संदेश

February, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ब्रज संस्कृति की चुनौतियाँ

ब्रज संस्कृति का विगत दो सौ सालों में निरंतर ह्रास हुआ है। यह संस्कृति मूलत: साहित्य, भाषा और जीवनशैली से जुड़ी रही है। विगत दो सौ सालों में ब्रज के अंदर साहित्य और संस्कृति का  ह्रास हुआ है । हिन्दी लेखकों द्वारा ब्रज भाषा को सबसे पहले साहित्य से सचेत रुप से खदेड़ा गया । ब्रज भाषा के आधुनिकीकरण के प्रयासों को किसी ने हाथ नहीं लगाया। आधुनिककाल के पहले ब्रज भाषा को कविता का भाषा के रुप में प्रतिष्ठा और स्वीकृति प्राप्त थी लेकिन आधुनिक काल आने के बाद ब्रज पर हमले बाहर से नहीं अंदर से हुए , दिलचस्प बात यह है कि ये हमले और किसी ने नहीं किए बल्कि साहित्य के नामी लेखकों ने किए, ख़ासकर खड़ी बोली हिन्दी को साहित्य में प्रतिष्ठित करने के लिए यह काम किया गया और इस क्रम में हिन्दीभाषी क्षेत्र की सभी भाषाएँ पिछड़ गयीं और उनको मुख्यधारा के साहित्य से अलग कर दिया गया । यह काम किया गया खड़ी बोली हिन्दी को जातीय भाषा के रुप में प्रतिष्ठित करने के बहाने, लेकिन हिन्दीभाषी क्षेत्र की भाषाओं और बोलियों के प्रति समान व्यवहार नहीं किया गया। इससे भाषा संहार की प्रक्रिया ने जन्म लिया। यह भाषा संहार उर्दू से …

"आप" की जीत का सच

दिल्ली विधानसभा चुनाव हो गए, चौदह फ़रवरी 2015 को नए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण करेंगे । वे रोड शो करते हुए सभा स्थल तक जाएँगे। यह नए क़िस्म का शक्ति प्रदर्शन और मीडिया इवेंट है । यह असल में मोदी के जलसेबाज फिनोमिना का जलसेबाजी से खोजा जा रहा विकल्प है । यह दुनिया के सामने लोकतंत्र को मजमे में तब्दील करने का शो भी है। अन्ना हज़ारे के सुझाव को केजरीवाल ने मान लिया होता तो बेहतर होता।   यह लोकतंत्र के नायक की पहली चूक गिनी जाएगी। सादगी से शपथग्रहण समारोह करने से केजरीवाल का क़द छोटा नहीं होता , जलसेबाजी से क़द बड़ा भी नहीं होता ! केजरीवाल का जलसा प्रेम अंततः मोदी के छंद में बँधने की शुरुआत है । मोदी को बेनक़ाब करने के लिए मोदी का छंद चुनाव तक प्रासंगिक है , सत्तारुढ़ होने के बाद जलसेबाजी करना लोकतंत्र और नेता की ताक़त कम और कमज़ोरी ज्यादा दिखाता है। बेहतर होता शपथग्रहण की जलसेबाजी न होती !           केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को दिल्ली में अभूतपूर्व विजय हासिल हुई है । यह जीत क्यों और कैसे मिली ? किन शक्तियों की इस जीत में भूमिका थी ? कारपोरेट घरानों की प्र…

दिल्ली विश्व पुस्तकमेला के शिरकत विरोधी आयाम

विश्व पुस्तक मेला (१४ -२२फरवरी २०१५) पर लेखकों -पाठकों की निगाहें टिकी हैं ! कुछ के लिए यह इवेंट है !कुछ के लिए लोकार्पण उत्सव है!कुछ के लिए प्रकाशन का अवसर है !   विश्व पुस्तक मेला स्वभावत: शिरकत विरोधी है। यह प्रकाशकों , पाठकों और लेखकों की शिरकत सीमित करता है।  यह मान लिया गया है कि यह भी एक इवेंट है और उसी रुप में आयोजित कर दो ! लेखक संगठनों का विश्व पुस्तक मेला की समस्याओं की ओर कभी  ध्यान ही नहीं गया और लेखकों ने निजी तौर पर भी पहल करके कुछ भी लिखने की ज़रुरत महसूस नहीं । यहाँ तक कि हिन्दी के लोकार्पण नरेशों ( नामवर सिंह आदि) का भी ध्यान नहीं गया।          विश्व पुस्तक मेला का ढाँचा इस तरह का है जिसमें प्रकाशकों को शिरकत का मौक़ा कम मिलता है। इसमें शिरकत करने वाले प्रकाशकों को खर्च ज्यादा करना पड़ता है और मेला मात्र ७ दिन चलता है जिसके कारण इसमें जो लागत खर्च होती है वह भी छोटे दुकानदार झेल नहीं पाते। क़ायदे से मेले में स्टाल लगाने का ख़र्चा न्यूनतम रखा जाय और मेला दो सप्ताह चले।      मसलन् कोलकाता पुस्तक मेला तुलनात्मक तौर पर कम खर्चीला पड़ता है और मेला १५ दिन तक चलता है।इसके अला…

मोदी का सपनों का पुल

नेता वही अपील करता है जो सपनों का पुल बनाए। सपनों के पुल पर सरपट दौड़े। इसबार नेता के सपनों में झोंपड़ी को जगह मिली है। जबसे झोंपड़ी को जगह मिली है, झोंपड़ीवालों को नींद नहीं आ रही। वे पक्केघर के सपने से बेचैन हैं ! डरे हैं! वे हजम नहीं कर पा रहे हैं कि उन्होंने ऐसा कौन सा पुण्यकार्य किया है जो झोंपड़ी को सभी नेता पक्के मकान में तब्दील करने में लगे हैं ! रामलाल कल कड़कड़दूमा से मोदीजी की मीटिंग से लौटा तो सारी रात सो नहीं पाया ! वह डरा हुआ था । उसे इस सपने से ही दहशत हो रही थी कि उसे घर बैठे पक्का घर मिल जाएगा! वह परेशान था कि कोई भी नेता उसकी पगार बढ़ाने की बात क्यों नहीं कर रहा ? महंगाई कम करने की बात क्यों नहीं कर रहा ? झोंपड़ी में रहनेवाले विगत दो महिने से बहुत परेशान हैं। वे सपनों के कारण सो नहीं पा रहे हैं ! 
दिल्ली के झोंपड़ीवालों ने इतने सपने पहले कभी नहीं देखे। वे पहले गुण्डों के सपने देखते थे,पुलिसवाले के सपने देखते थे, कभी –कभी फिल्मी सपने देखते थे।लेकिन घर का सपना कभी नहीं देखते थे। मजेदार बात यह है कि गुण्डे-पुलिस के सपने से उनको मुक्ति आज तक नहीं मिली । …

मोदी का नसीब और अभागा लोकतंत्र

नसीब का तर्कशास्त्र परजीवियों को भाता है। लोकतंत्र नसीब तंत्र नहीं है। लोकतंत्र में भाग्य को श्रेय देना जनता का अपमान करना है। जनता से किए गए वायदों से मुँह मोड़ना है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कल जब दिल्ली में एक आमसभा में बोल रहे थे तो अपने नसीब यानी भाग्य को श्रेय दे रहे थे। लोकतंत्र को भाग्यतंत्र कहना सही नहीं है। राजसत्ता यदि भाग्य का ही खेल होता,कुंडली के ग्रहों का ही खेल होता तो राजाओं का पराभव कभी नहीं होता। राजतंत्र की विदाई नहीं होती।

मोदी वोट की राजनीति में भाग्य का सिक्का उछालकर असल में आम जनता की पिछड़ीचेतना का दोहन करना चाहते हैं। वे यह भी चाहते हैं कि आम जनता अब भाग्य के भरोसे रहे !उनकी सरकार अब वायदे पूरे करने नहीं जा रही !

लोकतंत्र में भाग्य की हिमायत के कई आयाम हैं जिन पर गौर करने की जरुरत है। लोकतंत्र को भाग्य का खेल मानने का अर्थ है संविधान का अपमान करना। संविधान हमारे नागरिक और शासकों को अंधविश्वास फैलाने की अनुमति नहीं देता।नसीब तो अंधविश्वास का हिस्सा है। मोदी पीएम इसलिए नहीं बने कि उनका भाग्य अच्छा था बल्कि इसलिए बने कि जनता ने उनको वोट दिया। तेल …