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March, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -4-यशपाल

भगवतीचरण वोहरा नेशनल कालेज में हम लोगों से दो वर्ष ऊपर थे। यों तो भगत सिंह का डीलडौल भी दो-तीन वर्ष में काफी पनप आया था परंतु भगवतीचरण की बराबरी वह भी न कर सकता था। कद छह फुट से कुछ ही कम, दोहरा, कसरती, चुस्त बदन। गोलसा गंभीर चेहरा, गंदमी रंग, जरा भारी होंठ, आंखें चश्मे के शीशों के पीछे छिपी हुर्इं। उनका जन्म लाहौर में ही हुआ था परंतु वंशक्रम से वे गुजराती ब्राह्मण थे। भगवतीचरण अपने आप को पंजाबी ही कहते थे और इतना शुध्द पंजाबी उच्चारण करते थे कि उनके बहुत अंतरंग लोगों के सिवा दूसरे शायद ही जानते हों कि उनके पूर्वज गुजरात से आगरा और आगरे से लाहौर में आकर बसे थे। इन दिनों गुप्त संगठन के कार्य का क्षेत्रा तैयार करने के लिए पंजाब में एच.आर.ए. का परचा आया तो जयचंद्रजी के सूत्राों से था परंतु रखा गया था गवालमंडी में भगवतीचरण के मकान पर ही। इसे बांटने के आयोजन में भी भगवतीचरण ने पूरा सहयोग दिया था। 'नौजवान भारत सभा' की स्थापना के लिए विचार और सूत्रपात से ही हम सब ने सहयोग दिया। उसके मुख्य सूत्राधार भगत सिंह और भगवतीचरण ही थे। भगत सिंह जनरल सेक्रेटरी और भगवतीचरण प्रोपेगेण्डा सेक्रेटरी थे…

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -3-यशपाल

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नेशलन कालिज में भाई परमानंद प्राध्यापक थे। वे पढ़ने-लिखने में ही लगे रहते। एक प्रकार से भाई परमानंद ही लाला लाजपत रायजी की ओर से नेशलन कालिज के व्यवस्थापक थे। भाई परमानंदजी की स्थिति के व्यक्ति का केवल कुर्ता-धोती पहनना और वह मोटे और घर के धोये, बिना स्त्री किए विशेष ध्यान आकर्षित करता था। उन्हें साधारणत: लोग त्याग मूर्ति भाई परमानंदजी कहते थे।

भाई परमानंदजी को पायजामा और कोट पहनने वाले विद्यार्थियों के प्रति खासी वितृष्णा थी। जो विद्यार्थी जुल्फें रखकर तेल और कंघी का व्यवहार करते थे, उन्हें तो वे बिल्कुल जनखा ही समझते थे। वे कालेज में इतिहास पढ़ाते थे और साधारणत: विद्यार्थियों में राष्ट्र सेवा की भावना को उत्साहित भी करते थे। जिनमें ऐसी रुचि देखते उन्हें प्रोत्साहित भी करते। इस प्रसंग में यदि किसी ऐसे विद्यार्थी का नाम उन्हें सुझाया जाता जो धोबी के धुले साफ कपड़े पहनने का शौक रखता हो, तो वे उसकी ओर से तुरंत ही निराशा प्रकट कर देते।

नेशनल कालेज के प्रिंसिपल आचार्य जुगल किशोरजी थे। आचार्यजी 1951 में उ.प्र. कांग्रेस के प्रधान और तदनंतर श्रमविभाग के मंत्री हो गए थे। उ.प्र. कांग्रेस के…

यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -2-यशपाल

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आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद ने यद्यपि विदेशी शासन से विद्रोह की पुकार नहीं उठाई थी, अपने धर्मग्रंथ 'सत्यार्थप्रकाश' में उन्होंने राजभक्ति का भी उपदेश जरूर दिया है परंतु वे यह लिखे बिना भी नहीं रह सके कि विदेशी शासन चाहे जितना भी सुखदायक और उन्नतिशील क्यों न हो, अपनी जाति के स्वतंत्र शासन से अच्छा नहीं हो सकता। आर्यसमाज के आंदोलन से प्रभावित होने वाले लोगों की भावना पर स्वामीजी के इस वाक्य का प्रभाव न पड़ा हो, यह नहीं हो सकता। यह सामाजिक चेतना का अनिवार्य परिणाम था। एक समय ऐसा था कि कोई भी व्यक्ति आर्यसमाजी बन जाने से ही सरकार की दृष्टि में राजनैतिक रूप से संदिग्ध हो जाता था। उस समय किसी नवयुवक के आर्यसमाजी बन जाने पर परिवार के लोग ऐसे ही चेहरा लटका लेते थे जैसे कि आजकल घर के लड़के के कम्युनिस्ट बन जाने पर आशंका अनुभव की जाती है। आर्यसमाज के प्रभाव से देश की अधोगति के प्रति असंतोष, समाज को पतन से बचाने की इच्छा और विदेशी शासन के प्रति मूक विरोध की भावना दो तरह प्रकट हो रही थी। इसका एक रूप था- भारत की प्राचीन समृध्दि और शक्ति का अत्युक्तिपूर्ण प्रचार। इसका अभिप्राय था…

रघुवीर सहाय की पांच छोटी कविताएं

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उसका रहना रोज़ सुबह उठकर पाते हो उसको तुम घर में इससे यह मत मान लो वह हरदम मौजूद रहेगी


बेटे से
टूट रहा है यह घर जो तेरे वास्ते बनाया था जहाँ कहीं हो आ जाओ...  नहीं यह मत लिखो लिखो जहाँ हो वहीं अपने को टूटने से बचाओ हम एक दिन इस घर से दूर दुनिया के कोने में कहीं बाहें फैलाकर मिल जाएँगे


भ्रम निवारण तुम क्या समझते हो कि हर लड़की जो मुझे देखकर  मुस्कुराती है मेरी पहचानी है नहीं,वह तो सिर्फ  अपनी दुनिया में मस्त रहती है


ग़रीबी  "हम गरीबी हटाने चले और उस समाज में जहाँ आज भी दरिद्र होना दीनता नहीं भारतीयता की पहचान है,दासता विरोध है दमन का प्रतिकार है हम ग़रीबी हटाने चले हम यानी ग़रीबों से नफ़रत हिकारत परहेज़ करनेवाले  हम गरीबी हटाते हैं तो ग़रीब का आत्म सम्मान लिया करते हैं इसलिए मैं तो इस तरह ग़रीबी हटाने की नीति के विरूद्ध हूं क्योंकि वही तो कभी-कभी अपने सम्मान की अकेली  रचना रह जाती है


ख़तरा एक चिटका हुआ पुल है  एक रिसता हुआ बाँध है ज़मीन के नीचे बढ़ता हुआ पानी है ख़तरे में राम ख़तरे में राजधानी है पहले खुदा के यहाँ देर थी अँधेर न था  अब खुदा के यहाँ अंधेर है और उसमें देर नहीं






यादों के आइने में भगतसिंह और उनके साथी -1-यशपाल

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( क्रांतिकारी और महान कथाकार स्व.यशपाल) मैं यह कहानी व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर लिख रहा हूं। भगत सिंह, सुखदेव और मैं कालिज के सहपाठी थे। भगवतीचरण हम लोगों से दो बरस आगे थे। सहपाठी ही नहीं, हम लोगों में विशेष आंतरिकता भी थी। इस आंतरिकता का भी कुछ कारण रहा होगा। इस आंतरिकता द्वारा मैं उन लोगों की परिस्थितियों को भी जान सका हूं। भगत सिंह का पारिवारिक घर लाहौर से लगभग कुछ मील दूर सांडा गांव में था। सुखदेव लायलपुर का रहने वाला था। भगवतीचरण वोहरा लाहौर के ही रहने वाले थे। मेरे परिवार का आदिम स्थान तो कांगड़े का पहाड़ी जिला है परंतु पंजाब नेशनल कालिज में मैं फिरोजपुर से गया था। लाहौर के पंजाब नेशनल कालिज में, जहां कि एच.एच.आर.ए. की प्रथम धूनी सुलगी, हम लोगों का आकर मिल जाना जैसी परिस्थितियों में संभव हुआ और जिन प्रवृत्तियों के कारण हम लोग एक दूसरे की ओर आकर्षित हुए या हमने एक दूसरे में कुछ ऐसी बात विश्वास के योग्य पाई जिसके कारण जिंदगी-मौत के खेल में साथी बन गए। सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन के जिस काल से मेरा व्यक्तिगत संबंध रहा है उसमें भगत सिंह का स्थान महत्वपूर्ण था। क्रांत…

प्रमोशन और साहित्य का संकट

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कोलकाता में एक दशक से हिन्दी सेमीनार के प्रमाणपत्र जुटाने की संक्रामक बीमारी कॉलेज शिक्षकों में फैल गयी है। सेमीनार में वे इसलिए सुनने जाते हैं जिससे उन्हें सेमीनार में भाग लेने का सर्टीफिकेट मिल जाए। यह साहित्य के चरम पतन की सूचना है। ये वे लोग हैं जो हिन्दी साहित्य से रोटी-रोजी कमा रहे हैं। ये लोग सेमीनार में बोले बिना सेमीनार में भाग लेने का प्रमाणपत्र पाकर अपने को धन्य कर रहे हैं। आयोजक यह कहकर शिक्षकों को बुलाते हैं कि प्रमोशन कराना है तो सेमीनार सर्टीफिकेट लगेगा, आ जाओ सुनने, सर्टीफिकेट मिल जाएगा। फलतः ज्यादातर शिक्षक सेमीनार को सुनने आते हैं। सेमीनार का सर्टीफिकेट पाने के लिए वे डेलीगेट फीस भी देते हैं। इस प्रक्रिया में दो किस्म का साहित्यिक भ्रष्टाचार हो रहा है. पहला नौकरी में प्रमोशन के स्तर पर हो रहा है। श्रोता के सर्टीफिकेट को वक्ता के सर्टीफिकेट के रूप में पेश करके तरक्की के पॉइण्ट प्राप्त किए जा रहे हैं। दूसरा , साहित्य विमर्श के नाम पर कूपमंडूकता बढ़ रही है। सेमीनारों में वक्ताओं के भाषण साधारण पाठक की चेतना से भी निचले स्तर के होते हैं और सेमीनार के बाद सभी लोग एक-दूसरे…