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March, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

काश ! हम संचार क्रांति के गुलाम न होते

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संचार क्रांति धुरी है साम्राज्यवादी वर्चस्व, धंधा और झूठ। जो लोग इसे सत्य से जोड़ते हैं वे मासूम हैं और इस तकनीक की वैधता को अभी भी खिलंदड भाव से ले रहे हैं। संचार क्रांति की पारदर्शिता के खोखलेपन का आदर्श उदाहरण है हाल में आई आर्थिकमंदी और अमेरिका में सैंकड़ों बैंकों दिवालिया हो जाना। आश्चर्य की बात यह है कि आम जनता और मीडिया को उसकी भनक तक नहीं लगी। पारदर्शिता का आलम यह है कि अमेरिका आज सारी दुनिया के सामने नंगा खड़ा है,400 से ज्यादा अमेरिकी बैंक दिवालिया हो चुके हैं लेकिन अभी तक एक भी अपराधी नहीं पकड़ा गया। सबसे ज्यादा सुरक्षा देने वाली नयी उन्नत तकनीक का इस्तेमाल जब से हुआ है तब से साइबर सफेदपोश अपराधियों की संख्या हठात् आसमान छूने लगी है। साइबर लूट और अपराध में सैंकड़ों गुना वृद्धि हुई है। फेक मेल, फेक दोस्त ,फेक सेक्स और फेक प्रेम की भी बाढ़ आ गयी है। कहने का तात्पर्य यह है कि इंटरनेट की संचार प्रणाली पर शक की सुई जिस तरह घूम रही है वैसी स्थिति अन्य किसी माध्यम की नहीं हुई थी। आज नेट प्रामाणिकता के संकट से गुजर रहा है। मानव सभ्यता के इतिहास में संचार के किसी भी उपकरण को इस तरह के …

ट्विटर‘ पर नकली हेबरमास

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( प्रसिद्ध जर्मन समाजशास्त्री जे.हेबरमास)
जर्मन के विश्व विख्यात समाजशास्त्री जे.हेबरमास अचानक 29 जनवरी 2010 को 5.38P.M. पर ‘ट्विटर’ पर आए और उन्होंने लिखा, ‘‘ यह सच है कि इंटरनेट ने विविधतापूर्ण जमीनी लेखकों और पाठकों के सार्वजनिक वातावरण को पुनः सक्रिय किया है।’’ 5.40 पर उन्होंने फिर ‘ट्विट’ किया और लिखा, ‘‘ ब्राडकास्टिंग का यह निर्वैयक्तिक और बहुआयामी प्रतिवादी संतुलन है।’’ फिर 5.41 पर लिखा ‘‘ इसने संचार में अनिवार्य संप्रेषण के तत्व को शामिल कर दिया है। साथ ही यह सर्वसत्तावादी शासनों की सेंसरशिप की उपेक्षा करता है।’’ फिर 5.44 पर लिखा ‘‘ विश्व में लाखों बिखरे हुई चर्चाओ से बिखरे हुए आडिएंस और अलग-थलग पड़ी जनता का निर्माण हो रहा है। ’’ गार्जियन ने लिखा कि क्या 80 साल का फ्रेकफुर्ट स्कूल का मनीषी ‘ट्विट’ पर आया था ? अथवा कोई twitter.com/­jhabermas के नाम से हेबरमास का इस्तेमाल कर रहा है ? अथवा philosophy ­blogosके लोग उन्माद पैदा करने के लिए हेबरमास के नाम की प्रामाणिकता जानने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं ? कुछ लोग कह रहे हैं कि हेबरमास ने Political Communication in Media Society: Does D…

सैलीबरेटी अमिताभ से आतंकित क्यों है कांग्रेस

अमिताभ बच्चन ने जब से गुजरात के विकासदूत का जिम्मा लिया है तब से कांग्रेस बौखलाई घूम रही है। कल कांग्रेस के प्रवक्ता ने अमिताभ से जबाव मांगा कि वह गोधरा-गुजरात के 2002 के दंगों के बारे में अपनी राय व्यक्त करें ? पहली बात यह है कि अमिताभ से जबाव मांगने का कांग्रेस को कोई हक नहीं है। किसी भी नागरिक को यह हक है कि वह किसी मसले पर बोले या न बोले। जिस बेवकूफी के साथ कांग्रेस प्रवक्ता ने अमिताभ से जबाव मांगा है, उस सिलसिले को यदि बरकरार रखा जाए तो क्या किसी उद्योगपति से कांग्रेस यह सवाल कर सकती है ? क्या टाटा से नैनो का कारखाना गुजरात में लगाते वक्त यह सवाल कांग्रेस ने पूछा कि आप गुजरात क्यों जा रहे हैं ? वहां तो 2002 में दंगे हुए थे,क्या कांग्रेस ने उन उद्योगपतियों से सवाल किया था जिन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री को कुछ अर्सा पहले प्रधानमंत्री के पद हेतु ‘योग्य’नेता घोषित किया था, मूल बात यह है कि कांग्रेस जो सवाल अमिताभ से कर रही है वही सवाल देशी-विदेशी उद्योगपतियों से क्यों नहीं करती ? आखिरकार वे कौन सी मजबूरियां हैं जो कांग्रेस को देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों से गोधरा-गुजरात के दंगों पर स…

साम्यवादी खबर से क्यों डरते हैं ?

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एक जमाना था जब सोवियत शासन और समाजवाद के प्रभाववश सारी दुनिया में विचारों और सूचनाओं की सेसरशिप खूब होती थी, आए दिन समाजवादी समाजों में साधारण आदमी सूचना और खबरों को तरसता था। संयोग की बात है अथवा सिद्धांत की समस्या है यह कहना मुश्किल है,लेकिन सच यह है कि साम्यवादी विचारकों और कम्युनिस्ट समाज का सूचना और खबरों से बैर चला आ रहा है। आज भी समाजवादी समाजों में सूचना पाना,खबर पाना आसान नहीं हैं। हमें सोचना चाहिए कि आखिरकार साम्यवादी खबर से क्यों डरते हैं ? खबरों से डरने वाला समाज कभी भी स्वस्थ समाज का दावा नहीं कर सकता। जिस समाज में खबरें प्राप्त करने के लिए जंग करनी पड़े,वह समाज आर्थिक तौर पर कितनी भी तरक्की कर ले पिछड़ा ही कह लाएगा। यही स्थिति इन दिनों चीन की है। चीन में कहने को इंटरनेट है लेकिन अबाधित ढ़ंग से सूचनाएं पाना संभव नहीं है। सूचनाओं की खोज करते हुए आप जेल भी जा सकते हैं। पहली दिक्कत तो यह है कि सूचनाओं पर कड़ी साइबर निगरानी है। इसके बावजूद यदि सूचना मिल गयी तो उसे संप्रसारित करना मुश्किल होता है। उल्लेखनीय है चीन में इंटरनेट यूजर पर देश के अंदर नजर रखी जाती है। आप यदि ऐसी सूचन…

संचार क्रांति का मानवाधिकार कार्यकर्ता है ‘ ट्विटर' और 'ब्लॉगर'

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भारत में ‘ ट्विटर’ को अभी भी बहुत सारे ज्ञानी सही राजनीतिक अर्थ में समझ नहीं पाए हैं ,खासकर मीडिया से जुड़े लोग भारत के विदेश राज्यमंत्री शशि थरुर के ‘ट्विटर’ संवादों पर जिस तरह की बेवकूफियां करते हैं उसे देखकर यही कहने की इच्छा होती है कि हे परमात्मा इन्हें माफ करना ये नहीं जानते कि ये क्या बोल रहे है।‘ट्विटर‘ मूलतः नयी संचार क्रांति का मानवाधिकार कार्यकर्ता है। यह महज संचार का उपकरण मात्र नहीं है। यह साधारण जनता का औजार है। यह ऐसे लोगों का औजार है जिनके पास और कोई अस्त्र नहीं है। इन दिनों चीन में जिस तरह का दमन चक्र चल रहा है। उसके प्रत्युत्तर में चीन में मानवाधिकार कर्मियों के लिए ‘ट्विटर’ सबसे प्रभावशाली संचार और संगठन का अस्त्र साबित हुआ है। जगह-जगह साधारण लोग ‘ट्विटर’ के जरिए एकजुट हो रहे हैं। लेकिन एक परेशानी भी आ रही है। ‘ट्विटर’ में 140 करेक्टर में ही लिखना होता है और चीनी भाषा में यह काम थोड़ा मुश्किलें पैदा कर रहा है। ‘ट्विटर’ लेखन के कारण चीन में मानवाधिकार कर्मियों को ,खासकर नेट लेखकों को निशाना बनाया जा रहा है। नेट लेखक चीन की अदालतों में जनाधिकार के पक्ष में और चीनी प्र…

फिल्मी संस्कृति की प्रमुख चुनौतियां- 4-

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(हैदराबाद स्थित अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय में दीप प्रज्वलित करते जगदीश्वर चतुर्वेदी)
हिन्दी सिनेमा में राजनीति आरंभ से ही रही है। हिन्दी सिनेमा की यह विशेषता है कि इसके जितने भी बड़े हीरो हैं वे किसी न किसी न किसी रुप में भारत की राजनीति के प्रधान नेता के भावों और विचारों को व्यक्त करते रहे हैं। फिल्मों में ग्राम्य जीवन,कृषिदासता,भूमि विवाद, जाति संघर्ष, भारत-चीन युद्ध,भारत-पाक विवाद, मुसलमानों का स्टीरियोटाईप, औद्योगिक संस्कृति,राजनीतिक संवृत्तियां,राजनीतिक विमर्श की चालू भाषा आदि चीजें हैं जो बार बार आती रही हैं। ग्लोबलाइजेशन में कलाओं के सामने क्या चुनौती है और फैशन उद्योग में क्या चलेगा,इसका फैसला फिल्मों में होता है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं है बल्कि आधुनिककाल के उद्योग और राजनीतिक विमर्श के वातावरण निर्माण का उपकरण या माध्यम भी है। एक जमाना था सिनेमा में वाम की भाषा दिखती थी और आज वाम की प्रतिवादी भाषा नजर नहीं आती। अब सिनेमा की भाषा में दृश्यों के माध्यम से परवर्ती पूंजीवाद के दृश्यों का बाहुल्य नजर आता है। सिनेमा के दृशय ही हैं जो उसकी भा…

माध्यम और सामाजिक सरोकार - पीटर गोल्डिंग

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तकनीकी क्षेत्र में तेजी से आ रहे परिवर्तनों ने परंपरित जीवनशैली पर इनके प्रभावों को लेकर काफी आलोचना और आशंका पैदा की। कोई आश्चर्य नहीं कि सर्वाधिक नए माध्यम को भी उसी भर्त्सनामूलक आलोचना के नजरिए से देखा गया। टेलीविजन के एक आरंभिक आलोचक ने अपना अनुभव इन शब्दों में लिखा है-
     ''आणविक बमों के बुखार से पीड़ित इस दुनिया में जो बहुत भयावह ढंग से शांति और युद्ध के बीच संतुलन बनाए हुए है, एक नया ख़तरा पैदा हुआ है , टेलीविजन का ख़तरा-अणु के जेकिल और हाईड, एक ऐसी ताकत जो संस्कृति और मनोरंजन के क्षेत्र में क्रांति पैदा कर दे, जो एक ही साथ विनाश का दानव भी है और उसका निषेधक भी।''
      माध्यम के इस तकनीकी पक्ष के प्रति जागरुकता और भी ज्यादा गहराई से प्रसारण के साथ जुड़ी हुई है। यद्यपि तकनीक नएपन के प्रति लगाव सिनेमा के आरंभिक इतिहास का महत्वपूर्ण पक्ष रहा है। शायद इसकी जड़ें और भी गहरी हैं, उदाहरण के लिए, औद्योगीकरण के विरुद्ध लोकप्रिय विद्रोहों के रूप में। नई तकनीक ने कार्य और अवकाश दोनों में बदलाव किया है लेकिन दोनों के बीच का संबंध बहुत महत्वपूर्ण है कम से कम दोनों…

चीन और अमेरिका संबंधों का नया पैराडाइम-अरुण माहेश्वरी

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सरसरी तौर पर यह साफ दिखाई देता है कि चीन और अमेरिका की अर्थ–व्यवस्थाएं आपस में पूरी तरह से गुथ गयी है। चीन का विकास उसके निर्यात पर निर्भर है और उसके निर्यात का काफी बड़ा हिस्सा अमेरिका जाता है। 2001 में चीन का निर्यात उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 20 प्रतिशत था, जो 2007 तक बढ़ कर 36 प्रतिशत होगया। देशों के समूह के तौर पर निश्चित तौर पर यूरोपियन यूनियन उसके मालों का सबसे बड़ा ग्राहक है, लेकिन अकेले एक ग्राहक के रूप में अमेरिका का ही स्थान अव्वल है। इसके अलावा, अमेरिका को आपूर्ति करने वाले देशों में कुछ अर्से पहले तक कनाडा सबसे आगे था, लेकिन अब उसका स्थान चीन ले चुका है। चीन ही आज अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों का सबसे बड़ा खरीदार और मालिक है। पहले यह स्थान जापान को प्राप्त था। 2008 के बाद से चीन अब उससे आगे चला गया है। हाल के अमेरिकी संकट में अगर किसी देश ने अमेरिका के लिये सबसे बड़े त्राणदाता की भूमिका अदा की तो वह चीन ही था। अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद के जरिये चीन अमेरिका को ऋण देने वाला आज सबसे बड़ा देश बन चुका है। चीन और अमेरिका के संबंधों को लेकर अभी जिसप्रकार का चि…

फिल्मी संस्कृति की प्रमुख चुनौतियां- 3-

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मासकल्चर के उत्पादन का सबसे बड़ा कारखाना है सिनेमा। सिनेमा का संस्कृति के उत्पादन से कम और मासकल्चर के उत्पादन से ज्यादा संबंध है। भारत में सिनेमा निर्माण के 5 केन्द्र है,ये हैं-मुम्बई,मद्रास,हैदराबाद,कोलकाता और बैंगलौर। ये पांचों केन्द्र धीरे-धीरे माध्यम साम्राज्यवाद के दायरे में कैद होते चले जा रहे हैं। हाल ही में जारी ‘माई नेम इज खान’फिल्म की सफलता और इसके पहले की सफल फिल्मों और फिल्म उद्योग में देशी-विदेशी इजारेदार और बहुराष्ट्रीय पूंजी के निवेश और निरंतर फैलते साम्राज्य को ध्यान से देखें तो हमें फिल्म उद्योग में आ रहे परिवर्तनों और संकट का सही ढ़ंग से आभास मिल सकता है। एक जमाना था हिन्दी सिनेमा में पूंजी निवेश देशी था,इसमें वैध-अवैध दोनों ही किस्म का पैसा लगा था। यह सारा पैसा गैरइजारेदार घरानों का था।अर्थशास्त्र की भाषा में इसे लुंपन पूंजीपति या समानान्तर अर्थव्यवस्था कहते हैं या ब्लैकमनी भी कहते हैं। आज यह स्थिति नहीं है। आज सिनेमा उद्योग में अनिल अम्बानी से लेकर रुपक मडरॉक का पैसा लगा है। यह मूलत:ग्लोबलाइजेशन की विश्वव्यापी प्रक्रिया का हिस्सा है। देशी-विदेशी कारपोरेट घरानो…

फिल्मी संस्कृति की प्रमुख चुनौतियां- 2-

भारतीय सिनेमा में सांस्कृतिक संवाद का मूलाधार है आनंद। इसके तीन मुख्य तत्व हैं, ये हैं, भारतीय संस्कार, गाने और संगीत। ये तीनों ही तत्व मिश्रित संस्कृति का रसायन तैयार करते हैं। मिश्रित संस्कृति का संचार करने के कारण ही हिन्दी की फिल्में किसी भी विकसित और अविकसित पूंजीवादी मुल्क से लेकर समाजवादी सोवियत संघ तक में कई बार वर्ष की सर्वोच्च 10 या 20 फिल्मों में स्थान बनाती रही हैं। सांस्कृतिक बहुलतावाद की लोकतांत्रिक भावबोध के साथ जैसी सेवा हिन्दी सिनेमा ने की है वैसी सेवा हॉलीवुड भी नहीं कर पाया। यही वजह है कि बॉलीवुड का हिन्दी सिनेमा शीतयुद्ध के समय में हॉलीवुड के सामने चट्टान की तरह अड़ा रहा। पूरे शीतयुद्ध के दौरान हॉलीवुड सिनेमा ने दुनिया के अधिकांश देशों के सिनेमा उद्योग को बर्बाद कर दिया। किंतु भारत में उसे पैर जमाने में सफलता नहीं मिली। द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दौर में भारत का एक बड़ा फिनोमिना है आप्रवासी भारतीय। इसमें विविध किस्म के भारतीय हैं और ये अमेरिका से दक्षिण अफ्रीका,मारीशस से कैरिबियन देशों ,मध्यपूर्व के देशों से लेकर समूचे यूरोप तक फैले हैं। इनमें भारत की जातीय-सांस्कृतिक…

फिल्मी संस्कृति की प्रमुख चुनौतियां- 1-

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(फिल्म अभिनेता शाहरुख खान) संचार तकनीक के द्वारा निर्मित वातावरण स्वभावत: ग्लोबल-लोकल होता है। यह धारणा फिल्मों के ऊपर भी लागू होती है। भारतीय फिल्मों का चरित्र और हॉलीवुड फिल्मों का चरित्र अनेक मामलों में भिन्न है। भारतीय सिनेमा का मूलाधार है वैविध्य और बहुलतावाद। जबकि हॉलीवुड सिनेमा की धुरी है इकसारता। भारतीय सिनेमा में संस्कृति और लोकसंस्कृति के तत्वों का फिल्म के कथानक के निर्माण में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। जबकि हॉलीवुड सिनेमा के कथानक की धुरी है मासकल्चर। हॉलीवुड सिनेमा विश्वव्यापी अमरीकी ग्लोबल कल्चर के प्रचारक-प्रसारक की अग्रणी भूमिका अदा करता रहा है। जबकि भारतीय सिनेमा में पापुलरकल्चर के व्यापक प्रयोग मिलते हैं। हॉलीवुड-बॉलीवुड उद्योग की इस प्रकिया में भारतीय सिनेमा ने खिचड़ी फिल्मी संस्कृति का निर्माण किया है। उसने भारतीय फैंटेसी का व्यापक प्रचार-प्रसार किया है। भारतीय फिल्मी फैंटेसी के चार प्रमुख क्षेत्र हैं, प्रेम, परिवार -समुदाय, राष्ट्र और गरीब। इन चारों के कथानक,विवाद और नज़ारे सबसे ज्यादा रचे गए हैं। भारतीय सिनेमा में भाषायी वैविध्य है साथ ही इसे अपने लिए देश और विदेश …

स्त्री की भिन्नता का आख्यान

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स्त्रीऔरपुरूषएकप्रतीकव्यवस्थाबनातेहैंजिसमेंभाषासंरचनाहै।जिसकेअनेकदरवाजेहै,अनेकखिड़कियांहैं।अनेकतरीकेहैं।यहांपरविषयकोसेक्स