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सुभाषचन्द्र बोस , साम्प्रदायिकता और संघी मासूमियत

इन दिनों वाम राजनीति हाशिए पर है और संघी राजनीति सत्ता,समाज और मीडिया के केन्द्र में है। खासकर मोदी सरकार बनने के बाद से सारा परिदृश्य बदल गया है। अचानक स्वाधीनता सेनानियों को हड़प लेने की कोशिशें हो रही हैं, मासूम तर्क दिए जा रहे हैं। संघी लोग जानते हैं कि मासूम तर्कों से इतिहास नहीं रचा जाता। मासूम तर्क यह है कि स्वाधीनता सेनानी सबके हैं, इसलिए वे हमारे भी हैं, उनको दलीय राजनीति में बांधकर या किसी विचारधारा विशेष के परिप्रेक्ष्य में मत देखो, खासकर स्वाधीनता सेनानियों पर जब भी बातें करो, फूलमालाएं चढ़ा कर प्रणाम करो, विचार-विनिमय मत करो, आलोचनात्मक विवेक का इस्तेमाल मत करो।    संघ की रणनीति है स्वाधीनता सेनानियों के विचार,राजनीति,संघर्ष आदि में निहित विचारधारा की चर्चा मत करो, उन्हीं पहलुओं की चर्चा करो जो हिन्दुत्व के फ्रेमवर्क में फिट बैठते हैं। इस तरह के तर्कशास्त्र के जरिए संघ और उसके संगठन संगठित ढ़ंग से स्वाधीनता संग्राम की विरासत को विकृत कर रहे हैं। उसे युवाओं में गलत ढ़ंग से पेश कर रहे हैं, साथ ही यह भी संदेश दे रहे हैं कि स्वाधीनता आंदोलन की परंपरा राष्ट्रवाद की परंपरा है, ध…

सुभाषचन्द्र बोस और जनसंघर्ष

सुभाष चन्द्र बोस के बारे में इन दिनों मीडिया में जिस तरह से सनसनी पैदा की जा रही है उससे यह खतरा पैदा हो गया है कि कहीं उनके नजरिए को प्रदूषित न कर दिया जाय। सुभाष के नजरिए की आधारभूमि है भारत की मुक्ति। वे आजीवन वामपंथी रहे और उनकी वामपंथी विचारधारा में गहरी आस्थाएं थीं। हमारे देश में अनेक किस्म के समाजवादी पहले भी थे और आज भी हैं, पहले वाले समाजवादी ऐसे थे जो दक्षिणपंथी राजनेताओं के साथ काम करते थे या फिर किताबी समाजवादी थे। सुभाष का नजरिया इन दोनों से भिन्न था।      सुभाष आमूल-चूल सामाजिक परिवर्तन के पक्षधर थे, वे संविधानवादी और सुधारवादी नजरिए से सामाजिक बदलाव की बहुत कम संभावनाएं देख रहे थे, इसलिए उन्होंने संविधानवाद और सुधारवाद से बचने की सलाह दी थी। कांग्रेस में ये दोनों ही दृष्टियों के मानने वाले लोग बड़ी संख्या में थे।     सवाल यह है  क्या संविधानवादी और पूंजीवादी सुधारवादी मार्ग के सहारे हम समाज में आमूलचूल परिवर्तन कर पाए हैं ? सच यह है कि ये दोनों ही नजरिए 65साल में अभीप्सित परिणाम पैदा करने में असमर्थ रहे हैं। यह तब हुआ है जबकि देश का शासन पांच दशकों तक कांग्रेस के पा…

हिन्दुत्ववादी तानाशाही के 15 लक्ष्य

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जो लोग फेसबुक से लेकर मोदी की रैलियों तक मोदी-मोदी का नारा लगाते रहते हैं वे सोचें कि मोदी में नारे के अलावा क्या है ,वह जब बोलता है तो स्कूली बच्चों की तरह बोलता है,कपड़े पहनता है फैशन डिजायनरों के मॉडल की तरह, दावे करता है तो भोंदुओं की तरह, इतिहास पर बोलता है तो इतिहासअज्ञानी की तरह । मोदी में अभी तक पीएम के सामान्य लक्षणों ,संस्कारों, आदतों और भाषण की भाषा का बोध पैदा नहीं हुआ है। मसलन् पीएम को दिल्ली मेट्रो में सैर करने की क्या जरुरत थी ? वे क्या मेट्रो से कहीं रैली में जा रहे थे ?मेट्रो सफर करने का साधन है, सैर-सपाटे का नहीं। मोदी सरकार के लिए भारत की धर्मनिरपेक्ष परंपराएं बेकार की चीज है। असल है देश की महानता का नकली नशा। उसके लिए शांति,सद्भाव महत्वपूर्ण नहीं है ,उसके लिए तो विकास महत्वपूर्ण है, वह मानती है शांति खोकर,सामाजिक तानेबाने को नष्ट करके भी विकास को पैदा किया जाय। जाहिर है इससे अशांति फैलेगी और यही चीज मोदी को अशांति का नायक बनाती है। मोदी की समझ है स्वतंत्रता महत्वपूर्ण नहीं है, विकास महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रता और उससे जुड़े सभी पैरामीटरों को मोदी सरकार एकसिरे से…

भाषण ,पिता और पिटाई

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यह घटना उस समय की है जब मैं मथुरा के माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय में उत्तरमध्यमा के अंतिम वर्ष का छात्र था सबसे कम उम्र और सबसे छोटी कक्षा का पहलीबार छात्रसंघ का महामंत्री चुना गया था,यह घटना सन् 1974 की है। संस्कृत पाठशाला में आम सभा के जरिए छात्रसंघ का चुनाव होता । उस चुनाव में मैं जीत गया,जीतने के साथ महासचिव होने के नाते मुझे भाषण देना था, छात्रसंघ की परंपरा थी कि जो महासचिव चुना जाता था वह भाषण देता था,मैं भाषण देने से हमेशा बचता था, बल्कि यह कहें तो बेहतर होगा कि मुझे भाषण देना पसंद ही नहीं था। लेकिन छात्रसंघ की परंपरा का निर्वाह करते हुए मैंने अपने गुरुजनों के आदेश पर भाषण देना आरंभ दिया, भाषण संस्कृत में देना था , छात्रसंघ की समूची कार्यवाही संस्कृत में होती थी, संस्कृत में मिनट्स लिखे जाते थे और संस्कृत में संचालन होता था ,छात्रों और शिक्षकों को संस्कृत में ही बोलने का अघोषित निर्देश था, वैसे छात्र हिन्दी में भी बोल सकते थे, लेकिन एक परंपरा चली आ रही थी जिसके कारण समूची कार्यवाही संस्कृत में होती थी।       मैंने पहलीबार भाषण दिया वह भी संस्कृत में और भाषण देते समय मेरी …

श्रद्धा के बिना माकपा

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भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की 21वीं पार्टी कॉग्रेस हाल ही में खत्म हुई है। यह कॉग्रेस एक मायने में महत्वपूर्ण है कि इसने माकपा में श्रद्धा के नायक को अपदस्थ किया है।श्रद्धा को नहीं। प्रकाश कारात के जमाने में माकपा श्रद्धालुओं और भक्तों का दल होकर रह गया था। माकपा के नेतागण श्रद्धालुओं की तरह बातें करते थे और श्रद्धालुओं की तरह ही अविवेकवादी आचरण कर रहे थे। प्रकाश कारात को यह श्रेय जाता है उसने प्रतिबद्ध माकपा को श्रद्धालु माकपा में तब्दील किया । कहने के लिए सीताराम येचुरी महासचिव हुए हैं,लेकिन पोलिट ब्यूरो अभी श्रद्धालुओं से भरा है। इस कमजोरी के बावजूद प्रकाश कारात की श्रद्धा की नीति को कॉग्रेस ने पूरी तरह ठुकरा दिया है।साथ ही श्रद्धा के नायक को विदा किया है ,यह सकारात्मक पक्ष है। 
उल्लेखनीय है विगत दस सालों में माकपा में प्रतिबद्धता घटी, श्रद्धा और अंध-श्रद्धा बढ़ी है। इस श्रद्धा और अंध-श्रद्धा की धुरी है पार्टी का संघात्मक ढ़ांचा और अभिजात्य भावबोध। इसके कारण पार्टी में छोटे-बड़े का भेद बढ़ा है। यह माकपा की अभी भी मूल समस्या है। संघात्मक ढ़ांचे को माकपा किसी भी तरह तोड़ …

गजेन्द्र की आत्महत्या से उठे सवाल

एक व्यक्ति ने आम आदमी पार्टी की रैली के दौरान ,रैली के दायरे में ही  जंतर- मंतर पर सरेआम पेड़ पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। इस आत्महत्या के गर्भ से अनेक सवाल उठ खड़े हुए हैं। गजेन्द्र की आत्महत्या से यह संदेश गया है कि किसान या आम आदमी की जिंदगी उतनी खुशहाल नहीं रह गयी है जितना मीडिया के जरिए प्रचार किया जा रहा है। आम आदमी की जिंदगी लगातार असंख्य परेशानियों से घिरती जा रही है। कितना भयानक दृश्य है कि जो व्यक्ति सामूहिक लड़ाई का अंग बनकर रैली में भाग लेने आया था उसके मन की थाह किसी के पास नहीं थी, वह अपनी जेब में आत्महत्या का पुर्जा लिखकर लाया था। उसने अपने किसी भी संगी-साथी को भनक तक नहीं लगने दी कि वह किस तकलीफ में है। वह सामूहिक जंग में भी  एकाकी और पराएपन में कैद था।         गजेन्द्र का रैली में सरेआम फांसी लगाकर आत्महत्या कर लेना और रैली में शामिल हजारों लोगों का उसको देखते रहना,लंबे समय तक रैली के आयोजकों का उसकी स्थिति की ओर ध्यान न देना इस बात का द्योतक है कि हम घनघोर अमानवीय समय और अमानवीय भावबोध में डूबे नेताओं और संगठनों के बीच में जी रहे हैं। हमारा समाज अरविंद केजरीवाल…

मनुष्य "पाने" की नहीं "देने" की भावना से बचता है

आजकल जो राजनीतिक आंदोलन और रैलियां होती हैं वे आम जनता या संघर्ष में शामिल जनता के मन में कैथारसिस या विरेचन या कुर्बानी की भावना पैदा नहीं करतीं, इसके उलटे आम जनता में लालच और मोह पैदा करती हैं। राजनीतिकदलों की समूची प्रचारनीति इस बात पर टिकी  है कि येन-केन प्रकारेण आम लोगों को अपने साथ लाया जाय,वे जनता की राजनीतिक शिक्षा नहीं करते, वे उसमें त्याग की भावना पैदा नहीं करते, वे प्रचार के जरिए उसमें उन्माद की भावना पैदा करके उसके विवेक को कुंद बनाते या विवेक का अपहरण कर लेते हैं। त्याग की भावना पैदा किए किए बना  किसानों और नौजवानों में किसी भी किस्म के उल्लास की भावना पैदा नहीं की है।         जंतर-मंतर की रैली में आया किसान कायदे से उत्साह-उमंग में घर जाता तो बढ़िया होता लेकिन वह रैली में आने के बाद गहरी निराशा और हताशा में चला गया और उसने आत्महत्या का फैसला कर लिया,हमें यह बात सोचनी चाहिए कि वामदलों की किसानसभाएं और भारतीय किसान यूनियनों की राजनीति भी कमोबेश राजनीति का वही हथकंड़ा अपना रही हैं जो राजनीतिकदल अपना रहे हैं।         हमें गंभीरता के साथ इस सवाल पर सोचना चाहिए कि जब किसानों क…

पेजथ्री मार्क्सवाद की भँवर

सीताराम येचुरी के माकपा महासचिव बनते ही मीडिया में आशा का संचार दिख रहा है। उनको कोई भिन्न खबर मिली है। हमने बहुत पहले लिखा था, फिर लिख रहे हैं,सीताराम के महासचिव बनने से माकपा सुधरने नहीं जा रही। लेकिन एक काम जरुर होगा मीडिया में माकपा जरुर नजर आएगी,क्योंकि सीता का मीडिया जनसंपर्क हमेशा से अच्छा रहा है। लेकिन माकपा को मीडिया में नहीं आम जनता में काम करना है।      माकपा की विशाखापत्तनम कॉगेंस में ऐसा कुछ भी नया नहीं घटा जिससे लगे कि माकपा में जल्द ही कोई बड़ा बदलाव आएगा। माकपा सबसे कंजरवेटिव किस्म की कम्युनिस्ट पार्टी है, अनुदारवादी भावबोध इसमें कूट-कूटकर भरा हुआ है। माकपा में अनुदारवादियों के अलावा एक बड़ा तबका असामाजिक तत्वों का भी दाखिल हुआ है जिसने माकपा की इमेज को क्षतिग्रस्त किया है। माकपा यदि आंतरिक अनुदारवाद और असामाजिक कार्यकर्ताओं के तंत्र को तोड़ने में सफल होती है तब तो कोई नई आशा की किरन फूट सकती है वरना विशाखापत्तनम कॉग्रेस मात्र रुटिन कॉग्रेस ही मानी जाएगी।
     हम तो चाहते हैं कि माकपा यह करे, वह करे, भारत की राजनीति के केन्द्र में आ जाए,लेकिन माकपा की भौतिक परिस्थितियां …

भूरा के सर्जक

मेरा जन्म परंपरागत परिवार में हुआ,घर में दादी का वर्चस्व था, वही परिवार की मुखिया थी और उसने ही परिवार के सभी महत्वपूर्ण फैसले लिए। मेरे निर्माण में मेरी माँ के अलावा दादी और बुआ की बहुत बड़ी भूमिका रही है। बचपन में स्त्रीमन को पढ़ने के सूत्र मुझे इन तीनों से ही मिले। परिवार की स्त्रियां बच्चे के मन को  रचती हैं । मैं 13-14 साल की उम्र से ही सुबह चार बजे उठ रहा हूँ। सुबह उठाने का काम माँ और दादी करती थी,इन दोनों की जिम्मेदारी थी कि मैं सुबह उठूँ और पढ़ूँ. वह सिलसिला आज तक बना हुआ है। मैं सुबह उठकर सो न जाऊँ इसलिए मुझे एक गिलास में  रोज चाय मिलती थी जिसमें तेज काली मिर्च हुआ करती थीं। बेहतर बात यह थी कि मेरे लिए एक छोटा कमरा अलग से बनवा दिया गया था जिसमें मैं अकेले सोता था,मेरे लिए एक रेडियो ,एक टेबिल लैंप, कुर्सी-टेबिल की व्यवस्था कर दी गयी थी ।          मेरा जन्म संयुक्त परिवार में हुआ था, जिस मकान में जन्म हुआ वह तीन आंगन का  था और उसमें आठ कमरे थे । लंबी छतें थीं। घर में एक भी पंखा नहीं था, एक छोटी सी घड़ी थी । परिवार के पालन-पोषण का आधार परंपरागत यजमानी थी । साथ में चर्चि…

गऊमांस,तम्बाकू,प्राइम टाइम सिनेमा और राज्य आतंकवाद

जन-जागरण के काम को  हमारे नेतागण कानून और पुलिस के सहारे करना चाहते हैं। इससे सामाजिक जारुकता पैदा नहीं होगी । सामाजिक जागरुकता के लिए घरों से निकलो ,लोगों से मिलो और समझाओ और यह काम निरंतर करो। लेकिन इतना परिश्रम करने का समय किसी भी दल के पास नहीं है। खासकर जो चीजें आम लोगों के खान-पान और आदतों में हैं उनको छुड़ाने के लिए जमीनी स्तर से लेकर टीवी तक प्रचार अभियान तेज करो। यह सब करने की बजाय राजनेताओं ने सीधे कानून बनाकर आम जनता के जीवन पर हमला करना आरंभ कर दिया है। यह राज्य आतंकवाद है।        मसलन्, संघ परिवार को गऊ मांस नापसंद है तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप सीधे गऊमांस बंद कर देंगे। भारत में यह संभव नहीं है। यदि ऐसा करेंगे तो लाखों चमड़ा मजदूर भूखे मर जाएंगे। अकेले महाराष्ट्र में गऊहत्या पर पाबंदी से कोल्हापुरी चप्पल का उद्योग बंद हो गया है। लाखों परिवारों के घरों में राशन-पानी बंद हो गया है। यही हाल बाकी देश का है। यदि संघ परिवार सच में गऊहत्या रोकना चाहता है तो जन-जागरण करे और आम लोगों को समझाए कि वे गऊ मांस न खाएं। लेकिन कानूनी आतंकवाद का सहारा न ले। यही बात हम दिल्ली में तम्ब…

संघ का कुँआ

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संघियों के एनजीओ संगठनों के सम्मेलन में कहा कि हम तो नेकी कर कुँआ में डाल की भावना से काम करते हैं!
भागवत जी यह कुँआ क्या आरएसएस है ? या फिर भविष्य में इस्लाम और ईसाइयत पर हमले नहीं होंगे इसका वायदा है? सच कहो ,माजरा क्या है? कारपोरेट मुगलों के सामने कुँआ के जुमले की जरुरत क्यों पड़ी? कारपोरेट मुगलों को अपने जलसे में क्यों बुलाया ? क्या साख में लगे दाग मिटाने को ? बेहतर होता रामजी की शरण में जाते,प्रेमजी की ओर जाना गले नहीं उतर रहा! या फिर महान हिन्दूनेता बनने की तमन्ना जगी है ? जो काम हिन्दूसमाज दो हजार साल में न कर पाया वह आप करेंगे हमें संदेह है ! फिर भी नेक काम में देरी किस बात की! कहो स्वयंसेवकों से १.अंधविश्वासों के खिलाफ जंग लडें! २. दूसरे धर्मों खासकर इस्लाम और ईसाई धर्म के खिलाफ बोलना बंद करें, ३. संविधान का मन से पालन करें,धर्मनिरपेक्षता से प्यार करें! यदि ये तीन काम संघ के स्वयंसेवक करने लगेंगे तो नेकी को कुएं में डालने की नहीं समाज में डालने की जरुरत महसूस होगी ! नेकी वह काम की जो समाज के काम आए ,कुएँ (संघ) के नहीं!

आम आदमी पार्टी और लोकतंत्र की चुनौतियाँ

'आप' के आंतरिक कलह को लेकर मीडिया में इनदिनों जमकर लिखा गया है। इसमें निश्चित रुप से आनंदकुमार,प्रशांत भूषण,योगेन्द्र यादव आदि के द्वारा उठाए सवाल वाजिब हैं । कुछ महत्वपूर्ण सवाल केजरीवाल एंड कंपनी ने भी उठाए हैं जो अपनी जगह सही हैं। दोनों ओर से जमकर एक-दूसरे के व्यवहार और राजनीतिक आचरण की समीक्षा भी की गयी है। गंदे और भद्दे किस्म के हमले भी हुए हैं। अंततः स्थिति यह है कि 'आप' एक राजनीतिक दल के रुप में बरकरार है । जब तक वह राजनीतिक दल के रुप में बरकरार है और केजरीवाल जनता के मुद्दे उठाता है आम जनता में उसकी राजनीतिक साख बनी रहेगी । 'आप' एक राजनीतिक दल है, वह कोई एनजीओ नहीं है। वह बृहत्तर लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रिया का अंग है। राजनीतिक दल होने के नाते और खासकर दिल्ली में सत्ताधारी दल होने के नाते उसकी साख का फैसला उसके सरकारी और गैर-सरकारी कामकाज पर निर्भर  है। राजनीतिक प्रक्रिया में दलीय लोकतंत्र के सवाल बहुत छोटे सवाल हैं। राजनीतिक प्रक्रिया के लिए नेताविशेष के निजी दलीय आचरण के सवाल भी बहुत बड़े सवाल नहीं होते। उल्लेखनीय है लोकतंत्र में निजी आचार-व…

गुड फ़्राइडे पर अ-न्याय खेल

गुड फ़्राइडे हो या दीपावली  ये हमारे सद्भाव के पर्व हैं। दुखद है कि अब निहित स्वार्थी ताक़तें इन त्यौहारों पर भी राजनीति की रोटियाँ सेंकने से बाज़ नहीं आ रही हैं। हमें संस्थागत हित बनाम व्यक्तिगत हित का सवाल उठाते समय यह बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि संस्थान के हित कभी उसमें काम करने वालों के हितों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। संयोग की बात है कि संस्थान के हित को लोकतांत्रिक हक़ों से ऊपर तरजीह देने की बात कही जा रही है। यह भाषा सुप्रीम कोर्ट के मुख्यन्याधीश ने कही है , इसके पहले कभी गुडफ्राइडे या दीपावली के दिन जजों कीकोई सरकारी कॉंफ़्रेंस नहीं रखी गयी।    सुप्रीम कोर्ट के मुख्यन्यायाधीश का तर्क है कि संस्थान के कर्तव्य प्रधान हैं और निजी चीज़ें गौण हैं तो इस तर्क के भयानक अ-लोकतांत्रिक परिणाम हो सकते हैं।        धर्म हमारी लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का हिस्सा है। वह सरकारी तौर -तरीक़ों और मान्यताओं से नियमित नहीं होता। जजों के सम्मेलन  की तिथि तय करते समय तिथि की धार्मिक महत्ता का ख़्याल रखना चाहिए। सवाल यह है कि जजों का यह सम्मेलन अन्य किसी दिन क्यों नहीं रखा गया ? क्या ३६५ दिन में यही…

अल -शबाब के केन्या हिंसाचार के मायने

केन्या में अल-शबाब द्वारा किया गया गरिस्सा विश्वविद्यालय  नृशंस हत्याकांड निंदनीय है। इस घटना के जितने विवरण और ब्यौरे मीडिया में आ रहे हैं, उनसे अल-शबाब की आतंकी हरकतों का संकेत मात्र मिलता है। अल-शबाब के हमले में 147 लोग मारे गए इनमें अधिकतर लड़कियां हैं.तकरीबन 20 पुलिस और सुरक्षाकर्मी भी मारे गए हैं। यह हमला जिस तरह हुआ है उसने सारी दुनिया के लिए संकेत दिया है कि आतंकी हमेशा सुरक्षा की दृष्टि से  कमजोर इलाकों पर ही हमले करते हैं। इन हमलों के पीछे अल-शबाब की साम्प्रदायिक मंशाएं साफ दिख रही हैं, उनके निशाने पर गैर-मुस्लिम छात्र थे।      उल्लेखनीय है यह संगठन केन्या में गैर-मुस्लिमों पर निरंतर हमले करता रहा है और इसे सोमालिया के  अल-कायदा के हिंसक हमलों के खिलाफ इस्तेमाल करने के मकसद से 2011 में संयुक्त राष्ट्र संघ की शांतिसेना की मदद के लिए शामिल किया गया था। अल-शबाब को अफ्रीकी यूनियन सेना की मदद से मुख्य सघन आबादी वाले इलाकों में तैनात किया गया और  उसके वर्चस्व का विस्तार किया गया।  खासकर केन्या,सोमालिया और उगांडा में उसके नेटवर्क का विस्तार करने में संयुक्त राष्ट्रसंघ शांति सेना और …