सोमवार, 18 अप्रैल 2016

गोपेश्वर सिंह यहाँ से देखें


गोपेश्वर सिंह (प्रोफेसर हिंदी विभाग,दि.वि.वि ने जनसत्ता (17अप्रैल2016)में एक लेख”आभासी दुनिया के राग रंग´´ लिखा है, उससे हम विनम्र असहमति दर्ज करते हैं।

आप यदि सोशलमीडिया,मीडिया और साहित्यालोचना के बारे में नहीं जानते तो जाने बिना लिखते क्यों हैं ॽ कम से कम अपने पद की गरिमा का तो ख्याल करें।सोशलमीडिया-मीडिया पर अंगुली उठाकर मूलतःआप अपने निकम्मेपन पर ही अंगुली उठा रहे हैं।सोशलमीडिया और उस पर लिखने वालों पर बेसिर-पैर की बातें लिखकर आपने सोशलमीडिया के संबंध में अपनी अज्ञानता और घृणा का परिचय दिया है,साथ ही साहित्य और सोशलमीडिया ,साहित्यालोचना के ह्रास पर अपनी जो राय रखी है,वह आपके अज्ञान को सामने लाती है। मुश्किल यह है जब कम्युनिकेट करना नहीं आता तो हम ´हाय हाय´, ´पतन पतन´की भाषा बोलने लगते हैं।

जितने भी आधुनिक मीडियम और विधारूप हैं वे आत्मप्रचार के बिना नहीं बनते। किसी में यह मात्रा कम है तो किसी में ज्यादा।आत्मप्रचार या प्रचार ये दोनों संचार के लिए जरूरी तत्व हैं।हिन्दी साहित्य में इन दिनों साहित्यकार,लेखक,आलोचक आदि की जो दयनीय स्थिति नजर आ रही है उसकी जड़ें हिंदीविभाग की संरचना,शिक्षक की वैचारिक संरचना और ज्ञान की विश्वव्यापी परंपरा से उसके अलगाव में है।आलोचना के ह्रास का सोशलमीडिया या मीडिया से कोई संबंध नहीं है।दूसरी बात यह कि साहित्यालोचना कभी अखबारों या सोशलमीडिया से नहीं बनी.दुनिया के सभी प्रमुख आलोचकों ने जो भी आलोचना लिखी है,वह मीडिया से प्रभावित होकर या मीडिया में रहकर नहीं लिखी है।

साहित्यालोचना की दुर्दशा के लिए लेखक-आलोचक-प्रकाशक और हिंदी के शिक्षक सीधे जिम्मेदार हैं।सवाल यह है आलोचकों ने आलोचना लिखनी क्यों बंद कर दी ॽ क्या सोशलमीडिया या मीडिया ने आलोचना न लिखने के लिए दबाव डाला है ॽ या फिर आलोचना न लिखने के लिए कोई फतवा जारी हुआ है ॽ प्रत्येक माध्यम खास ऐतिहासिक परिस्थितियों में जन्म लेता है,यह आपकी जिम्मेदारी है कि आप जानें कि सोशलमीडिया क्यों और कैसे आया ॽ लेकिन आपकी प्रकृति है कि आप बिना जाने लिखते हैं। यह दोष है,लेकिन हिंदी प्रोफेसरों में बिना जाने लिखना-बोलना अब दोष नहीं माना जाता,हम सभी में यह बीमारी अंदर तक घुस आई है कि हम बिना जाने हर विषय पर बोलने और लिखने को तैयार हो जाते हैं। हर मीडियम की अपनी सर्जनात्मक क्षमता होती है,मीडियम में सर्जनात्मक क्षमता न हो तो वह आम जनता में स्वीकृति अर्जित नहीं कर पाता।सोशलमीडिया की सर्जनात्मक क्षमता अब तक के सभी माध्यमों से कई गुना ज्यादा है।यह मानव सभ्यता का अब तक का सबसे शक्तिशाली माध्यम है।इसमें पहले के सभी माध्यम समाहित हैं।यह माध्यम तिकड़म-घृणा-जोड़तोड़ आदि के आधार पर अपना विकास नहीं करता। सोशलमीडिया वस्तुतः कम्युनिकेशन का मीडियम है।इसमें जो व्यस्त है वह सर्जक है। हिंदी के स्वनामधन्य आलोचकों का इससे कोई संबंध नहीं है।यह सोशलमीडिया है,रीयलटाइम मीडिया है,यह साहित्य नहीं है।यह नए किस्म का कम्युनिकेशन है। यह साहित्य नहीं है।हम जिसे साहित्य कहते हैं वह प्रिंटयुग और उससे पूर्व की विरासत की देन है। सोशलमीडिया और उसके विधारूप भिन्न हैं।उनको पुराने साहित्यरूपों के साथ एकमेक नहीं करना चाहिए। साहित्यालोचना के पतन के कारण सोशलमीडिया में नहीं खोजने चाहिए।साहित्यालोचना के पतन पर हम समय-समय पर बहुत लिख चुके हैं,फुरसत हो तो पढ़ लें।दूसरी बात यह कि सोशलमीडिया आने के बाद पहली,दूसरी,तीसरी साहित्य परंपरा का अंत हो चुका है।साहित्य की मनमानी परंपरा बनाकर जिस रास्ते पर हिंदीवाले चलते रहे हैं उसको हमेशा के लिए दफ्न कर दिया गया है।

सोशलमीडिया के अपने ठाट हैं, अपना मुहावरा है,अपनी सर्जनात्मकता है और विराट संचार का रीयल टाइम फलक है।इसने सामान्य से पाठक को भी शक्तिशाली बनाया है।लेखक को भी ताकत दी है।वे लेखक सोशलमीडिया से शक्ति ग्रहण नहीं कर सकते जोपुराने मीडिया से रीतिवादियों की तरह अभी भी जुड़े हैं।संक्षेप में कहें आपने अनर्गल और अप्रासंगिक लिखा है।सोशलमीडिया के बारे में एक विश्वविद्यालय प्रोफेसर की इस तरह की अज्ञानता सच में पीड़ादायक है।यह स्थिति बदलनी चाहिए।सोशलमीडिया को जानने की कोशिश करें,उस पर रहें ,लिखें,गंभीर लिखें कौन रोक रहा है।सोशलमीडिया का पेट भरने लायक हिंदी आलोचकों-लेखकों के पास बहुत कम सामग्री है।सोशलमीडिया का पेट बहुत बड़ा है।थोड़ा कहा है बहुत जानना।









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