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फेसबुक और स्त्रीमुक्ति

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स्त्री अपनी पहचान अर्जित करे इसके लिए जरूरी है कि झूठी भावनाओं और लालसाओं से मुक्त होकर स्वयं को देखे। विभ्रमों से दूर रहे।

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स्त्री की मुक्ति का अर्थ है -स्त्रियों को आत्म-निर्णय का अधिकार होना चाहिए।

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औरत की स्वायत्तता की रक्षा के लिए उससे बात बात पर स्पष्टीकरण मांगना बंद करें।

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स्त्री की मुक्ति का मार्ग आरंभ होता है उसकी स्वायत्तता मानने से । हम उसे अपने अनुकूल ढालना बंद करें। स्त्री को अनुकूल ढालने का अर्थ है उसे मातहत बनाना।

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टीवी चैनल लगे हुए हैं कि समाज को बदलने के लिए क्या करें और पंडितलोग बता रहे हैं यह करो, यह न करो। समाज बदले इसके लिए पहली शर्त्त है कि औरत के जीवन में हस्तक्षेप बंद हो।

हर स्तर पर स्त्री पर समाज और परिवार का हस्तक्षेप सबसे बड़ी बाधा है। हमें स्त्री पर विश्वास करना चाहिए। उस पर संदेह करना छोडें। स्त्री को निषेध और हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।

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कथाकार रमेश उपाध्याय का सुझाव है कि- सबसे पहले हिंदी की स्त्री और स्त्री अंगों से सम्बंधित गालियों के खिलाफ जंग ज़रूरी है.

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भारतीय मनोदशा में जड़ जमाए हुए स्त्री के रूढ़बद्ध रूपों के खिलाफ जंग करने ज…

दामिनी प्रकरण पर फेसबुक कवरेज का असर

दामिनी प्रसंग में हमने अनेक मांगें ,सुझाव और अनेक विचार रखे । इनमें अनेक मांगें और सुझाव केन्द्र सरकार के नेताओं ने माने हैं।अनेक सुझावों को मीडिया में प्रचार के लिए इस्तेमाल किया गया और यही विचारों का आदान-प्रदान फेसबुक लेखन की बड़ी उपलब्धि है। इस प्रसंग में उन सभी टिप्पणियों को यहां नए सिरे से पढ़ने की जरूरत है। 

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दामिनी का पार्थिव शरीर आज तड़के सुबह विशेष विमान के जरिए दिल्ली आ चुका है। हवाई अड्डे पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी मौजूद थीं। हम सब दामिनी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

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औरतों पर अत्याचार थमें इसके लिए जरूरी है कि पुलिस फोर्स में खाली पड़े स्थानों को तत्काल भरा जाय। प्रत्येक थाने के प्रतिदिन के फोन रिकॉर्ड रखे जाएं। प्रत्येक थाने में स्त्री विरोधी मानसिकता के खिलाफ पुलिसकर्मियों को शिक्षित किया जाय।

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केन्द्र सरकार को औरतों पर बढ़ते हुए अत्याचारों को देखते हुए तुरंत एक नयी योजना घोषित करनी चाहिए जिसके तहत देश में औरतों के खिलाफ चल रहे उत्पीड़न के मुकदमों को विशेष अदालतों के हवाले करके तत्काल न्याय की व्यवस्था करनी चाहिए। इन अद…

बलात्कारकांड ,सुभाष तोमर की मौत और फेसबुक पर उठे सवाल

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मीडिया कवरेज में जनता के असभ्य व्यवहार को कवरेज देकर भीड़ को उकसाया है। लाइव कवरेज के नाम पर अधिकांश टीवी चैनलों में संपादकीय नीति अनुपस्थित थी। मसलन् सरकारी संपत्ति तोड़ती भीड़ को कवरेज दिया।भीड़ में फांसी की मांग करने वालों को कवरेज देकर सही नहीं किया। टीवी पत्रकारों ने लगातार उत्तेजना पैदा करने का काम किया। पत्रकारों ने अपनी जिम्मेदारी को संयम के साथ नहीं निभाया। बलात्कार की घटना पर मीडिया ने उत्तेजना पैदा करने का काम करने जनता की अपूर्णीय क्षति की है। हाल ही में अमेरिका में 27 बच्चों की हत्या की घटना पर मीडिया ने वहां पर आम जनता को संयम बरतने और धैर्य से काम लेने की भूमिका अदा की। भारत में सामूहिक बलात्कार काड पर आम जनता को उत्तेजित करने से बचा जाना चाहिए। पहले से ही उत्तेजित भीड़ को भड़काया है।

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दैनिक हिन्दू अखबार ने लिखा है-यह रिपोर्ट उन सभी दावों को खारिज करती है जिनके जरिए आम आदमी पार्टी अपने नए तर्कशास्त्र गढ़ रही है।पढें रिपोर्ट-

A controversy raged on Wednesday over the cause of death of constable Subhash Tomar during violent demonstrations last Sunday with eye…

दामिनी बलात्कारकांड और फेसबुक

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देश में सारी व्यवस्था चरमरा गयी है,देश में न तो पर्याप्त जज हैं और न अदालतें हैं , न अदालतों की सुविधाएं हैं, ऊपर से करोड़ों केस हैं जो लंबित पड़े हैं। लोग परेशान हैं और लुट रहे हैं लेकिन सरकार सोई है,जजों ने कान में तेल डाला हुआ है। आखिर कब तक लोग इंतजार करेंगे,मनमोहन सरकार ने यदि न्यायव्यवस्था को दुरूस्त और सक्षम नहीं बनाया तो वह दिन दूर नहीं जब जजों से लेकर सांसदों तक लोग घेरेंगे और कानून अपने हाथ में लेंगे। न्याय अब अदृश्य है उसे दृश्य बनाने का काम सरकार का है। जो काम वर्मा कमीशन अभी करेगा वह काम काफी पहले क्यों नहीं किया गया, क्या सरकार नहीं जानती कि सालाना डेढ़ लाख से ज्यादा सालाना बलात्कार हो रहे हैं। जनता के लिए सरकार का निकम्मापन अब असहनीय महसूस हो रहा है इसलिए वो सड़कों पर निकल रही है।

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इंडियागेट पर तैनात कांस्टेबिल सुभाष की मौत की खबर आई है। यह मौत बहुत ही दुखद है। सुभाष की मौत के जिम्मेदार लोगों को जेल में पहुँचाया जाना चाहिए।

इंडियागेट पर हाल ही में जो आंदोलन चला उसके आखिरी दिन सुभाष को चारों ओर से घेरकर आंदोलनकारियों ने सिर में लट्ठों से मार-मारकर अधमरा कर दिया था…

नरेन्द्र मोदी का मीडिया असत्य और फेसबुक

मीडिया में लाइव कमेंट्री के दौरान पत्रकारों और राजनीतिक विशेषज्ञों ने अमूमन नरेन्द्र मोदी की जीत पर भावविभोर होकर बातें की। विश्लेषकों का भावविभोर होना सही नहीं है। विश्लेषक को टीवी पर सत्य को सामने लाने का काम करना चाहिए और उन्माद से बचना चाहिए। उन्माद से बचने के लिए विधानसभा चुनाव परिणामों के इतिहास का बारीकी से ज्ञान होना चाहिए। 

आमतौर पर विश्लेषक गुजरात और मोदी पर बात करते हुए सरलीकरण और झूठ का सहारा ले रहे थे। जो झूठ बोले गए उनमें से एक बड़ा झूठ यह है कि ‘विधानसभा चुनाव के इतिहास में मोदी ने तीसरीबार जीतकर इतिहास रचा है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।’ यह बात एकसिरे से गलत है।यह बात गुजरात के संदर्भ में सही है लेकिन देश के संदर्भ में नहीं।

मसलन्, ज्योतिबाबू के लोकप्रियता के मानक से काफी पीछे हैं नरेन्द्रमोदी और उनकी पार्टी भाजपा। मीडियापंडितों के द्वारा मोदी की प्रशंसा में अहर्निश झूठ कहा गया। तथ्य बताते हैं कि ज्योतिबाबू 23साल मुख्यमंत्री रहे,वाममोर्चे की तीन-चौथाई बहुमत से चार बार विजय हुई।यह रिकार्ड पार करना किसी भी दल के लिए संभव नहीं है।

विद्या सुब्रहमण्यम ने हिन्दू ( 22…

राजारहाट –न्यूटाउन के प्रति ममता की बेरूखी

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी धीरे धीरे समझ रही है कि उनके हाथ से समय निकलता जा रहा है। वे अपने सांगठनिक पचड़ों और अपनी पुरानी राजनीतिक मनोदशा के जंजाल से मुक्त होने के बारे में नए सिरे से संगठित होने की कोशिश कर रही हैं। इस कोशिश के क्रम में उन्होंने विगत सोमवार को शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर समिति के अफसरों ,उद्योगपतियों और भवन निर्माताओं के प्रतिनिधियों के साथ मीटिंग की। पश्चिम बंगाल के शहरों में शहरी सुविधाओं का व्यापक अभाव है। राज्य के शहरों से जुड़े इलाकों में सामान्य शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर की न्यूनतम सुविधाओं का अभाव आज एक ठोस वास्तविकता है। मुख्यमंत्री के साथ हुई इस बैठक में शहरी विकास मंत्रालय के अधिकारियों के अलावा भवन निर्माताओं के प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया था। 

भवन निर्माताओं ने मुख्यमंत्री से शहरी लैण्डशिलिंग एक्ट को तुरंत समाप्त करने की मांग रखी और कहा कि देश के अधिकांश शहरों में यह कानून खत्म किया जा चुका है लेकिन कोलकाता में अभी तक यह खत्म नहीं हुआ है। इस कानून के कारण भवन निर्माण के क्षेत्र में तेजी लाने में मुश्किलें आ रही हैं। साथ ही नए पूंजी निवेश का मार्ग भी रूका हुआ है…

नरेन्द्र मोदी,विकास और फेसबुक

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गुजरात विधानसभा चुनाव के बारे में हाल ही में जो परिणाम पूर्व सर्वे आए हैं उनमें भाजपा फिर से सरकार बनाने जा रही है। लोकतंत्र में एकतंत्र का यह परिणाम है। इस तरह के परिणाम एक जमाने में पश्चिम बंगाल से वाम मोर्चे की जीत के छहबार आए हैं। मोदी ने सांगठनिक तौर पर गुजरात में माकपा के मॉडल को लागू किया है और विपक्ष को बेकार करके रख दिया है।

यही स्थिति एक जमाने में पश्चिम बंगाल में 1977से 2009 तक वाममोर्चे की भी रही है।

मोदीतंत्र मूलतःदलतंत्र है इसमें लोकतंत्र नहीं बिकता,दलीय वर्चस्व बिकता है। जो लोग सोच रहे हैं मोदी ठीक कर रहे हैं ,विकास कर रहे हैं वे मुगालते में हैं। यह भ्रम टूटेगा लेकिन कुछ समय लेगा।

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गरीबी में आई कमी के आधार पर गुजरात 20 राज्यों की सूची में 10वें पायदान पर है।

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सेंटर फॉर डेवलपमेंट अल्टरनेटिव्स के निदेशक और अर्थशास्त्र की प्राध्यापक इंदिरा हीरवे कहती हैं, 'गरीबी का स्तर कम हुआ है लेकिन शहरी क्षेत्रों में जहां 43 फीसदी आबादी रहती है, वहां गरीब उन्मूलन की रफ्तार सुस्त हुई है।' उनका कहना है कि गुजरात में गरीबी में आई कमी दूसरे प्रतिस्पर्धी राज्यों की तुलना म…

सीमोन द बोउवार और फेसबुक

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एक लड़की से माँ की तरह बनने की आशा की जाती है,पिता की तरह नहीं। लड़का जहाँ पिता की श्रेष्ठता को एक चुनौती की तरह लेता है,वहीं लड़की एक लाचरीभरी प्रशंसा पिता के प्रति समर्पित करती है। अपनी वैयक्तिकता को बिलकुल त्यागकर वह समर्पण की वस्तु बन जाती है।

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भारतीय समाज पुरानी रूढ़ियों में इस कदर बंधा है कि स्त्री को जीते जी स्वतंत्रता नहीं देता।यहां तककि मरने के बाद भी औरत को स्वतंत्रता नहीं देता। स्त्री के मरने के बाद भी उसकी मिट्टी,संपत्ति आदि पर पुरूष का कब्जा बना रहता है।

जबकि भारतीय संविधान ऐसा नहीं मानता। त्रासद यह है कि जो मर्द संविधान मानते हैं वे स्त्री,परिवार आदि के संदर्भ में संविधान में बतायी गयी बातों को नहीं मानते। इसके कारण स्त्री विरोधी मनोदशा अभी तक हमारे सोच में बनी हुई है।

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फेसबुकवीरों को अनेक नए विषयों पर जोर आजमाइश करते देखा है। लेकिन परिवार और स्त्री की संविधानविरोधी स्थितियों पर कभी भी बहस करते नहीं देखा।

स्त्रियों के रसीले वाक्य,सुंदर फोटो,लोकलुभावन कथन से भी ज्यादा मूल्यवान है स्त्री के प्रति आधुनिक नजरिया। यह नजरिया भारत के संविधान में प्रदत्त अधिकारों के दा…

ज्ञानक्रांति का फैसला कब लेंगी ममता

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सपने देखना अच्छी बात है। सपनों में आनंद लेना भी अच्छी बात है लेकिन सपनों को साकार करना उससे भी अच्छी बात है। जो राजनेता सपने देखता है और सपने साकार करता है वह विज़नरी कहलाता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को यदि पश्चिम बंगाल का सही अर्थ में आइकॉन बनना है तो राजनेता की बजाय विज़नरी बनना होगा। कथनी और करनी के भेद को खत्म करना होगा। भाषण कम और काम ज्यादा। जलसे कम और एक्शन ज्यादा की कर्मसंस्कृति पैदा करनी होगी। राज्य में पूंजीनिवेश भाषणों से नहीं होता। कोई भी उद्योगपति भाषणों से प्रभावित होकर राज्य में पूंजी निवेश नहीं करता। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि उनके हाथ से राज्य का यथार्थ खिसकता चला जा रहा है। वे जब से मुख्यमंत्री बनी हैं उनकी आमलोगों से दूरी बढ़ी है ,राज्य की समस्याओं से भी अलगाव बढ़ा है। वे अपने दल के कॉकस और नौकरशाही के घेरे में कैद हैं। कॉकस और नौकरशाही उनको खुलेमन से न तो सोचने देती है और नहीं अपने ही लोगों पर विश्वास करने देती है। जनता और यथार्थ से अलगाव के कारण व्यापक पैमाने पर मुख्यमंत्री के मन में संदेह और अविश्वास बढ़ा है। संदेह और अविश्वास के कार…