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January, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

1857 में भारत से आने वाले समाचार- कार्ल मार्क्स

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भारत से आने वाली पिछली डाक, जिसमें दिल्ली की 17 जून तक की और बंबई की 1 जुलाई तक की खबरें मौजूद हैं, भविष्य के संबंध में अत्यंत निराशापूर्ण चिंताएं उत्पन्न करती हैं। नियंत्रण बोर्ड (बोर्ड ऑफ कंट्रोल) के अध्यक्ष, मि. वर्नन स्मिथ ने जब भारतीय विद्रोह की पहले-पहल कॉमन्स सभा को सूचना दी थी, तो उन्होंने विश्वासपूर्वक कहा था कि अगली डाक यह खबर लेती आएगी कि दिल्ली को जमींदोज कर दिया गया है। डाक आई, लेकिन दिल्ली को अभी तक 'इतिहास के पृष्ठों से साफ' नहीं किया जा सका है। उस वक्त कहा गया था कि तोपखाने की गाड़ी 9 जून से पहले नहीं लाई जा सकेगी और इसलिए शहर पर, जिसकी किस्मत का फैसला हो चुका है, उस तारीख तक के लिए हमला रुक जाएगा। पर 9 जून भी बिना किसी उल्लेखनीय घटना के ही गुजर गया। 12 और 15 जून को कुछ घटनाएं हुईं, लेकिन उलटी ही दिशा मेंदिल्ली पर अंगरेजों का धावा नहीं हुआ, बल्कि अंगरेजों के ऊपर विप्लवकारियों ने हमला बोल दिया। लेकिन उनके बारंबार होने वाले इन हमलों को रोक दिया गया है। इस तरह दिल्ली का पतन फिर स्थगित हो गया है। इसका तथाकथित एकमात्र कारण अब घेरे के लिए तोपखाने की कमी नहीं है, बल्क…

28जनवरी जन्मदिन पर विशेष- जोसे मार्ती की विरासत- फिदेल कास्त्रो

जोसे मार्ती के जन्म की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित विश्व संतुलन के लिए अंतर्राष्ट्रीय बैठक के विशिष्ट प्रतिभागियो,देशवासियो, क्यूबावासियों के लिए मार्ती का क्या महत्व है? मार्ती जब 16 वर्ष के थे तब उन्हें पैरों में बेड़ियों के साथ कठोर कारावास में डाल दिया गया था। जब वे मुश्किल से 18 वर्ष के थे तो उन्होंने 'पॉलिटिकल प्रीजन इन क्यूबा' नामक दस्तावेज में दृढ़ता के साथ कहा था,'ईश्वर मौजूद है लेकिन अच्छाई के विचार में। वह प्रत्येक मानव के जन्म के समय मौजूद रहता है और उनकी आत्माओं में एक शुध्द आंसू रोप जाता है। अच्छाई ही ईश्वर है। आंसू शाश्वत अनुभूति का स्रोत है।' हम क्यूबावासियों के लिए मार्ती अच्छाई के ऐसे ही विचार हैं।स्वतंत्रता के लिए 10 अक्टूबर 1868 से शुरू हुए संघर्ष को मार्ती के जन्म के ठीक 100 साल बाद जब 26 जुलाई 1963 से फिर शुरू किया गया तो उनके नैतिक सिध्दांतों की विरासत हमारे पास थी जिसके अभाव में हम क्रांति की बात सोच भी नहीं सकते थे। उनसे ही हमें देशभक्ति की प्रेरणा मिली और सम्मान तथा मानव गरिमा का विचार मिला। ऐसे उदात्त विचार दुनिया में और कोई हमें नहीं दे सक…

जेएनयू छात्र प्रतिवाद का स्वर्णिम पन्नाः इंदिरा गांधी वापस जाओ

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( जेएनयू कुलपति के ऑफिस के सामने प्रतिवाद करते हुए छात्र) जेएनयू में रहते हुए अनेक सुनहरे पलों को जीने का मौका मिला था। जेएनयू के पुराने दोस्तों ने काफी समय से एक फोटो फेसबुक पर लगाया हुआ है। यह फोटो और इसके साथ जुड़ा प्रतिवाद कई मायनों में महत्वपूर्ण है। छात्र राजनीति में इस प्रतिवाद की सही मीमांसा होनी चाहिए। उन छात्रों को रेखांकित किया जाना चाहिए जो पुलिस लाठाचार्ज में घायल हुए। उन छात्रनेताओं की पहचान की जानी चाहिए जो नेतृत्व कर रहे थे। उन परिस्थितियों का मूल्यांकन भी किया जाना चाहिए जिसमें यह प्रतिवाद हुआ था। संभवतः 30 अक्टूबर 1981 का दिन था वह। इस दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.श्रीमती इंदिरागांधी जेएनयू में आयी थीं। याद करें वह जमाना जब श्रीमती गांधी 1977 की पराजय के बाद दोबारा सत्ता में 1980 में वापस आयीं। जेएनयू के छात्रों के प्रतिवाद का प्रधान कारण था कि आपातकाल में लोकतंत्र की हत्या में वे अग्रणी थीं,जेएनयू के छात्रों के दमन में भी वे अग्रणी थीं। स्कूल आफ इंटरनेशनल स्टैडीज के तत्कालीन डीन के.पी मिश्रा ने उन्होंने स्कूल के 25 साल होने पर बुलाया था,छात्रों ने आमसभा में सर्वसम्मत…

हिन्दीभाषी पूंजीपति का हिन्दीभाषा से अलगाव क्यों ?

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हमारे मित्र विमलेश त्रिपाठी युवा कवि हैं और मेरे छात्र भी रहे हैं। वे आए दिन मेरी खबर सुध ले लेते हैं। उनसे चैट के जरिए आज जो बात हुई उसमें अचानक कई विचारणीय समस्याएं अचानक सामने आ खड़ी हुईं। मैं यहां वह बातचीत रख रहा हूँ आप लोग भी इन समस्याओं पर सोचें।- विमलेश ने रोमन हिन्दी में कहा है और मैंने देवनागरी में।  - good morning sir
- कहिए
कैसे हैं

 kaise hain sir?
main thik hun....thora busy tha idhar kuchh kaamon men....

 एकदम ठीक,
क्या कर रहे हो इन दिनों ,
खूब लिख रहे हो यह अच्छी बात है

nahin sir khub kahan likh raha hun....
aapne ko bachana hai to likhna padega...bas utna hi likh raha hun

 कुछ सामयिक विषयों पर आसपास के हिन्दी-अहिन्दीभाषियों की समस्याओं और जिंदगी पर भी लिखो
पश्चिम बंगाल के बारे में लोग कम जानते हैं
jee  कम से कम सप्ताह में एक पन्ना जरूर लिखो
jee aapka sujhav dhyan me rakhunga  मुझे बेहद तकलीफ होती है, यहां के हिन्दीभाषियों को देखकर
jee, ye to hai... ajib log hain....

 मैंने अभिव्यक्तिविहीन हिन्दीभाषी ,वह भी शिक्षित यहीं पर देखे हैं । तुम लोगों की जिम्मेदारी है जो अभिव…

फासीवादी ताकतें मार्क्सवाद का विरोध क्यों करती हैं ? - रोजे बूर्दरों

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जहां तक मार्क्सवाद और मार्क्सवादी पार्टियों का संबंध है, फासीवादी आंदोलनों में प्रयुक्त शब्द बहुत सटीक नहीं है। फासीवादी जानबूझ कर गोलमोल शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। और 'मार्क्सवाद' 'समाजवाद' 'कम्युनिज्म' के बीच फर्क नहीं करते और कम्युनिस्ट आंदोलन और सोशल-डेमोक्रेसी के बीच भी फर्क नहीं करते। इन आंदोलनों के संस्थापक और विचारक जब अपने आंदोलन के सिद्धांत परिभाषित करते हैं तो मार्क्सवादी विचारों के नकार से ही शुरू करते हैं। इसके अनगिनत उदाहरण हैं। 21 जून 1921 को सत्ता प्राप्ति के पहले मुसोलिनी ने संसद में मार्क्सवाद के विध्वंस को सारभूत उद्देश्य के रूप में चिह्नित किया था : 'हम अपनी पूरी शक्ति के साथ समाजीकरण, राज्यीकरण और सामूहिकीकरण की कोशिशों का विरोध करेंगे। राजकीय समाजवाद से हम भर पाए। हम आपके जटिल सिध्दांतों, जिन्हें हम सत्य और नियतिविरोधी करार देते हैं, के विरुध्द अपना सैध्दांतिक संघर्ष छोड़ेंगे नहीं। हम नकारते हैं कि दो वर्गों का अस्तित्व है, क्योंकि और बहुतों का भी अस्तित्व है। हम नकारते हैं कि आर्थिक नियतिवाद के जरिए समस्त मानव-इतिहास की व्याख्य…

भारत में विद्रोह- फ्रेडरिक एंगेल्स

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गर्मी और वर्षा के गर्म महीनों में भारत का अभियान लगभग पूर्ण रूप में स्थगित कर दिया गया है। सर कॉलिन कैंपबेल ने एक शाक्तिशाली प्रयास के द्वारा अवध और रुहेलखंड के तमाम महत्वपूर्ण स्थानों पर गर्मी के प्रारंभ में ही अधिकार कर लिया था। उसके बाद उन्होंने अपने सैनिकों को छावनी में रख दिया है और बाकी देश को खुले तौर पर बागियों के कब्जे में छोड़ दिया है। और अपनी कोशिशों को वे संचार के अपने साधनों को बनाए रखने तक ही सीमित रख रहे हैं। इस काल में महत्व की जो एकमात्र घटना अवध में हुई है, वह हैमान सिंह की सहायता के लिए सर होप ग्रैंट का शाहगंज के लिए अभियान। मान सिंह एक ऐसा देशी राजा है जिसने काफी हीले-हवाले के बाद कुछ ही समय पहले अंगरेजों के साथ समझौता कर लिया था और अब उसके पुराने देशी मित्रों ने उसे घेर लिया था। यह अभियान केवल एक सैनिक सैर के समान सिध्द हुआ-यद्यपि लू और हैजे की वजह से अंगरेजों का उसमें भारी नुकसान हुआ होगा। देशी लोग बिना मुकाबला किए ही तितर-बितर हो गए और मान सिंह अंगरेजों से जा मिला। इतनी सरलता से प्राप्त हुई इस सफलता से यद्यपि यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरा अवध इसी प्रका…