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October, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मीडि‍या सर्वे : भारतीय पाठक आगे हैं नेट यूजर से

इंटरनेट के चालीस साल हो चुके हैं। इंटरनेट जब आया था तो लोग कह रहे थे कि‍ अब अखबार के दि‍न लद गए। लोग अखबार नहीं पढेंगे। टीवी क्रांति‍ हुई तो हल्‍ला शुरू हो गया कि‍ अखबार के दि‍न लद गए। लेकि‍न अखबार अभी भी जिंदा है। भारत में अखबार के पाठकों की संख्‍या तेजी से बढ रही है। अखबारों का प्रकाशन बढ रहा है। कल तक जो अखबार की मौत पर शोक प्रस्‍ताव पढ रहे थे वे आज  प्रेस क्रांति‍ देखकर अवाक हैं। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि‍ आखि‍रकार भारत में प्रिंट क्रांति‍ का रहस्‍य क्‍या है ।
      प्रेस क्रांति‍ के कारण भारत में सन् 2007  में  दैनि‍क अखबारों के पाठकों की संख्‍या 150 मि‍लि‍यन का आंकडा पार गयी। इसकी तुलना में अमेरि‍का में दैनि‍क अखबार के 97 मि‍लि‍यन पाठक हैं। जर्मनी में 48 मि‍लि‍यन पाठक हैं। इसके वि‍परीत भारत में अखबारों का सर्कुलेशन छलांग लगा रहा है। अखबारों की आय में बढोतरी हुई है। वि‍ज्ञापनों में इजाफा हुआ है। सन् 2007 में वि‍ज्ञापनों से होने वाली आय में 15 फीसद की बढोतरी हुई।अकेले दि‍ल्‍ली से 15 भाषाओं में अखबार प्रकाशि‍त होते हैं। इनमें अंग्रेजी और हि‍न्‍दी के अखबारों का क्षेत्रीय रूझान है। ज…

श्रीमती इंदि‍रा गांधी की हत्‍या के दि‍न सदमे में था जेएनयू

ऐसा गम मैंने नहीं देखा बौद्धि‍कों के चेहरे गम और दहशत में डूबे हुए थे। चारों ओर बेचैनी थी । कैसे हुआ,कौन लोग थे, जि‍न्‍होंने प्रधानमंत्री स्‍व.श्रीमती इंदि‍रा गांधी की हत्‍या की। हत्‍या क्‍यों की। क्‍या खबर है।क्‍या क्‍या कर रहे हो इत्‍यादि‍ सवालों को लगातार जेएनयू के छात्र -शि‍क्षक और कर्मचारी छात्रसंघ के दफतर में आकर पूछ रहे थे। मैंने तीन -चार दि‍न पहले ही छात्रसंघ अध्‍यक्ष का पद संभाला था,अभी हम लोग सही तरीके से यूनि‍यन का दफतर भी ठीक नहीं कर पाए थे। चुनाव की थकान दूर करने में सभी छात्र  व्‍यस्‍त थे कि‍ अचानक 31 अक्‍टूबर 1984 को सुबह 11 बजे के करीब खबर आई प्रधानमंत्री श्रीमती इंदि‍रा गांधी की हत्‍या कर दी गयी है। सारे कैंपस का वातावरण गमगीन हो गया ।लोग परेशान थे।  मैं  समझ नहीं पा रहा था क्‍या करूँ ? उसी रात को पेरि‍यार होस्‍टल में शोकसभा हुई जि‍समें हजारों छात्रों और शि‍क्षकों ने शि‍रकत की और  सभी ने शोक व्‍यक्‍त कि‍या। श्रीमती गांधी की हत्‍या के तुरंत बाद ही अफवाहों का बाजार गर्म हो गया। कि‍सी ने अफवाह उडा दी कि‍ यूनि‍यनवाले मि‍ठाई बांट रहे थे। जबकि‍ सच यह नहीं था। छात्रसंघ…

ताजा मीडि‍या सर्वे : ऑनलाइन के खेल में अखबार की सत्‍ता बरकरार

मीडि‍या के नए अनुसंधान अमरीकी मीडि‍या के अनेक मि‍थों को तोडते हैं। मीडि‍या खबरों का स्‍तर गि‍रा है। अधूरी,अपूर्ण, वि‍भ्रमपूर्ण खबरें प्रकाशि‍त होती है। वि‍गत बीस सालों में समाचारों का स्‍तर तेजी से गि‍रा है। यह नि‍ष्‍कर्ष है 'पेव रि‍सर्च सेंटर' के ताजा सर्वे का। 'पेव रि‍सर्च सेंटर' (PewResearchCente) ने 1,506 लोगों के साक्षात्‍कारों के आधार पर यह सर्वे तैयार कि‍या है। 63 प्रति‍शत लोगों का मानना है समाचारपत्रों में प्रकाशि‍त समाचार लेख अधूरे होते हैं। मात्र 29 प्रति‍शत लोगों का मानना था कि‍ मीडि‍या ''सीधे तथ्‍यों'' को संप्रेषि‍त करता है। सामाजि‍क -राजनीति‍क सवालों पर मीडि‍या घराने एक ही कि‍स्‍म के नजरि‍ए का पक्ष लेते हैं,ऐसा 74 प्रति‍शत लोगों का मानना था। कुछ लोगों का मानना था ताकतवर लोगों के हि‍तों का भी मीडि‍या पर प्रभाव देखा गया है। सन् 2007 के बाद के दो सालों में 'पेव' के पि‍छले सर्वे के नि‍ष्‍कर्ष और भी नकारात्‍मक दि‍शा में गए हैं। उल्‍लेखनीय है सन् 2002 से यह संस्‍थान सर्वे प्रकाशि‍त करता रहा है और इसके सर्वे महत्‍वपूर्ण और प्रामाणि‍क माने …

वि‍श्‍व ब्‍लॉग सर्वे : ब्‍लॉगिंग से स्‍तब्‍ध हैं सत्‍ताधारी

ब्‍लॉगिंग का परंपरागत मीडि‍या के साथ कोई बैर नहीं है। सच यह है कि परंपरागत मीडि‍या में काम करने वाले अधि‍कांश पत्रकारों के ब्‍लॉग हैं। हिंदी में एक खास बात यह है कि‍ नये युवा लेखक ब्‍लॉग बना कर लि‍ख रहे हैं। नये पेशेवर लोग लि‍ख रहे हैं। हिंदी में जो अभी कम लि‍ख रहे हैं, वे हैं हिंदी के कॉलेज, वि‍श्‍ववि‍द्यालयों में पढ़ाने वाले शिक्षक। लेकि‍न जो शि‍क्षक नहीं हैं, लेकि‍न युवा हैं, लि‍खने का मन है, वि‍भि‍न्‍न वि‍षयों पर अच्‍छी तैयारी है, ऐसे नये लेखक हज़ारों की तादाद में लि‍ख रहे हैं। ऐसे लेखकों की संख्‍या को चि‍ट्ठाजगत पर ब्‍लॉगरों की बढ़ती हुई सूची देख कर सहज ही समझा जा सकता है। तकरीबन 11 हज़ार ब्‍लॉग लेखक हैं, जो प्रति‍दि‍न सैकड़ों लेख लि‍ख रहे हैं। इनमें अच्‍छा कौन लि‍ख रहा है, बुरा कौन लि‍ख रहा है – पढ़ने वाला सहज ही अंदाज़ा लगा लेता है।
ब्‍लॉग पाठक को कि‍सी बि‍चौलि‍ये की ज़रूरत नहीं है। उसे कि‍सी आलोचक की भी ज़रूरत नहीं है, जो यह बताये कि कौन लेखक है और कौन लेखक नहीं है। इस अर्थ में ब्‍लॉगिंग ने बिचौलिये आलोचक की मौत की घोषणा कर दी है। हिंदी के ब्‍लॉगरों का अधि‍कांश लेखकवर्ग उनमें स…

इंटरनेट में लैटि‍न की वि‍दाई और देशज भाषाओं का आगमन

इंटरनेट पर देशज भाषाओं का दखल बढ़ रहा है। इंटरनेट पर आने वाले समय में डोमेन नाम, वेबसाइट, ईमेल पता, ट्वि‍टर पोस्‍ट आदि‍ में अब गैर अंग्रेजी भाषाएं भी नजर आएंगी। खासकर चीनी, अरबी,कोरि‍यन और जापानी भाषाओं का प्रयोग होने लगेगा। अभी तक डोमेन पते पर अंग्रेजी का ही इस्‍तेमाल होता है। इसके अलावा ग्रीक,हि‍न्‍दी,रूसी आदि‍ भाषाओं के प्रयोग का रास्‍ता भी खुल जाएगा। ''Internet Corporation for Assigned Names and Numbers'' (आईसीएएनएन) के प्रवक्‍ता ने 26 अक्‍टूबर 2009 को बताया कि वेब पते पर लैटि‍न भाषा के उपयोग का फैसला इस सप्‍ताह उठा लि‍या है। इंटरनेट के भाषि‍क और संरचनात्‍मक इति‍हास का यह अब तक का सबसे बड़ा बदलाव है। इंटरनेट के जन्‍म के साथ वि‍गत चालीस सालों में वेब पते‍ के लि‍ए लैटि‍न का प्रयोग होता रहा है। दक्षि‍ण कोरि‍या की राजधानी सि‍ओल में सारी दुनि‍या के इंटरनेट कंपनि‍यों, सूचना सम्राटों , वि‍भि‍न्‍न सर्वर के मालि‍कों,सुरक्षा वि‍शेषज्ञों आदि‍ छह दि‍नों तक चलने वाली कॉंफ्रेंस में मि‍ले । इसी कॉंफ्रेस में यह महत्‍वपूर्ण फैसला लि‍या गया है। इस परि‍वर्तन की घोषणा इंटरनेट…

साइबर उत्‍पाति‍यों की खैर नहीं

भारत में मंगलवार से संशोधि‍त सूचना तकनीक कानून 2008 लागू हो गया है। यह सन् 2008 के सूचना तकनीक कानून का संशोधि‍त रूप है। साइबर जगत के अपराधों पर अब सरकार और भी सख्‍ती के साथ पेश आएगी। अभि‍व्‍यक्‍ति‍ की आजादी के नाम चाहे जि‍से संदेश भेजना, अपमानजनक ब्‍लाग लेखन, अपमानजनक टि‍प्‍पणि‍यां,अश्‍लील सामग्री का वि‍तरण, बाल पोर्नोग्राफी के वि‍तरण के साथ -साथ साइबर सामग्री के बगैर अनुमति‍ के उपयोग और दुरूपयोग के बारे में यह कानून ज्‍यादा सख्‍त है। इस कानून से गैर कानूनी साइबर हरकतें कि‍तनी कम होंगी यह तो वक्‍त ही बताएगा, लेकि‍न यह तय है‍ अब आप मनमाने लेखन के दि‍न लद गए।
साइबर जगत में जि‍म्‍मेदार लेखन और सृजन के लि‍ए ज्‍यादा सुरक्षि‍त रास्‍ता तैयार हुआ है। अभी तक जो लोग अपमानजनक ईमेल भेजकर सो जाते थे वे ऐसा नहीं कर पाएंगे। अपमानजनक, अवैध ईमेल कानून के दायरे में आ चुके हैं। अब आपका ईमेल भी वैध गति‍वि‍धि‍ है। आपकी टि‍प्‍पणी और ईमेल भी कॉपीराइट के दायरे में हैं। गलत करने पर दंडि‍त हो सकते हैं। गोपनीयता का उल्‍लंघन अभी तक साइबर स्‍पेस में अपराध नहीं था लेकि‍न अब अपराध है। आप कि‍सी के वैध संरक्षि‍त डाट…

जेएनयू में हि‍न्‍दी-उर्दू् के दि‍ग्‍गजों का महामि‍लन

जेएनयू के हि‍न्‍दी-उर्दू के पूर्व छात्रों का समागम आगामी 27-29 अक्‍टूबर 2009 को  होने जा रहा है। यह समागम इस अर्थ में महत्‍वपूर्ण है कि‍ इसमें पहलीबार नामवरजी नहीं हैं। जेएनयू का भारतीय भाषा केन्‍द्र नामवर के बि‍ना सूना लगता है ,लगता है प्रो.चमनलाल ने नामवरजी की उस बात का ख्‍याल रखा है जो उन्‍होंने 'जेएनयू में नामवर' पुस्‍तक के लोकार्पण के समय दि‍ल्‍ली के त्रि‍वेणी सभागार में कही थी। नामवरजी ने कहा था '' मैं चाहता हूँ कभी मुझे सुनने के लि‍ए भी बुलाया जाए''। नामवर जी के छात्रों ने लगता है उनकी बात रख ली है। देखते हैं आगे क्‍या होता है। आशा है इस मौके पर आदरणीय गुरूवर सुनने तो कम से कम जरूर आएंगे। वैसे भी यदि‍ वे कार्यक्रम में आ धमके और छात्रों ने मांग कर दी तो उन्‍हें मंच पर आने से कौन रोक पाएगा । तब वह वक्‍ता ही होंगे। श्रोता नहीं।
जेएनयू के हि‍न्‍दी-उर्दू के भूतपूर्व छात्रों का यह समागम कई अर्थों में महत्‍वपूर्ण है। पहला महत्‍व यह है कि‍ इसमें नामवरजी नहीं होंगे। इस कार्यक्रम का दूसरा महत्‍व यह है कि‍ इसमें हि‍न्‍दी-उर्दू के सवालों पर नए परि‍प्रेक्ष्…

अमेरि‍का में फंडामेंटलि‍ज्‍म का असली चेहरा

सा 

जनमाध्यमोंसेअमेरिकीसमाजकीआमतौरपरजोतस्वीरपेशकीजातीहैउसमेंग्लैमर, चमक- दमक,शानो-शौकत,खुशी,आनंद,मजा,सेक्स,सिनेमा,उपभोक्तावस्तुओंकीभरमार,सत्ताकेखेल, अमीरीकेसपनेप्रमुखहोतेहैं।इसतरहकीप्रस्तुतियोंमेंकभीभीयहनहींबतायाजाताकिअमेरिकीसमाजफंडामेंटलिज्मकीओरजारहाहै।अथवाअमेरिकामेंफंडामेंटलिस्टोंकाबोलवालाहै।फंडामेंटलिज्मकोअमेरिकीमीडियानेहमेशा