपा जैसे सुंदर दल को लीडरशिप ने सचेत रूप से नष्ट किया है।आज स्थिति यह है कि बंगाल में माकपा की कोई साख नहीं है।ममता के महान भ्रष्टाचार,हिंसाचार आदि के बावजूद आम जनता माकपा पर विश्वास नहीं करती।कायदे से बंगाल लाइन के नाम पर जो घोटाला हुआ है उसके लिए पश्चिम बंगाल की पूरी पार्टी को भंग किया जाना चाहिए और निचले स्तर से लेकर राज्य स्तर तक नए सिरे से पार्टी का निर्माण किया जाना चाहिए।

रविवार, 22 मई 2016

चुनावी हिंसा का मतलब


        पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव खत्म हुए हैं लेकिन दो राज्य ऐसे हैं जहां चुनाव के बाद हिंसा अभी जारी  है।ये हैं पश्चिम बंगाल और केरल। संयोग की बात है दोनों ही राज्यों में वाम निशाने पर है या निशाना लगा रहा है।सवाल यह है वाम जहां रहता है वहां पर चुनावी हिंसा क्यों होती रही है ॽ बिहार में कुछ महिना पहले चुनाव हुए उसके पहले दिल्ली में चुनाव हुए,हाल ही में तमिलनाडु,असम और पांडुचेरी में भी चुनाव हुए लेकिन कहीं पर चुनावी हिंसा नहीं हुई।संयोग की बात है इन सब राज्यों में वाम नहीं के बराबर है।
    पश्चिम बंगाल में विगत पाँच सालों में वामदलों खासकर माकपा पर असंख्य हमले हुए हैं।इसबार भी  चुनाव के पहले और बाद में असंख्य हमले हुए हैं।वाम पर हमले ऐसे समय में हो रहे हैं जब टीएमसी को अपार बहुमत मिला है।टीएमसी वाले जीत के बाद भी उदार बनने को तैयार नहीं हैं।लगातार हिंसक हमले कर रहे हैं।
    सवाल उठता है इस हिंसा की जड़ कहां है ॽ हिंसा वे लोग करते हैं जिनका जनता पर विश्वास नहीं होता।जो जनता के दिलो-दिमाग पर हिंसा के जरिए कब्जा या वर्चस्व रखना चाहते हैं।जिस दल का जनता में असर होगा वह हिंसा का सहारा नहीं लेगा लेकिन जो दल हिंसा का सहारा लेता है वह सतह पर कहता है कि आत्मरक्षा के लिए हिंसा कर रहा है या बदले की भावना से कर रहा है।
    असल में, हिंसा का असल मकसद है वर्चस्व स्थापित करना।वर्चस्व स्थापित करने वाली मनोदशा राजनीतिक कमजोरी से पैदा होती है। हिंसा जिस इलाके में होती है वहां पर वह तो असर छोड़ती ही है,इसके अलावा उन इलाकों में भी असर छोड़ती है जो दूर पड़ते हैं।लेकिन हिंसा हमेशा एक वृत्त में केन्द्रित रहती है।मसलन्,केरल के जिस जिले में माकपा-आरएसएस के बीच हिंसा हो रही है वह अधिक से अधिक केरल तक या सबंधित जिले तक सीमित रहेगी,उसके बाहर नहीं जाएगी।इस अर्थ में हिंसा स्थानीय और प्रांतीय होती है।

     मौजूदा हिंसा की जड़ें राजनीतिक असहिष्णुता में छिपी हैं।फिलहाल सभी राजनीतिकदलों में असहिष्णुता चरम पर है।कोई असहिष्णुता छोड़ने को तैयार नहीं है।मौजूदा हिंसा को पहल करके रोकने के लिए कोई दल तैयार नहीं है,उलटे गरम-गरम बयान आ रहे हैं या फिर उपेक्षा करके चुपचाप हिंसा देख रहे हैं।यह मनोदशा अ-लोकतांत्रिक और हिंसक है।हिंसा का जबाव हिंसा नहीं है,हिंसा का जबाव पुलिस भी नहीं है।हिंसा जबाव है शांति और वह संवाद-सहयोग के बिना स्थापित नहीं हो सकती।लोकतंत्र के ये दोनों महत्वपूर्ण तत्व हैं।जो दल लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए कल तक वोट मांग रहा था वही दल आज मुँह फुलाए,गुस्से में ऑफिस में बैठा है या हिंसा में मशगूल है।हिंसा को हिंसा या घृणा या निंदा से खत्म नहीं कर सकते। हिंसा को खत्म करने के लिए शांति,सहयोग और संवाद की जरूरत है।

शुक्रवार, 20 मई 2016

वाम- कांग्रेस गठजोड़ पराजय के सबक-


        पश्चिम बंगाल में वाम की पराजय काफी महत्व रखती है।जिन लोगों की वाम के प्रति सहानुभूति है वे वाम को पश्चिम बंगाल के सामाजिक यथार्थ के संदर्भ में बहुत कम जानते हैं,जो वाम इस राज्य में है वह विचारधारा के नशे और ३४साल सत्ता में रहने के कारण यथार्थ से एकदम कटा हुआ है।लोकल से लेकर नेशनल स्तर के वामनेता,खासकर माकपानेता जमीनी यथार्थ को देखने से भागते रहे हैं।सच्चाई यह है कि वाम के पराभव का सिलसिला थमा नहीं है ऊपर से राजनीतिक अवसरवाद ने वाम को घेर लिया है।आयरनी यह है कि माकपा पोलिट ब्यूरो सदस्य पी.विजयन( केरल) से प्रणव राय से हाल ही में केरल कवरेज के दौरान पूछा कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस से वाम ने जो गठबंधन किया है उस पर क्या कहना है ? विजयन ने कहा मैं नहीं जानता।आश्चर्य है वाम-कांग्रेस का यहां गठबंधन था सारे मीडिया में खबर है पूरी पार्टी मिलकर चुनाव लड़ रही है लेकिन पोलिट ब्यूरो सदस्य कह रहा है,मैं नहीं जानता! चुनावी सभाओं में पोलिट ब्यूरो सदस्य गठबंधन कह रहे हैं,लेकिन एक दूसरे पोलिट ब्यूरो सदस्य विमान बसु ने कहा गठबंधन कहां है ? यह राजनीतिक दोगलापन यदि माकपा नेताओं के मन में है तो जनता कैसे उन पर विश्वास करती !माकपा ने दो टूक ढंग से कभी खुलकर नहीं बताया कि वाम- कांग्रेस गठबंधन है या चुनावी तालमेल है ?इस तालमेल को किन तर्कों को लेकर किया गया उसकी कोई लिखित रूप में चर्चा नजर नहीं आई! कोई विश्वास करेगा कि केरल के माकपा नेताओं को मालूम नहीं है कि बंगाल में क्या हो रहा है!
माकपा की जिन मुद्दों को लेकर आलोचना हमने की उन पर कभी ध्यान नहीं दिया गया।इससे भी बड़ी बात यह कि जब संगठन कमजोर है और हमले हो रहे हैं ,माकपानेता अपने लोगों को सुरक्षा देने में असमर्थ हैं,पोलिंग एजेंट तक देने में असमर्थ हैं,तब फिर चुनाव लड़ने क्यों गए ? क्या संगठन के बिना चुनाव लड़ना चाहिए? बंगाल में कई बार चुनाव होते हैं और माकपा चुनाव में लड़ने लायक अवस्था में नहीं है।ऐसी स्थिति में माकपा को पश्चिम बंगाल में कुछ वर्षों के लिए चुनावी राजनीति से विरत रहकर संगठन निर्माण के काम पर ध्यान देना चाहिए,इस समय माकपा अधेड़ और बूढ़ों का दल मात्र होकर रह गया है।युवाओं का संगठन में अभाव है ,और सही नीतियों का भी अभाव है।
माकपा की सबसे बड़ी चुनौती है कि वह अपनी सांगठनिक संरचनाओं ,नियमों और नीतियों को नागरिक समाज की परिकल्पना और नीतियों की संगति में नए सिरे से बनाए,यदि वह ऐसा करता है तो भविष्य में संभावनाएं हैं।वरना लोकतंत्र में हाशिए पर रहने के लिए तैयार रहे।



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ममता की जीत को यहां से देखो-


     पश्चिम बंगाल में माकपा का जनाधार जिस तरह खत्म हो रहा है वह बताता है कि माकपा ने 34साल की वामशासन की गलतियों से कोई सबक हासिल नहीं किया ।मसलन् इसबार के चुनाव में माकपा को मात्र 19.7फीसदी वोट मिले हैं जबकि टीएमसी को 44.9फीसदी वोट मिले हैं।यानी टीएमसी अकेले अपने दम पर समाज के बृहत्तर तबकों के बीचमें अपनी स्वीकृति अर्जित करने में सफल रही है।खासकर अल्पसंख्यकों,एससी,एसटी और ग्रामीणों में उसे व्यापक जन समर्थन तो मिला है, इसके अलावा शहरीजनों में भी वह जनाधार का विस्तार करने में सफल रही है।इसबार के चुनाव से यह भी निष्कर्ष निकलता है कि टीवी चैनलों का जनता पर कोई असर नहीं होता।आज भी निजी जनसंपर्क और परंपरागत संगठन के जरिए किया गया प्रचार कार्य प्रभावी होता है।जो लोग सोचते हैं कि टीवी और सोशलमीडिया से चुनाव जीता जाता है,वे गलतफहमी में हैं।
पश्चिम बंगाल में अधिकांश टीवी चैनलों ने अहर्निश ममता के खिलाफ प्रचार किया,लेकिन आम जनता पर उसका कोई असर नहीं हुआ।इसका प्रधान कारण है ममता का कैडर आधारित संगठन।दूसरी बात यह कि ममता सरकार ने विकासमूलक योजनाओं को नीचे तक लागू करके,स्वयं निरीक्षण और निर्देशन का काम किया,हर जिले में बार-बार दौरा किया,इससे सारी योजनाएं जमीनी स्तर पर लागू करने में वह सफल रही। तीसरा प्रधान कारण है वाम और भाजपा का साखविहीन प्रचार।इन तीन कारणों ने मिलकर ममता की जीत को संभव बनाया।उल्लेखनीय है ममता सरकार के खिलाफ अपराधीकरण, घूसखोरी, पुलिस मशीनरी के दुरूपयोग आदि के सभी आरोप सच हैं,लेकिन आम जनता ने अपनेहित के सामान्य विकासमूलक कार्यों को केन्द्र में रखकर ममता को वोट दिया।वाम की इस मामले में 34 साल की नाकामियां आज भी सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़ी हैं।एक छोटे से उदाहरण से समझ सकते हैं।मैं जिस मुहल्ला-गली में रहता हूँ,उसके आसपास कोई पानी की प्याऊ वाम जमाने में नहीं थी,लेकिन ममता के आने के बाद ठंड़े पानी की चार प्याऊ विभिन्न नुक्कड़ों पर इस बीच में बनायी गयीं।इससे नागरिकों को मदद मिली।सफाई के मामले में भी वाम को ममता ने मात दी है,कोलकाता पहले की तुलना में ज्यादा साफ रहता है,सड़कों और गलियों में बहुत रोशनी रहती है।यही रोशनी वाम शासन में कम नजर आती थी।यह स्थिति सारे राज्य की है।इसी तरह कन्याश्री योजना के तहत हर लड़की के बैंक खाते में 25हजार रूपये सरकार ने जमा कराए हैं,गरीबों को 50हजार रूपये तक की घर बनाने के लिए धनराशि गांवों में घर-घर जाकर बांटी है।हर लड़की को साइकिल मिली है,इन सब कार्यों के कारण राज्य का नक्शा बदला है।शिक्षा के क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े पैमाने पर निवेश हुआ है।जो कि वाम शासन में नहीं हुआ था। इन सभी पहलुओं पर मैं फेसबुक पर पहले भी लिख चुका हूँ।कहने का तात्पर्य है कि ममता को वोट सकारात्मक कारणों की वजह से मिला है और इसके कारण ममता की गड़बड़ियों को जनता ने नजरअंदाज किया है।

गुरुवार, 5 मई 2016

फेसबुक वॉल को तो कम से कम खुला रहने दो कॉमरेड !

यार इतनी कंजूसी क्यों करते हो,फेसबुक पर क्लिक करने में कंजूसी करोगे तो फिर तुम कभी अभिव्यक्ति के मामले में उदार नहीं बन सकते।ठीक है हम तुम्हारे दल में नहीं हैं,लेकिन पहले तो थे,यह भी सही है कि हम तुम पर भी लिखते हैं,तुम्हारे दल पर भी लिखते हैं,तुमनेे बेइंतहा तकलीफें दी हैं,हमारे खिलाफ तुम्हारे दल के लोगों ने जहरीला प्रचार किया,इसके बावजूद हमने तुमसे हलो बंद नहीं की,तुमसे प्यार करना बंद नहीं किया।तुम इस कदर कमीनापन क्यों करते हो जिससे तुम्हारे दल को क्षति पहुँचे,कमीनेपन का मतलब कम्युनिस्ट होना नहीं है।कृतघ्न व्यक्ति कभी कम्युनिस्ट आंदोलन का भला नहीं कर सकता।तुम यह तो बताओ तुमने कृतघ्नता कहां से सीखी,कम से कम हमने नहीं सिखाया तुमको।कुछ क्षण रूककर सोचो कि कम्युनिस्टों को कैसे उदार बनाएं,किस तरह उनमें कृतज्ञताबोध पैदा करें।उसकी पहली सीढ़ी है कि तुम फेसबुक पर रहते हो तो प्रगतिशीलों के फेसबुक पोस्ट को लाइक करना सीखो, हमेशा दलीय गिरोह में कैद मत रखो अपने को, यह दौर दलीय गिरोहबंदी का नहीं है।यही सब नरक फैलाना है तो फेसबुक एकाउंट बंद करके शांति से बैठो।

फेसबुक पर सक्रिय कम्युनिस्टों से अनुरोध है कि अपनी वॉल को कम्युनिस्ट वॉल न बनाएं,वरना कोई नहीं पढ़ेगा।खुलकर लिखो,कम्युनिस्ट और गैर-कम्युनिस्ट विषयों पर लिखो।सिर्फ पार्टी का प्रचार करने के लिए यदि फेसबुक पर आते हो तो बहुत ही सीमित लक्ष्य लेकर जी रहे हो,उसके लिए फेसबुक पर आने की जरूरत नहीं है,हर समय तुम पार्टी के मेम्बर नहीं हो,यह कैसा मनुष्य बनाया है जो पार्टी के बिना न हंसता है,न बोलता है।

बुधवार, 30 मार्च 2016

वे वाम का साथ छोड़कर क्यों चले गए ॽ



     पश्चिम बंगाल के चुनाव में टीएमसी के खिलाफ दो साल पहले किए गए नारद वीडियो स्टिंग ऑपरेशन के जरिए किसी भयानक राजनीतिक उथल-पुथल की कुछ लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं।हमारा अनुमान है ऐसा कुछ भी नहीं होगा।पश्चिम बंगाल के लोग,खासकर मध्यवर्ग के अंदर इस वीडियो के आने के बाद कोई आक्रोश नजर नहीं आ रहा,यहां के लोग करप्शन से बेखबर हैं,करप्शन देखते हैं,झेलते हैं,सामंजस्य बिठाते हैं और जी रहे हैं,करप्शन को लेकर सारे देश में यही दशा है।जनचेतना की  भयावह स्थिति है कि सारधा चिटफंड कांड में टीएमसी के अधिकांश बड़े नेताओं के लिप्त होने के बावजूद वाममोर्चा कोई विशाल जनांदोलन खड़ा करने में असमर्थ रहा,हां,उसने निरंतर प्रतिवाद जरूर किया,लेकिन जिस स्केल पर लोग चिटफंड घोटाले से लोग प्रभावित हुए हैं उसकी तुलना में दशांश को भी जुलूसों में खींच नहीं पाया,यहां तक कि विधानसभा उपचुनावों में टीएमसी को हराने सफल नहीं हुआ।नगरपालिका चुनावों  में हरा नहीं पाया।ऐसी स्थिति में नारद वीडियो स्टिंग कोई जादू कर देगा हमें नहीं लगता।
     सवाल यह है वाम के साथ जो सामाजिक शक्तियां थीं,जो सामाजिक संतुलन था,वह आज क्यों नहीं है ॽ चुनावों की सारी लड़ाई सामाजिक संतुलन को पक्ष में करने की लड़ाई है।ममता ऐन-केन-प्रकारेण सामाजिक संतुलन को अपनी ओर झुकाने में सफल रही है और यही उनके नेतृत्व की सफलता है।

सवाल यह है जो सामाजिक शक्तियां वाम के साथ थीं वे किन कारणों से वाम को छोड़कर चली गयीं ॽ मसलन्,शरणार्थी बंगालियों के पुनर्वास में वाम ने सक्रिय भूमिका निभायी और उनकी आर्थिक-सामाजिक शक्ति के विकास में हर संभव मदद की,एक जमाना था ये लोग बेहद गरीब थे,लेकिन वाम जमाने में इनके आर्थिक हालात बदले,इनमें मध्यवर्ग पैदा हुआ,संपत्ति पैदा हुई,लेकिन वामचेतना का विकास न हो सका।वे सिर्फ वोटबैंक बने रहे।लेकिन ज्योंही वाम के खिलाफ सिंगूर-नंदीग्राम आंदोलन के कारण हवा बहने लगी,ये लोग वाम को छोड़कर चले गए।यही हाल शिक्षकों का है। शिक्षकों एक बड़ा वर्ग वाम के साथ था।लेकिन आज वे लोग भी साथ नहीं हैं। जबकि शिक्षकों पर कोई जुल्म नहीं हुआ,इसके बावजूद वे वाम को छोड़कर क्यों चले गए ॽ सरकारी कर्मचारियों के संगठन में भी यही हाल है।यह वह वर्ग है जो सचेतन कहलाता है,आर्थिक रूप से सुरक्षित है,इसको कोई खतरा न तो वाम के जमाने में था और न ममता के जमाने में था,फिर यह वर्ग वाम को क्यों छोड़कर चला गया ॽवाम ने कभी सार्वजनिकतौर इन वर्गों के वाम-विमुख हो जाने की समीक्षा नहीं की,क्यों नहीं की ॽक्या बंगलादेशी शरणार्थियों में आई समृद्धि का वाम के नजरिए से कोई अंतर्विरोध है ॽक्या शिक्षकवर्ग के वाम-विमुख होने का वाम के नव्य-आर्थिक उदारीकरण के विरोध और केन्द्र के समान छठे वेतन आयोग के अनुसार नए वेतनमान में केन्द्र के समान महंगाई भत्ता न देने के वाम सरकार के फैसले के साथ कोई संबंध है ॽ जी हां,गहरा संबंध है।इस तरह के फैसलों ने वाम के जनाधार को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है और वाम ने अपनी आज तक आत्मालोचना नहीं की है। समस्या को जानकर भी उसके बारे में चुप रहना वाम की विशेषता है,जबकि आम जनता उत्तर चाहती है।समस्या के समाधान सुझाए बगैर वाम को आम जनता दोबारा आसानी से सत्ता पर पहुँचने नहीं देगी।वाम अपना स्टैंड साफ करे कि उसने केन्द्र के बराबर राज्य कर्मचारियों को महंगाई भत्ता क्यों नहीं दिया ॽ भविष्य में देगा या नहीं ॽ आज राज्य में कॉलेज-वि वि लेक्चरर केन्द्र की तुलना में 25हजार रूपये कम पाता है, प्रोफेसर 60रूपये कम पाता है,यह सीधे वामशासन में लागू की गयी वेतननीति का भयानक परिणाम है।यह साधारण बात नहीं है जिसे दरकिनार किया जाए।माकपा के लोग देस में अन्यत्र जितना वेतन पाते हैं पश्चिम बंगाल में माकपा के और अन्य शिक्षक उनसे काफी कम वेतन पाते हैं।यह माकपा के द्वारा किया गया ऐसा अपराध है जिसके लिए उसे कभी माफ नहीं किया जा सकता।  

लोकतंत्र ,जुल्म और बंगाल


        पश्चिम बंगाल विधानसभा के 2016 के चुनाव कई मायनों में महत्वपूर्ण हैं,इस चुनाव का भारतीय राजनीति पर दूरगामी असर हो सकता है।इसबार के चुनाव में कई नई चीजें नजर आ रही हैं जो पहले कभी नहीं देखी गयीं।पहलीबार वाममोर्चा और कांग्रेस के बीच में चुनाव गठबंधन हुआ है,इस तरह का गठबंधन पहले कभी नजर नहीं आया।जमीनी स्तर पर इस मोर्चे ने मिल-जुलकर काम करने की कोशिश की है,इसे आम भाषा मे सिलीगुड़ी लाइन कहते हैं। सबसे पहले सिलीगुडी नगरपालिका चुनाव में कांग्रेस-वाम ने मिलकर चुनाव लड़ा था। उसके परिणाम बेहतर रहे।वाम को वहां विजय मिली।सिलीगुडी लाइन से प्रेरित होकर काफी पहले वाम-कांग्रेस गठबंधन का मन बना चुके थे।

यह पहलीबार हुआ कि राजनीतिक सिद्धांतों को इस मोर्चे के निर्माण में सिलीगुड़ी में आड़े नहीं आने दिया गया,बाद में यही चीज समूचे राज्य में नजर आ रही है।लोकतंत्र के लिए राजनीतिक सफलता जितनी जरूरी है उतना ही जरूरी है सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य ।लेकिन इसबार पश्चिम बंगाल में राजनीतिक सफलता हासिल करना इतना जरूरी हो गया है कि माकपा जैसा सिद्धांतनिष्ठ दल खुलकर इस गठजोड़ के प्रति सैद्धांतिक ढ़ांचा प्रस्तावित नहीं कर पाया,यह माकपा की सबसे बड़ी कमजोरी है।कायदे से संध्याभाषा में पश्चिम बंगाल पर बातें करने से माकपा के केन्द्रीय नेतृत्व को बचने की जरूरत थी और खुलकर यह बताने की जरूरत थी कि उनको कांग्रेस से मिलकर चुनाव लड़ना क्यों जरूरी है ॽ लेकिन माकपा ने ऐसा नहीं किया। इससे माकपा जैसे सिद्धांतनिष्ठ दल की कमजोरी ही सामने आई है,जबकि पश्चिम बंगाल में वह कांग्रेस से कमजोर दल आज भी नहीं है।

सवाल यह है कि क्या राजनीति में सैद्धांतिक पारदर्शिता जरूरी है ॽ यदि हां तो उसका आधार कहां है ॽइस बात को कहने का यह आशय नहीं है कि वाम को कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ना चाहिए।यह माकपा-कांग्रेस तय करें लेकिन कागज पर सैद्धातिकतौर पर परिभाषित तो करें कि वे क्यों और किन परिस्थितियों में मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं ॽ जनता की मांग है,जनता चाहती है,इसलिए वाम-कांग्रेस गठबंधन या सीट समझौता हुआ है,यह सब कहकर सिद्धांतहीनता का प्रदर्शन न करें।कांग्रेस एक सिद्धांतहीन दल है,लेकिन माकपा से हम यह उम्मीद नहीं कर सकते ! भविष्य में कम्युनिस्ट आंदोलन का जो लोग मूल्यांकन करेंगे उनके लिए यह मुश्किल रहेगी कि वे माकपा-कांग्रेस इस गठजोड़ के सैद्धांतिक राजनीतिक दस्तावेज कहीं पर भी नहीं देख पाएंगे। राजनैतिक व्यवहारवाद को इस गठजोड़ का मूलाधार बना दिया गया है।

कांग्रेस-वाम की पश्चिम बंगाल में राजनीतिक एकता का एक धागा जिस तरह सिलीगुड़ी लाइन से जुड़ा है उसी तरह उसका दूसरा धागा हाल के पूना-हैदराबाद-जेएनयू के छात्र आंदोलन से भी जुड़ा है। तीसरा धागा मोदी सरकार की अ-लोकतांत्रिक और अधिनायकवादी नीतियों के खिलाफ संसद में वाम-कांग्रेस की संयुक्त कार्रवाईयों से भी जुड़ा है। इन तीनों ही धागों से मिलकर वाम-कांग्रेस का पश्चिम बंगाल में जमीनी राजनीतिक समझौता हो पाया है।

पश्चिम बंगाल की जमीनी सच्चाई यह है कि ममता सरकार ने हर मोर्चे पर निकम्मेपन और अपराधीकरण का प्रदर्शन किया है।अपराधियों ने राजनीति को बंधक बना लिया है।खासकर ममता सरकार आने के बाद हर क्षेत्र में अपराधीकरण बढ़ा है,अपराधियों के हमले बढ़े हैं।पुलिस और प्रशासन का दुरूपयोग बढ़ा है।ममता सरकार खुलेआम अपराधियों को संरक्षण देती रही है,औरतों पर अत्याचार बढ़े हैं,बुद्धिजीवियों में सत्ताभक्ति बढ़ी है,गांवों से लेकर शहर तक खुलेआम गुण्डों का दबदबा बढ़ा है।शिक्षित बंगाली मध्यवर्ग ,खासकर लेखकों,बुद्धिजीवियों और शिक्षकों ने सरकार के खिलाफ भय के कारण बोलना बंद कर दिया है।त्रासद पक्ष यह है कि बुद्धिजीवी अपराधियों के संरक्षण में जीने को अभिशप्त हैं।अपराधी किस्म के लोग हर स्तर पर प्रशासन में काम करने वालों को निर्देश दे रहे हैं कि वे क्या करें और क्या न करें।बौद्धिकों का इस तरह का पतन पहले कभी नहीं देखा गया।इससे बंगाल की सांस्कृतिक-बौद्धिक इमेज क्षतिग्रस्त हुई है।समाज में दब्बूपन बढ़ा है।यह वही दब्बूपन है जिसको अपने अंतिम वर्षों में वामशासन में अपराधियों ने पैदा किया था।अपराधियों का सामाजिक क्षितिज पर निर्णायक बन जाना असल में वामयुगीन फिनोमिना है,जो अपराधी एक जमाने में वाम के साथ थे, वाम के चुनाव हारते ही ममता की छत्रछाया में चले गए,इन अपराधियों के कारण वाम को चुनावों में हारना पड़ा,यही अपराधी इसबार ममता के गले की हड्डी बन गए हैं।

सवाल यह है अपराधियों के खिलाफ वाम-कांग्रेस गठबंधन क्या कड़ा रूख अपनाएगा ॽ क्या वे यह वायदा करेंगे कि अपराधियों को संरक्षण नहीं देंगे ॽ पश्चिम बंगाल की जमीनी सच्चाई है अपराधी गिरोह विभिन्न इलाकों में सक्रिय हैं और वोट बैंक नियंत्रित करते हैं।वोट बैंक का नियंत्रण इस तरह देश में अन्यत्र नजर नहीं आता। इस अपराधीकरण पर तकरीबन सभी दल चुप हैं,जबकि सभी मसलों पर थोड़ी बहुत बातें हो रही हैं।यहां तक कि मीडिया कवरेज से भी अपराधी गिरोह गायब हैं। कम से कम मीडिया में विभिन्न इलाकों में सक्रिय अपराधी गिरोहों के काले कारनामों को प्रकाशित करने का काम होना चाहिए।लोकतंत्र को भय मुक्त करने का सबसे आसान पहला कदम है अपराधी गिरोहों की नामों के साथ पहचान को मीडिया में उदघाटित किया जाए।बिना अपराधियों को एक्सपोज किए बंगाल में लोकतंत्र नहीं बचा सकते।तकरीबन 86हजार वारंट कटे हुए लोग राज्य में खुलेआम घूम रहे थे,इनमें से रीयलसेंस में अभी भी 38हजार बाहर हैं,कहा जा रहा है बाकी को चुनाव आयोग के दबाव में पकड़कर बंद कर दिया गया ,लेकिन जमीनी हकीकत बता रही है कि अपराधी खुलेआम बाहर घूम रहे हैं,जिनके एक साल से ज्यादा समय से वारंट कटे हुए थे उनमें से अधिकांश बाहर हैं और सरेआम जनता को धमकाने का काम कर रहे हैं।ऐसी अवस्था में विधानसभा चुनाव में हिंसा का होना,गांवों,मुहल्लों में आतंक का होना स्वाभाविक है। अनेक इलाकों में टीएमसी के नेतागण गांव वालों के मतदादा पहचान पत्र घरों से जबर्दस्ती छीनकर ले गए हैं,अफसरों को कहा गया है कि सत्तारूढ़ टीएमसी के पक्ष में काम करो,मतदान कराओ। जिन इलाकों में हिंसा की घटनाएं हो रही हैं वहां पर पुलिस निष्क्रिय दर्शक बनी हुई है।केन्द्रीय पर्यवेक्षक और केन्द्रीयबलों के आने के बावजूद हिंसक हमले बंद नहीं हुए हैं। आतंक-भय कम नहीं हुआ है। खासकर वाम-कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर अनेक इलाकों में दीवारलेखन से लेकर मीटिंग न करने देने के लिए टीएमसी के लोगों ने हमले किए हैं। निचले स्तर टीएमसी के छद्म संगठनों द्वारा झुग्गी-बस्ती इलाकों में भजन-कीर्तन के आयोजन किए जा रहे हैं,यह हिन्दूवोटरों को जोड़ने की साम्प्रदायिक कोशिश है। इलाके के लोगों में सामूहिक भोज कराए जा रहे हैं, लेकिन चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों का कोई हस्तक्षेप नजर नहीं आ रहा।



इसबार के चुनाव में कांग्रेस-वाम के पास कैडर या कार्यकर्ताओं का अभाव सहज ही देखा जा सकता है। बड़े पैमाने पर माकपा के कैडरों ने टीएमसी में शामिल होकर माकपा की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। एक जमाना था माकपा के पास इफरात में कैडर हुआ करते थे,आज टीएमसी के पास कैडर है।सांगठिक हथियारबंद लोग हैं जो एक ही इशारे पर कहीं पर भी जाकर एक्शन कर सकते हैं।यह वह टीम है जो नंदीग्राम-सिंगूर आंदोलन के दौरान बनायी गयी थी।इस टीम में तकरीबन 10हजार लोगों के होने का अनुमान है।इसके अलावा दलालों,बिल्डरों,ठेकेदारों,चिटफंड एजेंट, पुलिस अफसरों के एक अंश का ममता को खुला सहयोग हासिल है।इसने निचले स्तर पर वाम-कांग्रेस के प्रचार को बाधित किया हुआ है।अब देखना यह है कि वाम-कांग्रेस गठजोड़ किस तरह इस नाकेबंदी को तोड़ता है।एक तथ्य साफ है यदि शांतिपूर्ण मतदान होता है तो ममता नहीं जीतेगी।

मंगलवार, 8 मार्च 2016

वे कम्युनिस्टों से क्यों डरते हैं


 ’ WHY  IS  THERE   SO   MUCH    FEAR   OF   THE   COMMUNISTS ’ यह शीर्षक है मराठी में ’क्रांति´ नामक पत्रिका  के 10 सितम्बर 1927 के अंक में प्रकाशित लेख का। जेएनयू के प्रो.मकरंद परांजपे ने जेएनयू में अपनी साम्यवाद विरोधी मनोभावनाओं का  तरह परिचय दिया है,उसके प्रसंग में इस लेख में जो चीजें बयां की गयी हैं उनका जिक्र करना समीचीन होगा।इससे यह भी पता चलेगा कि कम्युनिस्टों की क्या दशा थी ॽ इस लेख मे कॉमरेड सकलातवाला का विशेष रूप से जिक्र किया गया और पूरा लेख उन पर ही है।सकलातवाला कम्युनिस्ट थे और वे यह मानते थे ब्रिटेन का यूनियन जैक झंडा गुलामी का प्रतीक है।इस बयान के कारण उन पर संसद में ब्रिटिश सत्ताधारियों ने जमकर हमले किए थे।उनका दण्डस्वरूप पासपोर्ट जब्त कर लिया था। इसके कारण वे अमेरिका नहीं जा पाए।बाद में वे किसी तरह जुगाड़ करके ब्रिटिश सत्ता को चकमा देकर पासपोर्ट बनवाकर भारत चले आए। भारत में उनके आने पर ब्रिटिश शासक सोच रहे थे कि सकलातवाला महात्मा गांधी की आंधी देखकर भौचक रह जाएंगे और यहां साम्यवाद भूल जाएंगे। अथवा यदि वे ब्रिटिश शासकों के खिलाफ कुछ बोलेंगे तो उनको जेल में ठूंस दिया जाएगा। ब्रिटिश शासक यह भी सोच रहे थे कि सकलातवाला को किसी तरह भारत से विदेश नहीं जाने दिया जाएगा लेकिन सकलातवाला चकमा देकर भारत आए अपना काम किया और फिर चकमा देकर भारत से चले भी गए।
    सकलातवाला असल में मद्रास कॉग्रेस में शामिल होने  आए थे ,वे यह कहकर गए कि दोबारा भारत आना चाहते हैं। उनके आने से उस समय के कम्युनिस्टों को बड़ा बल मिला। सकलातवाला का मानना था  कम्युनिस्ट आंदोलन को परंपरागत आंदोलन के दायरे के बाहर निकाला जाए।ब्रिटिश सरकार सकलातवाला के भारत आने के खिलाफ थी,उसने उनको पासपोर्ट नहीं दिया,वे किसी तरह चालाकी  से पासपोर्ट बनाने  में सफल रहे।ब्रिटिश पुलिस उनको भारत में उस समय पकड़ नहीं पायी। उस समय ब्रिटिश सरकार कम्युनिस्टों से वैसे ही नफरत करती थी जिस तरह परांजपे नफरत करते हैं या संघी नफरत करते हैं। सकलातवाला जिस समय बॉम्बे आए थे उस  समय उस शहर में 25 कम्युनिस्ट भी नहीं थे लेकिन ब्रिटिश शासन डरा हुआ था,यदि कम्युनिस्टों की  उनसे मित्रता होती तो सकलातवाला का पासपोर्ट रद्द नहीं किया जाता,कम्युनिस्टों की दिन-रात निगरानी नहीं होती।

     ´क्रांति´पत्रिका ने लिखा है उस समय कम्युनिस्टों के ठिकानों पर तीन बार पुलिस के छापे पड़े। ब्रिटिश शासकों ने उस समय डाक विभाग को कड़े आदेश दिए थे  कम्युनिस्टों की कोई भी डाक खासकर किताब आदि की पार्सल की सप्लाई न दी जाए।उनकी सभी डाक जब्त कर ली जाए।परांजपेजी यह वाकया काल्पनिक नहीं है।यह मित्र सरकार का आदेश नहीं है,यह वह लेख है जो मेरठ षडयंत्र केस में कम्युनिस्टों के खिलाफ  देशद्रोह के सबूत के तौर पर पेश किया गया था।सब लोग जानते हैं कि उन दिनों कम्युनिस्ट छिपकर गुप्त संघर्ष नहीं करते थे बल्कि खुलेआम सारी गतिविधियां और आंदोलन करते थे।इसके बावजूद ब्रिटिश सरकार उनके खिलाफ इतनी सख्त क्यों थी ॽ परांजपेजी कारण आप बेहतर ढ़ंग से समझ सकते हैं कि ब्रिटिश शासकों ने कम्युनिस्टों का विरोध किया,उनकी डाक तक पर पाबंदी क्यों लगायी ॽ यह वह जमाना था जब भारत के अखबारों में कम्युनिस्टों की खबरें और लेख आदि छापने पर अघोषित पाबंदी लगी हुई थी।परांजपेजी यह क्या स्वाधीनता संग्राम में कम्युनिस्टों का ब्रिटिश शासकों से मित्रता का प्रतीक है ॽ परांजपेजी बेहतर है आप अपने साम्यवाद ज्ञान को दुरूस्त कर ले।

रविवार, 27 दिसंबर 2015

माकपा के पार्टी प्लेनम के सामने प्रमुख चुनौतियां

         आज से कोलकाता में माकपा पार्टी प्लेनम आरंभ होरहा है। यह प्लेनम इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसके ज़रिए माकपा अपने विकास का मार्ग तलाश करने का प्रयास करेगी। खासकर पश्चिम बंगाल में पुन: सत्ता में वापसी हो यह चिंता भी है। माकपा को यदि पश्चिम बंगाल की जनता का विश्वास जीतना है तो उसे निम्न सवालों के दवाब खोजने होंगे-
१. पश्चिम बंगाल की समूची शिक्षा व्यवस्था को किन नीतियों और फ़ैसलों ने पतन के स्तर पर पहुँचाया? समूची शिक्षा का ढाँचा कैसे बर्बाद हुआ? कौन लोग उसके लिए ज़िम्मेदार हैं? शिक्षा का अपराधीकरण कैसे हुआ ?
२. पार्टी संगठन और जनसंगठनों के अपराधीकरण के लिए किस तरह की नीतियाँ और कौन से नेता ज़िम्मेदार हैं?
३.समूचे पश्चिम बंगाल में वामशासन के अंतिम १० साल आम जनता के लिए बेहद तकलीफ़देह रहे हैं,सामाजिकतौर पर माकपा के नेता और कार्यकर्ताओं ने आम जनता के जीवन में जिस तरह हस्तक्षेप किया उसके कारण राजनीति और समाज का अपराधीकरण हुआ। आम जनता को अकल्पनीय मानसिक- सामाजिक यातनाएँ सहन करनी पड़ी हैं, इस समूची प्रक्रिया के लिए जो लोग ज़िम्मेदार रहे हैं वे आजतक पार्टी में हैं जबकि उनको दल से निकालना चाहिए, इस तरह के व्यापक अपराधीकरण के मूल कारणों को रेखांकित किया जाना चाहिए,साथ ही अपराधी मनोदशा के पार्टी सदस्यों और नेताओं को पार्टी ने निकालना चाहिए।
४.पार्टी की सांगठनिक प्रणाली को लोकतांत्रिक बनाया जाय और सदस्यों को पहल करके काम करने देने की नीति बनायी जाय।
५. पार्टी यह तय करे कि वह अपराधी तत्वों से दूर रहेगी और आम जनता से अपने वामशासन में हुई गलतियों के लिए घर घर जाकर माफ़ी माँगेगी,आम जनता का विश्वास जीतने के लिए यह ज़रूरी है।
उपरोक्त पाँचों समस्याओं पर समग्रता में कार्रवाई की योजना लेकर पार्टी सामने आए तो आम जनता से जुड़ने में मदद मिल सकती है।
  उल्लेखनीय है माकपा के दस लाख से ज्यादा सदस्य हैं।90हजार से ज्यादा ब्रांच-प्राथमिक इकाईयां हैं।तकरीबन 10हजार से ज्यादा होलटाइमर हैं।इतने बड़े नेटवर्क के बावजूद यदि माकपा में ठहराव और संकट है तो उसकी जड़ें कहीं गहरी होंगी जिनको प्लेनम को खोजना चाहिए। सामयिक संकट का प्रधान कारण है पार्टी सदस्यों का सामंती मनोभाव,सामंती आदतेंऔर आत्मसंघर्ष करके बदल न पाने की स्थिति।इसके अलावा पूंजीवाद और पूंजीपतिवर्ग के प्रति अंधघृणा।सामंतीबोध और अंध- पूंजीवादी घृणा के आधार पर सांगठनिक विकास संभव नहीं है।
लोकतंत्र के अनुरूप जिस उदार मनोदशा को विकसित होना चाहिए वह मनोदशा पार्टी अपने सदस्यों में विकसित ही नहीं कर पायी है।उदारवादी मूल्यों,संस्कारों और क्रांतिकारी मूल्यों -संस्कारों में अंतर्क्रिया का एकसिरे से अभाव है।इसके विपरीत पार्टी में गुटबाजी का,खासकर पश्चिम बंगाल में बोलवाला है।जिन नेताओं की इमेज खराब है या फिर जो एकसिरे से अप्रासंगिक हो चुके हैं,उनसे पार्टी अपने को मुक्त नहीं कर पायी,उनके साथ पार्टी ने सामंती वफादारों जैसा संबंध बनाया हुआ है।सामंती वफादारी के आधार पर क्रांतिकारी पार्टी का विकास संभव ही नहीं है।यही सामंतीभावबोध है जिसके कारण उत्तरभारत में पार्टी अपना विकास नहीं करपायी है।पार्टी के अंदर सामंती भावबोध,सामंती वफादारी आदि के खिलाफ संघर्ष का माकपा अभी तक कोई ब्लूप्रिंट तैयार नहीं करपायी है।यही वजह है नेकनीयत के बावजूद पार्टी अपना विकास नहीं कर पा रही है।
आज के राजनीतिक हालात में भारत के राजनीतिक दलों में तुलनात्मक तौर पर माकपा सबसे बेहतरीन राजनीतिक दल है,इसके पास बेहतरीन ईमानदार केन्द्रीय नेतृत्व है।निचले स्तर पर बहुत बड़ी संख्या में समर्पित कार्यकर्ता हैं। नीतियों के मामले में यह बेजोड़ है। आज माकपा जिस राजनीतिक संकट और ठहराव में फंसी है उसमें से यह पार्टी देर-सबेर निकलेगी,इसका प्रधान कारण है भारत की परिस्थितियां।
भारत की मौजूदा परिस्थितियों में माकपा की भूमिका बढ़ गयी है,जरुरत इस बात की है कि नेता-कार्यकर्ता वैचारिक पहल करें,नए नजरिए को अपनाएं,पुराने संकीर्णतावादी रूझानो से संगठन को मुक्त करें और नए सामाजिक यथार्थ के अनुरुप पार्टी का सांगठनिक ढाँचा बनाएं।
पार्टी का मौजूदा सांगठनिक ढाँचा एकसिरे से अप्रासंगिक हो चुका है,यह आम जनता के सवालों पर त्वरित कार्रवाई करने में असमर्थ है।आज कम्युनिस्ट पार्टी सदस्यों को रीयल टाइम में फैसले लेने,राय व्यक्त करने और आम लोगों को सार्वजनिक संचार माध्यमों के मंचों पर लोकतांत्रिक आचरण करने,लोकतांत्रिक नजरिए से पार्टी की राय रखने या निजी तौर पर हस्तक्षेप करने की आदत डालनी होगी।
कम्युनिस्ट पार्टी को रीयल टाइम में रेस्पांस देने की शिक्षा अपने सदस्यों और नेताओं को देने की व्यवस्था करनी चाहिए।यह दौर राजनीतिक पहल और राजनीतिक संचार का दौर है।इस दौर में मार्क्सवाद के विकास की अनंत संभावनाएं हैं।खासकर युवाओं के बीच सक्रिय रहने की जरुरत है।
युवाओं को जोड़ने का सोशलमीडिया सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है।इस माध्यम में पार्टीलाइन की नहीं लोकतांत्रिक संवाद और लोकतांत्रिक नजरिए,लोकतांत्रिक वेबसाइट या लोकतांत्रिक साइबर समूहों में गोलबंद करने की जरुरत है। साइबर संचार के जरिए लोकतांत्रिक और मार्क्सवादी विचार सामग्री के नए-नए साइबर मंचों के निर्माण की जरुरत है।इस दिशा में माकपा को व्यापक पहल करने की जरूरत है।
माकपा के सांगठनिक ढाँचे के सामने सबसे बड़ी चुनौती वैचारिक है,इस समय जो सदस्य हैं उनमें अधिकांश को मार्क्सवाद का क ख ग तक नहीं आता।यह स्थिति जितनी जल्द खत्म हो उतना ही अच्छा है। भारत में सामाजिक परिवर्तन के लिए अच्छे पढाकू और अच्छे लड़ाकू कॉमरेडों की जरुरत है। लट्ठ कॉमरेडों की नहीं।विगत दो दशकों में पश्चिम बंगाल में हमने कॉमरेडों के ज्ञान के स्तर में जो क्षय देखा है वह अकल्पनीय है। अधिकांश के लिए माकपा एक कैरियर संगठन रहा है।माकपा और उसके जनसंगठन कैरियर प्रमोशन स्कीम का अंग नहीं है। राजनीतिकचेतना की बजाय कैरियरचेतना पर कॉमरेडों ने काम किया है और उन सभी को पार्टी नेतृत्व ने पाला-पोसा है जो कैरियर के रुप में पार्टी में शामिल हुए,सरकारीतंत्र की मलाई खाई,ऐसे ही कॉमरेडों ने संगठन को सबसे ज्यादा क्षतिग्रस्त किया है। इसे लेनिन की भाषा में राजनीतिक अवसरवाद कहते हैं। राजनीतिक अवसरवाद किसी भी कम्युनिस्टपार्टी के लिए जहर है।
देश में जिस तरह का राजनीतिक संकट और नीतिहीनता का माहौल है उसमें वामपंथी ताकतों को नए नीतिगत परिप्रेक्ष्य और पद्धतियों के साथ आम जनता और लोकतांत्रिक राजनीतिक ताकतों को एकजुट करने के बारे में सोचना होगा।इसमें दो स्तरों पर कदम उठाने के बारे में पार्टी प्लेनम निर्णय ले,पहला, पूर्व माकपा सदस्यों और हमदर्दों को कैसे वापस साथ लिया जाए और उनके साथ निचले स्तर पर संपर्क-संबंध बनाने के लिए प्लेनम सीधे सभी इकाईयों को निर्देश दे,जो पार्टी जनपार्टी बनना चाहती है वह अपने बिछुड़े या त्यागे या भागे हुए सदस्यों हमदर्दों को उसे हर हालमें अपने साथ जोड़ना चाहिए।यह काम आत्मालोचना और विनम्रता के साथ किया जाना चाहिए। पार्टी में आए अहंकार को हर स्तर पर सीधे चुनौती दी जानी चाहिए। माकपा सदस्यों में अहंकार क्यों है और उससे कैसे मुक्ति पायी जाए,यह बड़ी चुनौती प्लेनम के सामने है। अहंकार तो कम्युनिस्ट को अमानुष बना देता है।

वामशासन के दौरान सरकार और पार्टीतंत्र का अंतर खत्म हो गया था।पार्टी मेम्बर समूचे राज्य तंत्र को उसके नियमों से चलाने की बजाय पार्टी नियमों और पार्टी आदेशों के जरिए चलाते रहे इसके कारण आम जनता के हितों को गंभीर नुकसान पहुँचा।इसने प्रत्येक स्तर पर पेशेवर कौशल और स्वायत्तता को क्षतिग्रस्त किया।इसके कारण विभिन्न स्तरों पर दलीय आधार पर भेदभाव हुआ।ये वे मसले हैं जिनका हल प्लेनम को खोजना चाहिए।

गुरुवार, 10 दिसंबर 2015

21वीं सदी में माकपा की चुनौतियाँ

CPIM का प्लेनम 27-31दिसम्बर2015 को कोलकाता में होने जा रहा है। माकपा अपनी सांगठनिक समस्याओं पर इसमें विस्तार से चर्चा करेगी।माकपा की सबसे बड़ी चुनौती है संगठन संचालन की पद्धति और रुढबद्ध कार्यक्रम से मुक्त होने की।इसमें सर्जनात्मकता और नए के लिए कोई जगह नहीं है। इसमें सब कुछ तयशुदा तरीकों से काम करने पर बल है, काम करने की यह पद्धति पुरानी हो चुकी है। माकपा को यदि 21वीं सदी की पार्टी के रुप में काम करना है तो उसे नए सांगठनिक ढाँचे और नए कार्यक्रम के बारे में सोचना होगा,उसे यह सोचना होगा कि समाजवाद के अंत के बाद उभरे पूंजीवाद में कैसे काम करे और किस तरह के काम करे।पार्टी कॉमरेडों का नजरिया क्या हो ,नए संचारजगत में सदस्यों को स्वतंत्र रुप से रायजाहिर करने देने की आजादी रहेगी या नहीं ,या फिर यह कहें कि माकपा क्या अपने पार्टी कार्यक्रम को भारत के संविधान में उल्लिखित व्यक्ति के अधिकारों की संगति में अपने सदस्यों को अभिव्यक्ति के अधिकार देने के पक्ष में है या नहीं,फिलहाल माकपा में सदस्यों को उतने भी अधिकार प्राप्त नहीं हैं जितने भारत का संविधान देता है। कहने का आशय यह है कि नागरिक अधिकारों की संगति में माकपा अपने लक्ष्यों और भूमिकाओं को नए सिरे से तय करे,यदि लोकतांत्रिक प्रणाली और लोकतांत्रिक हकों को पार्टी के सांगठनिक ढाँचे और राजनीतिक कार्यक्रम में वरीयता दी जाए तो पार्टी में नई प्राणवायु का संचार हो सकता है। वरना पुराना ढ़ाँचा तो लगातार माकपा को हाशिए के बाहर खदेड़ रहा है और इससे बचने की जरुरत है।फिलहाल माकपा को क्रांतिकारी कार्यक्रम से भी ज्यादा जरुरत है लोकतांत्रिक कार्यक्रम, लोकतांत्रिक संगठन और लोकतांत्रिक संचार प्रणाली की।

गुरुवार, 24 सितंबर 2015

बर्बर बंगाल और कलंकित जनतंत्र


      सुनने में अटपटा लगता है लेकिन सच है कि पश्चिम बंगाल निरंतर बर्बरता की ओर कदम बढ़ा रहा है। गांवों से लेकर कस्बों तक प्रेम करने वाले युवाओं पर संगठित हमले हो रहे हैं। इन संगठित हमलों में संस्था के रुप में सालिसी सभाएं अग्रणी भूमिका अदा कर रही हैं। पश्चिमी बंगाल में वाम जमाने में बनायी गयी सालिसी सभाएं इन दिनों बर्बरता के मामले में चरम पर हैं,सालिसी सभाओं के जरिए गांवों में तमाम किस्म के यंत्रणादायी दण्ड नियमित दिए जा रहे हैं,कल एक तरुण की सभा की पब्लिक सुनवाई में सरेआम हत्या कर दी गयी, बांकुड़ा में कल सालिसी सभा में लड़की के पिता ने लड़के की चाकू मारकर हत्या कर दी,बंगाल में अब तक सालिसी सभा ने हजारों प्रेमियों को बर्बर दण्ड दिए हैं,हम मांग करते हैं ये सभाएं तुरंत खत्म की जाएं, अब तक सैंकडों प्रेमियों को ये सभाएं विभिन्न किस्म के बर्बर दण्ड दे चुकी हैं,लेकिन राजनीतिकदलों के मुँह पर ताला लगा है,वे सालिसी सभाओं के फैसलों के खिलाफ कभी नहीं बोलते।
     उल्लेखनीय है वामशासन में बर्बर यंत्रणा के लिए बनायी गयी ये सालिसी सभाएं वाम के कलंकित कर्म का आदर्श प्रमाण हैं,टीएमसी ने शासन में आने के बाद सालिसी सभाओं को भंग नहीं किया। यह उसने गलत किया। अब समय आ गया है कि सालिसी सभाओं को भंग किया जाय,पश्चिम बंगाल के गांवों में यह तालिबानी सिस्टम का एक रुप है।
     सालिसी सभाओं के जरिए आए दिन प्रेम करने वाले युवाओं से लाखों रुपये जुर्माने के तौर पर वसूले गए हैं। गांव निष्कासन के कारण सैंकड़ों युवा शिकार हुए हैं। दर्जनों युवाओं को मौत के घाट उतारा गया है। इसके बावजूद सालिसी सभाओं के खिलाफ राजनीतिक दलों का मिलकर कोई कदम न उठाना चौंकाने वाली चीज है। मुश्किल यह है कि सालिसी सभाओं के जरिए पहले माकपा हमदर्द  दण्ड देते थे इन दिनों टीएमसी के समर्थक यह काम कर रहे हैं। यही वजह है सालिसी सभाओं के खिलाफ राज्य में कोई आंदोलन तक नजर नहीं आता। सालिसी सभा के किसी फैसले की मीडिया में खबर जब भी आती है तो ध्यान जाता है लेकिन आमतौर पर अधिकांश फैसले मीडिया में खबर नहीं बन पाते। लोकतंत्र की मांग है कि सालिसी सभाओं को तुरंत प्रतिबंधित किया जाय।





बुधवार, 23 सितंबर 2015

भ्रष्टाचार और माकपा



माकपा के पश्चिम बंगाल में निरंतर ह्रास के कारणों की पड़ताल की जानी चाहिए। बिना गंभीर पड़ताल के यह पता लगाना मुश्किल है कि माकपा इस दुर्दशापूर्ण अवस्था में कैसे पहुँची।   माकपा के अंदर और माकपा के बाहर बहुस्तरीय भ्रष्टाचार हमने करीब से देखा है। मैं 2005 तक पार्टी में था,बाद में पार्टी छोड़ दी। मसलन्, राज्य के विश्वविद्यालय सिस्टम में पेशागत सीनियरटी का कोई महत्व नहीं है। वाम जमाने में ऐसा सिस्टम बनाया गया कि उसमें पार्टी वफादार ही सीनियर होता था,उसे ही पदों पर बिठाया गया।विश्वविद्यालय के अंदर लोकतांत्रिकीकरण के नाम पर दलीय आदेश पर विभिन्न पदों पर लोग बिठाए गए और उनका मनमाफिक ढ़ंग से इस्तेमाल किया गया। किसी भी किस्म की सीनियरटी और अकादमिक विद्वत्ता को कभी भी माकपा ने कोई जगह नहीं दी। इस तरह के लोगों  को पश्चिम बंगाल में प्रोफेसर बनाया गया जिन्होंने एक निबंध लिखा,किसी विद्यार्थी को पीएचडी तक नहीं करायी,न स्वयं पीएचडी की। इस तरह की पदोन्नति और नियुक्ति पाने वाले लोगों में भाजपा से लेकर माकपा के लोग शामिल हैं,सभी किस्म की पदोन्नतियों और नियुक्तियों में माकपा का होना या माकपा की सिफारिश का होना ही एकमात्र शर्त थी। इस तरह के लोगों को उपकुलपति बनाया गया जिनका औसत अकादमिक रिकॉर्ड था। स्थिति की भयावहता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि यूजीसी के द्वारा प्रस्तावित अनेक नियमों की खुलेआम अवहेलना की गयी। विश्वविद्यालय के स्तर पर बनने वाली तमाम कमेटियों में उन लोगों को संयोजक और सदस्य बनाकर रखा गया जिनको नियमानुसार उसमें नहीं होना चाहिए। मसलन्, 60साल की उम्र पर रिटायर होने के बाद विश्वविद्यालय और विभाग की विभिन्न कमेटियों में वफादारों को बिठाकर रखा गया।यह काम इतने निर्लज्ज ढ़ंग से किया गया कि इसकी मिसाल सारे देश में मिलना संभव नहीं है। मैं यहां सभ्यता के नाते नाम नहीं लिख रहा । मेरे लिए दुखद बात यह भी रही है कि नियम-भंग की घटनाओं को विश्वविद्यालय प्रशासन की जानकारी में लाने के बावजूद कोई सुधार नहीं हुआ,यहां तक कि नियम-भंग में शामिल प्रोफेसरगण भी 60साल के बाद कमेटियों से कहने के बावजूद नहीं हटे। इस तरह माकपा ने लालझंड़े को तो कलंकित किया ही समूची अकादमिक व्यवस्था को भ्रष्ट लोगों से भर दिया।जिसके कारण राज्य में उच्चशिक्षा का समूचा ढ़ांचा बुरी तरह चरमरा गया । 

सोमवार, 1 जून 2015

मथुरा के तीन कमाल के साथी

             
       
हम सबकी आदत है कि हम महान लोगों को खोजते हैं और महान लोगों की संगति में रहने का सपना देखते हैं,लेकिन महान लोग मिलते नहीं हैं,खासकर मध्यवर्ग-निम्न मध्यवर्ग के लोगों का जीवन सामान्य और साधारण किस्म के लोगों के बीच में ही आगे बढ़ता है। सामान्य लोगों में ही असामान्य मेधावी और परिश्रमी लोग पैदा होते हैं। मथुरा के अपने अनुभव ने बार-बार यह शिक्षा दी है कि अपने आसपास के लोगों को देखो और उनमें मित्र बनाओ,वहां आपको ऊर्जा मिलेगी,प्रेरणा मिलेगी। प्रेरणा कभी दूर के लोगों से नहीं मिलती,वह तो आसपास के लोगों से मिलती है। आसपास के लोगों में ही अच्छे विचार और अच्छे आचरण की खोज करो तो यथार्थपरक जीवनशैली निर्मित करने में मदद मिलेगी।

आपातकाल के दिनों में जिन तीन मित्रों से परिचय हुआ वे तीनों मेरी यादगार का अभिन्न हिस्सा हैं। इन तीनों से मैंने बहुत कुछ सीखा। ये तीन थे कॉमरेड सव्यसाची (श्यामलाल वशिष्ठ), कॉमरेड ऋषिकांत और कॉमरेड वीरेन्द्र सिंह। इन तीनों से एक साथ मुलाकात नहीं हुई ,सबसे पहले सव्यसाची मिले,बाद में इन दोनों से मुलाकात हुई और फिर तो हम चारों की रोज मुलाकात होती, कभी सव्यसाची के यहां, कभी पार्टी दफ्तर में,कभी पार्टी मीटिंग के दौरान,कभी वैसे ही। लेकिन हम चारों को रोज मिलना ही था। बाद में इस कड़ी में डा.हरीशंकर जुड़ गए,जिन पर मैं बाद में कभी लिखूँगा।

सामान्यतौर पर मित्रों को हम स्वार्थवश याद करते हैं लेकिन हम चारों रोज मिलते थे लेकिन हमारा कोई निजी स्वार्थ नहीं था, हम चारों में सव्यसाची बीएसए कॉलेज में राजनीतिविभाग में प्रवक्ता थे। बाकी हम तीनों छात्र थे। अलग-अलग कॉलेजों में पढ़ते थे। सव्यसाची,वीरेन्द्र और ऋषि के पास साइकिल थी,मैं पैदलयात्री था। बाद में मुझे भी पिता की कृपा से साइकिल मिल गयी। हम चारों में एक-दूसरे की समस्याओं को सुनने और जानने की बेहद उत्सुकता हुआ करती थी, लेकिन कभी कोई एक-दूसरे की समस्याओं में हस्तक्षेप नहीं करता। हमने आपस में अघोषित तौर पर तय कर रखा था कि निजी समस्याओं से निजी तौर पर लड़ेंगे,लेकिन उन पर आपस में विचार-विनिमय जरुर करेंगे। इस तरह हमने निजी और सार्वजनिक जीवन में लक्ष्मणरेखा खींच ली थी।

मथुरा का माहौल बड़ा विलक्षण था वहां आम लोगों में सजगता तो बहुत थी, लेकिन दृष्टिगत सजगता का अभाव था। आम मध्यवर्गीय लोगों में राजनीतिक खबरों पर तीखी बहस करने की आदत थी,हर गली-मुहल्ले के नुक्कड़ पर विभिन्न किस्म के राजनीतिक विषयों पर बहस करते लोग मिल जाते थे,चाय की दुकान, पार्क, मंदिर के बाहर अमूमन बहस करते लोग मिल जाते थे और इन बहसों में कोई अपरिचित भी शामिल हो सकता था । इससे पता चलता था कि आमलोगों में सजगता है, राजनीतिक सचेतनता है, लेकिन दृष्टिकोण का अभाव है। हमलोग रोज अपने तजुर्बों को एक-दूसरे के साथ साझा करते,विश्लेषित करते । इस प्रक्रिया में हमलोगों की समस्याओं पर खुलकर सोचने की बुद्धि का तेजी से विकास हुआ। संयोग की बात थी कि सव्यसाची,ऋषि और वीरेन्द्र पहले से माकपा के सदस्य थे,मैं भी जल्द पार्टी सदस्य बना लिया गया।

सव्यसाची की मथुरा शहर में एक आदर्शवादी कम्युनिस्ट के रुप में साख थी,आम मध्यवर्गके राजनेता, बुद्धिजीवी,शिक्षक,छात्र आदि में उनको बेहद सम्मान की नजर से देखा जाता था। वे ऋषि के घर में एक छोटे से कमरे मे भाड़े पर रहते थे। उनकी बेहद सरल और छोटी जीवनशैली थी। बमुश्किल उनके पास तीन-चार जोड़ी कुत्ता-पाजामा थे,एक चारपाई,एक स्टोव,एक साइकिल तीन मूड़ा यही कुल जमा उनकी संपत्ति थी। आरंभ में वे खाना बाजार से खरीदकर खाते थे। उन दिनों सव्यसाची रिक्शाचालक यूनियन के सचिव हुआ करते थे और डेम्पियर में जहां से रिक्शावाले खाना खाते थे वहीं से सव्यसाची एक रुपये की 6 रोटी दाल खरीदकर लाते और दिन में दोबार वही खाकर रहते, जिस दुकानदार से वह रोटी लाते थे वह भी रिक्शा चलाता था ,बाद में सव्यसाची ने उसे भी पार्टी मेम्बर बना लिया और रिक्शाचालक यूनियन का पदाधिकारी बना दिया।

सव्यसाची में मित्र बनाने और दिल जीतने की अद्भुत क्षमता थी,वे अपनी सादगी और विचारों से सहज ही प्रभावित कर लेते। सव्यसाची सहज,ईमानदार, निष्ठावान मनुष्य थे। वे गंभीर मार्क्सवादी साहित्य कम पढ़ते थे लेकिन दैनंदिन जीवन की घटनाओं को मार्क्सवादी ढ़ंग से कम्युनिकेट करने की उनमें विलक्षण क्षमता थी। सव्यसाची की पार्टीलाइफ की लाइफलाइन थे वीरेन्द्र और ऋषि। इन दोनों की मदद के बिना वे कोई काम नहीं कर पाते।

सव्यसाची का एक गुण यह भी था कि वे संस्कृति और उससे जुड़े सवालों पर स्वतंत्र रुप से संगठन बने,इसकी जरुरत को बड़ी गहराई से महसूस करते थे। वे मानते थे कि कम्युनिस्ट पार्टी के सांगठनिक ढॉंचे में रहकर संस्कृति के कामों को करना संभव नहीं है,यही वजह थी कि मथुरा में उनकी प्रेरणा और युवामित्रों के सहयोग से लोकतांत्रिक संस्कृति के प्रचार-प्रचार के लिए 'जन सांस्कृतिक मंच' नामक संगठन का निर्माण हुआ । इस संगठन का मकसद था बृहत्तर समाज में फैले युवाओं को अपने करीब लाना,उनमें लोकतांत्रिक मूल्यों का बोध पैदा करना । इस संगठन का मुख्य लक्ष्य था संस्कृति और समाजसेवा के सवालों पर युवाओं में सजगता पैदा करना। उन दिनों छात्रों के लिए एसएफआई जैसा संगठन था लेकिन युवाओं के लिए कोई संगठन नहीं था,इसके लिए प्रगतिशील युवा मोर्चा नामक संगठन बनाया गया। उल्लेखनीय है कि माकपा के पास उनदिनों युवाओं के लिए कोई संगठन नहीं था, डीवाईएफआई का गठन बहुत बाद में हुआ।

चौधरी वीरेन्द्र के व्यक्तित्व की विशेषता थी कि वह बेइंतिहा मेहनती,निष्ठावान और मिलनसार था। वह इन दिनों यूपी पुलिस में उच्चपदस्थ पुलिस अधिकारी है। पुलिस में रहते हुए उसने कभी अपने व्यक्तित्व पर दाग नहीं लगने दिया। वह यूपी के उन चंद पुलिस अफसरों में है जो ईमानदारी से अपनी पगार में ही अपना गुजारा करते हैं,उसने कभी जीवन में रिश्वत नहीं ली। वीरेन्द्र के बारे में हम सभी यही मानकर चल रहे थे कि वह तो आगे चलकर होलटाइमर बनेगा,उसकी काम करने की अपार क्षमता हम सबको प्रभावित करती थी। खासकर सव्यसाची का जितना प्रकाशन का काम था,उसे वही संभालता था,उसकी मदद के बिना 'उत्तरार्द्ध' जैसी पत्रिका का सारे देश में पहुँचना संभव ही नहीं था। सव्यसाची के साहित्य को आम जनता में पहुँचाने की उन दिनों एकमात्र वीरेन्द्र पर जिम्मेदारी थी।

वीरेन्द्र,ऋषिकांत और मैं हर रोज कभी सुबह तो कभी शाम को लंबी बातचीत के लिए मिलते, हम तीनों के पास असंख्य राजनीतिक समस्याएं हुआ करतीं जिन पर हमें बहस करनी होती थी, सुबह मिलते तो होलीगेट पर पहलवान कचौड़ीवाले की दुकान पर पहले कचौड़ी-जलेबी का कलेवा करते, बाद में ,भाटिया रेस्टोरैंट में जाकर बैठकर कई कप चाय पीते और जमकर बहस करते। हम तीनों में ऋषिकांत उग्र मार्क्सवादी की तरह पेश आता,वीरेन्द्र शांत मार्क्सवादी की तरह पेश आता,ये दोनों किसी भी समस्या के अनंत विकल्प बनाकर सोचने में माहिर थे। विकल्पों में रखकर मार्क्सवाद को कैसे लागू करें शायद यह पद्धति इसी दौर में हमतीनों में विकसित हुई। हमने विकल्प की परिधि को बहुत ही लोचदार बनाया हुआ था। हम विकल्प को वहां तक रखते जहां तक आदमी हमारे हाथ में रहे,हमारे संपर्क में रहे।

सही विकल्प वह जो आदमी को साथ में बनाए रखे। अमूमन कॉमरेड विकल्प के चक्कर में आदमी को भगा देते हैं,लेकिन उनके पास विकल्प रह जाता था । कोरा विकल्प मार्क्सवाद की मौत है। मार्क्सवाद तब ही काम का है जब आदमी केन्द्र में रहे और विकल्प हाशिए पर रहे। वह विकल्प किसी काम का नहीं है जो आदमी को भगा दे। हमने आदमी को केन्द्र में रखा विकल्प को हाशिए पर रखा, इससे हमें सैंकड़ों युवाओं को मित्र बनाने में सफलता मिली। मथुरा जैसे शहर में इसी आधार पर मैं सैंकड़ों छात्राओं को एसएफआई में शामिल करने में सफल रहा। हमतीनों की रणनीति थी कि मित्र बनाओ,अपना दायरा बड़ा करो, इसके चाहे कुछ देर के लिए विचारों को स्थगित भी करना पड़े । हमारे लिए आदमी प्रधान था,विकल्प गौण था।

हमने जिन युवाओं को मित्र बनाया उनको कभी नहीं छोड़ा ,उनपर कभी कोई विचार नहीं थोपा ,साथ ही उनको कभी अपने विचारों की परिधि के बाहर जाने नहीं दिया। हमारे लिए विचार की परिधि वहां तक फैली हुई थी जहां तक हम मनुष्य को बांधे रख सकें। विचार का काम है मनुष्य को बांधना, विचार को हम वहां तक लचीला रखें जहां तक मनुष्य को आराम मिले,सहजता का अनुभव हो। हम तीनों यही सोचते थे विचार तो मनुष्यों की सेवा के लिए हैं,मार्क्सवाद तो मनुष्यों की सेवा के लिए।

हम मनुष्य को मार्क्सवादी बनाने की कोशिश नहीं करते बल्कि आदमी की जिंदगी के ढांचे में मार्क्सवाद को ढालने की कोशिश करते थे, और इससे हमें अनेक लाभ हुए,हमें सैंकड़ों दोस्त बनाने,उनका दिल जीतने का मौका मिला। विचारों में लचीलेपन की कला मथुरा में इन मित्रों के बीच में ही विकसित हुई। खासकर वीरेन्द्र और ऋषिकांत की बुद्धि विकल्पों की खोज में खूब चलती थी। हम तीनों ने मिलकर सैंकड़ों किताबें पढ़ीं,उन पर आपस में जमकर बहस की,हमारे बीच में किताबें ईंधन की तरह हुआ करती थीं। हम सबमें वीरेन्द्र बहुत ज्यादा किताबें पढ़ता था। दिलचस्प बात यह थी कि वीरेन्द्र और ऋषिकांत में होलटाइमर बनने की इच्छा थी, लेकिन संयोग की बात कि हंसी-हंसी में वीरेन्द्र ने यूपी में थानेदारी परीक्षा दी और वह पास होकर हमारे बीच सेअचानक गायब हो गया। वह मन ही मन किसी नौकरी की तलाश में था, यह बात कभी -कभी कहता था लेकिन कोई प्रयत्न नहीं करता था। पहलीबार प्रयास किया और वह सफल रहा। वह थानेदार हो गया। हम सब बड़े दुखी हुए,मास्साब तो एकदम टूट से गए,क्योंकि वीरेन्द्र उनकी नींव था। हम सब सोचने लगे कि क्या मार्क्सवाद की शिक्षा असफल रही ? कई लोग मानते थे कि मार्क्सवादी को पुलिस में नहीं जाना चाहिए, लेकिन मेरी और कई लोगों की राय थी कि नौकरी के लिए कहीं पर भी जाया जा सकता है। मार्क्सवादी होने का मतलब यह नहीं है कि होलटाइमर ही बना जाय।

एक नागरिक के नाते हम मार्क्सवाद से बहुत कुछ ऐसा सीखते हैं जिससे बेहतरीन नागरिक की भूमिका निभा सकें। मार्क्सवाद का मतलब है बेहतरीन नागरिक बनाना। मार्क्सवाद का मतलब सिर्फ क्रांतिकारी या होलटाइमर बनाना नहीं है। हम तीनों बार –बार इस सवाल पर बातें करते कि भारत जैसे समाज में मार्क्सवाद का लक्ष्य क्या हो सकता है ? कई बार लगता पेशेवर कम्युनिस्ट बनना ही महान कार्य है, लेकिन भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन की दशा देखकर अंत में यही सोचते कि पेशेवर कम्युनिस्ट की जिंदगी संभालने लायक कम्युनिस्ट पार्टी के पास संसाधन ही नहीं हैं। एक बेहतर कम्युनिस्ट वह है जो आत्मनिर्भर हो, नौकरी करता हो,जो कम्युनिस्ट नौकरी नहीं करता ,वह न तो मार्क्सवाद को बचा सकता है और न अपने को बचा सकता है। आजीविका कमाने का काम छोड़कर सभी मार्क्सवादी यदि पेशेवर कम्युनिस्ट बन जाएं तो न तो कम्युनिस्ट पार्टी बनेगी और न समाज बनेगा। एक अवस्था के बाद आम लोग कम्युनिस्ट पार्टी में आना बंद कर देंगे। इसलिए बेहतर है कम्युनिस्ट समाज में घुलेमिले रहें,वैसे ही जिस तरह पानी में मछली रहती है। वीरेन्द्र के पुलिस में जाने के बाद मथुरा एसएफआई का महामंत्री मुझे बनाया गया।

ऋषिकांत की खूबी यह थी कि वह शानदार कार्यकर्ता के अलावा बेहतरीन क्रिकेट खिलाड़ी भी था। के.आर. कॉलेज की ग्राउण्ड पर इसकी गेंदबाजी के कहर को मैंने कईबार देखा है, वह कम्युनिस्ट न बनता तो यह तय था नामी क्रिकेटर बनता,उसकी क्रिकेटर के रुप में मथुरा में धाक थी। ऋषिकांत बेहद संवेदनशील था। हम सबमें संवेदनशीलता के मामले में वह सबसे आगे था। उसने अनेक चीजें साथ में काम करते हुए विकसित कीं इनमें मूल्यवान चीज थी उसकी विलक्षण विश्लेषण क्षमता। वीरेन्द्र और ऋषिकांत में एक और गुण था कि वे दोनों बहुत सुंदर पोस्टर भी बनाते थे। उनके बनाए पोस्टरों से आए दिन मथुरा की दीवारें भरी रहती थीं। हमलोग हर छह महिने में कॉलेजों में दीवार रंगने , नारे लिखने आदि के काम करते थे। मथुरा में जब भी नुक्कड़ सभाओं का सिलसिला शुरु होता था,सव्यसाची,मैं,वीरेन्द्र और ऋषिकांत हमेशा साथ ही रहते। ऋषिकांत ने बाद में अपनी नौकरी की और कुछ समय बाद नौकरी छोड़कर कई सालों तक पार्टी होलटाइमर के रुप में दिल्ली और अंत में मथुरा में काम किया। कालांतर में उसकी परिस्थितियां इतनी तेजी से बदलीं कि उसने होलटाइमरी छोड़ दी और आजीविका के कामों में व्यस्त हो गया।


रविवार, 26 अप्रैल 2015

भाषण ,पिता और पिटाई


              यह घटना उस समय की है जब मैं मथुरा के माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय में उत्तरमध्यमा के अंतिम वर्ष का छात्र था सबसे कम उम्र और सबसे छोटी कक्षा का पहलीबार छात्रसंघ का महामंत्री चुना गया था,यह घटना सन् 1974 की है। संस्कृत पाठशाला में आम सभा के जरिए छात्रसंघ का चुनाव होता । उस चुनाव में मैं जीत गया,जीतने के साथ महासचिव होने के नाते मुझे भाषण देना था, छात्रसंघ की परंपरा थी कि जो महासचिव चुना जाता था वह भाषण देता था,मैं भाषण देने से हमेशा बचता था, बल्कि यह कहें तो बेहतर होगा कि मुझे भाषण देना पसंद ही नहीं था। लेकिन छात्रसंघ की परंपरा का निर्वाह करते हुए मैंने अपने गुरुजनों के आदेश पर भाषण देना आरंभ दिया, भाषण संस्कृत में देना था , छात्रसंघ की समूची कार्यवाही संस्कृत में होती थी, संस्कृत में मिनट्स लिखे जाते थे और संस्कृत में संचालन होता था ,छात्रों और शिक्षकों को संस्कृत में ही बोलने का अघोषित निर्देश था, वैसे छात्र हिन्दी में भी बोल सकते थे, लेकिन एक परंपरा चली आ रही थी जिसके कारण समूची कार्यवाही संस्कृत में होती थी।
      मैंने पहलीबार भाषण दिया वह भी संस्कृत में और भाषण देते समय मेरी आंखों से लगातार आँसू टपक रहे थे। मैं समझ नहीं पा रहा था कि मैं क्यों रो रहा हूँ,मेरी गुरुजन भी परेशान थे, संयोग की बात थी कि मेरा भाषण  भाषा और शैली के लिहाज से अच्छा रहा, मेरे गुरुजनों ने मेरी खूब प्रशंसा की और एक सवाल किया कि तुम बोलते हुए रो क्यों रहे थे ? यह सवाल मेरे लिए आज भी अनुत्तरित है।
    संस्कृत कॉलेज में पढ़ते समय दूसरा महत्वपूर्ण भाषण सन् 1976 में छात्रसंघ के अध्यक्ष के रुप में दिया, यह आपातकाल का दौर था और संभवतः मेरा कॉलेज अकेला कॉलेज था जिसमें कानून तोड़कर छात्रसंघ का चुनाव हुआ और छात्रसंघ का सालाना जलसा भी हुआ जिसमें 'कौत्स की गुरु दक्षिणा' संस्कृत नाटक का मंचन हुआ और मेरा अध्यक्षीय भाषण हुआ। परंपरा के अनुसार यह में मेरा पहला लिखित संस्कृत भाषण था।
         आपातकाल में ही माकपा नेता सव्यसाची से संपर्क हुआ और आपातकाल के बाद उनके साथ पहलीबार होलीगेट पर तांगा स्टैंड पर सन् 1977 में नुक्कड़सभा में भाषण दिया। सव्यसाची का उन दिनों रिक्शा-तांगेवालों पर गहरा असर था, इसलिए सुनने वालों में वे ही ज्यादा था, संयोग की बात थी मेरे पिता ने मुझे भाषण देते देख लिया और उन्होंने मेरा भाषण सुना और चुपचाप गुस्से में घर चले आए, मैं बाद में जब घर पहुँचा तो उन्होंने कम्युनिस्टों को जीभर कर गालियां दीं, सव्यसाची को गालियां दीं, साथ भी मुझे पीटा भी और कहा कि तुम्हारा इतना पतन होगा मैंने यह तो सोचा ही नहीं था ,तुम पंडित हो,शास्त्री हो, तुमको कथा कहनी चाहिए, प्रवचन करना चाहिए, शास्त्रार्थ करना चाहिए, यह क्या तांगेवालों-रिक्शावालों में भाषण देते घूम रहे हो, यह तुम्हारे सम्मान के अनुरुप नहीं है अगलीबार यदि मैंने तुमको कम्युनिस्टों के साथ देखा तो डंडों से पीटूँगा।
      लेकिन मैं लाचार था, मेरे दोस्त लगातार बढ़ रहे थे और सभी पर साम्यवाद का गहरा असर था और सभी अच्छे परिवारों से आते थे,धीरे धीरे मेरे मंदिर पर आने वाले लोगों ने भी पिता से शिकायत की कि पंडितजी आपका बेटा तो बिगड़ गया है, आज वहां बोलते देखा,फलां जगह भाषण दे रहा था। मैं भाषण देकर जब भी लौटकर आता तो पिता पूछते  तुम फलां जगह भाषण देने गए थे आज, मैं सच बोल देता,बस,उसके बाद मेरी कसकर पिटाई होती, बाद में मैंने सच बोलना बंद कर दिया, उसके बाद मेरे पिता जब भी पूछते थे मैं साफ कह देता कि मैं भाषण देकर नहीं आ रहा,तो वे कहते कि फलां आदमी फिर तुम्हारा नाम क्यों ले रहा था, मैं कहता वे लोग चिढ़ते हैं,इसलिए झूठी शिकायतें करते रहते हैं।
उस दौर के भाषण और आंदोलनकर्म की एक दुर्घटनाबड़ी ही दिलचस्प है। किशोरी रमण गर्ल्स डिग्री कॉलेज में छात्राओं का शानदार आंदोलन हुआ,तकरीबन 15दिन तक हड़ताल के कारण कॉलेज बंद रहा। एक दिन इस आंदोलन के दौरान में चार सौ छात्राओं का जुलूस लेकर मथुरा के जिलाधीश के घर पर गया था, जुलूस में मैं अकेला लड़का था ,बाकी चार सौ लड़कियां थीं, उन दिनों मैं मथुरा में एसएफआई का जिलामंत्री था।यह वाकया सन् 1978 का है। उस समय डीएम एस.डी. बागला थे। संयोग की बात थी गर्मी का दिन था हम सीधे  उनके बंगले पर पहुँचे लेकिन वे बंगले पर नहीं थे, लड़कियां भूखी- प्यासी थीं, पानी आदि की बंगले के बाहर कोई व्यवस्था नहीं थी। मैंने चौकीदार से पानी देने को कहा उसने मना कर दिया, मैंने लड़कियों से कहा डीएम के घर के अंदर जाओ और जबर्दस्ती पानी पीओ और जो मिले खा-पी लो, बाकी जो होगा मैं देख लूँगा। मेरे बोलते ही 400लड़कियों ने बंगले के अंदर धावा बोल दिया और पूरा बंगला हमारे कब्जे में था, आराम से खाया-पिया,डेढ़ घंटे बाद डीएम आए,बंगले का अस्त-व्यस्त सीन देखकर घबड़ाए और बोले बंद करवा दूँगा ,लड़कियां बिफरी हुईं थीं और इतनी लड़कियों को देखकर डीएम के होश उड़े हुए थे, मैंने कहा आपने यदि भूल से गलती कि तो ये लड़कियां आपको पीटेंगी, डीएम शांत हो गए, उन्होंने हमारी मांगे ध्यान से सुनीं और हमें कार्रवाई का आश्वासन देकर विदा किया। लेकिन डीएम ने मेरे पिता को संदेशा भिजवा दिया कि पंडितजी अपने बेटे को संभालिए वरना हाथ से निकल जाएगा, एक साथ इतनी लड़कियों के साथ उसका जुलूस में आना अच्छा लक्षण नहीं है। मैं शाम को घर लौटा तो पिता ने पूछा कहां गए थे मैंने झूठ बोला कि कहीं नहीं कॉलेज से आ रहा हूँ, बस फिर क्या था जमकर पिटाई हुई और कमरे में बंद कर दिया गया, (दिलचस्प बात यह थी कि डीएम मेरे मंदिर पर हर रविवार आते थे, वे पिता और मुझे जानते थे। वे अंदर से दुखी थे कि मैं कम्युनिस्ट क्यों हूँ !) लड़कियों का  आंदोलन चरम था पर मैं घर में कैद था, पिता कहीं बाहर जाने ही न दे रहे थे, बाहर सारे मित्र और कॉमरेड परेशान थे, कोई संपर्क नहीं कर पा रहा था , खैर किसी तरह दो दिन बाद में पिता को यह वचन देकर बाहर निकला कि किसी आंदोलन-जुलूस में नहीं जाऊँगा और कहीं पर भाषण नहीं दूँगा।कॉमरेडों से नहीं मिलूँगा। लेकिन मैं क्या करूँ मैं अपनी आदत से लाचार था,बाहर भाषण देता था और घर पर आए दिन पिता से पिटता था, सन् 1979 में जेएनयू जाने बाद ही पिता की पिटाई से मुक्ति मिला।  

       

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

श्रद्धा के बिना माकपा


                                              
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की 21वीं पार्टी कॉग्रेस हाल ही में खत्म हुई है। यह कॉग्रेस एक मायने में महत्वपूर्ण है कि इसने माकपा में श्रद्धा के नायक को अपदस्थ किया है।श्रद्धा को नहीं। प्रकाश कारात के जमाने में माकपा श्रद्धालुओं और भक्तों का दल होकर रह गया था। माकपा के नेतागण श्रद्धालुओं की तरह बातें करते थे और श्रद्धालुओं की तरह ही अविवेकवादी आचरण कर रहे थे। प्रकाश कारात को यह श्रेय जाता है उसने प्रतिबद्ध माकपा को श्रद्धालु माकपा में तब्दील किया । कहने के लिए सीताराम येचुरी महासचिव हुए हैं,लेकिन पोलिट ब्यूरो अभी श्रद्धालुओं से भरा है। इस कमजोरी के बावजूद प्रकाश कारात की श्रद्धा की नीति को कॉग्रेस ने पूरी तरह ठुकरा दिया है।साथ ही श्रद्धा के नायक को विदा किया है ,यह सकारात्मक पक्ष है। 
उल्लेखनीय है विगत दस सालों में माकपा में प्रतिबद्धता घटी, श्रद्धा और अंध-श्रद्धा बढ़ी है। इस श्रद्धा और अंध-श्रद्धा की धुरी है पार्टी का संघात्मक ढ़ांचा और अभिजात्य भावबोध। इसके कारण पार्टी में छोटे-बड़े का भेद बढ़ा है। यह माकपा की अभी भी मूल समस्या है। संघात्मक ढ़ांचे को माकपा किसी भी तरह तोड़ नहीं पाई है। इसबार की पार्टी कॉग्रेस में भी यह ढ़ांचा ज्यों का त्यों बना रहा । सिर्फ महासचिव किसी तरह इस ढ़ांचे की पकड़ के बाहर से ऊपर आ गया है। सीताराम कैसे महासचिव बने हैं यह तो पार्टी के अंदर के लोग जानें लेकिन हम बाहर से माकपा को जिस तरह देख पा रहे हैं उसके आधार पर कह सकते हैं कि सीताराम येचुरी की महासचिव के पद पर प्रतिष्ठा के साथ यदि प्रकाश कारात के श्रद्धालु कॉमरेडों की प्रकाश सहित पोलिट ब्यूरो और केन्द्रीय समिति से विदाई हो जाती तो बेहतर होता। अब मुश्किल यह है कि सीताराम को श्रद्धालुओं के साथ मिलकर फैसले लेने होंगे। 
माकपा को श्रद्धालुओं ने पोलिट ब्यूरो से लेकर निचले स्तर तक प्रदूषित किया है। कायदे से प्रकाश कारात के जमाने में जो श्रद्धातंत्र माकपा में निर्मित हुआ था उसको सर्वोच्च कमेटी से ही तोड़े जाने की जरुरत है, प्रकाश कारात सहित उन तमाम पोलिट ब्यूरो सदस्यों को पार्टीतंत्र से बाहर किया जाना चाहिए,अथवा उनको निरस्त्र किया जाय, जिन लोगों ने माकपा को श्रद्धालुओं,दलालों,प्रमोटरों और तमाम किस्म निहित स्वार्थी तत्वों की पार्टी बनाया। मसलन् ,पश्चिम बंगाल माकपा में प्रमोटर,दलाल और असामाजिक तत्वों की पकड़ संगठन पर इतनी मजबूत रही है कि पार्टी का सचिव भी उनके सामने फैसले लेने में शर्माता था। 
विगत एक दशक से माकपा की समस्या उसकी नीतियां कम और कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं खासकर महासचिव का राजनीतिक व्यवहार सबसे बड़ी समस्या रहा है। वह स्थानीयतावाद और प्रांतीयतावाद को किसी भी तरह कम नहीं कर पाया। प्रांतीयतावाद के आगे महासचिव बौना बना रहा और समूची पार्टी कभी अखिल भारतीय दल की तरह काम ही नहीं कर पाई। यहां तक कि पोलिट ब्यूरो में भी इसकी अभिव्यंजना साफतौर पर देखी जा सकती है। 
श्रद्धातंत्र ने पार्टी को रोबोट दल में तब्दील कर दिया। कॉमरेडों का रोबोट आचरण आज भी दहशत और थरथराहट पैदा करता है, उनका अहंकार आज भी मन में घृणा पैदा करता है। कॉमरेड भूल ही गए कि मौजूदा दौर पूजावाद और श्रद्धा का नहीं है। यह अविश्वास और बहस का युग है। शक दूर करने का युग है। श्रद्धा के पक्षधर पुराने ख्यालों और दस्तूरों में जी रहे हैं। उनकी समझ का यथार्थ से कोई मेल नहीं है। उनकी यथार्थ जीवन में कोई दिलचस्पी नहीं है । जबकि आज के कॉमरेड मार्क्सवाद का यथार्थ के साथ मेल देखना चाहते हैं। वे उन तमाम चीजों के बारे में सवाल खड़े करना चाहते हैं जिनको माकपा ने गढ़ा है। वे सार्वजनिक तौर पर बहस-मुबाहिशे करके चीजों के बारे में समझना चाहता है। पार्टी का माहौल बदलना चाहते हैं। उनको अ-न्याय,निजी रंजिशों और कॉमरेडों की हैवानियत से सख्त नफरत है। लेकिन श्रद्धेयनेता इन चीजों पर ध्यान देना नही देना चाहते। वे उन मसलों पर बातें करना नहीं चाहते जिनसे माकपा के कॉमरेडों का मन और सामाजिक जीवन बदरुप हुआ है। 
श्रद्धेय नेताओं ने बदरंगी रुपों को पार्टी अनुशासन और ऊपर के नेता की राय के नाम पर हमेशा ढ़ंकने की कोशिश की है। इन लोगों ने यह भावना पैदा की है कि पाटी में नेता के बिना हमारा कोई नहीं है। नेता नहीं तो तुम नहीं । 21वीं पार्टी कॉग्रेस में हो सकता है पार्टी के बदरंग भावबोध की जमकर चर्चा हुई हो, लेकिन हम नहीं कह सकते कि वहां इस पर गौर किया गया था । यदि गंभीरता से श्रद्धा और अंध-श्रद्धा के दौर की समीक्षा की जाती तो प्रकाश कारात और उनके बासी श्रद्धासुमन बाहर फेंके क्यों नहीं गए ? जिन नेताओं के आचरण के कारण पार्टी आज रसातल के मुहाने पर खड़ी है वे सभी पोलिट ब्यूरो में बरकरार क्यों हैं ? पार्टी के जिन दोषों की 21वीं कॉग्रेस में चर्चा हुई है, वे दोष, व्यक्तिविहीन नहीं हैं। उनके साथ कोई न कोई नेता जुडा रहा है, ऐसे मं सामूहिक फैसले और निजी जिम्मेदारी के सिद्धांत का पालन करते हुए दोषयुक्त कार्यकलापों को प्रश्रय देने वाले नेताओं को पार्टी की सर्वोच्च कमेटी से निकाला क्यों नहीं गया ? 
सवाल यह भी है कि प्रकाश कारात के दौर में पार्टी सांगठनिक तौर पर कमजोर हुई है या ताकतवर बनी है ? सब जानते है कि पार्टी का राष्ट्रीय स्तर से लेकर निचले स्तर तक ह्रास हुआ है, लेकिन इस ह्रास के लिए महासचिव को दण्डित क्यों नहीं किया गया ? यह कैसे संभव है कि पश्चिम बंगाल में जो नेतागण तबाही के नायक हैं वे अभी भी पोलिट ब्यूरो में बने हुए हैं , क्या पार्टी में ईमानदार लोगों की कमी है ? पार्टी के पोलिट ब्यूरो में उन लोगों को बरकरार रखा गया है जो समूची पार्टी को दलदल,कीचड़ और बदनामी में छोड़ गए हैं। 
इसका अर्थ यह भी है कि माकपा में अभी भी नेताओं के बीच में श्रद्धा की गाँठ बंधी हुई है यही वजह है संगठन में कोई उनको टस से मस नहीं कर पाया। कायदे से श्रद्धा की गांठ को तोड़ा जाना चाहिए। श्रद्धा से देवता बनाए जा सकते हैं, बुर्जुआ नेता बनाए जा सकते हैं,कम्युनिस्ट नेता नहीं बनाए जा सकते। कम्युनिस्ट नेता, श्रद्धा से नहीं बनते, वे तो प्रतिबद्धता से बनते हैं। माकपा में फिलहाल तो हमें श्रद्धा के फूल खिलते नजर आ रहे हैं। देखते हैं नया माली (सीता) पूरे बगीचे को कैसे श्रद्धासुमनों से मुक्त करता है।

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