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January, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कामुकता का बदलता चरित्र -4- समापन किश्त

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हिंदुत्ववादियों की हिंदू धर्म की व्याख्या मूलत: धर्म को जीवनशैली मानकर चलती है। अस्मिता का जीवनशैली से जुड़ना वस्तुत: विश्व पूंजीवादी बाजार के तर्क की जीत है और हिंदू तत्ववादी इसी चीज का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। वे हिंदू धर्म को जीवनशैली मानते हैं। शरीर कैसे जीवनशैली से जुड़ गया? उसे 'डाइटिंग' (नियंत्रित आहार) के आधुनिक अर्थ के साथ जोड़कर देखें। 
'डाइटिंग' का खान-पान के विज्ञान के प्रवेश के साथ संबंध है। पहले खान-पान का विज्ञान के साथ संबंध नहीं था। आज खान-पान का विज्ञान निर्मित हो चुका है। आज व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह क्या खाए? क्या पीए? आज विकसित देशों में प्रत्येक व्यक्ति (अति गरीब को छोड़कर) 'डाइटिंग' करता है। इसके कारण 'डाइटिंग' का 33 बिलियन डॉलर का विश्व बाजार पैदा हो गया है।
विश्वव्यापी पूंजीवादी व्यवस्था के उदय के साथ खाने-पीने की तरह-तरह की चीजें बाजार में उपलब्ध हुईं। 'डाइटिंग' उद्योग ने इसे नई बुलंदियों तक पहुंचाया। आज अनेक किस्म की खाने-पीने की चीजें पूरे वर्ष सहज ही उपलब्ध हैं। खान-पान का जीवनशैली से संबंध जुड़ने के कार…

कामुकता का बदलता चरित्र -3-

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एक जमाना था जब सेक्स का प्रजनन से संबंध था। प्रजनन के कारण बड़े पैमाने पर औरतों को अकाल मृत्यु का शिकार होना पड़ता था। एक तरह से स्त्री के लिए सेक्स का मतलब मौत था। किंतु परिवार नियोजन के उपायों के आने के बाद सेक्स का प्रजनन से संबंध विच्छेद हो गया। आज स्थिति यह है कि बगैर सेक्स किए गर्भधारण किया जा सकता है।
 आज सेक्स और कामुकता पूरी तरह स्वायत्त हैं। यह कामुकता की मुक्ति की घोषणा है। अब कामुकता पूरी तरह व्यक्ति का निजी गुण बन गई है वह चाहे तो अन्य से इसका विनिमय कर सकता है। यह कृत्रिम कामुकता है। यह स्त्री की सबसे बड़ी जीत है। 
अधिकांश औरतें सैकड़ों वर्षों से कामुक आनंद से वंचित थीं। कामुक आनंद स्त्रियों के लिए भयानक सपने की तरह था। वे सेक्स करते हुए डरती थीं कि उन्हें इसके कारण गर्भधारण की पीड़ा से गुजरना पड़ेगा। बार-बार गर्भधारण का अर्थ था स्त्री की असमय मौत। आज भी भारतीय समाज में परिवार नियोजन के उपायों के प्रति अज्ञानता और सामान्य-से खर्चे पर इनकी अनुपलब्धता के कारण बड़ी संख्या में स्त्रियां प्रजनन के दौरान ही मर जाती हैं। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो परिवार नियोजन के उपायों ने स्त…

कामुकता का बदलता चरित्र -2-

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19वीं शताब्दी में सेक्स विमर्श के दौरान तीन तरह के दृष्टिकोण सामने आए। पहला, विमर्श स्त्रr की कामुकता को 'हिस्टीरिया' के चिकित्साशास्त्र से जोड़ता है। दूसरा, बच्चों के संदर्भ में कामुकता की व्याख्या प्रस्तुत करता है। इन लोगों ने बताया गया कि बच्चे सेक्स की दृष्टि से सक्रिय होते हैं अत: बच्चों को सेक्स से दूर रखना चाहिए। तीसरा, विमर्श पिता के संदर्भ में कामुकता पर विचार करता है और कामुकता को परिवार और शादी से जोड़कर देखता है। शादी में सेक्स को आवश्यक और स्व-नियामक मान लिया गया।
आरंभ में परिवार नियोजन की पध्दतियों को गैर-जरूरी माना गया। आरंभ के वर्षों में यह तर्क दिया गया कि जो परिवार नियोजन करना चाहता है तो उसे अपनी कामेच्छा पर नियंत्राण लगाना चाहिए इससे परिवार स्वत: छोटा हो जाएगा। यही वह दौर है जब तेजी से संयुक्त परिवार के टूटने की प्रक्रिया शुरू हुई। दूसरी ओर मूलत: सभी धर्मों की ओर से संयुक्त या बड़े परिवार की वकालत शुरू हुई।
फूको के अनुसार कामुकता की धारणा का उदय विभिन्न किस्म के आधुनिक सामाजिक संस्थानों के उदय के साथ हुआ। आधुनिक समाज और आधुनिक राष्ट्र को सक्षम बनाने में अन्य…

कामुकता का बदलता चरित्र -1-

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कामुकता आज चर्चा के केंद्र में है। इसके बारे में भारतीय समाज में तेजी से मंथन चल रहा है। कामुकता के सवालों पर खुली बहसें हो रही हैं। एक जमाना था जब कामुकता के बारे में बात करना निषिद्ध था। अपराध था। जो लोग बात करते थे उन्हें हेयदृष्टि से देखा जाता था। उनसे दूर रहने की सलाह दी जाती थी। सामंतकाल के पहले यह स्थिति नहीं थी।
प्राचीनकाल में आम लोगों की शिक्षा के सामान्य विमर्श में कामुकता और सेक्स संबंधी विषय भी शामिल थे। सामंतकाल के आने के बाद कामुकता के प्रति खुलापन गायब हो गया। अब अन्य अनेक विषयों की तरह कामुकता संबंधी विमर्श भी चंद लोगों की बपौती हो गया। सामंती दौर में निर्मित निषिध्द तत्वों में सेक्स और कामुकता संबंधी तत्वों को भी शामिल कर लिया गया। यह सिलसिला लंबे समय तक चलता रहा।
सामंती मानसिकता शर्म या पर्दा डालने पर जोर देती है। शर्म और पर्दे
की ओट में सबकुछ लागू कर सकते हैं। यहां तक कि कामुकता और सेक्स पर भी विमर्श कर सकते हैं। कामुकता और सेक्स के इन दिनों विमर्श के केंद्र में आने से सामंती विचारधारा को जबर्दस्त धक्का लगा है। यह आधुनिकता की जीत है। आज पर्दा, झिझक और शर्म को प्रतिग…

मुक्ति की गारंटी है जनोन्मुखी विज्ञान

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अंधविश्वास से लड़ने के लिए विज्ञान के बुनियादी क्षेत्रों में अनुसंधान और विज्ञानसम्मत चेतना के निर्माण पर जोर दिया जाना चाहिए। कुछ विज्ञान संगठन हैं जो सचमुच में अंधविश्वास से लड़ना चाहते हैं किंतु इसके लिए ये लोग लोकप्रिय विज्ञान का सहारा लेते हैं। प्रसिध्द वैज्ञानिक जे.डी. बर्नाल के शब्दों में 'लोकप्रिय विज्ञान वास्तविक विज्ञान से उतनी ही दूर की चीज है जितनी लोकप्रिय संगीत, शास्त्रीय संगीत से है।'
इस फर्क के बावजूद लोकप्रिय विज्ञान के जरिए टुकड़ों-टुकड़ों में विज्ञान के परिणामों को आम जनता तक पहुंचाने में मदद मिलती है। या जब इन्हें सनसनीखेज ढंग से पुनर्प्रस्तुत किया जाता है तो भी परिणाम आम लोग जान ही जाते हैं। लेकिन यह टुकड़ों-टुकड़ों में होता है और लोग विज्ञान की विधि और भावना से अपरिचित ही रह जाते हैं।
आज विज्ञान और लोकप्रिय विचारों के बीच आदान-प्रदान टूट चुका है। विज्ञान को लेकर वैसी सघन और प्रशिक्षित गुणग्राहकता कहीं नहीं मिलती जैसी क्रिकेट या फुटबाल मैचों को लेकर देखी जाती है। इसकी व्याख्या केवल वैज्ञानिक आनंद में वित्तीय हितों की कमी या इस विषय की अंतर्निहित कठिनाई के ज…

गूगल के खिलाफ भारतीय प्रकाशक अमेरिकी अदालत पहुँचे

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गूगल की डाकेजनी के खिलाफ भारतीय प्रकाशकों ने अमेरिकी अदालत में जाकर हस्तक्षेप किया है। भारतीय प्रकाशकों और लेखकों के प्रतिनिधि के अलावा IRROऔरFIP ने भी इस विवाद में अपना कानूनी विरोध दर्ज कराया है। इनका तर्क है कि गूगल ने लाखों भारतीय किताबों को स्केन करके नेट पर अवैध धंधा आरंभ कर दिया है। यह सीधे कॉपीराइट के अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और भारतीय कॉपीराइट एक्ट 1957 का सीधा उल्लंघन है। उल्लेखनीय है कि गूगल ने विश्व के अनेक देशों के साथ किताबों के डिजिटल रुप को पेश करने के लिए गुप्त सौदे किए हैं। भारतीय प्रकाशकों के द्वारा अमेरिकी अदालत में जाकर प्रतिवाद करने और गूगल और अमेरिकी प्रकाशकों और लेखकों के बीच कुछ अर्सा पहले हुए समझौते का भी विरोध किया गया है। प्रतिवाद करने वालों में इंडियन रिप्रोग्राफिक राइटस ऑर्गनाइजेशन और फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स के नाम प्रमुख हैं। इन संगठनों ने गूगल बुक सेट्टलमेंट 2-0 को चुनौती दी है। न्यूयार्क की जिला अदालत में प्रतिवाद दाखिल करने वालों में स्टार पब्लिकेशंस, अभिनव पब्लिकेशंस, दया पब्लिकेशंस हाउस, पुस्तक महल भी शामिल हैं।
IRRO के वकील सिद्धार्थ आर्य का मानना…

संस्कृति उद्योग की धुरी हैं अंधविश्वास - 3-

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नकल की प्रवृत्ति को पूंजीवाद का प्रधान गुण माना जाता है। इस अर्थ में पूंजीवाद अपने विकास के साथ-साथ सामंती और पूर्व सामंती कला रूपों और मूल्यबोध को बरकरार रखता है। कलाओं में अंधानुकरण आधुनिक काल में नकल में रूपांतरित कर लेता है। इससे जहां कभी न खत्म होने वाले मनोरंजन की सृष्टि करने में मदद मिलती है वहीं दूसरी ओर अंधानुकरण के एटीटयूट्स, रवैए और संस्कार का विकास होता है। कलाओं से यथार्थ गायब हो जाता है। उसकी जगह काल्पनिक यथार्थ या आभासी यथार्थ ले लेता है।
इसी तरह अंधविश्वास या नकल की संस्कृति का परजीवीपन और पेटूपन की संस्कृति से गहरा संबंध है। इसका स्वतंत्राता के विचार से विरोध है, यह उन तमाम विचारों को अस्वीकार करती है जो नकल या अंधानुकरण के विरोधी हैं।
     पूंजीवाद अपनी सामान्य प्रकृति के अनुसार अंधविश्वासों को भी वस्तु के रूप में बदल देता है, उन्हें संस्थागत रूप दे देता है। अंधविश्वासों को कामुकता एवं रोमांस के साथ प्रस्तुत करता है और यह कार्य फिल्म, टी.वी. और वीडियो फिल्मों के संगठित औद्योगिक माल के उत्पादन के रूप में करता है। 
कामुकता, पोर्नोग्राफी, अतिलयात्मक गीत और संगीत तथा नकल के …

संस्कृति उद्योग की धुरी हैं अंधविश्वास - 2-

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आज हम रोम की महानता के गुण गाते हैं किंतु यह भूल जाते हैं कि रोम की महानता का आधार अंधविश्वास था। रोम की महानता के बारे में पोलिबियस ने लिखा कि मैं साहसपूर्वक यह बात कहूंगा कि संसार के शेष लोग जिस चीज का उपहास करते हैं, वह रोम की महानता का आधार है और उस चीज का नाम अंधविश्वास है। इस तत्व का उसके निजी और सार्वजनिक जीवन के सभी अंगों में समावेश कराया गया है और इसने ऐसी खूबी से उनकी कल्पनाशक्ति को आक्रांत कर लिया है कि उस खूबी को बेहतर नहीं बनाया जा सकता। संभवत: बहुत से लोग इसकी विशेषता समझ नहीं पाएंगे, लेकिन मेरा मत है कि ऐसा लोगों को प्रभावित करने के लिए किया गया है। यदि किसी ऐसे राज्य की संभावना होती, जिसके सभी नागरिक तत्वज्ञ होते तो इस तरह की चीज से हम बचे रह सकते थे। लेकिन सभी राज्यों में जनता अस्थिर है, निरंकुश भावनाओं, अकारण क्रोध और हिंसक आवेगों से ग्रस्त है। इसलिए केवल यही किया जा सकता है कि जनता को अदृश्य के भय से, और इसी किस्म के पाखंडों से काबू में रखा जाए। यह अकारण नहीं, बल्कि सुविचारित चाल थी कि पुराने जमाने के लोगों ने जनता के दिमाग में देवताओं और मृत्यु के बाद के जीवन की बा…

संस्कृति उद्योग की धुरी हैं अंधविश्वास - 1-

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अंधविश्वास सामाजिक कैंसर है। अंधविश्वास ने सत्ता और संपत्ति के हितों को सामाजिक स्वीकृति दिलाने में अग्रणी भूमिका अदा की है। आधुनिक विमर्श का माहौल बनाने के लिए अंधविश्वासों के खिलाफ जागरूकता बेहद जरूरी है। आमतौर पर साधारण जनता के जीवन में अंधविश्वास घुले-मिले होते हैं।

अंधविश्वासों को संस्कार और एटीटयूट्स का रूप देने में सत्ता और सत्ताधारी वर्गों को सैकड़ों वर्ष लगे हैं। अंधविश्वासों की शुरुआत कब से हुई इसका आरंभ वर्ष तय करना मुश्किल है। फिर भी ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि सामाजिक विकास के क्रम में जब राजसत्ता का निर्माण कार्य शुरू हुआ था उस समय साधारण लोग किसी से डरते नहीं थे। किसी भी किस्म का अनुशासन मानने के लिए तैयार नहीं थे, राजा की सत्ता को स्वीकार नहीं करते थे। सत्ता के दंड का भय नहीं था। यही वह ऐतिहासिक संदर्भ है जब अंधविश्वासों की सृष्टि की गई। 
आरंभिक दौर में अंधविश्वासों को संस्कार और जीवन मूल्य से स्वतंत्र रूप में रखकर देखा जाता था। कालांतर में अंधविश्वासों ने सामाजिक जीवन में अपनी जड़ें इस कदर मजबूत कर लीं कि अंधविश्वासों को हम सच मानने लगे।
अंधविश्वास का दायरा बहुत बड़ा ह…