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April, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

टीवीयुग में कन्हैया कुमार की सीमाएं-

मेरे कल के आलेख ´कन्हैया कुमारःविभ्रम और यथार्थ´ पर टिप्पणी करते हुए प्रियंकर पालीवाल ने कुछ गंभीर सवाल उठाए हैं जिन पर सोचने की जरूरत है। पालीवाल का मानना है,´कन्हैया कुमार,राज ठाकरे, लालूप्रसाद और नरेंद्र मोदी इन सबके भाषण उनके समर्थकों में जबर्दस्त लोकप्रिय हैं . सेंस ऑफ ह्यूमर ? खांटीपन ? देसी मुहावरा ? लफ्फाज़ी ? अन्य के लिए घृणा-प्रचार ? आखिर क्या है इनकी लोकप्रियता का राज ? इसका विश्लेषण होना चाहिए . अगर जे.एन.यू. के पूर्व छात्र नेताओं से ही तुलना करनी हो तो डी.पी.त्रिपाठी या सीताराम येचुरी से कर ली जाए . जगदीश्वर चतुर्वेदी से ही कर ली जाए . पर एक बात तय है कि कन्हैया की लोकप्रियता अभिजात वाम की लोकप्रियता नहीं है. वह वाम के आभिजात्य को तोड़ने वाली ग्रामी-वामी यानी भदेस-वामी लोकप्रियता है .´

इस प्रसंग सबसे पहली बात यह कि कन्हैया कुमार के भाषण को राज ठाकरे,लालू प्रसाद यादव ,नरेन्द्र मोदी के साथ तुलना करके नहीं देखा जाना चाहिए।राज ठाकरे लंपट राजनीति का मीडियानायक है,लालू यादव बिहार का सबसे जनप्रियनेता है,नरेन्द्र मोदी हिन्दुत्व के नायक हैं, जबकि कन्हैया कुमार जेएनयू का …

आतंकवाद,साम्प्रदायिकता और मीडिया

आतंकवाद और साम्प्रदायिकता जुड़वाँ भाई हैं। इसलिए उनको संक्षेप में ´आ –सा´ कहना समीचीन होगा।इन दोनों में साझा तत्व है कि ये दोनों मीडिया कवरेज के बिना जी नहीं सकते।इनके लिए मीडिया कवरेज संजीवनी है।वे गिनती में कम होते हैं लेकिन टीवी और समाचारपत्र में कवरेज को लेकर पगलाए रहते हैं। वे मीडिया कवरेज के सहारे ही अपना विकास करते हैं। मीडिया कवरेज के जरिए ही ये भारतीय मध्यवर्ग तक अपनी पैठ बनाने में सफल हो जाते हैं।इनके मीडिया कवरेज का अल्पकालिक और दीर्घकालिक दो तरह का असर होता है।ये अपने को राष्ट्र-राज्य के संरक्षक के रूप में पेश करते हैं,उनकी यह छवि मध्यवर्ग को अपील करती है।खासकर पश्चिमी जीवनशैली से प्रभावित मध्यवर्ग को अपील करती है,क्योंकि यह वर्ग भारतीय समाज में अपने को राष्ट्र संरक्षक के रूप में पेश करता है। उनके इस नजरिए का पत्रकारों पर गहरा असर होता है और वे भी अपने मीडिया कवरेज के लिए राष्ट्र संरक्षकों को खोजने लगते हैं और यही वह प्रस्थान बिंदु है जहं पर टीवी बहसों से लेकर समाचारपत्रों तक साम्प्रदायिक लेखक,प्रवक्ता ,नेता आदि राष्ट्र संरक्षक के रूप में हमारे सामने पेश किए जाते…

विज्ञान ,संस्कृत और संघ

आरएसएस का विज्ञान और संस्कृत से तीन-तेरह का संबंध है।इस संगठन की न तो विज्ञान में रूचि है और न संस्कृतभाषा और साहित्य के पठन-पाठन में दिलचस्पी है।इसके विपरीत इस संगठन का समूचा आचरण विज्ञान और संस्कृत विरोधी है।

आरएसएस के लिए विज्ञान और संस्कृत अन्य पर,विरोधियों पर और ज्ञान संपदा पर हमला करने का बहाना है।वे ज्ञान को अर्जित करने के लिए विज्ञान और संस्कृत के पास नहीं जाते बल्कि ज्ञानसंपदा को नष्ट करने के लिए संस्कृत का बहाने के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं।

भारत की पुरानी परंपरा में संस्कृत साहित्य और संस्कृत भाषा आनंद सृजन और आनंद प्राप्ति का स्रोत थी और आज भी है,लेकिन संघ ने संस्कृत भाषा को आनंद की बजाय टकराव और वर्चस्व की भाषा बना दिया है। बृहदारण्यक उपनिषद में वेदान्त के बारह महावाक्यों में एक ´विज्ञानमानन्दं ब्रह्म´भी है।इसमें विज्ञान को आनंद के समान माना है।यह विज्ञान और कुछ नहीं भाषा ही है।संस्कृत में इसी के आधार पर भाषा को विज्ञान मानने की परंपरा चली आ रही है।अन्यत्र तैतिरीय उपनिषद में ´विज्ञानं देवाःसर्वे ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते´ कहा गया है यानि विज्ञान को ही ज्येष…

आईआईटी , संस्कृत और संघ का खेल

मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी का मानना है कि आईआईटी के छात्रों को संस्कृतभाषा की शिक्षा दी जानी चाहिए।सुनने में यह सुझाव बड़ा अच्छा लगता है लेकिन सवाल यह है संस्कृत पढ़कर आईआईटी का छात्र क्या करेगा ॽ क्या संस्कृतभाषा उसके ज्ञान-विज्ञान में कोई इजाफा करेगी ॽइससे भी बड़ी बात यह कि संस्कृत पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों को आईआईटी में क्या दाखिला मिलता है ॽये कुछ सवाल हैं जिनके बारे में ईरानी और उनकी संस्कृतमंडली को जबाव देने चाहिए।

आईआईटी के पाठ्यक्रम का ढ़ांचा कुछ इस तरह का है कि उसमें संस्कृत से कोई मदद नहीं मिलेगी।मसलन्,आईआईटी के पाठ्यक्रम से संबंधित कोई भी सामग्री संस्कृत में नहीं है।दूसरी बात यह कि आईआईटी में भाषा की पढ़ाई नहीं होती बल्कि प्रौद्योगिक,इंजीनियरिंग आदि की पढ़ाई होती।स्मृति ईरानी को यदि संस्कृत के उत्थान की इतनी ही चिन्ता है तो उनको संस्कृत भाषा और साहित्य के पठन-पाठन पर उन विश्वविद्यालयों में जोर देना चाहिए जहां संस्कृत पढायी जाती है।अधिक से अधिक संस्कृत के शिक्षकों की नियुक्तियां कराएं,संस्कृत के विद्यार्थियों को विशेष वजीफे दें,शोध के लिए बड़े-…

कन्हैया कुमारः विभ्रम और यथार्थ

कन्हैया कुमार,जेएनयूएसयू अध्यक्ष, काफी लंबे समय से छात्र राजनीति कर रहे हैं,लेकिन 9फरवरी 2016 की घटना ने उनको रातों-रात जेएनयू कैंपस के बाहर बेहद जनप्रिय बना दिया।इस घटना के पहले वह जेएनयू में जनप्रिय थे,लेकिन 9फरवरी की घटना के मीडिया कवरेज ने उनको राष्ट्रीय स्तर पर जनप्रिय बना दिया।इस जनप्रियता का श्रेय मीडिया,साइबर मीडिया और कन्हैया के वाम नजरिए को जाता है।कन्हैया कुमार ने ऐसा कुछ नहीं कहा जो वह पहले किसी वाम नेता ने नहीं बोला हो।इसके बावजूद किसी युवा वाम छात्रनेता को उतनी जनप्रियता नहीं मिली,जितनी कन्हैया कुमार को मिली।इस जनप्रियता के कारणों और प्रक्रिया की खोज की जानी चाहिए।

कन्हैया कुमार जो कुछ बोलता है, जिस मुहावरे में बोलता है वह वाम छात्र राजनीति की चिर-परिचित शैली है।इसे जेएनयूएसयू के किसी भी वाम छात्रनेता में सामान्यतौर पर देख सकते हैं।इसमें विलक्षण जैसी कोई चीज नहीं है।कन्हैया कुमार जब बोलता है तो सामान्य,सहज और जोशीली भाषा में बोलता है।यह खूबी वाम छात्रनेताओं की है।

उल्लेखनीय है युवा पीढ़ी नरेन्द्र मोदी और दूसरे नेताओं के भाषणों से विगत दो सालों से घिरी…

सोशलमीडिया और साहित्य

इन दिनों अकादमिक जगत का एक वर्ग सोशलमीडिया से क्षुब्ध है।खासकर हिन्दी के प्रोफेसर और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग में सोशलमीडिया को लेकर हेयभाव है।वे इसमें लिखने-पढ़ने को थर्डग्रेड किस्म का काम समझते हैं।यदि सोशलमीडिया पर कोई मेरा जैसा प्रोफेसर सक्रिय है तो उसे एकदम अ-गंभीर और गैर-जिम्मेदार समझते हैं।मेरी फेसबुक वॉल पर आए दिन इस तरह के क्षुब्ध लोग लिखते रहते हैं कि सब समय तो फेसबुक पर रहते हो फिर पढ़ाने कब जाते हो ॽ सच्चाई यह है मैं कक्षा में कभी अनुपस्थित नहीं रहा।कभी कोर्स अधूरा नहीं छोड़ा।बल्कि हिन्दी के जितने भी प्रोफेसर हैं उनमें अब तक सबसे ज्यादा किताबें लिखी हैं।किताबों के पाठक भी हैं।कभी किताब लिखना नहीं छोड़ा।कभी किसी की चमचागिरी नहीं की,किताबें लिखने के लिए किसी से अनुदान नहीं लिया,यहां तक कि यूजीसी और अपने विश्वविद्यालय से भी कोई अनुदान नहीं लिया। इस तरह के लोग यह भी मानते हैं कि हल्के-फुल्के लेखन,फोटो लगाने,दैनंदिन गप्पबाजी करने आदि के लिए सोशलमीडिया ठीक है लेकिन कोई गंभीर साहित्यिक कार्य सोशलमीडिया के जरिए नहीं कर सकते।हम विनम्रता के साथ इस तरह का नजरिया रखने वालों से …

गोपेश्वर सिंह यहाँ से देखें

गोपेश्वर सिंह (प्रोफेसर हिंदी विभाग,दि.वि.वि ने जनसत्ता (17अप्रैल2016)में एक लेख”आभासी दुनिया के राग रंग´´ लिखा है, उससे हम विनम्र असहमति दर्ज करते हैं।

आप यदि सोशलमीडिया,मीडिया और साहित्यालोचना के बारे में नहीं जानते तो जाने बिना लिखते क्यों हैं ॽ कम से कम अपने पद की गरिमा का तो ख्याल करें।सोशलमीडिया-मीडिया पर अंगुली उठाकर मूलतःआप अपने निकम्मेपन पर ही अंगुली उठा रहे हैं।सोशलमीडिया और उस पर लिखने वालों पर बेसिर-पैर की बातें लिखकर आपने सोशलमीडिया के संबंध में अपनी अज्ञानता और घृणा का परिचय दिया है,साथ ही साहित्य और सोशलमीडिया ,साहित्यालोचना के ह्रास पर अपनी जो राय रखी है,वह आपके अज्ञान को सामने लाती है। मुश्किल यह है जब कम्युनिकेट करना नहीं आता तो हम ´हाय हाय´, ´पतन पतन´की भाषा बोलने लगते हैं।

जितने भी आधुनिक मीडियम और विधारूप हैं वे आत्मप्रचार के बिना नहीं बनते। किसी में यह मात्रा कम है तो किसी में ज्यादा।आत्मप्रचार या प्रचार ये दोनों संचार के लिए जरूरी तत्व हैं।हिन्दी साहित्य में इन दिनों साहित्यकार,लेखक,आलोचक आदि की जो दयनीय स्थिति नजर आ रही है उसकी जड़ें हिंदीविभाग की संरचना,शि…

फ्लाईओवर तबाही और राजनीतिक जबावदेही

गिरीश पार्क-पोश्ता फ्लाईओवर के एक अंश का कल गिरना ममता सरकार के बारे में बहुत कुछ कहता है। इस फ्लाईओवर का गिरना प्राकृतिक आपदा या ईश्वरलीला नहीं है,बल्कि यह मनुष्यजनित तबाही का आदर्श नमूना है।कोई भी फ्लाईओवर अचानक नहीं गिरता,किसी एक क्षण में नहीं गिरता बल्कि उसके क्षय की प्रक्रिया लंबा समय लेती है,सवाल उठता है कि यह प्रक्रिया इंजीनियरों की नजर से ओझल कैसे रही ॽ उन्होंने समय रहते इसे पकड़ा क्यों नहीं ॽ यह फ्लाईओवर जिस तरह गिरा है उससे पता चलता है कि इंजीनियर इसके निर्माण कार्य के दौरान सजग नहीं थे। इस प्रसंग में महत्वपूर्ण है फ्लाईओवर का अचानक गिरना और व्यापक जनहानि।राजनीति में इसकी जबावदेही होनी चाहिए। यह कहीं न कहीं भ्रष्टाचार का मामला भी है। ममता सरकार अपनी जबावदेही से इसमें बरी नहीं हो सकती।अभी तक समस्त विवरण सामने नहीं आए हैं,लेकिन प्रथमदृष्टया जो चीज नजर आ रही है कि इसके निर्माण में कहीं न कहीं गफलत हुई है,घोटाला हुआ है,निर्माण के नियमों का उल्लंघन हुआ है।यह घटना सामान्य रूटिन दुर्घटना नहीं है,बल्कि असामान्य घटना है,यह घटना बताती है कि ममता सरकार विकास के प्रति किस तरह…