गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

बलात्कारकांड ,सुभाष तोमर की मौत और फेसबुक पर उठे सवाल


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मीडिया कवरेज में जनता के असभ्य व्यवहार को कवरेज देकर भीड़ को उकसाया है। लाइव कवरेज के नाम पर अधिकांश टीवी चैनलों में संपादकीय नीति अनुपस्थित थी। मसलन् सरकारी संपत्ति तोड़ती भीड़ को कवरेज दिया।भीड़ में फांसी की मांग करने वालों को कवरेज देकर सही नहीं किया। टीवी पत्रकारों ने लगातार उत्तेजना पैदा करने का काम किया। पत्रकारों ने अपनी जिम्मेदारी को संयम के साथ नहीं निभाया। बलात्कार की घटना पर मीडिया ने उत्तेजना पैदा करने का काम करने जनता की अपूर्णीय क्षति की है। हाल ही में अमेरिका में 27 बच्चों की हत्या की घटना पर मीडिया ने वहां पर आम जनता को संयम बरतने और धैर्य से काम लेने की भूमिका अदा की। भारत में सामूहिक बलात्कार काड पर आम जनता को उत्तेजित करने से बचा जाना चाहिए। पहले से ही उत्तेजित भीड़ को भड़काया है।

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दैनिक हिन्दू अखबार ने लिखा है-यह रिपोर्ट उन सभी दावों को खारिज करती है जिनके जरिए आम आदमी पार्टी अपने नए तर्कशास्त्र गढ़ रही है।पढें रिपोर्ट-

A controversy raged on Wednesday over the cause of death of constable Subhash Tomar during violent demonstrations last Sunday with eyewitnesses and a government hospital claiming there were no injuries on his person while the post mortem report contradicted these versions.
The Delhi Police late in the evening released excerpts of report of the post mortem done by a Board of Doctors in the government-run Ram Manohar Lohia (RML) Hospital, where he died on Tuesday. 
Following contradictory versions, Delhi Police asked its Crime Branch to investigate the case in which murder charges have been invoked. 
“Myocardial infarction (cardiac arrest) and its complications that could be precipitated by multiple ante-mortem (before death) injuries to neck and chest produced by blunt force impact,” Additional Commissioner of Police (New Delhi) K.C. Dwivedi said quoting from the report as the cause of 47-year-old Tomar’s death. 
The Delhi Police statement came on a day when various claims emerged about the cause of Tomar’s death with two eyewitnesses claiming that they did not spot any injuries on his person when they tried to revive him after he collapsed near India Gate during violent protests against the gang-rape of a girl in a moving bus on December 16. 
To add to this, Medical Superintendent of RML Dr. T.S. Sidhu, said, there were “no major external injury marks except for some cuts and bruises. …In all our records, there are no severe internal injuries recorded but the post-mortem will tell everything.” 
Asked whether it was a case of cardiac arrest, Dr. Sidhu said, “I don’t know. That is not my comment. He came, he was in serious shock and we revived him. He came in a state of total collapse.” 
Yogendra, a journalism student, and his friend Paoline, who have rushed Tomar to the hospital, contradicted the police version that the constable was beaten up by protesters leading to his death. He fell down on his own, they said. 
Mr. Yogendra claimed, “I was at India Gate with a female friend who was injured. I saw one policeman who was running after protesters and then suddenly collapsing. We rushed towards him and some policemen were also there. Suddenly, policemen started running after other protesters. 
“So I rushed to a nearby PCR van. They took him to hospital. I also went in the same vehicle. I saw him in hospital and his body didn’t have any injuries. He wasn’t trampled by a mob, he wasn’t assaulted. The claims of police are false. I am surprised to hear that eight were arrested over Tomar’s death.” 

Ms. Paoline said she saw him falling down. “We removed his jacket and shoes. I asked whether he can hear me and then I asked him to breathe... He was sweating profusely and there were no injuries on his body. If we had not been there, he would have been dead on the spot,” she said. 
Tomar’s family refuted the eyewitness claims, saying he died after suffering injuries caused in the chaos. 
“My father died because of the chaos during the protests at India Gate. Protesters pushed him, they trampled upon him. He had internal injuries. The claims that he did not receive injuries are false,” Tomar’s son Aditya said. 
Tomar’s family claimed that the policeman did not have a history of heart problems. “Tomar was attacked by protesters. He did not suffer from any heart-related problems,” Tomar’s relative Naveen Chaudhary said. 
The post-mortem report said Tomar’s third, fourth and fifth ribs on left side had fractures and there was “mid-calibaculur bleeding” at several places. 
Police sources said effusion of blood was present in tissues and neck muscles and ante-mortem injuries were caused when the body suffered heavy blows from a blunt object. 
“He had a lot of injuries. His ribs had fractures. These multiple injuries aggravated his condition and led to cardiac arrest,” Mr. Dwivedi, the Additional Commissioner of Police, said. 
Asked whether after the post mortem report, police would initiate action against doctors at RML, Mr. Dwivedi said he has no comments to offer as investigations were with Crime Branch. “I can’t comment on doctors or eyewitness comments,” he said. 
Police have slapped murder charges in the case. Earlier, eight persons, including an activist of the Arvind Kejriwal-led Aam Aadmi Party (AAP) were arrested on Monday on charges of attempt to murder. 
Following the claims of the eyewitnesses, the AAP demanded sacking of Delhi Police Commissioner Neeraj Kumar alleging that police was misleading people by arresting eight “innocent youth” in connection with the incident. 
Mr. Kejriwal said Mr. Yogendra’s account was opposite of what police said. “Is police lying,” he asked. 
AAP chief spokesperson Manish Sisodia alleged police was “politicising” Tomar’s death to cover their mistakes and demanded that Mr. Kumar be sacked. 

“Delhi Police should have dealt with the matter with sensitivity and honoured the constable’s death. But, the police have politicised the death to cover their own mistakes. We feel that the Delhi Police are involved in a conspiracy. The Police Commissioner should be sacked,” he said. 
Meanwhile, the Home Ministry has announced an ex-gratia of Rs. 10 lakh to the next of kin of Tomar. 

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दिल्ली पुलिस के सिपाही सुभाष तोमर की मौत की वजहों को लेकर हो रहे अलग-अलग दावों से यह गुत्थी लगातार उलझती जा रही है। इस मामले में ताजा घटना यह है कि पुलिस ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के हवाले से दावा किया है कि मौत की वजह सीने पर लगी चोट है। चोट के बाद ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा जिससे उनकी मौत हुई। 
कायदे से इस रिपोर्ट के आने के बाद टीवी ट्रायल बंद कर दिए जाने चाहिए। अदालत को जांच करने दें और देश के अन्य मसले पर ध्यान दे मीडिया। इस प्रसंग में आम आदमी पार्टी के नेताओं का बार बार टीवी पर बहसों में उलझना अनेक सवाल खड़े करता है। अन्य दल इस मसले पर तकरीबन चुप हैं। 

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सुभाष यादव की हत्या के आरोप में पकड़े गए आठों में 4 लोगों ने एनडीटीवी को बताया कि वे निर्दोष हैं और घटना के समय घटनास्थल पर नहीं थे। टीवी चैनल की इस तरह की प्रस्तुतियां अदालत के काम में हस्तक्षेप कही जा सकती हैं।

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दिल्ली पुलिस के पीआरओ भगत ने कहा कि कुछ भी कहना प्रिमेच्योर होगा। कमिश्नर ने सीधे कहा कि सुभाष के किन किन अंगों पर चोट लगी है।जीन्यूज के अनुसार यह अन्तर्विरोध गैंगरेप कांड से ध्यान हटाने की कोशिश है।

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यूपी में एक माह में ऑनलाइन के जरिए स्त्री उत्पीडन की 61 हजार शिकायतें आई हैं, इनमें14 हजार फोन पर अश्लील बातें करने की शिकायतें हैं। हाय रे भारतमाता। कैसे कुपूत हैं तेरे देश में।

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अजीब स्थिति है कि योगेन्द्र के बयान के साथ जीन्यूज ने अपनी पोजीशन रख दी है कि वे उसके बयान से सहमत नहीं हैं।

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दूसरी चश्मदीद पाओलीन ने कहा कि सुभाषतोमर लोगों को हटाने के चक्कर में पहुँचे उनके गिरते ही 2मिनट में पुलिस वाले पहुँच गए थे। एबीपी न्यूज का खुलासा।

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राममनोहर लोहिया अस्पताल के डाक्टर ने कहा है सुभाष तोमर के शरीर पर गंभीरचोट के निशान नहीं थे। एक्सरे में हड्डी टूटने वाली बात नहीं।

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सुभाष तोमर की मौत के बाद जिस तरह के अन्तर्विरोधी बयान आ रहे हैं उनके कारण सुभाष तोमर की निष्पक्ष-पेशेवर मेडीकल जांच कराकर तथ्यों को सरकार उजागर करे। हेडलाइन टुडे के अनुसार अभी तक दिल्ली पुलिसकर्मियों ने सुभाष के परिवार को अपनी एकदिन की पगार सहायता के रूप में देने के लिए दो करोड़ रूपये एकत्रित किए हैं।

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एनडीटीवी इंडिया ने सुभाष तोमर की मौत के चश्मदीद गवाह की बातों पर यकीन कर लिया है और वह बार बार इस गवाह को पेश करके साफ कर देने पर आमादा है कि चश्मदीद गवाह का सत्य परमसत्य है।
आज सुबह भी उसे लाइव कवरेज के लिए इस्तेमाल किया गया। यह सीधे केजरीवाल एंड कंपनी द्वारा मीडिया उडान में पुलिस कवरेज को पछाड़कर बढ़त लेने या प्रौपेगैण्डा करने की योजना का अभिन्न अंग लगता है।

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एनडीटीवी पर चश्मदीद गवाह ने माना- " ये गिर गए वहां पर मैं इनको लेकर चला आया। " यह बात योगेन्द्र ने अस्पताल में उसी दिन कही थी। एनडीटीवी रिपोर्टर ने अभी पुलिस सूत्रों के हवाले कहा कि सुभाष तोमर को पीसीआर बैन अस्पताल लेकर गई।जबकि लड़के ने पहले कहा कि वो लेकर गया। यह उसने अपने बयान पहला झूठ बोला। अभी उसने ( योगेन्द्र) पलटा खाया और कहा कि पीसीआर बैन लेकर गयी।

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अफसोस यह है कि मीडिया से लेकर फेसबुक तक प्रबुद्धलोगों का एक वर्ग है जो सुभाष तोमर की मौत पर एक युवा की बातों को तोमर की मौत के संदर्भ में प्रमाण के रूप में पेश कर रहा है।

स्थिति की अतिरंजना का आलम यह है कि लोग गांधी को भी इस मौके पर याद कर रहे हैं। साथ ही सूचना के दुरूपयोग की संभावनाओं को एकसिरे से खारिज कर रहे हैं। आज के दौर में कैमरे के सामने किसी घटना विशेष के बारे जो व्यक्ति बोल रहा है और प्रमाणस्वरूप इमेजों को पेश कर रहा है। उसके बारे में कोई भी मूल्य निर्णय करना सही नहीं होगा। हो सकता है उस युवक का दावा तहकीकात में प्रमाणित ही न हो पाए।

होसकता है तहकीकात में पुलिस का दावा गलत साबित हो, लेकिन इसकी तहकीकात के लिए सबसे उपयुक्त स्थान अदालत है मीडिया नहीं।

जिस लड़के के पास ये प्रमाण हैं उन प्रमाणों को अपनी डिफेंस में वे लोग अदालत में पेश करें जो गिरफ्तार किए गए हैं।

मीडिया मेंउस लड़के का महाप्रमाण के रूप में आना सारे मसले को मीडिया तथ्य नें नहीं गॉसिप में बदल रहा है।

सुभाष तोमर के बेटे का बयान भी इस प्रसंग में देखें जिसमें वह बार बार कह रहा है कि उसके पिता को गहरी चोटें आई थीं। अफसोस है कि केजरीवाल एंड कंपनी के लोग इस कांड में धरे गए हैं, होसकता है पुलिस ने गलत लोगों को पकड़ा हो, यह भी हो सकता है सही लोग धरे गए हों, हमें उन पुलिस वालों के बयानों पर भी गौर करना होगा जिन्होंने इन 8 लोगों को मौके से पकड़ा है। अंततः फैसला मीडिया में नहीं अदालत में होगा गांधी या अन्य के विचारों की रोशनी में अदालत विचार नहीं करती, वहां ठोस प्रमाण की जरूरत होती है मीडिया गॉसिप की नहीं।

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मीडिया को छेड़खानी का कवरेज देते समय स्त्री का फोटो दिखना से बचना चाहिए, उसे शोहदों के ऊपर केन्द्रित करना चाहिए। इस तरह के मसले पर ध्यान हटाने से भी बचने की जरूरत है शोहदों पर न्यूज का केन्द्रित होना जरूरी है। मुश्किल यह है कि टीवीवाले पुलिस-नेताओं को पीटने लगते हैं।इससे मूल मसले से ध्यान हट जाता है। पुलिस -नेताओं को पीटने से भी ज्यादा जरूरी है शोहदों को पीटना। हाल ही में बलात्कार कांड के खिलाफ जो आंदोलन कवरेज आया उसमें उन लोगों पर कम जानकारी आई जो अपराधी हैं।

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छेड़खानी हो या स्त्री उत्पीडन के अन्य रूप हों मीडिया को उनको व्यापक कवरेज देना चाहिए और अपराध में शामिल लोगों के चेहरे बार बार दिखाए जाने चाहिए और प्रत्येक चैनल को अपनी बेवसाइट पर मनचले शोहदों की स्वतंत्र सीरीज चलानी चाहिए।

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सुभाष तोमर की मौत पर एनडीटीवी पर टीवी ट्रायल चल रहा है। एक चश्मदीद गवाह आया है जो विस्तार से विवरण दे रहा है। कायदे से मौत के बाद इस तरह का ट्रायल सही नहीं है। पुलिस मुखिया नीरज कुमार ने कहा कि गरदन,पेट और सीने पर गहरी चोट लगी हैं। असल में यह फैसला अदालत करे टीवीवाले नहीं। यह अदालत के काम में हस्तक्षेप है और अनैतिक है।

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सिपाही सुभाष तोमर की मौत के बाद 8लोगों पर हत्या के केस लगाए गए हैं।

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दिल्ली पुलिस का महाझूठ कि रेप विरोधी आंदोलन की आड़ में आतंकी इंडियागेट पर हमला कर सकते हैं।

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तीन विदेशी कंपनियों के एरिया मैनेजर साकेत मॉल में लड़कियों के साथ छेड़खानी करतेहुए धरे गए।

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दिल्ली के बर्बर बलात्कारकांड ने कामकाजी महिलाओं के आत्मविश्वास को हिला दिया है। कवरेज में हिंसा पर नहीं न्याय और दण्ड पर जोर दिया जाना चाहिए।पढें इकोनॉमिक टाइम्स (24दिसम्बर 2012)-

The horrendous rape case in Delhi has not only shaken the confidence of working women in the National Capital Region (NCR) but also in other major cities, a survey has said.



Most of the respondents felt that it is the time the quality of governance should be improved and the obsession of the police "bandobast" with the VVIPs be changed, Assocham said in a survey.



"Majority of respondents, who are working in companies located in Gurgaon, Noida, Delhi, Sonepat and Faridabad, said they have begun insisting on leaving offices on dot, immediately after duty hours following the atmosphere of insecurity," it said.



After the brutal gang-rape of a 23-year-old girl in a moving bus about a week back, people in many parts of the country have been demanding quick justice for her and also to make stringent laws against rape cases.



"About 88 per cent of women respondents said the anxiety is more among the guardians of those women who travel by chartered buses," the survey said.



These respondents said that now they get more calls while at work from home -- parents or husbands -- after the incident, it added.



The chamber said that it surveyed about 2,500 women and men in various cities.



The survey said those who use the Delhi Metro feel relatively secure as long as they are within the premises of the metro stations.



However, they said the moment they deboard the train, their anxiety levels increase as the basic infrastructure from the stations to the colonies is found lacking.



The survey said majority of respondents feel that the deployment of more police personnels would be there for few days and after that everything will be back to usual, the survey said.



"It is not difficult to wire the major and vulnerable parts of the region with CCTVs, which should be properly monitored and action taken," Assocham Secretary General D S Rawat said.



The fear of law must be instilled among those who are prone to commit heinous crime, he added.



The chamber said that accountability must be fixed not among the junior functionaries but also among the higher-ups. Those found guilty of incompetence and complacency should be simply sacked. "The fear of losing job would work."



Besides, the survey said that if the confidence of workforce is shaken, the NCR would lose its eminent position among even investors.



The respondents also wanted companies human resource departments to devise new ways of ensuring increased staff security, especially among those who work on night duties, it said.

1 टिप्पणी:

  1. यह टी वी वाले लोगो की मानसिकता को बदलने में बड़ी भूमिका निभा रहे है मुझे तो कभी कभी यह लगता है कि लोगो ने दिमाग को इन मीडिया वाले के यहाँ बंधक रख दिया है जिन्हें हम आप बुध्हिजिवी मानते है वह जब मीडिया का सहारा लेकर बोलता है जो बहुत कोफ़्त होती है
    तोमर की मृत्यु को इन्होने तमाशा बना डाला मीडिया सही अर्थो में अराजक भीड़ के साथ खड़ी नजर आ रही है मीडिया सही अर्थ में एक makhi की तरह है जिसे गन्दगी पर ही बैठ कर वमन करना आता है सटीक लेख के लिए साधुवाद

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