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शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

लीबिया में जल्लादवाहिनी का खूनी खेल 2000 कत्ल


                      (लीबिया का कातिल शासक गद्दाफी)
   लीबिया में कर्नल गद्दाफी की जल्लादवाहिनी ने आम लोगों के घरों में घुसकर हमले करके पीटना आरंभ कर दिया है। जो लोग गद्दाफी का विरोध कर रहे हैं उनके घरों में घुसकर पिटाई का जा रही है,गोली से भूना जा रहा है और गिरफ्तारियां की जा रही हैं। लीबिया के इस खूनी शासक ने अपनी जल्लादवाहिनी के बलबूते पर एक ऐसा तंत्र बनाया है जिसकी सारी दुनिया में कहीं पर भी मिसाल नहीं मिलेगी। इसे गद्दाफी की जल्लादवाहिनी कहना समीचीन होगा। जल्लाद वाहिनी के हमलों और अत्याचारों को देखते हुए अरब लीग ने अपने संगठन की गतिविधियों में भाग लेने से लीबिया को फिलहाल रोक दिया है और कहा है कि लीबिया के शासक पहले आम लोगों पर जुल्म करना बंद करें।
अरब लीग का मानना है लीबिया का मौजूदा प्रशासन लगातार मानवाधिकारों का हनन कर रहा है और शांतिप्रिय आंदोलनकारियों पर हिंसक हमले किए गए हैं। आम जनता के आंदोलन पर हमले जब तक जारी रहेंगे लीबिया को अरब लीग की बैठकों में हिस्सा लेने नहीं दिया जाएगा।
     लीबिया की राजधानी त्रिपोली में श्मशानी शांति है । आम लोगों को घरों से बाहर निकलने की इजाजत नहीं है। मीडिया पर पाबंदी लगी हुई है। आंदोलन के बारे किसी भी किस्म की खबरें बाहर नहीं आ रही हैं। जो लोग देश छोड़कर जा रहे हैं उनके कैमरे-मोबाइल आदि की जांच की जा रही है और किसी भी किस्म की कोई भी इमेज बाहर न जा सके इसका ख्याल रखा जा रहा है।
         गद्दाफी की तथाकथित क्रांतिकारी कमेटी जो मूलतः जल्लादवाहिनी है, का आदेश है कि जो भी व्यक्ति गद्दाफी के खिलाफ है उसे जान से मार दो और इसी आधार पर खुलेआम कत्लेआम हो रहा है।
   एक जमाने में फासिस्ट शासक विरोधी जनता को पकड़ते थे,बंदी बनाते थे,यातना देते थे, गद्दाफी ने फासिस्टों से भी एक कदम आगे जाकर विरोधी को सीधे कत्ल कर देने के आदेश दिए हैं और गद्दाफी की निजीसेना यह काम बखूबी अंजाम दे रही है। लीबिया के पूर्व के अनेक शहरों पर गद्दाफी विरोधियों का कब्जा है और इन शहरों पर फिर से गद्दाफी प्रशासन अपना राज कायम करना चाहता है। इसके कारण सीधे टकराव और खूनीजंग के आसार पैदा हो गए हैं। गद्दाफी के सैनिक लाउडस्पीकर से घोषणाएं कर रहे हैं कि विरोधी सरेंडर कर दें,जनता उनका साथ न दे वरना घरों में घुसकर हमले किए जाएंगे, कत्ल किया जाएगा।
   दूसरी ओर जनता को सड़कों पर आने और सरकारी इमारतों पर हमले करने के लिए मौलवी लोग मस्जिदों से अपील कर रहे हैं। यानी खुली खूनी टकराहट का माहौल बन गया है। लीबिया में अब तक कितने लोग मारे गए हैं और कितने घायल हुए हैं.गिरफ्तार हुए हैं किसी को कुछ नहीं मालूम। इटली के विदेश मंत्री ने कहा है  कम से कम एक हजार लोग मारे जा चुके हैं। जबकि फ्रांस के मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि 2 हजार लोग मारे जा चुके हैं।       
कॉमन ड्रीम डॉट कॉम ने मानवाधिकार कार्यकर्ता के हवाले से लिखा है "Armed Gaddafi loyalists, including some apparently from sub-Saharan Africa, were reported to have set up roadblocks and opened fire from rooftops. Another protester described ruthless violence in Green Square. "Men wearing civilian clothing in the square were shooting at us," he told Human Rights Watch. "I saw guys taking off their shirts and exposing their chests to the snipers. I have never seen anything like it. I was very ashamed to hide under a tree but I am human." दूसरी ओर गद्दाफी के खेमे में भगदड़ मची हुई है। गद्दाफी के एक करीबी रिश्तेदार ने जो जॉर्डन में राजदूत था इस्तीफा दे दिया है।अलजजीरा के अनुसार "Gaddafi is fast losing the support of his inner circle. His cousin, the country's ambassador to Jordan and a close aide in Egypt all resigned on Thursday.
Ahmed Gadhaf al-Dam, one of Gaddafi's top security official and a cousin, defected on Wednesday evening, saying in a statement issued by his Cairo office that he left the country "in protest and to show disagreement" with "grave violations to human rights and human and international laws".
Al-Dam was travelling to Syria from Cairo on a private plane, sources told Al Jazeera. He denied allegations that he was asked to recruit Egyptian tribes on the border to fight in Libya and said he went to Egypt in protest against his government's used of violence."
लीबिया में फोन,सैटेलाइट कम्युनिकेशन आदि सभी को बाधित किया जा रहा है। ज्यादातर फोन बंद पड़े हैं। राजधानी त्रिपोली में मुर्दनी छाई हुई है।अलजजीरा के अनुसार- "the Libyan capital, meanwhile, is said to be virtually locked down, and streets remained mostly deserted, even though Gaddafi had called for his supporters to come out in force on Wednesday and "cleanse" the country from the anti-government demonstrators.

Witnesses in Tripoli have told Reuters that uniformed police were directing traffic as usual, state television was broadcasting and pro-Gaddafi supporters held a rally in the city.

Libyan authorities said food supplies were available as "normal" in the shops and urged schools and public services to restore regular services, although economic activity and banks have been paralysed since Tuesday.

London-based newspaper the Independent reported, however, that petrol and food prices in the capital have trebled as a result of serious shortages.

Foreign governments, meanwhile, continue to rush to evacuate their citizens, with thousands flooding to the country's borders with Tunisia and Egypt."
      कल एक टेलीफोन प्रसारण में गद्दाफी ने ताजा आंदोलन के लिए अलकायदा,दूध ,नैस्कैफे कॉफी और नशीली दवाओं को जिम्मेदार ठहराया है।
    लीबिया में जिस तरह के हालात हैं उनमें विदेशी और देशी नागरिकों का बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है। अपना माल- असबाब छोड़कर हजारों विदेशी नागरिक किसी न किसी तरह लीबिया से निकलकर बाहर जा रहे हैं। इसके कारण पड़ोसी देशों में यात्रियों की समस्याएं उठ खड़ी हुई है। त्रिपोली में गद्दाफी के लोग देश छोड़कर जाने वालों की तलाशी ले रहे हैं,कैमरा,मोबाइल फोन आदि छीन रहे हैं और घूस में पैसे भी मांग रहे हैं।






गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

लीबिया में जनांदोलन और कुर्बानियों का जादू


          अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने लीबिया में शांतिपूर्ण आंदोलनकारियों पर पुलिसबलों के हमलों की कड़े शब्दों में निंदा की है। लेकिन उन्होंने गद्दाफी के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला है। उल्लेखनीय है  अमेरिकी प्रशासन को निंदा करने में 7 दिन लग गए। जबकि वे आमतौर पर तत्काल प्रतिक्रिया  देते हैं।
     ओबामा ने कहा है-"The suffering and bloodshed is outrageous and unacceptable,". "So are threats and orders to shoot peaceful protesters and further punish the people of Libya." "These actions violate international norms and every standard of common decency. This violence must stop."
     

          ( लीबिया के बेनगाझी शहर में सेना के टैंक पर खुशी मनाती जनता)
     मानवाधिकार संगठनों के अनुसार लीबिया में अभी तक 700 से ज्यादा आंदोलनकारियों को गद्दाफी की पुलिस और सेना मौत के घाट उतार चुकी है। ऐसी स्थिति में ओबामा का यह कथन मायने रखता है  "In a volatile situation like this one, it is imperative that the nations and peoples of the world speak with one voice,"
लीबिया में अभी जो चल रहा है वो कई मायनों में महत्वपूर्ण है। पहली बात यह कि लीबिया की जनता लोकतंत्र और अपने अधिकारों के लिए एकजुट हो रही है। दूसरी बड़ी बात यह है कि बड़े पैमाने पर जनता पर जो 41 सालों में जुल्म हुआ है उसकी पीड़ाएं और अन्याय की प्रतिक्रियाएं हो रही हैं। तीसरी बात यह कि लीबिया में कितनी खोखली शासन व्यवस्था चल रही है इसका भी पता चला है।
    मसलन् हाल के आंदोलन के कारण अनेक शहरों में नागरिक प्रशासन की बागडोर बागियों के हाथों में आ गयी है और आम जनता के आंदोलन के सामने सेना ने भी आत्मसमर्पण कर दिया है। लेकिन सेना की टुकड़ियों के इस तरह के समर्पण से गद्दाफी के शासन पर कोई खास असर नहीं होगा। इसका प्रधान कारण है गद्दाफी का समानान्तर सैन्यबल।
       
       गद्दाफी ने अपने शासन में लीबिया की सेना-पुलिस को मजबूत बनाने की बजाय अपने संगठन की सेना-पुलिस तैयार की है जिसमें हजारों वफादार और भाड़े के विदेशी सैनिक हैं। इसके कारण गद्दाफी को सेना में बगाबत से भी कोई खतरा नहीं होने वाला।क्योंकि सरकारी सेना कमजोर है। लीबिया में सेना प्रतीकात्मक रूप में है।उसकी तुलना में गद्दाफी ने जो निजी सेना बनायी है वो ज्यादा ताकतवर है। इसलिए लीबिया में सेना की नया सत्ता संतुलन बनाने में कोई बड़ी भूमिका शायद न बन पाए। जैसाकि मिस्र में देखा गया था।
गद्दाफी के भाषण में जनता के प्रति जो घृणा,अहंकार और बदले की भावना व्यक्त हुई है वो चिंन्ता की बात है। जनांदोलनकारियों को उसने क्रांक्रोच कहा है और उन्हें घर में घुसकर मारने का अपने समर्थकों से आह्वान भी किया है।
    गद्दाफी जानता है कि सेना के बगावत करने से उसका कोई नुकसान नहीं होगा। लीबिया का जनांदोलन यदि गद्दाफी की निजी सेना को तोड़ पाता है तो यह उनकी बड़ी सफलता कही जाएगी। इसके बाबजूद लीबिया की जनता एकजुट होकर प्रतिवाद कर रही है।अनेक शहरों पर उनका कब्जा हो गया है। दुनिया में भी दबाब बढ़ रहा है।
    गद्दाफी की निजी सेना का समाज में आतंक है और कोई भी व्यक्ति उनके खिलाफ एक वाक्य भी नहीं बोल सकता। आमतौर पर सार्वजनिक आलोचना सुनने को नहीं मिलती थी,आम जनता ने इस आतंक के माहौल को काटकर अब तक के आंदोलन में सफलताएं हासिल की हैं। त्रिपोली में अभी भी आतंक है। किसी भी व्यक्ति का घर से निकलना संभव नहीं है,घर के बाहर किसी भी व्यक्ति को देखते ही गोली मार देने के आदेश दे दिए गए हैं। त्रिपोली की सड़कें सुनसान हैं। शहर में जहां-तहां पुलिस और सेना के द्वारा मारे गए लोगों की लाशें पड़ी हैं। इसके अलावा जो विदेशी नागरिक हैं वे परेशान हैं कि किसी तरह सुरक्षित जान बचाकर अपने मुल्क भागें।
    अलजजीरा के अनुसार लीबिया के अनेक शहरों में आंदोलनकारियों का प्रशासन पर नियंत्रण कायम हो चुका है और इन इलाकों में सेना के अफसरों और जवानों ने गद्दाफी प्रशासन का साथ देने से इंकार कर दिया है। दूसरी ओर सारी दुनिया में अधिकांश लीबियाई राजदूतों ने इस्तीफा दे दिया है या फिर वे जनता पर हमले की आलोचना कर रहे हैं,निंदा कर रहे हैं। देश के गृहमंत्री,न्यायमंत्री,गद्दाफी के बेटे सैफ अल इस्लाम के सहयोगी  ने इस्तीफा दे दिया है। अनेक सैन्य अफसरों ने साझा बयान जारी करके जनता के आंदोलन में शरीक होने की अपील की है।  
 




बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

लीबिया का जनांदोलन और गद्दाफी का हिंसक भाषण


     लीबिया के नेता म्यूमार गद्दाफी का कल रात टीवी प्रसारण देखा। गद्दाफी साहब फासिस्टों की हिंसक भाषा में बोल रहे थे। यह भाषण जब चल रहा था तो उनके सामने जनता नहीं थी। इसका अर्थ यह है कि यह भाषण पहले रिकॉर्ड कर लिया गया था। गद्दाफी ने 75 मिनट भाषण दिया और समूचे भाषण में कहीं पर भी सभ्य भाषा का नामोनिशान नहीं था। एक राष्ट्राध्यक्ष की भाषा आज के जमाने में इस कदर हिंसक हो सकती है यह मैंने पहलीबार देखा है।
    गद्दाफी के भाषण की हिटलर की हिंसक भाषा से तुलना की जा सकती है। गद्दाफी ने अपना भाषण पुराने निवासस्थान के विध्वस्त भवन के सामने खड़े होकर दिया,यह भवन त्रिपोली में है और 1980 तक गद्दाफी साहब वहीं रहते थे। उनके इसी निवासस्थान पर 1980 में अमेरिकी बमबर्षक विमानों ने हमला किया था जिसमें यह भवन पूरी तरह ध्वस्त हो गया था और गद्दाफी साहब बच गए थे।
गद्दाफी का रहना था  "मैं लड़ाकू क्रांतिकारी हूँ और अंत तक लडूँगा और शहीद होना पसंद करूँगा।" उन्होंने सत्ता त्यागने से साफ इंकार कर दिया। गद्दाफी ने अपने समर्थकों से घरों से निकलने और सड़कों पर विरोधियों से संघर्ष करने की अपील की। गद्दाफी ने अपने भाषण में जनता को धमकी दी है कि यदि वो सही रास्ते पर नहीं आई तो उसके साथ बर्बर बर्ताब किया जाएगा। इस संदर्भ में उन्होंने कुछ उदाहरण भी दिए ,जैसे उन्होंने सन् 1989 में चीन के तियेनमैन चौक के जनसंहार का समर्थन में उदाहरण  दिया। इराक में अमेरिकी सेना ने फलूजा पर किस तरह बमबारी करके तबाही मचायी ,उसका जिक्र किया,गद्दाफी ने अपने समर्थकों का आह्वान किया कि वे घर -घर जाएं और विरोधियों को निकालकर दंडित करें। उल्लेखनीय है जिस समय गद्दाफी का भाषण दिखाया जा रहा था उस समय उनके समर्थन में मुट्ठीभर पुलिस वाले और अन्य लोग नारे लगा रहे थे। गद्दाफी अपने भाषण में वस्तुतःआम जनता को धमका रहे थे। एक तरफ उन्होंने धमकी दी कि उनके समर्थक सड़कों पर निकलेंगे और विरोधियों को सबक सिखाएंगे,दूसरी ओर  आदिवासी प्रशासन संचालकों के जरिए सारे देश में शुद्धीकरण अभियान चलाया जाएगा।
    कर्नल गद्दाफी जिस समय भाषण दे रहे थे और सारी दुनिया को यह आभास दे रहे थे कि उनका प्रशासन एकजुट है तो वहीं दूसरी ओर उनके प्रशासन के गृहमंत्री ने 17 फरवरी आंदोलन के समर्थन में इस्तीफा दे दिया और सेना से अपील की है कि वह जनांदोलन का समर्थन करे। अरबलीग के प्रधान और अमेरिका में लीबिया के राजदूत ने भी इस्तीफा देने की घोषणा की।

     हाल के वर्षों में जुलूस पर हवाई हमले, हवाई गोलीबारी कहीं नहीं देखी गयी है लेकिन गद्दाफी प्रशासन ने 17 फरवरी को जनता के शांतिपूर्ण जुलूस पर राजधानी त्रिपोली में हवाई फायरिंग करवाई जिसमें 300 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। भारत में लीबिया के राजदूत ,जिन्होंने इस्तीफा दे दिया है, उन्होंने अलजजीरा को बताया कि 17 फरवरी के जुलूस पर हवाई फायरिंग की गई है। अंतर्राष्ट्रीय नियमों के अनुसार यह मानवता विरोधी जघन्य कार्रवाई है और इसे जनसंहार कहते हैं।
    उल्लेखनीय है गद्दाफी ने अपने देश में विरोधियों से निबटने के लिए बड़े पैमाने पर भाड़े के सैनिक अल्जीरिया और दूसरे देशों से आयात किए हैं जिनका काम है जनता पर हमले करना । गद्दाफी ने अपने समर्थकों से सड़कों पर निकलकर विरोधियों को मुँहतोड़ जबाब देने की भी अपील की है। इसके अलावा आंदोलनकारियों के खिलाफ वायुसेना के बमबर्षक जहाजों,टैंक और दूसरे युद्दास्त्रों का प्रयोग करने का भी संकेत दिया है।     
     लीबिया के दूसरे सबसे बड़े शहर बेनगाजी में स्थिति यह है कि इस शहर पर विरोधियों का नियंत्रण है और इस शहर में तैनात सेना ने सरकार का साथ छोड़कर विरोधियों के आंदोलन में शामिल होने का फैसला किया है। इससे गद्दाफी की मुश्किलें और बढ़ गयी हैं। जिस समय गद्दाफी भाषण दे रहे थे ठीक उसी समय अरब लीग के मुखिया अमर मूसा ने सुरक्षा परिषद में अपने को लीबिया के प्रतिनिधिमंडल से उस समय अलग कर लिया जब सारी संस्थाओं के मुखियाओं की मीटिंग बुलाई गयी थी। सुरक्षा परिषद ने इस मौके पर जो बयान जारी किया है उसमें लीबिया प्रशासन की निंदा की गई है। बयान में कहा गया है कि "The members of the Security Council expressed grave concern at the situation in Libya. They condemned the violence and use of force against civilians, deplored the repression against peaceful demonstrators, and expressed deep regret at the deaths of hundreds of civilians."
   दूसरी ओर क्यूबा के नेता फिदेल कास्त्रो ने कहा है कि लीबिया में बिगड़ी हुई परिस्थितियों का बहाना बनाकर नाटो के हस्तक्षेप के लिए वातावरण बनाया जा रहा है। निकारागुआ के राष्ट्रपति डेनियल ऑर्तेगा ने गद्दाफी के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति हूगो चावेज अभी चुप बैठे हैं। पेरू ने अपने राजनयिक संबंधों को स्थगित कर दिया है। बोलविया सरकार ने गद्दाफी प्रशासन की निरीह जनता पर गोलीबारी की निंदा की है।
     पेरिस स्थित अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन के अनुसार विरोधियों का सिर्ती,तॉबरूक,मिसोरटा,खोम्स, तारहुनाह,जेनटिन,जाबिया ,जौरा और बेनगाजी पर नियंत्रण है। इसके अलावा लीबिया के प्रमुख आदिवासी समूह ने गद्दाफी का साथ छोड़ दिया है। उल्लेखनीय है लीबिया के प्रमुख आदिवासी समूह का विगत 40 साल से गद्दाफी को समर्थन  मिलता रहा है। और वे उनके समर्थन से ही टिके रहे हैं।  लीबिया की प्रमुख सैन्य टुकड़ी इसी आदिवासी समूह के सैनिकों की है।
    दूसरी ओर गद्दाफी के फैसलों का विरोध करे हुए और जनांदोलन का समर्थन करते हुए अनेक राजनयिकों ने इस्तीफे दे दिए हैं। लीबिया के मजदूर भी संघर्ष में कूद पड़े हैं और उन्होंने लीबिया के सबसे बड़े तेल उत्पादन केन्द्र नफूरा में कामकाज ठप्प कर दिया है।
        अब तक लीबिया के एक दर्जन से ज्यादा राजनयिक इस्तीफा दे चुके हैं। इनमें प्रमुख हैं गृहमंत्री,अरबलीग के प्रधान,इसके अलावा भारत,अमेरिका,चीन,इंण्डोनेशिया, मलेशिया, पोलैण्ड ,बंगलादेश, और आस्ट्रेलिया के राजदूतों ने भी जनांदोलन के समर्थन में इस्तीफा दे दिया है। दूसरी ओर विकसित पूंजीवादी देश अपने आर्थिक हितों की,खासकर तेलहितों की रक्षा के लिए अति सक्रिय हो उठे हैं और लीबिया की ओर अमेरिकी नौसैनिक बेड़ा,जर्मनी,इटली और नीदरलैण्ड के नौ सेना जहाज प्रस्थान कर चुके हैं। लीबिया के तेल उत्पादन केन्द्रों पर जो विदेशी कर्मचारी,इंजीनियर आदि काम कर रहे हैं उन्हें तुरंत बाहर निकालने के प्रयास किए जा रहे हैं ,क्योंकि लीबिया में जो हालात बन गए हैं उसमें गृहयुद्ध के छिड़जाने की संभावनाएं बढ़ गयी हैं। लीबिया की इतनी विस्फोटक परिस्थितियों के बाबजूद अमेरिका राष्ट्रपति बराक ओबामा और विदेश सचिव हिलेरी क्लिंटन का अभी तक कोई बयान तक नहीं आया है।     





सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

लाशों के साए में लीबिया में लोकतंत्र की तलाश


         लीबिया में कर्नल गद्दाफी के 41 साल के अधिनायकवादी शासन के खिलाफ जनता सड़कों पर निकल आयी है। वहां पर गद्दाफी और उनके परिवार का एकच्छत्र शासन है और किसी भी किस्म के प्रतिवाद,अपील,वकील,दलील की देश में कोई संभावनाएं नहीं हैं। आम जनता के प्रतिवाद में अब तक 265 से ज्यादा लोग मारे गए हैं और सैंकड़ों घायल हुए हैं। जनता का प्रतिवाद निरंतर फैल रहा है और अब तक देश के 7 शहरों में आम जनता ने जमकर प्रतिवाद आयोजित किया है। लीबिया के प्रतिवाद में आम जनता गद्दाफी के अधिनायकवाद की समाप्ति चाहती है। इसके विपरीत गद्दाफी का परिवार किसी भी कीमत पर गद्दी छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। वे अंतिम दम तक जनता से संघर्ष करने का संकल्प व्यक्त कर चुके हैं।
     गद्दाफी की तुलना किसी फासिस्ट से ही की जा सकती है। उसने आम जनता के शांतिपूर्ण जुलूसों पर बर्बर गोलीबारी की है। जमीन और आकाश से जुलूसों पर गोलीबारी की गई है। अनेक ब्लॉगर हैं जो लीबिया में जान जोखिम में डालकर लिख रहे हैं और आम जनता को एकजुट आंदोलन चलाने में मदद कर रहे हैं। लेकिन इस सप्ताह से लीबिया के शासकों ने इंटरनेट सर्वर बंद कर दिए हैं। लैंडलाइन फोन काट दिए हैं।मोबाइल सेवाओं को बाधित कर दिया है। घरों की बिजली सप्लाई बंद कर दी गयी है।
    लंदन से प्रकाशित गार्दियन ने अनुसार यहां तक कहा जा रहा है कि यदि जनता ने अपना प्रतिवाद जारी रखा तो पीने के पानी में जहर मिला दिया जाएगा। आंदोलनकारियों के मारी गयी ज्यादातर गोलियां सिर में लगी हैं। अनेक शहरों में स्थानीय पुलिस के अनेक जवानों ने जनांदोलन में शिरकत की है। कल रविवार (20 फरवरी 2011) के दिन बेनगाजी में एक साथ 60 आंदोलनकारियों की लाशों के साथ जुलूस निकाला गया था जिसमें हजारों लोगों शिरकत की। उल्लेखनीय है कि बेनगाजी शहर राजधानी त्रिपोली से 650 किलोमीटर दूर है और विपक्ष का बड़ा केन्द्र है। लीबिया में आंदोलन स्थलों पर विदेशी या स्थानीय पत्रकारों को जाने की अनुमति नहीं है और न किसी पत्रकार को फो से बात करने दी जा रही है। फोन कटे पड़े हैं,या काट दिए जाते हैं। जो सूचनाएं बाहर आ रही हैं उनकी पुष्टि करना संभव नहीं  है। लीबिया में चल रहे आंदोलन के संदर्भ में   Shariah Scholars Association, Libya  Sheikh Nasrallah Said Akkub ने जो बयान दिया है वह उल्लेखनीय है। उन्होंने कहा है-
''Bear the Jamiat Ulema-law of Libya Libyan regime fully responsible for everything that happened and is happening from the massacres and crime against the citizens of Libya's isolation, carrying Colonel Muammar Gaddafi personally and his children and those around him responsible for the rivers of blood flowing and flowing profusely in all our cities Libya, especially in the city of Benghazi, and responsibility Launched for the lives that have killed for premeditated and deliberate, which amounted to hundreds, and the wounded, whose number exceeded one thousand wounded during a few days, so by the foreign mercenaries from Africa and elsewhere, and by the militias of the Revolutionary Committees armed under the control of Colonel Muammar Gaddafi personally.
It calls on the Assembly of Shariah scholars to Libya all the sons and daughters of our Libyan east and west, north and south, and all tribes, and the Libyan families and our armed forces and honest security services and the nobility of the revolutionary committees to stand together and cohesion with their fellow citizens demanding a decent life and decent living, and freedom, dignity and social justice, and the lifting of restrictions of oppression and shackles of injustice , and all forms of despotism and tyranny, and asking them to prevent militia, the Revolutionary Committees and foreign mercenaries to kill the sons and daughters Libya insulation, and to stop the bleeding blood-Libi, and learning that they stand with their fellow citizens and legitimate duty, patriotic does not excuse the failure to him.  Also confirms Association Sharia scholars to Libya that the legitimacy of Colonel Muammar Gaddafi has fallen a legitimate, popular and morally, and it calls for the trial to a fair trial to be a lesson to all criminal and serial killer, and calls for the Assembly of Sharia scholars Libya international courts to issue a request to bring the right of Colonel Muammar Gaddafi, to be tried as a war criminal.''
इसके अलावा सुन्नी बोर्ड के प्रधान का भी एक बयान आया है जिसमें कहा गया है-
In the name of God the Merciful
Praise be to Allah, and peace and blessings be upon His Messenger Secretary and after: The eye tears and the heart to grieve, do not say except what pleases our Lord and God and to Him we shall return, and no strength except in Allah the Almighty. The heart of any Muslim can be received by the painful news we get from Libya beloved killed a number of sons at the hands of their children some security men who are supposed to be protectors of their fellow compatriots.
It is a truism to recall in this place how great bloodshed, and murder innocent people, how Allah Almighty says: {And whoever kills a believer intentionally, his recompense is Hell to abide therein and the wrath of God upon him, and prepared for him a great punishment}, and says: {for that we wrote to the Children Israel that whoever kills the same or corruption in the earth as if he killed all people live as if it is recited by all the people} And our Prophet peace be upon him says: (still a believer in a space of religion unless it pours blood haram).
We urgently call on the following: 1 off the battalions that are fired live bullets on civilian demonstrators. Two immediate halt to all who gave the orders to fire live bullets at demonstrators and carried out these orders and bring them to trial.
3 released immediately to all detainees who have been security agents arrested them without any conditions. 4 to allow citizens to demonstrate peacefully to demand their rights without intimidation, and intimidation.5 respect people's right to self-determination.
We as a matter of legitimate performance of the Secretariat these messages go to everyone who has a heart or who gives ear and earnestly witnesses. The first message: To all those who bear the responsibility, and wore a dress the Secretariat, and presented himself to the question in the world and the Hereafter true to say peace be upon him {you is a shepherd and is responsible for his flock shepherd and is responsible for his flock}: to improve their listening to the demands of their brothers and their children, who came out to express them peaceful world without violence or abuse, and consider it into wisdom, justice and equity, and to know that these young men are sons of this homeland, and that the right which is guaranteed to them all the heavenly religions and all laws ground to express their demands, needs and grievances and aspirations of all freedom of choice and, secretly and openly, individually and collectively, is committed to peace and non-aggression.
The second message: To all Secretaries of the committees on security and public sectors in Libya: to issue orders and categorically to prevent the use of force against unarmed innocent people, and that they take at the hands of anyone who violates it, the they do not they partners in the crime of murder, and will bear full responsibility before God for every drop of blood being shed from the blood of the sons of the Libyan people Aziz.
The third message: To our brothers and sisters of the Libyan people who came out demanding their rights to commit themselves to peaceful expression, and to come together on the word either, and decide what they want clearly, and adhere to the ethics of Islam in such a citizen that forbid the use of curses, insults, and the injustice of others, and abuse the property of innocent people and destroying their shops, or their windows or lighting the fire in the public utilities and the like.
{And Allah has full power over His Affairs, but most people do not know}.
And free on Friday, 15 Rabi I 1432 - 02/18/2011
President of the Association: Dr.. Ahmad Chris
Secretary-General of the Commonwealth of d. Safwat Hegazi
Date: 20/02/2011
अलजजीरा के अनुसार मानवाधिकार संगठनों ने भी लीबिया के बारे में क बयान जारी किया है,अलजजीरा के अनुसार- Crossed the Arab Organization for Human Rights expressed its strong condemnation of what it called the massacre of protesters in Libya. The African mercenaries and the elements of the Revolutionary Committees, firing live bullets at demonstrators.

The statement said the organization was in Cairo yesterday Eighty people were killed in the protests, which began peaceful demonstrations in the early days the first three, and that its goal was to obtain political freedoms, respect for human rights, combating corruption, and to desist from repressive means in the management of the country, and the accountability of perpetrators of massacres of prisoners at Abu properly.

The organization said that the Libyan security services were involved, "Sadly," with African mercenaries and the elements of the Revolutionary Committees in the use of live bullets to quell protesters, and the threat of the revolutionary committees of more killings and intimidation what it calls a shocking reply landing on the demonstrators.

The statement said "The system is arranged counter-demonstrations led by Colonel (Muammar) Gaddafi personally in Tripoli, and carried by public TV, as well as blocking the Internet and mobile phone in areas of protests, and so on as used in Egypt, which backfired."

The organization called the Libyan authorities to refrain from "acts of murder and intimidation and immediately release all detainees."

It also called for an international investigation into the massacres taking place in Libya, "after all efforts failed since 1996 to conduct a serious investigation into the massacre of more than 1200 people in the Abu Salim prison."
Date: 20/02/2011





रविवार, 20 फ़रवरी 2011

मिस्र में आखिरकार अभी आंदोलन क्यों हुआ ?


              मध्यपूर्व के अरब देशों में प्रतिवाद की आंधी चल रही है। सारे ज्ञानी और विशेषज्ञ परेशान हैं कि आखिरकार यह आंधी कहां से आई ? मिस्र में लोकतंत्र का जो आंदोलन चल रहा है वह इसी समय क्यों सामने आया ?  मिस्र और दूसरे अरब देशों में जनता आज कुर्बानी के लिए आमादा क्यों है ? कुर्बानी और लोकतंत्र का यह जज्बा पहले क्यों नहीं दिखाई दिया ? लोकतंत्र का महानतम लाइव टीवी कवरेज क्यों आया ? इत्यादि सवालों पर हमें गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए।
अरब में लोकतंत्र और सर्वसत्तावादी शासकों के खिलाफ जो आंधी चल रही है उसका बुनियादी कारण है इराक में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की सैन्य-राजनीतिक पराजय और उनका वहां से पलायन। आज अमेरिका इस स्थिति में नहीं है कि वह इराक में जीत जाए। इतने व्यापक खून-खराबे और जन-धन की व्यापक हानि के बाबजूद अमेरिकी सेनाएं 2011 के अंत तक इराक से वापस आ जाएंगी ऐसा ओबामा ने कहा है।
     ओबामा के द्वारा इराक से सेना वापसी का कार्यक्रम घोषित करने के बाद से अरब जनता में अमेरिकी वर्चस्व का मिथ टूटा है। यह मिथ भी टूटा है कि मध्यपूर्व को सेना के नियंत्रण में रखा जा सकता है। साम्राज्यवाद और उसके गुर्गे तब तक ही शासन करते हैं जब तक सेना संभालने में सक्षम हो। सैन्य नियंत्रण के बिना साम्राज्यवाद अपना शासन स्थापित नहीं कर पाता। अमेरिकी सेना की वापसी इस बात का संकेत है कि अमेरिकी सेनाएं मध्यपूर्व को संभालने में सक्षम नहीं हैं। यह सैन्य आतंक के अंत की सूचना है और मध्यपूर्व और खासकर मिस्र की जनता ने इस इबारत को सही पढ़ा है।
    सामयिक अरब प्रतिवाद का पहला संदेश है भूमंडलीकरण के आने के साथ जिस अमेरिकी वर्चस्व की स्थापना हुई थी वह वर्चस्व खत्म हो गया है। जिस तरह पोलैण्ड की जनता के प्रतिवाद ने समाजवाद की सत्ता से विदाई कर दी ,समाजवाद में निहित सर्वसत्तावाद को नष्ट कर दिया था और उससे समूचा समाजवादी जगत प्रभावित हुआ था। ठीक वैसे ही भूमंडलीकरण के अमेरिकी वर्चस्व की कब्रगाह अरब मुल्क बने हैं। उल्लेखनीय है सोवियत सेनाओं की अफगानिस्तान से वापसी के बाद समाजवाद बिखरा था। इराक से सेना वापसी से अमेरिका प्रभावित होगा। उसका विश्वव्यापी सैन्यतंत्र प्रभावित होगा। यानी मुस्लिम देशों ने सोवियत संघ और अमेरिका दोनों को प्रभावित और पराजित किया है। सोवियत संघ की अफगानिस्तान से वापसी के साथ समाजवाद गया और इराक से अमेरिकी सेनाओं की वापसी की घोषणा के साथ भूमंडलीकरण -शीतयुद्ध का अंत हुआ है।
   उल्लेखनीय है शीतयुद्ध का प्रधान संघर्ष केन्द्र मध्यपूर्व है। अमेरिकी विश्व राजनीति की यह प्रमुख धुरी है। अरब जनता और अरब देशों की एकता को सबसे पहले मिस्र को साथ मिलाकर अमेरिका-इस्राइल ने तोड़ा था। आज उसी मिस्र के पिट्ठू शासक हुसैनी मुबारक और उनकी चारणमंडली को मिस्र की जनता ने ठुकरा दिया है।
    मिस्र का एक और संदेश है कि अमेरिकी वर्चस्व,सर्वसत्तावाद और सैन्यशासन को लोकतांत्रिक फौलादी एकता के आधार पर ही चुनौती दी जा सकती है।लोकतांत्रिक एकता सर्वसत्तावादी विचारधाराओं और शासकों के लिए मौत की सूचना है।   
    मिस्र में हुसैनी मुबारक ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने के बाद अज्ञातवास का निर्णय लिया है। अमेरिका को मालूम है कि मुबारक कहां रह रहे हैं। मिस्र की सेना के बड़े अफसर भी जानते हैं। कायदे से मुबारक के खिलाफ मानवाधिकार हनन के लिए मिस्र की अदालत में मुकदमे चलाए जाने चाहिए। उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए। सद्दाम और मिलोशेविच के लिए जो मानक अमेरिका ने लागू किए थे ,न्याय-अन्याय के वे मानक मुबारक पर भी लागू होते हैं।  मुबारक के खिलाफ असंख्य अपराधों की शिकायत वहां की जनता ने की है और अमेरिकी प्रशासन ने उन्हें इस तरह अज्ञातस्थान पर क्यों जाने दिया ? ओबामा प्रशासन ने अभी तक मुबारक के मानवाधिकारहनन के कारनामों पर मुँह क्यों नहीं खोला ?
    विगत तीन दशकों से मिस्र की जनता ने जिस तरह का दमन,उत्पीडन और आतंक झेला है उसका कायदे से मूल्यांकन होना चाहिए और उत्पीडितों को न्याय मिलना चाहिए । साथ ही मुबारक शासन के जो लोग मिस्र की जनता पर बेइंतिहा जुल्म ढाने के लिए जिम्मेदार हैं उनकी निशानदेही होनी चाहिए। इसके अलावा मुबारक और उनकी कॉकस मंडली के लोगों के बैंक खाते सील किए जाने चाहिए।
    आश्चर्य की बात है कि मुबारक के द्वारा किए गए मानवाधिकारों के हनन पर अमेरिकी प्रशासन और बहुराष्ट्रीय अमेरिकी मीडिया एकदम चुप्पी लगाए बैठा है।जबकि यही मीडिया इराक के सद्दाम हुसैन और यूगोस्लाविया के मिलोशेविच के मामले में अतिरंजित और झूठी मानवाधिकार हनन की खबरें तक हैडलाइन बनाता रहा है। आज किसी भी अमेरिकी मीडिया में मुबारक के अत्याचारों का आख्यान नहीं मिलेगा।
    उल्लेखनीय है सेना जनांदोलन में फूट पड़ने का इंतजार कर रही थी, बहुराष्ट्रीय मीडिया ने मुस्लिम ब्रदरहुड का फंडामेंटलिस्ट पत्ता चला था जो असफल रहा। जनता के अन्य ग्रुपों में भी दरार पैदा करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन आम जनता में लोकतंत्र की मांग पर कुर्बानी का जज्बा देखकर सभी राजनीतिक संगठनों के दिमाग सन्न हैं। मिस्र के आंदोलन में पुलिस के हाथों 300 से ज्यादा लोग मारे गए हैं । सैंकड़ों आंदोलनकारी अभी भी जेलों में बंद हैं। 24 से ज्यादा पत्रकार बंद हैं।विगत 25 सालों में लोकतंत्र के लिए दी गई यह विश्व की सबसे बड़ी कुर्बानी है।
       मिस्र के जनांदोलन ने अरब औरतों के बारे में कारपोरेट मीडिया निर्मित मिथ तोड़ा है । अरब औरतों ने जिस बहादुरी और समझबूझ के साथ इस आंदोलन में नेतृत्वकारी भूमिका अदा की है उसने बुर्केवाली,बेबकूफ,जाहिल मुस्लिम औरत की ग्लोबल मीडिया निर्मित इमेज को पूरी तरह तोड़ दिया है। बगैर किसी फेमिनिज्म के इतने बड़े पैमाने पर औरतों का संघर्ष में सामने आना, व्यापक शिरकत करना और नेतृत्व करना अपने आप में इस दौर की महानतम उपलब्धि है। औरतों का प्रतिवाद बगैर फेमिनिज्म के भी हो सकता है यह संदेश अमेरिकी विचारधाराओं के गर्भ से पैदा हुए फेमिनिज्म को संभवतः समझ में नहीं आएगा। 
    मिस्र के जनांदोलन में युवाओं का जो सैलाब दिखा है,मजदूर संगठनों का जो जुझारू और संगठित रूप दिखा है उसने संदेश दिया है कि लोकतंत्र की अग्रणी चौकी की रक्षा की कल्पना मजदूरों के संगठनों के बिना नहीं की जा सकती।
    उल्लेखनीय है पोलैंड में मजदूरवर्ग ने ही समाजवाद को चुनौती दीथी और समाजवादी व्यवस्था के सर्वसत्तावाद को नष्ट किया था। मिस्र में भी मजदूर अग्रणी कतारों में हैं। देश के सभी मजदूर संगठनों ने व्यापक रूप में कामकाज ठप्प कर दिया । समूचे प्रशासन को ठप्प कर दिया। तहरीर एस्क्वेयर पर वे अग्रणी कतारों में थे।
     तहरीर चौक पर स्त्रियों, मजदूरों और युवाओं की धुरी के कारण मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे फंडामेंटलिस्ट संगठन को अपने फंडामेंटलिस्ट एजेण्डे को वैसे ही स्थगित करना पड़ा जैसे एनडीए में भाजपा को अपने हिन्दुत्व के एजेंडे को त्यागना पड़ा। इसी तरह अमेरिकी फंडिंग से चलने वाले किफाया संगठन को भी अपने एजेण्डे को स्थगित रखने पर मजबूर किया।
     औरतों,मजदूरों और युवाओं की व्यापक लोकतांत्रिक फौलादी एकता ने मिस्र और अरब देशों में लोकतंत्र की अकल्पनीय विकल्पों की संभावनाओं के द्वार खोले हैं। किफाया और मुस्लिम ब्रदरहुड अपने एजेण्डे में सफल नहीं हो पाए हैं इसका बड़ा श्रेय औरतों, मजदूरों और युवाओं के संगठनों के बीच पैदा हुई लोकतांत्रिक एकता को जाता है।
     सारी दुनिया में भूमंडलीकरण और नव्य उदार आर्थिक नीतियों के शिकार मजदूर,औरतें और युवा रहे हैं अतः मिस्र में ये वर्ग और समुदाय संघर्ष और कुर्बानी की अग्रणी कतारों में हैं।
    मिस्र के जनांदोलन के कारण मध्यपूर्व में नए सिरे से युवाओं की लोकतांत्रिक जुझारू राजनीति में दिलचस्पी बढ़ेगी। अरब युवाओं के बागी तेवर नए सिरे से देखने को मिलेंगे। मिस्र के जनांदोलन ने युवाओं को नए सिरे से पहचान दी है और आज उनके पास टेलीविजन और इंटरनेट जैसा सशक्त माध्यम भी है।
    मिस्र के जनांदोलन ने कारपोरेट मीडिया के जन-उपेक्षा और नियंत्रण का मिथ तोड़ा है। यह संदेश दिया है जनता का यदि कोई तबका आंदोलन करेगा तो टीवी वाले वहां सहयोगी होंगे। टीवी का सिर्फ कारपोरेट -मनोरंजन एजेण्डा नहीं होता बल्कि लोकतांत्रिक राजनीति के प्रचार-प्रसार का भी एजेण्डा हो सकता है।
    अलजजीरा-अलअरबिया-बीबीसी लंदन आदि के कवरेज में कोई भी नजरिया व्यक्त हुआ हो,लेकिन आंदोलन के फ्लो का अहर्निश कवरेज हैडलाइन बना रहा है। कई दिनों तक लाइव कवरेज चलता रहा है। अभी तक मध्यपूर्व से सैन्य ऑपरेशन का लाइव कवरेज आया था जो 1992-93 में सीएनएन ने दिखाया था ।वह अमेरिकी वर्चस्व के चरमोत्कर्ष का कवरेज था। इस कवरेज को मिस्र की जनता के आंदोलन के कवरेज ने धो दिया है। मिस्र में मुबारक के खिलाफ जो गुस्सा था उस गुस्से में अमेरिकी नीतियों,नव्य उदार भूमंडलीकरण, सैन्यशासन और सर्वसत्तावाद के खिलाफ जन प्रतिवाद शामिल है। टीवी के लोकतांत्रिक लाइव कवरेज के मामले में मिस्र ने बाजी मार ली है। कहने का अर्थ यह है कि मीडिया के नए एजेण्डे की प्रयोगस्थली मध्यपूर्व है। विकसित पूंजीवादी देश नहीं। 





शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

लोकतंत्र चाहती है मिस्र की जनता


     कल सारी रात बीबीसी वर्ल्ड पर टीवी पर मिस्र का लाइव प्रसारण देख रहा था। उसमें दो भाषण भी सुने। पहला भाषण था राष्ट्रपति हुसैनी मुबारक का और दूसरा था उपराष्ट्रपति सुलेमान का। दोनों ही भाषण सत्ता और दमन के मद में भरे हुए थे। इन दोनों के प्रसारण के बाद जनता का आक्रोश सातवें आसमान पर है आज मिस्र की जनता शुक्रवार की नवाज के बाद राष्ट्रपति प्रासाद की ओर जा सकती है ?टीवी में जनता एकदम निहत्थी और दोनों शासक सत्ता के नशे में चूर थे।
     मैं मुबारक का भाषण सुनते हुए एक बात सोच रहा था कि तानाशाह के कान नहीं होते। लाखों जनता का हुजूम पिछले 18 दिनों से आंदोलन कर रहा है। विश्व में चारों ओर थू-थू हो रही है इसके बाबजूद मुबारक साहब की हेकड़ी कम नहीं हुई है। वे लोग भी इस जनांदोलन से परेशान हैं जो आंदोलन को सीमित दायरे में रखकर चलाना चाहते थे।अमेरिकी गुर्गे चंद संवैधानिक संशोधनों के जरिए सत्ता हथियाना चाहते हैं। जनता उनकी भी सुनने को तैयार नहीं है। 
   जैसाकि हमने लिखा भी है कि इस आंदोलन में मजदूरवर्ग की बड़ी भूमिका है। इसकी प्रतिध्वनियां कल के लाइव प्रसारण में सुनाई दे रहीं थीं मिस्र की आम जनता के मुख से नारा निकल रहा था हमें धर्मनिरपेक्ष मिस्र चाहिए। लोकतांत्रिक मिस्र चाहिए। ये वे नारे हैं जिन्हें मिस्र में मजदूर लगाते हैं । मजदूरों का मुस्लिम ब्रदरहुड पर भी असर पड़ा है उन्होंने अपनी अनेक फंडामेंटलिस्ट बातों को फिलहाल त्याग दिया है,इससे एक पुख्ता और लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष मिस्र की संभावनाएं प्रबल हो उठी हैं।
     आम जनता संविधान संशोधन नहीं चाहती बल्कि नये लोकतांत्रिक शासक और नया लोकतांत्रिक संविधान चाहती है और ये ही बातें अल -अहराम की संवाददाता ने भी लाइव प्रसारण के दौरान कही। मुबारक के भाषण के तत्काल बाद अलबरदाई ने कहा कि मुबारक के भाषण के बाद जनता और भड़केगी।
    अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा  सामान्य अधिकारों के हस्तांतरण से जनता शांत होने वाली नहीं है। लोकतंत्र की कैसे स्थापना होगी इसके बारे में साफ तौर पर कार्यक्रम की घोषणा की जानी चाहिए। मिस्र के राष्ट्रपति ने सत्ता हस्तांतरण की बात कही है लेकिन क्या यह तत्काल होगा ? क्या सत्ता हस्तांतरण अर्थपूर्ण और पर्याप्त होगा ?
    दूसरी ओर उपराष्ट्रपति सुलेमान को कुछ अधिकार सौंपे जाने की बात कही है राष्ट्रपति ने ।जिसे जनता ने ठुकरा दिया है। उल्लेखनीय है सुलेमान साहब उपराष्ट्रपति बनने के पहले मिस्र की जासूसी संस्था के प्रधान रहे हैं और सीआईए के लिए सीधे काम करते रहे हैं। विकीलीक के 2007 के केबल में साफ कहा गया है कि मिस्र में मुबारक का उत्तराधिकारी कौन हो सकता है।यह केबल अमेरिका के किसी राजनयिक ने भेजा है और यह डिप्लोमेटिक केबल है। केबल 14 मई 2007 को भेजा गया था।शीर्षक था- 'Presidential Succession in Egypt', देखें विकीलीक क्या कहता है- ''Egyptian intelligence chief and Mubarak consigliere, in past years Soliman was often cited as likely to be named to the long-vacant vice-presidential post. In the past two years, Soliman has stepped out of the shadows, and allowed himself to be photographed, and his meetings with foreign leaders reported. Many of our contacts believe that Soliman, because of his military background, would at least have to figure in any succession scenario."   
    उपराष्ट्रपति सुलेमान सन् 1993 से मिस्र की जासूसी संस्था के प्रधान रहे हैं। और हाल में जनांदोलन के बाद हुए सत्ता परिवर्तन में उन्हें राष्ट्रपति पद दिया गया है और उनके ही हाथों में राष्ट्रपति के कुछ अधिकार स्थानांतरित करने की बात हो रही है। मीडिया का एक हिस्सा उन्हें ही भावी राष्ट्रपति के रूप में देख रहा है। ये जनाब सीआईए के लिए काम करते रहे हैं। यह बात अलजजीरा ने एक्सपोज की है।
   क्लिंटन के जमाने में ये साहब अमेरिका के लिए बदनाम रेंडीसन कार्यक्रम में काम करते थे। इस कार्यक्रम का लक्ष्य था संदेहास्पद आतंकियों का अपहरण और फिर उन्हें सीआईए को सौंपना।अपहरण के बाद किसी तीसरे देश में आतंकियों पर मुकदमा चलता था। डार्क साइड और जानी मयेर ने इस कार्यक्रम के बारे में लिखा है 
"Each rendition was authorised at the very top levels of both governments [the US and Egypt] ... The long-serving chief of the Egyptian central intelligence agency, Omar Suleiman, negotiated directly with top [CIA] officials. [Former US Ambassador to Egypt Edward] Walker described the Egyptian counterpart, Suleiman, as 'very bright, very realistic', adding that he was cognisant that there was a downside to 'some of the negative things that the Egyptians engaged in, of torture and so on. But he was not squeamish, by the way'. 
 "Technically, US law required the CIA to seek 'assurances' from Egypt that rendered suspects wouldn't face torture. But under Suleiman's reign at the EGIS, such assurances were considered close to worthless. As Michael Scheuer, a former CIA officer [head of the al-Qaeda desk], who helped set up the practise of rendition, later testified, even if such 'assurances' were written in indelible ink, 'they weren't worth a bucket of warm spit'."। उल्लेखनीय है यह कार्यक्रम बुश प्रशासन के दौरान आतंक के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय मुहिम के नाम से आरंभ किया गया था। मिस्र की जनता बदनाम मुबारक प्रशासन के किसी भी व्यक्ति को उत्तराधिकारी के रूप में देखना नहीं चाहती,वह मौजूदा संविधान बदलना और लोकतंत्र चाहती है और ये तेवर लगातार प्रखर हो रहे हैं।


मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

मिस्र का राजनीतिक संकट और अमरीकी खेल


      मीडिया प्रस्तुतियों में मिस्र का मौजूदा आंदोलन स्वतःस्फूर्त्त लगता है लेकिन यह संगठित और पूर्व नियोजित प्रतिवाद है। इसे सीआईए,पेंटागन और विदेश विभाग के योजनाकारों ने तैयार किया था और इसकी तैयारियां काफी पहले से चल रही थीं। ग्लोबल रिसर्च डॉट कॉम के अनुसार इसकी योजना तीन साल पहले बना ली गयी थी। इस योजना में सीआईए ने नागरिक संगठनों,ब्रदरहुड और विपक्ष के अन्य संगठनों को शामिल कर लिया था और ठीक योजना के अनुसार ही चीजें घटित हुई हैं। साथ ही इस योजना के बारे में अमेरिका के सत्तापक्ष और विपक्ष की भी सहमति ले ली गयी थी। इस समूची योजना का बुनियादी लक्ष्य था मध्यपूर्व में अमेरिकी हितों की रक्षा और विस्तार करना।
   आम जनता को दिग्भ्रमित करने के लिए मीडिया में अमेरिका के छुटभैय्या नेताओं ने हल्ला मचाया कि मिस्र में इतना बड़ा जनप्रतिवाद होने वाला था और अमेरिकी गुप्तचर संस्थाएं पहले से इसके बारे में बता नहीं पायीं। सच इसके एकदम विपरीत है। समूचा आंदोलन और उसके विभिन्न चरणों की योजना सीआईए-पेंटागन-विदेश विभाग ने बनायी थी। वे जानते थे मिस्र में आम जनता मुबारक के खिलाफ है और उन्हें हटाना चाहती है और इस गुस्से को चैनलाइज करने के लिए प्रिएम्टिव एक्शन के तौर पर जन प्रतिवाद आयोजित किया गया। सतह पर लगता है कि मिस्र की जनता के प्रतिवाद के बारे में अमेरिकी प्रशासन एकदम अंधेरे में था लेकिन सच यह नहीं है,मीडिया ने इसे अमेरिका की जासूसी संस्थाओं की असफलता कहा है और इस प्रचार को बहाने के रूप में इस्तेमाल करते हुए अमेरिकी प्रशासन मिस्र और दूसरे मध्यपूर्व के देशों में अपने जासूसी नेटवर्क को और भी पुख्ता बनाने में जुट गया है।
    मिस्र के जनांदोलन की विशेषता है कि इसे आरंभ किसी भी मंशा से किया गया हो और इसका नेतृत्व किसी भी गुट या राजनीतिक विचारधारा के हाथ में हो लेकिन इस इसके दूरगामी असर होंगे। आम मिस्रवासियों में लोकतंत्र की भावना मजबूत होगी,लोकतंत्र का रास्ता खुलेगा और सामान्य जीवन में लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आकर्षण बढ़ेगा।
     मिस्र के अभी के हालत में कोई सरकार संयुक्त मोर्चे के बिना नहीं बनेगी और सेना की उसमें प्रमुख भूमिका रहेगी ।यही बात अमेरिकी प्रशासन ,मिस्र की सेना और राष्ट्रपति मुबारक का दल चाहता है। इस आंदोलन में ऐसी भी ताकतें हैं जो चाहती हैं कि मिस्र में अमेरिकी वर्चस्व को खत्म किया जाए। दूसरी ओर इस्राइल और यहूदी लॉबी चाहती है कि मिस्र में सेना का प्रशासन में वर्चस्व बना रहे। अमेरिका भी अपने हितों के विस्तार के लिए मिस्र की सेना पर ही निर्भर है। यह बिडम्बना है कि अमेरिका मिस्र में सेना को सत्ता मे बने रहने देना चाहता है जबकि कायदे से मिस्र में नागरिक प्रशासन होना चाहिए और अमेरिका भी यदि लोकतत्र का पक्षधर है तो उसे नागरिक प्रशासन पर जोर देना चाहिए। लेकिन अमेरिका चाहता है किसी भी तरह सेना और फंडामेंटलिस्टों का समझौता हो जाए और लोकतांत्रिक शक्तियों को अलग-थलग कर दिया जाए। इस क्रम में ही फंडामेंटलिस्ट संगठन ब्रदरहुड को बातचीत के लिए बुलाया गया है।
    सवाल उठता है मिस्र के राष्ट्रपति हुसैनी मुबारक के साथ ओबामा प्रशासन के संबंध क्यों खराब हुए ? इसका प्रधान कारण है अमेरिका की ईरान नीति। ईरान का ओबामा ने जिस तरह विरोध किया और परमाणु कार्यक्रम के आधार पर ईरान विरोधी जो रूख अपनाया है ,मिस्र के राष्ट्रपति मुबारक ने उस नीति का समर्थन करने से मना किया और विरोध किया है। इसके कारण अमेरिकी प्रशासन ने मुबारक की पीठ पर से अपना हाथ हटा लिया और मुबारक के खिलाफ जनांदोलन को हवा दी और साफ कहा कि आंदोलन का दमन नहीं किया जाना चाहिए।
      मिस्र में इन दिनों इंटरनेट की खपत बढ़ी है। फेसबुक और ट्विटर के सदस्यों की संख्या 2009 में आठ लाख थी ,विगत दो सालों में इसमें इजाफा हुआ है। इस बार के आंदोलन में दो बड़े धड़े हैं जो सक्रिय रहे हैं पहला है किफाया ग्रुप और दूसरा है मुस्लिम ब्रदरहुड,इसके अलावा बड़े पैमाने पर मजदूर संगठनों की इसमें शिरकत रही है। मजदूर संगठनों की कोई राजनीतिक पहचानवाला नेता सामने नहीं आया है जबकि अन्य गुटों के नेता सामने आ चुके हैं।
   आरंभ में किफाया संगठन ने ही समूचा आंदोलन योजनाबद्ध ढ़ंग से तैयार किया था। यह संगठन अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष अल बरदाई का 2011 में होने वाले राष्ट्रपति के चुनाव में उम्मीदवार के रूप में समर्थन की घोषणा कर चुका है और यह बेहद संगठित दल है और अत्याधुनिक संचार तकनीक और उसकी विभिन्न विधाओं में दक्ष कैडरवाहिनी इसके पास है। यह संगठन मिस्र में परिवर्तनों की मांग करता रहा है और पेंटागन और रैंड कारपोरेशन के साथ इसके गहरे संबंध हैं। किफाया का अर्थ है 'बहुत हुआ।' इसके कैडरों को अमेरिकी वित्तीय संस्थानों के कुशल लोगों ने प्रशिक्षित किया है।  
  उल्लेखनीय है कि National Endowment for Democracy  नामक संगठन बड़े पैमाने पर सन् 2001 से अप्रीका और मध्यपूर्व में विभिन्न सत्ताओं को अपदस्थ करने का काम करता रहा है। इस संगठन की वेबसाइट पर तिब्बत से यूक्रेन ,वेनेजुएला से लेकर अफगानिस्तान,इराक,ईरान तक के उन देशों के नाम दिए हैं जहां पर यह सक्रिय है,इसके अलावा मिस्र,ट्यूनीशिया,जोर्डन,कुवैत,लीबिया ,सीरिया,यमन,सूडान आदि में यह संगठन विभिन्न स्वयसेवी संस्थाओं के जरिए सक्रिय है। इस संगठन की वेबसाइट पर जानकारी दी गयी है कि किफाया नामक संगठन को National Endowment for Democracy से आर्थिक मदद मिलती रही है।
     उल्लेखनीय है National Endowment for Democracy को अमरीकी कांग्रेस से सीधे फंड मिलता है। संक्षेप में इसे 'नेड' कहते हैं, इस संगठन के निर्माता और प्रथम अध्यक्ष एलीन विंस्टीन ने 'वाशिंगटन पोस्ट' को 1991 में कहा था कि  “a lot of what we do today was done covertly 25 years ago by the CIA”
    'नेड' के निदेशकों में अमेरिका के भू.पू. रक्षासचिव,सीआईए के उपाध्यक्ष,कारयेले ग्रुप के फ्रेंक कारलूसी,नाटो के पूर्व जनरल वीसली क्लार्क,नव्य संकीर्णवादी युद्धपंथी जलमे खिलाजाद,ये जनाव बुश के जमाने में अफगानिस्तान पर हमले के योजनाकार और बाद में अफगानिस्तान में अमेरिकी राजदूत रहे हैं। मिस्र के मौजूदा आंदोलन में यह संगठन मूलाधार में बैठा हुआ है। 





शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

मिस्र के जनांदोलन की बदलती तस्वीर



मिस्र के जनांदोलन की तस्वीर और भी ज्यादा जटिल रूप ग्रहण करती जा रही है और राष्ट्रपति हुसैनी मुबारक की राजनीतिक चालें पिटती चली जा रही हैं। सेना और प्रतिवादियों में मुठभेड़ को टालने के लिए लिहाज से मुबारक ने अपने समर्थकों को मैदान में उतारा ,जगह-जगह उनके समर्थकों ने रैलियां की और मुबारक विरोधियों से मुठभेडें कीं, जिनमें आठ लोग मारे गए और सैंकड़ों घायल हुए हैं।
    जब बृहत्तर जनसमूह मुबारक के खिलाफ मैदान में था और सेना ने सीधे कार्रवाई से मना कर दिया तो ऐसे में मुबारक समर्थकों का रैलियां आत्मघाती कदम ही कहलाएगा। इस एक्शन के गलत परिणाम निकले है और कल मिस्र के प्रधानमंत्री ने इन मुठभेड़ों के लिए माफी मांगी है।

    नवनियुक्त प्रधानमंत्री अहमद शफ़ीक़ ने देश में हुई घटनाओं के लिए माफ़ी मांगी है.उल्लेखनीय है राष्ट्रपति समर्थक और विरोधी गुटों की बीच झड़पों में आठ लोग मारे गए हैं और सैकड़ों लोग घायल हुए हैं. उन्होंने हिंसा की जाँच का वादा किया है.
      प्रधानमंत्री ने कहा, "मैं इस घटना के लिए सबके सामने खुलकर माफ़ी माँगता हूँ इसलिए नहीं कि यह मेरी ग़लती थी या किसी और की. मैं तो इस बात से दुखी हूँ कि मिस्र के ही लोग इस तरह आपस में लड़ रहे हैं. फूट तो परिवारों में भी होते हैं लेकिन कल जो हुआ वह किसी योजना का हिस्सा नहीं था, मैं उम्मीद करता हूँ कि इंशा अल्लाह सब ठीक हो जाएगा।"
     जनांदोलन का ही दबाब है कि मिस्र के शासनाध्यक्ष संविधान में जरूरी परिवर्तन की बात कह रहे हैं।  उपराष्ट्रपति ने टेलीविजन से प्रसारित अपने संदेश में कहा, "हम संवैधानिक और विधायिका संबंधी सुधार लागू करेंगे और हर मुद्दे के अध्ययन के लिए एक समिति का गठन करेंगे. इसके बाद हम इसकी भी जाँच करेंगे कि ऐसी घटनाएँ क्यों हुई.।"
    मुश्किल यह है कि जनता लोकतंत्र की मांग कर रही है और लोकतंत्र का संविधान में प्रावधान ही नहीं है। लोकतंत्र से कम पर वह कुछ भी स्वीकार करने को तैयार नहीं है। मुबारक को हटाने की मांग उनकी पहली मांग है लेकिन असल मांग है मिस्र में लोकतंत्र की स्थापना की जाए। मुबारक और उनके समर्थक यदि संविधान संशोधन करके लोकतंत्र की स्थापना का संकल्प व्यक्त करते हैं तो उसका कुछ असर भी होगा।
           मुबारक और अमेरिका की रणनीति है कि किसी तरह आंदोलनकारी जनता को शांत किया जाए और उन्हें तहरीर स्क्वेयर से वापस घर भेजा जाए। लेकिन आंदोलनकारी वापस जाने को तैयार नहीं दिख रहे हैं। आंदोलनकारियों को शांत करने के लिहाज से अमेरिका ने अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अल बरदाई,उपराष्ट्रपति सामी अनान,सेना के मुखियाओं की मदद लेने का फैसला किया है साथ ही कैमिस्ट्री में नोबेल पुरस्कार प्राप्त अहमद जुएल की भी मदद ली जा रही है लेकिन अभी तक कोई अनुकूल परिणाम नहीं मिले हैं। इसका प्रधान कारण है अलबरदाई और अहमद जुएल का मिस्र में आंदोलनकारियों में कोई जनाधार नही है।
    तहरीर चौक पर सेना और टैंकों की घेराबंदी बनी हुई है। चौक पर आंदोलनकारी जमे हुए हैं। आंदोलन के दबाब में मुबारक ने पुराने मंत्रीमंडल को भंग करके जो नया मंत्रीमंडल बनाया है उसमें बड़े पैमाने पर सेना के बड़े अफसरों को रखा गया है इससे एक बात तो यह निकलती है कि अमेरिका मिस्र में आने वाले समय में जनता का शासन नहीं चाहता बल्कि नग्न सैन्यशासन चाहता है क्योंकि ये सारे परिवर्तन अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के इशारे पर हो रहे हैं।
     मुबारक और उनके साथी यह हौव्वा खड़ा कर रहे हैं कि मिस्र में ब्रदरहुड नामक फंडामेंटलिस्ट संगठन के सत्ता में आ जाने का खतरा है अतः सेना की मदद बेहद जरूरी है। असल में मिस्र के मौजूदा प्रतिवाद को संगठित किया है लोकतांत्रिक शक्तियों ने,इसमें बड़े पैमाने पर मजदूरों संगठनों की भी भूमिका है। यह सच है  मुस्लिम ब्रदरहुड संगठन मिस्र का सबसे बड़ा मुबारक विरोधी संगठन है और वह इस प्रतिवाद में शामिल है लेकिन जनता के और भी तबके शामिल हैं प्रतिवाद में।
   मुबारक विरोधियों की मांग है कि सबसे पहले राष्ट्रपति इस्तीफा दें और उसके बाद एक सभी गुटों को मिलाकर एक राष्ट्रीय सरकार का गठन किया जाए और आंदोलनकारियों की मांगों पर विचार किया जाए।
     मिस्र के प्रतिवादी आंदोलन में आम जनता पर व्यापक हमले हुए हैं साथ ही मीडिया पर भी हमले हुए हैं। यहां तक कि विदेशी पत्रकारों को गिरफ्तार और उत्पीडित किया गया है।अब तक24 पत्रकार गिरफ्तार किए गए हैं और 21 पत्रकारों पर हमले हुए हैं। पांच मामलों में पत्रकारों के उपकरण सेना ने जब्त कर लिए हैं। मुबारक प्रशासन का सबसे ज्यादा गुस्सा अल जजीरा टीवी चैनल पर है। सेना ने उसके 3 पत्रकारों को बंद कर दिया है,चार पर हमला हुआ है और एक पत्रकार लापता है। अलजजीरा के अनुसार सेना ने दर्जनों पत्रकारों के कैमरा और दूसरे संचार उपकरण छीनकर नष्ट कर दिए गए हैं।






गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

मिस्र में अमेरिका विरोधी नारे क्यों नहीं लगे ?

      मिस्र में लाखों लोग राष्ट्रपति हुसैनी मुबारक के पदत्याग की मांग करते हुए सड़कों पर निकल आए हैं और देश के विभिन्न शहरों में रैलियां कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर मुबारक के समर्थक भी सड़कों पर उतर पड़े हैं। इस सारी प्रक्रिया में एक सवाल बार-बार उठ रहा है कि इस आंदोलन में अमेरिका के खिलाफ प्रतिवाद क्यों नहीं दिखाई दे रहा ? अमेरिका विरोधी नारे क्यों नहीं दिख रहे ? जबकि अमेरिका ने विगत 30 सालों में मिस्र को मदद के बहाने पामाली के कगार पर पहुँचा दिया है और मुबारक को अंध समर्थन देकर मिस्र की जनता को अपार तकलीफें दी हैं। इसके बावजूद मिस्र के मौजूदा आंदोलन में कोई भी समूह अमेरिका के खिलाफ मुँह खोलने के लिए तैयार नहीं है।
    इस आंदोलन में शामिल विभिन्न समूह बहुत ही सीमित लक्ष्य को ध्यान में रखकर काम कर रहे हैं अधिकांश लोग इस आंदोलन को मौजूदा संविधान का सम्मान करते हुए और उसमें छोटे -मोटे संशोधन करके चलाना चाहते हैं। इस आंदोलन का सीमित लक्ष्य है राष्ट्रपति बदलो। मिस्र का मौजूदा आंदोलन देश की आर्थिक संप्रभुता और विदेशी हस्तक्षेप के सवालों को नहीं उठाना चाहता। इस आंदोलन में शामिल सभी समूह राष्ट्रपति परिवर्तन की मांग तक सीमित रखना चाहते हैं। ऐसी अवस्था में यह आंदोलन बहुत ज्यादा दूर तक नहीं जा सकता।
    उल्लेखनीय है 1991 में मध्यपूर्व युद्ध के बीच में मिस्र में विश्वबैंक -आईएमएफ का नव्य उदार आर्थिक कार्यक्रम लागू किया गया था। इस कार्यक्रम ने मिस्र की जनता की समूची अर्थव्यवस्था को ही गड़बड़ा दिया है। उसके बाद से शासन की असली कमान अमेरिकी संस्थानों के हाथ में चली गयी है। अमेरिका द्वारा संचालित नेशनल इनडोवमेंट फॉर डेमोक्रेसी और प्रीडम हाउस के द्वारा बड़े पैमाने पर मिस्र,ट्यूनीशिया और अल्जीरिया में विभिन्न स्वैच्छिक संगठनों और नागरिक समाज संगठनों को धन दिया है। और वे ही संगठन इस आंदोलन के पीछे सक्रिय हैं। इन दोनों संगठनों की कमान सीआईए के हाथों में है। इस प्रसंग में फ्रीडम हाउस ने जो प्रेस विज्ञप्ति जारी की है उसका अंश पढ़ना महत्वपूर्ण होगा। लिखा है- "Egyptian civil society is both vibrant and constrained. There are hundreds of non-governmental organizations devoted to expanding civil and political rights in the country, operating in a highly regulated environment." आगे लिखा है- Freedom House’s effort to empower a new generation of advocates has yielded tangible results and the New Generation program in Egypt has gained prominence both locally and internationally. Egyptian visiting fellows from all civil society groups received [May 2008] unprecedented attention and recognition, including meetings in Washington with US Secretary of State, the National Security Advisor, and prominent members of Congress. In the words of Condoleezza Rice, the fellows represent the "hope for the future of Egypt."
इस समूचे प्रसंग में उल्लेखनीय बात यह है कि अमेरिकी शासक एक ओर मुबारक और सैन्यशासन बनाए रखना चाहते हैं वहीं दूसरी ओर सीआईए नियंत्रित संगठन मिस्र की जनता को आंदोलित कर रहे हैं। सवाल उठता है कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं ? इसके पीछे प्रधान लक्ष्य है मिस्र में किसी अमेरिकी गुलाम को सत्ता पर बिठाना और मुबारक साहब को विदा करना । यही वजह है कि मिस्र के आंदोलन में अमेरिकी विरोध की कहीं पर गंध तक नहीं आ रही। साथ ही इसमें लोकतंत्र का भविष्य देखना भी बेबकूफी होगी। लोकतंत्र का मार्ग विदेशी हस्तक्षेप को खत्म करके ही अर्जित किया जा सकता है। मिस्र में अमेरिका का विदेशी हस्तक्षेप बना रहेगा तो लोकतंत्र नहीं आ सकता। राष्ट्रीय संप्रभुता का एजेण्डा जब तक आंदोलनकारी परिभाषित नहीं करते तब तक इस आंदोलन का कोई भविष्य नहीं हो सकता।
       



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