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रविवार, 31 जुलाई 2016

प्रेमचंद और भाषा समस्या

एक है मीडिया की भाषा और दूसरी जनता की भाषा,मीडिया की भाषा और जनता की भाषा के संप्रेषण को एकमेक करने से बचना चाहिए।

प्रेमचंद ने भाषा के प्रसंग में एक बहुत ही रोचक उपमा देकर भाषा को समझाने की कोशिश की है, उन्होंने लिखा है ´यदि कोई बंगाली तोता पालता है तो उसकी राष्ट्रभाषा बँगला होती है।उसी तोते की सन्तान किसी हिन्दी बोलनेवाले के यहाँ पलकर हिन्दी को ही अपनी मादरी-जबान बना लेता है।बाज़ तोते तो अपनी असली भाषा यहाँ तक भूल जाते हैं कि ´´ टें-टें´´ भी कभी नहीं कहते।ठीक इसी प्रकार कुछ नये रंग के भारतीय हिन्दी इतनी भूल जाते हैं कि अपने माँ-बाप को भी वे अँग्रेजी में खत लिखा करते हैं। विलायत से लौटकर ´´तुम´´को ´´टुम´´कहना मामूली बात है।हम भारतीय भाषा के विचार में भी अंग्रेजों के इतने दास हो गए हैं कि अन्य अति धनी तथा सुन्दर भाषाओं का भी हमें कभी ध्यान नहीं आता।´

प्रेमचन्द ने ´´शान्ति तथा व्यवस्था´´की भाषा के प्रसंग में अंग्रेजी मीडिया के अखबारों पर जो बात कही है वह आज के बहुत सारे अंग्रेजी मीडिया पर शत-प्रतिशत लागू होती है।प्रेमचंद ने लिखा है ´विलायती समाचार-पत्र डेली टेलीग्राफ या डेली मिरर या डेली न्यूज (तीनों ही लन्दन के हैं तथा अनुदापदल के प्रमुखपत्र हैं)जो अंग्रेजी में ही छपते हैं,पर इंग्लैंड की राजनीति के अधिकांश सूत्र प्रायःइन्हीं के हाथ में हैं और इनकी भाषा प्रायःसबसे अधिक कटु,दुष्ट,जहरीली और निंद्य होती है।´ अंग्रेजी मीडिया की भाषा को जिस रूप में यहां विश्लेषित किया गया है वह बात आज भी अनेक मीडिया के संदर्भ में अक्षरशःसच है।भारत में टाइम्स नाउ टीवी चैनल इसका आदर्श नमूना है।

उत्तर-आधुनिक विमर्श की शुरूआत संस्कृति के क्षेत्र से हुई। यही वजह है इसकी शैतानियों का जन्म भी यहीं हुआ। आज भी विवाद का क्षेत्र यही है। प्रश्न उठता है संस्कृति के क्षेत्र में ही यह उत्पात शुरू क्यों हुआ?असल में संस्कृति का क्षेत्र आम जीवन की हलचलों का क्षेत्र है और साम्राज्यवादी विस्तार की अनन्त संभावनाओं से भरा है। पूंजी,मुनाफा, और प्रभुत्व के विस्तार की लड़ाईयां इसी क्षेत्र में लडी जा रही हैं।भाषा व्यक्तिगत तथा ऐतिहासिक स्मरण की वस्तु है। यह न केवल वर्षों के स्थायी आत्म-अनुभव को संजोने में सक्षम बनाती है बल्कि भविष्य में अपने आपको अवस्थित करने में, ऐतिहासिक स्मरण का उपयोग करने में सहायता करती है।भाषा हमें भविष्य की ओर उन्मुख रहते हुए अतीत में जाने में सक्षम बनाती है। अतीत के अनुभव लाभ-हानि, जय-पराजय, खुशी-गम, वर्तमान की परिस्थिति के बारे में कुछ कह सकते हैं; वे प्रेरणा, सबक तथा वर्तमान के लिए उम्मीद की किरण दे सकते हैं। भविष्य में पहुंचने के क्रम में हम अतीत में वापस आ सकते हैं, और ऐसा करने में भाषा हमारी मदद करती है।

भाषा हमें उन अर्थों के निर्माण के लिए संसाधन प्रदान करती है जो भविष्य की ओर अग्रसर होते हैं। ये उन संभावनाओं की ओर इशारा करते हैं जो वर्तमान में हमारे अनुभव से परे होती है और कई संसाधन जो भाषा हमें उपलब्ध कराती है, अतीत के उन अर्थों से व्युत्पन्न होते हैं जो हमारे लिए समाप्त हुए नहीं रहते, बल्कि वे हमारी भाषा में, हमारी संस्कृति में, हमारे अनुभव में जीवित रहते हैं।

भारत में अधिकांश प्रतिष्ठित समाजविज्ञानी बुद्धिजीवी अपनी भाषा में नहीं लिखते,यह किस बात का सबूत है ?एक जमाने में मध्यवर्ग बंगाली मातृभाषा में बोलना-लिखना गौरव की बात समझता था,महान वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बसु और सत्येन्द्र बसु जैसे लोग बंगला में विज्ञान की नई खोजों पर लिखते थे, लेकिन इन दिनों अनेक बड़े बंगाली बुद्धिजीवी हैं जो बंगला में नहीं लिखते, यह हम सबके लिए चिन्ता की बात है।

एक अन्य समस्या है वह है संचार क्रांति की मूलभाषा अंग्रेजी है । अंग्रेजी कम्प्यूटर की मूलभाषा है, इसमें जनभाषाओं की देर से शुरूआत हुई है,इसका कु-फल है कि कम्प्यूटर में जनभाषाएं हैं लेकिन भारतवासी उनका न्यूनतम इस्तेमाल करते हैं।सिर्फ किताब-पत्र-पत्रिका प्रकाशन में जनभाषाओं की मदद लेते हैं।बाकी सब काम अंग्रेजी में कर रहे हैं।यह स्थिति बदलनी चाहिए। प्रतिष्ठित लेखक-प्रोफेसर-पत्रकार-एम.ए,बी.ए. लोग अभी तक इंटरनेट पर यूनीकोड हिन्दी या भारतीय भाषा के फॉण्ट में नहीं लिखते, यह स्थिति जितनी जल्दी बदले उतना ही अच्छा है। कहीं यह मातृभाषा की विदाई की सूचना तो नहीं है ?





रविवार, 24 अप्रैल 2016

सोशलमीडिया और साहित्य

      इन दिनों अकादमिक जगत का एक वर्ग सोशलमीडिया से क्षुब्ध है।खासकर हिन्दी के प्रोफेसर और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग में सोशलमीडिया को लेकर हेयभाव है।वे इसमें लिखने-पढ़ने को थर्डग्रेड किस्म का काम समझते हैं।यदि सोशलमीडिया पर कोई मेरा जैसा प्रोफेसर सक्रिय है तो उसे एकदम अ-गंभीर और गैर-जिम्मेदार समझते हैं।मेरी फेसबुक वॉल पर आए दिन इस तरह के क्षुब्ध लोग लिखते रहते हैं कि सब समय तो फेसबुक पर रहते हो फिर पढ़ाने कब जाते हो ॽ सच्चाई यह है मैं कक्षा में कभी अनुपस्थित नहीं रहा।कभी कोर्स अधूरा नहीं छोड़ा।बल्कि हिन्दी के जितने भी प्रोफेसर हैं उनमें अब तक सबसे ज्यादा किताबें लिखी हैं।किताबों के पाठक भी हैं।कभी किताब लिखना नहीं छोड़ा।कभी किसी की चमचागिरी नहीं की,किताबें लिखने के लिए किसी से अनुदान नहीं लिया,यहां तक कि यूजीसी और अपने विश्वविद्यालय से भी कोई अनुदान नहीं लिया। इस तरह के लोग यह भी मानते हैं कि हल्के-फुल्के लेखन,फोटो लगाने,दैनंदिन गप्पबाजी करने आदि के लिए सोशलमीडिया ठीक है लेकिन कोई गंभीर साहित्यिक कार्य सोशलमीडिया के जरिए नहीं कर सकते।हम विनम्रता के साथ इस तरह का नजरिया रखने वालों से असहमत हैं।ये वे लोग हैं जो सोशलमीडिया के चरित्र से अंजान हैं या फिर जानबूझकर सोशलमीडिया विरोधी अभियान में लगे हैं।

सोशलमीडिया वस्तुतः भाषा का विस्तार है। यह भाषा का विकसित रूप है।भाषा मूलतः अभिव्यक्ति की तकनीक है। भाषा में दो तरह की अभिव्यक्ति नजर आती है।पहली अभिव्यक्ति वह है जो दैनंदिन जीवन से जुड़ी है।जिसका हम क्षणिक उपयोग करते हैं और वह उपयोग करते ही खत्म हो जाती है। दैनंदिन जीवन की क्षुद्र बातों और क्षुद्र कर्मों की सीमा में भाषा का एक रूप खत्म हो जाता है।लेकिन भाषा का एक रूप वह भी है जो वनस्पति की तरह है।जिस तरह वनस्पति की उम्र लंबी होती है,ठीक उसी तरह भाषा में रचे गए साहित्य की भी उम्र लंबी होती है।जिस तरह वनस्पति में शाखा-प्रशाखाएं होती हैं,उसी तरह साहित्य में भी विभिन्न किस्म की विधाएं होती हैं,विभिन्न माध्यमों की साहित्यिक विधाएं होती हैं।भाषा में हम तथ्य या सूचनाएं भी देते हैं उसी तरह मनोभावों को भी व्यक्त करते हैं।जिस तरह गालियां देते हैं उसी तरह कविता,कहानी आदि भी लिखते हैं।भाषा में गुस्सा,प्रेम,घृणा आदि को भी यथास्थान व्यक्त करते हैं।इसमें ध्वनि और भंगिमाएं भी होती हैं।सभ्यता के विकासक्रम में भाषा के इस रूप से हम बहुत आगे चले आए हैं।भाषा के रूपों के विकास में हमेशा ´मैं´केन्द्र में रहा है। माध्यमों में भी अभिव्यक्ति के विभिन्न विधा रूपों में ´मैं´केन्द्र में है।इसी तरह भाषा में दैनंदिन जीवन ही केन्द्र में नहीं है अपितु ज्ञान भी है।इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाएंगे संचार के तकनीकी रूप वस्तुतः भाषा का विस्तार हैं।

सोशलमीडिया में लिखे को साहित्य कहें या न कहें यह सवाल बहस के केन्द्र लाने की जरूरत है। इससे साहित्य के मौजूदा स्वरूप और दायरे का विकास होगा।इस प्रसंग में मुझे रवीन्द्रनाथ टैगोर की साहित्य संबंधी परिभाषा याद पड़ रही है। टैगोर के अनुसार साहित्य का सहज अर्थ है ´नैकट्य अर्थात् सम्मिलन´।भाषा के क्षेत्र में साहित्य का काम है ´हृदय का योग कराना´।टैगोर ने लिखा है, ´मनुष्य को तरह-तरह के उद्देश्यों के लिए मिलना पड़ता है,इसके अलावा मनुष्य को मिलना पड़ता है केवल मिलने के लिए,अर्थात् साहित्य के उद्देश्य से।´नए मीडिया रूप,खासकर सोशलमीडिया की विशेषता है मिलाना। सम्मिलन की इच्छा को नए किस्म के संचार ने प्रमुख बनाया है।जिससे आप मिलना चाहते हैं उससे अब नए मीडियम के जरिए मिलते हैं।ये मीडियम हैं मोबाइल,इंटरनेट,सोशलमीडिया आदि।अब यह आपके ऊपर है कि संचार के दौरान क्या करना चाहते हैं।यह संचार व्यक्ति का व्यक्ति से भी हो सकता है और व्यक्ति का समाज से भी हो सकता है।यह दैनंदिन जीवन से जुड़ा भी हो सकता है और कलात्मक-साहित्यिक भी हो सकता है।यह मन की इच्छाओं पर निर्भर करता है।मनुष्य के पास दो तरह की इच्छाएं हैं,पहला ,सामान्य इच्छा और दूसरा है अद्भुत इच्छा।सामान्य इच्छा को हम दैनंदिन जीवन की भाषा में अभिव्यक्त करते हैं,जबकि अद्भुत इच्छा हमारे साहित्य सृजन का मूलाधार है।अद्भुत इच्छा के कारण ही मनुष्य अपने को संसार में प्रसारित करता है।साहित्य उसी का विराट रूप है।

जब भी कोई नया मीडियम समाज में जन्म लेता है पुराने मीडियम के प्रयोगकर्ता परेशानी महसूस करते हैं। उल्लेखनीय है मानव समाज ने भाषायी और कलात्मक अभिव्यक्ति के जितने भी रूप अब तक पैदा किए वे सभी आज तक बरकरार हैं और कला या साहित्य परंपरा के अंग भी हैं।इनमें वाचिक परंपरा के रूपों से लेकर भित्तिचित्र,भित्तिलेखन तक,विधाओं जैसे कविता से लेकर निजी चिट्ठी-पत्री तक शामिल है,पोथी से लेकर किताब तक,पत्र-पत्रिकाओं से लेकर सिनेमातक,रेडियो कम्युनिकेशन से लेकर इंटरनेट तक,सोशलमीडिया से लेकर ईमेल तक सब कुछ शामिल है।



साहित्य की परिधि वहां तक है जहां तक भाषा का आकाश फैला हुआ है।दिलचस्प बात यह है कि कम्प्यूटर में कोई काम भाषा के बिना संभव नहीं है।हर चीज पहले भाषा में लिखी जाती है,यहां तक कि रेडियो,टीवी,फिल्म आदि भी भाषा में लिखे जाते हैं,उसके बाद वे हम तक पहुँचते हैं।सभी किस्म के संचार का मुख्य द्वार है भाषा।इसी तरह भाषा का प्रयोग मनुष्य के बिना संभव नहीं है।इसी अर्थ में भाषा मानवीय कार्य-व्यापार की अभिव्यक्ति का मूलाधार है।यह भी कह सकते हैं मनुष्य के बिना भाषा नहीं,भाषा के बिना मनुष्य नहीं।उसी तरह मीडियम के बिना भाषा नहीं होती।भाषा जब रस की सृष्टि करती है तो मनुष्य में मिलने की इच्छा पैदा होती है।उससे मिलन की इच्छा करती है जो सभी कालों के सभी जनों में स्वीकृति पाए।भाषा में जब रस पैदा होता है तो उसे हम अनुभूति कहते हैं और इसी अनुभूति को मनुष्य विभिन्न माध्यमों के जरिए व्यक्त करने को आतुर हो उठता है।भाषा के विभिन्न माध्यमों में जो रूप हम देखते हैं वे मुनष्य ने तब बनाने आरंभ किए जब उसने नैपुण्य की सृष्टि की। नैपुण्य के कारण ही भाषा को अर्थ मिला।इन्द्रियबोध को विभिन्न उपादानों के जरिए व्यक्त करने की संभावनाएं पैदा हुईं।

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

ग्लोबलाइजेशन और इंटरनेट पर अंग्रेजी वर्चस्व का क्षय

      ग्लोबलाइजेशन की गति को उपग्रह संस्कृति,इंटरनेट और उन्नत सूचना तकनीकी ने नई ऊँचाईयां दी हैं। सवाल यह है कि ग्लोबलाइजेशन क्या है ? इसका ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में धडल्ले से प्रयोग हो रहा है। किंतु अवधारणात्मक स्पष्टता के अभाव में इसकी भ्रमात्मक व्याख्याएं की जा रही हैं। 
     हाल के वर्षों में ग्लोबलाइजेशन के नाम पर जो नीतियां लाई जा रही हैं उनमें नव्य उदारतावाद के नाम पर मुक्त व्यापार,मुक्त व्यापार और व्यक्तिगत चयन के अधिकार और सरकारी नियमों और कानूनों में ढील देने पर जोर है। उल्लेखनीय है कि 'ग्लोबलाइजेशन' पदबंध को 'ग्लोबलिज्म' के साथ गड्डमडृड नहीं करना चाहिए। ये दोनों अलग हैं।'ग्लोवलिज्म' का अर्थ है ग्लोबलाइजेशन एक सामाजिक प्रक्रिया है। इसमें राजनीति,आर्थिक,सांस्कृतिक पहलू शामिल है। यह बेहद जटिल प्रक्रिया है।यही वजह है कि ग्लोबलाइजेशन के सही-सही अर्थ के बारे मेंमतभेद हैं।सामान्य तौर पर 'ग्लोबल संपर्क' पर जोर है। इसमे व्यक्तियों,पूंजी और विचारों के राष्ट्र की सीमाओं के परे ले जाकर आदान-प्रदान पर जोर है। आंकड़े बताते हैं कि इंटरनेट का उपयोग करने वाले आधे से ज्यादा उपभोक्ता अंग्रेजीभाषी हैं।
      एक अनुमान के अनुसार 68.4 फीसदी से लेकर 80 फीसदी साइट अंग्रेजी में हैं। इंटरनेट में इतने बड़े पैमाने पर अंग्रेजी के इस्तेमाल के बावजूद अंग्रेजी सिर्फ आठ देशों (ब्रिटेन-आयरलैंड,अमेरिका,कनाडा,ऑस्ट्रेलिया,न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका,फिलीपींस, और भारत) में ऑनलाइन कारोबार अंग्रेजी में होता है। कुछ देश ऐसे भी हैं जिनकी एक राष्ट्रभाषा नहीं है। उदाहरण के तौर पर स्विटजरलैंड की चार राष्ट्रीय भाषाएं (जर्मन,फ्रेंच,इटली,रोमनिक) हैं। सारी दुनिया में कुल 43 फीसदी लोग अंग्रेजी बोलते हैं।
      विश्वस्तर पर भाषाओं के प्रयोग के बारे में पाएंगे कि जापानी भाषा के सारी दुनिया में 134 मिलियन बोलने वाले हैं। जिन देशों में जापानी भाषा बोली जाती है वे हैं-जापान,अमेरिका,जर्मनी,ब्राजील इसके अलावा कई यूरोपीय देशों में भी जापानी बोलने वाले रहते हैं।जापानी बोलने वाले कुल 8.9 फीसदी लोग हैं।
     चीनी भाषियों की 1999 में चीन में जनसंख्या 1.261बिलियन थी। इसके अलावा ताइवान की 22.2मिलियन,हांगकांग में 7.1 मिलियन,इसके अलावा अमेरिका में 1.3 मिलियन चीनी भाषाभाषी रहते हैं। चीनी भाषी 8.8 फीसदी हैं।
    जर्मन भाषा जर्मनी,स्विटजरलैंड,आस्ट्रिया, लग्जमबर्ग, इटली,ब्राजील, अर्जेण्टीना, डेनमार्क, पोलैण्ड और फ्रांस। जर्मनभाषियों की तादाद 6.8 फीसदी है।स्पेनिश भाषी लोगों की संख्या 332 मिलियन है।जिन देशों में इस भाषा के बोलने वाले पाए जाते हैं। वे हैं स्पेन,वेनेजुएला, अर्जेण्टीना, चिली,मैक्सिको,सैण्ट्रल अमेरिका और दक्षिणी अमेरिका  (ब्राजील को छोड़कर ) ज्यादातर इलाकों में स्पेनिशभाषा बोली जाती है। कुल स्पेनिशभाषी हैं 6.5 फीसदी। कोरियन भाषी 4.6 फीसदी लोग हैं। कोरिया की जनसंख्या है 47.5 मिलियन है।
      इसके अलावा अमेरिका में दस लाख कोरियन भाषी ,इटालियनभाषी 3.8 फीसदी, और कोरियन भाषियों की संख्या 4.6फीसदी है। इटालियन बोलने वालों की सारी दुनिया में तादाद 59.6 मिलियन है। ये इटली,अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में रहते हैं। फ्रेंच बोलने वालों की तादाद 3.3 फीसदी है। पोर्तुगीज 161 मिलियन लोग बोलते हैं।यानी 2.2 फीसदी लोग पोर्तुगीज बोलते हैं।
       अन्य भाषाभाषियों की तादाद 11.7 फीसदी है। दिसम्बर 2001 मे  ऑनलाइन जनसंख्या थी 529 मिलियन। जबकि सारी दुनिया की जनसंख्या है 6.2 विलियन। आंकड़े बताते हैं कि थाई भाषा बोलने वालों की तादाद है 62.4 मिलियन। जबकि इंटरनेट का मात्र 2.3 मिलियन लोग ही इस्तेमाल करते हैं। इण्डोनेशिया और मलेशिया में रहने वाले मलयभाषियों की तादाद है 229 मिलियन। जबकि इंटरनेट का मात्र 4.7 मिलियन लोग ही इस्तेमाल करते हैं। 
      अरबी लोगों की तादाद है 229 मिलियन। इंटरनेट का मात्र 4.1 मिलियन लोग ही इस्तेमाल करते हैं। डच भाषियों की कुल तादाद है 23.6 मिलियन। जबकि इंटरनेट का मात्र 11.1 मिलियन लोग ही प्रयोग करते हैं।
      सारी दुनिया के व्यापारिक समुदाय की यह समझ है कि ऑनलाइन पर आने वाले सभी लोग अंग्रेजी भाषी हैं। यही वजह है कि ज्यादातर कंपनियां बहुभाषी वेबसाइट नहीं बनातीं। वे सिर्फ अंग्रेजी में ही वेबसाइट बनाती हैं। यह स्थिति उन देशों के संदर्भ में सही हो सकती है जो अंग्रेजीभाषी हैं। किंतु जिन देशों में ज्यादातर लोग गैर अंग्रेजी भाषी हैं वहां के संदर्भ में स्थानीयभाषाओं को महत्व दिया जाना चाहिए। यह स्थिति तेजी से बदली है। स्थानीय भाषाओं का नेट पर प्रयोग बढ़ा है। 
       आज सच्चाई यह है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के 90 फीसदी दस्तावेज अंग्रेजी में तैयार किए जाते हैं। यहां तक कि जर्मन नेशनल बैंक भी अंग्रेजी का इस्तेमाल करता है। जबकि उसका अमेरिका या ब्रिटेन से कोई संबंध नहीं है। भारत में अंग्रेजी ही सरकारी कामकाज की प्रमुख भाषा है। प्रथम विश्वयुद्ध के पहले फ्रेंच भाषा व्यापार और विनिमय की विश्वभाषा थी। किंतु आज अंग्रेजी है।
    अधिकांश कपनियों द्वारा बहुभाषी वेबसाइट न बनाने के पीछे प्रधान कारण है अनुवाद का मंहगा होना और अच्छे अनुवादकों का अभाव। अनुवाद सस्ता हो और ज्यादा से ज्यादा तादाद में अच्छे अनुवादक उपलब्ध हों तो शायद इस स्थिति में थोड़ा बदलाव आए।



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