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सोमवार, 5 सितंबर 2016

शिक्षक के रूप में फेसबुक

       गुरू वह जो सम्प्रेषक बनाए।फेसबुक इस अर्थ में हम सबका गुरू है ,उसने हम सबको कम्युनिकेटर बनाया है।कम्युनिकेशन की कलाओं से लैस किया है। जो लोग फेसबुक पर सक्रिय है उन सबका अप्रत्यक्ष रूप में फेसबुक गुरू है।यह हमारी दिमागी हरकतों का नियंत्रक और नियामक है।

हर मीडियम हमें सिखाता है।लेकिन हम उसे उपकरण से अधिक महत्व नहीं देते।वास्तविकता यह है आधुनिक युग में मीडियम हमारे गुरू हैं। पहले हम शिक्षक से सीखते थे लेकिन औद्योगिक क्रांति के बाद शुरू हुई तकनीकी क्रांति ने मीडियम को शिक्षक और छात्र के बीच में लाकर खड़ा कर दिया है।हम देखें फिल्म ने एक मीडियम के रूप में समाज को किस तरह सिखाया-पढ़ाया और सजाया-संवारा है।उसी तरह फेसबुक ने लेखन और अभिव्यक्ति के तौर-तरीकों के संबंध में हमारी नए सिरे से शिक्षा की है।

मैंने निजी तौर पर मीडियम के तौर पर फेसबुक से बहुत कुछ सीखा है,रोज कोई न कोई नई चीज हम यहां सीखते हैं।फेसबुक हमारा नया शिक्षक है।फेसबुक की वॉल जब सामने खुली होती है तो हर शिक्षित व्यक्ति लिखने के पहले छह बार सोचता है कि क्या लिखूँॽ लिखते हुए भय और संकोच में रहता है। भय-संकोच में वे लोग भी रहते हैं जो सुंदर-सटीक बोलने के लिए जाने जाते हैं।जिनके पास मेधा की कमी नहीं है।लेकिन फेसबुक पर आते ही उनकी सरस्वती गुम हो जाती है !

अभिव्यक्ति के रूपों में फेसबुक बेहतरीन माध्यम है,इसमें मित्र ही शिक्षक हैं,यूजर या पाठक ही शिक्षक है,जो गलती आप करते हैं,उसे दूसरा तुरंत बताता है,आप दुरूस्त कर लेते हैं।आप ऐसे व्यक्ति के कहे को मान लेते हैं जिसे आपने देखा नहीं,जाना नहीं,अनजाने व्यक्ति की आलोचना मानना,उससे सीखना यह फेसबुक का गुण है।बात करने के कौशल को कैसे विकसित करें,विभिन्न किस्म के लोगों में रहकर किस तरह संप्रेषण करें,यह कला फेसबुक पर रहकर ही सीख सकते हैं।फेसबुक की शिक्षण की कोई किताब नहीं है,वह पुराने किस्म के लेखन और अभिव्यक्ति रूपों का नया संस्करण लेकर आता है,हम यहां सब एकलव्य हैं।मित्रों की मदद से लिखकर सीखते हैं।यहां कोई गुरू नहीं है।शिक्षक नहीं है।



फेसबुक ने पहलीबार यह सिखाया कि मित्र ही गुरू है।सार्वजनिक संप्रेषण सामूहिक कला है। संप्रेषण तब ही सफल होता है जब उसे कोई पढ़े,सुने,गुने।फेसबुक इस मायने में हमें आत्मनिर्भर सम्प्रेषक बनाता है। वह पुराने सभी किस्म के संप्रेषण रूपों से भिन्न पैराडाइम में ले जाता है। यह मनुष्य की आत्मनिर्भर संप्रेषण शक्ति का चरमोत्कर्ष है।

बुधवार, 10 अगस्त 2016

कार्ल मार्क्स पखवाडा- सोशलमीडिया,अभिव्यक्ति की आजादी और मार्क्स

          फेसबुक आदि सोशल मीडिया में अभिव्यक्ति की आजादी का जब से विस्तार हुआ है,तब से अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले भी तेज हुए हैं,बोलने वाले जितने चतुर और तेज दिख रहे हैं,उन पर नियंत्रण लगाने वाले और भी चतुर हो गए हैं, सोशलमीडिया के दुरूपयोग की घटनाएं बढ़ी हैं, दूसरी ओर राज्य की साइबर निगरानी बढ़ी है।नागरिक की निजता खत्म हो चुकी है।आज यूरोप और उत्तर अमेरिका पूरी तरह साइबर निगरानी में चले गए हैं।इस तरह की निगरानी पहले कभी नहीं थी।राज्य के खिलाफ बोलना अपराध घोषित हो गया है। ईमेल से लेकर सोशलमीडिया तक मोबाइल से लेकर एसएमएस तक निगरानी हो रही है।यह सीधे अभिव्यक्ति की आजादी के क्षय की सूचना है।दिलचस्प बात यह है कि हम सब इस पर एकदम चुप हैं।आखिर हम अभिव्यक्ति की आजादी पर हो रहे हमलों और साइबर निगरानी के सवालों पर फेसबुक आदि में बहस क्यों नहीं करते ॽअभिव्यक्ति की आजादी के सवाल पर मार्क्स ने जो बातें कही थीं उनमें से अनेक बातें आज भी साइबरयुग में भी मूल्यवान हैं।

कार्ल मार्क्स ने कहा की प्रेस की स्वतंत्रता के लिए जरूरी है पत्रकार स्वयं जाने, ज्ञान अर्जित करे।स्व-ज्ञान, बिना आत्म-स्वीकृति के संभव नहीं है।हम जो बात नहीं जानते उस पर न लिखें,पहले जानें फिर लिखें।लेखन में यदि कोई गलती हो जाए तो उसे सीधे स्वीकार करें।लिखते समय भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग करने से बचें,जिन भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करते हैं,कभी यह भी सोच लें कि उनका असली अर्थ क्या है। लिखने के नाम पर भारी-भरकम शब्दों में लिखने की आदत से बचें।जिस समय मार्क्स ने यह लेख लिखा उनकी उम्र मात्र 24साल थी,उन्होंने अपने जन्मदिन पर यह लेख Rheinische Zeitung´(No. 125, Supplement ,May 5 1842)प्रूशिया के समाचारपत्रों के प्रसंग में सेंसरशिप के सवालों पर विचार करते हुए "By a Rhinelander." नाम से लिखा था। यह लेख बहुत सराहा गया।जिस समय यह लेख लिखा गया उस समय भी प्रेस में वे तमाम प्रवृत्तियां थीं जो इन दिनों नजर आती है,धंधेखोरी,चालबाजियां,सनसनी आदि।

मार्क्स ने सवाल उठाया कि प्रेस की क्या जनता में दिलचस्पी है ॽ हम इसी सवाल को इस तरह उठाना चाहते हैं कि साइबर लेखकों यूजरों की क्या भारत की जनता में दिलचस्पी है ॽयदि साइबर लेखकों -यूजरों की भारत की जनता में दिलचस्पी है तो भारत सरकार निश्चित तौर पर उनके लिखे पर ध्यान देगी,लेकिन यदि साइबर लेखकों की भारत की जनता में दिलचस्पी नहीं है तो भारत सरकार उन पर ध्यान नहीं देगी,उनकी स्वतंत्रता की रक्षा पर ध्यान नहीं देगी।हम तो यही कहना चाहेंगे कि भारत की जनता,सरकार आदि से जुड़े सवालों पर जमकर लिखो,गंभीर से गंभीर विषयों पर बहस चलाओ लेकिन तैयारी करके,सतही ढ़ंग से नहीं।सतही,सनसनीखेज,गाली-गलौज,अपमान,ब्लैकमेलिंग की भाषा में साइबर लेखन,मीडिया प्रस्तुतियां बंद होनी चाहिए।

मार्क्स ने लिखा आप पत्रकार लोग जो लिखते हैं वह जनता में भूमिका अदा करे,जनता को सचेत करे।उसमें विवेक बोले,अनसुनी आवाजें सुनाई दें। मार्क्स ने लिखा कि पत्रकार में बच्चों जैसा संवेदनात्मक-व्यवहारिक गुण होना चाहिए।जिस तरह बच्चा अपनी सहज संवेदनात्मक भाषा के जरिए जगत से जुड़ता है उसी तरह की भाषा का उन्हें प्रयोग करना चाहिए।पत्रकार की संवेदनात्मक क्षमता बच्चों जैसी होनी चाहिए।बच्चों का पहला गुण है कि वे हर चीज को संवेदना के धरातल पर परखते हैं।नाक और मुँह के जरिए परखते हैं।अखबार का भी यही गुण होना चाहिए कि उसे भी हम बच्चों जैसी संवेदनात्मक अनुभूति की तरह महसूस करें।यानी जब सामान्य आदमी सहज ही अपनी संवेदनाएं अखबार के साथ जोड़ सके तो समझो अखबार सार्थक है।अखबार अपने मूल्य स्वयं बनाए,यानी अपनी साख स्वयं बनाए।

इस लेख में ही मार्क्स ने राजसत्ता के राजनीतिक मर्म का सवाल उठाया है,उन्होंने लिखा है राज्य को राजनीतिक मर्म से रहित नहीं होना चाहिए।राज्य की राजनीतिक स्प्रिट होनी चाहिए।मार्क्स जिस समय लिख रहे थे उस समय प्रूशिया राज्य की कोई राजनीतिक स्प्रिट नहीं थी,जिसकी उन्होंने आलोचना की। राज्य के यदि राजनीतिक हित होगे तो वो उस दिशा में सोचेगा।

भारत में राज्य के राजनीतिक हित हैं,राजनीतिक स्प्रिट है।धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक स्प्रिट इसका मूलाधार है।लेकिन मुश्किल यह है कि दलीय नेतृत्व की प्रकृति के कारण इस स्प्रिट के साथ घालमेल होता रहता है।मसलन् इन दिनों मोदी जी की सरकार है तो अखबारवालों की नजर हिन्दुत्व पर केन्द्रित है,जो कि गलत है।मोदीजी पीएम हैं,भाजपा सत्ता में है,लेकिन राज्य की राजनीतिक स्प्रिट का मूल स्रोत संविधान है,दल नहीं। शासकदल को तो संविधान की संगति में ही राजनीति करनी है,जहां वह संगति विकसित कर लेता है सहज काम करता है,जहां संगति विकसित नहीं कर पाता असहज काम करता है। मुश्किल यह है कि मीडियावाले संविधानजनित राजनीतिक स्प्रिट को भूल जाते हैं और शासकदल जनित स्प्रिट को प्रमुखता देने लगते हैं और यही से सारी मुसीबतें खड़ी हो रही हैं।

दलीयबोध से प्रेरित होकर जब खबरें लिखी जाएंगी तो असुविधा होगी।टकराव होगा।दलीयबोध अलगाव पैदा करता है।इन दिनों खबरें दर्शक भाव से लिखी जा रही हैं।दर्शक भाव सबसे खराब भाव है। मार्क्स ने प्रूशिया के सदन की कार्यवाही की रिपोर्टिंग के प्रसंग में जो सवाल उठाए हैं वे सवाल हमारी संसद के दोनों सदनों की मीडिया में आने वाली रिपोर्टिंग के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण हैं।संसद में होने वाली समस्त गतिविधि सार्वजनिक तथ्य है।इसे दर्शक की नजर से पेश करें या ऐतिहासिक दृष्टि से पेश करें ॽ मार्क्स ऐतिहासिक दर्शक के नजरिए से प्रस्तुत करने पर जोर देते हैं।

मोदीजी के सत्ता में आने के बाद से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने पर जोर है,इसके लिए ´जिम्मेदारी´ और ´सीमा´पदबंध का बार बार वित्तमंत्री अरूण जेटली और अन्य मंत्री इस्तेमाल कर चुके हैं।वे ´जिम्मेदारी´और ´सीमा´के दायरे में बांधकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को देख रहे हैं और इस आधार पर कानूनी प्रावधानों की रोशनी में रिपोर्टिंग करने पर जोर दे रहे हैं।दिलचस्प बात यह है कि उनके साथ कारपोरेट मीडिया का बहुत बड़ा अंश साथ में खड़ा है। ये लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को व्यापक परिप्रेक्ष्य में,संविधान के परिप्रेक्ष्य में रखकर नहीं देख रहे।







बुधवार, 20 जुलाई 2016

फेसबुक सूक्तियाँ




नियमित अच्छी चीजों को पढ़ने की आदत होनी चाहिए।नियमित रीडिंग बेहतर इंसान बनाती है।

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मनुष्य के अंदर का खालीपन सिर्फ दो चीजों से भरा जा सकता है ,वह है प्रेम और त्याग ।

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जो धर्म भय पैदा करे वह धर्म नहीं है,धर्म वह है जो अभय दे।

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रामचरित मानस में रचित राम को एक ही चीज पसंद है प्रेम।प्रामाणिक प्रेम प्रसन्नता का जनक है।

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सत्य के लिए आक्रामकता नहीं त्याग और विनम्रता चाहिए।

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सत्य को धैर्य के बिना नहीं पा सकते।वह स्वाभाविक चीज है।

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सद्गुरू सबसे समर्थ वैद्य है।

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श्रद्धा का स्थान फेसबुक नहीं मनुष्य का हृदय है।

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मानव समाज में विचारों का दान श्रेष्ठ दान है।

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अभिभावक के बिना लड़का-लड़की की पहचान होती है,जब पहचान होती है तो फिर हर जगह अभिभावक का नाम क्यों लिखते हो,सीधे नाम लिखो पता लिखो,बंदे के बारे में विवरण लिखो,अभिभावक पिता होगा या माँ,इन दोनों के दबाव से व्यक्ति की पहचान को निकालना चाहिए।व्यक्ति को व्यक्ति की तरह देखो,वंशधर की तरह नहीं।

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ग़ज़ब का फिल्मीगेम है ये फ़िल्म में हीरो -हीरोइन दोनों होते हैं लेकिन खबर बनती है सलमान की फ़िल्म हिट! अमीर की फ़िल्म हिट! कभी अनुष्का का भी नाम ले लिया करो मीडियावालो।हीरोइन के बिना फ़िल्म नहीं बनती फिर प्रचार में हीरो का ही जयगान क्यों ?

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मुख्य न्यायाधीश टी एस ठाकुर ने व्यंग्य करते हुए कहा "आखिर शादी के लिए जितनी पूछ आईएएस, इंजीनियर, डॉक्टर आदि अन्य

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पेशों के युवकों की है उतनी पूछ वकीलों की क्यों नहीं है? ऐसा इसलिए है क्योंकि आईएएस, इंजीनियर और चिकित्सक बनना उतना आसान नहीं है लेकिन जो देखो वही वकील बन जाता है। शायद यही कारण है कि शादी के लिए वकीलों की पूछ नहीं होती है।’

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ठठेरेबाजी और नॉनसेंस भाषा को एमटीवी आदि टीवी चैनल ने रियलिटी शो का अनिवार्य अंग बनाकर रद्दी को मुनाफे में बदल दिया है। आज के युवाओं को इस तरह के रियलिटी शो की तू-तड़ाक की भाषा प्रभावित कर रही है।

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मैं गंभीर लोगों से डरता हूं।मुझे गंभीरता नहीं व्यंग्य पसंद है।

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आत्मा,परमात्मा,अन्तर्मन,अंतर्दृष्टि,परमपिता,परम तत्व,परम,अन्तरात्मा आदि पदबंध अप्रासंगिक हो गए हैं।

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मेरे लिए फेसबुक खेल है और खेल में सूरदास के अनुसार- खेलन में को काकों गुसईंया। यानी सब समान हैं।

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किसी भी कला का ज्ञान मनुष्य को बूढा नहीं होने देता।

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धर्म पुरानी जीवन संहिता है,संविधान नई जीवन संहिता है। तय करो किस ओर हो तुम।

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सही ज्ञान वह है जो मनुष्य को सही-गलत की पहचान कराए।

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तर्क में परास्त करना सबसे घटिया चीज है,इससे आनंद नष्ट होता है।सुंदर तर्क वह है जो संवाद में खींचे,संवाद खुला रखे।

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बौद्ध धर्म की सबसे बड़ी कमजोरी है उसकी पुनर्जन्म की धारणा में आस्था।

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अंतर्दृष्टि जैसी कोई चीज नहीं होती।

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महाभारत तो कुरूक्षेत्र के बिना लिखा गया।

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पवित्रता सबसे घटिया शब्द है,इसने सबसे ज्यादा पीड़ित किया है।

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मोक्ष का मतलब मरना नहीं है, मोक्ष का मतलब मोह रहित सावधानी से जीना है।

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जो धर्म मातहत भाव का प्रचार करे वह धर्म नहीं अधर्म है।

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जिस तरह दुख की कोई सीमा नहीं होती,उसी तरह सुख की भी कोई सीमा नहीं है।

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विवेकहीन भक्ति और प्रेम अंततःदुख देते हैं।

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भक्ति और प्रेम में विधि निषेध नहीं होते,बल्कि सभी किस्म के विधि निषेधों का अंत हो जाता है।

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दुनिया से विरक्ति पैदा कर दे वह गुरू नहीं बल्कि दुनिया को समझाए वह है गुरू।

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व्यक्ति के विकास के लिए एकांत जरूरी है।

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आधुनिक धार्मिक प्रचारक इन दिनों धर्म-चर्चा कम राजनीतिक और व्यापारिक चर्चाएं ज्यादा करते हैं।इनमें से अधिकांश के साथ कारपोरेट घरानों में से कोई न कोई बंदा काम कर रहा है।धर्म इन सबके कारण अधर्म में रूपान्तरित हो गया है।धर्म यदि धर्म का मार्ग छोड़कर अन्य मार्ग ग्रहण कर ले तो समझो धर्म का अंत हो गया .वह राजनीति बन गया।दिलचस्प बात यह है कि इन नए धर्म प्रचारकों को टीवी बहुत पसंद है,बिना टीवी के इनके विचारों का प्रसार नहीं होता।टीवी से धर्म का प्रचार धर्म को धर्म नहीं रहने देता,बल्कि राजनीतिक बनाता है।

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सेना के लिए नई सोशलमीडिया नीति



भारत सरकार सेना के लिए नई सोशलमीडिया नीति लेकर आई है।यह नीति 2015 की नीति की तुलना में काफी उदार है।अब सेना के लोग खुलकर सोशलमीडिया का इस्तेमाल कर पाएंगे।उनको अपने पद,मूवमेंट,सेना के ऑपरेशन आदि की सोसलमीडिया में जानकारी शेयर न करने को कहा गया है।
‘Policy on Usage of Social Media’ नामक नीति में कहा है-
“The Rules suggested that serving officers and jawans of the Army can have media account on their name provided that the account holder doesn’t mention anything about his services including rank, place of posting, Unit and Corps etc. They will not upload photographs or videos or make comments while inter-acting on social media, which mentions specific information, unit or establishment,”
“As a general parameter, conduct which will be unacceptable in physical domain in the Army will also be unacceptable in the Cyber/ Social Media domain,”
“Indian Army recognizes the positive potential of social media platforms as exponentially faster means of conveying messages, information and opinions, important role the social media can play for the Army personnel in their personal life for keeping them in touch with their families and friends and in building a cohesive Indian Army Community while upholding its image as a disciplined and professional citizens.
“The social media can also serve as instrument for promoting national security and its values in mass internal communications for building, raising and sustaining morale of all ranks within the Army,”

नई नीति बुरहान वानी के सोशलमीडिया हीरो बनने के संदर्भ में लाई गयी है।खासकर जम्मू-कश्मीर में तैनात सेना को इससे मदद मिलेगी,अन्य इलाकों में काम करने वाले सैनिक भी लाभ उठा पाएंगे।

रविवार, 26 जून 2016

सोशल मीडिया के डिजिटल संस्कार

       फेसबुक पर अश्लील वीडियो पोस्ट करने,अश्लील गालियां लिखने,औरतों के प्रति अशालीन आचरण करने,गद्दी बातें लिखने वालों की संख्या बढ़ रही है। कायदे से फेसबुक प्रबंधकों को अश्लील, अपमानजनक भाषा और कामुक सामग्री आदि को निजी पहल करके सेंसर करना चाहिए। अश्लील -कामुक सामग्री और गालियां फेसबुक की आचारसंहिता का उल्लंघन है।सभी यूजरों को अश्लील भाषा और कामुक सामग्री के फेसबुक पर प्रचार-प्रसार का विरोध करना चाहिए।

फोटोग्राफी,डिजिटल तकनीक और विज्ञापनों के दबाब ने हमारे चेहरे-मोहरे सब बदल दिए हैं। खासकर नकली शरीर और नकली शक्ल की जो संस्कृति पैदा हुई है उसने असली चेहरे और असली शरीर के बोध ही खत्म कर दिया है। सवाल यह है कि नकली शक्ल और नकली स्कीन से हमारे नकली विचारों और व्यवहार का संबंध भी बन रहा है क्या ?उल्लेखनीय है भारत के मीडिया और सोशलमीडिया में बेरोजगारी, निरूद्योगीकरण और किसानों की बदहाली पर न्यूनतम कवरेज है । मीडिया से लेकर इंटरनेट तक सैलीब्रिटी चेहरे,फिल्म-टीवी,क्रिकेट आदि का ज्यादा कवरेज है। यह वस्तुतः डिजिटल संस्कृति है।इससे राजनीतिक अचेतनता बढ़ती है।

सोशल नेटवर्क और खासकर फेसबुक को जो लोग आजादी का मंच समझ रहे हैं वे गलतफहमी के शिकार हैं। फेसबुक का अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठानों ,जैसे सीआईए,एफबीआई आदि से याराना है,वे सभी फेसबुक यूजरों की नजरदारी कर रहे हैं,अब इसी पैटर्न पर भारत सरकार भी नजरदारी कर रही है। फेसबुक यूजर शालीनता,लोकतांत्रिकबोध और परिपक्व नागरिक की तरह इस माध्यम का इस्तेमाल करें।

हमारे समाज में मध्यवर्ग के एक बड़े तबके में फैशन की तरह ग्लोबलाईजेशन का प्रभाव बढ़ा है,सरकार की नीतियों में ग्लोबलाइजेशन का अंधानुकरण चल रहा है,यहां तक कि अब तो वे लोग भी ग्लोबलाइजेशन के पक्ष में बोलने लगे हैं जो कल तक उसका विरोध करते थे,ऐसे विचारकों और राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं की तादाद तेजी से बढ़ रही है, वे यह कह रहे हैं कि पूंजीवाद का अब कोई विकल्प नहीं है,ग्लोबलाईजेशन के तर्कों को मानने के अलावा और कोई विकल्प नहीं हैं। यही स्थिति ग्लोबल मीडिया चैनलों की है, उनके उपभोक्ताओं में किसी भी किस्म का प्रतिवाद का स्वर दिखाई नहीं देता बल्कि उल्टे राजनीतिक हल्कों में ज्यादा से ज्यादा चैनल और अखबार समूहों को अपने राजनीतिक रुझान के पक्ष में करने की होड़ चल निकली है।



समग्रता में देखें तो फेसबुक पर हम असहिष्णु समाज बना रहे हैं ?सामान्यतौर पर कम्युनिकेशन सहिष्णु बनाता है,लेकिन फेसबुक ने यूजर के अवचेतन को जगाया है। अवचेतन में पड़ी घृणा,गंदगी, अश्लीलता आदि को अभिव्यक्त करने का सहज मौका दिया है। हमें सोचना चाहिए कि चेतनमन को जगाते हैं या अवचेतन मन को? फिलहाल तो अवचेतन की हवा बह रही है। कम्युनिकेशन के लिए चेतनमन सक्रिय रहे तो सुरक्षा है वरना खतरे ही खतरे हैं।

सोशलमीडिया को लेकर भारत सरकार की सचेतनता का कोई अर्थ नहीं है। असलमें ,सबसे पहले भारत सरकार को पोर्न सामग्री के वितरण पर पाबंदी लगानी चाहिए। पोर्न दिखाना-बेचना अपराध है।इसके सामाजिक दुष्प्रभावों पर सारी दुनिया में बहस हो रही है। लेकिन केन्द्र सरकार और उसके विरोधीदल पोर्न के मामले पर चुप हैं।महिला संगठन भी चुप्पी लगाए हुए हैं।इंटरनेट पर आपत्तिजनक सामग्री की निगरानी को लेकर जारी विवाद के बीच नामी सर्च पोर्टल गूगल ने अपनी पारदर्शिता रिपोर्ट में जनवरी 2011 से लेकर जून 2011 के बीच सरकार की ओर से सामग्री हटाने की सिफारिशें जारी की हैं। गूगल ने बताया है कि इस अवधि में सरकार ने उससे 358 आइटम और 68 कंटेंट हटाने की मांग की थी, जिसमें से कंपनी ने 51 फीसदी मांगों को आंशिक या पूरे तौर पर मान लिया था।

गूगल ने बताया, 'राज्य और स्थानीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने हमसे सामाजिक नेताओं के विरोध में प्रदर्शन, आपत्तिजनक भाषा वाले वीडियो यू ट्यूब से हटाने के लिए कहा था। हमने इनमें से ज्यादातर वीडियो हटाने से मना कर दिया था और महज उन्हीं वीडियो को हटाया था, जिनके कारण समुदायों में रंजिश बढऩे की आशंका थी।

सोशल मीडिया के नियंत्रण के बारे में केन्द्र सरकार की चिन्ताएं अन्ना आंदोलन के समय सामने आ गयी थीं। मोदी सरकार आने के बाद भी केन्द्र सरकार का पुराना नजरिया बदला नहीं है।यह एक तरह से सोशल मीडिया की संचालक कंपनियों को धमकी है कि 'सावधान रहो अपने दायरे के बाहर मत जाओ।' विचारणीय बात यह है जो केन्द्र सरकार दूरसंचार विभाग को नहीं चला पायी और उसे निजी स्वामित्व में दे दिया। वह सोशलमीडिया को क्या नियंत्रित करेगी ! ये सिर्फ कागजी कानूनी शेरों की बातें हैं ! इसके बावजूद हम यह कहना चाहेंगे कि हमारे फेसबुक बंधुओं को शालीन भाषा,सभ्य राजनीति और संस्कृति के नए मानकों को बनाना चाहिए। फेसबुक पर गली-मोहल्लों की भाषा ,खासकर गाली-गलौज की भाषा से बचना चाहिए। अन्ना भक्तमंडली से लेकर भाजपा की वानरटोली तक यह फिनोमिना देखा गया है। इन लोगों के एक धड़े ने फेसबुक पर आएदिन जो गंदगी की है,उसने सोशलमीडिया की साख को बट्टा लगाया है।



फेसबुक पर यूजर्स की निजी सूचना निकालने और उसे विज्ञापनदाताओं को 'बेचने' का

आरोप है और इस मुद्दे पर उसे यूरोप में कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। ' संडे टेलिग्राफ ' की एक रिपोर्ट के अनुसार , फेसबुक अपने यूजर्स के राजनीतिक विचार, लैंगिक पहचान, धार्मिक आस्थाएं और यहां तक कि उनका अता-पता भी जमा कर रही है। यूरोपीय आयोग इस मुद्दे पर कार्रवाई करने की योजना बना रहा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि लोग चाहे अपना 'प्राइवेसी सेटिंग' कुछ भी रखें, फेसबुक अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर का उपयोग कर सोशल नेटवर्किंग साइट पर लोगों की गतिविधियों की सूचना जमा कर रही है और उसे विज्ञापनदाताओं को उपलब्ध करा रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरोपीय आयोग 2012 जनवरी में एक नया निर्देश जारी करने वाला है जिसमें इस तरह के विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है।

दूसरे उद्योगों की तरह भारतीय दूरसंचार के आंकड़े भ्रमित करने वाले हैं। देश में 85 करोड़ से अधिक पंजीकृत मोबाइल नंबर हैं। पर स्पेक्ट्रम आवंटन का ढांचा सेवा प्रदाताओं के लिए इनकी संख्या बढ़ाने में मदद करता है। इसमें से एक तिहाई नंबर ऐक्टिव नहीं हैं। बाकी बचे नंबरों में से भी कई उन ग्राहकों के नाम पर पंजीकृत हैं जो ऑफिस या निजी इस्तेमाल के लिए अलग-अलग नंबर रखते हैं। पिछले कुछ वर्षों से लगातार प्रति ग्राहक औसत राजस्व घटा है। इस कारण से सेवा प्रदाताओं का मुनाफा भी कम हुआ है। हर सर्किल में दर्जनों टेलीकॉम सेवा प्रदाता कंपनियां हैं। इनमें से कुछ ही पैसा बना पाती हैं और नई कंपनियां तो अब तक अपने निवेश का बड़ा हिस्सा तक नहीं वसूल पाई हैं। इस बदहाल अवस्था के बाद तो दूरसंचार क्षेत्र के निजीकरण को यहीं रोकना चाहिए।

सीईए के साथ समझौते और तकनीकी सहमेल के कारण फेसबुक अपने यूजर की प्राइवेसी में हस्तक्षेप और तांक-झांक कर रहा है। फेसबुक अधिकारियों के अनुसार फेसबुक अपने यूज़र के लॉग ऑफ करने के बाद भी इस बात पर नजर रखता है कि उसके यूजर्स कौन सी वेबसाइट विजिट कर रहे हैं।

चीन में इंटरनेट के 50 करोड़ के करीब यूजर हैं और सबसे शक्तिशाली इंटरनेट सेंसरशिप भी है। सर्वसत्तावादी एकतंत्र में यह व्यवस्था बेहद परेशानी खड़ी करने वाली है। नव्य आर्थिक उदारीकरण और विश्व व्यापार संगठन की नीतियों के दायरे में आने के बावजूद वहां पर इंटरनेट सेंसरशिप में कोई ढ़ील नहीं आयी है। कायदे से उसे अपने सिस्टम को और उदार बनाना था,लेकिन उन्होंने नहीं किया। चीन पर विश्व जनमत का भी कोई दबाव नहीं है।इसका अर्थ यही है कि लूट की उदारता में चीन हिस्सेदार है,लोकतांत्रिक छूट देने के मामले में चीन आज भी कंजरवेटिव है। चीन का मॉडल है राजनीति में सर्वसत्तावाद,आर्थिक क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कारपोरेट तंत्र,उपभोक्तावाद और सख्त सेंसरशिप।

भारत में फेसबुक और इंटरनेट पर साइबर हैकरों के हमले बढ़ गए हैं। अभी तक भारत फेसबुक संतों की शांत रमणस्थली था लेकिन विगत एक सप्ताह से साइबर अशांति की खबरें आ रही हैं। भारत सरकार के संस्थानों की बेवसाइट हैक करके नकली लोग अन्य देशों की बेवसाइट पर हमले कर रहे हैं। इसी तरह फेसबुक को बाजार में डाउन करने के लिए नए तरीकों से पोर्न सामग्री फेसबुक पर भेजी जा रही है। साइबर हैकरों की इन शैतानियों के प्रति सजगता जरूरी है। इस विषय पर फेसबुक दोस्तों को अपनी वॉल पर लिखना चाहिए।भारत में संचार क्रांति के दुरूपयोगों के प्रति सचेतनता बढ़ रही है। इंटरनेट,फेसबुक,सोशल साइट ,ब्लॉग आदि पर अपमानजनक बातें लिखने वालों के प्रति अब आम यूजर सचेत हो रहा है। इस सचेतनता के कारण ही एक युवक को एक लड़की के प्रति अपमानजनक और अशालीन बातें नेट पर लिखने के लिए अदालत ने 20हजार रूपये का जुर्माना लगाया है। आप भी आई टी एक्ट के प्रति जागरूक बनें ।

दूसरी ओर सीआईए ने फेसबुक और ट्विटर पर निगरानी तेज कर दी है। वे विभिन्न देशों में चल रही राजनीतिक और अन्य किस्म की गतिविधियों पर गहरी नजर रखे हैं। इसके आधार पर वे अपने रणकौशल को भी बदल रहे हैं ,साथ ही यूजरों का व्यापक प्रोफाइल भी बना रहे हैं। यह यूजरों की निजता का उल्लंघन है ?

इंटरनेट आने के बाद से ऑनलाइन छेडखानी ,उत्पीड़न और अपमान की घटनाओं में इजाफा हुआ है। मसलन् ,आस्ट्रेलिया में 2008 में की गयी रिसर्च में पाया कि 42प्रतिशत युवाओं को ह्रासमेंट का सामना करना पड़ा।एक अन्य सर्वे में 36 फीसद लड़कियों और 32 फीसद लड़कों ने ह्रासमेंट की शिकायत की। ऑनलाइन ह्रासमेंट की घटनाओं से भारत में भी एक बड़ा तबका परेशान है । लेकिन अभी तक ऑनलाइन ह्रासमेंट की सटीक अवधारणा विकसित नहीं हो पायी है ।

फेसबुक के 80 करोड़ यूजर हैं और उसकी विज्ञापनों से इस साल 4.27 बिलियन डालर की आमदनी हुई है जो उसकी सकल आय का 85 फीसदी है। ऐसे में फेसबुक पर मंथली चार्ज लेने की अफवाह उसके प्रतिद्वंद्वी सोशल मीडिया साइट के लोगों ने ही उड़ायी है। फेसबुक पर जो लिखा जाता है उस पर सहज में विश्वास न करें। उसकी अन्य स्रोतों से पुष्टि करें। फेसबुक पर अफवाहें भी चलती हैं।

फेसबुक पर कभी आर्थिक तबाही के घटनाक्रमों पर मित्रलोग बहस क्यों नहीं करते ? क्या भारत में आर्थिक खुशहाली आ गयी है ? क्या मंदी की मार के सवाल सताते हैं ? सवाल यह है फेसबुक को हम भारत की मूल समस्याओं का मंच क्यों नहीं बना पाए हैं ?

फेसबुक पर वर्चुअल कामुक औरतें सक्रिय हैं।ये फेसबुक और चैटिंग के बहाने मोहित करती हैं। वर्चुअल प्रेम में फंसाती हैं और अंतमें गहरी निराशा और हताशा में धकेल देती हैं। आज इनके एक शिकार युवा ने फेसबुक से विदा ले ली। कहने का अर्थ है फेसबुक पर वर्चुअल औरतों से चैटिंग ओर वर्चुअल प्रेम न करें। यह आत्मघाती है।

नए साइबर जमाने के युवाओं में लोकतांत्रिक प्रतिवाद की आकांक्षाएं कम है। यह समाज से विच्छिन्न है और पूरी तरह मोबाइल और सोशल नेटवर्किंग से सम्बद्ध है। इस युवा की मनोसंरचनाएं उपभोग,अकेलेपन , क्षण में पाने की आकांक्षा और प्रतिहिंसा ने निर्मित की है।

इंटरनेट महान है,फेसबुक महानतम है और लुढ़कता बाजार और आर्थिक मंदी इन सबसे महान है। संचार क्रांति और भूमंडलीकरण जिस स्वर्ग का सपना लेकर आए थे वहां इन दिनों वैचारिक-सांस्कृतिक सन्नाटा पसरा हुआ है। हमारे दोस्त इन सब सवालों पर चुप हैं । क्या ये सवाल बहस के लायक नहीं हैं ॽ

फेसबुक तो स्वर्ग की इन्द्रसभा है इसमें सुख है,आनंद है,विचार हैं,अमरता है,गान,संगीत, नृत्य, चित्र,मित्र सब हैं,इन्द्रसभा की तरह यहां रसोई ,खाना ,महंगाई ,मंदी ,राक्षस ,पति, पत्नी, संतान,समाज आदि की चिन्ता नहीं है। यहां सिर्फ रस , आनंद और अभिव्यक्ति है।यह सुखियों का संसार है।फेसबुक क्षणिक और अधूरी अभिव्यक्ति का माध्यम है।फेसबुक सिरपड़ों का खेल है,यहां अपरिचय के परिचय,बिना दीवार के वॉल,बिना स्याही कागज का लेखन,मुँह देखी मीठी बातें और खोखली प्रशंसाओं की लंबी सूची,सूचनाओं का ढ़ेर, बिना मांगे उपदेश,मजे की बातें,बोरिंग बातें,विज्ञापन और नकली व्यक्तिवाद का खोखला ताण्डव और फेसबुक का अरबों का धंधा।यानी फेसबुक उल्लू है उसकी सवारी लक्ष्मी करती है।फेसबुक में स्वर्ग और नरक भी हैं , स्वर्ग में उत्तर अमेरिका है वहां की 41 प्रतिशत आबादी ऑनलाइन है । नरक में विश्व की बाकी आबादी है जिसमें मात्र 10 प्रतिशत लोग ऑनलाइन हैं।अफ्रीका की मात्र 1 प्रतिशत आबादी ऑनलाइन है। ऑनलाइन स्वर्ग है और जो लाइन में है वो नरक में हैं। फेसबुक पर कुछ लोग हैं जो 11बजे के बाद अवतरित होते हैं वे फेसबुक के यक्ष-यक्षिणी हैं।

परवर्ती पूंजीवाद में सबसे बड़े किराए वसूलने वाले कारपोरेट घराने हैं। वे केबल टीवी से लेकर डीटीएच तक,इंटरनेट से टेलीफोन तक,डिस्नी लैंड से लेकर साइंस सिटी तक आम जनता से आनंद और कम्युनिकेशन के बदले किराया वसूलते हैं। यह किराया ही मोनोपोली कैपीटलिज्म के मुनाफे और आनंद का मूल स्रोत है। क्या इसके बाद भी हमें पूंजीवाद से प्यार करना चाहिए ?

पूंजीवाद में कोई भी कम्युनिकेशन फोकट में नहीं होता।दूरसंचार -मीडिया के इजारेदार घरानों की मुनाफाखोरी के बिना नहीं होता। मसलन् फेसबुक,ब्लॉग आदि इंटरनेट कम्युनिकेशन के लिए हम किराया देते हैं। दूरसंचार मुगल इस किराए से अमीर बनते हैं।यह परवर्ती पूंजीवाद का किराए का कम्युनिकेशन है और इसी अर्थ में बुर्जुआ कम्युनिकेशन है।

फेसबुक के मित्र किस विचारधारा के हैं यह जानने का आसान तरीका है कि वे किन विषयों पर वॉल पर लिखते हैं,किन विषयों पर अन्यत्र जाकर पढ़ते हैं और आमतौर पर उनकी किस तरह के राजनीतिक-आर्थिक सवालों में रूचि रखते हैं ? टिप्पणी करते हैं ?सवाल यह है कि क्या फेसबुक विचारधारारहित कम्युनिकेशन है ? फेसबुक पर शिक्षित युवा और अधेड़ आमतौर पर जिस भाषा का प्रयोग करते हैं वो प्रतिगामी भाषिक- सांस्कृतिक मनोदशा की अभिव्यक्ति है। ये,नकली फोटो लगाना, गलत सूचनाएं देना,विभ्रम की बातें करना,अश्लील भाषा या द्वयर्थक भाषा में लिखना,चैट करते हुए किसी भी लिंक को भेज देना आदि। अनेक लोग हैं जो फेसबुक पर लड़की देखी और लगे पीछा करने, ये लोग फेसबुक पर लड़की को पीछा किए बिना क्यों नहीं रह पाते ? पहले दोस्त बनाते हैं फिर चैट में पीछा करते हैं,क्या यह नेट पर स्त्री उत्पीड़न है ?

इंटरनेट पर सत्ता की नजरदारी लगातार बढ़ रही है।लैटिन अमेरिका में इंटरनेट को राजनीतिक औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।प्रतिवादियों पर नजर रखी जा रही है,उन पर नियंत्रण लगाया जा रहा है। पेरू से लेकर बोलविया तक इंटरनेट की नजरदारी हो रही है। ईमेल,फेसबुक,ब्लॉग,ई मूवमेंट आदि पर विभिन्न तरीकों से नजर रखी जा रही है। यह नेट प्राइवेसी का अंत है।

इंटरनेट और कम्प्यूटर का ज्यादा उपयोग स्मृति में संचित करने की दिशा बदल सकता है। आमतौर पर अभी वैज्ञानिक नहीं जानते कि इससे मनुष्य की स्मृति का क्षय हो रहा है या स्मृति समृद्ध हो रही है। लेकिन मन के बाहर जो चीज संग्रहीत करना चाहते हैं उसके लिए इंटरनेट और कम्प्यूटर सुंदर माध्यम और संग्रहशाला है। मनुष्य का दिमाग इस मीडिय़म की संगति में धीरे धीरे बदल रहा है।

यह संचार क्रांति की आजादी के अंत की बेला है। संचार क्रांति ने जिस तरह की स्वतंत्रता और प्राइवेसी का आरंभ में वायदा किया था उसका धीरे धीरे अंत हो रहा है। आम लोगों की प्राइवेसी को नियंत्रित और नियोजित किया जा रहा है। बेहतर है नेट की दुनिया में हम अपने निजी पत्ते न खोलें।

साइबर साँड मात्र शब्दों से ही अपमानित नहीं करते वे इलैक्ट्रोनिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। मसलन वे किसी को अपमानित या परेशान करने के लिए गंदे,अश्लील वीडियो फेसबुक की वॉल पर लगा देते हैं।अपमानजनक एमएमएस या ईमेल करते हैं। अपमानजनक या नेगेटिव साइबर टेक्स्ट भेज देते हैं।

साइबर बांस करने के तरीके क्या हैं- पहला तरीका है आघात पहुँचा,अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना,सेक्सुअल लैंग्वेज का इस्तेमाल करना, परेशान करना,मसलन् , बार-बार यह कहना 'बात कीजिए प्लीज' आदि । जो व्यक्ति इस तरह की भाषा का प्रयोग कर रहा है वह कितनी बार दोहराता है अपने व्यवहार को,महिने में एक बार,दो बार ,तीनबार या रोज।इससे आप उसके असंतुलन का अंदाजा सहज ही लगा सकते हैं।साइबर साँड मूलतःसामाजिक जीवन में मौजूद दादागिरी का ही साइबर रूप है। साइबर साँड ज्यादातर वे युवा और तरूण हैं जो एडजेस्टमेंट प्रॉब्लम के शिकार हैं। इसे साइबर भाषा में रिस्क ग्रुप में रखा जाता है और ये लोग भिन्न किस्म के व्यवहार की मांग करते हैं।साइबर पंगेबाज को साइबर बैल कहना ज्यादा सही होगा।वे अपनी नेगेटिव हरकत को बार बार दोहराते हैं। मसलन् साइबर बैल चैट में आकर पूछते हैं '' क्या आप मुझे पसंद करते हैं'। 'सेक्स करोगे',या वे कोई व्यक्तिगत आक्षेप करने वाले वाक्य या शब्द का इस्तेमाल कर बैठते हैं। साइबर स्पेस में किया गया एक नेगेटिव एक्शन दूरगामी असर छोड़ता है। नेगेटिव एक्शन की पुनरावृत्ति तुरंत प्रतिक्रिया पैदा कर सकती है।साइबर पंगेबाज कैसे लोग होते हैं ,किस उम्र के होते हैं,उनके पंगा लेने का तरीका क्या वे साइबर कम्युनिकेशन में कैसे परेशान करते हैं। इसे साइबर में 'बांस' करना भी कहते हैं।पश्चिम में इसमें ज्यादातर 10-18साल की उम्र के तरूण आते हैं।भारत में ऐसे लोगों में वयस्कों की संख्या ज्यादा है। इन लोगों का काम है नेट,फेसबुक,ब्लॉग,ईमेल,चाट आदि के जरिए आघात पहुँचाना।ये नेगेटिव एक्शन में ज्यादा रहते हैं।

नेट पर किए गए अनेक अनुसंधान बताते हैं कि जो ज्यादा चैट ,ईमेल और शॉपिंग करते हैं उनमें अवसाद के लक्षण ज्यादा होते हैं।ताइवान के कॉलेज छात्रों में किए अध्ययन से पता चला है कि इंटरनेट की लत का पढ़ाई ,दैनिक रूटीन पर असर होता है। जिनको लत है वे अवसाद में कष्ट पाते हैं।फेसबुक की बढ़ती आदत ने अमेरिकी तरूणों की स्कूली पढ़ाई को प्रभावित किया है।इंटरनेट में उन्हीं यूजरों के साथ दुर्व्यवहार या एब्यूज की घटनाएं देखी गयी हैं जिनमें आमने-सामने बात करने की क्षमता का अभाव होता है अथवा जो अवसाद में रहते हैं।रिसर्च में पाया गया है कि इंटरनेट यूजरों में जो अकेलेपन में नहीं हैं वे भावनात्मक सहयोगी की तलाश में नेट पर आते हैं। ऑनलाइन मित्र यहां ऑफलाइन मित्रों से मिलकर संतोष पाते हैं। इस तरह के यूजर भी हैं जो मनो व्यथाओं के शिकार हैं और अपनी व्यथा का समाधान खोजने आते हैं। इनमें बेचैनी,अवसाद और आत्मविश्वास की कमी देखी गयी है।

सन् 1990 के आसपास जब इंटरनेट का चलन तेज हुआ तो उस समय इसे लेकर भय और उत्साह का भाव था।आरंभ के शोध बताते हैं इंटरनेट के उपयोग ने अकेलेपन ,अवसाद और तनाव में वृद्धि की।नेट विशेषज्ञों का मानना है कि संचार की नई तकनीक के कारण हठात कम्युनिकेशन बढ़ जाने का सामाजिक-मनोवैज्ञानिक नकारात्मक असर होता है। इससे लत और अवसाद की जुगलबंदी पैदा होती है।क्या सोशल मीडिया नेटवर्क में गालियों का वही स्थान है जो उसे हमने सामाजिक जीवन में दिया है ? क्या सोशल मीडिया गालियों से ऊर्जा प्राप्त करता है ?गालियां संवादहीनता का संकेत है ।

फेसबुक आने के बाद विरही-विरहिणियों की संख्या बढ़ी है या घटी है ? विरह का प्रसार हुआ है या अवसान हुआ है ?मनमाने ढ़ंग से अपनी बात कहने का ढ़ंग अभागों का ढ़ंग है।कहते-कहते ऐसा भी कुछ सुनने को मिल जाता है जो पहले कभी नहीं सुना था।कहने के स्रोत में जब ज्वार आता है तब न जाने किस गुफा के भीतर की अनजान सामग्री बहती-बहती आकर घाट पर लग जाती है। क्या आपने ऐसा अनुभव किया है ?



सौंदर्य मनुष्य को संयम की ओर खींचता है,शालीनता का विकास करता है। इसके अलावा हमारी क्षुधा तृप्ति के साथ -साथ सदा उच्चतर सुर जगाता है।फेसबुक ने आम लोगों में खासकर मध्यवर्ग के लोगों में झूठ बोलने,फुसलाने,हां में हां मिलाने या निरर्थक समय खर्च करने की आदत में इजाफा किया है। छद्म या आभासी यथार्थ में जीने की भावना को पुख्ता बनाया है। आदमी का कम्युनिकेशन फास्ट किया है लेकिन संचार ,समाज ,व्यक्ति और वस्तु के बीच में महा-अंतराल पैदा किया है।फेसबुक यूजरों की संख्या 70 करोड़ के करीब हो गई है। आश्चर्यजनक बात है कि अमेरिका में फेसबुक यूजरों की संख्या में 6 मिलियन की गिरावट आई है।इसी तरह कनाडा,रूस,ब्रिटेन,नार्वे में फेसबुक यूजरों की संख्या घटी है। लेकिन विकासशील देशों में बढ़ रही है। क्या अमेरिकी लोग त्रस्त हैं फेसबुक से ?क्या फेसबुक सामाजिक-भावनात्मक अलगाव पैदा कर रहा है ?फेसबुक की खूबी है "जान ना पहचान मैं तेरा मेहमान",अनजाने लोगों से राजनीतिक-सामाजिक चर्चा तो ठीक है लेकिन इमोशनल बातें करना,व्यक्तिगत जानकारियां देना खतरनाक है।



शनिवार, 14 मई 2016

औरत के हक में और संशय के प्रतिवाद में


      फ़ेसबुक से लेकर मासमीडिया तक , नेताओं से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं तक औरतों के प्रति संशय और संदेह का वातावरण बन रहा है । औरत हो या पुरुष किसी पर भी संदेह या संशय के आधार पर बातचीत नहीं करनी चाहिए ।मानवीय सभ्यता के विकास में मानवीय भरोसे और विश्वास की बड़ी भूमिका रही है। कभी-कभार इन संबंधों में विपर्यय भी देखा गया है।औरतों में बहुत छोटा किंतु नगण्य अंश है जो विश्वासघात भी करता रहा है । यह पहले भी था और आगे भी रहेगा ।

मानवीय संबंध स्त्री-पुरुष संबंधों के बिना नहीं बनते । नए युग में इन संबंधों का स्वरुप नए ढंग और तरीक़े से बनाना होगा । नए मानवीय मूल्यों को औरतें भी अर्जित कर रही हैं ।वे निडर होकर जीने की कोशिश कर रही हैं ,हमें उनकी इस कोशिश में हर संभव मदद करनी चाहिए ।औरत निडर और आधुनिक बनेगी तो वह हमारी पुरानी आस्थाओं को तोड़ेगी और चुनौती भी देगी ।हम सभी लोग औरत के इस नए परिवर्तन को समझ नहीं पा रहे हैं ।

औरत बदलती है तो सबसे पहले पुरानी आस्थाएँ टूटती हैं , औरत का पुराना स्टीरियोटाइप टूटता है । इस क्रम में अनेक मर्दों और औरतों को त्रासदियाँ झेलनी पड़ सकती हैं।औरत का बदलना और समाज में निडर होकर घूमना, बातें करना , मिलना -जुलना , मित्रों के साथ शाम गुज़ारना , पुरुष के साथ निडर होकर घुलना-मिलना सामान्य और सही प्रवृत्ति है।औरत जितनी निडर होगी समाज में पोंगापंथ , साम्प्रदायिकता, फंडामेंटलिज्म, लिंगभेद उतना ही कम होगा या इन सबसे लड़ने में मदद मिलेगी ।

औरत के साथ नए युग के अनुसार हमें व्यवहार करना सीखना होगा । औरत के प्रति संशय या संदेह मूलतः पितृसत्तात्मकता की अभिव्यक्ति है । पितृसत्ता की विचारधारा सामाजिक विकास में सबसे बड़ी बाधा है । पितृसत्ता तो समाजवाद, पूँजीवाद की भी अम्मा है ।हिंदी में कहावत है चोर को न मारो चोर की अम्मा को मारो। लिंगभेद या औरत के प्रति अविश्वास की अम्मा है पितृसत्ता । यह बेहद बारीक ढंग से काम करती है और इसके रुपों से लड़ने के लिए बेहद सतर्क प्रयासों की ज़रुरत है ।

पितृसत्ता का महान गुण है कि वह स्वयं पर संदेह करना नहीं सिखाती । हम सब में पितृसत्ताप्रेम वैचारिक तौर पर कूट-कूटकर भरा है । औरत जब घर से निकलती है , अपने दुख सार्वजनिक करती है या सुख की सार्वजनिक अभिव्यक्ति करती है तो पितृसत्ता को धक्का लगता है और यही धक्का हम अपने अंदर महसूस करते हैं और काँपने लगते हैं , औरत पर संदेह करने लगते हैं ।

औरतों की हाल में जितनी भी सही-ग़लत शिकायतें आई हैं वे पितृसत्ता को कमज़ोर कर रही हैं और इस प्रक्रिया को किसी भी क़ीमत पर रुकना नहीं चाहिए । इस प्रक्रिया में अनेक श्रेष्ठ पुरुषों की बलि भी चढ़ेगी और यह अस्वाभाविक नहीं है । जिनको हम महान,निष्कलंक और निर्दोष मान रहे हैं उनके पितृसत्तात्मकता अपराधों को अपराध नहीं मानते उलटे पुण्य कार्य या सही काम मानते हैं । औरत का हर एक्शन पुरुष की महानता का निषेध है । पितृसत्ता को धराशायी करने वाली सबसे बड़ी बाधा यही महान श्रेष्ठ लोग हैं जो विभिन्न रंगतों और विचारधाराओं में हमारे बीच वैचारिक वैधता का आदर्श लिए खड़े हैं ।

औरत का सामान्य जीवन , सामान्य आचरण परिभाषित करने के लिए औरत के नज़रिए से चीज़ों को देखने की आदत विकसित करनी होगी । हमारे मीडिया का वर्चस्वशाली विमर्श ,चैटिंग,फ़ेसबुक कमेंट्स आदि पूरी तरह पितृसत्तात्मकता के आवरण में आ रहे हैं । औरत का हर एक्शन इस आवरण को छिन्न- भिन्न करता है । वह जब भी बोलती है तो पितृसत्ता को कमज़ोर करती है ,वह जब पुरुषों से सार्वजनिक या निजी तौर पर मिलती है तो अपना स्पेस बना रही होती है ।

औरत की समस्या है कि उसके पास भारत में निजी स्पेस और सार्वजनिक स्पेस बहुत कम है।औरत के लिए निजी और सार्वजनिक स्पेस के अभाव को हमने कभी गंभीरता से नहीं लिया । नई सक्रिय औरत अपनी नई दुनिया रच रही है । जिसमें वह क्रमश: वर्जनाओं और सामाजिक बंदिशों से लड़ रही है । इधर दो दशकों में औरतों पर ख़ासकर शिक्षित औरतों पर हमले तेज़ी से बढ़ें हैं । वह जब इनका प्रतिवाद करती है तो तरह तरह के बहाने खोजकर हमलोग औरत को दोषी ठहराने या फिर उदार मूल्यों पर ही हमले करने आरंभ कर देते हैं ।

भारत के विकास के लिए औरत पर अविश्वास करने की ज़रुरत नहीं है । औरत पर संशय के नज़रिए से सोचने की ज़रुरत नहीं है । औरत पर अविश्वास करनासामाजिक विकास के चक्र को उलटी दिशा में मोड़ना है ।ठगने ,झूठ बोलने या छल का काम औरत करें या मर्द करें हमें सतर्क रहना चाहिए और प्रतिवाद करना चाहिए । कोई औरत झूठे इल्ज़ाम लगाए तो झूठे इल्ज़ाम का विरोध करो , औरतों के ख़िलाफ़ संशय पैदा मत करो । क़ानून में इस तरह के प्रावधान होने चाहिए जिससे ग़लत इल्ज़ाम लगाने पर औरत को भी दण्डित किया जा सके । मौजूदा दौर में अनेक मामलों में औरतों के द्वारा ग़लत आरोपों के संगीन मामले सामने आए हैं और इस तरह के मामलों में क़ानूनी प्रक्रिया की मदद ली जानी चाहिए ।

औरत की सामाजिक बराबरी की लड़ाई का यह सबसे कठिन दौर है । औरत का आज जितने बडे कैनवास में सामाजिक एक्सपोजर हो रहा है उतना पहले कभी नहीं हुआ । फलत: हम आए दिन नई स्त्री समस्याओं और चुनौतियों से दो-चार हो रहे हैं । इस प्रक्रिया से किनाराकशी या इसे रोकने के प्रयास निश्चिततौर पर असफल होंगे। औरत घर से निकली है तो वह अपने रास्ते , अपना संसार भी बनाएगी और इस काम में हम सबको औरत पर विश्वास और मित्रता का भाव बनाए रखना होगा । आज औरत को संरक्षक की नहीं मित्र की ज़रुरत है । हमारे मन में बैठा यही संरक्षक भाव औरत की नई हक़ीक़त को समझने में बाधाएँ पैदा कर रहा है । औरत की नई हक़ीक़त को मित्रभाव से ही समझ सकते हैं और यहपरिवर्तन हमें अपने व्यवहार में करना पड़ेगा ।

भारत में स्त्री और सामाजिक समूहों के साथ दो तरह का भेदभाव और शोषण पाया जाता है, पहला ,सामाजिक शोषण और भेदभाव के रुप में है ,और दूसरा ,केजुअल शोषण और भेदभाव है । केजुअल शोषण और भेदभाव भी उतना खराब और निंदनीय है जितना सामाजिक भेदभाव और शोषण। इस केजुअल भेदभाव का एक रुप साम्प्रदायिक-अंधक्षेत्रीयतावादी नजरिए में भी व्यक्त होता रहता है । हम मुसलमानों और अन्य समूहों के प्रति हंसी-मजाक में अपनी भेददृष्टि को व्यक्त करते रहते हैं । खासकर मीडिया में यह रुप व्यापक है। मीडिया ( फिल्म,टीवी और अखबार के कार्टून सीरीज) ने केजुअल भेदभाव को वैध बनाने में बड़ी भूमिका अदा की है। भेदभाव किसी भी रुप में हो केजुअल हो या अन्य रुप में हो वह स्वीकार्य नहीं है । अफसोस यह है कि हम केजुअल भेदभाव के प्रति अभी तक सचेत नहीं हो पाए हैं ।

यह सच है पुराने कानून में अनेक स्त्री विरोधी प्रावधान रहे हैं लेकिन हमारे यहां कानूनी संतुलन को असंतुलन में बदलने की कला में अ-सामाजिक तत्व सफल रहे हैं । कानून जेण्डर संतुलन और संरक्षण के साथ काम करे,इसके लिए कानून के दुरुपयोग को रोकने वाली सामाजिक-राजनीतिक संरचनाएं बनायी जाएं । साथ ही अपराधी बचने न पाएं और जल्दी न्याय हो । सरकार सारे कर्म करने के बावजूद जल्द न्याय की व्यवस्था करने में असफल रही है ।औरतों की राय को परम पवित्र मानने वाले भारतीय फेमिनिस्टों को जरा औरतों के बारे में यूरोप की फेमिनिस्टों की राय पर भी गौर करना चाहिए। औरत के नाम पर अंधा विमर्श या स्त्री फंडामेंटलिज्म वस्तुतः स्त्री विरोधी है । भारत की स्त्री अधिकार रक्षक संस्थाएं और विदुषियां भारतीय औरतों की नकारात्मक और समाज विरोधी धारणाओं की कभी आलोचनाएं नहीं लिखतीं यह त्रासद है।





गुरुवार, 12 मई 2016

फेसबुक पापाचार


एक सज्जन हैं और लेखक हैं। लेकिन फेसबुक पर लड़की देखकर लंपट भावबोध में चले जाते हैं।फेसबुक पर उनके कुकर्म देखें ,फेसबुक में कुकर्म भाषा में होता है।जैसे, हलो, कैसी हो,अकेली हो,मैं तो अंधेरे में बैठा हूँ। वगैरह -वगैरह।
अब इन जनाब को कौन समझाए कि जान न पहचान बड़े मियाँ सलाम करके लड़की देखी और पीछे हो लिए।काश,ये जनाब सभ्य हो पाते !
जीवन में कमीनापन पसंद नहीं करते तो फेसबुकलेखन में कमीनापन कैसे मान लें। कमीनेपन की लेखन में कोई जगह नहीं है। कमीनापन असभ्यता है। लेखन का काम है कमीनेपन को नंगा करना, न कि कमीनापन करना।
फेसबुक पर सक्रिय पापबुद्धि का एक और रुप है, हाल ही में जिस दिन समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया तो मैंने उसदिन कई पोस्ट लगायीं। एक जनाब चैटिंग में आए और लगे बतियाने,बोले अजी सर,अब आपके पास तो कई समलैंगिकों के प्रस्ताव आ जाएंगे। अब आपलोग ही बताएं इस तरह की मनोदशा के लोगों का पागलखाने के अलावा और कहीं इलाज संभव है ?
     फेसबुक पर पापाचार का आलम यह है कि पढ़ी-लिखी लड़कियों को दुष्टलोग आए दिन सताते हैं। सताने के तरीके जानें - शुरु होतेही कहेंगे, हलो,कैसी हो,इसके बाद नाम-पता-अभिरुचि आदि जानेंगे फिर कहेंगे लेख आदि लिखती हो तो भेजो मैं फलां फलां पत्रिका निकालता हूँ ,मैं फलां प्रकाशक को जानता हूँ, इसके बाद डर्टी भाषा में चले जाते हैं। मैसेज बॉक्स को गंदे संदेशों और फोटो से भर देते हैं। इस तरह के व्यक्ति को नामर्द कहते हैं।फेसबुक पर लड़की की मित्रता मिलती तो उपहार की तरह है लेकिन यदि उसका लंपटगिरी के लिए इस्तेमाल किया जाता है तो हमारे देश में बड़े जालिम कानून हैं लंपटो !!
     फेसबुक पापाचार का नया रुप है लड़की को देखकर उन्मत्त हो जाना । उसकी व्यस्तता और खाली समय की खोजबीन करना। गैर जरुरी पर तौर प्रशंसा करना ।यह फेसबुक पर हताश मन की अभिव्यक्ति है।
फेसबुक पर लड़की देखते ही प्रशंसा करना। मुखमंडल या फोटो पर बलिहारी- बलिहारी हो जाना।यह बीमारी है। फेसबुक पर लड़की को सुंदर और वांछनीय मानना अंततःपापाचार है। इसका वास्तव भावनाओं से कोई सरोकार नहीं है। यह फेसबुक लंपटगिरी है।फेसबुक पर कोई लड़की किसी लड़के से बात करती है तो इसका यह अर्थ नहीं है कि वे प्रेम करते हैं। फेसबुक कम्युनिकेशन प्रेम की नहीं सामान्य कम्युनिकेशन की जगह है। फेसबुक पर अनजान लोगों में ,खासकर लड़की के प्रति घनिष्ठता का प्रदर्शन मात्र कम्युनिकेशन है ,यह न मित्रता है ,और न घनिष्ठता है।
फेसबुक पर लड़कियां स्वतंत्र नहीं होतीं। यहां पर भी उनकी घेराबंदी होती रहती है। स्त्री को मर्दवादी मानसिकता की अभिव्यक्ति के लिए उकसाने का सबसे अच्छा तरीका है औरत को बेबकूफियां करने वाले वाक्य या पोस्ट लिखने दो और धड़ाधड़ लाइक करते जाओ। यह फेसबुक लंपटई का नया देशी मुहावरा है।फेसबुक लंपटता मर्द की अल्पकालिक शाब्दिक तड़प है।
फेसबुक कल्चर स्वस्थ कल्चर बने और इसे फेक होने से यथासंभव बचाएं।यह बडा माध्यम है कम्युनिकेशन का। फेसबुक पर ज्यादा से ज्यादा यथार्थवादी-मानवीय और सरल बनें।तर्क करें और पंगे न करें। नई बातें लिखें ,अपमान न करें। आलोचना लिखें,गाली न दें या हेयभाषा न लिखें। यह नया कम्युनिकेशन है और इसका शास्त्र अभी रचा जाना है।
जिस तरह समाज में मूर्खों की कमी नहीं है ,वैसे ही फेसबुक पर भी मूर्खों की कमी नहीं है,वे बिना बुलाए चले आते हैं। जिस तरह समाज में फंडामेंटलिस्ट और अविववेकवादी हैं, फेसबुक पर भी हैं। फेसबुक को समृद्ध करने का तरीका है मूर्खों और अविवेकवादियों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाए। अविवेकवादी-फंडामेंटलिस्ट किसी भी दल में हो सकते हैं। हम उनको पहचानें और छोडें।
फेसबुक कल्चर है असहमत के साथ बैठना,कम्युनिकेट करना और आलोचना करना। "हेट " ,"निंदा "या "घृणा" से दूर रहना। मोदी हो या फंडामेंटलिस्ट हों या कांग्रेसी हों हम इनको पसंद नहीं करते, फिर भी ये लोग समाज में हैं तो इनकी हरकतों की बार बार आलोचना करते हैं।आलोचना करना लोकतंत्र में जीना है। यह विरोधी को गले लगाना नहीं है।
     फेसबुक शरीफों का वधस्थल है। यहां पर कम्युनिकेशन तो है ही ,वध भी होता है । खासकर यदि कोई व्यक्ति जनप्रिय हो। उसकी समाज में साख हो तो उसका जनता की आलोचना से बचना मुश्किल है ।


मंगलवार, 10 मई 2016

सोशलमीडिया के डिजिटल संस्कार-

                फेसबुक पर अश्लील वीडियो पोस्ट करने,अश्लील गालियां लिखने,औरतों के प्रति अशालीन आचरण करने,गद्दी बातें लिखने वालों की संख्या बढ़ रही है। कायदे से फेसबुक प्रबंधकों को अश्लील, अपमानजनक भाषा और कामुक सामग्री आदि को निजी पहल करके सेंसर करना चाहिए। अश्लील -कामुक सामग्री और गालियां फेसबुक की आचारसंहिता का उल्लंघन है।सभी यूजरों को अश्लील भाषा और कामुक सामग्री के फेसबुक पर प्रचार-प्रसार का विरोध करना चाहिए.

फोटोग्राफी,डिजिटल तकनीक और विज्ञापनों के दबाब ने हमारे चेहरे-मोहरे सब बदल दिए हैं। खासकर नकली शरीर और नकली शक्ल की जो संस्कृति पैदा हुई है उसने असली चेहरे और असली शरीर के बोध ही खत्म कर दिया है। सवाल यह है कि नकली शक्ल और नकली स्कीन से हमारे नकली विचारों और व्यवहार का संबंध भी बन रहा है क्या ?उल्लेखनीय है भारत के मीडिया और सोशलमीडिया में बेरोजगारी, निरूद्योगीकरण और किसानों की बदहाली पर न्यूनतम कवरेज है । मीडिया से लेकर इंटरनेट तक सैलीब्रिटी चेहरे,फिल्म-टीवी,क्रिकेट आदि का ज्यादा कवरेज है। यह वस्तुतः डिजिटल संस्कृति है।इससे राजनीतिक अचेतनता बढती है।

सोशल नेटवर्क और खासकर फेसबुक को जो लोग आजादी का मंच समझ रहे हैं वे गलतफहमी के शिकार हैं। फेसबुक का अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठानों ,जैसे सीआईए,एफबीआई आदि से याराना है,वे सभी फेसबुक यूजरों की नजरदारी कर रहे हैं,अब इसी पैटर्न पर भारत सरकार भी नजरदारी कर रही है। फेसबुक यूजर शालीनता,लोकतांत्रिकबोध और परिपक्व नागरिक की तरह इस माध्यम का इस्तेमाल करें।

हमारे समाज में मध्यवर्ग के एक बड़े तबके में फैशन की तरह ग्लोबलाईजेशन का प्रभाव बढ़ा है,सरकार की नीतियों में ग्लोबलाइजेशन का अंधानुकरण चल रहा है,यहां तक कि अब तो वे लोग भी ग्लोबलाइजेशन के पक्ष में बोलने लगे हैं जो कल तक उसका विरोध करते थे,ऐसे विचारकों और राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं की तादाद तेजी से बढ़ रही है, वे यह कह रहे हैं कि पूंजीवाद का अब कोई विकल्प नहीं है,ग्लोबलाईजेशन के तर्कों को मानने के अलावा और कोई विकल्प नहीं हैं। यही स्थिति ग्लोबल मीडिया चैनलों की है, उनके उपभोक्ताओं में किसी भी किस्म का प्रतिवाद का स्वर दिखाई नहीं देता बल्कि उल्टे राजनीतिक हल्कों में ज्यादा से ज्यादा चैनल और अखबार समूहों को अपने राजनीतिक रुझान के पक्ष में करने की होड़ चल निकली है।



समग्रता में देखें तो फेसबुक पर हम असहिष्णु समाज बना रहे हैं ?सामान्यतौर पर कम्युनिकेशन सहिष्णु बनाता है,लेकिन फेसबुक ने यूजर के अवचेतन को जगाया है। अवचेतन में पड़ी घृणा,गंदगी, अश्लीलता आदि को अभिव्यक्त करने का सहज मौका दिया है। हमें सोचना चाहिए कि चेतनमन को जगाते हैं या अवचेतन मन को? फिलहाल तो अवचेतन की हवा बह रही है। कम्युनिकेशन के लिए चेतनमन सक्रिय रहे तो सुरक्षा है वरना खतरे ही खतरे हैं।

सोशलमीडिया को लेकर भारत सरकार की सचेतनता का कोई अर्थ नहीं है। असलमें ,सबसे पहले भारत सरकार को पोर्न सामग्री के वितरण पर पाबंदी लगानी चाहिए। पोर्न दिखाना-बेचना अपराध है।इसके सामाजिक दुष्प्रभावों पर सारी दुनिया में बहस हो रही है। लेकिन केन्द्र सरकार और उसके विरोधीदल पोर्न के मामले पर चुप हैं।महिला संगठन भी चुप्पी लगाए हुए हैं।इंटरनेट पर आपत्तिजनक सामग्री की निगरानी को लेकर जारी विवाद के बीच नामी सर्च पोर्टल गूगल ने अपनी पारदर्शिता रिपोर्ट में जनवरी 2011 से लेकर जून 2011 के बीच सरकार की ओर से सामग्री हटाने की सिफारिशें जारी की हैं। गूगल ने बताया है कि इस अवधि में सरकार ने उससे 358 आइटम और 68 कंटेंट हटाने की मांग की थी, जिसमें से कंपनी ने 51 फीसदी मांगों को आंशिक या पूरे तौर पर मान लिया था।

गूगल ने बताया, 'राज्य और स्थानीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने हमसे सामाजिक नेताओं के विरोध में प्रदर्शन, आपत्तिजनक भाषा वाले वीडियो यू ट्यूब से हटाने के लिए कहा था। हमने इनमें से ज्यादातर वीडियो हटाने से मना कर दिया था और महज उन्हीं वीडियो को हटाया था, जिनके कारण समुदायों में रंजिश बढऩे की आशंका थी।

सोशल मीडिया के नियंत्रण के बारे में केन्द्र सरकार की चिन्ताएं अन्ना आंदोलन के समय सामने आ गयी थीं। मोदी सरकार आने के बाद भी केन्द्र सरकार का पुराना नजरिया बदला नहीं है।यह एक तरह से सोशल मीडिया की संचालक कंपनियों को धमकी है कि 'सावधान रहो अपने दायरे के बाहर मत जाओ।' विचारणीय बात यह है जो केन्द्र सरकार दूरसंचार विभाग को नहीं चला पायी और उसे निजी स्वामित्व में दे दिया। वह सोशलमीडिया को क्या नियंत्रित करेगी ! ये सिर्फ कागजी कानूनी शेरों की बातें हैं ! इसके बावजूद हम यह कहना चाहेंगे कि हमारे फेसबुक बंधुओं को शालीन भाषा,सभ्य राजनीति और संस्कृति के नए मानकों को बनाना चाहिए। फेसबुक पर गली-मोहल्लों की भाषा ,खासकर गाली-गलौज की भाषा से बचना चाहिए। अन्ना भक्तमंडली से लेकर भाजपा की वानरटोली तक यह फिनोमिना देखा गया है। इन लोगों के एक धड़े ने फेसबुक पर आएदिन जो गंदगी की है,उसने सोशलमीडिया की साख को बट्टा लगाया है।



फेसबुक पर यूजर्स की निजी सूचना निकालने और उसे विज्ञापनदाताओं को 'बेचने' का

आरोप है और इस मुद्दे पर उसे यूरोप में कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। ' संडे टेलिग्राफ ' की एक रिपोर्ट के अनुसार , फेसबुक अपने यूजर्स के राजनीतिक विचार, लैंगिक पहचान, धार्मिक आस्थाएं और यहां तक कि उनका अता-पता भी जमा कर रही है। यूरोपीय आयोग इस मुद्दे पर कार्रवाई करने की योजना बना रहा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि लोग चाहे अपना 'प्राइवेसी सेटिंग' कुछ भी रखें, फेसबुक अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर का उपयोग कर सोशल नेटवर्किंग साइट पर लोगों की गतिविधियों की सूचना जमा कर रही है और उसे विज्ञापनदाताओं को उपलब्ध करा रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरोपीय आयोग 2012 जनवरी में एक नया निर्देश जारी करने वाला है जिसमें इस तरह के विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है।

दूसरे उद्योगों की तरह भारतीय दूरसंचार के आंकड़े भ्रमित करने वाले हैं। देश में 85 करोड़ से अधिक पंजीकृत मोबाइल नंबर हैं। पर स्पेक्ट्रम आवंटन का ढांचा सेवा प्रदाताओं के लिए इनकी संख्या बढ़ाने में मदद करता है। इसमें से एक तिहाई नंबर ऐक्टिव नहीं हैं। बाकी बचे नंबरों में से भी कई उन ग्राहकों के नाम पर पंजीकृत हैं जो ऑफिस या निजी इस्तेमाल के लिए अलग-अलग नंबर रखते हैं। पिछले कुछ वर्षों से लगातार प्रति ग्राहक औसत राजस्व घटा है। इस कारण से सेवा प्रदाताओं का मुनाफा भी कम हुआ है। हर सर्किल में दर्जनों टेलीकॉम सेवा प्रदाता कंपनियां हैं। इनमें से कुछ ही पैसा बना पाती हैं और नई कंपनियां तो अब तक अपने निवेश का बड़ा हिस्सा तक नहीं वसूल पाई हैं। इस बदहाल अवस्था के बाद तो दूरसंचार क्षेत्र के निजीकरण को यहीं रोकना चाहिए।

सीईए के साथ समझौते और तकनीकी सहमेल के कारण फेसबुक अपने यूजर की प्राइवेसी में हस्तक्षेप और तांक-झांक कर रहा है। फेसबुक अधिकारियों के अनुसार फेसबुक अपने यूज़र के लॉग ऑफ करने के बाद भी इस बात पर नजर रखता है कि उसके यूजर्स कौन सी वेबसाइट विजिट कर रहे हैं।

चीन में इंटरनेट के 50 करोड़ के करीब यूजर हैं और सबसे शक्तिशाली इंटरनेट सेंसरशिप भी है। सर्वसत्तावादी एकतंत्र में यह व्यवस्था बेहद परेशानी खड़ी करने वाली है। नव्य आर्थिक उदारीकरण और विश्व व्यापार संगठन की नीतियों के दायरे में आने के बावजूद वहां पर इंटरनेट सेंसरशिप में कोई ढ़ील नहीं आयी है। कायदे से उसे अपने सिस्टम को और उदार बनाना था,लेकिन उन्होंने नहीं किया। चीन पर विश्व जनमत का भी कोई दबाव नहीं है।इसका अर्थ यही है कि लूट की उदारता में चीन हिस्सेदार है,लोकतांत्रिक छूट देने के मामले में चीन आज भी कंजरवेटिव है। चीन का मॉडल है राजनीति में सर्वसत्तावाद,आर्थिक क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कारपोरेट तंत्र,उपभोक्तावाद और सख्त सेंसरशिप।

भारत में फेसबुक और इंटरनेट पर साइबर हैकरों के हमले बढ़ गए हैं। अभी तक भारत फेसबुक संतों की शांत रमणस्थली था लेकिन विगत एक सप्ताह से साइबर अशांति की खबरें आ रही हैं। भारत सरकार के संस्थानों की बेवसाइट हैक करके नकली लोग अन्य देशों की बेवसाइट पर हमले कर रहे हैं। इसी तरह फेसबुक को बाजार में डाउन करने के लिए नए तरीकों से पोर्न सामग्री फेसबुक पर भेजी जा रही है। साइबर हैकरों की इन शैतानियों के प्रति सजगता जरूरी है। इस विषय पर फेसबुक दोस्तों को अपनी वॉल पर लिखना चाहिए।भारत में संचार क्रांति के दुरूपयोगों के प्रति सचेतनता बढ़ रही है। इंटरनेट,फेसबुक,सोशल साइट ,ब्लॉग आदि पर अपमानजनक बातें लिखने वालों के प्रति अब आम यूजर सचेत हो रहा है। इस सचेतनता के कारण ही एक युवक को एक लड़की के प्रति अपमानजनक और अशालीन बातें नेट पर लिखने के लिए अदालत ने 20हजार रूपये का जुर्माना लगाया है। आप भी आई टी एक्ट के प्रति जागरूक बनें ।

दूसरी ओर सीआईए ने फेसबुक और ट्विटर पर निगरानी तेज कर दी है। वे विभिन्न देशों में चल रही राजनीतिक और अन्य किस्म की गतिविधियों पर गहरी नजर रखे हैं। इसके आधार पर वे अपने रणकौशल को भी बदल रहे हैं ,साथ ही यूजरों का व्यापक प्रोफाइल भी बना रहे हैं। यह यूजरों की निजता का उल्लंघन है ?

इंटरनेट आने के बाद से ऑनलाइन छेडखानी ,उत्पीड़न और अपमान की घटनाओं में इजाफा हुआ है। मसलन् ,आस्ट्रेलिया में 2008 में की गयी रिसर्च में पाया कि 42प्रतिशत युवाओं को ह्रासमेंट का सामना करना पड़ा।एक अन्य सर्वे में 36 फीसद लड़कियों और 32 फीसद लड़कों ने ह्रासमेंट की शिकायत की। ऑनलाइन ह्रासमेंट की घटनाओं से भारत में भी एक बड़ा तबका परेशान है । लेकिन अभी तक ऑनलाइन ह्रासमेंट की सटीक अवधारणा विकसित नहीं हो पायी है ।

फेसबुक के 80 करोड़ यूजर हैं और उसकी विज्ञापनों से इस साल 4.27 बिलियन डालर की आमदनी हुई है जो उसकी सकल आय का 85 फीसदी है। ऐसे में फेसबुक पर मंथली चार्ज लेने की अफवाह उसके प्रतिद्वंद्वी सोशल मीडिया साइट के लोगों ने ही उड़ायी है। फेसबुक पर जो लिखा जाता है उस पर सहज में विश्वास न करें। उसकी अन्य स्रोतों से पुष्टि करें। फेसबुक पर अफवाहें भी चलती हैं।

फेसबुक पर कभी आर्थिक तबाही के घटनाक्रमों पर मित्रलोग बहस क्यों नहीं करते ? क्या भारत में आर्थिक खुशहाली आ गयी है ? क्या मंदी की मार के सवाल सताते हैं ? सवाल यह है फेसबुक को हम भारत की मूल समस्याओं का मंच क्यों नहीं बना पाए हैं ?

फेसबुक पर वर्चुअल कामुक औरतें सक्रिय हैं।ये फेसबुक और चैटिंग के बहाने मोहित करती हैं। वर्चुअल प्रेम में फंसाती हैं और अंतमें गहरी निराशा और हताशा में धकेल देती हैं। आज इनके एक शिकार युवा ने फेसबुक से विदा ले ली। कहने का अर्थ है फेसबुक पर वर्चुअल औरतों से चैटिंग ओर वर्चुअल प्रेम न करें। यह आत्मघाती है।

नए साइबर जमाने के युवाओं में लोकतांत्रिक प्रतिवाद की आकांक्षाएं कम है। यह समाज से विच्छिन्न है और पूरी तरह मोबाइल और सोशल नेटवर्किंग से सम्बद्ध है। इस युवा की मनोसंरचनाएं उपभोग,अकेलेपन , क्षण में पाने की आकांक्षा और प्रतिहिंसा ने निर्मित की है।

इंटरनेट महान है,फेसबुक महानतम है और लुढ़कता बाजार और आर्थिक मंदी इन सबसे महान है। संचार क्रांति और भूमंडलीकरण जिस स्वर्ग का सपना लेकर आए थे वहां इन दिनों वैचारिक-सांस्कृतिक सन्नाटा पसरा हुआ है। हमारे दोस्त इन सब सवालों पर चुप हैं । क्या ये सवाल बहस के लायक नहीं हैं ॽ

फेसबुक तो स्वर्ग की इन्द्रसभा है इसमें सुख है,आनंद है,विचार हैं,अमरता है,गान,संगीत, नृत्य, चित्र,मित्र सब हैं,इन्द्रसभा की तरह यहां रसोई ,खाना ,महंगाई ,मंदी ,राक्षस ,पति, पत्नी, संतान,समाज आदि की चिन्ता नहीं है। यहां सिर्फ रस , आनंद और अभिव्यक्ति है।यह सुखियों का संसार है।फेसबुक क्षणिक और अधूरी अभिव्यक्ति का माध्यम है।फेसबुक सिरपड़ों का खेल है,यहां अपरिचय के परिचय,बिना दीवार के वॉल,बिना स्याही कागज का लेखन,मुँह देखी मीठी बातें और खोखली प्रशंसाओं की लंबी सूची,सूचनाओं का ढ़ेर, बिना मांगे उपदेश,मजे की बातें,बोरिंग बातें,विज्ञापन और नकली व्यक्तिवाद का खोखला ताण्डव और फेसबुक का अरबों का धंधा।यानी फेसबुक उल्लू है उसकी सवारी लक्ष्मी करती है।फेसबुक में स्वर्ग और नरक भी हैं , स्वर्ग में उत्तर अमेरिका है वहां की 41 प्रतिशत आबादी ऑनलाइन है । नरक में विश्व की बाकी आबादी है जिसमें मात्र 10 प्रतिशत लोग ऑनलाइन हैं।अफ्रीका की मात्र 1 प्रतिशत आबादी ऑनलाइन है। ऑनलाइन स्वर्ग है और जो लाइन में है वो नरक में हैं। फेसबुक पर कुछ लोग हैं जो 11बजे के बाद अवतरित होते हैं वे फेसबुक के यक्ष-यक्षिणी हैं।

परवर्ती पूंजीवाद में सबसे बड़े किराए वसूलने वाले कारपोरेट घराने हैं। वे केबल टीवी से लेकर डीटीएच तक,इंटरनेट से टेलीफोन तक,डिस्नी लैंड से लेकर साइंस सिटी तक आम जनता से आनंद और कम्युनिकेशन के बदले किराया वसूलते हैं। यह किराया ही मोनोपोली कैपीटलिज्म के मुनाफे और आनंद का मूल स्रोत है। क्या इसके बाद भी हमें पूंजीवाद से प्यार करना चाहिए ?

पूंजीवाद में कोई भी कम्युनिकेशन फोकट में नहीं होता।दूरसंचार -मीडिया के इजारेदार घरानों की मुनाफाखोरी के बिना नहीं होता। मसलन् फेसबुक,ब्लॉग आदि इंटरनेट कम्युनिकेशन के लिए हम किराया देते हैं। दूरसंचार मुगल इस किराए से अमीर बनते हैं।यह परवर्ती पूंजीवाद का किराए का कम्युनिकेशन है और इसी अर्थ में बुर्जुआ कम्युनिकेशन है।

फेसबुक के मित्र किस विचारधारा के हैं यह जानने का आसान तरीका है कि वे किन विषयों पर वॉल पर लिखते हैं,किन विषयों पर अन्यत्र जाकर पढ़ते हैं और आमतौर पर उनकी किस तरह के राजनीतिक-आर्थिक सवालों में रूचि रखते हैं ? टिप्पणी करते हैं ?सवाल यह है कि क्या फेसबुक विचारधारारहित कम्युनिकेशन है ? फेसबुक पर शिक्षित युवा और अधेड़ आमतौर पर जिस भाषा का प्रयोग करते हैं वो प्रतिगामी भाषिक- सांस्कृतिक मनोदशा की अभिव्यक्ति है। ये,नकली फोटो लगाना, गलत सूचनाएं देना,विभ्रम की बातें करना,अश्लील भाषा या द्वयर्थक भाषा में लिखना,चैट करते हुए किसी भी लिंक को भेज देना आदि। अनेक लोग हैं जो फेसबुक पर लड़की देखी और लगे पीछा करने, ये लोग फेसबुक पर लड़की को पीछा किए बिना क्यों नहीं रह पाते ? पहले दोस्त बनाते हैं फिर चैट में पीछा करते हैं,क्या यह नेट पर स्त्री उत्पीड़न है ?

इंटरनेट पर सत्ता की नजरदारी लगातार बढ़ रही है।लैटिन अमेरिका में इंटरनेट को राजनीतिक औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।प्रतिवादियों पर नजर रखी जा रही है,उन पर नियंत्रण लगाया जा रहा है। पेरू से लेकर बोलविया तक इंटरनेट की नजरदारी हो रही है। ईमेल,फेसबुक,ब्लॉग,ई मूवमेंट आदि पर विभिन्न तरीकों से नजर रखी जा रही है। यह नेट प्राइवेसी का अंत है।

इंटरनेट और कम्प्यूटर का ज्यादा उपयोग स्मृति में संचित करने की दिशा बदल सकता है। आमतौर पर अभी वैज्ञानिक नहीं जानते कि इससे मनुष्य की स्मृति का क्षय हो रहा है या स्मृति समृद्ध हो रही है। लेकिन मन के बाहर जो चीज संग्रहीत करना चाहते हैं उसके लिए इंटरनेट और कम्प्यूटर सुंदर माध्यम और संग्रहशाला है। मनुष्य का दिमाग इस मीडिय़म की संगति में धीरे धीरे बदल रहा है।

यह संचार क्रांति की आजादी के अंत की बेला है। संचार क्रांति ने जिस तरह की स्वतंत्रता और प्राइवेसी का आरंभ में वायदा किया था उसका धीरे धीरे अंत हो रहा है। आम लोगों की प्राइवेसी को नियंत्रित और नियोजित किया जा रहा है। बेहतर है नेट की दुनिया में हम अपने निजी पत्ते न खोलें।

साइबर साँड मात्र शब्दों से ही अपमानित नहीं करते वे इलैक्ट्रोनिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। मसलन वे किसी को अपमानित या परेशान करने के लिए गंदे,अश्लील वीडियो फेसबुक की वॉल पर लगा देते हैं।अपमानजनक एमएमएस या ईमेल करते हैं। अपमानजनक या नेगेटिव साइबर टेक्स्ट भेज देते हैं।

साइबर बांस करने के तरीके क्या हैं- पहला तरीका है आघात पहुँचा,अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना,सेक्सुअल लैंग्वेज का इस्तेमाल करना, परेशान करना,मसलन् , बार-बार यह कहना 'बात कीजिए प्लीज' आदि । जो व्यक्ति इस तरह की भाषा का प्रयोग कर रहा है वह कितनी बार दोहराता है अपने व्यवहार को,महिने में एक बार,दो बार ,तीनबार या रोज।इससे आप उसके असंतुलन का अंदाजा सहज ही लगा सकते हैं।साइबर साँड मूलतःसामाजिक जीवन में मौजूद दादागिरी का ही साइबर रूप है। साइबर साँड ज्यादातर वे युवा और तरूण हैं जो एडजेस्टमेंट प्रॉब्लम के शिकार हैं। इसे साइबर भाषा में रिस्क ग्रुप में रखा जाता है और ये लोग भिन्न किस्म के व्यवहार की मांग करते हैं।साइबर पंगेबाज को साइबर बैल कहना ज्यादा सही होगा।वे अपनी नेगेटिव हरकत को बार बार दोहराते हैं। मसलन् साइबर बैल चैट में आकर पूछते हैं '' क्या आप मुझे पसंद करते हैं'। 'सेक्स करोगे',या वे कोई व्यक्तिगत आक्षेप करने वाले वाक्य या शब्द का इस्तेमाल कर बैठते हैं। साइबर स्पेस में किया गया एक नेगेटिव एक्शन दूरगामी असर छोड़ता है। नेगेटिव एक्शन की पुनरावृत्ति तुरंत प्रतिक्रिया पैदा कर सकती है।साइबर पंगेबाज कैसे लोग होते हैं ,किस उम्र के होते हैं,उनके पंगा लेने का तरीका क्या वे साइबर कम्युनिकेशन में कैसे परेशान करते हैं। इसे साइबर में 'बांस' करना भी कहते हैं।पश्चिम में इसमें ज्यादातर 10-18साल की उम्र के तरूण आते हैं।भारत में ऐसे लोगों में वयस्कों की संख्या ज्यादा है। इन लोगों का काम है नेट,फेसबुक,ब्लॉग,ईमेल,चाट आदि के जरिए आघात पहुँचाना।ये नेगेटिव एक्शन में ज्यादा रहते हैं।

नेट पर किए गए अनेक अनुसंधान बताते हैं कि जो ज्यादा चैट ,ईमेल और शॉपिंग करते हैं उनमें अवसाद के लक्षण ज्यादा होते हैं।ताइवान के कॉलेज छात्रों में किए अध्ययन से पता चला है कि इंटरनेट की लत का पढ़ाई ,दैनिक रूटीन पर असर होता है। जिनको लत है वे अवसाद में कष्ट पाते हैं।फेसबुक की बढ़ती आदत ने अमेरिकी तरूणों की स्कूली पढ़ाई को प्रभावित किया है।इंटरनेट में उन्हीं यूजरों के साथ दुर्व्यवहार या एब्यूज की घटनाएं देखी गयी हैं जिनमें आमने-सामने बात करने की क्षमता का अभाव होता है अथवा जो अवसाद में रहते हैं।रिसर्च में पाया गया है कि इंटरनेट यूजरों में जो अकेलेपन में नहीं हैं वे भावनात्मक सहयोगी की तलाश में नेट पर आते हैं। ऑनलाइन मित्र यहां ऑफलाइन मित्रों से मिलकर संतोष पाते हैं। इस तरह के यूजर भी हैं जो मनो व्यथाओं के शिकार हैं और अपनी व्यथा का समाधान खोजने आते हैं। इनमें बेचैनी,अवसाद और आत्मविश्वास की कमी देखी गयी है।

सन् 1990 के आसपास जब इंटरनेट का चलन तेज हुआ तो उस समय इसे लेकर भय और उत्साह का भाव था।आरंभ के शोध बताते हैं इंटरनेट के उपयोग ने अकेलेपन ,अवसाद और तनाव में वृद्धि की।नेट विशेषज्ञों का मानना है कि संचार की नई तकनीक के कारण हठात कम्युनिकेशन बढ़ जाने का सामाजिक-मनोवैज्ञानिक नकारात्मक असर होता है। इससे लत और अवसाद की जुगलबंदी पैदा होती है।क्या सोशल मीडिया नेटवर्क में गालियों का वही स्थान है जो उसे हमने सामाजिक जीवन में दिया है ? क्या सोशल मीडिया गालियों से ऊर्जा प्राप्त करता है ?गालियां संवादहीनता का संकेत है ।

फेसबुक आने के बाद विरही-विरहिणियों की संख्या बढ़ी है या घटी है ? विरह का प्रसार हुआ है या अवसान हुआ है ?मनमाने ढ़ंग से अपनी बात कहने का ढ़ंग अभागों का ढ़ंग है।कहते-कहते ऐसा भी कुछ सुनने को मिल जाता है जो पहले कभी नहीं सुना था।कहने के स्रोत में जब ज्वार आता है तब न जाने किस गुफा के भीतर की अनजान सामग्री बहती-बहती आकर घाट पर लग जाती है। क्या आपने ऐसा अनुभव किया है ?



सौंदर्य मनुष्य को संयम की ओर खींचता है,शालीनता का विकास करता है। इसके अलावा हमारी क्षुधा तृप्ति के साथ -साथ सदा उच्चतर सुर जगाता है।फेसबुक ने आम लोगों में खासकर मध्यवर्ग के लोगों में झूठ बोलने,फुसलाने,हां में हां मिलाने या निरर्थक समय खर्च करने की आदत में इजाफा किया है। छद्म या आभासी यथार्थ में जीने की भावना को पुख्ता बनाया है। आदमी का कम्युनिकेशन फास्ट किया है लेकिन संचार ,समाज ,व्यक्ति और वस्तु के बीच में महा-अंतराल पैदा किया है।फेसबुक यूजरों की संख्या 70 करोड़ के करीब हो गई है। आश्चर्यजनक बात है कि अमेरिका में फेसबुक यूजरों की संख्या में 6 मिलियन की गिरावट आई है।इसी तरह कनाडा,रूस,ब्रिटेन,नार्वे में फेसबुक यूजरों की संख्या घटी है। लेकिन विकासशील देशों में बढ़ रही है। क्या अमेरिकी लोग त्रस्त हैं फेसबुक से ?क्या फेसबुक सामाजिक-भावनात्मक अलगाव पैदा कर रहा है ?फेसबुक की खूबी है "जान ना पहचान मैं तेरा मेहमान",अनजाने लोगों से राजनीतिक-सामाजिक चर्चा तो ठीक है लेकिन इमोशनल बातें करना,व्यक्तिगत जानकारियां देना खतरनाक है।







रविवार, 8 मई 2016

माँ सोशलमीडिया और भाषा

        इंटरनेट का पहला सुख है आत्माभिव्यक्ति।दूसरा सुख है वर्चुअल प्रशंसा।इन दो सुखों ने सोशलमीडिया पर निजी जीवन के अनुभवों की बाढ़ पैदा कर दी है।जाहिर है आत्भिव्यक्ति की यह विश्वव्यापी सुविधा पहले कभी उपलब्ध नहीं थी।आज है तो लोग बढ़-चढ़कर माँ के साथ अपनी तस्वीरें शेयर कर रहे हैं,बहुत कम लोग हैं जो निजी अनुभव शेयर कर रहे हैं।यह सच है फोटो बहुत कुछ कहता है।लेकिन आत्माभिव्यक्ति का अभी भी सबसे ताकतवर मीडियम भाषा है।समस्या यह है कि भाषा में माँ के अनुभव कैसे व्यक्त करें ॽ अभी भी बहुतों के पास माँ के बारे में सही भाषा नहीं है।मात्र फोटो हैं।यह मूलतःआदिम अभिव्यंजना है। माँ को भाषा में लाना चाहिए।माँ जितनी भाषा में आएगी स्त्री की ताकत और स्पेस का उतना ही विकास होगा। भाषा में अभिव्यक्त करने के बाद ही मनुष्य को स्थान मिलता है,पहचान मिलती है।फोटो दें ,लेकिन फोटो को भाषा भी दें,फोटो को गद्य-पद्य से जब तक नहीं जोड़ेंगे, जीवन संघर्ष सामने नहीं आएंगे।जीवन संघर्ष के बिना मां या किसी का भी रूप निरर्थक है।माँ हमें भाषा देती है,भाषा बनाने में मदद करती है,वह जब भी मिलेगी भाषा में मिलेगी।

रविवार, 24 अप्रैल 2016

सोशलमीडिया और साहित्य

      इन दिनों अकादमिक जगत का एक वर्ग सोशलमीडिया से क्षुब्ध है।खासकर हिन्दी के प्रोफेसर और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग में सोशलमीडिया को लेकर हेयभाव है।वे इसमें लिखने-पढ़ने को थर्डग्रेड किस्म का काम समझते हैं।यदि सोशलमीडिया पर कोई मेरा जैसा प्रोफेसर सक्रिय है तो उसे एकदम अ-गंभीर और गैर-जिम्मेदार समझते हैं।मेरी फेसबुक वॉल पर आए दिन इस तरह के क्षुब्ध लोग लिखते रहते हैं कि सब समय तो फेसबुक पर रहते हो फिर पढ़ाने कब जाते हो ॽ सच्चाई यह है मैं कक्षा में कभी अनुपस्थित नहीं रहा।कभी कोर्स अधूरा नहीं छोड़ा।बल्कि हिन्दी के जितने भी प्रोफेसर हैं उनमें अब तक सबसे ज्यादा किताबें लिखी हैं।किताबों के पाठक भी हैं।कभी किताब लिखना नहीं छोड़ा।कभी किसी की चमचागिरी नहीं की,किताबें लिखने के लिए किसी से अनुदान नहीं लिया,यहां तक कि यूजीसी और अपने विश्वविद्यालय से भी कोई अनुदान नहीं लिया। इस तरह के लोग यह भी मानते हैं कि हल्के-फुल्के लेखन,फोटो लगाने,दैनंदिन गप्पबाजी करने आदि के लिए सोशलमीडिया ठीक है लेकिन कोई गंभीर साहित्यिक कार्य सोशलमीडिया के जरिए नहीं कर सकते।हम विनम्रता के साथ इस तरह का नजरिया रखने वालों से असहमत हैं।ये वे लोग हैं जो सोशलमीडिया के चरित्र से अंजान हैं या फिर जानबूझकर सोशलमीडिया विरोधी अभियान में लगे हैं।

सोशलमीडिया वस्तुतः भाषा का विस्तार है। यह भाषा का विकसित रूप है।भाषा मूलतः अभिव्यक्ति की तकनीक है। भाषा में दो तरह की अभिव्यक्ति नजर आती है।पहली अभिव्यक्ति वह है जो दैनंदिन जीवन से जुड़ी है।जिसका हम क्षणिक उपयोग करते हैं और वह उपयोग करते ही खत्म हो जाती है। दैनंदिन जीवन की क्षुद्र बातों और क्षुद्र कर्मों की सीमा में भाषा का एक रूप खत्म हो जाता है।लेकिन भाषा का एक रूप वह भी है जो वनस्पति की तरह है।जिस तरह वनस्पति की उम्र लंबी होती है,ठीक उसी तरह भाषा में रचे गए साहित्य की भी उम्र लंबी होती है।जिस तरह वनस्पति में शाखा-प्रशाखाएं होती हैं,उसी तरह साहित्य में भी विभिन्न किस्म की विधाएं होती हैं,विभिन्न माध्यमों की साहित्यिक विधाएं होती हैं।भाषा में हम तथ्य या सूचनाएं भी देते हैं उसी तरह मनोभावों को भी व्यक्त करते हैं।जिस तरह गालियां देते हैं उसी तरह कविता,कहानी आदि भी लिखते हैं।भाषा में गुस्सा,प्रेम,घृणा आदि को भी यथास्थान व्यक्त करते हैं।इसमें ध्वनि और भंगिमाएं भी होती हैं।सभ्यता के विकासक्रम में भाषा के इस रूप से हम बहुत आगे चले आए हैं।भाषा के रूपों के विकास में हमेशा ´मैं´केन्द्र में रहा है। माध्यमों में भी अभिव्यक्ति के विभिन्न विधा रूपों में ´मैं´केन्द्र में है।इसी तरह भाषा में दैनंदिन जीवन ही केन्द्र में नहीं है अपितु ज्ञान भी है।इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाएंगे संचार के तकनीकी रूप वस्तुतः भाषा का विस्तार हैं।

सोशलमीडिया में लिखे को साहित्य कहें या न कहें यह सवाल बहस के केन्द्र लाने की जरूरत है। इससे साहित्य के मौजूदा स्वरूप और दायरे का विकास होगा।इस प्रसंग में मुझे रवीन्द्रनाथ टैगोर की साहित्य संबंधी परिभाषा याद पड़ रही है। टैगोर के अनुसार साहित्य का सहज अर्थ है ´नैकट्य अर्थात् सम्मिलन´।भाषा के क्षेत्र में साहित्य का काम है ´हृदय का योग कराना´।टैगोर ने लिखा है, ´मनुष्य को तरह-तरह के उद्देश्यों के लिए मिलना पड़ता है,इसके अलावा मनुष्य को मिलना पड़ता है केवल मिलने के लिए,अर्थात् साहित्य के उद्देश्य से।´नए मीडिया रूप,खासकर सोशलमीडिया की विशेषता है मिलाना। सम्मिलन की इच्छा को नए किस्म के संचार ने प्रमुख बनाया है।जिससे आप मिलना चाहते हैं उससे अब नए मीडियम के जरिए मिलते हैं।ये मीडियम हैं मोबाइल,इंटरनेट,सोशलमीडिया आदि।अब यह आपके ऊपर है कि संचार के दौरान क्या करना चाहते हैं।यह संचार व्यक्ति का व्यक्ति से भी हो सकता है और व्यक्ति का समाज से भी हो सकता है।यह दैनंदिन जीवन से जुड़ा भी हो सकता है और कलात्मक-साहित्यिक भी हो सकता है।यह मन की इच्छाओं पर निर्भर करता है।मनुष्य के पास दो तरह की इच्छाएं हैं,पहला ,सामान्य इच्छा और दूसरा है अद्भुत इच्छा।सामान्य इच्छा को हम दैनंदिन जीवन की भाषा में अभिव्यक्त करते हैं,जबकि अद्भुत इच्छा हमारे साहित्य सृजन का मूलाधार है।अद्भुत इच्छा के कारण ही मनुष्य अपने को संसार में प्रसारित करता है।साहित्य उसी का विराट रूप है।

जब भी कोई नया मीडियम समाज में जन्म लेता है पुराने मीडियम के प्रयोगकर्ता परेशानी महसूस करते हैं। उल्लेखनीय है मानव समाज ने भाषायी और कलात्मक अभिव्यक्ति के जितने भी रूप अब तक पैदा किए वे सभी आज तक बरकरार हैं और कला या साहित्य परंपरा के अंग भी हैं।इनमें वाचिक परंपरा के रूपों से लेकर भित्तिचित्र,भित्तिलेखन तक,विधाओं जैसे कविता से लेकर निजी चिट्ठी-पत्री तक शामिल है,पोथी से लेकर किताब तक,पत्र-पत्रिकाओं से लेकर सिनेमातक,रेडियो कम्युनिकेशन से लेकर इंटरनेट तक,सोशलमीडिया से लेकर ईमेल तक सब कुछ शामिल है।



साहित्य की परिधि वहां तक है जहां तक भाषा का आकाश फैला हुआ है।दिलचस्प बात यह है कि कम्प्यूटर में कोई काम भाषा के बिना संभव नहीं है।हर चीज पहले भाषा में लिखी जाती है,यहां तक कि रेडियो,टीवी,फिल्म आदि भी भाषा में लिखे जाते हैं,उसके बाद वे हम तक पहुँचते हैं।सभी किस्म के संचार का मुख्य द्वार है भाषा।इसी तरह भाषा का प्रयोग मनुष्य के बिना संभव नहीं है।इसी अर्थ में भाषा मानवीय कार्य-व्यापार की अभिव्यक्ति का मूलाधार है।यह भी कह सकते हैं मनुष्य के बिना भाषा नहीं,भाषा के बिना मनुष्य नहीं।उसी तरह मीडियम के बिना भाषा नहीं होती।भाषा जब रस की सृष्टि करती है तो मनुष्य में मिलने की इच्छा पैदा होती है।उससे मिलन की इच्छा करती है जो सभी कालों के सभी जनों में स्वीकृति पाए।भाषा में जब रस पैदा होता है तो उसे हम अनुभूति कहते हैं और इसी अनुभूति को मनुष्य विभिन्न माध्यमों के जरिए व्यक्त करने को आतुर हो उठता है।भाषा के विभिन्न माध्यमों में जो रूप हम देखते हैं वे मुनष्य ने तब बनाने आरंभ किए जब उसने नैपुण्य की सृष्टि की। नैपुण्य के कारण ही भाषा को अर्थ मिला।इन्द्रियबोध को विभिन्न उपादानों के जरिए व्यक्त करने की संभावनाएं पैदा हुईं।

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

गोपेश्वर सिंह यहाँ से देखें


गोपेश्वर सिंह (प्रोफेसर हिंदी विभाग,दि.वि.वि ने जनसत्ता (17अप्रैल2016)में एक लेख”आभासी दुनिया के राग रंग´´ लिखा है, उससे हम विनम्र असहमति दर्ज करते हैं।

आप यदि सोशलमीडिया,मीडिया और साहित्यालोचना के बारे में नहीं जानते तो जाने बिना लिखते क्यों हैं ॽ कम से कम अपने पद की गरिमा का तो ख्याल करें।सोशलमीडिया-मीडिया पर अंगुली उठाकर मूलतःआप अपने निकम्मेपन पर ही अंगुली उठा रहे हैं।सोशलमीडिया और उस पर लिखने वालों पर बेसिर-पैर की बातें लिखकर आपने सोशलमीडिया के संबंध में अपनी अज्ञानता और घृणा का परिचय दिया है,साथ ही साहित्य और सोशलमीडिया ,साहित्यालोचना के ह्रास पर अपनी जो राय रखी है,वह आपके अज्ञान को सामने लाती है। मुश्किल यह है जब कम्युनिकेट करना नहीं आता तो हम ´हाय हाय´, ´पतन पतन´की भाषा बोलने लगते हैं।

जितने भी आधुनिक मीडियम और विधारूप हैं वे आत्मप्रचार के बिना नहीं बनते। किसी में यह मात्रा कम है तो किसी में ज्यादा।आत्मप्रचार या प्रचार ये दोनों संचार के लिए जरूरी तत्व हैं।हिन्दी साहित्य में इन दिनों साहित्यकार,लेखक,आलोचक आदि की जो दयनीय स्थिति नजर आ रही है उसकी जड़ें हिंदीविभाग की संरचना,शिक्षक की वैचारिक संरचना और ज्ञान की विश्वव्यापी परंपरा से उसके अलगाव में है।आलोचना के ह्रास का सोशलमीडिया या मीडिया से कोई संबंध नहीं है।दूसरी बात यह कि साहित्यालोचना कभी अखबारों या सोशलमीडिया से नहीं बनी.दुनिया के सभी प्रमुख आलोचकों ने जो भी आलोचना लिखी है,वह मीडिया से प्रभावित होकर या मीडिया में रहकर नहीं लिखी है।

साहित्यालोचना की दुर्दशा के लिए लेखक-आलोचक-प्रकाशक और हिंदी के शिक्षक सीधे जिम्मेदार हैं।सवाल यह है आलोचकों ने आलोचना लिखनी क्यों बंद कर दी ॽ क्या सोशलमीडिया या मीडिया ने आलोचना न लिखने के लिए दबाव डाला है ॽ या फिर आलोचना न लिखने के लिए कोई फतवा जारी हुआ है ॽ प्रत्येक माध्यम खास ऐतिहासिक परिस्थितियों में जन्म लेता है,यह आपकी जिम्मेदारी है कि आप जानें कि सोशलमीडिया क्यों और कैसे आया ॽ लेकिन आपकी प्रकृति है कि आप बिना जाने लिखते हैं। यह दोष है,लेकिन हिंदी प्रोफेसरों में बिना जाने लिखना-बोलना अब दोष नहीं माना जाता,हम सभी में यह बीमारी अंदर तक घुस आई है कि हम बिना जाने हर विषय पर बोलने और लिखने को तैयार हो जाते हैं। हर मीडियम की अपनी सर्जनात्मक क्षमता होती है,मीडियम में सर्जनात्मक क्षमता न हो तो वह आम जनता में स्वीकृति अर्जित नहीं कर पाता।सोशलमीडिया की सर्जनात्मक क्षमता अब तक के सभी माध्यमों से कई गुना ज्यादा है।यह मानव सभ्यता का अब तक का सबसे शक्तिशाली माध्यम है।इसमें पहले के सभी माध्यम समाहित हैं।यह माध्यम तिकड़म-घृणा-जोड़तोड़ आदि के आधार पर अपना विकास नहीं करता। सोशलमीडिया वस्तुतः कम्युनिकेशन का मीडियम है।इसमें जो व्यस्त है वह सर्जक है। हिंदी के स्वनामधन्य आलोचकों का इससे कोई संबंध नहीं है।यह सोशलमीडिया है,रीयलटाइम मीडिया है,यह साहित्य नहीं है।यह नए किस्म का कम्युनिकेशन है। यह साहित्य नहीं है।हम जिसे साहित्य कहते हैं वह प्रिंटयुग और उससे पूर्व की विरासत की देन है। सोशलमीडिया और उसके विधारूप भिन्न हैं।उनको पुराने साहित्यरूपों के साथ एकमेक नहीं करना चाहिए। साहित्यालोचना के पतन के कारण सोशलमीडिया में नहीं खोजने चाहिए।साहित्यालोचना के पतन पर हम समय-समय पर बहुत लिख चुके हैं,फुरसत हो तो पढ़ लें।दूसरी बात यह कि सोशलमीडिया आने के बाद पहली,दूसरी,तीसरी साहित्य परंपरा का अंत हो चुका है।साहित्य की मनमानी परंपरा बनाकर जिस रास्ते पर हिंदीवाले चलते रहे हैं उसको हमेशा के लिए दफ्न कर दिया गया है।

सोशलमीडिया के अपने ठाट हैं, अपना मुहावरा है,अपनी सर्जनात्मकता है और विराट संचार का रीयल टाइम फलक है।इसने सामान्य से पाठक को भी शक्तिशाली बनाया है।लेखक को भी ताकत दी है।वे लेखक सोशलमीडिया से शक्ति ग्रहण नहीं कर सकते जोपुराने मीडिया से रीतिवादियों की तरह अभी भी जुड़े हैं।संक्षेप में कहें आपने अनर्गल और अप्रासंगिक लिखा है।सोशलमीडिया के बारे में एक विश्वविद्यालय प्रोफेसर की इस तरह की अज्ञानता सच में पीड़ादायक है।यह स्थिति बदलनी चाहिए।सोशलमीडिया को जानने की कोशिश करें,उस पर रहें ,लिखें,गंभीर लिखें कौन रोक रहा है।सोशलमीडिया का पेट भरने लायक हिंदी आलोचकों-लेखकों के पास बहुत कम सामग्री है।सोशलमीडिया का पेट बहुत बड़ा है।थोड़ा कहा है बहुत जानना।









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