शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

लोकतंत्र चाहती है मिस्र की जनता


     कल सारी रात बीबीसी वर्ल्ड पर टीवी पर मिस्र का लाइव प्रसारण देख रहा था। उसमें दो भाषण भी सुने। पहला भाषण था राष्ट्रपति हुसैनी मुबारक का और दूसरा था उपराष्ट्रपति सुलेमान का। दोनों ही भाषण सत्ता और दमन के मद में भरे हुए थे। इन दोनों के प्रसारण के बाद जनता का आक्रोश सातवें आसमान पर है आज मिस्र की जनता शुक्रवार की नवाज के बाद राष्ट्रपति प्रासाद की ओर जा सकती है ?टीवी में जनता एकदम निहत्थी और दोनों शासक सत्ता के नशे में चूर थे।
     मैं मुबारक का भाषण सुनते हुए एक बात सोच रहा था कि तानाशाह के कान नहीं होते। लाखों जनता का हुजूम पिछले 18 दिनों से आंदोलन कर रहा है। विश्व में चारों ओर थू-थू हो रही है इसके बाबजूद मुबारक साहब की हेकड़ी कम नहीं हुई है। वे लोग भी इस जनांदोलन से परेशान हैं जो आंदोलन को सीमित दायरे में रखकर चलाना चाहते थे।अमेरिकी गुर्गे चंद संवैधानिक संशोधनों के जरिए सत्ता हथियाना चाहते हैं। जनता उनकी भी सुनने को तैयार नहीं है। 
   जैसाकि हमने लिखा भी है कि इस आंदोलन में मजदूरवर्ग की बड़ी भूमिका है। इसकी प्रतिध्वनियां कल के लाइव प्रसारण में सुनाई दे रहीं थीं मिस्र की आम जनता के मुख से नारा निकल रहा था हमें धर्मनिरपेक्ष मिस्र चाहिए। लोकतांत्रिक मिस्र चाहिए। ये वे नारे हैं जिन्हें मिस्र में मजदूर लगाते हैं । मजदूरों का मुस्लिम ब्रदरहुड पर भी असर पड़ा है उन्होंने अपनी अनेक फंडामेंटलिस्ट बातों को फिलहाल त्याग दिया है,इससे एक पुख्ता और लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष मिस्र की संभावनाएं प्रबल हो उठी हैं।
     आम जनता संविधान संशोधन नहीं चाहती बल्कि नये लोकतांत्रिक शासक और नया लोकतांत्रिक संविधान चाहती है और ये ही बातें अल -अहराम की संवाददाता ने भी लाइव प्रसारण के दौरान कही। मुबारक के भाषण के तत्काल बाद अलबरदाई ने कहा कि मुबारक के भाषण के बाद जनता और भड़केगी।
    अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा  सामान्य अधिकारों के हस्तांतरण से जनता शांत होने वाली नहीं है। लोकतंत्र की कैसे स्थापना होगी इसके बारे में साफ तौर पर कार्यक्रम की घोषणा की जानी चाहिए। मिस्र के राष्ट्रपति ने सत्ता हस्तांतरण की बात कही है लेकिन क्या यह तत्काल होगा ? क्या सत्ता हस्तांतरण अर्थपूर्ण और पर्याप्त होगा ?
    दूसरी ओर उपराष्ट्रपति सुलेमान को कुछ अधिकार सौंपे जाने की बात कही है राष्ट्रपति ने ।जिसे जनता ने ठुकरा दिया है। उल्लेखनीय है सुलेमान साहब उपराष्ट्रपति बनने के पहले मिस्र की जासूसी संस्था के प्रधान रहे हैं और सीआईए के लिए सीधे काम करते रहे हैं। विकीलीक के 2007 के केबल में साफ कहा गया है कि मिस्र में मुबारक का उत्तराधिकारी कौन हो सकता है।यह केबल अमेरिका के किसी राजनयिक ने भेजा है और यह डिप्लोमेटिक केबल है। केबल 14 मई 2007 को भेजा गया था।शीर्षक था- 'Presidential Succession in Egypt', देखें विकीलीक क्या कहता है- ''Egyptian intelligence chief and Mubarak consigliere, in past years Soliman was often cited as likely to be named to the long-vacant vice-presidential post. In the past two years, Soliman has stepped out of the shadows, and allowed himself to be photographed, and his meetings with foreign leaders reported. Many of our contacts believe that Soliman, because of his military background, would at least have to figure in any succession scenario."   
    उपराष्ट्रपति सुलेमान सन् 1993 से मिस्र की जासूसी संस्था के प्रधान रहे हैं। और हाल में जनांदोलन के बाद हुए सत्ता परिवर्तन में उन्हें राष्ट्रपति पद दिया गया है और उनके ही हाथों में राष्ट्रपति के कुछ अधिकार स्थानांतरित करने की बात हो रही है। मीडिया का एक हिस्सा उन्हें ही भावी राष्ट्रपति के रूप में देख रहा है। ये जनाब सीआईए के लिए काम करते रहे हैं। यह बात अलजजीरा ने एक्सपोज की है।
   क्लिंटन के जमाने में ये साहब अमेरिका के लिए बदनाम रेंडीसन कार्यक्रम में काम करते थे। इस कार्यक्रम का लक्ष्य था संदेहास्पद आतंकियों का अपहरण और फिर उन्हें सीआईए को सौंपना।अपहरण के बाद किसी तीसरे देश में आतंकियों पर मुकदमा चलता था। डार्क साइड और जानी मयेर ने इस कार्यक्रम के बारे में लिखा है 
"Each rendition was authorised at the very top levels of both governments [the US and Egypt] ... The long-serving chief of the Egyptian central intelligence agency, Omar Suleiman, negotiated directly with top [CIA] officials. [Former US Ambassador to Egypt Edward] Walker described the Egyptian counterpart, Suleiman, as 'very bright, very realistic', adding that he was cognisant that there was a downside to 'some of the negative things that the Egyptians engaged in, of torture and so on. But he was not squeamish, by the way'. 
 "Technically, US law required the CIA to seek 'assurances' from Egypt that rendered suspects wouldn't face torture. But under Suleiman's reign at the EGIS, such assurances were considered close to worthless. As Michael Scheuer, a former CIA officer [head of the al-Qaeda desk], who helped set up the practise of rendition, later testified, even if such 'assurances' were written in indelible ink, 'they weren't worth a bucket of warm spit'."। उल्लेखनीय है यह कार्यक्रम बुश प्रशासन के दौरान आतंक के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय मुहिम के नाम से आरंभ किया गया था। मिस्र की जनता बदनाम मुबारक प्रशासन के किसी भी व्यक्ति को उत्तराधिकारी के रूप में देखना नहीं चाहती,वह मौजूदा संविधान बदलना और लोकतंत्र चाहती है और ये तेवर लगातार प्रखर हो रहे हैं।


2 टिप्‍पणियां:

  1. अब तो सेना ने बागडोर सम्भाल ली है। लगता है वो कहावत सच निकले.. नमाज़ बख्श्वाने गए तो रोज़े गल्ले पड़े ॥

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