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बुधवार, 7 सितंबर 2016

मार्क्स-हेगेल के परे जाओगे तो रवीन्द्र को पाओगे

         रवीन्द्रनाथ टैगोर को अपना बनाने के चक्कर में आप यदि उनको मार्क्सवादी बनाएंगे तो दिक्कत होगी।हजारी प्रसाद द्विवेदी ने रवीन्द्र को रवीन्द्र रहने दिया।रवीन्द्र के विचार और अनुभूतियां खांटीं भारतीय हैं।रवीन्द्र की मूल भावभूमि है मानवीय अनुभूति।उसे आप मार्क्स,हेगेल,कांट,देरिदा के जरिए नहीं पा सकते।यही वह प्रस्थान बिंदु हैं जहां से आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने रवीन्द्रनाथ टैगोर से रस प्राप्त किया
।रवीन्द्र का विश्वदृष्टिकोण प्रमुख है।हम य़दि वह ग्रहण करते हैं तो शायद वे हमारे लिए आज भी प्रासंगिक हैं।इन दिनों प्रगति पर बहुत बहस है।रवीन्द्रनाथ टैगोर के लिए इसका क्या अर्थ है ॽ
साहित्य और समाज के प्रसंग में ´प्रगति´ का सवाल बेहद महत्वपूर्ण है।इसकी तरह-तरह की परिभाषाएं हो रही हैं।आज प्रगति का मतलब है सड़क,बिजली और पानी।लेकिन रवीन्द्रनाथ के जमाने में प्रगति का अर्थ था ´महान् परिवर्तनों की ओर अग्रसर होना´।एक जमाने में साम्यवाद की ओर अग्रसर होने को प्रगति कहा गया। इस दृष्टिकोण से अलगाते हुए रवीन्द्रनाथ के लिए प्रगति का अर्थ है ´नूतन दृष्टिकोण´।रवीन्द्रनाथ ने सामाजिक उत्पीड़न और रूढ़िवादिता के खिलाफ जमकर लिखा है, इस तरह की रचनाओं का प्रगति की धारणा से कोई संबंध नहीं है।सुशोभन सरकार के अनुसार ´सच तो यह है रवीन्द्रनाथ टैगोर का किसी आमूल परिवर्तनवादी कार्यक्रम में; किसी प्रशासनिक संस्था अथवा तंत्र में कोई निश्चित विश्वास न था।´

सुशोभन सरकार के अनुसार ´अंततःहम यही कहेंगे कि टैगोर की दार्शनिक आस्था उस विचार से मेल नहीं खाती जिसे हम आज ´प्रगति´कहते हैं।उनमें केवल भौतिकवाद विरोधी दार्शनिक आदर्शवाद ही नहीं पाया जाता बल्कि उनके चिंतन का सार-तत्व व्यक्तित्व में विश्वास करने में निहित है।उन्होंने मानव के सर्वतोमुखी विकास के आदर्शों की खोज की।उनकी ´दृष्टि´में ´´मनुष्य का धर्म´´स्वतःधर्म का आधार है। उनके अनुसार व्यक्तित्व का विकास ही सभ्यता का तात्पर्य है,जो आज की औद्योगिक प्रवृत्ति से आच्छन्न है।आज मशीन की उपासना के पीछे हमारा विषाद तथा थकावट भरी पड़ी है।कदाचित यही भाव´रक्त करवी´ के प्रतीक के रूप में निहित है।कवि ने व्यक्तित्व की धारणा में प्रगति को अंतर्निहित माना है।किंतु आज के युग में विशाल जनसमूह को ध्यान में रखते हुए व्यक्तिगत विकास की कल्पना अप्रासंगिक है।अतएव व्यक्तित्व को लक्ष्य बनाकर सामाजिक सुधार का विचार संशयपूर्ण हो जाता है।व्यक्तिगत विकास को वास्तविक मूर्त रूप देने के पूर्व हमें अपने सामाजिक ढांचे को बदलना होगा।´

यह सच है टैगोर ने बंगला भाषा,साहित्य,काव्यशैली और जनमानस पर अपनी रचनाओं के जरिए व्यापक प्रभाव डाला।नए परिवर्तनों को जन्म दिया।इसी प्रसंग में यह सवाल उठा कि टैगोर के लेखन से किसतरह की संस्कृति प्रभावित हुई और किस तरह की संस्कृति ने जन्म लिया ॽ इस प्रसंग में सबसे पहले हमें इस सवाल पर विचार करना होगा कि बुर्जुआ संस्कृति का टैगोर युगीन परिदृश्य किस तरह का था ॽटैगोर ने जिन नए परिवर्तनों को जन्म दिया वे परिवर्तन किस तरह के थे ॽ उस जमाने में बुर्जुआ संस्कृति भयाक्रांत थी।भविष्य के भय से त्रस्त थी।इसके कारण बुर्जुआ संस्कृति में अपंग भाव था।टैगोर ने इस अपंग और भयाक्रांत भावबोध के खिलाफ निडर होकर लिखा,वे पूर्व धारणाओं से टकराने से डरते नहीं थे,भविष्य कों लेकर भी संशय में नहीं थे।दूसरा संस्कृति के संकुचित दायरों को उन्होंने हमेशा तोड़ा।उन दिनों बुर्जुआजी संस्कृति रह-रहकर सीमित दायरों की ओर लौट रही थी।एक खास किस्म का संकीर्णतावाद व्यक्त हो रहा था,टैगोर ने इसे खुली चुनौती दी।यह चुनौती भाषा,शैली और सौंदर्यानुभूति के स्तर पर दी गयी।

टैगोर ने ´रूस के पत्र´में बुर्जुआ व्यवस्था और संस्कृति के ह्रासशील पहलुओं की चर्चा करते हुए लिखा है ´आधुनिक राजनीति की प्रेरणा-शक्ति वीर्याभिमान नहीं,धन का लोभ है-यह तत्त्व हमें ध्यान में रखना ही होगा।´टैगोर ने पूंजीवाद को ´वैश्ययुग´ की संज्ञा दी है और इसकी आदिम भूमिका को ´दस्युवृत्ति´ कहा। यह भी लिखा ´आज के युग में लोभ-प्रवृत्ति ने समाज को आलोड़ित करके उसके सारे बन्धन शिथिल और विच्छिन्न कर दिए हैं।´ टैगोर को रूस इसलिए अच्छा लगा क्योंकि वहां के समाज ने लोभ का तिरस्कार किया।उन्होंने लिखा ´रूस में जब मैंने लोभ को तिरस्कृत देखा,मुझे इतना आनन्द हुआ जितना शायद किसी अन्य देश के निवासी को न होता।लेकिन मूल तथ्य को भुलाया नहीं जा सकता;केवल भारत में ही नहीं,समस्त पृथ्वी पर जहाँ भी विपत्तियों का जाल फैलाया गया वहाँ लोभ की ही प्रेरणा ने काम किया है-लोभ के साथ संशय रहे हैं,और लोभ के पीछे अस्त्र-सज्जा रही है,मिथ्या ,निष्ठुर राजनीति रही है।´



बुर्जुआ व्यवस्था का चरमोत्कर्ष तानाशाही में अभिव्यक्त हुआ है,इस प्रवृत्ति की आलोचना करते हुए टैगोर ने लिखा ´डिक्टेटरशिप का प्रश्न भी उठता है।मैं व्यक्तिगत रूप से किसी भी विषय में नेताशाही पसन्द नहीं करता।क्षति या दंड का भय दिखाकर या भाषा-भंगिमा –व्यवहार से अपनी जिद व्यक्त करके मत-प्रचार का मार्ग प्रश्स्त करने की चेष्टा मैं अपने कर्मक्षेत्र में कभी नहीं कर सकता।इसमें सन्देह नहीं कि एक-नायकत्व में बहुत-सी विपत्तियाँ हैं।उसकी एकरूपता और नित्यता अनिश्चित होती है; चालकों और चलितों की इच्छा में योग-साधन न होने से क्रान्ति की संभावना सदा बनी रहती है।इसके अलावा किसी दूसरे से चलाए जाने का अभ्यास चित्त और चरित्र को दुर्बल बनाता है।एकनायकत्व जहाँ भी हो-शास्त्र में,गुरू में,या राष्ट्र-नेता में,उससे मनुष्यत्व की हानि होती है।´

शनिवार, 20 जुलाई 2013

जनसत्ता के निराला पर प्रतिक्रियावादी हमले


 हाल ही में जनसत्ता अखबार में शंकरशरण का लेख छपा है जिसमें सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' को हिन्दुत्ववादी सिद्ध करने का आधारहीन प्रयास किया गया है। इस लेख में निराला को समग्रता में देखने की कोशिश ही नहीं की गयी है। साथ ही इस लेख में निरर्थक प्रगतिवाद पर हमला बोला गया है। अप्रासंगिकता को आलोचना में दीमक कहते हैं।
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जनसत्ता जैसे अखबार की प्रगतिशीलता विरोधी मुहिम जारी है और उसमें कविताओं के साथ आलोचना कम कु-समीक्षा ज्यादा लिखी जा रही है।हाल ही में शंकर शरण जैसे लेखक ने अपने लेख में निराला की प्रसिद्ध कविता तुलसीदास का गलत मूल्यांकन किया है।
असल में उसी कविता में निराला ने कविता लिखने का मकसद भी लिखा है। निराला ने लिखा है- "करना होगा यह तिमिर पार। देखना सत्य का मिहिर द्वार।"
यह कविता हिन्दुत्ववादी नजरिए को अभिव्यंजित करने वाली कविता नहीं है। बल्कि इसका लक्ष्य भिन्न है।
इस कविता का मूल लक्ष्य है सांस्कृतिक अंधकार को पार करके सत्य को पाना। साम्प्रदायिक नजरिए का सत्य के सत्य बैर है। शंकरशरण जैसे लेखक इस मूल बात को पकड़ने में असमर्थ रहे हैं। कविता किसके लिए लिखी गयी है यह बात कविता में निराला ने स्वयं लिखी है । सवाल यह है शंकरशरण यह लेख क्यों इनदिनों मोदी को महान बनाने की मुहिम के हिस्से के तौर पर इस तरह के लेख छापकर जनसत्ता अखबार जाने-अनजाने मोदी की जनसंपर्ककला का शिकार बन गया। निराला का हिन्दुत्व से कोई संबंध नहीं है। निराला विचार और कर्म दोनों में साम्प्रदायिकता विरोधी थे।
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शंकर शरण जैसे लेखक को यह भी जानना चाहिए कि साम्प्रदायिक समस्या पर निराला आखिरकार क्या सोचते थे। निराला ने लिखा है- "हिंदू और मुसलमानों की समस्या इस देश की पराधीनता की सबसे बड़ी समस्या है।"
शंकरशरण जैसे लेखकों का इस समस्या के प्रति रूख क्या है ,यह बात भी जाननी दिलचस्प है। वे निराला में से मनवांछित यथार्थ खोज रहे हैं। इस तरह के लेखन को निराला मानसिक दु्र्बलता मानते थे।
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शंकर शरण जैसे लेखकों को ध्यान में रखकर ही निराला ने लिखा था- "हमारे देश में धार्मिक कट्टरता ही प्रबल है। इसका परिणाम यह होता है कि कट्टरता का जड़त्व मस्तिष्क का विकास नहीं होने देता।अपने अनुकूल न होने पर धार्मिक तत्व झूठे जान पड़ते हैं।यह आत्मानुकूल तत्ववृत्ति बहुत बड़ी मानसिक दुर्बलता है। इसके कारण सभी रेखाओं से मन-शक्ति का विकास नहीं हो पाता। प्रहार करने वाली पशुवृत्ति बनी रहती है।मनुष्य सब देशों के साहित्य,समाज,राजनीति और धर्म का महत्व समझ नहीं पाता।प्रगति एक हद तक बंधी रहती है। "
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निराला ने लिखा था- " हिंदुओं की संकीर्णता के कारण ही मुसलमान इस देश में संकीर्ण हो रहे हैं। "

मंगलवार, 15 मई 2012

जनसत्ता और विक्रम राव का जलेबीलेखन


जनसत्ता अपनी प्रगतिशीलता विरोधी मुहिम में एक कदम आगे बढ़ गया है. उसने के.विक्रम राव का जनसत्ता के 13मई 2012 के अंक में "न प्रगति न जनवाद, निपट अवसरवाद" शीर्षक से लेख छापा है। यह लेख प्रगतिशील लेखकों और समाजवाद के प्रति पूर्वाग्रहों से भरा है।

यह सच है राव साहब की लोकतंत्र में आस्थाएं हैं लेकिन उनके लोकतंत्र में प्रगतिशील लेखकों के लिए कोई जगह नहीं है। प्रगतिशील लेखकों की भूमिका पर राव का मानना है "आज के कथित प्रगतिवादी इसी दोयम दर्जे में आते हैं।" यही उनके लेख की आधारभूत धारणा है । यही उनके साहित्य-विवेक का पैमाना भी है।

राव साहब के लिखे को देखकर यही लगता है कि इनको प्रगतिशील साहित्य का कोई ज्ञान नहीं है अथवा ये जान-बूझकर झूठ बोल रहे हैं। विक्रमराव साहब कम से कम यह तो बताएं कि आधुनिक साहित्य के खासकर नए युग के लोकतांत्रिक प्रतिवादी लेखन के कविता, कहानी,उपन्यास आदि में जो मानक प्रगतिशील-जनवादी लेखकों ने बनाए क्या वे अन्य किसी ने बनाए हैं ?

राव साहब के इस लेख की एक बड़ी दिक्कत है कि यहां तथ्य की बजाय असत्य के आधार पर विचारों की जलेवी बनायी गयी है। प्रगतिशील साहित्य यदि अवसरवादी साहित्य होता और प्रगतिशील लेखक अवसरवादी होते तो प्रगतिशील लेखकों के घरों में घी के दीपक जल रहे होते।

साहित्य में अवसरवाद का अर्थ है प्रतिवादी साहित्य की मौत। विक्रमराव साहब आप ही बताएं कि जगदीश चन्द्र के "धरती धन न अपना" से लेकर भीष्म साहनी के "तमस" तक लेखन में कहां पर अवसरवाद है ? आप जानते हैं कि लेखक की पहचान उसके लिखे के आधार पर होनी चाहिए न कि बयानबाजी के आधार पर। आपातकाल में प्रगतिशील आंदोलन के पुरोधाओं केदारनाथ अग्रवाल,परसाई आदि ने साहित्य धरातल पर आपात्काल का प्रतिवाद भी किया था। उनकी रचनाएं उपलब्ध हैं। मंगाकर पढ़ लें।

राव साहब,जलेबी सुख के लिए काहे को प्रगतिशील विरोधी अंध प्रौपैगैण्डा के आधार पर अनर्गल लिख रहे हैं ? अनर्गल और असत्य लेखन को विचार नहीं कहते,जलेबीलेखन को कभी साहित्य या पत्रकारिता का दर्जा नहीं मिला है। राव साहब आपने जो लेख लिखा है वह पत्रकारिता नहीं है, बल्कि एक अदने से संपादक के लेख की हिमायत में लिखा भौंड़ा और आधारहीन लेखन जलेबी लेखन है। कम से कम राव जैसे प्रतिष्ठित लेखक-पत्रकार से हम यह उम्मीद तो करते हैं कि वह अपने संपादक की डिफेंस में न लिखे। संपादक की डिफेंस में असत्य लेखन पत्रकारिता का पतन है। यह दरबारी लेखन है। इसे आजकल की भाषा में पेड लेखन भी कहते हैं।

संपादक की इच्छा पर उगले गए राव साहब के विचार इस बात की सूचना भी देते हैं कि हिन्दी पत्रकारिता का आदर्श अखबार नपुंसक –जलेबी पत्रकारिता में मशगूल हो गया है और उसके संपादक को अपने विचारों की डिफेंस में आदेश पर लिखवाना पड़ रहा है। आदेश पर जलेबी हलवाई लिखते है, पत्रकार नहीं।

राव साहब की चरम आकांक्षा है कि "इन प्रगतिवादियों को सोवियत संघ की मृत्यु के बाद स्वयं गुम हो जाना चाहिए था।" राव आप साहब देख रहे हैं सारी दुनिया में कम्युनिस्ट मरे नहीं हैं। भारत में भी मरे नहीं हैं। काहे को इतनी व्यथा झेल रहे हैं अंध –कम्युनिस्ट विरोध के आधार पर।यह कम्युनिस्ट कुण्ठा है। यह अनेक की नींद ले चुकी है।आपको भी यह ग्रंथि कष्ट दे रही है लेकिन अफसोस है कि हम इस मामले में कोई मदद नहीं कर सकते। जनसत्ता के संपादक के पास में भी इसका कोई लाज नहीं है। कुण्ठाएं अनुदार नजरिए का चरम होती हैं। प्लीज जलेबी खाना बंद कर दीजिए आपको राहत मिल जाएगी।दूसरी बात यह कि कम्युनिस्ट या प्रगतिशील लेखक मरने वाले नहीं हैं। शोषण जब तक रहेगा प्रगतिशील रहेंगे,कम्युनिस्ट भी रहेंगे और सामाजिक परिवर्तन का साम्यवादी विश्ववदृष्टिकोण भी रहेगा।

विक्रम राव का मानना है, "भारतीय समाज के साथ दशकों तक धोखाधड़ी करने के प्रायश्चित के तौर पर ही सही, जनवाद का चोला पहनने वालों को इतिहास के नेपथ्य में चला जाना चाहिए था।" राव साहब आप ही बताएं कि कम्युनिस्टों ने और खासकर प्रगतिशील-जनवादी लेखकों ने आम जनता के साथ कौन सी धोखाधड़ी की है ? हिन्दी के अधिकांश प्रगतिशील लेखक (चाहे वो किसी भी दल में हों) मौटे तौर पर यथाशक्ति जनता के संघर्षों का समर्थन करते रहे हैं। प्रतिवाद की बेला में यदि कभी किसी के कदम इधर-उधर बहके भी हैं तो अंत में बहके हुए लोग भी सही दिशा में कदम उठाते नजर आए हैं।

किसी भी लेखक के बारे में या आंदोलन के बारे में समग्रता में बातें की जानी चाहिए। दूसरी बात यह कि बद-दुआएं ,लेखन नहीं है।उसी तरह दुआएं भी लेखन नहीं है।यह जलेबी लेखन है। राव साहब आपके पास प्रगतिशीलों के प्रति बद-दुआओं का वह खजाना है जिसे शीतयुद्धीय राजनीति के दौरान अमेरिकी कलमवीरों ने कमाल दिखाते हुए इजाद किया था। आप भारत में रहते हैं अमेरिका में नहीं। कम से कम भारत की हकीकत तो देखकर बातें करें। भारत की आज जो दुर्दशा है उसके लिए न तो कम्युनिस्ट जिम्मेदार हैं और न प्रगतिशील ही जिम्मेदार हैं, ये लोग भारत में शासन नहीं चलाते,इनका इस देश की नीतियों के निर्माण में भी बहुत कम योगदान है,फिर इनके ऊपर इतना गुस्सा क्यों ?

राव साहब ,जनवाद को बुर्जुआजी और उसके आप जैसे हमदर्द जलेबी लेखकों ने बंधक बनाया हुआ है। जनवादी-प्रगतिशील लेखक अपनी कलम से यथाशक्ति इसके खिलाफ संघर्ष करते रहते हैं। वे संघर्ष इसलिए नहीं करते कि उनको कोई इनाम मिले। वे इसलिए भी नहीं लिखते कि उनको शोहरत मिले। वे तो हृदय के आदेश पर लिखते हैं।

राव साहब, जरा कभी अपने हृदय के आदेश पर लिखें और सोचें तो संभवतःप्रगतिशील-जनवादी लेखकों के प्रति आपके मन में जो घृणा बैठी है वह कुछ कम हो जाए ? राव साहब बूढ़े तोते को सिखाया नहीं जा सकता, फिर भी यही कहेंगे कि लेखक और लेखन पर (चाहे वो किसी भी विचारधारा को मानते हों) पर घृणा और असत्य के आधार पर नहीं सोचना चाहिए। एक सम्मानित पत्रकार को घृणा शोभा नहीं देती। घृणा के आधार की गयी पत्रकारिता विचारों की हत्या है। आपने अपने लेख में विचारों के हत्यारे के भाव से लिखा है। प्रगतिशीलों के प्रति आपकी घृणा देखकर संपादक ओम थानवी के संपादकीय विवेक पर भी तरस आ रहा है कि बिना किसी प्रमाण के इस तरह का अनर्गल लेख उन्होंने कैसे छाप दिया।

राव साहब,आपके लेख को देखकर यही महसूस हो रहा है आपका प्रगतिशील विरोधी बुखार काफी बढ़ा हुआ है। प्रगतिशील लेखक संघ और उससे जुड़े कुछ लेखकों ने सत्ता के हित में जो किया उसके आधार समूचे प्रगतिशील लेखन का मूल्यांकन करना सही नहीं होगा। लेखकों का मूल्यांकन उनकी रचनाओं के आधार पर किया जाना चाहिए उनकी सांगठनिक सदस्यता के आधार पर नहीं। लेखक अपनी रचना और उसमें व्यक्त नजरिए से पहचाना जाता है।

राव साहब ने लिखा है- "ये कथित प्रगतिवादी, जनवादी, अंध-मार्क्सवादी असहिष्णु हैं।" इस बयान के लिए उनके पास एकाध घटिया किस्म के उदाहरण भी हैं। असल में पत्रकारिता में रहते हुए और सत्ता के संस्थानों की मलाई खाते-खाते झाडूमार विवेक पैदा हो जाता है। ये झाडूमार विवेक राव साहव की सबसे बड़ी पूंजी है।

राव साहब ने अपने अंध कम्युनिस्ट विरोध की झोंक में कुछ सवाल उठाए हैं देखें सच क्या है- "क्या प्रगतिवादी सीना ठोंक कर कह सकते हैं कि वे हमेशा भारत हितकारी भावना संजोते रहे हैं? बेचारी तसलीमा नसरीन पर कट्टरवादियों के हमले पर साजिशभरी खामोशी क्यों बनाए रहे?" पहली बात यह कि तसलीमा पर कभी खामोशी नहीं रही है। जनसत्ता अखबार में मैंने स्वयं तसलीमा की किताब पर पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा पाबंदी लगाए जाने के विरोध में तत्काल विस्तार से बड़ा लेख लिखा था ,मैंने जब लेख लिखा था मैं जनवादी लेखक संघ की कोलकाता जिला शाखा का महासचिव था। मैं माकपा में भी था। मेरी तरह और भी अनेक लेखक हैं जिन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी पर हुए हमलों के खिलाफ हमेशा आवाज बुलंद की है और हमेशा प्रगतिशील कदमों का समर्थन किया है। यदि किसी मसले पर प्रगतिशील लेखकों की राय मीडिया में नहीं दिखती तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वे प्रतिक्रियावादी विचारों का समर्थन कर रहे हैं। मीडिया में प्रगतिशीलों के विचार न दिखने का बड़ा कारण है मीडिया की प्रगतिशीलों में दिलचस्पी का अभाव। मीडिया के लोग जब भी प्रगतिशील लेखकों से साहित्य-संस्कृति के किसी भी मसले पर राय मांगते हैं वे अमूमन उदार राय जाहिर करते हैं। प्रगतिशील लेखन की बुनियादी शर्त है उदार और सहिष्णु नजरिया।

राव साहब यह आपके अंध-कम्युविस्ट विरोधी नजरिए से निकला काल्पनिक सोच है कि प्रगतिशील असहिष्णु होते हैं। असहिष्णु और अनुदार होकर प्रगतिशील-जनवादी साहित्य नहीं लिखा जा सकता। यह सच है कि प्रगतिशील लेखक संपादक के भांड नहीं होते,जबकि अंध-कम्युनिस्ट विचारधारा में नहाए पत्रकार ,संपादक के इशारों पर नाचने वाले शब्द-नर्तक और जलेबीवीर होते हैं।








शनिवार, 19 मार्च 2011

जनकवि मनमोहन की छह कविताएँ

                                               (कवि मनमोहन)
जिन्होंने मरने से इन्कार किया 
जिन्होंने मरने से इन्कार किया
और जिन्हें मार कर गाड़ दिया गया
वे मौका लगते ही चुपके से लौट आते हैं
और ख़ामोशी से हमारे कामों में शरीक हो जाते हैं

कभी-कभी तो हम घंटों बातें करते हैं
या साथ साथ रोते हैं

खा खाकर मर चुके लोगों को यह बात पता चलनी
जरा मुश्किल है
जो बड़ी तल्लीनता से अपने भव्य मकबरे बनाने
और अधमरे लोगों को ललचाने में लगे हैं


फिर भी मेरा क्या भरोसा

मैं साथ लिया जा चुका हूँ
फ़तह किया जा चुका हूँ
 फिर भी मेरा क्या भरोसा !
 बहुत मामूली ठहरेंगी मेरी इच्छाएँ

औसत दर्जे़ के विचार
ज्यादातर पिटे हुए

मेरी याददाश्त भी कोई अच्छी नही

लेकिन देखिए ,फिर भी,कुत्ते मुझे सूँघने आते हैं
और मेरी तस्वीरें रखी जाती हैं



ईश वन्दना
धन्य हो परमपिता ‍!

सबसे ऊँचा अकेला आसन
ललाट पर विधान का लेखा
ओंठ तिरछे
नेत्र निर्विकार अनासक्त
भृकुटि में शाप और वरदान
रात और दिन कन्धों पर
स्वर्ग इधर नरक उधर

वाणी में छिपा है निर्णय

एक हाथ में न्याय की तुला
दूसरे में संस्कृति की चाबुक

दूर -दूर तक फैली है
प्रकृति

साक्षात पाप की तरह।

ग़लती

 उन्होंने झटपट कहा
हम अपनी ग़लती मानते हैं
ग़लती मनवाने वाले खुश हुए
कि आख़िर उन्होंने ग़लती मनवा कर ही छोड़ी
उधर ग़लती ने राहत की साँस ली
कि अभी उसे पहचाना नहीं गया

मेरी ओर   
मैं तुम्हारी ओर हूँ

ग़लत स्पेलिंग की ओर
अटपटे उच्चारण की ओर

सही -सही और साफ़ -साफ़ सब ठीक है
लेकिन मैं ग़लतियों और उलझनों से भरी कटी-पिटी
बड़ी सच्चाई की ओर हूँ

गुमशुदा को खोजने हर बार हाशिए की ओर जाना होता है
कतार तोड़कर उलट की ओर
अनबने अधबने की ओर

असम्बोधित को पुकारने
संदिग्ध की ओर
निषिद्ध की ओर ।

यक़ीन 
 एक दिन किया जाएगा हिसाब
जो कभी रखा नहीं गया
हिसाब
एक दिन सामने आएगा
जो बीच में ही चले गए
और अपनी कह नहीं सके
आएँगे और
अपनी पूरी कहेंगे
जो लुप्त हो गया अधूरा नक्शा़
फिर खोजा जाएगा

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

चेग्वेरा क्यों नहीं बने नामवर सिंह

               (बाएं क्रांतिकारी चेग्वेरा) 
          सवाल टेढ़ा है लेकिन जरूरी है कि चेग्वेरा क्यों नहीं बन पाए नामवर सिंह। उन्होंने क्रांतिकारी की बजाय बुर्जुआमार्ग क्यों अपनाया ? क्रांति का मार्ग दूसरी परंपरा का मार्ग है। जीवन की प्रथम परंपरा है बुर्जुआजी की है। नामवरजी को पहली परंपरा की बजाय दूसरी परंपरा पसंद है। सवाल यह है कि दूसरी परंपरा क्या है ?  दूसरी परंपरा है क्रांति की और क्रांतिकारी विचारों के निर्माण की। दूसरी परंपरा वह नहीं है जो हजारीप्रसाद द्विवेदी ने खोजी है। वह तो साहित्य की बुर्जुआ परंपरा है। यह परंपरा तो उसी बुर्जुआ साहित्य परंपरा का एक रूप है जिसे रामचन्द्र शुक्ल ने खोजा था। रामविलास शर्मा शुक्लजी की परंपरा में अटककर रह गए और बाद में और भी पीछे चल गए। नामवर सिंह ने दूसरी परंपरा की खोज की और जो बातें कहीं उनमें वे बुनियादी तौर पर बुर्जुआ चिंतन के ढ़ांचे का अतिक्रमण नहीं कर पाते।
     चे की पुण्यतिथि के मौके पर नामवर सिंह से हम यह सवाल करना चाहते हैं कि उन्होंने चे की परंपरा में जाने की बजाय बुर्जुआ परंपरा में रहना क्यों पसंद किया ? हम जानते हैं कि नामवरजी और उनके भक्तों के पास इस सवाल का जबाव नहीं है। लेकिन चे और नामवरजी में एक समानता है,चे जिस तरह सारी दुनिया में क्रांतिकारियों के प्यारे थे और हैं, नामवरजी भी प्रगतिशील , क्रांतिकारी लेखकों, युवाओं में आइकॉन की तरह हैं। हिन्दी के छात्रों में आज भी आइकॉन हैं। प्यारे हैं।
     सवाल उठता है उनके व्यक्तित्व में ऐसा कौन सा जादू है जो लोगों पर असर डालता है और उन्हें महान बनाता है ? उनसे मिलकर यही लगेगा कि किसी महान व्यक्ति से मिले। बुर्जुआ महानायकों जैसी उदारता उनके व्यक्तित्व में रच बस गयी है।
    मैं नहीं जानता कि उनके अंदर क्रांतिकारी विचारों का कौन सा महान पाठ छिपा है लेकिन एक बात उनकी चे से जरूर मिलती है वे चे की तरह असहमत होना जानते हैं और अपनी असहमति को वे बताना,समझाना और व्यवहार में उतारना भी जानते हैं। नामवरजी का यह असहमति वाला गुण क्रांतिकारी विरासत से मिलता-जुलता है। चे से उनके व्यक्तित्व की एक और बात मिलती है कि वे प्रेम के पुजारी हैं। चे की तरह उन्होंने भी प्रेम को अपने संस्कार का हिस्सा बनाया है। इसके बावजूद वे चे क्यों बन पाए यही मेरी मूल चिन्ता है।   
     चे की जिंदगी और विचारो ने करोड़ों युवाओं को सारी दुनिया में क्रांति के लिए जान निछाबर करने की प्रेरणा दी। क्रांतिकारी विचारों और क्रांति से प्यार करना सिखाया। भारत के युवाओं पर भी चे का गहरा असर रहा है। किसी भी क्रांतिकारी की जिंदगी उसके जनता के प्रति समर्पण,कुर्बानी और विचारधारात्मक स्पष्टता के पैमाने पर देखी जानी चाहिए। चे के विचारों और कर्म में गहरी एकता थी। उनमें अन्य के प्रति,उसकी मुक्ति के प्रति गहरी निष्ठा थी। चे यह नहीं मानते थे कि वे जनता के मुक्तिदाता हैं बल्कि उनका मानना था "मैं मुक्तिदाता नहीं हूँ। मुक्तिदाता का अस्तित्व नहीं होता। जनता स्वयं को मुक्त करती है।"
    हमें देखना चाहिए कि जिस समाज में बुनियादी परिवर्तन चाहते हैं वहां क्रांतिकारी ताकतें,क्रांति के लिए प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी आखिर क्या कर रहे हैं ?क्या वे बुर्जुआ वर्ग के एजेण्डे पर काम कर रहे हैं या फिर क्रांतिकारियों के एजेण्डे पर काम कर रहे हैं ? भारत की आयरनी यह है कि यहां के क्रातिकारी बुद्धिजीवी बुर्जुआ एजेण्डे पर फुलटाइम काम करते हैं ,क्रांतिकारी एजेण्डे पर पार्टटाइम काम करते हैं। जाहिर है समग्रता में उनके कार्यों से क्रांति का कम बुर्जुआजी का ज्यादा भला होता है।
     क्रांतिकारी कार्यकलाप का प्रेम की धारणा के साथ गहरा संबंध है जो प्रेम नहीं कर सकता वह क्रांति भी नहीं कर सकता। जो प्रेम नहीं कर सकता वह भक्ति भी नहीं कर सकता। ईश्वर उपासना भी नहीं कर सकता। प्रेम हमारे समस्त जीवन की धुरी है। उसका क्रांति के साथ भी अभिन्न संबंध है। क्रांतिकारी भावों-विचारों के प्रति निष्ठा बनाने में प्रेम के प्रति कर्म और व्यवहार में वचनवद्धता जरूरी है।
    चे का मानना था"यह हास्यास्पद लग सकता है लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि सच्चा क्रांतिकारी प्रेम से निर्देशित होता है। "
   हम मध्यवर्ग के लोगों की बुनियादी समस्या यह है कि हम जीवन में सब कुछ पाना चाहते हैं। सुखी जीवन चाहते हैं। सारी सुविधाएं चाहते हैं। किसी भी किस्म के सामाजिक परिवर्तन के लिए विचार से लेकर व्यवहार तक हमारे  पास समय नहीं है। हम सारी जिंदगी जुगाड़ में लगा देते हैं। जोड़-तोड़,कुर्सी,पद,सम्मान,पैसा,शोहरत आदि हासिल करने में सारी ऊर्जा खर्च कर देते हैं और इस चक्कर में ब्लडप्रेशर से लेकर डायविटीज तक अनगिनत बीमारियों के शिकार हो जाते हैं,खाली समय में अवसाद में भोगते हैं,इससे कुछ बचता है तो निंदा में खर्च करते हैं,इससे समय बचता है तो फिर सो जाते हैं।
     हमारे पूरे जीवन के टाइमटेबिल में क्रांति और सामाजिक परिवर्तन के कामों के लिए कोई जगह नहीं होती। यदि हम महान प्रगतिशील आलोचक हुए तो सारी उम्र सेमीनार, चयन समिति,पुरस्कार समिति,अध्यक्षता आदि में आदरणीय नामवर सिंह की तरह खर्च कर देते हैं।
    आप कल्पना कीजिए नामवरसिंह जैसे महान पंडित ने क्रांति के बारे में अपने जीवन का आधा समय भी खर्च किया होता तो भारत और हिन्दीभाषी समाज का कितना उपकार हुआ होता। अंत में चे के शब्दों में " आप सब कुछ खोकर ,कुछ पाते हैं।’’ उसके बाद ही क्रांति कर पाते हैं। नामवर सिंह ने अपने जीवन में सब कुछ पाया। लेकिन बिना जोखिम उठाए। उनके जीवन की चे के मुताबिक सबसे बड़ी असफलता यही है कि उन्होंने कोई जोखिम नहीं उठाया। चे के अनुसार जोखिम उठाए बिना सब कुछ पाना जीवन की सबसे बड़ी विपत्ति है, और नामवरजी इसके आदर्श पुरूष हैं। नामवरसिंह ने सब कुछ पाया लेकिन कोई जोखिम नहीं उठाया। व्यक्तिगत जीवन से लेकर सामाजिक-राजनीतिक जीवन तक यदि वे जोखिम उठाते तो वे चे बन सकते थे।

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...